Friday, February 29, 2008

साईं बाबा (36)

लेखकः स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया

महासमाधि की पूर्व सूचना

सन्त भगवान के अवतार होते हैं। उन्हें संसार की किसी भी वस्तु में तिल भर भी मोह नहीं रहता। यहाँ तक कि वे अपने शरीर से भी अलग रहते हैं। उनके शरीर तो "निज इच्छा निर्मित तनु" होते हैं। वे स्वेच्छा से शरीर धारण करते और बिना कष्ट के उसे त्याग देते हैं। साईं बाबा ने भी यही किया था।

महा समाधि लेने के दो वर्ष पूर्व सन् 1916 ई. में दशहरे (सीमोल्लंघन) के दिन साईं बाबा अपने भक्तों से धिरे हुये मस्जिद में बैठे थे। शाम का समय था। अचानक साईं बाबा को सीमा-रहित क्रोध आ गया। उन्होंने अपने सिर का कपड़ा, कफनी, लंगोट आदि को उतार कर अपने शरीर से अलग कर दिया और पूरी तरह से निर्वस्त्र हो कर सबके सामने धूनी के साने क्रोध में विकराल बने खड़े रहे। यह देख कर वहाँ उपस्थित सभी लोग डर से थर थर काँपने लगे। साईं बाबा ने अपने शरीर से निकाले हुये अपने सभी कपड़ों को जलती हुई धूनी में डाल दिया। जब कपड़े जलने लगे तब धूनी की आग की लपटें बहुत तेज और प्रकाशपूर्ण हो गई। उनकी आँखें लाल हो गईं और वे क्रोध में चिल्लाये, "तुम लोग गौर से देखो कि मैं हिन्दू हूँ कि मुसलमान।"

वहाँ उपस्थित भक्त लोग काँप रहे थे। बाबा के समीप जाने का साहस किसी में नहीं था। कुछ समय बाद साईं बाबा का कुष्ठ रोगी भक्त भागो जी शिन्दे हिम्मत करे बाबा के नजदीक गया और उनकी कमर में एक लंगोट बांधने में सफल हो गया और बोला, "बाबा यह सब क्या है? आज दशहरा का त्यौहार है।" अपने सटके (लकड़ी) से जमीन को पीटते हुये बाबा ने कहा, "यह मेरा सीमोल्लंघन का दिन है।" इस तरह साईं बाबा ने दो साल पहले अपने 'सीमोल्लंघन' अथवा दशहरे के दिन अपने महासमाधि की पूर्वसूचना दे दी थी पर किसी ने नहीं समझा और ध्यान नहीं दिया।

साईं बाबा का क्रोध शान्त हो ही नहीं रहा था। कम से कम ग्यारह बजे रात तक बाबा शान्त नहीं हुये और लोगों को सन्देह होने लगा कि आज बाबा की चावड़ी यात्रा का जुलूस निकलेगा या नहीं। एक घण्टे के बाद साईं बाबा की स्थिति शान्त और सामान्य हो गई और वे चावड़ी जाने के लिये कपड़े पहन कर तैयार हो गये।

(क्रमशः)

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