Sunday, January 31, 2010

मैं ब्लोगिंग क्यों करता हूँ

कोई भी व्यक्ति यदि कुछ करता है तो उस कार्य का कुछ न कुछ उद्देश्य अवश्य ही होता है। मैं भी यदि ब्लोगिंग करता हूँ तो मेरा भी अवश्य ही कुछ न कुछ उद्देश्य होना ही चाहिये। मैं न तो कवि हूँ, न लेखक और न ही पत्रकार। याने कि लेखन से मेरा कुछ विशेष सम्बन्ध नहीं है, बस ऐसे ही कुछ कुछ लिख लेता हूँ। अक्टूबर 2004 में मैंने स्वैच्छिक सेवानिवृति ली तो बहुत अधिक खाली समय रहने लग गया मेरे पास। मैंने सुन रखा था नेट से कमाई के बारे में। तो दिन भर मैं नेट में खँगालते रहा करता था कि नेट से कमाई कैसे हो। वहीं मुझे पता चला कि ब्लोगिंग नाम की कोई चीज होती है जिसके द्वारा विज्ञापन से कमाई की जा सकती है। हिन्दी ब्लोगिंग के विषय में मुझे उस समय तक कुछ भी पता नहीं था। मैंने अंग्रेजी के कुछ ब्लोग बना लिये। कुछ काल के बाद मेरा एडसेंस का खाता भी खुल गया। अपने अंग्रेजी ब्लोग्स में मैंने एडसेंस के विज्ञापन भी लगा दिये। रोज देखा किया करता था अपने एडसेंस खाते को कि कुछ कमाई हो रही है या नहीं मगर महीनों तक एक भी क्लिक नहीं हुआ किसी विज्ञापन पर। मैं निराश होने लगा। पर ज्यों-ज्यों मैं निराश होता था त्यों-त्यों मेरा जुनून बढ़ते जाता था कि जब दूसरे लोग एडसेंस से कमाई कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं? अवश्य ही मुझमें ही कुछ न कुछ खामी है। खैर साहब, लगे ही रहा मैं अपनी कोशिश में और उस दिन मेरी खुशी का पारावार न रहा जब मैंने देखा कि एडसेंस विज्ञापन पर एक क्लिक हुआ है और मेरे खाते में $0.02 का बैलेंस हो गया है। मुझे वो $0.02 कुबेर के खजाने जैसा लगा और मैं और भी उत्साहित होकर काम करने लग गया। अपने ब्लोग्स में एडसेंस के विज्ञापन लगभग आठ महीने बाद मुझे गूगल से मेरी कमाई का पहला चेक मिला। फिर मैंने agoodplace4all.com नामक डोमेननेम, वेब होस्टिंग और अंग्रेजी का एक बना बनाया वेबसाइट भी खरीद लिया। दूसरा चेक मुझे पाँच माह बाद मिला और तीसरा उसके दो माह बाद। उसके बाद हर माह मेरी कमाई होने लगी।

इसी बीच नेट को खँगालते खँगालते मुझे नेट में हिन्दी के विषय में पता चला तो मैंने अपने हिन्दी ब्लॉग्स भी बना लिये और उनमें भी एडसेंस विज्ञापन लगा दिया। जब मैंने देखा कि हिन्दी के विज्ञापनों से भी कमाई हो रही है तो अंग्रेजी वेबसाइट के साथ साथ हिन्दी वेबसाइट भी बना लिया क्योंकि मैं चाहता था कि कमाई होने के साथ ही साथ यदि मातृभाषा की भी सेवा हो। मेरा हिन्दी लेखन यहीं से शुरू हुआ। यहीं से अंग्रेजी के प्रति रुचि कम हो गई, आखिर हिन्दी माध्यम से ही मेरी शिक्षा हुई थी।

बाद में गूगल के नीति में परिवर्तन हो गया और हिन्दी में एडसेंस विज्ञापन आने बन्द हो गये। किन्तु, बावजूद कमाई कम हो जाने के भी, हिन्दी के प्रति अपने मोह को मैं त्याग नहीं सका और इसीलिये मैँ हिन्दी ब्लोगिंग करता हूँ।

हिन्दी ब्लोगिंग के पीछे अभी भी मेरा उद्देश्य यही है कि नेट में हिन्दी आगे बढ़े और साथ ही साथ पाठकों की संख्या तेजी के साथ बढ़े क्योंकि पाठकों की अधिक से अधिक संख्या ही नेट में हिन्दी के द्वारा विज्ञापनों से कमाई करवा पायेगी। गूगल भी हिन्दी पाठकों की संख्या बढ़ाने के लिये जी जान से जुटा हुआ है। हिन्दी पाठकों की संख्या बढ़ाने के लिये गूगल ने 'है बातों में दम?' प्रतियोगिता आयोजित किया है जिसका कि आज अन्तिम तिथि है। इस प्रतियोगिता में अपने ब्लोग जैसे अपने नोल में पोस्ट लिखना पड़ता है।

मेरे ब्लोग प्रोफाइल को मुश्किल से कुछ सौ लोग ही देखते हैं किन्तु मेरे नोल प्रोफाइल को पिछले एक सप्ताह में 1261 लोगों ने देखा है। इससे पता चलता है कि गूगल के इस प्रयास से अवश्य ही हिन्दी पाठकों की संख्या बढ़ रही है।

Saturday, January 30, 2010

ये पोस्ट निकालना क्या होता है ज्ञानदत्त जी? ... एक प्रश्न समीर जी से भी

मेरे पोस्ट "मैंने कब कहा कि जिस पोस्ट में मैंने टिप्पणी नहीं की वह "व्यर्थ लेखन" या "निरर्थक पोस्ट" है" में टिप्पणी की हैः

:-)
अच्छा हुआ, आपने एक पोस्ट निकाल ली!
अब मैं ठहरा मन्दबुद्धि प्राणी। इस टिप्पणी का अर्थ ही नहीं समझ पाया। मेरे हिसाब से तो मैंने कुछ हास्य जैसी कोई चीज नहीं लिखी थी फिर :-) (हँसने वाला इमोशन) का क्या मतलब हुआ? लगता है कि भूलवश मैंने कुछ भौंडी बात लिख दिया रहा होगा जिससे हँसी आ गई होगी। और यह पोस्ट निकालना? ये क्या बला है? मैं तो पोस्ट लिखता हूँ, कभी कभी पोस्ट बन जाती है पर पोस्ट निकालने जैसी किसी प्रक्रिया से बिल्कुल ही अन्जान हूँ।

मेरा दुर्भाग्य है कि मैं ज्ञानदत्त जी के पोस्ट को भी नहीं समझ पाता। हिन्दी माध्यम में शिक्षा पाने के बाद भी मैं हिन्दी में लिखे गये प्रचलित अंग्रेजी शब्दों को तो कुछ कुछ समझ लेता हूँ किन्तु भारी भरकम अंग्रेजी शब्दों को समझने की बुद्धि मुझ में नहीं है। "सोचने में बहुत कूछ फिल्थ होता है", "... पोस्टनीय नहीं है" जैसी भाषा को समझना मेरे लिये मुश्किल हो जाता है। अब देखिये ना अटक गया मैं "फिल्थ" शब्द पढ़कर। बहुत सोचा पर याद ही नहीं आया कि हिन्दी में कोई ऐसा शब्द होता है। फिर लगा कि हो न हो यह कोई अंग्रेजी शब्द ही होगा। तो इसका अर्थ जानने के लिये मैंने शब्दकोश.कॉम में जाकर खोजा तो पता चला कि इसके एक से अधिक अर्थ होते हैं जो हैं अश्लीलता, कूड़ा, गंदगी और मैला। तब जाकर कहीं मुझे पता चला कि सोचने में क्या क्या होते हैं।

तो मैं यही कहना चाह रहा था कि मुझे तो "फिल्थ" के बजाय "कलुष" और "पोस्टनीय" के बजाय "प्रविष्टि योग्य" शब्द ही जल्दी समझ में आते हैं। जाने दीजिये, अब अपने दुर्भाग्य का कहाँ तक रोना रोऊँ।

मेरा एक प्रश्न समीर जी से भी है। क्या उच्च स्थान प्राप्त कर लेने का अर्थ यही होता है कि दूसरों का मखौल उड़ाया जाये?

मेरे सन्दर्भित पोस्ट में उनकी टिप्पणी हैः

इसीलिए मैं भी कम ही टिप्पणी करता हूँ कि अनर्थ न हो जाये. :)
अब मखौल के अलावा क्या समझूँ मैं इसे? और यदि यह मखौल नहीं है तो शायद आपको भी कुछ भौंडी चीज नजर आई होगी मेरे पोस्ट में।

मैं अनूप जी का भी शुक्रिया अदा करना चाहूँगा कि उन्होंने भी मेरे पोस्ट को अपनी इस टिप्पणी से नवाजाः

देखा आपने ज्ञानजी कल भी मौज लिये आपसे और आज भी मौज ले रहे हैं कि आपने एक पोस्ट निकाल ली। वैसे जब कल आपने ज्ञानजी की टिप्पणी पर अपनी बात कल ही साफ़ कर दी थी तो क्या आज इस पोस्ट को लिखना आवश्यक था? मेरी समझ में गैरजरूरी पोस्ट! :)
अनूप जी, आपने जिस मौज का जिक्र किया है उसे मैंने देखा है और अच्छी तरह से देखा है। मुझे खुशी है कि कम से कम मेरा पोस्ट किसी को मौज तो दे रहा है! रही जरूरी और गैरजरूरी वाली बात, तो आप तो जानते ही हैं कि "मुण्डे मुण्डे मतिर्भिना"। मेरा ब्लॉग है तो मेरे लिये कुछ ना कुछ लिखना भी जरूरी होता है, भले ही वह गैरजरूरी हो। हो सकता है कि मेरे और भी गैरजरूरी पोस्ट आयें।

सठियाया हुआ बुड्ढा हूँ, खरी-खरी कहना और खरी-खरी सुनना पसंद करता हूँ। किसी के व्यक्तिगत नाम से लिखना पसन्द नहीं करता किन्तु यदि कोई छत्तीसगढ़ी कहावत "कुकुर के मुँह में लौड़ी हुड़सना" को चरितार्थ करे तो उसे भी मैं सहन नहीं कर पाता।

अन्त में खेद के साथ मुझे कहना पड़ रहा है कि अब विवश होकर मैंने टिप्पणी मॉडरेशन चालू कर दिया है ताकि जो टिप्पणी मुझे मखौल लगे उसे मैं प्रकाशित ही ना होने दूँ।

Friday, January 29, 2010

मैंने कब कहा कि जिस पोस्ट में मैंने टिप्पणी नहीं की वह "व्यर्थ लेखन" या "निरर्थक पोस्ट" है

मैंने एक पोस्ट लिखा था "मैं टिप्पणी क्यों करता हूँ"। पोस्ट में मैंने सीधे सरल शब्दों में सिर्फ यह बताया था कि टिप्पणी करने के मेरे अपने क्या कारण हैं। पर वहाँ की कुछ टिप्पणियों को पढ़ कर मुझे पता चला कि उस पोस्ट के सीधे अर्थ के अलावा भी और अर्थ हो सकते हैं। मानो मेरा पोस्ट न हुआ "हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता" हो गया जिसका कि विद्वान लोग अलग-अलग प्रकार से अर्थ निकालते हैं। उस पोस्ट के ऐसे भी अर्थ निकाले कि जिस पोस्ट में मैं टिप्पणी नहीं करता वह "व्यर्थ लेखन" या "निरर्थक पोस्ट" है।

मैंने तो सिर्फ यही लिखा थाः

मैं उन्हीं पोस्टों में टिप्पणी करता हूँ जिन्हें पढ़कर प्रतिक्रयास्वरूप मेरे मन में भी कुछ विचार उठते हैं। जिन पोस्टों को पढ़कर मेरे भीतर यदि कुछ भी प्रतिक्रिया न हो तो मैं उन पोस्टों में जबरन टिप्पणी करना व्यर्थ समझता हूँ।
मेरे इस प्रकार से लिखने का अर्थ, कम से कम मेरी अल्प सोच के अनुसार, यह तो नहीं होता कि जिस पोस्ट में मैं टिप्पणी नहीं करता वह "व्यर्थ लेखन" या "निरर्थक पोस्ट" है।

मेरी तुच्छ बुद्धि यदि किसी पोस्ट में निहित गूढ़ बातों को समझ पायेगी तभी ना मेरे मन में प्रतिक्रियास्वरूप विचार आयेंगे? और यदि मैं किसी बात को समझ ही ना पाऊँ तो भला क्या खाक टिप्पणी करूँगा?

