Wednesday, January 30, 2008

साईं बाबा (18)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

त्यौहारों का समन्वय

साईं नाथ का लक्ष्य

साईं बाबा का उद्देश्य हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सद्भाव और समन्वय स्थापित करना जान पड़ता है। यही कारण रहा होगा कि वे रहते तो थे मस्जिद में पर उसका नाम उन्होंने 'द्वारका माई' रखा था। वे एक ओर तो संस्कृत के ज्ञाता थे और विशुद्ध रीति से वेद पाठ करते थे तो दूसरी ओर वे कुरान की आयतें भी कहते थे। वे पण्ढरपुर के विट्ठल भगवान के भक्त थे और राम, कृष्ण, श्री हरि के मानने वाले थे तो साथ ही उनके मुँह से हमेशा यही निकलता था कि "अल्लाह मालिक है।" साईं बाबा जाति-पाँति और धर्म के विवादों से ऊपर निर्लिप्त तथा समस्त प्राणियों का कल्याण करने वाले अवतार थै।

पूजा और त्यौहार

साईं बाबा अत्यन्त उदार थे। उन्होंने अपने भक्तों को अपने पूजा-अर्चना करने की पूरी स्वतंत्रता दे रखी थी। वे तो थे भक्त वत्सल। उनके निवास स्थान को मस्जिद या मन्दिर की अपेक्षा आश्रम कहना ही अधिक उचित होगा। शिरडी ही क्या, दूर दूर तक के लोग उनके जीवन काल में ही उनको भगवान मानते थे। भक्त जन जल के अर्ध्य से उनका पद प्रक्षालन करते थे।

मस्जिद या साईं बाबा के आश्रम में चौबीसों घण्टे धूनी जलती रहती थी। वहाँ शंख, झालर और घण्टे बजाये जाते थे। भजन होता था और नाम सप्ताह का आयोजन किया जाता था जिसमें अखण्ड राम धुन होती थी। भक्त लोग साईं बाबा को प्रातःकाल मंगल आरती, मध्याह्न की आरती और शाम को सन्ध्या आरती करते थे। साधक, साधु, सन्त और सन्यासी भी मोक्ष की अभिलाषा से उनके पास आते थे। श्रेष्ठ अग्निहोत्री ब्राह्मण भी साईं बाबा के चरणों में साष्टांग दण्डवत प्रणाम करते थे।

साईं बाबा वर्ष में चार त्यौहार मनाते थे। वे हैं - राम नवमी, जन्माष्टमी, सन्दल और ईद। इनमें से राम नवमी और जन्माष्टमी हिन्दुओं के और सन्दल तथा ईद मुसलमानों के त्यौहार हैं। इस प्रकार उन्होनें अपने जीवन में त्यौहारों का समन्वय किया था। ईद में वे नमाज पढ़ते और रामनवमी के दिन वेदपाठ करते थे। राम नवमी में नाम सप्ताह का और जन्माष्टमी में गोपाल काला का आयोजन किया जाता था।

राम नवमी और उर्स

इन दोनों त्यौहारों में पहले उर्स का आयोजन किया गया और उसके बाद राम नवमी का। कोपरगाँव में गोपाल राव गुंड नाम का एक सर्किल इंस्पेक्टर साईं बाबा का भक्त था। उसका कोई पुत्र नहीं था। साईं बाबा के आशीर्वाद से उसका एक लड़का हुआ। इसी खुशी में गोपाल राव गुंड के मन में शिरडी में उर्स और उर्स का मेला लगाने का विचार आया। यह बात सन् 1897 की है।

गोपाल राव गुंड ने अपने विचार शिरडी में साईं बाबा के भक्तों के सामने उन लोगों की सहमति लेने के लिये रखा। सबने उसका समर्थन किया। बाबा से अनुमति और आशीर्वाद मांगा गया जो उन्होंने दे दिया। साईं बाबा ने उर्स के लिये रामनवमी का दिन निश्चय किया। ऐसा जान पड़ता है कि इसमें साईं बाबा का रहस्य था। वे तो त्रिकालदर्शी और सर्वज्ञ थे। उनका उद्देश्य हिन्दू-मुस्लिम एकता थी और दूसरा यह कि उर्स का समावेश रामनवमी में होना था।

शिरडी गाँव था। वहाँ केवल दो कुँए थे जिनमें से एक सूख गया था। और दूसरे का पानी खारा था। उर्स और मेले में पीने के पानी की कठिनाई हो सकती थी जिसे पहले से ही दूर करना आवश्यक था। साईं बाबा ने खारे पानी वाले कुँए में कुछ फूल डाले और उसका पानी मीठा हो गया। तात्या पाटिल ने काफी दूर पर स्थित एक कुँए से भी पानी लाने की व्यवस्था की।

