Tuesday, December 30, 2008

बाप दादाओं की तस्वीरों को निकाल कर फेंक दो

"हिन्दी के प्राचीनतम रूप और उसके प्राचीन साहित्य को अजाबघर में रख दो। उसकी अब कोई आवश्यकता नहीं।"

दिल खटास से भर गया है ऐसी बात पढ़ कर।

फिर तो बाप दादाओं की तस्वीरों को भी निकाल कर फेंक दो। क्यों उन्हें कमरे में लगा रखा है, क्या आवश्यकता रह गई है इन तस्वीरों की?

हिन्दी के प्राचीनतम रूप को अजायबघर में रख देने के बाद कौन सी हिन्दी का प्रयोग करोगे? अंग्रेजी शब्दों के सहारे जीवित रहने वाले खिचड़ी हिन्दी की? आज हिन्दी का सही ज्ञान ही लुप्तप्राय हो चुका है। दिल्ली जैसे हिन्दीभाषी क्षेत्र के लोगों को गागर जैसे सामान्य शब्द का अर्थ नहीं पता है (देखें मेरा ये पोस्ट)। अपने अज्ञान को छुपाने का यह बहुत ही अच्छा तरीका है। स्वयं अपना ज्ञान बढ़ाने के बदले दूसरे सभी लोगों को अज्ञानी बना दो।

दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जी चिट्ठा चर्चा की टिप्पणी के माध्यम से कहते हैं, "........ और जानता हूं कि हमारे पाठ्यक्रम कितने जड़ हैं. चन्द बरदाई, कबीर, तुलसी, सूर, बिहारी, केशव सब महान हैं, अपने युग में महत्वपूर्ण थे, लेकिन सामान्य हिन्दी के विद्यार्थी को उन्हें पढाने का क्या अर्थ है? तुलसी, सूर, बिहारी की भाषा आज आपकी ज़िन्दगी में कहां काम आएगी? मन्दाक्रांता, छन्द और किसम किसम के अलंकार आज कैसे प्रासंगिक हैं? अगर हम अपने विद्यार्थी को इन सब पारम्परिक चीज़ों के बोझ तले ही दबाये रखेंगे तो वह नई चीज़ें पढने का मौका कब और कैसे पाएगा?....."

भाई जब आप जानते हैं कि हमारे पाठ्यक्रम जड़ हैं तो क्या जरूरत थी आपको उसी जड़ पाठ्यक्रम को चालीस साल तक पढ़ाने की? तुलसी, सूर, बिहारी की भाषा ही वास्तविक हिन्दी भाषा है और यदि हम उस भाषा को समझ नहीं सकते, उनकी तरह लिख नहीं सकते तो इसमें उनकी भाषा का क्या दोष है? दोष है तो हमारी अज्ञानता का। मन्दाक्रांता, छन्द (आप हिन्दी पढ़ाते हैं किन्तु यह भी नहीं जानते कि मन्दाक्रांता छन्द का एक प्रकार है, छन्द जैसा काव्य का कोई अलग अवयव नहीं) और किसम किसम के अलंकार आज भी प्रासंगिक हैं किन्तु हममें अब वैसी काव्य रचने का सामर्थ्य नहीं रह गया है। उन महान कवियों ने हिन्दी को अलंकृत किया था, अब यदि हम हिन्दी को अलंकृत नहीं कर सकते तो क्या उसके वस्त्र भी उतार दें?

मैं ऐसी बातें लिखने से हमेशा परहेज करता हूँ जिनसे किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न हो। ऐसी बाते मुझे पसंद ही नहीं हैं। किन्तु आज इस पोस्ट को लिखने से मैं स्वयं को रोक नहीं पाया। जानता हूँ कि क्या होगा। बहुत सारी विरोधी टिप्पणिया ही आयेंगी ना। आने दो। न तो मैं यहाँ पर जो अपने विचार लिख रहा हूँ वह मेरे विरोधी विचार वालों पर जबरदस्ती लद जाने वाला है और न ही विरोधी विचार वाली टिप्पणियाँ मुझ पर लदने वाली हैं।

Thursday, December 25, 2008

हमें गलतफहमी (misunderstanding) से बचना है

ज्ञानदत्त जी के पोस्ट "वर्तमान पीढ़ी और ऊब" के प्रतिक्रियास्वरूप लिखे गये कुछ पोस्ट मैने पढ़े (ज्ञानदत्त जी से प्रेरित, नयी पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी, ये फासला क्यों?, मानसिक हलचल की हलचले) इन्हें पढ़ कर लग रहा है कि हमारे बीच कुछ गलफहमियाँ सी उत्पन्न हो गई है। इससे पहले कि गलफहमी और बढ़े उसे खत्म कर देने में ही भलाई है।

मैं समझता हूँ कि ज्ञानदत्त जी का विरोध ऊब से था, कि नई पीढ़ी से। हाँ उन्होंने ऊब को वर्तमान पीढ़ी के साथ सीधा जोड़ दिया यह मेरी समझ में ठीक नहीं हुआ (ज्ञानदत्त जी कृपया अन्यथा लें) ऊब तो पुरानी पीढ़ी में भी थी। मैं स्वयं जब दसवीं कक्षा में था तो कोर्स में शामिल चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी की विख्यात कहानी "उसने कहा था" को पहली बार पढ़ कर ऊब गया था क्योंकि उसे पहली बार पढ़कर मैं समझ नहीं सका था। उस ऊब के कारण उस कहानी को फिर से पढ़ने की इच्छा ही नहीं हो रही थी। पर हर साल परीक्षा में उस कहानी से कम से कम एक प्रश्न अवश्य ही आता था, मुझे उस कहानी को समझने के लिये बार बार पढ़ना ही पड़ा। आज "उसने कहा था" मेरी प्रिय कहानियों में से एक है। हाँ तो मैं कह रहा था कि ऊब सिर्फ वर्तमान पीढ़ी में ही नहीं है, पुरानी पीढ़ी में भी थी। किन्तु आज हर काम के लिये शार्टकट अपनाने, जैसे कि पाठ्यपुस्तक के पाठ पढ़ कर परीक्षा गाइड पर निर्भर रहने, का चलन बढ़ गया है। यह ऊब के बढ़ जाने के परिणामस्वरूप ही है।

यह भी सही है कि ऊब जाना एक स्वाभाविक क्रिया है जिससे कोई भी नहीं बच सकता चाहे वह वर्तमान पीढ़ी का हो या पुरानी पीढ़ी का। किन्तु ऊब के कारण हम शार्टकट रास्ते अपना कर यदि उब को सहने और ऊब से लड़ने का प्रयास करें तो क्या यह अधिक अच्छा नहीं होगा?