खैर साहब, कोई किसी बात को पढ़कर उसका क्या अर्थ निकालता है यह तो पढ़ने वाले के ऊपर ही निर्भर करता है, मैं भला उसमें क्या कर सकता हूँ?

Thursday, January 28, 2010

ऐसे भी बीमे होते हैं ... ललित जी प्रेरणा लें सकते हैं मूछों की बीमा करवाने वाले से

एक ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट खिलाड़ी ने अपनी अनूठी मूंछों के लिए लाखों डॉलर की राशि की बीमा पॉलिसी ली थी। [ललित शर्मा जी इनसे प्रेरणा लें सकते हैं! :)]

1957 में खाद्य समीक्षक (food critic) इगोन रोने (Egon Ronay) ने अपने स्वाद के लिये 400,000 डॉलर का बीमा करवाया था।

कीथ रिचर्ड्स (Keith Richards), जिन्हें गिटारिस्ट फॉर रोलिंग स्टोन्स रोलिंग स्टोन्स (guitarist for the Rolling Stones) के नाम से भी जाना जाता है, ने अपनी उंगलियों का बीमा करवाया था।

फ्लेम्बोयान्ट लिबेरस Flamboyant Liberace ने अपने पियानो बजाने वाले हाथ का बीमा करवाया था।

1980 के दशक में Bruce Springstein ने अपनी आवाज का $6 million के लिये बीमा करवाया था।

गायक Tom Jones ने अपने छाती के बालों का $7 million के लिये बीमा करवाया था।

एक अफवाह यह उड़ी थी कि जेनिफ़र लोपेज़ (Jennifer Lopez) ने कई मिलियन या बिलियन डॉलर के लिये अपनी नितम्बों का बीमा करवाया था।

स्रोतः http://abcinsuranceleads.com/pages/strange-insurance-policies.php

Wednesday, January 27, 2010

मैं टिप्पणी क्यों करता हूँ

सभी पोस्टों को पढ़ना तो बहुत मुश्किल क्या असम्भव है क्योंकि मेरी कुछ रुचियाँ हैं और जिन पोस्टों के विषय मेरी रुचि के नहीं होते उन्हें प्रायः मैं नहीं ही पढ़ पाता। फिर भी रोज ही बहुत सारे पोस्टों को पढ़ता हूँ मैं किन्तु टिप्पणी कुछ ही पोस्टों में करता हूँ।

मैं उन्हीं पोस्टों में टिप्पणी करता हूँ जिन्हें पढ़कर प्रतिक्रयास्वरूप मेरे मन में भी कुछ विचार उठते हैं। जिन पोस्टों को पढ़कर मेरे भीतर यदि कुछ भी प्रतिक्रिया न हो तो मैं उन पोस्टों में जबरन टिप्पणी करना व्यर्थ समझता हूँ। यदि मेरे किसी पोस्ट को पढ़कर किसी पाठक के मन में कुछ विचार न उठे तो मैं उस पाठक से किसी भी प्रकार की टिप्पणी की अपेक्षा नहीं रखता।

कुछ ब्लोगर्स ऐसे भी हैं जिनकी लिखने की शैली मुझे शुरू से ही प्रभावित करती रही है। ऐसे ब्लोगर्स से मैं स्वयं को भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ महसूस करता हूँ और जहाँ तक हो सके उनके पोस्ट पर टिप्पणी के रूप में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने का प्रयास करता हूँ।

विवाद उत्पन्न करने के उद्देश्य से लिखे गये पोस्टों पर टिप्पणी करने से मैं भरसक बचने की कोशिश करता हूँ।

मैं नये ब्लोगरों के पोस्टों पर प्रोत्साहन देने के लिये टिप्पणी महत्व को समझता हूँ किन्तु यह भी मानता हूँ कि यदि वे नेट में हिन्दी को अच्छी सामग्री दे पा रहे हैं तभी वे टिप्पणी पाने के योग्य हैं अन्यथा नहीं।

मेरे विचार से टिप्पणियाँ पोस्ट को पढ़ने के प्रतिक्रियास्वरूप मन में उठे विचार हैं न कि एक दूसरे की पीठ थपथपाने की कोई चीज। यदि किसी पोस्ट, चाहे वह पुराने ब्लोगर की हो या नये की, में अच्छी सामग्री मिलती है तो उस पोस्ट को टिप्पणी पाने से कोई भी नहीं रोक सकता।

मेरा मानना यह भी है कि जहाँ सटीक टिप्पणियाँ प्रोत्साहित करती है वहीं पोस्ट के विषय से हटकर तथा समझ में न आने वाली टिप्पणियाँ पढ़ कर दिमाग खराब हो जाता है।

Tuesday, January 26, 2010

तिरंगा फहरा दिया ... देशभक्ति वाले गाने बजा दिया ... क्या यही है गणतन्त्रदिवस मनाना?

जब से होश सम्भाला है तब से देखते आ रहा हूँ कि हर साल 26 जनवरी के दिन स्कूलों, शासकीय कार्यालयों, गली मुहल्लों में तिरंगा फहराया जाता है, जन-गण-मन गाया जाता है और देशभक्ति वाले फिल्मी गाने बजाये जाते हैं। क्या यही है गणतन्त्र दिवस मनाना? यदि कोई पूछ ले कि आखिर गणतन्त्र दिवस क्यों मनाया जाता है तो हममें से बहुत लोग शायद बगलें झाँकने लग जायेंगे।

यद्यपि हमारा देश 15 अगस्त को स्वतन्त्र हो गया था किन्तु उस समय हमारे पास अपना कोई संविधान नहीं था और हमारे कानून औपनिवेशिक भारत सरकार के संशोधित भारत अधिनियम 1935 पर ही आधारित थे। अर्थात उस समय भारत एक "स्वतंत्र-उपनिवेश" (Dominion) था तथा स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भी हमारे राष्ट्र के प्रमुख जॉर्ज षष्ठम् तथा गवर्नरल जनरल अर्ल माउंटबेटन थे। भारत को पूर्ण गणतन्त्र बनने के लिये हमारा अपना संविधान बनाना आवश्यक था अतः अपना संविधान बनाने के लिये 29 अगस्त 1947 को भीमराव अम्बेडकर की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई। इस समिति ने भारतीय संविधान का निर्माण किया जिसे 26 जनवरी, १९५० को देश में लागू किया गया और हमारा देश गणतन्त्र में परिणित हो गया। भारत के संविधान के अभिग्रहण की सालगिरह पर प्रतिवर्ष हम राष्ट्रीय पर्व के रूप में गणतन्त्र दिवस मनाते हैं।

विदेशी, विशेषकर ब्रिटिश, संविधानों पर आधारित हमारा संविधान, जिसमें भारतीय मौलिकता नाम की कुछ भी चीज कहीं नजर ही नहीं आती, कितना कारगर है यह तो इसी से पता चलता है कि आज हमारा देश आतंकवाद, नक्सलवाद, माओवाद, जेहाद आदि से लगातार जूझ रहा है और पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देश भारतीय भूमि में घुसपैठ करने में कामयाबी प्राप्त कर रहे हैं, भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा में है और मँहगाई आसमान छू रही है।

Monday, January 25, 2010

क्या हिन्दी में छंदबद्ध कविताएँ लिखनी खत्म हो जायेंगी?

आज हिन्दी में बहुत सारी कविताएँ लिखी जा रही हैं। एक से बढ़कर एक कवि हैं आज हिन्दी के। हमारे हिन्दी ब्लोगजगत में भी कवि मित्रों की कमी नहीं है। सुन्दर सुन्दर भाव होते हैं उनकी कविताओं में इसीलिये वे पठनीय भी होती हैं। किन्तु अलंकारयुक्त छंदबद्ध रचनाएँ लुप्तप्राय होते जा रही हैं। बहुत ही क्षोभ होता है यह देखकर। गति, यति और लय तो कविता के प्राण हैं किन्तु आज की कविताओं में इन्हीं का अभाव दिखता है।

क्यों आज के कवि छंदबद्ध कविताएँ नहीं लिखते?

क्या हिन्दी में छंदबद्ध कविताएँ लिखनी खत्म हो जायेंगी?

