मैं कोई काल्पनिक नहीं बल्कि सच्ची बात बता रहा हूँ आपको। बात कुछ ही महीने पुरानी है। हम और हमारे दो और मित्र याने कि तीन "डेली ड्रिंक्स" वाले रोज ही रात को इकट्ठे हो जाते हैं। मैंने "डेली ड्रिंक्स" कह कर अपनी टोली को कुछ सम्माननीय बनाने की कोशिश की है क्योंकि अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग कर लेने से सम्मान स्वतः ही बढ़ जाता है, यदि मैंने अपनी टोली के लिये "डेली ड्रिंक्स" के स्थान पर "पियक्कड़" या छत्तीसगढ़ के बस्तरिहा भाषा का शब्द "मंदू भाई" (बस्तरिहा भाषा में दारू को मंद कहा जाता है) प्रयोग किया होता तो हमारी टोली का तो भट्ठा ही बैठ जाता।
हाँ तो मैं बता रहा था कि एक दिन हमारे एक मित्र ने कहा, "यार हमारे यहाँ के एक कर्मचारी के पिता की तेरहवीं है और उसने हमें मित्रों सहित भोज में बुलाया है।"
दूसरे मित्र ने कहा, "छोड़ यार, जाना जरूरी है क्या? वैसे भी मुझे मृत्यु भोज में जाना अच्छा नहीं लगता।"
पहले मित्र ने कहा, "बेचारा चतुर्थवर्ग कर्मचारी है यार और बहुत मानता है मुझको। हम नहीं जायेंगे तो बहुत 'फील' करेगा।"
दूसरा मित्र बोला, "अगर वहाँ जायेंगे तो फिर हमारे 'प्रोग्राम' का क्या होगा?"
मैंने कहा, "एक फुल रख लेते हैं साथ में और किसी ढाबे के पास कार के भीतर ही निबटा लेंगे।"
बात तय हो गई। हम पहुँच गये वहाँ अपनी व्यवस्था के साथ। जिसने निमन्त्रित किया था वह बहुत खुश हुआ हम लोगों को देखकर।
शहर के भीतर ही भीतर जाना हुआ था इसलिये रास्ते में कोई ढाबा नहीं मिला था। ढाबा उसके घर के तीन-चार कि.मी. आगे ही था, इसलिये उससे कहा गया कि हम लोग आधे घंटे में वापस आ रहे हैं खाना खाने के लिये।
सुनकर वह हम लोगों को थोड़े अलग में ले गया और हमें एक 'आरएस' की बोतल हमें देते हुए उसने कहा, "मैं जानता हूँ सर, आप लोग डेली लेने वाले हैं, इसलिये व्यवस्था कर रखी थी। आप लोग इसे निबटा कर जल्दी से आ जाइये और हाँ थोड़ा एहतियात रखिये कि दूसरे लोगों को पता ना चले नहीं तो मेरे समाज में मेरी बहुत बदनामी होगी।"
अब सोचने की बात यह है कि किस ओर चले जा रहे हैं हम और हमारा समाज? आज आलम यह हो गया है कि होली हो तो हम पियेंगे, दिवाली हो तो हम पियेंगे। शादी विवाह हो तो फिर तो बात ही क्या है! पर्व-तीज-त्यौहार और मांगलिक कार्यों में दारू ने तो पहले से ही अपनी अनिवार्यता बना ली है और अब मृत्यु भोज में भी....
राज्य-भक्त
12 hours ago
10:58 AM
जी.के. अवधिया








40 टिप्पणियाँ:
लानत है ऐसे लोगों पर!
वैसे इस्लाम में शराब को हराम करार दिया गया है यही वहज है कि दुनियां में सबसे कम शराब पीने वालों में मुस्लिम ही होते है!!!
सार्थक और बेहतर पोस्ट !!!
सलीम ख़ान
संरक्षक
लखनऊ ब्लॉगर्स एसोसियेशन
+91 9838659380
आपने स्वयं को इस घटना से जोड़ कर जो प्रसंग उठाया है बहुत विचारणीय है....इंसान आदतों का कितना दास हो जाता है कि मृत्यु भोज जैसे कार्य में भी ऐसी आदत से बाज़ नहीं आता...