और फिर पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच कुछ कुछ दूरी याने कि जनरेशन गैप तो सदा से ही चलती आई है। जब हमारी पीढ़ी युवा थी अर्थात् उन दिनों की नई पीढ़ी थी तो हमें भी अपनी पुरानी पीढ़ी दकियानूस लगा करती थी। ईश्वर ने मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा बनाया है कि यह दूरी कभी भी मिट नहीं पायेगी। पुरानी पीढ़ी सदा ही अतीत में जीती है और अतीत को वर्तमान से अच्छा समझती है और यह भी स्वाभाविक है कि वर्तमान पीढ़ी वर्तमान को अतीत से अच्छा समझती है। दोनों पीढ़ियों में "कुत्ते बिल्ली का बैर" था, है और हमेशा रहेगा।

तो हम यदि हम पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी की बात को भूलकर ज्ञानदत्त जी के पोस्ट को पढ़ें तो सारी गलफहमियाँ अपने आप दूर हो जायेंगी।

Tuesday, December 23, 2008

मेरे ब्लॉग की पाठक संख्या क्यों कम है?

और किसी के मन में यह प्रश्न उठे या न उठे पर मेरे मन में तो प्रायः ही यह प्रश्न उठता है कि मेरे ब्लॉग की पाठक संख्या क्यों कम है?

मैं यह समझता हूँ कि यह सिर्फ आपकी लिखी सामग्री है (content) जो कि पाठकों को खींच कर आपके ब्लॉग में लाती है। अंग्रेजी की उक्ति हैः

'Content is king.'

अर्थात् यदि हिन्दी में कहें तो "सामग्री ही साम्राज्ञी है।"

तो जब भी आप अपने ब्लॉग की सामग्री लिखें तो यह सोच कर न लिखें कि कुछ न कुछ तो लिखना है क्योंकि ऐसी सामग्री को कोई भी पाठक पढ़ना पसंद नहीं करता। फिर ऐसे लेखन का क्या फायदा जिसे कि कोई पढ़े ही नहीं। यह तो वही बात हुई कि जंगल में मोर नाचा किसी ना देखा। तो लिखते समय हमेशा अपनी सामग्री की उत्कृष्टता ध्यान रखें।

पाठक क्या चाहता है?

अपने लेख को लोकप्रिय बनाने के लिये यह जानना बहुत जरूरी है कि पाठक क्या चाहता है। यदि पाठक को उसके पसंद की सामग्री मिलेगी तो वह उसे अवश्य ही पढ़ेगा। तो आखिर पाठक क्या चाहता है? वास्तव में पाठक संतुष्टि चाहता है। वह चाहता है कि उसे घिसी पिटी चीज पढ़ने को न मिले। उसने जो कुछ भी पढ़ा है उससे उसे कुछ नई जानकारी मिली है, उसके ज्ञान में कुछ वृद्धि हुई है।

तो ऐसे लेख पढ़ कर जिससे पाठक को कुछ भी प्राप्त नहीं होता, उसे क्षोभ होता है और जिस ब्लॉग में उसे ऐसी सामग्री पढ़ने को मिली है उस ब्लॉग से वह कन्नी काट लेता है। इसके विपरीत यदि उसे किसी ब्लॉग की सामग्री को पढ़कर कुछ नयापन मिले, उसे संतुष्टि हो तो वह उस ब्लॉग का चाहने वाला बन जाता है।

रोज रोज आखिर नई जानकारी लायें कहाँ से?

यह यक्षप्रश्न है कि आखिर रोज हम अपनी सामग्री में कहाँ से नयापन लायें? सच्चाई भी यही है कि हम हमेशा नई जानकारी नहीं प्राप्त कर सकते। पर हाँ किसी पुरानी जानकारी को ऐसी शैली में प्रस्तुत कर सकते हैं कि उसमें नयापन झलकने लगे। प्रायः सभी सफल लेखक यही करते हैं और इस प्रकार के प्रस्तुतीकरण को पाठक भी पसंद करते हैं।

लिखना शुरू करने के पहले
  • जानने का प्रयास करें कि पाठकों की रुचि क्या है। कोशिश करें कि आपका लेखन उनकी रुचि के अनुरूप हो न कि आपकी अपनी रुचि के।

  • जिन ब्लॉगर्स के ब्लॉग अधिक पढ़े जाते हैं उन्हें पढ़ें और विश्लेषण करें कि उनकी सामग्री में क्या विशेषताएँ हैं जिनके कारण लोग उन्हें पढ़ते हैं। इस प्रकार आपको स्वयं के लेखन की कमजोरियों का पता चलेगा। और यह कहने की आवश्यकता ही नहीं है कि अपनी कमजोरी जान लेने पर उन्हें दूर करने का प्रयत्न करना है।

  • उन विषयों पर लिखने के लिये कभी भी न सोचें जिन पर आप अधिकार नहीं रखते। इधर उधर से एकत्रित की गई सामग्री कभी भी किसी को प्रभावित नहीं करती बल्कि कई बार लेखक की स्थिति को हास्यास्पद बना देती है।