Sunday, January 24, 2010

आज महानायक हैं तो क्या हुआ ... महानायक बनने के लिये संघर्ष तो उन्हें भी करना पड़ा था


अमिताभ जी के कद और आवाज के आज लाखों प्रशंसक हैं किन्तु उसी कद और आवाज के कारण शुरू शुरू में उन्हें अस्वीकृत कर दिया जाता था। पहली बार ख्वाज़ा अहमद अब्बास जी ने उन्हें अपनी फिल्म सात हिंदुस्तानी (1969) में अवसर दिया भी तो वह फिल्म ही बुरी तरह पिट गई और अमिताभ बच्चन की ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया।

'मधुशाला' के रचयिता प्रसिद्ध कवि हरिवंशराय बच्चन के ज्येष्ठ पुत्र अमिताभ बच्चन ने अपने आरंभिक दिनों में अभिनय जगत में स्थापित होने के लिये बहुत संघर्ष किया है। फिल्मों में आने से पहले वे स्टेज आर्टिस्ट तथा रेडियो एनाउंसर भी रह चुके हैं। फिल्मों में काम करने के लिये उन्होंने कई बार आवेदन दिया पर हर बार उन्हें उनके ऊँचे कद के कारण अस्वीकार कर दिया जाता था।

उनकी आवाज से प्रभावित होकर उन्हें फिल्म भुवन सोम (1969) में 'नरेटर' (पार्श्व उद्घोषक) का कार्य दिया गया, भुवन सोम में उनकी आवाज अवश्य थी पर उन्हें परदे पर कहीं दिखाया नहीं गया था। ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म आनंद (1970) में अमिताभ बच्चन ने बहुत अच्छी भूमिका निभाई थी पर फिल्म की सफलता का सारा श्रेय राजेश खन्ना ले गये, ये तो सभी जानते हैं कि राजेश खन्ना उस समय के जाने माने तथा स्थापित नायक थे।

ऋषि दा ने अपनी फिल्म गुड्डी में भी अतिथि कलाकार बनाया पर इससे अमिताभ को कुछ विशेष फायदा नहीं मिला। फिर उन्हें रवि नगाइच के फिल्म प्यार की कहानी (1971) में मुख्य भूमिका मिली। नायिका तनूजा और सह कलाकार अनिल धवन के होने के बावजूद भी फिल्म चल नहीं पाई और अमिताभ के संघर्ष के दिन जारी ही रहे। उन दिनों अमिताभ बच्चन को जैसा भी रोल मिलता था स्वीकार कर लेते थे। इसीलिये फिल्म परवाना (1971) में उन्होंने एंटी हीरो का रोल किया। परवाना में नवीन निश्चल की मुख्य भूमिका थी और नवीन निश्चल भी उस समय के स्थापित नायक थे अतः अमिताभ की ओर लोगों का ध्यान कम ही गया। सन् 1971 में ही उन्होंने संजोग, रेशमा और शेरा तथा पिया का घर (अतिथि कलाकार) फिल्मों में काम किया पर कुछ विशेष सफलता नहीं मिली।

सन् 1972 में आज के महानायक की फिल्में थीं - बंशी बिरजू, बांबे टू गोवा, एक नजर, जबान, बावर्ची (पार्श्व उद्घोषक) और रास्ते का पत्थर। बी.आर. इशारा की फिल्म एक नजर में उनके साथ हीरोइन जया भादुड़ी थीं। फिल्म एक नजर के संगीत को बहुत सराहना मिली पर फिल्म फ्लॉप हो गई। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि फिल्म एक नजर के गाने आज भी संगीतप्रेमियों के जुबान पर आते रहते हैं खासकर 'प्यार को चाहिये क्या एक नजर.......', 'पत्ता पत्ता बूटा बूटा.......', 'पहले सौ बार इधर और उधर देखा है.......' आदि। इसी फिल्म से अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी एक दूसरे को चाहने लगे। ये जया भादुड़ी ही थीं जिन्होंने संघर्ष के दिनों में अमिताभ को संभाले रखा।

सन् 1973 में अमिताभ जी की फिल्में बंधे हाथ, गहरी चाल और सौदागर विशेष नहीं चलीं। पर प्रकाश मेहरा की फिल्म जंजीर की अपूर्व सफलता और उनके एंग्री यंगमैन के रोल ने उन्हें विकास के रास्ते पर ला खड़ा किया।

Saturday, January 23, 2010

बड़ी बेसब्री से इंतजार किया करते थे हम बुधवार का

एक समय था जब हमें लगता था कि कैसे जल्दी से जल्दी बुधवार आ जाये और जब बुधवार आ जाता था तो फिर बेसब्री के साथ इंतजार हो जाता था रात्रि के आठ बजने का। हमारा खयाल है कि सिर्फ हमें ही नहीं बल्कि आप को भी ऐसा लगता रहा होगा। हम बात कर रहे हैं अपने समय की सर्वाधिक लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम "बिनाका गीतमाला" की जिसके भारत के करोड़ों लोग दीवाने थे।

बिनाका गीतमाला रेडियो पर प्रसारित होने वाला भारतीय फिल्मों के गीतों पर आधारित प्रथम काउंट डाउन (count down) कार्यक्रम था जिसकी जो कि सन् 1952 से शुरू होकर सन् 1994 तक चली। एक समय में बिनाका गीतमाला इतना अधिक लोकप्रिय था कि लोग इसे सुनने के लिये अपने जरूरी से जरूरी काम को भी टाल दिया करते थे। भारत के करोड़ों लोग इस प्रोग्राम के दीवाने थे।

बिनाका गीतमाला का प्रसारण "सीलोन ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेशन", जिसे कि रेडियो सीलोन के नाम से जाना जाता था और जो बाद में "श्रीलंका ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेशन" हो गया, से प्रत्येक बुधवार की रात्रि 8 बजे हुआ करता था। आरम्भ में यह प्रोग्राम आधे घंटे का हुआ करता था किन्तु बाद में इसकी लोकप्रियता को ध्यान में रख कर इसे एक घंटे का कर दिया गया था। संगीत के इस अत्यन्त लोकप्रिय कार्यक्रम में लोकप्रियता के आधार पर भारतीय फिल्मों के गीतों को सुनवाया जाता था और इसे विख्यात उद्घोषक अमीन सयानी अपनी मनमोहक अंदाज एवं आवाज के साथ प्रस्तुत किया करते थे। भारतीय फिल्मों की मेलॉडियस संगीत और अमीन सयानी की कर्णप्रिय आवाज पूरे एक घंटे तक श्रोताओं को भाव विभोर कर के रेडियो से चिपका के रख दिया करती थी।

बिनाका गीतमाला में गीतों को उनकी लोकप्रियता के क्रम के अनुसार सुनवाया जाता था। चयन किये गये सोलह गानों में सबसे कम लोकप्रिय गाना सबसे पहले और सबसे अधिक लोकप्रिय गाना सबसे अंत में बजा करता था। कार्यक्रम का आरम्भ शानदार बिगुल बजने के साथ हुआ करता था। गानों के रेकॉर्ड की बिक्री गानों की लोकप्रियता का पैमाना हुआ करता था।

बाद में बिनाका गीतमाला के नाम को दो बार बदला गया। पहली बार इसका नाम बदल कर सिबाका गीतमाला किया गया और दूसरी बार कोलगेट गीतमाला। कालान्तर में सिबाका गीतमाला को सिबाका संगीतमाला के नाम से विविध भारती से भी प्रसारित किया गया।

बिनाका गीतमाला के आरम्भ होने के 39 वर्षों के बाद टेलीविजन पर फिल्मी गीतों के काउंट डाउन (count down) कार्यक्रम सुपरहिट मुकाबला शुरू हो गया जिसके कारण इस इस कार्यक्रम का प्रभाव कम होने लगा। लोकप्रियता कम हो जाने पर कार्यक्रम के 42वें वर्ष में इसे बंद कर दिया गया।

नीचे प्रस्तुत है बिनाका गीतमाला के अनुसार वर्षवार सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों की सूचीः

वर्षगीतफिल्मसंगीतकारगीतकारगायक/गायिका
1953ये जिन्दगी उसी की हैअनारकलीसी रामचंदराजेन्द कृष्णलता मंगेषकर
1954जायें तो जायें कहाँटैक्सी ड्राइव्हरसचिनदेव बर्मनसाहिर लुधियानवीतलत महमूद/लता मंगेषकर
1955मेरा जूता है जापानीश्री 420शंकर जयकिशनशैलेन्द्रमुकेश
1956ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँसीआईडीओ पी नैयरमजरूह सुल्तानपुरीमोहम्मद रफी, गीतादत्त
1957जरा सामने तो आओ छलियेजनम जनम के फेरेएस एन त्रिपाठीभरत व्यासमोहम्मद रफी, लता मंगेषकर
1958है अपना दिल तो आवारासोलहवाँ सालसचिनदेव बर्मनमजरूह सुल्तानपुरीहेमन्त कुमार
1959हाल कैसा है जनाब काचलती का नाम गाड़ीसचिनदेव बर्मनमजरूह सुल्तानपुरीहेमन्त कुमार, आशा भोसले
1960जिंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रातबरसात की रातरोशनसाहिर लुधियानवीमोहम्मद रफी, लता मंगेषकर
1961तेरी प्यारी प्यारी सूरत को
ससुरालशंकर जयकिशनहसरत जयपुरीमोहम्मद रफी
1962एहसान तेरा होगा मुझपरजंगलीशंकर जयकिशनहसरत जयपुरीमोहम्मद रफी/लता मंगेषकर
1963जो वादा किया वो निभाना पड़ेगाताजमहलरोशनसाहिर लुधियानवीमोहम्मद रफी, लता मंगेषकर
1964मेरे मन की गंगासंगमशंकर जयकिशनशैलेन्द्रमुकेश, वैजयन्तीमाला
1965जिस दिल में सा था प्यार तेरासहेलीकल्याणजी आनन्दजीइन्दीवरमुकेश/लता मंगेषकर
1966बहारों फूल बरसाओसूरजशंकर जयकिशनहसरत जयपुरीमोहम्मद रफी
1967सावन का महीना पवन करे सोरमिलनलक्ष्मीकान्त प्यारेलालआनन्द बख्शीमुकेश, लता मंगेषकर
1968दिल विल प्यार व्यारशागिर्दलक्ष्मीकान्त प्यारेलालआनन्द बख्शीलता मंगेषकर
1969कैसे रहूँ चुपइन्तेकामलक्ष्मीकान्त प्यारेलालराजेन्द्र कृष्णलता मंगेषकर
1970बिंदिया चमकेगीदो रास्तेलक्ष्मीकान्त प्यारेलालआनन्द बख्शीलता मंगेषकर
1971जिंदगी एक सफर है सुहानाअंदाजशंकर जयकिशनहसरत जयपुरीकिशोर कुमार/आशा भोसले
1972दम मारो दमहरे रामा हरे कृष्णाराहुलदेव बर्मनआनन्द बख्शीआशा भोसले
1973यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगीजंजीरकल्याणजी आनन्दजीगुलशन बावरामन्ना डे
1974मेरा जीवन कोरा कागज कोरा ही रह गयाकोरा कागजकल्याणजी आनन्दजीएम जी हश्मतकिशोर कुमार
1975बाकी कुछ बचा तो मँहगाई मार गईरोटी कपड़ा और मकानलक्ष्मीकान्त प्यारेलालवर्मा मलिकलता मंगेषकर, मुकेश, जानीबाबू, नरेन्द्र
1976कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता हैकभी कभीखैयामसाहिर लुधियानवीमुकेश
1977हुस्न हाजिर है मुहब्बत की सजा पाने कोलैला मजनूँमदन मोहनसाहिर लुधियानवीलता मंगेषकर
1978अँखियों के झरोखे से मैंने देखा जोअँखियों के झरोखे सेरवीन्द्र जैनरवीन्द्र जैनहेमलता
1979खइके पान बनारस वालाडॉनकल्याणजी आनन्द जीअंजानकिशोर कुमार
1980डफली वाले डफली बजासरगमलक्ष्मीकान्त प्यारेलालआनन्द बख्शीलता मंगेषकर, मोहम्मद रफी
1981मेरे अँगने में तुम्हारा क्या काम हैलावारिसकल्याणजी आनन्दजीअंजानअमिताभ बच्चन, अलका याग्निक
1982अंग्रेजी में कहते हैंखुद्दारराजेश रोशनमजरूह सुल्तानपुरीकिशोर कुमार, लता मंगेषकर
1983शायद मेरी शादी का खयालसौतनउषा खन्नासावन कुमारकिशोर कुमार, लता मंगेषकर
1984तू मेरा हीरो हैहीरोलक्ष्मीकान्त प्यारेलालआनन्द बख्शीअनुराधा पौढ़वाल, मनहर उधास
1985सुन सायबा सुनराम तेरी गंगा मैलीरवीन्द्र जैनरवीन्द्र जैनलता मंगेषकर
1986यशोदा का नन्दलालासंजोगलक्ष्मीकान्त प्यारेलालअंजानलता मंगेषकर
1987चिट्ठी आई हैनामलक्ष्मीकान्त प्यारेलालआनन्द बख्शीपंकज उधास
1988पापा कहते हैंकयामत से कयामत तकआनन्द मिलिन्दमजरूह सुल्तानपुरीअलका याग्निक, उदित नारायण
1989माय नेम इज लखनराम लखनलक्ष्मीकान्त प्यारेलालआनन्द बख्शीमोहम्मद अज़ीज़
1990गोरी है कलाइयाँआज का अर्जुनभप्पी लहरीअंजानलता मंगेषकर, शब्बीर कुमार
1991देखा है पहली बारसाजननदीम-श्रवणसमीरअलका याग्निक, एस पी बालसुब्रमनियम
1992मैने प्यार तुम्हीं से किया हैफूल और काँटेनदीम-श्रवणसमीरकुमार सानू, अनुराधा पौढ़वाल
1993चोली के पीछेखलनायाकलक्ष्मीकान्त प्यारेलालआनन्द बख्शीअलका याग्निक, इला अरुण