सलीम जी, इच्छा तो हो रही है कि आपकी टिप्पणी को मिटा दूँ, किन्तु यह सोचकर कि आप यह न समझ बैठें कि मेरा आपके प्रति पूर्वाग्रह या दुर्भाव हैं, मिटा नहीं रहा हूँ। इस पोस्ट का इस्लाम से कुछ भी सम्बन्ध नहीं है फिर भी आपने टिप्पणी में इस्लाम को घसीट दिया है। क्या हर पोस्ट में और हर टिप्पणी में इस्लाम को घसीटना जरूरी है? आपको शायद पता नहीं है कि आपके ऐसे ही कार्य के कारण आप लोगों का अपने प्रति सम्मान को खोते जा रहे हैं।
मैं सभी धर्मों का सम्मान करने वाला व्यक्ति हूँ किन्तु कभी भी और कहीं भी किसी धर्म के अकारण प्रचार को उचित नहीं समझता। भविष्य में मेरे किसी भी पोस्ट में टिप्पणी करते समय इस बात का ध्यान रखें नहीं तो टिप्पणी ना ही करें।
@Saleem....sharaab haraam ho fir bhi apne dharm ko lekar hi ek lagakhumaari hai janaa.kash nasha haraam kiya hota....khair main is niyam ki kadr karta hun...aur is vichaardhara ka mureed bhi hun....sabko ek taraju me nahi tolunga....
@Avadhiya ji...hamare sanskaar nasht hone ka ek pramukh kaaran hai..ye sharaab....iski poori tarah khilafat karta hun...aur islaam ki tarah hi hindu dharm yadi bacha ho to...usme bhi iske nishedh ki maang karta hun....
sahi kaha Avadhiya ji...aisi tippaniyan yahi jatati hain ki...baar baar inhe kuch na kuch safayi deni hi hoti hai...
आजकल तो हर त्यौहार को मनाने का ही यही तरीका हो गया है . आपके यहाँ किसी कार्यक्रम में कोई आये आप उसे हीरे मोती परोस दें और शराब न दे वो आपसे कभी खुश नहीं होगा . ऐसी मानसिकता अब युवा से लेकर किशोरों तक की होती जा रही है जो चिंता का विषय है .
agree with DILIP also!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
for his first tippani not second !!!
Lekh achchha laga isliye pasand ka chatka laga diya hai aur tweeter par follow bhi kar liya hai !!!
aapka bhatija
saleem khan
तिर्प्त हो गए होंगे पितृ भी :)
फिर तो पितरों की आगे स्वर्ग धाम की यात्रा टुन्नावस्था में लडखडाते हुए ही हुई होगी.:-)
पीने वालों को पीने का बहाना चाहिये
अवधिया जी यही है इंसानियत की पतन की ओर अग्रसर होने का सजीव चित्रण / जब समाज शराब पिने वालों को सम्मान देगा तो अच्छा कौन बनना चाहेगा / सलीम जी आपसे मेरा भी आग्रह है की आप अपनी अच्छी सोच को इस्लाम और हिन्दू धर्म के दायरे से बाहर निकालिए आप इस्लाम के बिना भी इंसानियत के धर्म के लिए मजबूती से काम कर सकते हैं ,आपके पोस्ट को भी हम पढ़ते है लेकिन हर बात में इस्लाम का जिक्र न करें तो बेहतर होगा और इंसानियत को हिन्दू धर्म या इस्लाम के वजाय एक अदद इन्सान की जरूरत ज्यादा है / आज धर्म से ज्यादा इंसानियत और उसके उसूलों की सच्ची जरूरत है / आशा है आप हमारे आग्रह पर विचार करेंगे /
मरने वाला भी खुश हो रहा होगा आप की शराब भगति को देख कर...
nice post
मैं नहीं मानता कि सिर्फ शराब पीने से ही समाज पतन की ओर चला जाता है। हालांकि मैं कभी शराब खूब पीता था, अब नहीं पीता। बावजूद इसके मेरा मानना है कि शराब लोगों को जोड़ने का काम भी करती है।
मैं आपको एक छोटा सा वाक्या सुनाना चाहता हूं। एक बार मैं अपने कुछ पत्रकार दोस्तों के साथ एक खबर के सिलसिले में बस्तर गया था। लौटते समय दोस्तों और मैंने खुद ने झक महुआ चढ़ा ली और रास्ता भटक गए। काफी खोजबीन के बाद भी हम मुख्य सड़क तक नहीं पहुंचे तो परेशान हो गए। भूख और प्यास से हालात खराब थी। जैसे-तैसे एक गांव दिखा। एक जगह कुछ आदिवासी एकत्रित थे। जब हम वहां पहुंचे तो पता चला कि एक आदिवासी अपने पिता के नाम पर अपने समाज के लोगों को मृत्यु भोज दे रहा है। चूंकि हमें भूख लगी थी सो हमने अपनी शुद्ध हिन्दी में उनसे भोजन मांगा। बस फिर क्या था.. आदिवासी परिवार धन्य हो गया। उसे लगा उसके पिता ने ईश्वर को उसके पास भेज दिया। आदिवासी ने अपनी बोली में हमें समझाया कि उनके समाज में यह माना जाता है कि जो कोई भी बगैर बुलाए यदि मृत्यु भोज का खाना खाने आ जाता है तो समझिए मरने वाले को मोक्ष मिल जाता है। आदिवासी ने एक काले से बर्तन में हमारे लिए एक बार फिर शराब परोसी। उस दिन जो कड़कनाथ मुर्गा मैंने खाया था वैसा फिर कभी नही खाया। वाकई हाथ का पीसा हुआ मसाला था।
