Saturday, October 31, 2009

विष्णु तथा सूर्य के अनेक नामों को जानें

हरि शब्द के अर्थों को आपने "कौन है रे हरि तू? ... साँप है या वानर है कि विष्णु है या साक्षात् यमराज!" पोस्ट में जाना, विष्णु तथा सूर्य के अनेक नामों को भी जानें।

अमरकोष के अनुसार भगवान विष्णु के निम्न नाम हैं:

  • विष्णु
  • नारायण
  • कृष्ण
  • वैकुण्ठ (या बैकुण्ठ)
  • दामोदर
  • हृषीकेश
  • केशव
  • माधव
  • दैत्यारि
  • पुण्डरीकाक्ष
  • गोविन्द
  • गरुड़ध्वज
  • पीताम्बर
  • अच्युत
  • जनार्दन
  • उपेन्द्र
  • चक्रपाणि
  • चतुर्भुज
  • पद्मनाभ
  • मधुरिपु
  • वासुदेव
  • त्रिविक्रम
  • देवकीनन्दन
  • श्रीपति
  • पुरुषोत्तम
  • वनमाली
  • विश्वम्भर
ग्रंथ अमरकोष के अनुसार सूर्य के निम्न नाम हैं:

  • सूर
  • सूर्य
  • अर्यमा
  • आदित्य
  • द्वादशात्मा
  • दिवाकर
  • भास्कर
  • अहस्कर
  • ब्रध्न
  • प्रभाकर
  • विभाकर
  • भास्वान
  • विवस्वान
  • सप्ताश्व
  • हरिदश्व
  • उष्णरश्मि
  • विकर्तन
  • अर्क
  • मार्तण्ड
  • मिहित
  • अरुण
  • पूषा
  • द्युमणि
  • तरणि
  • मित्त्र मित्र
  • चित्रभानु
  • विरोचन
  • विभावसु
  • ग्रहपति
  • त्विषांपति
  • अहर्पति
  • भानु
  • हंस
  • सहस्त्रांशु
  • तपन
  • सविता
  • रवि

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राजा दशरथ की मृत्यु - अयोध्याकाण्ड (20)

Friday, October 30, 2009

हम खुश होते थे सोचकर कि एक साल में दो बार ईद की छुट्टियाँ मिलेंगी

साल में एक ही त्यौहार दो बार आये और दो बार छुट्टियाँ मिले तो क्या कोई खुश नहीं होगा। ईद, मोहर्रम आदि की छुट्टियाँ ऐसी हैं जिनकी कभी न कभी एक साल में दो बार मिलने की सम्भावना होती है, एक बार जनवरी में और एक बार दिसम्बर में।

क्यों होता है ऐसा?

ऐसा इसलिये होता है क्योंकि ये चन्द्र की गति के आधार पर बनाये गये कैलेंडर पर आधारित होते हैं। सूर्य की गति के आधार पर बनाये गये कैलेंडर में वर्ष लगभग 365 दिन का होता है क्योंकि पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा करने में लगभग 365 दिन लगते हैं। किन्तु चन्द्रमा को पृथ्वी का एक चक्कर लगाने में लगभग 29.58 दिन लगते हैं इसलिये चन्द्र की गति के आधार पर बनाये गये कैलेंडर के एक वर्ष में लगभग 355 दिन ही होते हैं। इस प्रकार से दोनों कैलेंडरों में प्रतिवर्ष लगभग 10 दिनों का अन्तर हो जाता है और ये छुट्टियाँ 365 दिनो के बाद आने के बजान 355 दिनों के बाद आती हैं। अब मान लीजिये कि किसी साल ईद जनवरी माह के पहले सप्ताह में आती है तो अगली बार वह उसी साल के दिसम्बर माह के अन्तिम सप्ताह में आयेगी।

जहाँ मुस्लिम कैलेंडर चन्द्र की गति पर आधारित है वहीं हिन्दू कैलेंडर भी चन्द्र की गति पर ही आधारित है और हिन्दू त्यौहार भी प्रतिवर्ष 10 दिन पीछे हो जाते हैं। किन्तु हिन्दू कैलेंडर में चन्द्र की गति के साथ ही साथ सूर्य की गति को भी महत्व देकर उसे भी आधार बनाया गया है। इसीलिये प्रति तीन वर्ष में एक अधिक माह जोड़ दिया जाता है और इस प्रकार से फिर से समायोजन हो जाता है। मुस्लिम कैलेंडर में इस प्रकार के किसी समायोजन का प्रावधान नहीं है।

चलिये जाने थोड़ा सा हिन्दू पंचांग के बारे में

सामान्य

वेदों में पंचांग (calendar) के अनेकों प्रसंग मिलते हैं जिससे ज्ञात होता है कि हिन्दू पंचांग की उत्पत्ति वैदिक काल में ही हो चुकी थी।

प्रायः सभी हिन्दू पंचांग सूर्य सिद्धान्त में निहित सिद्धान्तों का ही अनुगमन करते हैं।

वैदिक काल के पश्चात् आर्यभट, वाराहमिहिर, भास्कर आदि जैसे ज्योतिष के प्रकाण्ड पण्डितों ने हिन्दू पंचांग को विकसित किया।

हिन्दू पंचाग के पाँच अंग (1) तिथि (2) वसर (3) नक्षत्र (4) योग और (5) करन होते हैं, इसी कारण से इसका नाम पंचांग (पंच+अंग) पड़ा।
विक्रम तथा शालिवाहन संवत

विक्रम तथा शालिवाहन संवत सर्वाधिक प्रयोग किये जाने वाले हिन्दू कैलेन्डर हैं।

विक्रम तथा शालिवाहन संवत क्रमशः उत्तर भारत व दक्षिण भारत में अधिक लोकप्रिय हैं।

विक्रम तथा शालिवाहन संवत दोनों में ही बारह चंद्रमास होते हैं।

पूर्ण चंद्र वाली रात्रि (पूर्णिमा) के अगले दिन से महीने का आरम्भ होता है।

प्रत्येक चंद्रमास को शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्ष नामक दो पक्षों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक चंद्रमास का आरम्भ कृष्णपक्ष से होता है और अन्त शुक्लपक्ष से।
हिन्दू पंचाग के बारह चंद्रमासों के नाम

1. चैत्र
2. वैशाख
3. ज्येष्ठ
4. आषाढ़
5. श्रावण
6. भाद्रपद
7. आश्विन
8. कार्तिक
9. मार्गशीर्ष
10. पौष
11. माघ
12. फाल्गुन

चलते-चलते

त्यौहार के उपलक्ष्य में एक दम्पति ने पण्डित जी को भोजन के लिये निमन्त्रित किया था। पत्नी किचन में गरम गरम पूरियाँ निकाल रही थी और पति डॉयनिंग रूम में पण्डित जी को परस रहा था। पण्डित जी थे कि खाये चले जा रहे थे, खाये चले जा रहे थे।

लगाया गया आटा पूरा चुक गया। पत्नी ने इशारे से पति को बुलाया और बोली, "आटा चुक गया है जी, मैं जल्दी से और आटा गूँथ लेती हूँ, तब तक आप जरा पण्डित जी को बातों में लगा कर उनका हाथ रोकिये।"

पति ने पण्डित जी को बातों में लगाना शुरू किया, "खाना तो अच्छा बना है न पण्डित जी?"

"बहुत सुस्वादु भोजन है यजमान! भगवान तुम्हें सुखी रखे।"

"पूरियाँ कुछ ठंडी हो गई हैं, मैं अभी गरम निकलवा कर लाता हूँ। तब तक आप जरा पानी-वानी पीजिये।"

"पानी तो हम आधा पेट भरने के बाद ही पीते हैं यजमान।"

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सुमन्त का अयोध्या लौटना - अयोध्याकाण्ड (18)

Thursday, October 29, 2009

कौन है रे हरि तू? ... साँप है या वानर है कि विष्णु है या साक्षात् यमराज!

मैं यमराज भी हूँ और विष्णु भी, पवन भी हूँ और इन्द्र भी, अगर तोता हूँ तो मेढक भी हूँ और सिंह हूँ तो घोड़ा भी।

जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ हरि की। हरि याने कि हिन्दी का एक शब्द! हरि शब्द तो एक है पर आपको शायद ही पता हो कि इसके कितने अर्थ हैं। संस्कृत ग्रंथ अमरकोष के अनुसार हरि शब्द के अर्थ हैं

यमराज, पवन, इन्द्र, चन्द्र, सूर्य, विष्णु, सिंह, किरण, घोड़ा, तोता, सांप, वानर और मेढक

उपरोक्त अर्थ तो अमरकोष से है और अमरकोष में ही बताया गया है कि विश्वकोष में कहा गया है कि वायु, सूर्य, चन्द्र, इन्द्र, यम, उपेन्द्र (वामन), किरण, सिंह घोड़ा, मेढक, सर्प, शुक्र और लोकान्तर को 'हरि' कहते हैं।

देखें अमरकोष के पृष्ठ का स्कैन किया गया चित्र


यमक अलंकार से युक्त एक दोहा याद आ रहा है जिसमें हरि शब्द के तीन अर्थ हैं

हरि हरसे हरि देखकर, हरि बैठे हरि पास।
या हरि हरि से जा मिले, वा हरि भये उदास॥
(अज्ञात)

पूरे दोहे का अर्थ हैः

मेढक (हरि) को देखकर सर्प (हरि) हर्षित हो गया (क्योंकि उसे अपना भोजन दिख गया था)। वह मेढक (हरि) समुद्र (हरि) के पास बैठा था। (सर्प को अपने पास आते देखकर) मेढक (हरि) समुद्र (हरि) में कूद गया। (मेढक के समुद्र में कूद जाने से या भोजन न मिल पाने के कारण) सर्प (हरि) उदास हो गया।

तो ऐसी समृद्ध भाषा है हमारी मातृभाषा हिन्दी! इस पर हम जितना गर्व करें कम है!!

चलते-चलते

डॉ. सरोजिनी प्रीतम की एक हँसिकाः

क्रुद्ध बॉस से
बोली घिघिया कर
माफ कर दीजिये सर
सुबह लेट आई थी
कम्पन्सेट कर जाऊँगी
बुरा न माने गर
शाम को 'लेट' जाऊँगी।

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ऋषि भरद्वाज के आश्रम में- अयोध्याकाण्ड (15)

Wednesday, October 28, 2009

मृत्यु निकट अनुभव

मृत्यु निकट अनुभव उन व्यक्तियों के अनुभवों का संग्रह तथा अध्ययन है जो कि मृत्यु के अत्यन्त समीप से गुजर चुके होते हैं (जैसे कि हृदयाघात से बच जाने वाले लोग, दुर्घटना में मौत के पास पहुँच जाने के बाद भी जीवित रह जाने वाले लोग आदि)। अध्ययन से ज्ञात होता है कि ऐसे लोगों को विभिन्न प्रकार के अनुभव होते हैं जैसे कि स्वयं को अपने ही शरीर से बाहर होते देखना, चरम भय, चरम शांति, अत्यन्त सुरक्षित महसूस करना, भयानक गर्मी का अनुभव, देवताओं की उपस्थिति, अलौकिक प्रकाश का दर्शन आदि।

मृत्यु निकट अनुभव परामनोविज्ञान से सम्बन्धित विषय है और इस विषय में संसार भर में अनेकों शोध कार्यों किये जा रहे हैं।
  • कुछ संस्कृतियाँ और व्यक्ति मृत्यु निकट अनुभव को अपसामान्य घटना और मृत्यु पश्चात् असाधारण तथा आध्यात्मिक झलक के रूप में देखते हैं।
  • चूँकि इस प्रकार के प्रकरणों का वर्णन आमतौर से ऐसे व्यक्ति करते हैं जो कि मौत के बहुत करीब पहुँच कर वापस आये होते हैं, इसलिये इन्हें मृत्यु निकट अनुभव का नाम दिया गया है।
  • श्री रेमंड मूडी के द्वारा सन् 1975 में लिखी गई पुस्तक "Life After Death" ने "मृत्यु निकट अनुभव" के प्रति आम लोगों की जिज्ञासा एव रुचि को बढ़ा दिया। इस विषय की लोकप्रियता को देखते हुये श्री मूडी ने सन् 1978 में International Association for Near-Death Studies (IANDS) नामक संस्था की स्थापना की।
  • गेलुप पोल (Gallup poll) के अनुसार लगभग अस्सी लाख अमेरिकनों ने "मृत्यु निकट अनुभव" करने का दावा किया है।
  • कुछ प्रकरणों में व्यक्तियों के मृत्यु निकट अनुभव उनके विश्वास के अनुसार बदले हुये पाये गये हैं अर्थात् व्यक्ति का जैसा विश्वास था वैसा ही उसने मृत्यु निकट अनुभव किया।
अधिकतर व्यक्तियों के मृत्यु निकट अनुभव निम्न क्रम में पाये गये हैं।

1. एक अत्यन्त अप्रिय ध्वनि/शोर सुनाई पड़ना (संदर्भः लाइफ आफ्टर डेथ)।

2. स्वयं के मरे हुये होने का ज्ञान।

3. सुखद भावनाओं, शांति और स्थिरता का अनुभव।

4. शरीर से बाहर होकर हवा में तैरते हुये आसपास के क्षेत्र को देखने का अनुभव।

5. नीले सुरंग, जिसके अंत में चमकदार प्रकाश या कोई उपवन हो, में तैरते हुये जाने का अनुभव।