Friday, January 22, 2010

मुझे अतीत ही अच्छा लगता है क्योंकि मैं वृद्ध हूँ ... पर इसका मतलब यह नहीं होना चाहिये कि मैं युवाओं को बोर करूँ

यह एक स्वाभाविक बात है कि पुरानी पीढ़ी वर्तमान में रहते हुए भी अतीत में जीने का प्रयास करती रहती है जबकि नई पीढ़ी के लिये वर्तमान ही सबकुछ होता है। इसीलिये वृद्धों को हमेशा अतीत अच्छा लगता है और युवाओं को वर्तमान। परिणामस्वरूप प्रायः दोनों पीढ़ियों के बीच बहस, चर्चा आदि जोर पकड़ लेती है, मतभेद बढ़ते जाता है और उनके बीच की खाई बढ़ने लगती है।

वृद्धजन भूल जाते हैं कि कभी वे भी नई पीढ़ी थे और अपनी पुरानी पीढ़ी की उसी प्रकार आलोचना किया करते थे जिस प्रकार से आज की नई पीढ़ी उनकी आलोचना करती है। अपने बेलबॉटम को अपने पिता के चौड़ी मोहरी वाले फुलपेंट से ज्यादा अच्छा समझते थे। पिताजी की पसंद के गायक के. एल सहगल की हँसी उड़ाते थे और रफी किशोर की प्रशंसा करते नहीं थकते थे। बात-बात पर माता-पिता से कह दिया करते थे कि आप लोग कुछ समझते तो हैं नहीं और अपनी चलाने की कोशिश करते रहते हैं।

दूसरी ओर नई पीढ़ी को भी यह सोचना जरूरी है कि यद्यपि वे आज नई पीढ़ी हैं किन्तु कल उन्हें पुरानी पीढ़ी बनना ही पड़ेगा और उनके बाद आने वाली पीढ़ी के लिये उनका कुछ महत्व ही नहीं रहेगा। उनके बच्चे भी कल उनसे यही कहेंगे कि आप लोग कुछ समझते तो हैं नहीं और अपनी चलाने की कोशिश करते रहते हैं।

यदि दोनों पीढ़ी के लोग यदि एक दूसरे की भावनाओं का जरा खयाल रखें तो कभी भी मतभेद न हो। अच्छाई और बुराई तो हर काल में बनी ही रहती हैं। अतीत हो या वर्तमान, कोई भी पूर्णरूपेण न तो अच्छा ही हो सकता है और न ही बुरा। यदि हम दोनों ही कालों की अच्छाइयों को स्वीकार कर लें, याने कि वृद्धजन वर्तमान की और युवावर्ग अतीत की अच्छाइयों को स्वीकार करें तो मतभेद की स्थिति कभी उत्पन्न ही न हो।

Thursday, January 21, 2010

घर बैठे देख सकते हैं पृथ्वी के कुछ रहस्यमय एवं रोमांचक स्थानों को

हमारे ग्रह पृथ्वी पर कुछ ऐसे स्थान हैं जो अत्यधिक रहस्यमय होने के साथ ही साथ अत्यन्त रोचक भी हैं। आप ऐसे स्थानों अन्तरिक्ष से लिये गये चित्रों को गूगल अर्थ की सहायता से घर बैठे देख सकते हैं।

यहाँ पर ऐसे ही कुछ स्थानों के चित्र दिये जा रहे हैं साथ ही साथ अक्षांश एवं देशांश में उन स्थानों की स्थिति भी दी जा रही है ताकि आप उन स्थानों को गूगल अर्थ की सहायता से घर बैठे ही अपने कम्प्यूटर पर देख सकें। इसके लिये आपको इन स्थानों की स्थति को गूगल अर्थ की "फ्लाई टू" बॉक्स में डालकर मात्र अपने की बोर्ड के एंटर बटन को दबाना है और क्षणमात्र में पहुँच जायेंगे आप उन स्थानों में! (यदि वांछित स्थान न दिख पाये तो जरा सा दायें, बायें, ऊपर, नीचे भी देखने पर अवश्य ही दिख जायेगा।)

हम आपको बता दें कि गूगल अर्थ (Google Earth) हमारे ग्रह पृथ्वी की आभासी यात्रा करने के लिये बनाया गया एक आभासी एक्सप्लोरर (virtual Explorer) है जिसकी सहायता से आप माउस से सिर्फ एक क्लिक कर के संसार के किसी भी स्थान की यात्रा कर सकते हैं चाहे वह स्थान आपके स्थान से भौगोलिक दृष्टि से कितनी ही दूरी पर स्थित हो। याने कि गूगल अर्थ की सहायता से आप बात की बात में विश्व के किसी भी स्थान पर जा सकते हैं।

गूगल अर्थ को गूगल के आफिसियल वेबसाइट से डाउनलोड किया जा सकता है।

(चित्रों को बड़ा करके देखने के लिये उनपर क्लिक करें)

Djoser, Saqqara का पिरामिड
29 52 13.58N, 31 13 01.02E

रेत पर बना स्पायरल
48 21'10.18"N 11 43'56.72"E

शेर का चित्र
51 50'54.34"N 0 33'16.49"W


पहाड़ पर रहस्यमय आकृति
40 27'24.72"N 93 23'33.75"E


पहाड़ पर त्रिकोण की आकृति
33 44'17.45"N 112 38'0.17"W

उँगली का निशान
50°50'38.73"N 0°10'18.91"W

नाज़ी का स्वास्तिक आकार भवन
32°40'34.19"N 117° 9'27.58"W

रहस्यमय गोले
39°39'38.05"N 115°58'33.73"W

Tuesday, January 19, 2010

पोस्ट बनता है रचनाओं से और रचनाएँ बनती हैं शब्दों से

हम सभी अपने ब्लॉग के लिये पोस्ट लिखते हैं। पोस्ट याने कि लेख शब्दों से बनते हैं। याने कि हर दिन हम शब्दों से खेलते हैं। पर यदि हमसे कोई यह पूछ दे कि "आखिर ये शब्द होता क्या है?" तो हममें से बहुत लोग शायद सिर खुजाने लग जायेंगे। ऐसा नहीं है कि हम नहीं जानते कि शब्द क्या होता है। अवश्य ही जानते हैं क्योंकि हमने कभी अपने स्कूल में इसके बारे में पढ़ा था। किन्तु स्कूल के दिनों से आज तक के बीते हुए एक लम्बे अन्तराल ने हमारी याद के ऊपर एक धूल की परत सी बिठा दी है इसीलिये परेशानी होने लगती है हमें शब्द की परिभाषा बताने में। समय समय पर हमें अपनी यादों पर जमी इस धूल को साफ भी करना चाहिये इसीलिये आज स्कूल के बच्चों को पढ़ाने जैसी यह पोस्ट प्रस्तुत कर रहा हूँ।

शब्द

ऐसी ध्वनि जिसका कुछ अर्थ होता है, शब्द कहलाता है। शब्द अक्षरों के मेल से बनता है और अक्षर ध्वनि के लिये नियत किये गये संकेत को कहा जाता है।

उदाहरणः राम (र् + आ + म्), हिमालय (ह् + इ + म् + आ + ल् + अ + य् + अ) आदि।

शब्दभेद

शब्दों को निम्नलिखित आठ भागों में विभाजित किया गया है, जिन्हें शब्दभेद कहते हैं:

संज्ञाः नाम प्रदर्शित करने वाले शब्द को संज्ञा कहते हैं।

उदाहरणः रामायण के रचयिता वाल्मीकि हैं।

सर्वनामः संज्ञा के बदले में प्रयुक्‍त होने वाले शब्द को सर्वनाम कहा जाता है।

उदाहरणः वे आदिकवि के नाम से प्रख्यात हैं।

विशेषणः किसी संज्ञा अथवा सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्द को विशेषण कहा जाता है।

उदाहरणः मोहन एक अच्छा लड़का है।

क्रियाः जिस शब्द से किसी कार्य को करने का बोध होता है उसे क्रिया कहते हैं।

उदाहरणः अनिल दौड़ता है।

क्रियाविशेषणः किसी क्रिया, विशेषण अथवा अन्य क्रियाविशेषण की विशेषता बताने वाले शब्द को क्रियाविशेषण कहते हैं।

उदाहरणः

(i) वह खाना अच्छा पकाती है।
(ii) वह एक बहुत अच्छा लड़का है।
(iii) अनिल बहुत तेज दौड़ता है।

सम्बंधसूचकः दो संज्ञा या दो सर्वनाम या एक संज्ञा तथा एक सर्वनाम के मध्य सम्बंध बताने वाले शब्द को सम्बंधसूचक कहते हैं।

उदाहरणः दशरथ राम के पिता हैं।

संयोजकः दो शब्दों अथवा वाक्यों को जोड़ने वाले शब्द को संयोजक कहते हैं।

उदाहरणः राम और लक्ष्मण भाई हैं।

विस्मयाधिबोधकः गहरी भावना को व्यक्‍त करने वाले शब्द को विस्मयादिबोधक कहते हैं।

उदाहरणः ओह, बड़ा दुःख हुआ।

Monday, January 18, 2010

गूगल अर्थ में पहाड़ों को प्राकृतिक तथा जीवन्त रूप में कैसे देखें?