  • जो कुछ भी आप लिखना चाहते हैं उसके लिये तरतीबवार पॉइंट्स बना लीजिये ताकि लिखते समय कुछ छूट न जाये।

  • लिखने के पहले स्वयं में पूर्ण आत्मविश्वास बना लें तभी लिखना शुरू करें।
लिख लेने के बाद

अपने लेख को आनन फानन में प्रकाशित न करें। पहले उसे कम से कम एक बार पढ़ें, दो बार पढ़ें तो और भी अच्छा है। विचारों के प्रवाह में लिखते समय प्रायः हिज्जे, व्याकरण और वाक्य विन्यास की गलतियाँ हो जाती हैं और इन गलतियों का पाठक के ऊपर विपरीत प्रभाव पड़ता है। प्रकाशन के पूर्व एक बार पढ़ लेने से हमें अपनी गलतियों की जानकारी हो जाती है और हम उसे सुधार सकते हैं।

पाठक के रुचि के प्रतिकूल सामग्री हो तो?

कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि हम पाठकों को ऐसी सामग्री देना चाहते हैं जिनके विषय में हम जानते हैं कि यह उनके लिये हितकारी है किन्तु उनकी रुचि के अनुरूप नहीं है। ऐसी स्थिति में आप अपने लेख को इस चतुराई से (tactfully) लिखें कि पाठक को वह सुरुचिपूर्ण लगे। मतलब यह कि कड़वी दवा के ऊपर शक्कर की परत।

पाठक संख्या बढ़ाने के लिये क्या करें?

सबसे अहम् बात तो यह है कि लोग जानें कि आपका ब्लॉग अपडेट हो गया है। ब्लोवाणी, चिट्ठाजगत, नारद जैसे हमारे हिन्दी एग्रीगेटर्स आपकी इस समस्या को बहुत हद तक हल कर देते हैं पर अभी भी बहुत से लोग हैं जो कि इन हिन्दी एग्रीगेटर्स के विषय में नहीं जानते अतः ब्लॉग अपडेट के के तत्काल बाद ही उसे पिंग करें। पिंग करने के लिये आप pingoat.com, pingomatic.com जैसी मुफ्त सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं। पिंग होने पर आपके ब्लॉग का अपडेशन विश्व के सभी बड़े ब्लॉग डायरेक्टरियों में स्वतः ही शामिल हो जाता है।

digg.com, technorati.com जैसे सोशल बुकमार्किंग साइट्स का (मुफ्त) सदस्य बनें का और अपने फेव्हरिट्स में अपने ब्लॉग को जोड़ दें। इस प्रकार जो लोग इन साइट्स के कई लाख सदस्यों पता चल जाता है कि आपका ब्लॉग अपडेट हो चुका है।

(विशेषकर technorati.com का क्योंकि वह हिन्दी को सपोर्ट करता है। यदि digg.com का प्रयोग करना है तो रोमन हिन्दी का प्रयोग करें।)

अपने लेख को कृति निर्देशिका में भी डाल दें और स्रोत बक्से में लिखें कि

".....(आपका नाम) हिन्दी के प्रति समर्पित लेखक हैं। उनके अन्य लेखों को पढ़ने के लिये आपका ब्लॉग में अवश्य पधारें।

इस प्रकार आपके ब्लोग के विषय में वहाँ आने वाले लोगों को जानकारी मिलेगी तथा आपके ब्लोग का इनबाउंड लिंक बढ़ेगा और सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि इन्टरनेट के हिन्दी सामग्री में इजाफा होगा।

Saturday, December 20, 2008

हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापन क्यों बंद हो गये

कल "शास्त्री जी कहते हैं" पोस्ट पर नजर पड़ गई। उसमें की गई टिप्पणियों को पढ़ने से लगा कि बहुत से लोग एडसेंस के विषय में जानने की जिज्ञासा रखते हैं। अतः इस विषय में मुझे जो जानकारी है वह यहाँ बता रहा हूँ (ये अलग बात है कि वर्तमान में एडसेंस के विज्ञापन हिन्दी ब्लोग्स तथा वेबसाइट्स को नहीं मिल पा रहे हैं पर उम्मीद करें कि जल्दी ही हिन्दी में फिर से ये विज्ञापन मिलने लगे, आखिर उम्मीद पे ही तो दुनिया कायम है)

एडसेंस क्या है

वास्तव में गूगल संसार की सबसे बड़ी आनलाइन विज्ञापन कंपनी है। संसार भर से उसे विज्ञापन मिलते हैं जिन्हें कि वह अनगिनत वेबसाइट्स तथा ब्लोग्स में फैला देती है। जब कोई इस विज्ञापन पर क्लिक करता है तो गूगल को विज्ञापनदाता से पैसे मिलते हैं जिसका एक छोटा सा हिस्सा गूगल उसे भी देता है जिसके ब्लोग या वेबसाइट से क्लिक किया गया था। इसे इस प्रकार से समझ सकते हैं कि बड़े शहरों में विज्ञापन एजेंसियाँ विज्ञापनदाताओं से पैसे लेकर उनके विज्ञापन को शहर भर में अनेकों होर्डिंग में दर्शाती है। अब यदि कोई होर्डिंग आपके घर के दीवाल पर लगा हो तो आपके दीवाल को उपयोग करने के एवज में विज्ञापन एजेंसी आपको भी कुछ कुछ रकम देती है।

