Friday, February 1, 2008

साईं बाबा (20)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

भक्तों के अनुभव

सामूहिक अनुभव

साईं बाबा की दया और चमत्कारों के जो अनुभव एक साथ अनेक व्यक्तियों को हुये उनकी परिगणना सामूहिक अनुभव में की जा सकती है। यहाँ पर ऐसे तीन सामूहिक अनुभव पर प्रकाश डाला जा रहा है।

आटे का चमत्कार

शिरडी में प्रायः सभी लोग साईं बाबा के भक्त थे। बाबा अपने भक्तों का बड़ा ध्यान रखते थे और उनकी रक्षा करने के लिये सदा तत्पर रहते थे। सन् 1910 के आसपास शिरडी के चारों ओर विसूचिका का भयंकर प्रकोप हुआ। लोग बड़ी संख्या में मरने लगे। सैकड़ों मील तक हैजे का आतंक छा गया। गाँव के गाँव श्मशान जैसे बन गये। शिरडी के लोग भी घबरा गये किन्तु उनकी रक्षा करने के लिये साईं बाबा ने उपाय सोच लिया था।

एक दिन सबेरे साईं बाबा ने मुँह हाथ धोया और चक्की से गेहूँ पीसने की तैयारी की। उन्होंने फर्श पर बोरा बिछाया और उस पर चक्की रखी। चक्की के मुँह में गेहूँ डाल कर चक्की की खूँटी पकड़ पीसने लगे। बोरे पर चक्की के चारों ओर आटा निकलने लगा। पर्याप्त मात्रा में आटा हो जाने पर बाबा ने भक्तों से कहा कि वे उस आटे को शिरडी की सीमा के चारों तरफ डाल दें। भक्तों ने वैसा ही किया और आटे की रेखा हैजा रूपी रावण के लिये लक्ष्मण रेखा बन गई। शिरडी में कहीं पर भी किसी को भी विसूचिका नहीं हुई।

आटे के द्वारा हैजे को रोक देने के चमत्कार की बात चारों तरफ फैल गई। आटा अथवा "विसूचिका निरोधक पावडर" लेने के लिये दूसरे गाँवों से हजारों लोग शिरडी आने लगे। साईं बाबा चक्की चलाते रहे, आटा बाँटते रहे और हैजे का नामोनिशान मिटाते रहे। जहाँ जहाँ और जिस जिस घर में वह आटा गया वहाँ से हैजा छू मन्तर हो गया। उस समय की अंग्रेज सरकार भी साईं बाबा का यह चमत्कार देख कर दंग रह गई।

धूनी की ज्वाला

साईं बाबा तो मायापति परब्रह्म परमात्मा थे। प्रकृति पर उनका पूरा नियंत्रण था। अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश उनके अंकुश में थे। उनकी द्वारकामाई मस्जिद में रात-दिन धूनी जलती रहती थी। एक दिन दोपहर के समय साईं बाबा के साथ लोग धूनी के पास बैठे थे। अचानक धूनी में आग की प्रचण्ड लपट निकली और वह ज्वाला छत के आड़े खम्भे (राफ्टर) को छूने लगी। यह देख कर लोग भयभीत हो गये पर किसी में साहस नहीं था कि वह बाबा से धूनी में पानी डाल कर ज्वाला को शान्त करने का अनुरोध करे।

अन्तर्यामी साईं बाबा जल्दी ही जान गये कि क्या हो रहा है। उन्होंने अपने डण्डा (सटका) उठाया और सामने के खम्भे को यह कहते हुये मारना शुरू किया कि 'नीचे उतरो, शान्त हो जावो।' सटके के प्रत्येक आघात पर ज्वाला नीचे उतरी गई और कुछ ही क्षणों में धूनी की आग सामान्य हो गई।

बवण्डर और वृष्टि शान्त

एक बार शिरडी में शाम के समय भयानक झंझावत उठा। आकाश में काले काले बादल उमड़-घुमड़ कर छा गये। तेज आंधी चलने लगी। बादल गरजने लगे। रह रह कर बिजली कौंधने लगी और मूसलाधार वृष्टि होने लगी। थोड़ी ही देर में चारों तरफ पानी की बाढ़ आ गई। लोग त्राहि त्राहि करने लगे। प्रकृति का कोप शान्त होने के बदले बढ़ता ही जा रहा था।

शिरडी के सभी लोग, पशु-पक्षी आदि तक भी डर कर मस्जिद में आ गये। लोगों ने साईं बाबा से रक्षा करने की प्रार्थना की। बाबा को दया आई। वे बाहर आये और मस्जिद के दरवाजे पर खड़े हो कर आकाश की ओर देखते हुये गरज कर कहा, "बन्द करो और अपने क्रोध शान्त करो।" कुछ ही क्षणों में वर्षा बन्द हो गई और आंधी रुक गई। बादल छँट गये और चन्द्रमा निकल आया। लोग साईं बाबा की जयजयकार करते हुये अपने अपने घर चले गये। द्वापर में परब्रह्म साईं बाबा ने ही इन्द्र के कोप से ब्रज की रक्षा की थी।

(क्रमशः)

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