गूगल अर्थ का प्रयोग तो आप लोग करते ही होंगे। किन्तु आप में से कुछ लोग यह नहीं जानते होंगे कि उसमें किसी स्थान, विशेषकर पर्वतीय स्थानों, को उसके प्राकृतिक रूप में जीवन्त कैसे देखा जाता है।

उदाहरण के लिये नीचे स्नैपशॉट में दिखाया गया है कि गूगल अर्थ में सामान्य रूप से रोहतांग दर्रा कैसा दिखता हैः

अब रोहतांग दर्रे को उसके प्राकृतिक रूप में जीवन्त देखने के लिये इसे टिल्ट करना पड़ता है। टिल्ट करने के लिये आप अपने कीबोर्ड में शिफ्ट बटन को दबाये हुये माऊस की चकरी से स्क्रोल करें। देखें रोहतांग दर्रे का टिल्ट किया गया स्नैपशॉटः

इसी प्रकार से कन्ट्रोल बटन को दबाये हुए माऊस से स्क्रोल करके दिखाई दिये जाने वाले स्थान के चारों ओर के दृश्य को किसी भी दिशा में घुमाया भी जा सकता है। देखें रोहतांग दर्रे का घुमाया गया स्नैपशॉटः

पहलगाम का एक मनभावन स्नैपशॉट देखें:

Sunday, January 17, 2010

यदि अलबेला जी की साइट हिन्दी के नये पाठक दे रही है तो उसका सहयोग करना हमारा फर्ज बनता है

आज नेट में हिन्दी को जितनी नये ब्लोगरों की आवश्यकता है उससे कहीं बहुत अधिक नये पाठकों की आवश्यकता है। आज भारत नेट यूजर्स के मामले में विश्व में चौथे स्थान पर आ चुका है। भारत में प्रतिदिन चार करोड़ पचास लाख लोग नेट पर आते हैं जिनमें से करोड़ों हिन्दीभाषी नेट यूजर्स हैं। किन्तु किसी भी हिन्दी ब्लोग के पाठकों की संख्या हजार तक भी नहीं पहुँच पाती। अभी तक हिन्दी में सर्च करने वाले नेट यूजर्स बहुत ही कम हैं। सच बात तो यह है कि नेट में हिन्दी में सर्च कैसे किया जाये यह तक हमारे हिन्दीभाषी नेट यूजर्स को पता नहीं है, इसीलिये वे सर्च अंग्रेजी में ही करते हैं। अब यदि कोई सर्च अंग्रेजी में किया जाये और सबसे टॉप में कोई हिन्दी को बढ़ावा देने वाली साइट मिले तो यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। अलबेला जी ने अपने पोस्ट "अब आप खुल के बधाई दीजिये दोस्तों ! क्योंकि ये मैं नहीं, google serch का परिणाम कहता है" में बताया है कि अंग्रेजी में "लाफ्टर के फटके" लिखकर सर्च करने पर सबसे पहला नाम उनके साइट का आता है।

इसका मतलब यह हुआ कि यदि कोई हिन्दीभाषी इस प्रकार से अंग्रेजी में सर्च करेगा तो उसे हिन्दी को बढ़ावा देने वाली अलबेला जी की साइट सबसे पहले दिखेगी। मतलब यह कि हिन्दी को अधिक से अधिक पाठक मिलते जायेंगे। अलबेला खत्री जी का यह साइट एक सोशल नेटवर्किंग साइट है जिसका मेम्बर बन कर उसमें हिन्दी रचनाएँ डाली जा सकती हैं। तो क्यों न हम सभी इस साइट का मेम्बर बन कर इसे अपना सहयोग दें और हिन्दी को बढ़ावा देने के साथ ही साथ अपनी रचनाओं के लिये नये नये हिन्दी के पाठक भी प्राप्त करें।

अलबेलाखत्री.कॉम में रजिस्टर करने में और भी कई फायदे हैं। आप अपने चित्रों, व्हीडियो, पीडीएफ आदि के संग्रह को इसमें डाल सकते हैं। गूगल सर्च में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर सकते हैं। यदि आप किसी भी प्रकार का टैलेंट है तो आप अपने क्षेत्र बहुत आगे तक जा सकते हैं क्योंकि अलबेलाखत्री.कॉम नये कलाकारों को आगे बढ़ाने के लिये कृतसंकल्प है।

तो यदि आपने अभी तक स्वयं को अलबेलाखत्री.कॉम में रजिस्टर नहीं करवाया है तो अभी करवा लें फटाफट!

Saturday, January 16, 2010

सर्वाधिक कमाई करने वाले ब्लोग्स

हिन्दी ब्लोग्स से तो फिलहाल कमाई का कुछ अवसर नजर नहीं आ रहा है किन्तु अंग्रेजी तथा अन्य भाषा के ब्लोग्स भरपूर कमाई कर रहे हैं। शायद आपको जानकर आश्चर्य होगा कि सबसे अधिक कमाई करने वाले ब्लोग की मासिक आय $200,000 प्रतिमाह है। प्रस्तुत है सबसे अधिक कमाई करने वाले 30 ब्लोग्स ब्लोग्स का विवरण सहित सूचीः














































































































































































































































RankWebsiteOwnerMonthly EarningsMain Income


1


TechcrunchMichael Arrington$200,000Advertising Banners


2


MashablePete Cashmore$180,000Advertising Banners

3

Timothy SykesTimothy Sykes$150,000Affiliate Sales

4


Perez HiltonMario Lavandeira$140,000Advertising Banners

5

GothamistJake Dobkin$80,000Pay Per Click
6Venture BeatMatt Marshall$62,000Pay Per Click
7Slash GearEwdison Then$60,000Pay Per Click
8Life HackerNick Denton$60,000Advertising Banners

9

Smashing MagazineVitaly Friedman$58,500Advertising Banners
10Tuts PlusCollis Taeed$55,000Advertising Banners
11DooceHeather B. Armstrong$50,000Pay Per Click

12

Steve PavlinaSteve Pavlina$45,000Pay Per Click

13

TPMJosh Marshall$45,000Pay Per Click

14

Car AdviceAlborz Fallah$42,000Advertising Banners


15

ProbloggerDarren Rowse$40,000Advertising Banners

16

JohnChow John Chow$35,000Affiliate Sales

17

KotakuNick Denton$32,000Advertising Banners

18

ShoemoneyJeremy Schoemaker$30,000Private Advertising

19

Coolest GadgetsAllan Carlton$30,000Advertising Banners
20JoystiqAOL$18,000CPM Advertising
21PC MechDavid Risley$16,000Affiliate Sales
22Freelance SwitchCollis Ta’eed$13,000Membership Area

23

AbduzeedoFabio Sasso$11,000Advertising Banners

24

SizlopediaSaad Hamid$9,000Pay Per Click

25


Retire at 21Michael Dunlop$5,000Affiliate Sales

26

NoupeNoupe$4,930Advertising Banners

27

Uber AffiliatePaul Bourque$4,500Second Tear Affiliates

28

Click For NickNick Skeba$3,900Pay Per Click

29

Tyler CruzTyler Cruz$3,200Advertising Banners
30Just Creative DesignJacob Cass$3,000Services







सौजन्यः http://www.incomediary.com/top-earning-blogs/

यदि अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं के ब्लोग्स से कमाई हो रही है तो हिन्दी के ब्लोग्स से भला कमाई क्यों नहीं हो सकती? यदि हम सभी मिलकर हिन्दी ब्लोग्स में अच्छे कंटेन्ट्स देने और हिन्दी का एक विशाल पाठक वर्ग तैयार करने के लिये ठान लें तो वह दिन दूर नहीं होगा जब कि आप अपने हिन्दी ब्लोग से कमाई कर रहे होंगे।

चलिये आपको घर बैठे ही मजे दिलवाते हैं रामोजी फिल्म सिटी के!

ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि आप रामोजी फिल्म सिटी के बारे में न जानते हों। यह दुनिया का सबसे बड़ा फिल्म स्टूडियो है जिसका परिसर 2,000 एकड़ (8.1 km2) में फैला हुआ है। हैदराबाद भ्रमण करने के लिये जाने वाला हर पर्यटक के लिये यह एक बहुत बड़ा आकर्षण का केन्द्र है क्योंकि एक फिल्म स्टुडियो होने के साथ ही यह एक लोकप्रिय पर्यटन स्थाल तथा मनोरंजन केंद्र भी है। यहाँ पर प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों ही प्रकार के आकर्षक रमणीक उद्यान हैं। रामोजी फिल्म सिटी हैदराबाद - विजयवाड़ा राजमार्ग (NH9) पर हैदराबाद लगभग 25 कि.मी. की दूरी पर स्थित है।

रामोजी फिल्म सिटी में आप घर बैठे गूगल अर्थ के जरिये घूम सकते हैं। पर यहाँ पर आपके लिये हम एक इमेजरी प्रस्तुत कर रहे हैं जो आपको रामोजी फिल्म सिटी के अधिक मजे देगा।

तो आइये आपको घर बैठे ही रामोजी फिल्म सिटी का मजा दिलवाते हैं हम गूगल अर्थ में!

मजे लेने के लिये क्लिक करें:

Google Earth Logo गूगल अर्थ (Google Earth) - रामोजी फिल्म सिटी के मजे

यदि मजा आया हो तो अपनी टिप्पणी में अवश्य बताइयेगा ताकि हम आपको ऐसे ही और अन्य स्थानों की सैर करा सकें।

Friday, January 15, 2010

मेरे पोस्ट मात्र चौबीस घंटे ही प्रभावशाली रहते हैं

मैंने अनुभव किया है कि मेरे पोस्टों का प्रभाव मात्र चौबीस घंटे तक ही रहते हैं। प्रायः चौबीस घंटे तक ही उन्हें पढ़ा जाता है और उसके बाद वे न जाने अन्धकार के किस गर्त में खो जाते हैं। लगता है कि संकलकों के आगे वाले पृष्ठों में रहने तक ही उनका प्रभाव रहता है, ज्यों-ज्यों वे संकलक के पीछे की पृष्ठों में जाते जाते हैं त्यों-त्यों उनका प्रभाव कम होते जाता है। याने कि जिन्दा तो रहते हैं वे पोस्ट पर कोमा की स्थिति में।

बहुत ही क्षोभ होता है मुझे अपने आप पर। सोचने लगता हूँ कि मैं क्यों कुछ ऐसा नहीं लिख पाता जो हमेशा हमेशा के लिये लोगों के आकर्षण का केन्द्र बन जायें, लोग खोज-खोज कर उन्हें पढ़ने आयें।

इस सत्य को जानने के बाद भी लाचार हूँ मैं। आत्मतुष्टि के लिये बेशर्मी के साथ हर रोज एक वैसा ही पोस्ट फिर कर दिया करता हूँ जिनका प्रभाव मात्र चौबीस घंटे तक ही रहे।

Thursday, January 14, 2010

क्या आप जीमेल का प्रयोग करते हैं? ... तो उसका बेहतर प्रयोग करें ना!

क्या आप जीमेल का प्रयोग करते हैं? यदि आपका उत्तर "हाँ" में है तो क्या आप जानते हैं कि जीमेल का बेहतर प्रयोग कैसे किया जा सकता है?