6. मरे हुये लोगों या आध्यात्मिक चरित्रों से मुलाकात।

7. अलौकिक प्रकाश दिखाई पड़ना(प्रायः समझा जाता है कि वह प्रकाश उस देवता का रूप होता है जिस पर व्यक्ति का अटूट विश्वास होता है)।

8. स्वयं के जीवन-काल का पुनरीक्षण अर्थात् जीवन में घटित घटनाओं का चलचित्र के समान दिखाई पड़ना।

9. एक आखरी सीमा में पहुँच जाना (Reaching a border or boundary)।

10. अपने स्वयं के शरीर में फिर से, प्रायः अनिच्छापूर्वक, पहुँचा हुआ महसूस करना।

11. निर्वस्त्र होने पर भी उष्णता (गर्मी) महसूस करना।

Rasch model-validated NDE मापदंड के अनुसार मृत्यु निकट अनुभव का केन्द्र शांति, आनन्द और एकलयता, जिनमें गूढ़ तथा रहस्यमय आध्यात्मिक अनुभव निहित होते हैं, से घिरा रहता है।

मृत्यु निकट अनुभव के प्रति आम लोगों की रुचि को मूलतः एलिसाबेथ कुबलेर रोस (Elisabeth Kübler-Ross), जार्ज रिचे (George Ritchie), पी.एम.एच एटवाटर (P.M.H. Atwater) के शोध कार्यों और रेमण्ड मूडी की पुस्तक "लाइफ आफ्टर डेथ" ने उकसाया। परिणामस्वरूप मृत्यु निकट अनुभव के क्षेत्र में अध्ययन एवं शोधकार्यों के लिये सन् 1978 में "इंटरनेशनल एसोसियेशन फॉर नियर डेथ स्टडीज" नामक संस्था की स्थापना हुई।

चलते-चलते

एक राजनीतिबाज की मृत्यु हो गई। यमदूत उसकी आत्मा को यमराज के पास ले गए। यमराज ने चित्रगुप्त से उसके कर्मों का लेखा-जोखा पूछा। चित्रगुप्त ने बताया कि इसके कर्मों में मात्र तीन सुकर्म हैं और शेष कुकर्म।

यमराज ने राजनीतिबाज से कहा, "कुकर्मों की सजा तो तुम्हें मिलेगी ही पर तुम्हारे द्वारा किए गए तीन सुकर्मों के बदले तुम तीन चीजें माँग सकते हो, माँगो क्या माँगते हो?"

मृतात्मा ने कहा, "मैं कुछ माँगू उससे पहले यह बताओ कि बाद में कहीं मुकर तो नहीं जाओगे?"

यमराज ने आश्वस्त उसे कर दिया कि उसकी तीन माँगे अवश्य ही पूरी की जायेंगी।

मृतात्मा ने कहा, "तो यमराज, मेरी पहली माँग ये है कि सबसे पहले तो ये जो तुम्हारे पास जो तुम्हारी सवारी याने कि भैंसा बैठा है उसके दो सींगों को एक कर दो।"

यमराज ने भैंसे के सींगों को जोड़ कर एक बना दिया।

मृतात्मा फिर बोला, "मेरी दूसरी माँग है कि अब सींग को अपने मुँह में डाल लो।"

यमराज घबराया, पर कर ही क्या सकता था? उसने भैंसे के सींग को अपने मुँह में डाल लिया।

अब मृतात्मा ने कहा, "यमराज! अब यदि तुमने मेरे सारे कुकर्मों सुकर्म में नहीं बदला तो मैं माँगूंगा कि सींग फिर से दो हो जाए।"

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भीलराज गुह - अयोध्याकाण्ड (13)

Tuesday, October 27, 2009

ब्लॉगर खाया हो या न हो, अघाया जरूर होता है

हाँ, अघाया होता है हिन्दी ब्लॉगर, खाया चाहे हो या न हो। वो दर्द और पीड़ा से अघाया होता है। डेजी मरती है पाबला जी की और दर्द तथा पीड़ा से अघा जाता है दिनेशराय द्विवेदी तभी तो लिखता है "डेज़ी तुम्हें आखिरी सलाम! तुम बहुत, बहुत याद आओगी!", अघा जाता है शरद कोकास तभी तो लिखता है "डेज़ी नहीं रही पाबला जी !!"

हिन्दी ब्लॉगर अघाया होता है अपने धर्म के अपमान से, अपने शहीद क्रान्तिकारी राष्ट्रभक्तों की अवहेलना से, अपने बुजुर्गों की बेइज्जती से, अपने लोगों पर होने वाले अन्याय से, अपनी शिक्षा के खोखलेपन से, अपने नेताओं के भ्रष्टाचार से, ....

अधिक क्या कहूँ, समझदार के लिए इशारा ही बहुत होता है। पता नहीं आपने खाया है या नहीं पर मैं जानता हूँ कि आप भी अघाये हुए हैं। आप स्वयं ही बता सकते हैं कि आप किससे अघाये हुए हैं।

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तमसा के तट पर - अयोध्याकाण्ड (11)

Monday, October 26, 2009

फिजिक्स के विद्यार्थी थे पर मनोविज्ञान पढ़ाया और फँस गए उम्र भर के लिए

मनोविज्ञान हमारा विषय कभी रहा ही नहीं पर पढ़ाया जरूर है इस विषय को। और उसी चक्कर में उम्र भर के लिए फँस भी गए। कैसे फँस गए यह सिर्फ आपको ही बता रहे हैं क्योंकि आप हमारे मित्र हैं, पर गुजारिश है कि आप किसी और को मत बताइगा प्लीज।

तो हम थे उस समय एम.एससी. फर्स्ट ईयर में, भौतिकशास्त्र विषय था हमारा। वार्षिक परीक्षा के कुछ दिन ही शेष थे। एक दिन हमारी एकमात्र छोटी बहन, जो कि बी.ए. फर्स्ट ईयर में पढ़ रही थी, ने हमसे कहा, "भैया, हम लोगों के सायकोलॉजी वाले सर पता नहीं पता नहीं कैसे पढ़ाते हैं कि कुछ समझ नहीं आता। लगता है हम सभी सहेलियाँ इस साल मनोविज्ञान में फेल हो जायेंगी। आप हम लोगों को सायकोलॉजी पढ़ा देंगे क्या?"

हमने कहा, "मैं भला मनोविज्ञान क्या जानूँ? ये तो मेरा विषय ही नहीं है। खैर, तुम्हारी मनोविज्ञान वाली पुस्तक दो पढ़ के देखते हैं और यदि समझ में आ जाएगा तो पढ़ा भी देंगे।"

उसने तत्काल हमें मनोविज्ञान की पुस्तक दे दी। पढ़ा तो विषय बहुत रोचक लगा। उसी दिन ही दो-तीन चेप्टर पढ़ गये और अगले ही दिन से सायकोलॉजी का क्लास लेने के लिए तैयार हो गये।

अगले दिन हमारी बहन के साथ उसकी पाँच छः सहेलियाँ आ गईं पढ़ने के लिए।

हमने कहा, "आज हम तुम लोगों को मनुष्य के मस्तिष्क के विषय में बतायेंगे। मस्तिष्क के तीन स्तर होते हैं - चेतन, अचेतन और अवचेतन। अंग्रेजी में इन्हें conscious, semi-conscious और unconscious कहा जाता है। जब हम जानते-बूझते किसी कार्य को करते हैं तो वह चेतन के द्वारा किया गया कार्य होता है किन्तु यदि किसी कार्य को अनजाने में करते हैं वह अचेतन का कार्य होता है। तुम लोगों ने देखा होगा तुम दो सहेलियाँ अपनी अपनी सायकल से कॉलेज जा रही हो और साथ ही साथ बातें भी कर रही हो। तुम लोगों का पूरा ध्यान बातें करने में ही लगा रहता है पर सड़क में मोड़ आने पर सायकल का हेंडल अपने आप मुड़ जाता है, सामने से किसी बड़ी गाड़ी आने पर सड़क के बीचोबीच चलती सायकलें किनारे आ जाती हैं पर बातों का सिलसिला कहीं पर भी नहीं टूटता। जब तुम लोग कॉलेज पहुँच जाती हो तो तुम्हें लगता है कि 'अरे! हम तो कॉलेज पहुँच गए'। याने कि तुम लोग जानती थीं कि तुम आपस में बाते कर रहीं थीं पर यह नहीं जानती थीं कि सायकल सही सही चलने का काम अपने आप हो रहा था। तो आपस में बातें करने वाला कार्य तुम लोगों का चेतन मस्तिष्क कर रहा था और सही सही सायकल चलाने का कार्य तुम्हारा अचेतन मस्तिष्क कर रहा था। चेतन तभी तक कार्य करता है जब तक हम जागते रहते हैं किन्तु अचेतन सोते-जागते चौबीसों घंटे कार्य करता है। सपने भी अचेतन ......."

अरे! अरे!! ये क्या? मैं तो आप लोगों का ही क्लास लेने लगा। थोड़ी धुनकी में आ गया था मैं। पर अब इससे आगे आप लोगों को और बोर नहीं करूँगा।

तो साहब, हमारा इस प्रकार पढ़ाना उन सभी को पसंद आया। उनमें हमारी बहन की एक बहुत प्यारी (और सुन्दर भी) सहेली भी हमारे मुहल्ले में ही रहती थी। अक्सर क्लास लेने के बाद भी हमसे कुछ कुछ पूछने आ जाती थी। हमारे पास से वो हमारी माँ के पास पहुँच जाती थी और उनके काम में हाथ बँटा दिया करती थी। वापस जाने के पहले हमारी दादी को भी उनकी पसंद की चर्चा याने कि धार्मिक चर्चा के लिए थोड़ा समय देना नहीं भूलती थी।

बहुत दिनों तक ऐसा ही चलता रहा। फिर हमारी नौकरी लग गई तो हम रायपुर छोड़ कर नरसिंहपुर चले गए अकेले। लगता है कि हमारे चले जाने के बाद भी उसका हमारे घर में वैसा ही सिलसिला चलता रहा क्योंकि सन 1975 में स्थानान्तरित होकर रायपुर आने पर हमने पाया कि हमारी माँ, दादी, पिताजी सभी की वो लाडली बन चुकी थी।

अब सबकी यही जिद थी कि हम शादी कर लें उसके साथ। सबसे ज्यादा दबाव तो हमारी दादी का था।किसी प्रकार उसके बाद भी एक साल तक तो हम टालते रहे पर अन्ततः शादी कर ही ली उसके साथ और आज तक भुगत रहे हैं।


चलते-चलते

हम दोस्तों के साथ रोज बार चले जाया करते थे। रात में वापस आने पर, जैसा कि आप अनुमान लगा ही सकते हैं, रोज ही हमें श्रीमती जी हड़काती थीं। जब हम बिना कोई प्रतिक्रिया किए चुपचाप सुन लेते थे तो आखिर में कहती थी 'देख लेना एक दिन भीख मांगोगे'

एक दिन हमने सोचा कि कहती तो ये ठीक ही है और इसकी बात में हमारी भलाई भी है, हमको दारू छोड़ देना चाहिए। बस क्या था छोड़ दिया पीना। यार दोस्त आए, हमें बहुत मनाया पर हम भी अपने निश्चय पर अटल रहे। इस प्रकार पूरे पच्चीस दिन बीत गए। पच्चीसवें दिन पूरी मित्र मण्डली ने हमें बधाई दी और कहा कि यार तुम्हें पीना छोड़े पच्चीस दिन हो गए हैं। इसी खुशी में हम लोगों ने एक पार्टी रखी है। हमने कहा भाई तुम्हारी पार्टी तो दारू वाली ही होगी, मेरा वहाँ क्या काम? उन्होंने कहा कि यार तुम भी अजीब आदमी हो! अरे भई, तुम ड्रिंक्स मत लेना पर खाना तो खा सकते हो ना।

अब पार्टी में हमें दोस्तों ने सिर्फ एक घूँट ले लेने के लिए इतनी मिन्नत की कि हमने हाँ कर दी। बस फिर क्या था। कोई कभी सिर्फ एक घूँट ले कर रह सकता है?

जब वापस लौटे तो फिर वही हड़काना - मैं कहती थी ना कि आप कभी भी पीना नहीं छोड़ सकते ... ऐसा... वैसा ... आदि आदि इत्यादि और आखिर में 'देख लेना एक दिन भीख मांगोगे'

हम तो जानते ही थे कि आखिर में क्या कहा जायेगा इसलिए हमने पहले से ही जुगाड़ कर लिया था याने कि एक भीख मांगने वाले को दस रुपये देकर साथ लाये थे जो कि दरवाजे के पास बैठा था। जब श्रीमती जी ने 'देख लेना एक दिन भीख मांगोगे' कहा तो हम बोले चलो जरा दरवाजे तक।

दोनों के दरवाजे तक आ जाने पर हमने उस भिखमंगे को बुला कर कहा, "तुम क्या करते हो भाई?"

"भीख मांगता हूँ साहब।"

"कभी दारू पी है?"