जिन्दगी बड़ी विचित्र ढंग से आपकी परीक्षा लेती है।
अवधिया जी मैं उस शख्स को जरा भी दोषी नहीं मानता हूं जिसने अपने पिता के मृत्यु भोज में शराब की व्यवस्था की। मैं तो उसकी भावना देखकर गदगद हो गया हूं। रहा सवाल... यह सब चोंचला है कि मरने के बाद आदमी को केवल पूड़ी-सब्जी खाकर ही काम चलाना चाहिए।
बस्तर में ही आदिवासियों में कई ऐसे लोग है जो मानते हैं कि मरने वाला जो-जो शौक रखता था वह पूरा किया जाना चाहिए। यदि मरने वाला पीता था तो सबको पिलाया जाता है। यदि मरने वाला गंजेडी था कोशिश की जाती है कि सबको गांजा मिले।
विचित्रताओं से भरा हुआ है हिन्दुस्तान, और यही विविधता इसकी सबसे बड़ी ताकत है। मुझे तो अपने देश से बहुत प्यार है और यहां के लोगों से भी।
मेरे हिसाब से उसंने कुछ भी बुरा नहीं किया अरे उसने तो आप सबके प्रति अपनी श्रद्धा दिखाई और आप लोग पहली बार उसके यहाँ निमंत्रण पर गए थे .
उसको गलत और समाज को गलत कहने के पहले अपने अन्दर झाकिये कि एक दिन भी आपका बिना शराब के नहीं चल सकता था और उसके घर पहुचने के बाद भे शराब खोज रहे थे !
वह तो सिर्फ आप सबको शराब दिया जिसकी आपको जरुरत थी .
यह लेख आप उसकी भक्ति भी दिखा कर लिख सकते थे
मै शराब नहीं पीता ध्यान रक्खे कही ऐसा ना हो कि उसकी तरफदारी के चक्कर आप मुझे ही शराबी समझे :)
post achhi hai lekin sharab ki koi bahut buri chij nahin hai
shart ye hai saleeke se piya jaaye..
टिप्पणियाँ पढ़कर मुझे लग रहा है कि इस पोस्ट से मेरा जो आशय था उसे शायद मैं ठीक से समझा नहीं पाया। इस पोस्ट से मेरा आशय शराब की अच्छाई बुराई साबित करना नहीं बल्कि यह दर्शाना था कि शराब हमारी संस्कृति और परम्पराओं में शामिल होते जा रहा है। हम और हमारा समाज अपने सुख दुख के अवसर पर शराब को अनिवार्य बनाते जा रहे हैं। यह कितना उचित है?
मैं स्वयं को अच्छा नहीं समझ सकता क्योंकि अपनी स्वयं की कमजोरी के कारण मैं शराब का आदी हो चुका हूँ किन्तु शराब का हमारी संस्कृति और परम्परा में घुसते चले आना कम से कम मुझे तो अच्छा नहीं लगता। यह बात अलग है कि कोई बुरा आदमी बुराई दूर करने की बात करे तो उसका प्रभाव शायद ही पड़े।
शराब पीने से कोई अच्छा, बुरा नहीं होता ..
अच्छा पिएगा तो अच्छी बात करेगा, बुरा पियेगा तो बुरी.
हर नशा.. हर जगह बुरा है ...हर सुख अपना कीमत वसूल करती है..
अतिथि को खुश करना मेज़बान का धर्म होता है ..उसने घर बुलाए मेहमान को उसके शौक के अनुसार स्वागत करके अच्छा काम किया.
अवधिया जी अगर वह अपनी आस्था और रीती रिएवाज में शामिल करता तो आपको अकेले एक बोतल देकर यह नहीं कहता की किसी को पता ना चले तब तो वह सारे लोगो कप कुल्हड़ भरकर भरकर सराब देता उसने सिर्फ आप लोगो को दिया था क्युकी शायद आप लोगो को मोहबात करता था
जरा ए तो सोचिये की खुद तो उसने पीया ही नहीं था और ना तो खुल्लम खुला गाव वालो को पिला रहा था फिर कैसी संस्कृति लूटने की बात आपने कही है ?
is post par us vyakti ke pitaji ko lekar bahut galat likhaa gaya hai ap ise delete kar dijiye vinati hai
राजू जी, मैंने तो इस पोस्ट में उस व्यक्ति के पिता जी के विषय में कुछ भी गलत नहीं लिखा है। कृपया बताने का कष्ट करें कि आपको कहाँ और क्या गलत लगा?