यहाँ पर यह समझ लेना आवश्यक है कि गूगल को विज्ञापन के पैसे तभी मिलते हैं जब कोई विज्ञापन को क्लिक करता है और उस क्लिक के लिये गूगल जिस ब्लोग या वेबसाइट से क्लिक हुआ है उसके मालिक को पैसे देता है। अब होता यह है कि बहुत से लोग पैसा कमाने के लिये अपने ब्लोग के एडसेंस विज्ञापन पर या तो स्वयं क्लिक करते हैं या फिर अपने मित्रों, रिश्तेदारों और जान पहचान वालों से क्लिक करवाते हैं जिसे कि click fraud कहा जाता है। गूगल आज सिर्फ अपनी ईमानदारी की वजह से संसार की सबसे बड़ी विज्ञापन कंपनी बना हुआ है। उसे बेइमानी जरा भी पसंद नहीं है और वह नहीं चाहता कि उसके विज्ञापनदाताओं को अनावश्यक नुकसान हो। गूगल के पास ऐसे धोखा देने वाले क्लिक्स को पकड़ने का फूलप्रूफ तकनीक है। शास्त्री जी ने सही लिखा है कि "गूगल की नजरें बहुत तेज हैं" क्लिक प्राड करने वालों पर गूगल जरा भी दया नहीं करता और उन्हें बैन करके विज्ञापनों से वंचित कर देता है। एक बार यदि किसी को गूगल ने बैन कर दिया तो उसे कभी भी गूगल एडसेंस से पैसे कमाने का अवसर नहीं मिल पाता। गूगल की इस नीति से अन्य भाषा के बहुत से ब्लोगर और वेबमास्टर (जिन्हें बेइमानी पसंद है) भी त्रस्त हैं। बेइमानी करने वाले लाखों लोगों को गूगल ने बैन करके रखा हुआ है।

हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापन आने क्यों बंद हो गये?

इस प्रश्न के उत्तर में हम विश्वासपूर्वक कुछ कह नहीं सकते क्योंकि गूगल ने इस विषय में अब तक कुछ भी नहीं कहा है। हाँ इस प्रश्न के उत्तर में कि मेरे वेब पेजेस में सार्वजनिक सेवा विज्ञापन क्यों आते हैं गूगल का जवाब हैः

Your site content is primarily in an unsupported language.
If the AdSense code is placed on pages with content primarily in an unsupported language, we may show public service ads or ads in another language. As noted in our program policies, publishers may not display ads on pages with content primarily in an unsupported language, so please remove the ad code from these pages until we're able to support your language.
(देखें: https://www.google.com/adsense/support/bin/answer.py?hl=en&answer=10035)

मुझे नहीं लगता कि हिन्दी ब्लोग्स में विज्ञापन आने या सिर्फ सार्वजनिक सेवा विज्ञापन ही मिलने का कारण क्लिक प्राड है (यानी कि लोगों ने अपने ब्लोग के विज्ञापनों को क्लिक किया इसलिये गूगल ने विज्ञापन भेजने बंद कर दिया) गूगल केवल उन लोगों पर ही कार्यवाही करता है जो कि धोखेबाज होते हैं। वास्तव में गूगल के एडसेंस के लिये सपोर्टिंग भाषाओं की सूची में हिन्दी भाषा शामिल नहीं है (मई 2008 के पहले तक गूगल ने अपनी भाषा नीति में ढिलाई दे रखी थी इसलिये हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापन रहे थे और बाद में इस नीति को सख्त कर दिये जाने के कारण विज्ञापन आने बंद हो गये)

बहुत हद तक तो यही लगता है कि गूगल के सपोर्टिंग भाषाओं की सूची में नहीं होने के कारण ही हमें एडसेंस विज्ञापन नहीं मिल पा रहे हैं। यह भी हो सकता है कि गूगल हिन्दी के लिये अपने "बोट" को विकसित करने में लगा हो क्योंकि गूगल का बोट आपके पेज को पढ़ता है और उसमें सिर्फ उन विज्ञापनों को ही भेजता है जो कि आपके पेज के विषय से संबंधित हों याने कि यदि आपका पेज फर्नीचर के बारे में है तो गूगल उसमें केवल फर्नीचर्स के विज्ञापन भेजेगा। मई 2008 तक हिन्दी पेजेस में जो एडसेंस विज्ञापन रहे थे वे पेज के विषय से संबंधित विज्ञापन हो कर सिर्फ हिन्दी से संबंधित विज्ञापन हुआ करते थे। अब जबकि गूगल ने हिन्दी के अन्य भाषाओं में अनुवाद (http://translate.google.com) की टेक्नोलॉजी विकसित कर लिया है तो इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि गूगल अपने बोट को हिन्दी सपोर्ट के लिये विकसित कर रहा हो। पर यह सिर्फ एक अनुमान है, सत्य क्या है यह तो सिर्फ गूगल ही जानता है।

क्या फिर हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापन आयेंगे?

बहुत अधिक संभावना तो इसी बात की है कि हिन्दी पेजेस में जल्दी ही एडसेंस विज्ञापन आने शुरू हो जायेंगे और वह भी आपके पेज के विषय से संबंधित। आज जब संसार की सभी बड़ी कंपनियों ने अपने हिन्दी साइट्स बना लिये हैं, फायरफॉक्स, गूगल क्रोम के हिन्दी संस्करण चुके हैं, भारत में इंटरनेट का प्रयोग दिन दूना रात चौगुना बढ़ते जा रहा है तो कोई कारण नहीं है कि गूगल भारत के विज्ञापनों से होने वाली कमाई से आँख फेर ले। एक प्रश्न के उत्तर में गूगल हेल्प ने कहा थाः


(AdSensePro Stephanie Google employee Jun 21, 1:14 am
From: AdSensePro Stephanie
Date: Fri, 20 Jun 2008 13:14:51 -0700 (PDT)
Local: Sat, Jun 21 2008 1:14 am
Subject: Re: Serving PSAs on unicoded (hindi) pages

If you haven't done so already, I'd encourage you to visit the AdSense
blog at adsense.blogspot.com to keep track of all the latest AdSense
news and updates. If we're able to expand our list of supported
languages, we'll be sure to post an announcement on our blog.)
(देखें: http://groups.google.com/group/adsense-help-features/browse_thread/thread/77476824e7119726/1916d587ba3f179b?lnk=gst&q=hindi#1916d587ba3f179b)

अभी पिछले हफ्ते ही गूगल ने अधिकारिक भाषाओं की लिस्ट में चार नई भाषाओं को जोड़ा है, देखें http://adsense.blogspot.com/2006/12/adsense-for-content-in-4-new-languages.html

तो हम भी उम्मीद कर सकते हैं कि जल्दी ही गूगल अपनी लिस्ट में हिन्दी को भी स्थान दे देगा और हमें विज्ञापन मिलने शुरू हो जायेंगे।

पर जब कभी भी हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापन आये तो याद रखें कि अपने स्वयं के ब्लोग के विज्ञापनों पर भूल कर भी न खुद क्लिक करना है और न ही किसी अन्य से क्लिक करवाना है।

Friday, December 19, 2008

मानो या ना मानो

या आप बता सकते हैं कि भारत का यह चित्र किस वस्तु से बना है?