"अरे साहब, भीख मांग कर बड़ी मुश्किल से एक टाइम के खाने का जुगाड़ होता है। भला मैं दारू कहाँ से पी सकता हूँ। नहीं, मैं दारू नहीं पीता।"

हमने उस भिखारी को जाने के लिए कह दिया और सीना फुला कर मैडम से बोले, "देखा मैडम! जो लोग दारू नहीं पीते वो ही भीख मांगते हैं।

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पिता के अन्तिम दर्शन - अयोध्याकाण्ड (9)

Sunday, October 25, 2009

अब मरने वाले की बुराई कैसे करें ...

मुहल्ले का कुख्यात गुंडा लल्लू लाटा मर गया। गुंडा तो था किन्तु उसके संबंध बड़े बड़े नेताओं से भी थे अतः उसकी अच्छी साख भी थी। लोग उसे छुपे तौर पर गुंडा कहते पर खुले तौर पर उस एक संभ्रांत व्यक्ति ही कहा करते थे।

तो लल्लू लाटा मर गया। मरना तो खैर प्रत्येक प्राणी की नियति है और जन्म के साथ ही मरने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। एक दिन आखिर सभी को मरना ही पड़ता है। अस्तु, तो लल्लू लाटा मर गया। संभ्रांत होने के कारण उसकी मृत्यु के पश्चात् मुहल्ले में एक शोक सभा आयोजित करने की योजना भी बन गई। मुहल्ला समिति के प्रमुख को एक छोटा सा भाषण भी देना था।

समिति प्रमुख के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई, आखिर बोले तो क्या बोले। कोई भी अच्छा कार्य, जिसे कि लल्लू लाटा ने किया हो, उसे याद ही नहीं आ रहा था। और फिर किसी दिवंगत की बुराई भी तो नहीं की जा सकती। भई, अब किसी के मरने के बाद उसकी बुराई कैसे करें?

अंततः समिति प्रमुख ने सभा में कहा, "ये माना कि लल्लू लाटा एक नंबर का कमीना था। पूरा हरामी था। कई बार डाके डाले थे उसने और कितनों की हत्याएँ भी की थी। मुहल्ले की बहू बेटियों पर हमेशा बुरी नजर रखा करता था। मुहल्ले का ऐसा कोई भी निवासी नहीं होगा जिसे कि उसने परेशान न किया हो। फिर भी वो अपने भाई कल्लू काटा से लाख गुना अच्छा था!"



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सीता और लक्ष्मण का अनुग्रह - अयोध्याकाण्ड (7)

Saturday, October 24, 2009

लगती थीं जो उर्वशी-मेनका ... बन गईं वो ही रणचण्डिका ...

शादी की थी हमने क्योंकि
लगती थी वो उर्वशी-मेनका,
पर पाया कुछ काल बाद ही
बन गईं वो ही रणचण्डिका।

फूलों से कोमल लगती थी
वो सुशील, सलज्ज, किशोरी,
क्यों बन गई कठोर वज्र सी
मेरे सपनों की वो गोरी।

सोचा था घर को सुखमय करने
गीता और रामायण पढ़ेगी,
पता नहीं था घर में मेरे
वो बाला महाभारत करेगी।

पर उसके हर काम के पीछे
मैं ही केन्द्रित रहता हूँ,
इसीलिए तो भक्त हूँ उसका
नखरे उसके सहता हूँ।

उससे ही तो घर है मेरा
उससे ही है घर की लाली,
मैं ही तो सब कुछ हूँ उसका
वो है मेरी घरवाली।

चलते-चलते

वो स्साला जी.के. अवधिया दारू पीना नहीं छोड़ रहा है

भाई जहाँ पत्नी साथ निभाती है वहीं मित्र भी साथ निभाता है। हमारा भी एक मित्र हमारा साथ आज तक निभा रहा है। आज वो भिलाई में हैं और हम रायपुर में। पर कभी हम दोनों एक साथ भिलाई में रहते थे। रोज एक साथ बार जाते थे और मौज मनाते थे। फिर हमारा ट्रांसफर हो गया और हमको भिलाई छोड़ना पड़ा और वो आज तक भिलाई में हैं।

हमारे भिलाई छोड़ देने के बाद भी दोस्ती निभाने के लिए वो रोज बार जाते रहे। बार वाले जानते थे कि वे दो पैग एक साथ मंगाते थे एक अपने लिए और एक मेरे लिए। फिर एक बार अपने पैग से तो दूसरी बार मेरे पैग से घूँट लगाते थे।

कुछ साल पहले एक दिन वेटर ने मामूल के अनुसार जब उनके लिए दो पैग लगाया तो उन्होंने कहा, "एक पैग वापस ले जाओ।"

आश्चर्य से वेटर ने पूछा, "क्यों साहब?"

मित्र ने बताया, "यार मैंने आज से दारू पीना छोड़ दिया है पर मेरे बार बार कहने के बाद भी वो स्साला जी.के. अवधिया दारू पीना नहीं छोड़ रहा है।"

और दोस्ती निभाने के लिए आज भी वो बार जाकर हमारा पैग पीते हैं।

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राम का वनवास - अयोध्याकाण्ड (5)

Friday, October 23, 2009

थोड़ी सी कमाई तो आप नेट में सर्च करके भी कर सकते हैं

यह कमाई नाममात्र की है, बिल्कुल थोड़ी सी, याने कि साल छः महीने में मात्र £20 की। अब कमाई तो कमाई ही होती है, भले ही नाममात्र की हो! तो मैं आपको यह बता रहा था कि थोड़ी सी कमाई तो आप नेट में सर्च करके भी कर सकते हैं। नेट में सर्च तो हम लोग प्रायः हम लोग रोज ही किया करते हैं पर यदि सर्च करने के साथ ही साथ कुछ कमाई भी हो जाए तो फिर बात ही क्या है!

यू.के. की होमपेजेस फ्रेंड्स कंपनी सर्च करने के लिए भी सर्च करने वाले को भुगतान करती है। यह कंपनी सर्च करने के लिए याहू सर्च इंजिन का प्रयोग करती है। इस कंपनी का सदस्य बन कर आप भी साल में £20 से £50 तक की कमाई कर सकते हैं। सदस्य बनने के लिए इस लिंक या नीचे के बैनर को क्लिक करें।




भुगतान £20 कमाई होने पर ही किया जाता है और राशि सीधे आपके बैंक खाते में या पेपल खाते में जमा होती है।

निम्न देशों में यह सेवा उपलब्ध नहीं हैः

United Kingdom, France, Germany, Italy, Spain, Australia, Thailand, Singapore, Indonesia, Philippines, Vietnam, Malaysia

ध्यान रखें

इस पोस्ट के सारे लिंक मेरे रेफरल लिंक्स हैं याने कि आपके सदस्य बनने पर आपकी कमाई के साथ मेरी भी कुछ कमाई हो जायेगी।

अब तक मेरी कमाई £20 नहीं पहुँचने के कारण मुझे अब तक कुछ भी भुगतान नहीं हुआ है।

यद्यपि मेरी जानकारी के अनुसार यह रेपुटेड कंपनी है और याहू जैसे विख्यात पोर्टल से जुड़ी है, फिर भी स्मरण रखना आवश्यक है कि कहा नहीं जा सकता कि नेट में कौन कब दगा दे जायेगा।

कल के खोपड़ी खपाऊ प्रश्न का उत्तरः

कल का प्रश्न थाः

आप अकेले किसी रास्ते से एक अनजान मंजिल तक जा रहे हैं। आपको बताया जाता है कि आगे जा कर यह रास्ता दो भागों मे बँट जायेगा जिसमें से एक तो आपको अपनी मंजिल तक पहुँचा सकता है और दूसरा मौत के मुँह में। याने कि एक सही रास्ता है और एक गलत। आपको यह भी बताया जाता है कि जहाँ पर रास्ता दो भागों में विभक्त होता है वहाँ पर दो आदमी दिखाई देंगे जिनमें से एक हमेशा सच बोलता है और दूसरा झूठ। सही रास्ता जानने के लिए आप उन दोनों में से किसी एक से सिर्फ एक प्रश्न पूछ सकते हैं (ध्यान रखें कि आप जिससे प्रश्न करेंगे उसके विषय में नहीं जानते कि वह सच बोलने वाला है या झूठ)।

तो क्या प्रश्न करेंगे आप?

जनाब कैरानवी जी ने कल मेरे पोस्ट प्रकाशित होने के कुछ देर बाद ही मुझे सही उत्तर मेल कर के सही उत्तर भेज दिया था जो इस प्रकार हैः

चलते चलते का जवाब इधर दे रहा हूं, कि उधर देता तो पोस्ट आपका मजा खराब होजाता, शायद

वह सवाल यूं था कि दो दरवाजों पर दो पहरेदार खडे हैं एक सच्‍चा एक झूठा आपको नहीं पता कि उनमें कौनसा सच्‍चा कौन कौन सा झूठा है,
उनसे आपको एक सवाल करना है जिससे सी दरवाजे का आपको पता लग जाये,
सवाल एक पहरेदार से किजियेः ''पहरेदार भाई यह बताओ अगर में दूसरे पहरेदार से पूछूं कि मुझे किस दरवाजे से जाना है तो वह क्‍या कहेगा''
उसका जो भी जवाब हो उससे उलटे यानी दूसरे दरवाजे में आप जा सकते हैं,
क्‍यूंकि अगर वह झूठा है तो वह जानता है कि दूसरा सच्‍चा है वह सच दरवाजा बता देगा, इस लिये वह गलत दरवाजा बतायेगा
क्‍यंकि अगर वह सच्‍चा है तो वह जानता है दूसरा झूठा है इस लिये वह गलत दरवाज बतायेगा तो यह गलत दरवाजा ही बतायेगा

इन सब से यह अर्थ निकलता है कि जो आप उपरोक्‍त से सवाल करेंगे जिस दरवाजे में जाने को कहा जाये उसमें ना जाकर दूसरे दरवाजे में जाया जाये,

बाद में आशीष श्रीवास्तव जी ने भी सही जवाब दियाः

हम पुछेँगे कि यदि मै दूसरे व्यक्ति से पुछूँ की मौत का रास्ता कौनसा है तो वह कौनसा रास्ता बतायेगा? जो भी रास्ता बताया जायेगा उसके उल्टे रास्ते पर चल देँगे!
सच बोलने वाला जो रास्ता बातायेगा वह गलत होगा क्योँकि वह सच बोल रहा है| सत्यवादी असत्यवादी का उतर वैसे ही बतायेगा जो गलत होगा|
झूठ बोलने वाला जो रास्ता बतायेगा वह गलत होगा क्योँकि वह झूठ बोल रहा है| असत्यवादी सत्यवादी के उत्तर को उल्टा कर के बतायेगा जो गलत ही होगा|

जी हाँ, दोनों व्यक्तियों में से किसी भी एक से आपका प्रश्न यही होगा कि 'दूसरे व्यक्ति से सही रास्ता पूछने पर वह किस रास्ते को बताएगा?'

आपके प्रश्न के उत्तर में बताया जाने वाला रास्ता गलत रास्ता ही होगा। आप उस रास्ते को छोड़ कर दूसरे रास्ते में जा सकते हैं।

व्यख्याः

यदि आपने सच बोलने वाले व्यक्ति से प्रश्न किया है तो वह जानता है कि दूसरा व्यक्ति झूठ बोलता है और गलत रास्ते को ही बतायेगा, इसलिए वह भी आपको गलत रास्ते को ही बतायेगा।

और यदि आपने झूठ बोलने वाले व्यक्ति से प्रश्न किया है तो वह जानता है कि दूसरा व्यक्ति सच बोलता है और सही रास्ता बतायेगा किन्तु अपने झूठ बोलने की आदत के कारण उसके बताये जाने वाले रास्ते को न बता कर दूसरे याने कि गलत रास्ते को बतायेगा।

चलते-चलते


नई शादी के बाद और शादी के एक वर्ष बाद ... पति पत्नी संवाद ...

नई शादी के बादः

पतिः देर किस बात की है।

पत्नीः क्या तुम चाहते हो मैं चली जाऊँ?

पतिः नहीं, ऐसा तो मैं सोच भी नहीं सकता।

पत्नीः क्या तुम मुझे प्यार करते हो?

पतिः अवश्य! एक नहीं अनेकों बार!!

पत्नीः क्या तुमने मुझे कभी धोखा दिया है?

पतिः कभी नहीं! ये तो तुम अच्छी तरह से जानती हो, फिर क्यों पूछ रही हो?

पत्नीः अब क्या तुम मेरा मुख चूमोगे?

पतिः इसके लिये तो मैं तो कोई भी अवसर नहीं छोड़ने वाला।

पत्नीः क्या तुम मुझे मारोगे?

पतिः मुझे क्या पागल कुत्ते ने काटा है जो मैं ऐसा करूँगा?

पत्नीः क्या तुम मुझ पर विश्वास करते हो?

पतिः हाँ!

पत्नीः ओ डार्लिंग!!!

शादी के एक वर्ष के बाद के लिये कृपया नीचे से ऊपर पढ़ें।

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"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

कैकेयी कोपभवन में - अयोध्याकाण्ड (3)

Thursday, October 22, 2009

आप एक साथ दो दो कृष्ण कैसे हैं?...ये पूछा गया था मेरे इंटरव्ह्यू में ...