सन्दल का जुलूस

साईं बाबा का एक भक्त था अमीर शक्कर दलाल। उर्स के साथ सन्दल के जुलूस को जोड़ देने का विचार उसके मन में आया। सन्दल का जुलूस मुसलमान सन्तों के सम्मान में निकाला जाता है। इसमें चन्दन घिस कर थाली में रखते हैं। उस थाली को अगरबत्ती की सुगन्ध के साथ बैण्ड बाजा बजाते हुये जुलूस निकाल कर गाँव में घुमाते हैं। मस्जिद वापस आने पर उस घिसे हुये चन्दन को हाथ से नीम-वृक्ष के चबूतरे और द्वारका माई मस्जिद की दीवारों पर छिड़क देते हैं। साईं बाबा ने सन्दल का जुलूस निकालने की अनुमति भी दे दी।

तैयारी और जुलूस

शिरडी में उर्स और रामनवमी का जुलूस एक साथ निकालने की तैयारी और प्रबन्ध का काम शुरू हो गया। गोपाल राव गुंड का अहमद नगर में दामू अण्णा कसार नाम का एक मित्र था। उसने दो ब्याह किये थे पर उसका भी कोई पुत्र नहीं था। साईं बाबा के आशीर्वाद से उसके भी पुत्र हुये। गोपाल राव गुंड ने दामू अण्णा को एक सादा बड़ा झण्डा बनवा कर देने को कहा जो उसने दिया और नाना साहब निमोणकर से एक जरी किनारी वाला झण्डा लिया गया।

उर्स मेले का प्रबन्ध

मेले के दिन वातावरण एकदम साफ था। शिरडी के छोटे-बड़े, धनी-गरीब सभी लोग प्रबन्ध करने में लगे थे। बाहरी प्रबन्ध तात्या कोते पाटिल की जिम्मेदारी में था। भीतरी प्रबन्ध राधा कृष्णा माई नाम की बाबा की एक भक्त महिला कर रही थी। राधा कृष्णा माई का घर मेहमानों से भरा हुआ था। वह सबके लिये मिठाइयाँ और भोजन बना रही थी। एक और काम राधा कृष्णा माई ने स्वेच्छा से अपने हाथ में ले लिया था। वह काम था मस्जिद की साफ सफाउ और दीवालों की पुताई करना। साईं बाबा जिस दिन सोने के लिये चावड़ी चले जाते थे उस दिन रात को वह मस्जिद की सफाई करती थी। गरीबों को भोजन कराना भी कार्यक्रम के अन्तर्गत था। यह काम साईं बाबा को अत्यन्त ही प्रिय था। मेला निर्विघ्न सम्पन्न हुआ।

उर्स का रामनवमी में समावेश

उर्स और मेले का कार्यक्रम वर्ष प्रतिवर्ष चल रहा था। लोगों की संख्या बढ़ती जा रही थी। प्रारम्भ से ही पाँच हजार से ले कर सात हजार तक लोग एकत्र होते थे। यह संख्या कुछ ही वर्षों में बढ़ कर पचहत्तर हजार हो गई।

सन् 1912 में अमरावती के दादा साहब खापर्डे के साथ 'साईं सगुणोपासना' के रचयिता कृष्ण राव जागेश्वर भीष्म मेले में आये। वे दीक्षित बाड़ा में ठहरे। जब वे बरामदे में लेटे हुये थे और लक्ष्मण राव उर्फ काका महाजनी पूजा की सामग्री ले कर मस्जिद में जा रहे थे तब कृष्ण राव भीष्म के मन में एक विचार आया जिसे उन्होंने काका महाजनी को इन शब्दों में बताया कि, "इस तथ्य में कोई ईश्वरीय व्यवस्था अवश्य ही है कि उर्स का मेला रामनवमी के दिन लगता है। भगवान राम का जन्म दिन रामनवमी सभी हिन्दुओं को अत्यन्त ही प्रिय है। तब रामनवमी का त्यौहार क्यों न मनाया जाये।" काका महाजनी को भीष्म का यह विचार बहुत पसन्द आया और उन्होंने इसके लिये साईं बाबा से अनुमति लेने की इच्छा व्यक्त की।

रामनवमी का उत्सव मनाने के लिये कीर्तन करने वाला हरिदास प्राप्त करने की समस्या थी जिसका हल कृष्ण राव भीष्म ने स्वयं निकाल लिया। वे बोले, "राम जन्म पर मेरी रचना 'रामाख्यम' पूरी हो चुकी है। मैं स्वयं कीर्तन करूंगा।" काका महाजनी हारमोनियम बजाने के लिये राजी कर लिये गये। राधा कृष्णा माई से प्रसाद बनवाना तय किया गया। इसके बाद साईं बाबा से अनुमति लेने के लिये मस्जिद गये।

अन्तर्यामी साईं बाबा तो सब कुछ जानते थे। उन्होंने काका महाजनी से पूछा, "बाड़े में क्या बात चल रही थी?" काका महाजनी किंकर्तव्यविमूढ़ हो कर चुप हो गये। तब बाबा ने भीष्म से पूछा, "तुम क्या चाहते हो?" भीष्म ने स्पष्ट रूप से कहा, "हम लोग राम नवमी उत्सव मनाना चाहते हैं। इसके लिये आपकी आज्ञा चाहिये।" साईं बाबा ने बड़ी प्रसन्नता से अनुमति दे दी। लोगों के हृदय में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई।

(क्रमशः)

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