Friday, January 18, 2008

साईं बाबा (9)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

साईं बाबा के वेश-भूषा में परिवर्तन

शिरडी में मोहिद्दीन तम्बोली नाम का एक कुश्तीबाज पहलवान रहता था। किसी बात पर साईं बाबा और मोहिद्दीन के बीच असहमति हो गई। दोनों आपस में कुश्ती लड़े जिसमें साईं बाबा हार गये। उस दिन से उन्होंने अपने वेश-भूषा और जीवन में परिवर्तन कर लिया। उन्होंने धोती-अंगरखा पहनना और टोपी लगाना छोड़ दिया। धोती छोड़ कर लंगोट पहनने लगे। अंगरखा त्याग कर लम्बा कौपीन (कफनी) पहनना शुरू कर दिया। टोपी पहनना छोड़ कर सिर पर कपड़े का एक टुकड़ा बाँध लिया जैसा कि उनके चित्र में देखा जा सकता है। टाट के टुकड़े पर सोने लगे। वे कहते थे कि रंकपन राजापन से अच्छा होता है क्योंकि भगवान तो हमेशा रंक के साथ रहते हैं। वे दीनबन्धु हैं। साईं बाबा हमेशा कहते थे, "अल्ला मालिक है।"

साईं बाबा की ख्याति

साईं बाबा नीमगाँव के त्रिम्बक जी डैंगले को बहुत चाहते थे। बाबा साहब डेंगले का छोटा भाई था नाना साहब डेंगले। नाना साहब ने दो ब्याह किये थे पर सन्तान एक की भी नहीं थी। बाबा साहब साईं बाबा के भक्त थे और उनकी शक्ति को जानते थे। उन्होंने अपने छोटे भाई को साईं बाबा के दर्शन करने और उनसे आशीर्वाद लेने के लिये शिरडी भेजा। साईं बाबा की दया और आशीर्वाद से नाना साहब डेंगले को एक पुत्र प्राप्त हुआ। उसी समय से साईं बाबा की ख्याति लोगों के बीच बढ़ने लगी। उनका यश अहमद नगर पहुँचा जहाँ से बाबा के दर्शन, सेवा और सत्संग करने के लिये नाना साहब चान्दोरकर, केशव चिदम्बर और दूसरे अनेक भक्त शिरडी आने लगे। भाग्यशाली भक्तों ने पहचाना कि साईं बाबा परब्रह्म के अवतार हैं।

साईं बाबा के सामान और सत्संग

साईं बाबा धन-सम्पत्ति की चिन्ता कभी नहीं करते थे। उनके पास चिलम, तम्बाखू, टीन का भिक्षा पात्र, झोली, लम्बा कौपीन सिर पर बाँधने का सफेद वस्त्र का टुकड़ा और एक सटका (लकड़ी) था जिसे वे हमेशा साथ रखते थे। वे जूते या खड़ाऊ नहीं पहनते थे। टाट के एक टुकड़े की उनकी आसनी थी। वे धूनी के पास हमेशा लकड़ी के एक आड़े खम्भे (रैलिंग) पर अपने बायाँ हाँथ टिकाये दक्षिण की ओर मुँह करके बैठे रहते थे। वे अपने भक्तों से घिरे रहते थे। वे उपदेश देते, सैकड़ों कथा-कहानियाँ और दृष्टान्त बताते थे। वे सिद्ध, योगी और अवतार थे। साईं बाबा के दर्शन मात्र से ही मन को परम शान्ति मिलती थी और दर्शक मुग्ध होकर उनकी ओर आकर्षित हो जाता था। वे वेदान्त की शिक्षा देते थे। एक क्षण के लिये भी उनका मन ईश्वर के ध्यान से अलग नहीं होता था। शिरडी उनका केन्द्र था पर उनकी ख्याति पंजाब, कलकत्ता, उत्तर भारत, गुजरात, दक्षिण भारत आदि क्षेत्रों तक पहुँच चुकी थी जहाँ से लोग साईं बाबा के दर्शन करने के लिये आते। शिरडी ग्राम तीर्थ स्थान बन गया।

(क्रमशः)

1 टिप्पणियाँ:

Mired Mirage said...

अच्छी जानकारी दी, धन्यवाद ।
घुघूती बासूती

 
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