आप एक साथ दो दो कृष्ण कैसे हैं?

जी हाँ, यही प्रश्न किया गया था मुझसे मेरे इंटरव्ह्यू में। मैंने क्या उत्तर दिया था यह भी बताता हूँ पर मेरा ये साक्षात्कार थोड़ा सा रोचक था इसलिए सिलसिलेवार बताने में मजा आयेगा। बात सन् 1972 की है। मैं उस समय एम।एससी. (फिजिक्स) फायनल ईयर में था। एक मित्र के कहने से भारतीय स्टेट बैंक का रिटन टेस्ट दे दिया था और उसमें पास भी हो गया था।

अब साक्षात्कार देने लिए पहुँचा था मैं। मेरे ही साथ अध्ययनरत एक सहपाठी भी आया था उस साक्षात्कार में। उसे साक्षात्कार के लिए मुझसे पहले बुलाया गया।

उसके साक्षात्कार कक्ष से बाहर निकलने पर मैंने उससे पूछा, "यार दिलीप, क्या पूछा तेरे से वहाँ पर?"

उसने कहा, "नाम वाम पूछने के बाद पूछा कि अभी क्या करते हो और मेरे यह बताने पर कि फिजिक्स के एम.एससी. फायनल ईयर में पढ़ रहा हूँ उन्होंने झट से पूछ लिया 'बताओ इस्केप व्हेलासिटी क्या होता है?' भाई इस्केप व्हेलासिटी तो नवीं-दसवीं कक्षा में पढ़े थे इसलिए याद कहाँ से आता पर जैसे तैसे याद आ ही गया।"

साहब, पहली बार इंटरव्ह्यू देने के नाम से एक तो मैं पहले से ही नर्वस सा था और अब जब पता चला कि प्रश्न पूछने वाला फिजिक्स भी जानता है तो नवीं दसवीं में पढ़े बेसिक बातों को याद करने लगा जैसे कि 'आर्किमीडीज का सिद्धान्त क्या है', उसने "यूरेका यूरेका" क्यों कहा था आदि आदि इत्यादि।

खैर, मेरा भी नंबर आ गया और दरवाजे पर पहुँच कर मैंने 'मे आई कमिन सर' कह कर अन्दर आने की इजाजत मांगी। प्रेमपूर्ण जवाब मिला, "आइये, आइये, बैठिये।"

मेरे बैठ जाने पर पूछा गया, "क्या नाम है आपका?"

"जी, गोपाल कृष्ण अवधिया।"

"अरे भाई गोपाल तो कृष्ण ही होता है और कृष्ण तो खैर कृष्ण हैं हीं। तो आप एक साथ दो दो कृष्ण कैसे हैं?"

बिना एक सेकंड सोचे भी मैंने उत्तर दिया, "सर मैं दो कृष्ण नहीं, एक ही कृष्ण हूँ। मेरे नाम में कृष्ण संज्ञा है और गोपाल उस संज्ञा की विशेषता बताने वाला विशेषण याने कि गौओं का पालन करने वाला कृष्ण।"

मेरा उत्तर शायद उन्हे बहुत पसंद आया और फिर मुझसे कोई भी प्रश्न नहीं पूछा गया।

बाद में मुझे वह नौकरी मिल गई थी याने कि मेरा पहला इंटरव्हियु आखरी इंटरव्हियु भी बन गया।

आज ये बात वैसे ही याद आ गई तो शेयर कर दिया आप लोगों के साथ।

चलते-चलते

एक खोपड़ी खपाऊ प्रश्नः

आप अकेले किसी रास्ते से एक अनजान मंजिल तक जा रहे हैं। आपको बताया जाता है कि आगे जा कर यह रास्ता दो भागों मे बँट जायेगा जिसमें से एक तो आपको अपनी मंजिल तक पहुँचा सकता है और दूसरा मौत के मुँह में। याने कि एक सही रास्ता है और एक गलत। आपको यह भी बताया जाता है कि जहाँ पर रास्ता दो भागों में विभक्त होता है वहाँ पर दो आदमी दिखाई देंगे जिनमें से एक हमेशा सच बोलता है और दूसरा झूठ। सही रास्ता जानने के लिए आप उन दोनों में से किसी एक से सिर्फ एक प्रश्न पूछ सकते हैं (ध्यान रखें कि आप जिससे प्रश्न करेंगे उसके विषय में नहीं जानते कि वह सच बोलने वाला है या झूठ)।

तो क्या प्रश्न करेंगे आप?

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"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

राम के राजतिलक की घोषणा - अयोध्याकाण्ड (1)

Wednesday, October 21, 2009

अब जरूरत है सर्च इंजिन्स से पाठक लाने की

हिन्दी ब्लोगिंग में दिनोंदिन निखार आते जा रहा है, ब्लोग पोस्ट्स की गुणवत्ता भी दिन-ब-दिन बढ़ते जा रही है। किन्तु अधिकतर पाठक और टिप्पणीकर्ता अभी भी हम ब्लोगर्स ही हैं। ब्लोग्स में लोग कहाँ से आ रहे हैं यह जानने के लिए मैं स्टेट काउंटर का प्रयोग करता हूँ (स्नैपशॉट देखें)

पेज 1
पेज 2
विश्लेषण करने पर मुझे तो यही पता चलता है कि अधिकतर लोग एग्रीगेटर्स से ही आते हैं। इस बात में तो दो मत नहीं हो सकता कि एग्रीगेटर्स फिलहाल हम ब्लोगर्स के बीच में ही लोकप्रिय है, नेट में आने वाले सामान्य लोगों में से अधिकतर लोगों को अभी भी एग्रीगेटर्स के बारे में जानकारी नहीं है। इसका मतलब यही हुआ कि मेरे ब्लोग में अधिकतर अन्य ब्लोगर्स ही आते हैं।

वैसे दूसरा पेज बताता है कि आठ-दस लोग गूगल सर्च, गूगल इमेजेस से भी मेरे ब्लोग में आये हुए हैं और यही वो लोग हैं जो कि कुछ खोजते खोजते मेरे ब्लोग में आए। यह बहुत अच्छी बात है कि हम ब्लोगर्स एक दूसरे के पोस्ट को पढ़ें किन्तु बाहरी पाठकों का हिन्दी ब्लोग्स में आना बहुत जरूरी है नहीं तो फिर वही मिसल हो जायेगी कि "जंगल में मोर नाचा किसने देखा"।

तो अब अब जरूरत है सर्च इंजिन्स से पाठक लाने की। मैं समझता हूँ कि सभी ब्लोगर बन्धु इस बात पर ध्यान देंगे और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए भगीरथ प्रयास में जुट जायेंगे।

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"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का नया पोस्ट

परशुराम जी का आगमन - बालकाण्ड (23)

Tuesday, October 20, 2009

क्या आपका फायरफॉक्स ब्राउसर बहुत धीमा है? ... गति ऐसे तेज कर सकते हैं ...

यदि आपका फायरफॉक्स ब्राउसर बहुत धीमी गति से ब्राउसिंग करता है तो उसकी गति निम्न तरीके से बढ़ा सकते हैं

फायरफॉक्स ब्राउसर को खोलें।

एड्रेस बार में about:config टाइप करके एंटर बटन दबा दें।

सामान्यतः आपका ब्राउसर एक बार में एक ही वेबपेज को रिक्वेस्ट करता है किन्तु पाइपलाइनिंग को सक्षम कर देने से यह एक ही समय में एक से अधिक वेबपेजेस को एक साथ रिक्वेस्ट करने लगता है और आपके ब्राउसिंग की गति तेज हो जाती है।

तो पाइपलाइनिंग को सक्षम करने के लिएः

स्क्रोल डाउन करके "network.http.pipelining" तक जाएँ (सूची अल्फाबेट के अनुसार है इसलिए खोजने में अधिक समय नहीं लगेगा)। इस पर डबल क्लिक करके इसके मान अर्थात् व्हेल्यु को "true" कर दें।

इसके बाद और स्क्रोल डाउन करके "network.http.proxy.pipelining" तक जाएँ इसके मान को भी "true" कर दें।

अब थोड़ा ऊपर स्क्रोल करके "network.http.pipelining.maxrequests" में जाएँ और इसके मान को 30 कर दें। याने कि अब आपका ब्राउसर एक ही समय में अधिक से अधिक 30 वेबपेजेस को रिक्वेस्ट करने लगेगा।

और अब एक आखरी काम। खुले हए ब्राउसर में किसी भी खाली जगह पर राइट क्लिक करें और नया (New) -> पूर्णांक (Integer) को सलेक्ट करें। खुलने वाले नाम के बॉक्स में nglayout.initialpaint.delay टाइप करें। एंटर बटन दबाएँ और नये खुलने वाले बॉक्स में मान "0" टाइप कर दें।

उम्मीद है कि ऐसा करने के बाद आपके फायरफॉक्स ब्राउसर की गति अवश्य ही बढ़ जायेगी।

अन्त में यह बताना मैं उचित समझता हूँ कि मैं नेट ब्राउसिंग का न तो कोई विशेषज्ञ हूँ न ही कोई बहुत बड़ा जानकार। हाँ यदि कुछ काम की बात मुझे मिल जाती है और उससे मुझे कुछ फायदा हो जाता है तो आप सभी के साथ शेयर कर दिया करता हूँ।


चलते-चलते

हमारे देश भारतवर्ष ने एक रॉकेट बनाया जो कि एक व्यक्ति को मंगल ग्रह तक ले जाये और वहाँ चित्र भेजने के बाद व्यक्ति को वापस पृथ्वी में ले आये। रॉकेट बन जाने के बाद अन्तिम जाँच में पता चला कि त्रुटि हो गई है और यह रॉकेट चित्र आदि भेजने के बाद वापस आते समय नष्ट हो जायेगा। याने कि उसमें सवार व्यक्ति मंगल ग्रह तक जा तो पायेगा पर वापस नहीं आ पायेगा।

रॉकेट को भेजना जरूरी था इसलिए ऐसे लोगों को बुलाया गया जो नियत राशि लेकर रॉकेट में जाने के इच्छुक हों। तीन लोग आए एक सरदार जी, एक बनिया और एक सिन्धी भाई।

सरदार जी ने कहा वे दस खरब रुपये ले कर रॉकेट में जाने के लिए तैयार हैं। जब साक्षात्कार मण्डली ने उनसे पूछा कि वे दस खरब रुपयों का क्या करेंगे तो उन्होंने जवाब दिया कि भाई मैं तो रहूँगा नहीं पर इन रुपयों से मेरे आने वाली पीढ़ियों की सुख सुविधा का सामान तो हो जायेगा।

बनिया ने बीस खरब रुपयों की मांग की। उन्होंने भी पूछने पर बताया कि दस खरब रुपयों से दान धर्म का कार्य, जैसे कि अनाथालय, धर्मशाला, पाठशाला, मन्दिर आदि का निर्माण, कर के वे अपना परलोक सुधारेंगे और बाकी दस खरब रुपये अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ जायेंगे।

सिन्धी भाई ने तीस खरब रुपयों की मांग की। जब उनसे पूछा गया कि वे तीस खरब का क्या करेंगे तो उन्होंने कहा कि दस खरब रुपया तो वे सेलेक्शन कमेटी को दे देंगे ताकि उनका ही टेंडर पास हो और दस खरब रुपये सरदार जी को देकर उन्हें रॉकेट में भेज देंगे बाकी दस खरब रुपये उनका मुनाफा रहेगा।

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शादी ब्याह में वर और कन्या पक्ष की वंशावली बताने का रिवाज होता है। श्री रामचन्द्र जी के विवाह में भी गुरु वशिष्ठ जी ने राम की वंशावली का वर्णन किया था। आप भी जानना चाहेंगे श्री राम की वंशावली के विषय में। तो इसके लिए पढ़िए ना

"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का आज का पोस्ट:

विवाह पूर्व की औपचारिकताएँ - बालकाण्ड (21)

इक्ष्वाकु वंश के गुरु वशिष्ठ जी ने श्री राम की वंशावली का वर्णन किया जो इस प्रकार हैः


"आदि रूप ब्रह्मा जी से मरीचि का जन्म हुआ। मरीचि के पुत्र कश्यप हुये। कश्यप के विवस्वान और विवस्वान के वैवस्वतमनु हुये। वैवस्वतमनु के पुत्र इक्ष्वाकु हुये। इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुल की स्थापना की। इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुये। कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था। विकुक्षि के पुत्र बाण और बाण के पुत्र अनरण्य हुये। अनरण्य से पृथु और पृथु और पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ ...

Monday, October 19, 2009

बेवकूफों के लिये यहाँ कोई जगह नहीं है

एक आदमी मर गया। यमदूत लेने के लिये नहीं आये। उसकी आत्मा बेचारी भटक रही थी। भटकते भटकते आत्मा एक ऐसे स्थान पर पहुँची जहाँ पर दो बड़े बड़े दरवाजे थे। एक पर लिखा था स्वर्ग और दूसरे पर नर्क। उसने स्वर्ग वाला दरवाजा खटखटाया।

द्वारपाल ने दरवाजा खोल कर पूछा, "क्या चाहते हो?"

आत्मा ने कहा, "भीतर आना है।"

द्वारपाल ने फिर पूछा, "शादी की थी तुमने?"