आप सोच रहे होंगे कि ये ड्राइंग पेपर या प्लास्टिक के बना होगा। जी नहीं! आप गलत सोच रहे हैं। यदि मैं कहूँ कि इसे खाया जा सकता है तो आप समझेंगे कि मैं बकवास कर रहा हूँ। पर आपको जानकर आश्चर्य होगा कि ये केक हैं और शायद इन्हें खाया भी जा चुका होगा।

सौजन्यः Love Guru Yahoo Group

Wednesday, December 17, 2008

हमको जो कोई बूढ़ा समझे बूढ़ा उसका बाप

भाई अगर हम आप लोगों से कुछ साल पहले इस दुनियाँ में आ गये तो इसका मतलब यह तो नहीं हुआ कि आप हमें बूढ़ा बोलें। और यदि बोलते हैं तो बोलते रहिये हम कौन सा ध्यान देने वाले हैं? हम तो सिर्फ अपनी श्रीमती जी की बातों को ही मानते हैं जो कहती हैं कि 'अजी अभी कौनसे बूढ़े हो गये हैं आप?' (यदि हम बूढ़े हो गये तो वे भी तो बुढ़िया मानी जायेंगी और यह तो आप सभी जानते हैं कि कोई भी महिला बुढ़िया कहलाना तो क्या अपनी उम्र को जरा सा खिसकाना भी नहीं चाहेगी, उनका बस चले तो अपनी बेटी को भी अपनी छोटी बहन ही बताना पसंद करेंगी )। वास्तव में हमारा तो सिद्धांत ही है कि 'पत्नी को परमेश्वर मानो'। पत्नी के वचन ब्रह्मवाक्य हैं, पत्नी ने कह दिया याने परमेश्वर ने कह दिया (अब यह अलग बात है कि जब मूड में होती हैं तो यही गुनगुनाती हैं - मैं का करूँ राम मुझे बुड्ढा मिल गया)। अब देखिये ना, अमिताभ जी हमसे भी चार पाँच साल बड़े हैं पर उनको तो कोई बूढ़ा नहीं कहता। फिल्मों में तो वे अभी भी जवानों के जवान हैं। और यदि कहना ही था तो बुजुर्ग न कह कर "ओल्ड ब्वाय" कह लेते, आपकी मंशा भी पूरी हो जाती और हम भी खुश होते।

सत्यानाश हो इस अंग्रेजी का जिसके कारण सभी हमें अंकल पुकारते हैं। अब आप ही सोचिये कि यदि आपको कोई अंकल कहेगा तो क्या आपको अच्छा लगेगा? हमारे पिताजी के समय में तो उम्र में उनसे बहुत छोटे लोग भी उन्हें 'भैया' ही कहते थे, 'काका' नहीं। देखा जाये तो हमारे बुजुर्ग कहलाने में इस अंग्रेजी का ही सबसे ज्यादा हाथ है।

साठ साल की उम्र में भी अयोध्या नरेश दशरथ बूढ़े नहीं हुये थे तभी तो राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। सौ पुत्रों में से निन्यान्बे पुत्रों की मृत्यु के बाद जब अपना समस्त राजपाट छोड़ के विश्वामित्र तपस्या करने के लिये अपनी पत्नी के साथ वन में गये तब भी वे बूढ़े नहीं हुये थे क्योंकि उसके बाद भी उनके और पुत्र हुये। ययाति तो बूढ़े होने का शाप पाने के बाद भी जवान बने रहे, अपने पुत्र पुरु की जवानी लेकर। फिर हमने तो साठ को स्पर्श भी नहीं किया है पर लगे आप हमे बूढ़ा कहने।

बहुत बेइंसाफी है ये। कितने आदमियों ने हमें बुजर्ग कहा कालिया?

एक ने सरदार, कहा नहीं बल्कि चिट्ठा चर्चा में पोस्ट कर दिया और उसके समस्त पाठकगण के साथ ही साथ अन्य हिन्दी ब्लोगर्स ने मान भी लिया।

हूँऽऽऽ, इसकी सजा मिलेगी। जरूर मिलेगी। अरे ओ सांभा, जरा मेरा कम्प्यूटर तो लाना। हम भी अपने ब्लोग में लिखेंगे "हमको जो कोई बूढ़ा समझे बूढ़ा उसका बाप"

उपसंहार

हमारे दो बुजुर्ग ( हालाँकि ये दोनों शायद बुजुर्ग कहलाना पसंद न करें )
पढ़कर एक अच्छा मसाला मिल गया लिखने के लिये। वैसे हम क्यों बुजुर्ग कहलाना पसंद नहीं करेंगे? करेंगे और जरूर करेंगे। हमें 'सींग कटा कर बछड़ों में शामिल हो कर' जग हँसाई नहीं करवाना है। और फिर आज के जमानें में तो लोग बुजुर्ग को बुजुर्ग कहना भी नहीं चाहते। तो जब हमें यह सम्मान मिला है तो उसे क्यों न लें? वैसे लिखने के लिये मसाला सुझाने के लिये चिट्ठा चर्चा और विवेक जी को धन्यवाद!