जीमेल में आपके लिये बहुत सारी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। आइये देखें कि जीमेल की सुविधाओं का प्रयोग करके कैसे जीमेल का बेहतर प्रयोग किया जा सकता है।

सितारे stars का प्रयोग करें: यदि कोई मेल आपके लिये विशेष है और बार

बार उस मेल को आपको खोलना है तो उसके लिये आप उस सितारे का प्रयोग कर सकते हैं। इससे आपको उस मेल को खोजने की जहमत बच जायेगी। स्टार प्रयोग करने के लिये बस आपको मेल के आगे बने सितारे को मात्र क्लिक कर देना है जिससे सफेद रंग का सितारे का चिह्न रंगीन हो जायेगा और वह मेल स्टार्ड फोल्डर में पहुँच जायेगी।

मेल का जवाब चैट से दें: किसी मेल का जवाब देने से पहले उसके फूटर तक स्क्रोल कर के देख लें कि क्या मेल भेजने वाला उस समय ऑनलाइन है। यदि वह उस समय ऑनलाइन रहे तो आप मेल का जवाब उससे चैटिंग कर के दे सकते हैं। इससे आपके बहुमूल्य समय की बचत होगी।

लेबल्स का प्रयोग करें: लेबल्स का प्रयोग करके आप अपने मेल सन्देशों को वर्गीकृत करके व्यवस्थित कर सकते हैं। इससे विशेष वर्ग याने कि लेबल्स वाले मेल तक आप बहुत ही आसानी के साथ पहुँच सकते हैं।

"Move to" का प्रयोग करें: मेलबॉक्स को साफ सुथरा रखने के लिये आप "Move to" क प्रयोग करके किसी भी मेल को किसी भी फोल्डर में पहुँचा सकते हैं।

सर्चबॉक्स का प्रयोग करें: किसी मेल को खोजने के लिये आप जीमेल में दिये गये सर्चबॉक्स का प्रयोग कर सकते हैं।

आर्चिव्हस का प्रयोग करें: ऐसे मेल को जिन्हें कि आप समझते हैं कि वर्तमान में इनका उपयोग नहीं है किन्तु भविष्य में शायद काम के हों में डाल दें। इससे मेल डिलीट भी नहीं होगा और आपका मेलबॉक्स साफ सुथरा रहेगा। आर्चिव्हस में डाले गये मेंल आपको "All Mail" फोल्डर में मिल जायेंगे।


थीम्स का प्रयोग करें: अपने जीमेल को सुन्दर बनाने के लिये थीम्स का प्रयोग करें। इसके लिये सेटिंग्स|थीम्स में जाकर पसंदीदा थीम का चयन कर लें।

Wednesday, January 13, 2010

यदि कोई कहता है कि मुझे गुस्सा नहीं आता तो वह बिल्कुल गलत कहता है

गुस्सा सभी को आता है। बहुत से लोग तो गुस्से से आग-बबूला हो जाते हैं। यदि कोई कहता है कि मुझे गुस्सा नहीं आता तो वह बिल्कुल गलत कहता है। गुस्से का आना उतना ही स्वाभाविक है जितना किसी पर प्यार आना। संसार में कोई भी ऐसा मनुष्य नहीं होगा जिसे गुस्सा न आता हो, मनुष्य तो क्या संसार में जितने प्राणी हैं उन सभी को क्रोध आता है।

हर्ष, दुःख, भय आदि के जैसे ही क्रोध भी प्राणीमात्र की एक मूलभावना है और प्राणियों के जीवित रहने के लिये ये मूल भावनाएँ अत्यन्त आवश्यक हैं। इन मूलभावनाओं के बगैर जिंदा रहा ही नहीं जा सकता। क्या आप बिना क्रोध किये किसी हमलावर से अपना बचाव कर सकते हैं? क्या कोई देशभक्त सैनिक क्रोध किये बिना शत्रु सैनिक का वध कर सकता है? सत्य तो यह है कि बुराइयों का नाश क्रोध किये बगैर हो ही नहीं सकता। क्रोध हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

गीता में श्री कृष्ण ने भी अर्जुन को शत्रु का वध करने का उपदेश दिया है। अब किसी का वध भला बिना क्रोध किये कैसे किया जा सकता है? स्पष्ट है कि श्री कृष्ण ने परोक्ष रूप से अर्जुन को क्रोध करने का ही उपदेश दिया है क्योंकि क्रोध जीवन के लिये आवश्यक है। हाँ अकारण या स्वार्थवश क्रोध करना अवश्य बहुत बड़ी बुराई है।

कई बार तो दया, करुणा जैसी भावनाएँ भी क्रोध का रूप धारण कर लेती हैं। क्रौञ्च पक्षी की मृत्यु के कारण वास्तव में महर्षि वाल्मीकि के हृदय में करुणा ही उत्पन्न हुई थी जो कि बहेलिये को शाप देने के रूप में क्रोध में परिवर्तित हो गई। किसी निर्बल या मासूम बच्चे पर किसी दुष्ट के अत्याचार के परिणामस्वरूप हमारे हृदय में दया की ही उत्पत्ति होती है किन्तु वह दया ही दुष्ट को सजा देने के लिये क्रोध का रूप धारण कर लेती है उदाहरण के लिये देखें यह पोस्ट

मेरे कहने का आप यह आशय मत निकाल लीजियेगा कि मैं क्रोध को अच्छा बता रहा हूँ। मैं तो आपको यह बताना चाहता हूँ कि यद्यपि क्रोध में बहुत सारी बुराइयाँ हैं किन्तु क्रोध की अपनी अच्छाइयाँ भी हैं और जीवन निर्वाह के लिये क्रोध आवश्यक है। याने कि गुस्सा आना भी उतना ही जरूरी है जितना कि गुस्से पर काबू पाना!

जब भी किसी को किसी पर किसी को क्रोध आता है तो क्रोध करने वाले का सबसे बड़ा उद्देश्य बन जाता है उस व्यक्ति को व्यथा पहुँचाना जिस पर क्रोध किया गया है। मारना-पीटना, शारीरिक या मानसिक चोट लगाना, अपमानित करना आदि व्यथा पहुँचाने के तरीके हैं। क्रोध में आकर आदमी सामने वाले को गाली-गलौज से लेकर उसकी हत्या तक भी कर सकता है। कभी-कभी तो सामने वाले को व्यथित करने के तरीके भी विचित्र होते हैं। आपने देखा होगा कि कई बार कोई आदमी क्रोध में आकर स्वयं को पीटने लगता है, खाना खाना छोड़ देता है। किन्तु स्वयं को पीटना या भोजन त्याग देना आदमी तभी करता है जब उसे किसी अपने प्रियजन पर क्रोध आता है। स्वयं को पीट कर भी वह सामने वाले को व्यथित करता है क्योंकि वह जानता है कि स्वयं को पीड़ा पहुँचाने पर वह प्रियजन अवश्य ही व्यथित होगा। किसी दूसरे आदमी पर क्रोध आने पर कभी भी कोई स्वयं को पीड़ा नहीं पहुँचाता।

जहाँ किसी की हत्या कर देना क्रोध का उग्र रूप है वहीं किसी को मात्र चिढ़ा देना क्रोध का एक छोटा रूप है। किसी को चिढ़ाने में आदमी का उद्देश्य मात्र स्वयं तथा अन्य लोगों का मनोरंजन करना होता है याने कि मात्र मनोरंजन के भी मनुष्य क्रोध करता है।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी ने बैर को क्रोध का अचार या मुरब्बा बताया है। जिस प्रकार से किसी फल का अचार या मुरब्बा बनाकर उसे दीर्घकाल के लिये सुरक्षित रखा जाता है उसी प्रकार से क्रोध को बैर बना कर दीर्घकालीन बना दिया जाता है अन्यथा क्रोध अल्पकालीन और अनेक बार क्षणिक ही होता है। शुक्ल जी ने क्रोध का एक बहुत ही अनूठा उदाहरण दिया है जिसके अनुसार एक ब्राह्मण बहुत ही भूखा था। उसने खाना बनाने के लिये चूल्हा जलाया। लकड़ियाँ गीली थी इसलिये जलने के स्थान पर मात्र धुआँ ही कर रही थी। ब्राह्मण देवता जब चूल्हा फूँकते-फूँकते थक गये तो अन्त में क्रोध में आकर बाल्टी भर पानी चूल्हे में डाल दिया और भूखे रह गये। इस प्रकार से क्रोध में आदमी प्रायः स्वयं को भी कष्ट पहुँचाता है।

क्रोध या गुस्सा या रोष पर नियन्त्रण करना "क्रोध प्रबन्धन" (anger management) के अन्तर्गत् आता है जो कि मनोवैज्ञानिक चिकित्सा प्रणाली का एक तकनीक है। इस प्रणाली का प्रयोग करके क्रोध पर नियन्त्रण रखा जा सकता है या फिर गुस्से को कम किया जा सकता है। क्रोध को नियन्त्रित करना बहुत अच्छी बात है किन्तु ऐसा करने के पहले यह जान लेना भी आवश्यक है कि हम किस प्रकार के क्रोध का नियन्त्रण कर रहे हैं। अच्छे प्रकार के क्रोध का या बुरे प्रकार के क्रोध का? पूरे क्रोध को नियन्त्रित करने के बजाय सिर्फ अतिरिक्त क्रोध को ही नियन्त्रित किया जाना चाहिये। हमेशा हानिकर क्रोध को ही नियन्त्रित किया जाना चाहिये। यदि आप अपने किसी प्रियजन की भलाई के उद्देश्य से उस पर गुस्सा करते हैं तो वह आपका बिल्कुल जायज गुस्सा है। इस प्रकार के गुस्से को नियन्त्रि कर के आप अपने प्रियजन का अहित ही करेंगे।

दूसरी ओर कुंठा, धमकी, उल्लंघन, या नुकसान की प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न क्रोध का हमेशा नियन्त्रण किया जाना चाहिये क्योंकि इस प्रकार का क्रोध हमें कई प्रकार की समस्याओं की ओर धकेल सकता है तथा हमारे भीतर अनेक मानसिक रोगों को जन्म दे सकता है।

कहा जाता है कि निम्न उपाय करने से अतिरिक्त क्रोध पर नियन्त्रण पाया जा सकता हैः

जोरदार गुस्सा आने पर गहरी गहरी साँसे लेना शुरू कर दें।

क्रोध एक मानसिक स्थिति होती है अतः गुस्सा आने पर अपने विचारों को किन्हीं अन्य विषयों की ओर मोड़ने का प्रयत्न करें।

गुस्सा आने पर 1 से 100 सौ तक गिनती गिनें, ऐसा करने से गुस्सा अपने आप ही शान्त होने लगेगा।

चलते-चलते

जीवन का उद्देश्य आनन्द प्राप्त करना है। - दलाई लामा

(The purpose of our lives is to be happy. - Dalai Lama)

Tuesday, January 12, 2010

अब ब्लागवाणी में किसी पसंद बटन को दोबारा क्लिक करने का मतलब है अपनी पसंद वापस लेना

क्या आपने कभी नये ब्लागवाणी में किसी पोस्ट को दो बार क्लिक कर के देखा है?