"हाँ की थी।"

"तो भीतर आ जाओ भाई, नर्क तो तुम पहले ही भोग चुके हो।"

कहकर द्वारपाल ने उसे भीतर जाने दिया। पीछे एक और आत्मा खड़ी थी और पूरी वार्तालाप सुन रही थी।

पहली आत्मा के भीतर जाने पर दूसरी आत्मा ने द्वारपाल से कहा, "मैंने दो शादी की थी।"

"बाजू के दरवाजे में जाओ, बेवकूफों के लिये यहाँ कोई जगह नहीं है।" कहकर द्वारपाल ने दरवाजा बंद कर दिया।

मेरा मस्तिष्क और हृदय मेरा मन्दिर है ...

"न ही मन्दिरों की कोई आवश्यकता है और न ही क्लिष्ट दर्शन की। मेरा मस्तिष्क और हृदय मेरा मन्दिर है और दया मेरा दर्शन है।"

दलाई लामा

Sunday, October 18, 2009

बड़ों को अपना चरणस्पर्श कराने का कोई शौक नहीं होता

बड़ों के चरणस्पर्श की प्रथा तो दिनोंदिन लुप्तप्राय होती जा रही है फिर भी दिवाली, दशहरा आदि त्यौहारों में परिवार के छोटे सदस्यों द्वारा अपने बड़ों के चरणस्पर्श की परिपाटी अभी भी मरी नहीं है। किन्तु ऐसा लगता है कि कुछ समय के बाद यह परिपाटी भी खत्म हो जायेगी। कल ही की बात है कि हमारे परिवार में लक्ष्मीपूजन हुआ। अब परिवार में सबसे बड़े हम ही हैं इसलिए हर साल लक्ष्मीपूजा होते ही परिवार के सभी सदस्य हमारा चरणस्पर्श करते हैं। कल भी सभी ने ऐसा ही किया किन्तु हमारे लघुभ्राता, जो कि हमसे मात्र पाँच साल छोटे हैं, सिर्फ देखते रहे, वे हमारे पास नहीं आए। थोड़ा सा अटपटा हमें भी लगा किन्तु यह सोच कर कि अभी चारेक दिन पहले उसकी हमारी छोटी सी झड़प हो गई थी उसका रंज रह गया होगा उसे, हमने कुछ भी नहीं कहा। बच्चे फटाके चलाने में मस्त हो गए और बड़े उनकी आतिशबाजी देखने में।

पन्द्रह बीस मिनट के बाद न जाने छोटे भाई साहब को क्या लगा कि हमारे पास आये और चरणस्पर्श कर लिया और हमने भी पूर्ण स्नेह के साथ उसे अपना आशीर्वाद दे दिया। शायद बरसों से उसके भीतर बैठे संस्कार ने उसे धिक्कारा हो या फिर उन्हें लगा हो कि बड़ों के आशीर्वाद का शायद कोई प्रभाव होता हो या न होता हो पर उससे कुछ नुकसान भी तो नहीं होता।

यहाँ पर हमारा यह अभिप्राय यह बताना नहीं है कि इस घटना से हमारे अहं को कहीं चोट पहुँचा है क्योंकि हम जानते हैं कि बड़ों को अपना चरणस्पर्श कराने का कोई शौक नहीं होता। और छोटे उनका मान करें या न करें, उनके मन में छोटों के प्रति स्नेह ही रहता है। हाँ, यह दुःख जरूर होता है कि धीरे धीरे भारतीय संस्कार खत्म होते जा रहे हैं।

Saturday, October 17, 2009

दिवाली थी, मिठाई थी, मेवे थे, रुपये थे और उदासी थी

बात दीवाली के दिन की ही है। सन् 1973 में 10 अक्टूबर को मैंने नरसिंहपुर में भारतीय स्टेट बैंक की नौकरी ज्वायन की थी। उसके पहले मैं कभी भी रायपुर से बाहर कहीं गया नहीं था। अकेलापन खाने को दौड़ता था। सही तारीख तो याद नहीं पर 25 या 26 अक्टूबर को दिवाली थी, इसीलिए 22 तारीख को ही वेतन भी मिल गई थी। उन दिनों स्टेट बैंक के बॉम्बे (वर्तमान मुंबइ) तथा भोपाल सर्किल में दिवाली के समय स्टाफ वेलफेयर की तरफ से पूरे स्टाफ को दिवाली की मिठाई तथा सूखे मेवे आदि दिए जाने का रिवाज था। तो दिवाली की छुट्टी थी, जेब में रुपये थे, मिठाई और सूखे मेवे का पैकेट सामने रखा था पर मैं उदासी में डूबा हुआ था।

और आज?

आज भी दिवाली है, घर है, परिवार है, परिजन हैं फिर भी उदासी है। आज अपनी व्हैल्यु जो नहीं है।

किन्तु 1973 की उदासी और आज की उदासी में फर्क है। उस समय मैं उदास था और अपनी उदासी को छुपा भी नहीं रहा था पर आज भले ही मैं उदासी अनुभव करूं लोगों को प्रसन्न ही नजर आउँगा।

दीपोत्सव का यह पावन पर्व आपके जीवन को धन-धान्य-सुख-समृद्धि से परिपूर्ण करे!!!


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"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

ऋषि विश्वामित्र का पूर्व चरित्र - बालकाण्ड (14)

ब्राह्मणत्व की प्राप्ति के पूर्व ऋषि विश्वामित्र बड़े पराक्रमी और प्रजावत्सल नरेश थे। प्रजापति के पुत्र कुश, कुश के पुत्र कुशनाभ और कुशनाभ के पुत्र राजा गाधि थे। ये सभी शूरवीर, पराक्रमी और धर्मपरायण थे। विश्वामित्र जी उन्हीं गाधि के पुत्र हैं।

Friday, October 16, 2009

दीपावली क्यों मनाई जाती है?... अलग अलग मान्यताएँ हैं ...

जैन धर्म के अनुसार भगवान महावीर को 15 अक्टूबर १५५२७ (ईसवी पूर्व) के दिन, जो कि दीपावली का दिन था, निर्वाण की प्राप्ति हुई थी। (अंग्रेजी विकीपेडिया http://en.wikipedia.org/wiki/Diwali#In_Jainism)

सिख समुदाय के लोग अनेकों कारण से दीपावली का त्यौहार मनाते हैं। इस दिन उनके छठवें गुरु, गुरु हरगोविंद जी, को 52 हिन्दू राजाओ के साथ कारागार से मुक्ति मिली थी और वे अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में मत्था टेकने गये थे जहाँ पर अनेकों दिये प्रकाशित करके उनका स्वागत किया गया था।

कहा जाता है किस चौदह वर्ष का वनवास काट कर भगवान श्री रामचन्द्र जी दीपावली के दिन ही अयोध्या वापस लौटे थे और अनेकों दीप प्रज्जवलित कर के उनका स्वागत किया गया था।

स्कन्द पुराण के अनुसार देवी शक्ति ने भगवान शिव का आधा शरीर प्राप्त करने के लिये 21 दिनों का व्रत किया था जिसका आरम्भ कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी से हुआ था और उन्हें दीपावली के दिन व्रत का फल मिला था।

दीपावली को फसल काटने का त्यौहार भी माना जाता है। कृषक अपने परिश्रम का फल फसल के रूप में पाकर आनन्द तथा उल्लास से सराबोर हो जाते हैं और त्यौहार मनाते हैं। चूँकि अन्न लक्ष्मी देवी का एक रूप है अतः दीपावली की रात्रि को लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है।

कुछ और जानकारी

दीपावली शब्द "दीप" (दिया) तथा "आवली" (कतार) शब्दों के मेल से बना है अर्थात् दीपावली का अर्थ है "दिये की कतार"।

दीपावली को "लक्ष्मी पूजा" के नाम से भी जाना जाता है। लक्ष्मी पूजा के दिन घरों के द्वारों पर सभी दिशाओ की ओर अनेकों दिये आलोकित किये जाते हैं। ।

दीपावली रोशनी का त्यौहार है। दिया या प्रकाश बुराई पर भलाई के विजय का प्रतीक है।

दीपावली हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक चन्द्रमास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है जो कि अंग्रेजी कैलेन्डर के अनुसार अक्टूबर या नवम्बर महीने में आता है।

लक्ष्मी पूजा के पूर्व का दिन "नर्क चतुर्दशी" कहलाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर पर विजय प्राप्त किया था। नर्क चतुर्दशी के दिन घरों के द्वारों पर दक्षिण दिशा की ओर चौदह दिये आलोकित किये जाते हैं।

लक्ष्मी पूजा के दूसरे दिन "गोवर्धन पूजा" मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने इन्द्र को पराजित किया था।

"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

अहल्या की कथा - बालकाण्ड (13)

एक दिन गौतम ऋषि की अनुपस्थिति में इन्द्र ने गौतम के वेश में आकर अहल्या से प्रणय-याचना की। यद्यपि अहल्या ने इन्द्र को पहचान लिया था तो भी यह सोचकर कि मैं इतनी सौन्दर्यशाली हूँ कि देवराज इन्द्र स्वयं मुझ से प्रणय-याचना कर रहे हैं, अपनी स्वीकृति दे दी।

Thursday, October 15, 2009

तीन तीन बात कहनी है एक पोस्ट में ... शीर्षक क्या दूँ? ... एडसेंस या ब्लॉगवाणी या धनतेरस?

पहली बात तो ये कि गूगल एडसेंस टीम ने कुछ चुने हुए लोगों को मेल भेजा है कि एडसेंस सर्वे करके एक आईपॉड जीतने का अवसर प्राप्त करें। उन चुने हुए लोगों में हमें भी शामिल किया है एडसेंस टीम ने याने कि उन्होंने हमें भी लायक समझा और मेल भेजा। खैर, सर्वे तो हमने कर दिया है अब इनाम मिले या न मिले, कुछ विशेष फर्क नहीं पड़ता।

दूसरी बात यह कि पता नहीं आप लोगों को अटपटा लगा कि नहीं पर हमें तो ब्लॉगवाणी के बिना फिर एक बार लगभग चौबीस घंटे गुजारना बड़ा अटपटा लगा। खैर तकनीकी दिक्कत सुलझ गई और हमारा अटपटापन भी खत्म हो गया। भई, हमारे ब्राउसर के एक टैब में तो ब्लॉगवाणी चलते ही रहता है।

अब तीसरी और आखरी बात धनतेरस वाली। "धन त्रयोदशी" याने कि धनतेरस के दिन को सोना-चांदी व बर्तन खरीदने के लिये अत्यधिक शुभ दिन माना जाता है (पर हम इस बार नहीं खरीदने वाले क्योंकि हमारा एडसेंस वाला चेक अब तीन महीने में एक बार आता है और फिलहाल जेब खाली है)।

आजकल तो लोग धनतेरस के दिन भी पकाई गई मिट्टी याने कि लाल रंग के दिये जलाते हैं जबकि हमें याद है कि इस दिन सूर्यास्त के बाद घर के मुख्य द्वार में पूर्व की ओर मुख कर वाले कच्ची मिट्टी के ही तेरह दिये प्रज्वलित करके ही पूजा की जाती थी। अस्तु, समय के अनुसार परिपाटी भी बदलती जाती है।


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"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्ट:

धनुष यज्ञ के लिये प्रस्थान - बालकाण्ड (9)

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Wednesday, October 14, 2009

आपके घर में किसकी चलती है?

"यार तुम्हारे घर में किसकी चलती है?"

"भाई सभी की चलती है। श्रीमती जी मुझे हड़काती हैं, मैं बच्चों को डाँट देता हूँ, बच्चे नौकर को चिल्ला देते हैं, नौकर कुत्ते को लात मार देता है।


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"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्ट :

विश्वामित्र द्वारा राम को अलभ्य अस्त्रों का दान - बालकाण्ड (6)

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कल शाम से ब्लॉगवाणी गायब क्यों है ...

कल शाम के बाद से ही ब्लॉगवाणी खुल नहीं रहा है। यह मेरे साथ ही है या आप लोग भी ब्लॉगवाणी नहीं खोल पा रहे हैं? इतने लंबे समय के लिए तो प्रायः सर्वर डाउन नहीं रहता? क्या कोई बहुत बड़ी तकनीकी समस्या आ गई है या फिर नया ब्लॉगवाणी अपलोड हो रहा है?


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"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्ट : ताड़का वध - बालकाण्ड (5)
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Tuesday, October 13, 2009

आनलाइन खरीदी करने क्या आप सुरक्षित भुगतान (secure payment) करते हैं?

क्या आप आनलाइन खरीदी करते हैं? और यदि करते हैं तो भुगतान सीधे अपने क्रेडिट कार्ड से करते हैं या किसी सुरक्षित भुगतान करने वाली एजेंसी के माध्यम से?

क्रेडिट कार्ड से सीधे भुगतान करने पर आपके क्रेडिट कार्ड के दुरुपयोग होने की सम्भावना बनी रहती है। आपके क्रेडिट कार्ड का दुरुपयोग न होने पाये इस बात को ध्यान में रख कर कई ऐसी एजेंसियाँ बनाई गई हैं जो कि आपको सुरक्षित भुगतान की सुविधा प्रदान करती है। सुरक्षित भुगतान कराने वाली सबसे अधिक जानी मानी और विश्वस्त एजेंसी है पेपल।

पेपल क्या है?