सूझ शब्द से याद आया कि एक मित्र ने हमसे पूछ लिया, "यार, तुम ये सब लिख कैसे लेते हो?"

हमने कहा, "बस कलम उठाता हूँ और जो कुछ भी सूझता है लिख देता हूँ।"
(मेरा तात्पर्य है कि कम्प्यूटर में तख्ती नोटपैड खोलता हूँ और जो कुछ भी सूझता है लिख देता हूँ।)

"तब तो लिखना बहुत सरल काम है।"

"हाँ, लिखना तो बहुत सरल है पर यह जो सूझना है ना, वही बहुत मुश्किल है।"

Tuesday, December 16, 2008

वह देश कौन सा है?

पुकार कर अल्ला-हो-अकबर,
संबंध सुधारना चाहता है
ये कह कर कि 'लव्ह दाइ नैबर';
पर अपनी जमीं पे वो सदा
देता शरण आतंकवाद को,
घुसपैठियों को भेजकर
रहता खुश-ओ-आबाद जो।

वह देश कौन सा है?

रक्त की जिसको प्यास है,
कश्मीर जिसकी आस है,
ग्रस्त है हीन भावना से जो
पर 'दादाओं' का खास है;
कहता है खुद को नेक-ओ-मजहबी
पर कट्टरपंथ का दास है;
झूठ पे झूठ बोल कर जो
निकालता अपनी भड़ास है।

वह देश कौन सा है?

करतूत जिसकी सुधरी न तो
निश्चित सजा जो पायेगा
इक पग भी आगे जो बढ़ा
तो जान ही से जायेगा
कमजोर जो समझा हमें
तो ऐसी मुँहकी खायेगा
संसार के मानचित्र से
नक्शा जिसका मिट जायेगा।

वह देश कौन सा है?

Monday, December 15, 2008

इंटरनेट यूजर्स - भारत चौथे स्थान पर (हिन्दी ब्लोग्स की साख में भी वृद्धि)

विश्व भर के इंटरनेट यूजर्स के मामले में अब भारत का स्थान चौथा हो गया है। भारत में इंटरनेट यूजर्स की संख्या 88100000 (88.1 मिलियन) है। देखें: With 81 mn Net users, India gets 4th slot

टाप 10 दस देशों की लिस्ट इस प्रकार है:

यूनाइटेड स्टेट्स आफ अमेरिका 220 मिलियन यूजर्स
चीन 210 मिलियन यूजर्स
जापान 88.1 मिलियन यूजर्स
भारत 81 मिलियन यूजर्स
ब्राजील 53 मिलियन यूजर्स
यूनाइटेड किंगडम 40.2 मिलियन यूजर्स
जर्मनी 39.1 मिलियन यूजर्स
कोरिया 35.5 मिलियन यूजर्स
इटली 32 मिलियन यूजर्स
फ्रांस 31.5 मिलियन यूजर्स

यद्यपि लगता है कि 88.1 मिलियन एक बहुत बड़ी संख्या है पर देखा जाये तो भारत के 300 मिलियन कर्मचारियों की तुलना में भारत में इंटरनेट यूजर्स की तादात अभी बहुत कम है। लगता है कि भारत में अभी भी इंटरनेट सुविधा की कीमत अपेक्षाकृत ज्यादा है और इसी कारण से अधिकतर लोग अपने आफिस से या फिर साइबर कैफे से ही इंटरनेट का प्रयोग करते हैं। पर यह तय है कि निकट भविष्य में इस संख्या में इजाफा ही होना है। यदि जल्दी ही भारत का स्थान चौथे से पहले या कम से कम दूसरे में आ जाये तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।

अब यदि हम ब्लोग्स की भी चर्चा करें तो आपको जान कर खुशी होगी कि हिंदी ब्लोग्स का मान अब विश्व की निगाह में बढ़ता जा रहा है। सबूत के तौर पर देखें Blog it in Hindi, dude से एक उद्धरणः

When Amitabh Bachchan decided to write his blog in Hindi, it evoked mixed reactions everywhere; but not many know that Hindi blogging in recent times has reached such a height that it really doesn't need big names to endorse it.

(जब अमिताभ बच्चने अपने ब्लोग को हिंदी में लिखने का निश्चय किया तो सभी स्थानों में इसकी मिश्रित प्रतिक्रिया हुई, किन्तु अधिकतर लोग नहीं जानते कि वर्तमान समय में हिन्दी ब्लोगिंग इतनी ऊँचाई पर पहुँच चुकी है कि उसे अपने परिचय के लिये बड़े नामों की आवश्कता नहीं है।)
फिलहाल विश्व भर में ब्लोग्स की कुल संख्या 70000000 से अधिक है जिसमें से 15000000 सक्रिय ब्लोग्स हैं। देखें Blog Count for July: 70 million blogs। एक आकलन के अनुसार प्रतिदिन 120000 नये ब्लोग्स का निर्माण होता है।

अभी भी अन्य भाषाओं के ब्लोग्स तथा वेबसाइट्स की तुलना में हिन्दी ब्लोग्स की संख्या नगण्य ही है।

हिन्दी ब्लोग्स की संख्या कम होने के कुछ कारण ये भी हैं।

  • अभी भी अधिकतर लोगों को हिन्दी लेखन सॉफ्टवेयर्स की जानकारी नहीं है और वे चाह कर भी अपने हिन्दी के ब्लोग्स नहीं बना पाते।

  • अन्य भाषा के ब्लोगर्स का मुख्य उद्देश्य होता है अपने ब्लोग से कमाई करना जबकि हिन्दी ब्लोगर्स अपनी आत्म तुष्टि के लिये ब्लोगिंग करते हैं। यदि आत्म तुष्टि के साथ साथ ब्लोग्स से कुछ अतिरिक्त कमाई होने लगे तो निश्चित तौर पर हिन्दी ब्लोग्स की संख्या बढ़ेगी।