नये ब्लागवाणी में नई बात यह है कि यदि आपने भूलवश किसी पोस्ट के पसंद बटन को क्लिक कर दिया है तो आप फिर से उसे क्लिक करके अपनी पसंद वापस भी ले सकते हैं। किसी पोस्ट के पसंद बटन को दुबारा क्लिक करने का मतलब है अपने पसंद को वापस लेना। और तीसरी बार फिर से पसंद बटन को क्लिक करने का मतलब है वापस लिये गये पसंद को फिर से वापस देना।

इस व्यवस्था का अर्थ यह है कि नये ब्लागवाणी में अब किसी पोस्ट को केवल एक बार पसंद किया जा सकता है। यह नये ब्लागवाणी की एक बहुत बड़ी विशेषता है। पुराने ब्लागवाणी में थोड़ा सा तिकड़म करके किसी लेख को बार बार पसंद किया जा सकता था क्योंकि उसमें पसंद का आधार आईपी एड्रेस था जो कि आसानी के साथ बदला जा सकता है किन्तु नये ब्लागवाणी में पसंद का आधार लागिन है इसलिये इसमें किसी पोस्ट की पसंद संख्या बढ़ाने के लिये पहले जैसा तिकड़म भिड़ाने की सम्भावना समाप्तप्राय हो गई है।

इतनी सुन्दर व्यवस्था करने के लिये ब्लागवाणी को कोटिशः धन्यवाद!

चलते-चलते

यदि कोई छोटी-छोटी बातों में सच को गंभीरता से नहीं है लेता है तो बड़ी-बड़ी बातों में भी उसका भरोसा नहीं किया जा सकता. - अल्बर्ट आइंस्टीन

(Anyone who doesn't take truth seriously in small matters cannot be trusted in large ones either. - Albert Einstein)

Monday, January 11, 2010

पोस्ट लिखना कौन सा कठिन काम है, कोई भी लिख सकता है

"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!"

"नमस्काऽऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!"

"सुनाइये क्या चल रहा है?"

"चलना क्या है? अभी अभी एक पोस्ट लिखकर डाला है अपने ब्लॉग में और अब हम ब्लागवाणी पर अन्य मित्रों के पोस्टों को देख रहे हैं।"

"अच्छा यह बताइये लिख्खाड़ानन्द जी, आप इतने सारे पोस्ट लिख कैसे लेते हैं? भइ हम तो बड़ी मुश्किल से सिर्फ टिप्पणी ही लिख पाते हैं, कई बार तो कुछ सूझता ही नहीं तो सिर्फ nice , बहुत अच्छा, सुन्दर, बढ़िया लिखा है जैसा ही कुछ भी लिख देते हैं। पोस्ट लिखना तो सूझ ही नहीं पाता हमें।"

"अरे टिप्पण्यानन्द जी! पोस्ट लिखना कौन सा कठिन काम है, कोई भी लिख सकता है।"

"कैसे?"

"बताता हूँ पर पहले आप यह बताइये कि दया करना पुण्य और क्रोध करना पाप होता है कि नहीं?"

"जी हाँ, ऐसा ही है, बिल्कुल सही कह रहे हैं आप!"

"अब मान लीजिये कि आप कहीं जा रहे हैं और रास्ते में देखते हैं कि एक आदमी किसी मासूम बच्चे को पीट रहा है और बहुत से लोग चुपचाप देख रहे हैं। आपके पूछने पर लोग बताते हैं कि बच्चे को मारने वाला वह आदमी बच्चे से भीख मँगवाता है। आज बच्चे ने भीख में कुछ भी नहीँ लाया इसीलिये वह बच्चे को मार रहा है। ऐसे में आप क्या करेंगे? आप तो हट्टे-कट्टे आदमी हैं, क्या आप उस आदमी को छोड़ देंगे?"

"अजी, मैं तो फाड्डालूँगा स्साले को। मार मार कर कचूमर निकाल दूँगा। इतना मारूँगा स्साले को कि फिर कभी बच्चे को पीटना ही भूल जायेगा।"

"क्यों मारेंगे उसे आप? क्योंकि उस मासूम बच्चे पर दया आई आपको इसीलिये ना?"

"जी हाँ!"

"तो बच्चे पर दया करके आपने पुण्य किया कि नहीं?"

"बिल्कुल किया जी!"

"अच्छा अब बताइये उस आदमी को मारने के लिये क्रोध भी किया था ना आपने? बिना क्रोध किये तो किसी को मारा नहीं जा सकता!"

"हाँ जी, बहुत गुस्सा आया मुझे।"

"तो क्रोध करके आपने पाप किया कि नहीं?"

"अजी आप फँसाने वाली बात कर रहे हैं।"

"आप तो बस इतना बताइये कि क्रोध करके आपने पाप किया कि नहीं?"

"हाँ जी किया?"

"तो मुझे बताइये कि वास्तव में आपने क्या किया? दया किया कि क्रोध? पुण्य किया कि पाप?"

"अब मैं क्या बताऊँ जी! मेरा तो दिमाग ही घूम गया।"

"देखिये टिप्पण्यानन्द जी! वास्तव में आपने बच्चे पर दया किया किन्तु सिर्फ दया करके आप उस बच्चे को बचा नहीं सकते थे। उसे बचाने के लिये आपको बच्चे को उस दुष्ट आदमी से छुटकारा नहीं दिला सकते थे, बच्चे को उस जालिम से बचाने के लिये उसको मारना भी जरूरी था जो कि बिना क्रोध किये हो ही नहीं सकता। है कि नहीं?"

"जी, बिल्कुल!"

"तो इसका मतलब यह हुआ कि दया करने के लिये क्रोध का सहारा लेना जरूरी है। पुण्य करने के लिये पाप भी करना पड़ता है। पाप और पुण्य का एक दूसरे के बिना काम ही नहीं चल सकता। याने कि पाप और पुण्य एक दूसरे के पूरक हैं।"

"आप की बात सुनने के बाद मुझे भी ऐसा ही लगने लगा है कि पाप और पुण्य एक दूसरे के पूरक हैं।"

"अब हम दोनों के बीच अभी जो बातें हुई हैं उसी को यदि मैं 'पुण्य करने के लिये पाप भी करना पड़ता है' शीर्षक देकर अपने ब्लोग में डाल दूँ तो बन गई ना एक पोस्ट?"

"बिल्कुल बन गई जी!"

"तो जब मैं कहता हूँ कि 'पोस्ट लिखना कौन सा कठिन काम है, कोई भी लिख सकता है' तो क्या गलत कहता हूँ?"

"बिल्कुल सही कहते हैं जी आप!"

"चाय पियेंगे आप? मँगवाऊँ?"

"नहीं लिख्खाड़ानन्द जी, फिर कभी पी लूँगा, आज जरा जल्दी में हूँ। चलता हूँ, नमस्कार!"

"नमस्कार!"

Sunday, January 10, 2010

भारतीय सिनेमा का स्वर्णिम काल - सन् 1950 से 1980 ... लिस्ट कुछ लोकप्रिय फिल्मों की

भारत में फिल्मों के निर्माण आरम्भ होने के बाद भारतीय सिनेमा विकास के रास्ते पर निरंतर आगे बढ़ता ही गया और उसने मुड़कर कभी पीछे नहीं देखा। किंतु सन् 1950 से उसका स्वर्णिम काल प्रारंभ हुआ। रोचक कथानकों और सुमधुर गीत संगीत के मेल होने के कारण अद्वितीय फिल्में बनने लगीं।

राज कपूर, महबूब खान, गुरु दत्त, व्ही. शांताराम और बिमल राय जैसे महान निर्माताओं ने बूट पालिश, श्री 420, जागते रहो, आन, मदर इंडिया, प्यासा, कागज के फूल, दो आँखें बारह हाथ, नवरंग, दो बीघा जमीन और मधुमती जैसी सुंदर, सशक्त एवं अविस्मरणीय चलचित्रों का निर्माण किया जो कि आज भी लोकप्रिय हैं। सन् 1955 में सत्यजित राय, जो कि विश्व के जाने माने निर्देशकों में से एक हैं, द्वारा निर्देशित फिल्म पाथेर पांचाली ने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की।

भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम काल में विभिन्न निर्माण संस्थाओं के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्मों का विवरण इस प्रकार हैः

महबूब खान के 'महबूब प्रोडक्शन्स' के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं हुमायु (1945), अनमोल घड़ी (1946), अनोखी अदा (1948), अंदाज (1949), झाँसी की रानी (1952), आन (1952), अमर (1954), आवाज (1956), मदर इंडिया (1957), सन आफ इंडिया (1962)।

बिमल राय के 'बिमल राय प्रोडक्शन्स' के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं दो बीघा जमीन (1953), नौकरी (1954), देवदास (1955), अमानत (1955), परिवार (1956), मधुमती (1958), सुजाता (1959), उसने कहा था (1960), परख (1960), काबुलीवाला (1961), प्रेम पत्र (1962), बंदिनी (1963), बेनज़ीर (1964), दो दूनी चार (1968)।

राज कपूर के 'आर.के. फिल्म्स' के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं आग (1948), बरसात (1949), आवारा (1951), बूट पालिश (1954), श्री 420 (1955), जिस देश में गंगा बहती है (1961), संगम (1964), मेरा नाम जोकर (1970), धरम करम (1975), सत्यं शिवं सुंदरम् (1978)।

राज कपूर अपने समय के सबसे कम उम्र वाले निर्देशक थे। संगीत की उन्हें खूब समझ थी इसीलिये उनकी फिल्मों के गाने आज तक लोकप्रिय हैं, खास कर बरसात का गाना 'हवा में उड़ता जाये.....', आवारा का गाना 'घर आया मेरा परदेशी.....', बूट पॉलिश का गाना 'नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है.....', श्री 420 का गाना 'मेरा जूता है जापानी.....' एवं 'प्यार हुआ इकरार हुआ.....', जिस देश में गंगा बहती है का गाना 'ओ बसंती पवन पागल.....', संगम का गाना 'ओ मेरे सनम ओ मेरे सनम.....' आदि।

देव आनंद के 'नवकेतन इंटरनेशनल' के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं अफसर (1950), टैक्सी ड्राइव्हर (1954), हाउस नं.44 (1955), फंटूश (1956), नौ दो ग्यारह (1957), काला पानी (1958), काला बाजार (1960), हम दोनों (1961), तेरे घर के सामने (1963), गाइड (1965), ज्वेल थीफ (1967), प्रेम पुजारी (1970), हरे राम हरे कृष्ण (1971), शरीफ़ बदमाश (1973), छुपा रुस्तम (1973), इश्क इश्क इश्क (1974), जानेमन (1976), लूटमार (1980)।

देव आनंद सदाबहार हीरो रहे। ग्रैगरी पैक के अंदाज में अभिनय किया करते थे और खूब लोकप्रिय हुये। उनके दोनों भाई चेतन आनंद और विजय आनंद भी गजब के प्रतिभा के धनी थे। फिल्म गाइड के निर्देशन के लिये विजय आनंद को सभी लोगों से बहुत प्रशंसा मिली थी।