पेपल एक ऐसी साइट है जिसके माध्यम से आप सुरक्षित भुगतान कर सकते हैं, सुरक्षित रूप से किसी को धन भेज सकते हैं और सुरक्षित रूप से किसी अन्य से धन प्राप्त कर सकते हैं। इसके जरिये आप अपना मासिक सब्स्क्रिप्शन का भुगतान कर सकते हैं, यहाँ पर राशि जमा रख सकते हैं और समय पड़ने पर निकाल सकते हैं। कहा जा सकता है कि पेपल एक प्रकार से आनलाइन बैंकिंग कार्य करता है।

सुरक्षित भुगतान क्या है?

जब आप किसी को अपने क्रेडिट से सीधे भुगतान करते हैं तो आपके क्रेडिट कार्ड का विवरण भी भुगतान प्राप्त करने वाले को मिल जाता है और इस बात का अवसर भी बन जाता है कि हो सकता है वह आपके क्रेडिट कार्ड का दुरुपयोग करे। किन्तु यदि आप पेपल जैसी किसी साइट के माध्यम से किसी को भुगतान करते हैं तो भुगतान प्राप्त करने वाले को सिर्फ भुगतान प्राप्त होता है आपके क्रेडिट कार्ड का विवरण नहीं, ये विवरण एजेंसी के पस ही सुरक्षित रहता है। इस प्रकार से ये भुगतान सुरक्षित होता है और इसीलिए इसे सुरक्षित भुगतान (secure payment) कहते हैं।

पेपल की सदस्यता बिल्कुल मुफ्त में मिलती है और जब आप भुगतान करते हैं तो उसके एवज में भी आपको किसी प्रकार की अतिरिक्त राशि नहीं देनी पड़ती। हाँ, यदि आप आनलाइन बिजनेस कर रहे हैं और पेपल के माध्यम से भुगतान प्राप्त करते हैं तो अवश्य ही पेपल आपसे नाममात्र की राशि कमीशन के रूप में अवश्य लेती है।

पेपल में अपना खाता कैसे खोलें?

आप इस लिंक या यहाँ पर प्रयुक्त शब्द पेपल में बने लिंक को क्लिक करके आप अपना खाता खोल सकते हैं।

यहाँ मैं यह भी बता देना उचित समझता हूँ कि इस लेख मे आए पेपल लिंक मेरा रेफरल लिंक है याने कि यदि आप भविष्य में कभी आनलाइन बिजनेस करके पेपल के माध्यम से भुगतान प्राप्त करते हैं, तो आपको पेपल का सदस्य बनाने के एवज में, पेपल आपसे प्राप्त कमीशन में से एक छोटी सी राशि मुझे भी देगी। वैसे तो निकट भविष्य में ऐसा अवसर शायद ही आये कि मैं इस प्रकार की कमाई कर सकूँ। :-)

फिर भी यदि मेरा रेफरल लिंक प्रयोग न करना चाहें तो सीधे पेपल साइट में जाकर अपना खाता खोल सकते हैं।

जब समय मिलेगा तो पढ़ लेंगे वाल्मीकि को भी ... जल्दी क्या है?

समय कहाँ है उन्हीं घिसी पिटी पुरानी बातों को पढ़ने की? कुछ नया है क्या इस रामकथा में? कभी पढ़ी नहीं तो क्या, कहानी तो सुनी है, टी.व्ही. में रामानन्द सागर ने दिखाया था तो देखी भी थी। पढ़ लेंगे भई, वाल्मीकि को भी जब समय मिलेगा तो।

परसों जब अपना नया ब्लॉग "संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" शुरू किया तो सोचा भी नहीं था कि इतनी सारी टिप्पणियाँ मिलेंगी। हम तो बड़े खुश हुए थे। अब पता चला कि ये तो हिन्दी ब्लोगिंग का रवैया है कि नये का, चाहे वह कोई नया ब्लोगर हो या चाहे पुराने ब्लोगर का कोई नया ब्लोग हो, स्वागत करना ही है। भले ही दूसरे दिन उधर झाँकने भी न जाओ।

पहले दिन की ढेर सारी टिप्पणियाँ पढ़कर हम उत्साहित हुए और अपने नये ब्लोग के पाठको की प्रगति जानने के लिए स्टेटकाउंटर में उसका एक नया प्रोजेक्ट बना दिया। काश हमने ये नहीं किया होता! न करते तो हमें पता भी नहीं चलता कि उस ब्लोग के दूसरे पोस्ट पर मात्र 20 हिट्स ही हुए हैं। और उनमें से दसेक तो हमारे ही हैं। याने कि मात्र दस लोगों ने देखा उस पोस्ट को। ये भी हो सकता है कि एक दो लोगों ने भूल से दो बार भी देख लिया हो और हिट्स की संख्या बढ़ गई हो। तो इसका मतलब ये हुआ कि दस लोगों ने नहीं बल्कि चार पाँच लोगों ने ही उस पोस्ट को देखा (जी हाँ, देखा; पढ़ा कि नहीं ये तो वे ही बता पायेंगे)।

अब सोच रहे हैं कि सात काण्डों में चौबीस हजार श्लोक वाले वाल्मीकि रामायण को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करने के लिए अपना घंटों समय बर्बाद करें या इस ब्लोग को बंद कर दें? सीधी सी बात है भाई कि जब लोगों के पास एक ब्लोग पोस्ट को पढ़ने के लिए दो-तीन या अधिक से अधिक पाँच मिनट का समय नहीं है तो हम क्यों उस पोस्ट को लिखने के लिए अपना घंटों का समय खराब करें। उसकी जगह उतने ही समय में आठ दस निंदाचारी, छीछालेदर वाले पोस्ट क्यों न लिख कर अधिक से अधिक पाठक बटोरें?

खैर, फिलहाल तो यही निर्णय लिया है कि चार-पाँच पोस्ट और कर के देखेंगे "संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" में और यदि फिर भी स्थिति यही रही तो बंद कर देंगे उसे। उसके लिए हमारे पास इस ब्लोगर के अलावा और भी प्लेटफॉर्म है। हम उसे अपने खुद के होस्टिंग में वर्डप्रेस में प्रकाशित करेंगे या फिर "संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का pdf फाइल बना कर उसे पुस्तक के रूप में बेचने का प्रयास करेंगे।

मैं ब्लॉगवाणी का बहुत आभारी हूँ जिन्होंने इस "संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" को बहुत जल्दी रजिस्टर कर लिया था। मैंने तो सोचा था कि कम से कम चौबीस घंटे तो लगेंगे ही इसे एग्रीगेटर में आने के लिए किन्तु चौबीस मिनट भी नहीं लगे। मैं श्री दिनेशराय द्विवेदी जी को भी हार्दिक धन्यवाद दूँगा जिन्होंने हर पोस्ट में मेरा उत्साहवर्धन किया।

Monday, October 12, 2009

ये हिन्दी बलॉगिंग तो हमारा दिवाला निकाल रहा है

हम तो नेट के संसार में आए थे कुछ कमाई करने के उद्देश्य से। हमने सुन रखा था कि नेट से भी कमाई की जाती है इसलिए सन् 2004 में स्वैच्छिक सेवानिवृति लेने के बाद हम लग गए इसी चक्कर में। बहुत शोध किया, डोमेननेम रजिस्टर कराया, होस्टिंग सेवा ले ली और कुछ अंग्रेजी लेख डाल कर खोल दिया अपना वेबसाइट। कुछ अंग्रेजी ब्लॉग्स भी बना लिया। एडसेंस पब्लिशर बन गये। बहुत सारे एफिलियेट लिंक्स डाल दिया अपने वेबसाइट्स में। कहने का मतलब यह कि बहुत पापड़ बेला। और आखिर में आठ महीने बाद हमारा पहला एडसेंस चेक हमें मिला।

इस बीच में हिन्दी ब्लॉगिंग के विषय में पता चला तो उसमें घुस गये। हिन्दी में भी गूगल एड्स आते थे उस समय। बस क्या था अपने मेन साइट को हिन्दी कर डाला। बहुत सारे सबडोमेन बना डाले और कई प्रकार के लेख लिख डाले उदाहरण के लिए देखे हमारी साइट भारतीय सिनेमा। एडसेंस ने भी रंग दिखाना शुरू किया और आठ महीने से पाँच, पाच से तीन होते होते हर महीने चेक आने लगा। तो अंग्रेजी लेखन के तरफ से ध्यान हटा कर हिन्दी में ही लिखने लगे। पर एकाएक हिन्दी में एडसेंस आना बंद हो गया, आता भी था तो गूगल का सार्वजनिक सेवा विज्ञापन। तो कमाई कम हो गई। अंग्रेजी के कुछ साइट्स से अभी भी कमाई हो रही है कुछ कुछ, याने कि हर तीसरे महीने गूगल से एक चेक मिल जाता है।

तो इस प्रकार से हिन्दी ब्लॉग ने दिवाला निकाल कर रख दिया हमारा। अब अंग्रेजी लेखन के तरफ ध्यान जाता ही नहीं। हिन्दी ब्लॉगिंग का चस्का ऐसा लग गया है कि सारा समय उसी में बीत जाता है। बस हम तो यही मना रहे हैं कि हिन्दी से भी जल्दी से जल्दी कमाई होना शुरू हो जाये।

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संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण की दूसरी किश्त - राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म - बालकाण्ड (2)
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पादे सो पुन्न करे ...

पादना शब्द का प्रयोग सामान्यतः अच्छा नहीं माना जाता किन्तु शिष्ट हास्य के लिए इस शब्द को प्रयोग करना अनुचित भी नहीं समझा जाता जैसे किः

  • पादे सो पुन्न करे, सूँघे सो धर्मात्मा।
    हाँसे सो नरक परे, छिन भर के वासना॥

  • ठुसका पाद महा बस्साय।

  • आइये हुजूर,खाइये खुजूर,बैठिये तखत पर,और पादिये बखत पर।
फिर भी यदि ये शब्द आपको पसंद नहीं आ पा रहा हो तो चलिए अब इसके बदले हम इसके शुद्ध हिन्दी नाम याने कि अधोवायु का ही प्रयोग करेंगे।

यह तो आप जानते ही हैं कि पेट के भीतर बनने वाली वायु अर्थात् गैस को अधोवायु कहा जाता है। पेट के भीतर वायु बनना स्वाभाविक क्रिया है और चूँकि यह वायु नीचे के तरफ याने कि गुदा से निकलती है इसलिए इसे अधोवायु कहा जाता है।

यदि यह अधोवायु शब्द करते हुए छूट जाए तो जहाँ अन्य लोगों को अनायास ही हँसी आ जाती है वहीं इसे छोड़ने वाला बड़ा अटपटा से अनुभव करने लगता है। इसीलिए विष्णुपुराण में गृहस्थ सम्बन्धी सदाचार का वर्णन करते हुए बताया गया है कि शब्द करते हुए अधोवायु नहीं छोड़ना चाहिए।

अधोवायु का पेट के बाहर निकल जाना निहायत ही जरूरी है। इसे पेट के भीतर रोक रखने से आदमी के पेटदर्द, सिरदर्द, कब्ज, एसिडिटी, जी मिचलाना, बेचैनी जैसी व्याधियों से ग्रसित हो जाने की अत्यधिक सम्भावना रहती है। आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार तो लंबे समय तक अधोवायु को पेट के भीतर रोके रहे जाना अनेको यौन रोगों के उत्पन्न हो जाने का कारण भी बन जाता है।

अधोवायु को पेट से बाहर निकालने के लिए दोनों समय भोजन के पश्चात् काली हरड़ चूसना बहुत ही गुणकारी होता है।

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आपको "संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" भी अवश्य ही पसंद आयेगा।

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Sunday, October 11, 2009

क्या किसी ब्लॉग को पढ़ने के लिए किसी प्रकार का सत्यापन जरूरी है?

कुछ ब्लॉग्स को मैं पढ़ने के लिए जाता हूँ तो ब्लॉग के ओपन होते ही एक छोटा सा विंडो खुल कर सामने आ जाता है, सत्यापन जरूरी वाला। स्नैपशॉट देखें:

इस विंडो में रद्द बटन को क्लिक करने पर वह पुनः सामने आ जाता है। आप बार बार रद्द करिए और यह, कपिल शर्मा वाला जिद्दी मुर्गे के जैसा (व्हीडियो देखें), फिर सामने आ जाता है। और मैं हारकर उस ब्लॉग को बिना पढ़े ही बंद कर देता हूँ।



तो क्या किसी ब्लॉग को पढ़ने के लिए किसी प्रकार का सत्यापन जरूरी है?

चलते-चलते

जहाज तूफान में फँस कर डूब गया। लाइफ बोट के सहारे तीन लोग एक वीरान टापू में पहुँच गये - एक अमेरिकन, एक जापानी और एक पाकिस्तानी। टापू में फलों के वृक्ष और पीने लायक पानी के झरने भरपूर थे। वे लोग साथ रहकर किसी तरह समय बिताने लगे। एक दिन वे समुद्र के किनारे बैठे तो उन्हें लहरों में तैरती हुई एक बोतल दिखी। अमेरिकन ने बोतल ढक्कन खोल दिया। बोतल में से जिन्न निकला और बोला, "मैं चार हजार साल से इस बोतल में बंद था। तुम लोगों ने मुझे कैद से मुक्ति दिलाई है। बदले में मैं तुम लोगों की एक एक इच्छा पूरी कर सकता हूँ। बोलो क्या इच्छा है तुम लोगों की?"