    (वैसे श्री दिनेशराय द्विवेदी के अंग्रेजी ब्लोग Law & Life को देख कर लगा कि अतिरिक्त कमाई के लिये द्विवेदी जी ने एक सार्थक पहल किया है। आखिर कब तक हिन्दी ब्लोगर्स बिना कमाई का लेखन करते रहेंगे, हिन्दी ब्लोग्स से कमाई नहीं तो अंग्रेजी ब्लोग्स से ही सही। वैसे मैंने भी इसी उद्देश्य से GKA's Blog बनाया है।)

  • अन्य भाषा में जो लोग स्वयं को लिखने में अक्षम पाते हैं वे लोग भी अन्य लेखकों से लेख खरीद कर या फिर आर्टिक डायरेक्टरीज़ से प्राप्त होने वाले मुफ्त लेखों का उपयोग कर के अपना ब्लोग बना लेते हैं जबकि हिन्दी में आर्टिकल डायरेक्टरी की सुविधा नहीं के बराबर है।

पर यह निश्चित है कि निकट भविष्य में हिन्दी ब्लोग्स की संख्या अवश्य ही बढ़ेगी।

अंत में:

मैं पहले भी बता चुका हूँ कि मैंने कृति निर्देशिका नामक हिन्दी आर्टिकल डायरेक्टरी का निर्माण किया है। चूँकि वह हिन्दी की डायरेक्टरी थी, गूगल महाराज ने उस पर कृपा की और उसका पेज रैंक 2 हो गया। नतीजे के रूप में उसमें अंग्रेजी के बहुत सारे लेख आने लग गये जिन्हें कि मैं, यह कारण बता कर कि यह डायरेक्टरी सिर्फ हिंदी के लेख स्वीकार करती है, सधन्यवाद प्रकाशन के लिये अस्वीकार कर दिया करता था। परिणाम स्वरूप पेज रैंक गिर कर 1 हो गया और वह डायरेक्टरी दम तोड़ने के कगार पर आ गई क्योंकि उसमें लेखों की संख्या बहुत कम थी (श्री जाकिर हुसैन रजनीश जी की दो कृतियों को छोड़ कर सिर्फ मेरी ही रचनाएँ है)। अंततः उसे मरने से बचाने के लिये मजबूरन मुझे उसमे एक अंग्रेजी लेख वर्ग बनाना तथा अंग्रेजी लेखों को स्वीकार करना पड़ा इससे डायरेक्टरी चल पड़ी (वर्तमान में उसमें 1500 से अधिक लेख हैं) और प्रतिदिन कुछ सेंट एडसेंस के द्वारा कमाई भी होने लगी। किन्तु मुझे दुःख है कि मैं अपनी डायरेक्टरी के लिये हिंदी रचनाएँ नहीं जुटा पाया। अपने समस्त ब्लोगर मित्रों से मैं एक बार फिर से आग्रह करता हूँ कि वे लोग कम से कम अपनी एक रचना (भले ही वह उनके ब्लोग में पूर्व प्रकाशित हो) कृति निर्देशिका को दान के रूप में दे दें जिससे कम से कम यह तो लगे कि ये हिन्दी की डायरेक्टरी है।

Saturday, December 13, 2008

ग्रुप फोटो



Thursday, December 11, 2008

देश दो - करेंसी एक!

यद्यपि पाकिस्तान को 14th अगस्त, 1947 के दिन, अर्थात् भारत की स्वतंत्रता से एक दिन पूर्व, स्वतंत्रता प्राप्त हुई किन्तु करेंसी के मामले में उसे 30 September, 1948 तक भारत पर ही निर्भर रहना पड़ा था क्योंकि उस दौरान दोनों देशों के मुद्रा प्रबंधन का पूरा भार भारतीय रिजर्व बैंक पर ही था। देखें सन् 1947 के एक रुपये का चित्र जिसमें, Government of India के साथ ही साथ बायीं ओर, Government of Pakistan भी मुद्रित है।

Wednesday, December 10, 2008

कौन शूटर है असली हीरो?

एक शूटर अभिनव बिन्द्रा को दियाः
महाराष्ट्र नेः रु.10 लाख
हरयाणा नेः रु.25 लाख
पंजाब नेः रु.1 करोड़
बिहार नेः रु.11 लाख
छत्तीसगढ़ नेः रु.1 लाख
मध्यप्रदेश नेः रु.5 लाख
चंडीगढ़ नेः रु.5 लाख
तमिलनाडु नेः रु.5 लाख
उड़ीसा नेः रु.5 लाख
केन्द्रीय रेल मंत्री लालू प्रसाद नेः भारतीय रेल के पहले दर्जे में मुफ्त यात्रा का गोल्डन पास (जो आजीवन जारी रहेगा)
BCCI नेः रु.25 लाख का चेक
(टाइम्स आफ इंडिया समाचार)

दूसरा शूटर जो कि देश के हजारों लोगों की रक्षा करते हुये मर जाता है उसके परिवार को दिया जाता है रु.25 लाख
(जी न्यूज)

तो कौन शूटर है असली हीरो?

Monday, December 8, 2008

McClatchy समाचार - जीवित मुंबई हमलावर पाकिस्तानी है


(चित्र McClatchy समाचार के सौजन्य से)

McClatchy समाचार के अनुसार मुंबई हादसे के दौरान पकड़ा गया जीवित हमलावर पाकिस्तान पाकिस्तान के देपालपुर गाँव, जिला फरीदकोट का रहने वाला है तथा उसके वहाँ रहने की पुष्टि ग्रामीणों के द्वारा हो चुकी है। उक्तसमाचार में यह भी बताया गया है कि उसके पिता तथा माता का नाम मोहम्मद अमीर तथा नूर इलाही है।

इस समाचार को पाकिस्तानी ब्लोग "बैठक" मे बैठक ने भी अपने पोस्ट में दर्शाया है।

Friday, December 5, 2008

किसके प्रति रोष है लोगों का?

