Thursday, March 25, 2010

कितना हित हो रहा है हिन्दी का हिन्दी ब्लोगिंग से?

माना कि हिन्दी ब्लोगिंग अभी भी अपने शैशव काल में हैं लेकिन यह भी सही है कि इसे शुरू हुए एक अच्छा खासा-समय भी बीत चुका है और इस अन्तराल में हजारों की संख्या में हिन्दी पोस्ट आ चुके हैं। पर इन पोस्टों में कितने पोस्ट ऐसे हैं जिनमें हिन्दी ब्लोगिंग से अनजान लोग, नेट में कुछ खोजते-खोजते, आते हैं? क्या कोई पोस्ट कालजयी बन पाया है?

ऐसा लगता है कि जिस प्रकार से लोकतन्त्र "जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन है", उसी प्रकार से हिन्दी ब्लोगिंग "ब्लोगरों द्वारा, ब्लोगरों के लिए, ब्लोगरों की ब्लोगिंग है"। जैसे लोकतन्त्र में कोई राष्ट्र के हित के लिये नहीं सोचता वैसे ही हिन्दी ब्लोगिंग में कोई हिन्दी के हित के लिये नहीं सोचता। लोकतन्त्र नेतागिरी कर के पैसे पीटने के लिये है और हिन्दी ब्लोगिंग अधिक से अधिक संख्या मे टिप्पणी बटोरकर आत्म-तुष्टि के लिये है।

हमारे पोस्ट की अधिकतम उम्र उतनी ही होती है जब तक वह लोकप्रिय संकलकों में दिखाई देता है याने कि मात्र चौबीस घंटे की!

जरा हृदय पर हाथ रख कर सोचें कि हम क्या दे रहे हैं हिन्दीभाषी लोगों को? क्या स्तर है हमारे लेखन का? क्या हमारे लेखन से हिन्दी "सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय" वाली भाषा बन कर नेट में एकछत्र राज्य करने लायक बन पायेगी?

मैं उपरोक्त बातों को कई बार कह चुका हूँ (और भविष्य में भी कहता ही रहूँगा), कभी व्यंगात्मक लहजे में तो कभी रो-धो कर। मैं जानता हूँ कि मेरे इन पोस्ट को पढ़कर प्रायः लोग यह सोचते हैं कि यह तो दूसरों को नीचा दिखाने के लिये और स्वयं को हिन्दी का बहुत बड़ा हितचिन्तक बताने के लिये ऐसा लिखता रहता है। किन्तु मैं बार-बार इस मुद्दे को सिर्फ इसलिये उछालते रहता हूँ कि कोई तो मेरे व्यंग से तिलमिला कर या मेरे रुदन पर तरस खाकर यह सोचने लगे कि बुढ्ढे की बात कुछ तो सही है और ऐसा सोचकर ही आत्म-तुष्टि की भावना को त्याग कर हिन्दी के हित के लिए कुछ करने की ठान ले।

मेरे विषय में यदि कोई गलत राय बना भी लेता है तो क्या फर्क पड़ना है मुझे उससे?

पर मुझे पढ़ कर यदि कोई हिन्दी के हित के लिये जूझने के लिये तत्पर हो जाता है तो मुझे अवश्य ही बहुत फर्क पड़ेगा, सफलता प्राप्त करके भला किसे फर्क नहीं पड़ता?
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