"मुझे न्यूयार्क पहुँचा दो।" अमेरिकन ने कहा।

जिन्न ने पलक झपकते उसे न्यूयार्क पहुँचा दिया।

"मुझे पेरिस पहुँचा दो।" जापानी ने कहा।

जिन्न ने उसे भी पलक झपकते पेरिस पहुँचा दिया।

"अब तुम कराँची जाना चाहोगे?" जिन्न ने पाकिस्तानी से पूछा।

"कौन साला वापस जाना चाहता है उस नामुराद माहौल में? मुझे तो ये टापू रास आ गई है। मैं तो यहीं रहूँगा।" पाकिस्तानी ने उत्तर दिया।

"फिर मुझसे क्या चाहते हो?"

"यहां पर मैं ठीक तो हूँ पर अकेलापन महसूस करता हूँ। तुम मेरे दोनों दोस्तों को वापस ले आओ।"

Saturday, October 10, 2009

तुम्हारी उपेक्षा के बाद भी तुम्हारे साथ की अपेक्षा

रातों में तेरा ही ख्वाब ...
दिन में तेरा ही खयाल ...
सभी लोगों से दूर भाग कर ...
अकेले हो जाने के बाद ...
तेरी यादों में डूब जाना ...
एक तेरे सौन्दर्य के सिवा ...
प्रकृति के सारे सौन्दर्य को भूल जाना ...
तुम्हारी उपेक्षा के बाद भी ...
तुम्हारे साथ की अपेक्षा ...
कभी तुम्हें भूलने के लिए ...
तो कभी तुम्हें याद करने के लिए ...
पीना ...
और केवल घुट घुट कर ...
जीना ...
सिर्फ यही दीवानापन ...
बन गया है मेरा जीवन ...

अब ये न सोच लीजियेगा कि इस बुढ़ौती में पगला गया हूँ। :)

भई ये तो सन् 1980 में अपनी डायरी में लिखा था मैंने। आज दिवाली की सफाई करते समय हाथ लग गई तो इसे पोस्ट कर दिया।

Friday, October 9, 2009

क्या आप राष्ट्रगान का अर्थ जानते हैं? .. भई मैं तो नहीं जानता। ... मुझे भी बताइये ना!

बड़ी शर्मिंदगी होती है अपने आप पर जब यह सोचता हूँ कि मुझे अपने राष्ट्रगान का अर्थ नहीं पता है। बचपन से ही राष्ट्रगान याने कि 'जनगणमन' सुनते और गाते चला आ रहा हूँ। स्कूल में पढ़ता था तो प्रार्थना में रोज ही गवाया जाता था। बीच में एक दौर ऐसा भी आया था कि सिनेमा हॉल में फिल्म की समाप्ति पर राष्ट्रगान दिखाना और सुनाना अनिवार्य कर दिया गया था। पर शर्मिंदा हूँ कि आज तक इसका अर्थ नहीं जानता। कैसे जानूँ आखिर? गवाते और सुनाते तो सभी थे पर अर्थ किसी ने नहीं बताया। पुस्तकों में राष्ट्रगान तो छपा होता था पर उसका अर्थ कहीं पर भी छपा नहीं दिखाई देता था। समझ में नहीं आता कि इसका अर्थ कैसे जानूँ। जिससे भी पूछो वही कन्नी काट के निकल लेता है।

यदि आप लोगों में से किसी को राष्ट्रगान का अर्थ पता है तो मुझे भी बताइए ना!

Thursday, October 8, 2009

ह्यूम साहब को भारतीयों के हित की ऐसी क्या चिन्ता हो गई जो उन्होंने कांग्रेस बनाया?

आप जानते ही होंगे कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना किसी भारतीय ने नहीं बल्कि एक अंग्रेज ए.ओ. (अलेन ऑक्टेवियन) ह्यूम ने सन् 1885 में, ब्रिटिश शासन की अनुमति से, किया था। कांग्रेस एक राजनैतिक पार्टी थी और इसका उद्देश्य था अंग्रेजी शासन व्यवस्था में भारतीयों की भागीदारी दिलाना। ब्रिटिश पार्लियामेंट में विरोधी पार्टी की हैसियत से काम करना। अब प्रश्न यह उठता है कि ह्यूम साहब, जो कि सिविल सर्विस से अवकाश प्राप्त अफसर थे, को भारतीयों के राजनैतिक हित की चिन्ता क्यों और कैसे जाग गई?

सन् 1885 से पहले अंग्रेज अपनी शासन व्यवस्था में भारतीयों का जरा भी दखलअंदाजी पसंद नहीं करते थे। तो फिर एक बार फिर प्रश्न उठता है कि आखिर क्यों दी ब्रिटिश शासन ने एक भारतीय राजनैतिक पार्टी बनाने की अनुमति?

यदि उपरोक्त दोनों प्रश्नों का उत्तर खोजें तो स्पष्ट हो जाता है कि भारतीयों को अपनी राजनीति में स्थान देना अंग्रेजों की मजबूरी बन गई थी। सन् 1857 की क्रान्ति ने अंग्रेजों की आँखें खोल दी थी। अपने ऊपर आए इतनी बड़ी आफत का विश्लेषण करने पर उन्हें समझ में आया कि यह गुलामी से क्षुब्ध जनता का बढ़ता हुआ आक्रोश ही था जो आफत बन कर उन पर टूटा था। यह ठीक उसी प्रकार था जैसे कि किसी गुब्बारे का अधिक हवा भरे जाने के कारण फूट जाना।

समझ में आ जाने पर अंग्रेजों ने इस आफत से बचाव के लिए तरीका निकाला और वह तरीका था सेफ्टी वाल्व्ह का। जैसे प्रेसर कूकर में प्रेसर बढ़ जाने पर सेफ्टी वाल्व्ह के रास्ते निकल जाता है और कूकर को हानि नहीं होती वैसे ही गुलाम भारतीयों के आक्रोश को सेफ्टी वाल्व्ह के रास्ते बाहर निकालने का सेफ्टी वाल्व्ह बनाया अंग्रेजों ने कांग्रेस के रूप में। अंग्रेजों ने सोचा कि गुलाम भारतीयों के इस आक्रोश को कम करने के लिए उनकी बातों को शासन समक्ष रखने देने में ही भलाई है। सीधी सी बात है कि यदि किसी की बात को कोई सुने ही नहीं तो उसका आक्रोश बढ़ते जाता है किन्तु उसकी बात को सिर्फ यदि सुन लिया जाए तो उसका आधा आक्रोश यूँ ही कम हो जाता है। यही सोचकर ब्रिटिश शासन ने भारतीयों की समस्याओं को शासन तक पहुँचने देने का निश्चय किया। और इसके लिए उन्हें भारतीयों को एक पार्टी बना कर राजनैतिक अधिकार देना जरूरी था। एक ऐसी संस्था का होना जरूरी था जो कि ब्रिटिश पार्लियामेंट में भारतीयों का पक्ष रख सके। याने कि भारतीयों की एक राजनैतिक पार्टी बनाना अंग्रेजों की मजबूरी थी।

किसी भारतीय को एक राजनैतिक पार्टी का गठन करने का गौरव भी नहीं देना चाहते थे वे अंग्रेज। और इसीलिए बड़े ही चालाकी के साथ उन्होंने ह्यूम साहब को सिखा पढ़ा कर भेज दिया भारतीयों के पास एक राजनैतिक पार्टी बनाने के लिए। इसका एक बड़ा फायदा उन्हें यह भी मिला कि एक अंग्रेज हम भारतीयों के नजर में महान बन गया, हम भारतीय स्वयं को अंग्रेजों का एहसानमंद भी समझने लगे। ये था अंग्रेजों का एक तीर से दो शिकार!

इस तरह से कांग्रेस की स्थापना हो गई और अंग्रेजों को गुलाम भारतीयों के आक्रोश को निकालने के लिए एक सेफ्टी वाल्व्ह मिल गया।

Wednesday, October 7, 2009

हम तुम्हें गाली दें, तुम हमारे मुँह पे थूको

खबरदार! खबरदार!! खबरदार!!!

अभी तक अगर सावधान नहीं हुए हो तो अब हो जाओ।

हिन्दी ब्लोग जगत में एक खतरनाक पागल खुल्ला घूम रहा है।

इस पागल को अपने मुँह पर थुकवाने का शौक है इसलिए वह लोगों को गाली देते फिरता है। उसे पता है कि कोई यूँ ही तो उसके मुँह पर थूकेगा नहीं, हाँ लोग गाली खायेंगे तो जरूर उसके मुँह पर थूकेंगे। इसीलिए उसने सिद्धान्त बना रखा है "हम तुम्हें गाली दें, तुम हमारे मुँह पे थूको"

कल तो यह खतरनाक पागल "दरबार" में जा पहुँचा था और वहाँ उसने 13 बार गाली दी थी। 13 की इस संख्या से उस पागल का एकदम नजदीकी रिश्ता है। 13 को उसका जन्म हुआ था, 13 बार पागल हुआ है, 13 टिप्पणी देख कर इसका पागलपन चरमसीमा में पहुँच जाता है, खुद भी अपनी एक ही टिप्पणी को 13 बार टिपियाता है।

टिप्पणी मॉडरेशन सक्षम देखकर तो इसका पागलपन एकदम बढ़ जाता है और फिर इसे सिर्फ दूसरों को 'रौंद डालने' का ही विचार आता है। दूसरों को रौंदने की कल्पना कर कर के अपनी हीन भावना को बढ़ाता है। हमारे बारे में तो यह हमेशा यही कहता है कि "खूँसट बुड्ढे, मैं तेरा खून पी जाउँगा"।

पर अब तो लोग उसकी गाली को भी हँसकर टाल देते हैं और उसके मुँह पर बिल्कुल भी नहीं थूकते। बहुत मायूस है बेचारा।

वैसे यह सिद्धांत कि "हमे तुम्हें गाली दें, तुम हमारे मुँह पे थूको" कोई नया सिद्धान्त नहीं है। यह तो बहुत पुराना है। इस सिद्धान्त का जन्म हमारे पड़ोसी देश के जन्म के साथ ही हुआ था और वहाँ की सरकार शुरू से ही अपने इसी सिद्धान्त के अनुसार हमारे देश को गाली देती थी। जब जब भी उस देश की भूखी नंगी जनता का ध्यान अपनी बेबसी की तरफ जाता था तो वहाँ की सरकार अपने सिद्धान्त को अमल में लाकर हमारे देश के साथ युद्ध की स्थिति पैदा कर देती थी और वहाँ की जनता का ध्यान अपनी बेबसी से हट कर युद्ध की तरफ चला जाता था। जनता का ध्यान हटने से वहाँ की सरकार मजे के साथ टिकी रह जाती थी। आज भी वो इसी सिद्धान्त का पालन कर रही है।

तो दोस्तों, सावधान हो जाओ और टिप्पणी मॉडरेशन सक्षम कर दो। टिप्पणी मॉडरेश सक्षम करने का अर्थ यह नहीं होता कि आप 'अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता' का हनन कर रहे हैं। नहीं, आप तो मात्र किसी पागल के प्रलाप का ही नाश कर रहे हैं क्योंकि पागल का प्रलाप को किसी भी मायने में अभिव्यक्ति की संज्ञा नहीं दी जा सकती। 'ब्लोगर बाबा' उर्फ 'गूगल महराज' ने यही सोच कर मॉडरेशन बनाया है किः

दुनिया में पागलों की कमी नहीं, एक ढूंढो हजार मिलते हैं।
न ढूंढो तो भी दो चार मिलते हैं।

चलते-चलते

हमारे मुहल्ले में भी एक पागल है पर वो खतरनाक नहीं सीधा सादा पागल है। चुपचाप रहता है किसी को तंग नहीं करता यहाँ तक कि किसी से बात भी नहीं करता। कभी किसी मकान के पाटे पर तो कभी किसी मकान के पाटे पर रात बिताता है। खाने के लिए कुछ दे दो तो खा लेता है और न मिले तो भूखा ही रह जाता है।

पर हमें याने कि महामूरख, गधासूरत, बुड्ढाधिराज जी.के. अवधिया को देखते ही वो खतरनाक हो जाता है। हम दिखे नहीं कि "भाग यहाँ से", "दूर हो जा नजरों से", "खबरदार जो फिर इधर आया" आदि आदि चिल्लाना शुरू कर देता है।

बहुत दिनों तक तो हम डरते रहे। समझ में ही नहीं आया कि आखिर मामला क्या है? आखिर एक बार हिम्मत करके उससे पूछ ही लिया, "भाई मेरे, आखिर तुझे मुझसे इतनी खुन्दक क्यों है?"