और अब मृत्यु भोज में भी....
विश्वास नहीं होता , कोई ऐसा भी कर सकता है।
sir aapne nahi lekin kamentar ne kya likha hai gaur faramaaye
1-मरने वाला भी खुश हो रहा होगा आप की शराब भगति को देख कर...
2-तिर्प्त हो गए होंगे पितृ भी :)
3-और अब मृत्यु भोज में भी....
विश्वास नहीं होता , कोई ऐसा भी कर सकता है।
4-फिर तो पितरों की आगे स्वर्ग धाम की यात्रा टुन्नावस्था में लडखडाते हुए ही हुई होगी.:-)
ab ap bataye kya ye sahi hai ?
राजू जी, मैं स्वयं किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना पसंद नहीं करता। जिन टिप्पणियों को आपने उद्धरित किया है उनके पीछे भी किसी प्रकार की गलत भावना नहीं है बल्कि एक प्रकार का व्यंग ही है जिसे भले की ही भावना से किया गया है। जिन्होंने ये टिप्पणियाँ की हैं वे सभी सुलझे हुए ब्लोगर्स हैं और सदैव सभी का हित चाहने वाले हैं। अतः आप निश्चिंत हो जाइये कि ये टिप्पणी किसी गलत उद्देश्य से लिखी गई हैं।
sulajhe hone ka matalab ye to nahi hota ki nis tarah ka kisi mare hue vyakti ke upar vyang likhe awadhiya ji dusare najariye se dekhiye shayad apako bhi hamari tarah lage
is tarah kisi 4th grade ke vyakti ka majak udana acha nahi lagata kripaya action lijiye aur in tipaniyo kp mitaaiye
यह कौन सी नयी बात है आदिवासियों और कबीलों में और अनुसूचित ग्रामीणों में यह तो परम्परा रही है !
आपकी यह पोस्ट एक छोटे कर्मचारी की सीधे तौर पर बेइज्जती है. उसने अपने पूरे समाज को शराब नहीं पिलाई.. फिर भी आप लिख रहे हैं कि उसने मृत्यु भोज में शराब का इन्तजाम किया था. जनाब उसने अपने उन हजरतों
के लिए दारू का जुगाड़ किया था जो एक दिन भी बगैर दारू के रह नहीं सकते थे.
और फिर आप लोग कोई मृत्युभोज में जाना थोड़े ही चाहते थे वहां भी आप लोग अपना जुगाड़ करके निकले थे वह तो अच्छा हुआ कि रास्ते में ढाबा नहीं मिला नहीं तो जहां मैं दाल-रोटी खा रहा था वहां आप लोग चालू हो जाते। अच्छा मृत्यु भोज वाले स्थान पर पहुंचकर भी आप लोग बोल रहे हो कि आधे घंटे में आते है। यानी किसी की पिता के मृत्यु का खाना खाने के पहले भी आप लोग चार-आठ पैग लगाना चाहते हो। आप लोग दारू पीकर खाना खाओंगे तब तो समाज गलत नहीं सोचेंगा और गरीब बेचारे ने आप लोगों की इज्जत का ध्यान रखते हुए एक दारू की बोतल थमा दी तो आपको लग रहा है कि मृत्यु भोज में भी दारू। यह चरित्र ठीक नहीं है। और फिर आपने अपनी पोस्ट में उसे बेचारा चतुर्थ वर्ग का कर्मचारी भी कहा है। क्या चतुर्थ शब्द लिखना जरूरी था। चतुर्थ वर्ग का कर्मचारी तो आप साहब लोगों से बहुत बड़ा निकला.
पोस्ट के व्यन्ग और बर्णन से पूरी तरह असहमत.
व्यन्ग इत्नी हकी चीज नही है अवधिया जी. वो गरीब आपको (जो इस कहानी के अनुसार बिल्कुल भी इज्जत के हकदार नही थे ) इज्जत दे रहा था और आप उस पर व्यन्ग कर रहे है. निराशा हुइ आपको पढकर.
गोदियाल साहब से पूरी तरह से सहमत हूँ
विश्वास नहीं होता , बहुत विचारणीय है
आपकी हर पोस्ट सोचने के लिए मजबूर कर देती है. यही है असली ब्लॉग-लेखन. जो यह कहते हैं कि ब्लॉग पर अच्छा नहीं लिखा जा रहा, उन्हें आपकी यह पोस्ट पढनी चाहिए.
बेहतरीन पोस्ट के लिए बधाई और साधुवाद.
post delete karo awadhiya ji
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