मुंबइ के हादसे के बाद लोगों में रोष तो है पर किसके प्रति है? आतंकवाद के प्रति या पाकिस्तान के प्रति या राजनीतिबाजों के प्रति या फिर स्वयं अपने ही प्रति कि आखिर हम क्यों कुछ कर नहीं पाये। सब कुछ गडमड सा हो गया है।

मानसिक हलचल में एकदम सही प्रश्न उठाया गया है कि आखिर घायलों के प्रति किसे सहानुभूति है। उनका हालचाल जानने के लिये न तो मोमबत्तियाँ जलाने वाले ही गये और न ही मीडिया गई। मीडिया तो सिर्फ लोगों के रोष को और भी हवा देने में लगी हुई है। लोगों और राजनीतिबाजों के बीच टकराव करवा के उन्हें नई नई स्टोरीज़ जो मिलेंगी। चौबीसों घंटे उन्हें अपना चैनल चलाना है तो दिखाने के लिये नई स्टोरीज़ भी तो चाहिये न?

रोष में आने से या फिर आपस मे कलह करने से कुछ भी नहीं होने वाला है। अब तो भैया यह सोचना है कि जो कुछ भी हुआ है वह फिर से भविष्य में फिर से न हो। भविष्य में आतंकवादी हमारी तरफ नजरें उठा कर देख भी न पायें। और यह तभी हो सकता है जब हम सभी मिलकर एक जुट हो पायेंगे।

Thursday, December 4, 2008

आम लोगों के लिये पेट्रोल महंगा क्यों?

संसार भर में मंदी के चलते कच्चे तेल की कीमत में भारी गिरावट आ गई है। जब कच्चे तेल की कीमत 147 डॉलर प्रति बैरल हो गई थी तो सरकार ने, यह कहकर कि कीमतें न बढ़ाने पर तेल कंपनियां तबाह हो जाएंगी, पेट्रोल-डीजल के दाम को बढ़ा दिया था। किन्तु आज जब कच्चे तेल की कीमत 48 डॉलर प्रति बैरल से भी कम हो चुकी हैं तो सरकार आज भी तेल कंपनियों को बढ़े दामों में पेट्रोल-डीजल क्यों बेचने दे रही है। तेल कंपनियाँ रु.35.00 की खरीदी वाले पेट्रोल को रु.50.00 प्रति लीटर में बेच रही हैं यानी कि 40% से भी अधिक मुनाफा कमा के।

जब दाम बढ़ने पर लोगों को पेट्रोल डीजल को महंगा किया जाता है तो कीमत घट जाने पर क्या सस्ता नहीं करना चाहिये?

Wednesday, December 3, 2008

प्लीज मुझे बचा लो मैं मरना नहीं चाहता

जब दूसरों की जान से खेलने वाले की अपनी जान पर बन आती है तो वह यही कहता है "प्लीज मुझे बचा लो। मैं मरना नहीं चाहता।" यही शब्द जिंदा पकड़े जाने वाले आतंकवादी के भी थे। अपनी जान बख्श देने की मिन्नत करते वक्त जरूर उसके जेहन में कहीं न कहीं रहा होगा कि ये लोग तो भारतीय हैं। सभी पर दया करने वाले। इन्हें तो हमेशा " अहिंसा परमो धर्मः" ही याद रहता है। पर उसे क्या पता कि गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को यह उपदेश भी दिया है कि "जो तुझे मारे तू उसे मार!"

इन आतंकवादियों को तो यही लगता है कि "उनका खून खून है और दूसरों का पानी।"

अब उसे बचाया तो जरूर गया है किन्तु दया करके नहीं बल्कि कूटनीति के जन्मदाता चाणक्य की दी गई शिक्षाओं पर अमल करने के लिये। यह पता करने के लिये कि 170 से भी अधिक लोगों, जिनमें 40 मुस्लिम तथा 10 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं, की जान से खेलने वालों के सहायकों में पाकिस्तानी सरकार भी है या नहीं या फिर पाकिस्तान, जैसा कि वह कहता है, वाकइ में निर्दोष है। और यदि पाकिस्तान उनके सहायकों में से है तो अब अपनी गलती को सुधारने के लिये अपराधियों को भारत के हवाले करता है या नहीं।

Monday, December 1, 2008

नेता जी का नियुक्तिपत्र

नेता जी ने माइक्रोसॉफ्ट के किसी पद में आवेदन के लिये अपना बायोडाटा भेजा।

कुछ रोज बाद उन्हें जवाब मिला जो कि नीचे दिया जा रहा हैः

Dear Mr. Neta Ji,

You do not meet our requirements. Please do not send any further correspondence.
No phone call shall be entertained.

Thanks
Bill Gates.

इस जवाब को पढ़कर नेता जी खुशी से उछल पड़े। उन्होंने तत्काल प्रेस कांफ्रेंस बुला कर कहा, "आप लोगों को जान कर खुशी होगी कि हम को अमरीका में नौकरी मिल गई है। अब हम आप सब को अपना नियुक्ति पत्र पढ़ कर सुनाते हैं। पर पत्र अंग्रेजी में है इसलिये साथ साथ हिन्दी में अनुवाद भी करते जायेंगे।

"Dear Mr. Neta Ji ----- प्यारे नेता जी

"You do not meet -----आप तो मिलते ही नहीं हैं

"our requirement ----- हमको जरूरत है

"Please do not send any further correspondence ----- अब लेटर वेटर भेजने की कोई जरूरत नहीं।

No phone call ----- फोन करने की भी जरूरत नहीं है

shall be entertained ----- बहुत खातिर की जायेगी।

Thanks ----- आपका बहुत बहुत धन्यवाद!

Bill Gates. ---- बिल गेट्स"

 
Design by Free WordPress Themes | Bloggerized by Lasantha - Premium Blogger Themes | fantastic sams coupons