Sunday, September 12, 2010

सुनहरा धोखा

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

रक्तिम उषा,
स्वर्णिम अरुणोदय,
रवि की चमक-दमक,
चन्द्र-रजत की ललक,
उष्ण-शीत दिवस,
झर झर झरता पावस,
इन सबमें पलता मानव,
कभी दिव्य, कभी दानव।

अहं त्वं अन्य का जाल,
क्षणिक काल अनन्त काल,
शून्य नभ में सुनहरा धोखा है,
उद्भव-स्थिति-संहार का-
न लेखा है न जोखा है।

पर धोखे की धुरी सत्य,
सतत अमिट अमर्त्य,
लहराता बन कर्तव्य जड़ में चेतन,
चेतन में स्वयं सकाम-निष्काम,
पर, अनादि अनन्त अभिराम

(रचना तिथिः शनिवार 24-12-1983)

7 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

पर धोखे की धुरी सत्य,
सतत अमिट अमर्त्य,
लहराता बन कर्तव्य जड़ में चेतन,
चेतन में स्वयं सकाम-निष्काम,
पर, अनादि अनन्त अभिराम

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ....एक सार्थक सोच को उकेरती हुई

उम्मतें said...

बडी सुन्दर ,अर्थपूर्ण रचना !

प्रवीण पाण्डेय said...

अहं-त्वं का भेद सबसे सुनहरा धोखा है। बहुत सुन्दर भाव हैं।

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
काव्यशास्त्र (भाग-1) – काव्य का प्रयोजन, “मनोज” पर, आचार्य परशुराम राय की प्रस्तुति पढिए!

ashokbajajcg.com said...

ग्राम चौपाल में तकनीकी सुधार की वजह से आप नहीं पहुँच पा रहें है.असुविधा के खेद प्रकट करता हूँ .आपसे क्षमा प्रार्थी हूँ .वैसे भी आज पर्युषण पर्व का शुभारम्भ हुआ है ,इस नाते भी पिछले 365 दिनों में जाने-अनजाने में हुई किसी भूल या गलती से यदि आपकी भावना को ठेस पंहुचीं हो तो कृपा-पूर्वक क्षमा करने का कष्ट करेंगें .आभार


क्षमा वीरस्य भूषणं .

ब्लॉ.ललित शर्मा said...


सार्थक लेखन के शुभकामनाएं

दांत का दर्द-1500 का फ़टका
आपकी पोस्ट ब्लॉग4वार्ता पर

रचना दीक्षित said...

बहुत सुन्दर भाव, लाजवाब प्रस्तुति