जवाब में वो कड़ककर बोला, "एक मुहल्ले में एक ही रहेगा।"

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आपको "और मारो, और मारो,..." भी अवश्य पसंद आएगा। क्लिक करके वहाँ पर "चलते-चलते" को पढ़ें।
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Tuesday, October 6, 2009

गूगल सर्च में अब हिन्दी सर्च बढ़ते जा रहा है

हिन्दी में गूगल सर्च करने के प्रति अब लोगों की रुचि बढ़ते जा रही है। यकीन नहीं होता तो http://google.co.in खोलिए और अंग्रेजी के एक दो अक्षर टाइप कीजिए। फौरन आपके समक्ष ड्रॉपडाउन बॉक्स खुलेगा और हिन्दी में किए गए सर्च की लिस्ट दिखाई देने लगेगी। स्क्रीनशॉट देखें


याने कि गूगल सर्च में अब हिन्दी सर्च बढ़ते जा रहा है!

वैसे यदि आप यह जानना चाहें कि आज भारत में गूगल सर्च में सबसे अधिक सर्च क्या किया गया तो गूगल ट्रेंड्स याने कि http://www.google.co.in/trends खोल लीजिए। खुलते ही वह आपको दस सबसे अधिक किए गए सर्च्स की सूची दिखा देगा। स्क्रीनशॉट देखें

हमने तो सोचा था कि आज सबसे ज्यादा किए गये सर्च को टॉपिक बना कर एक पोस्ट लिख देंगे पर यह क्या? पता नहीं क्या क्या खोजते रहते हैं लोग? धत्तेरे की! इन खोज पर तो एक अच्छा सा पोस्ट भी नहीं लिखा जा सकता।

चलते-चलते

बोर हो रहा था वो। सोचा चलो हिन्दी ब्लोग्स ही पढ़ लें। जी.के. अवधिया जैसे ब्लोगर्स के एक दो पोस्ट्स पढ़ कर और भी बोर हो गया बेचारा। तो अब क्या करे? चला गया फिल्म देखने। अंग्रेजी पिक्चर! किस-विस वाले बहुत से सीन थे उसमें। उत्तेजित हो कर निकला। दूर से देखा एक घर के दरवाजे पर एक खूबसूरत महिला खड़ी है। जब उस घर के पास पहुँचा तो महिला घर के भीतर जाने लगी। वह भी उसके पीछे घर में घुस गया। महिला के कमरे तक जा पहुँचा और उत्तेजना के वशीभूत उसे किस करने लगा।

महिला ऐतराज करते हुये कहे जा रही थी, "छोड़ो छोड़ो, जान न पहचान प्यार करते हो। शर्म नहीं आती बिना जान-पहचान के प्यार करते हए?"

आवाज सुन कर महिला का पति वहाँ आ पहुँचा। उसकी हरकत देख कर महिला के पति ने आव देखा न ताव, झपट कर उसे जमीन पर पटक दिया और उसकी छाती पर सवार हो कर उसकी धुनाई करने लगा।

महिला जोर जोर से कहने लगी, "और मारो, और मारो, जान न पहचान प्यार करता है। और मारो, और मारो, जान न पहचान प्यार करता है।"

वो भी कमजोर नहीं था। थोड़ी देर तक मार खाते रहा फिर जोर लगा कर महिला के पति को नीचे गिरा दिया और छाती पर सवार होकर खाये हुये मार का बदला निकालने लगा।

महिला फिर जोर जोर से चिल्लाने लगी, "और मारो, और मारो, खुद प्यार करता है दूसरे को प्यार करने देता है।"

Monday, October 5, 2009

कांग्रेस और मुस्लिम तुष्टिकरण

कांग्रेस के इतिहास को देखें तो स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि कांग्रेस ने सदा ही मुस्लिम तुष्टिकरण को बढ़ावा दिया है। सन् 1885 में, अंग्रेजी शासन व्यवस्था में भारतीयों की भागीदारी दिलाने के उद्देश्य से, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। यह भारतीयों की संस्था थी। भारतीय का अर्थ है भारत में निवास करने वाला, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान या अन्य। किन्तु कांग्रेस के सदस्यों में मुसलमानों की संख्या बहुत ही कम थी। मुसलमानों को कांग्रेस से जोड़ने के लिए कांग्रेस ने बहुत प्रयास किए। सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी के लिखे अनुसार - ”हम इस महान राष्ट्रीय कार्य में अपने मुसलमान देशवासियों का सहयोग प्राप्त करने के लिए जी-तोड़ प्रयास कर रहे हैं। कभी-कभी तो हमने मुसलमान प्रतिनिधियों को आने-जाने का किराया तथा अन्य सुविधाएं भी प्रदान कीं।सन् 1887 में बदरुद्दीन तैयबजी, 1896 में सहिमतुल्ला सायानी, सन् 1919 में मोहम्मद बहारदुर, जो कि मुसलमान थे, कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने किन्तु भारत के अधिकतर मुसलमान फिर भी कांग्रेस से नहीं जुड़ पाए।

शुरुवात में तो कांग्रेस से भारतीय मुस्लिमों को जोड़ने का सिर्फ प्रयास ही होता रहा किन्तु सन् 1915 में गांधी जी के आ जाने और गांधीवादी कांग्रेस बन जाने के बाद से मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति का कांग्रेस में पदार्पण हुआ। उस समय तक कांग्रेस दो आन्तरिक दलों - गरम दल और नरम दल - में बँट चुका था। गांधी जी ने गोपाल कृष्ण गोखले वाला नरम दल को अपने लिए चुना था। बहुत ही जल्दी वे नरम दल के बड़े नेता बन गए और उनकी लोकप्रियता दिनों दिन बढ़ने लग गई। कांग्रेस एक प्रकार से गांधीवादी कांग्रेस बन गया। गांधीवादी कांग्रेस में 'महात्मा गांधी' और 'गांधी जी' शब्द कांग्रेस का पर्याय बन गए। गांधी जी के विचार कांग्रेस की नीति बन गई। (और स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त कांग्रेस की नीति, जो कि गांधी जी के विचारों पर आधारित थी, राष्ट्र की नीति बन गई।) गांधी जी ‘हिन्दू-मुस्ल्मि एकता’ के नाम से हमेशा मुस्लिम तुष्टिकरण को ही जोर देते रहे। पर उन्हें अपने इस कार्य में कभी भी वांछित सफलता नहीं मिली। भारतीय मुसलमानों की कुल जनसंख्या के मुश्किल से चार प्रतिशत लोग ही शायद कांग्रेस से जुड़ पाये होंगे। प्रत्येक असफलता के साथ गांधी जी की मुस्लिम तुष्टिकरण वाली जिद बढ़ते ही जाती थी। गांधी जी के लाख प्रयास करने के बावजूद भी भारतीय मुस्लिम कांग्रेस से न जुड़ सके।

गांधी जी ने मुसलमानों का तुष्टिकरण करके उन्हें अपने पक्ष में करने के लिए कट्टरवादी नेताओं का साथ देना तक उचित समझा इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है खिलाफत आन्दोलन। खिलाफत आन्दोलन के विषय में आचार्य विष्णुकांत शास्त्री की पुस्तक के कुछ अंश ज्ञानदत्त जी के पोस्ट "आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री उवाच" में उद्धृत हैं जिसका स्क्रीनशॉट मैं नीचे दे रहा हूँ:

इन अंशों को पढ़ने से स्पष्ट रूप से ज्ञात हो जाता है कि गांधी जी का खिलाफत आन्दोलन सिर्फ मुस्लिम तुष्टिकरण के सिवा और कुछ नहीं था। गांधी जी का विचार था कि तुर्की के खलीफा, जो कि मुसलमान थे, को गद्दी से उतारे जाने का विरोध करने से भारत के मुसलमान खुश होकर कांग्रेस के पक्ष में आ जायेंगे। जबकि मुस्लिम लीग के नेता जिन्ना ने ही खिलाफत आन्दोलन का विरोध यह कह कर किया था कि "तुर्की के खलीफा को किसी ने गद्दी से उतार दिया, तो इससे भारत के मुसलमानों का क्या लेना-देना है।" देखें http://khabar.ndtv.com/2009/08/25094428/Suderson-on-Jinnah.html

दरअसल उस समय तक मुस्लिम लीग के सदस्य शिक्षित मुसलमान थे, वे दकियानूस नहीं थे और अच्छी तरह से समझते थे कि तुर्की के खलीफा से भारत के मुसलमानों का कुछ भी लेना देना नहीं है खलीफा के समर्थन से कट्टवादियों को ही फायदा होगा। इसीलिए वे खिलाफत आन्दोलन से दूर रहे।

इस खिलाफत आन्दोलन के कारण मालाबार (केरल) में भयानक मोपला नरसंहार हुआ। हताश मुसलमानों ने अपना सारा आक्रोश हिन्दुओं पर उतारा। सारे देश में दंगों की लहरें उमड़ पड़ी और हिन्दुओं को भारी नुकसान उठाना पड़ा। बावजूद इन सबके गांधी जी ने (6 दिसम्बर 1924 के) ‘यंग इण्डिया’ अंक में लिखा: ”हिन्दू-मुस्लिम एकता" किसी भी तरह चरखा-कताई से कम महत्वपूर्ण नहीं है। यह हमारे जीवन की श्वास-रेखा है।”

फिर देश का विभाजन हुआ। विभाजन के समय पाकिस्तान छोड़कर भारत आने वाले हिन्दुओं पर जो अत्याचार हुए वह किसी से भी छुपा हुआ नहीं है किन्तु उस अत्याचार के विषय में गांधी जी ने कभी भी कुछ नहीं कहा, मौन धारण किये रहे। जब मुसलमानों के अत्याचार से आक्रोशित होकर हिन्दुओं ने भी वैसा ही कदम उठाना शुरू किया तब गांधी जी को दिखाई देने लग गया कि मुसलमानों पर अत्याचार हो रहे हैं और हिन्दुओं के इस अत्याचार को रोकने के लिए उनका मौन टूट गया। उन्हें मुस्लिमों पर हुए अत्याचार तो नजर आये पर हिन्दुओं पर हुए अत्याचार कभी भी नहीं दिखा। यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि उन दिनों गांधी जी का कहे को कांग्रेस का कहा माना जाता था। गांधी जी ही कांग्रेस थे।

बंकिम चन्द्र रचित गीत "वन्दे मातरम्" को सितम्बर १९०५ में कांग्रेस अधिवेशन में राष्ट्रगीत का दर्जा दे दिया गया था (हिन्दी विकीपेडिया) किन्तु मुसलमानों ने यह कह कर कि "मुस्लिम धर्म किसी व्यक्ति या वस्तु की पूजा करने को मना करता है और इस गीत में वस्तु की वन्दना की गयी है" इसका विरोध किया परिणामस्वरूप "जनगणमन" राष्ट्रगीत बना दिया गया। यह तुष्टिकरण नहीं है तो क्या है?

गांधी जी ने तो तुष्टिकरण के लिए भाषा तक को नहीं छोड़ा। मुसलमानों की भाषा उर्दू थी और अधिकतर हिन्दुओं की भाषा हिन्दी। गांधी जी ने कथितहिन्दू-मुस्लिम एकता" के लिए "बादशाह राम" और "बेगम सीता" वाली एक नई "हिन्दुस्तानी भाषा" ईजाद किया। इस हिन्दुस्तानी भाषा को कुछ समय के लिए स्कूलों के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया पर यह हमारा और हिन्दी का सौभाग्य है कि उस भाषा का जोरदार विरोध हुआ और उसे पाठ्यक्रम से निकाल दिया गया। गांधी जी ने अपनी ईजाद की गई हिन्दुस्तानी में राम को 'बादशाह' और सीता को 'बेगम' तो बना दिया पर वे मोहम्मद साहब को कभी भी श्री या श्रीमान मोहम्मद नहीं बना पाये।

स्वतन्त्र भारत के प्रथम आम चुनाव में कांग्रेस को भारतीय जनसंघ जैसे हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टियों से भय लगने लगा इसलिए वो फिर मुस्लिमों की तरफ झुकी। ‘सेक्युलरिज्म’ पर जोर दिया गया। पण्डित जवाहरलाल नेहरू हिन्दू धर्म को हेय दृष्टि से देखते थे। वे स्वयं मानते थे कि वे संयोग से ही हिन्दू हैं। कांग्रेस में हिन्दू प्रवृत्ति वाले लोगों, जैसे कि राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभभाई पटेल, पीडी टण्डन, केएम मुंशी आदि, से उन्हें परेशानी रहा करती थी। नेहरू की मृत्यु पर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि नेहरू जन्म से ब्राह्मण, शिक्षा में यूरोपीय और आस्था में मुसलमान थे। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नेहरू को भारत का राष्ट्रवादी मुसलमान बताया था।

कांग्रेस सरकार ने 1959 में मुस्लिमों की हज सब्सिडी शुरू की थी। यह हज सब्सिडी आखिर है क्या? हिन्दुओं को तीर्थयात्रा के लिए क्यों सब्सिडी नहीं दी जाती? यह तो सभी जानते हैं कि राजीव सरकार ने, शाहबानो जजमेंट को ताक पर रख कर, मुस्लिम महिला (तलाक के अधिकार का संरक्षण) अधिनियम 1986 पारित किया।

वोट बैंक को ध्यान में रखकर और राजनैतिक स्वार्थ के लिए तुष्टिकरण की नीति अपनाना आखिर कहाँ तक उचित है?

 
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