गुरु दत्त के 'गुरुदत्त फिल्म्स' के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं बाज़ी (1951), प्यासा (1958), कागज के फूल (1959), साहेब बीबी और गुलाम (1962)।

वैसे तो गुरु दत्त की बनाई सभी फिल्में लाजवाब थीं पर फिल्म प्यासा की तारीफ सबसे अधिक की गई थी। आपको शायद पता हो कि उनके द्वारा बनाई गई फिल्म कागज के फूल हिंदी की पहली सिनेमास्कोप फिल्म है।

जेमिनी प्रोडक्शन्स के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं चंद्रलेखा (1948), निशान (1949), संसार (1951), मिस्टर संपत (1952), बहुत दिन हुये (1954), इंसानियत (1955), राज तिलक (1958), पैगाम (1959), घराना (1961), औरत (1967), तीन बहूरानियाँ (1968), शतरंज (1969)।

ए.व्ही.एम. प्रोडक्शन्स के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं बहार (1951), लड़की (1953), चोरी चोरी (1956), भाई भाई (1956), भाभी (1957), मिस मेरी (1957), बरखा (1959), बिंदिया (1960), छाया (1961), मैं चुप रहूँगी (1962), मुनीम जी (1962), पूजा के फूल (1964), लाडला, मेहरबान, दो कलियाँ (1968)।

जेमिनी प्रोडक्शन्स तथा ए.व्ही.एम. प्रोडक्शन्स दक्षिण भारत की फिल्म निर्माण संस्थाएँ थीं पर सामाजिक कथाओं पर आधारित लोकप्रिय हिंदी फिल्मे भी बनाया करती थीं।

बी.आर. चोपड़ा के 'बी.आर. फिल्म्स' के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं एक ही रास्ता (1956), नया दौर (1957), साधना (1958), धूल का फूल (1959), कानून (1961), धर्मपुत्र (1962), गर्ल्स हॉस्टल (1962), गुमराह (1963), वक्त (1965), हमराज़ (1967), इत्तिफाक (1969), हम एक हैं (1970), आदमी और इंसान (1970), जवाब (1970), छाटी सी बात (1976), इंसाफ का तराजू (1980)।

बी.आर. चोपड़ा जाने माने निर्माता निर्देशक रहे हैं। उनकी बनाई टी.व्ही. सीरयल महाभारत की आज भी प्रशंसा होती है।

एस. मुखर्जी के 'फिल्मालय प्रोडक्शन्स' के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं दिल दे के देखो (1959), हम हिंदुस्तानी (1960), लव्ह इन शिमला (1960), प्यार का सागर (1961), एक मुसाफिर एक हसीना (1962), आओ प्यार करें (1964), तू ही मेरी जिंदगी (1965)।

सुबोध मुखर्जी के 'सुबोध मुखर्जी प्रोडक्शन्स' के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं जंगली (1961), एप्रिल फूल (1964), शागिर्द (1967), अभिनेत्री (1970), शर्मीली (1971), मि. रोम्यो (1974)।

ताराचंद बड़जात्या के 'राजश्री प्रोडक्शन्स' के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं आरती (1962), दोस्ती (1964), महापुरुष (1965), तकदीर (1967), जीवन मृत्यु (1970), उपहार (1971), मेरे भैया (1972), पिया का घर (1972), सौदागर (1973), हनीमून (1973), तूफान (1975), गीत गाता चल (1975), तपस्या (1976), चितचोर (1976), पहेली (1977), दुल्हन वही जो पिया मन भाये (1977), अलीबाबा मरजीना (1977), एजेंट विनोद (1977), अँखियों के झरोखे से (1978), सुनयना (1979), शिक्षा (1979), सावन को आने दो (1979), साँच को आँच नहीं (1979), नैया (1979), गोपाल कृष्ण (1979), राधा और सीता (1979), तराना (1979), मनोकामना (1980), मान अभिमान (1980), एक बार कहो (1980), हमकदम (1980)।

रामानंद सागर के 'सागर आर्ट' के द्वारा बनाई गई लोकप्रिय फिल्में हैं जिंदगी (1964), आरजू (1965), आँखें (1968), गीत (1970), ललकार (1972), चरस (1976)।

रामानंद सागर के बनाये टी.व्ही. सीरियल रामायण के प्रसारण के समय ट्रेनों को भी स्टेशन में रोक दिया जाता था जिससे कि यात्री उसे देख सकें। प्रसारण समाप्त हो जाने के बाद ही ट्रेनें आगे बढ़ती थी।

Saturday, January 9, 2010

संगीता पुरी जी का सराहनीय कार्य ... 5 दिन में 45 लेख दिये गूगल के 'है बातों में दम?' प्रतियोगिता को

यह देखकर मुझे अपार हर्ष हुआ कि संगीता पुरी जी ने 5 दिन में 45 लेख दिये हैं गूगल के 'है बातों में दम?' प्रतियोगिता को! प्रतियोगिता में उनके द्वारा डाले गये लेखों की लिस्ट आप यहाँ क्लिक करके देख सकते हैं।

संगीता जी ने 4 जनवरी 2010 को प्रतियोगिता में भाग लेना आरम्भ किया मात्र 5 दिन में 45 लेख समर्पित कर दिया प्रतियोगिता को। नेट में हिन्दी के विस्तार के लिये यह अत्यन्त सराहनीय कार्य है उनका! मैं आशा करता हूँ कि उनका यह कार्य आपके लिये भी प्रेरणा बनेगी और आप भी बढ़ चढ़ कर इस प्रतियोगिता में अवश्य ही भाग लेंगे।

आपके इस कार्य के लिये हार्दिक धन्यवाद संगीता जी!

आज नेट में हिन्दी के जानकारीयुक्त अच्छे लेखों की अधिक से अधिक संख्या में जरूरत है और इस जरूरत को पूरा करने में आप सभी का सहयोग बहुत ही महत्वपूर्ण है।

नये ब्लागवाणी में बार बार लागिन करने की जरूरत नहीं है

नये साल में ब्लागवाणी ने भी अपना नया रूप पेश किया। अब नये ब्लागवाणी में यदि आपको किसी पोस्ट को पसंद करना हो तो पहले लागिन करना पड़ता है। बहुत से लोगों को परेशानी आ रही है कि उन्हें बार बार लागिन करना पड़ता है। किन्तु यह कोई बहुत बड़ी परेशानी नहीं है और इसे बहुत ही आसानी के साथ दूर किया जा सकता है। सबसे पहले ब्लागवाणी को अपने कम्प्यूटर में खोलिये और सीधे हाथ की तरफ सबसे ऊपर में "लागिन" को क्लिक करिये। क्लिक करते ही एक बॉक्स खुलता हे जिसमें आपको अपना ईमेल और पासवर्ड डालना होता है। उस बॉक्स में पासवर्ड के लिये दिये गये स्थान के नीचे लिखा होता है "मुझे याद रखना"। बस आपको इस बॉक्स को चेक कर देना है और बार बार लागिन करने की परेशानी से मुक्त हो जाना है। स्नैपशॉट देखें:

अब जब भी आप अपना कम्प्यूटर खोलेंगे, स्वयं को ब्लागवाणी में लागिन ही पायेंगे जब तक कि आप स्वयं लाग आउट नहीं होंगे तब तक आपका कम्प्यूटर आपके लागिन को याद रखेगा।

चलते-चलते

शाम का धुंधलका छा गया था और हल्की बारिश हो चुकी थी। मेकेनिकल इंजीनियर साहब की कार का पहिया पंचर हो गया। उन्होंने गाड़ी रोकी और जैक लगाकर पहिया बदला किन्तु जब पहिये को कसने के लिये नटों को देखा तो पता चला कि चारों नट ढुलक कर खो गये हैं। अब बड़े परेशान हो गये वे। माथा ठोंक लिया और उनके मुँह से निकल पड़ा, "हे भगवान! अब क्या करूँ।"

पास ही पागलखाना था जहाँ एक खिड़की पर बैठा हुआ पागल यह सब देख रहा था। उसने वहीं पर से पुकार कर कहा, "साहब! परेशान क्यों हो रहे हो? कार के बाकी तीन पहियों से एक एक नट निकाल कर चौथा पहिया कस लो। घर या गैराज तक तो पहुँच ही जाओगे।"

इंजीनियर साहब ने वैसा ही किया और खुश होकर बोले, "यार! किसने तुझे पागलखाने में भेज दिया है? भाई! तू जरा भी पागल नहीं है!!"

पागल ने गम्भीर स्वर में कहा, "नहीं साहब! पागल तो मैं हूँ, पर बेवकूफ नहीं हूँ।"

तीन देवियाँ

मैं फिल्म "तीन देवियाँ" की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं तो उन तीन देवियों की बात कर रहा हूँ जो कि नेता, साहब, थानेदार, क्लर्क, छात्र, महिलाएँ, गृहस्थ, पत्नी, मुन्ना और कुत्ता के साथ पाई जाती हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि ये बुड्ढा आज जरूर सठिया गया है तभी कुछ भी ऊल-जलूल बके जा रहा है। हो सकता है कि मैं सठिया गया होऊँ पर साहब मैं ऊल-जलूल बक नहीं रहा हूँ। मैं तो बात कर रहा हूँ जनाब स्माइल 'जगदलपुरी' की रचना "तीन देवियाँ" की। लीजिये आप भी पढ़ियेः

तीन देवियाँ

स्माइल 'जगदलपुरी'

नेता

खादी नित पहना करें, सूरत है मनहूस।
तीन देवियाँ साथ हैं, चंदा, थैली, घूस॥

साहब

रिश्वत खाकर बढ़ गया, बड़े साब का पेट।
तीन देवियाँ साथ हैं, चाय, पान सिगरेट॥

थानेदार

छात्र पुलिस संघर्ष में, टूट गई है टाँग।
तीन देवियाँ साथ हैं, व्हिस्की, गाँजा, भाँग॥

क्लर्क

बहे पसीना देह से, तनिक न आवे चैन।
तीन देवियाँ साथ हैं, फाइल, चिट्ठी, पैन॥

छात्र

पीट दिया आचार्य को, करी खोपड़ी ठूँठ।
तीन देवियाँ साथ हैं, हाकी, पत्थर, बूट॥

महिलाएँ

फिल्म देखने को चली, महिलाओं की टीम।
तीन देवियाँ साथ हैं, रूज़, पाउडर, क्रीम॥

गृहस्थ

दर्जन भर बच्चे हुये, किस्मत का है खेल।
तीन देवियाँ साथ हैं, राशन, लकड़ी, तेल॥

पत्नी

घर आने में रात को, पति हो जायें लेट।
तीन देवियाँ साथ हैं, चिमटा, बेलन, प्लेट॥

मुन्ना

भाग गये स्कूल से, देख पिता जी दंग।
तीन देवियाँ साथ हैं, मंझा, डोर, पतंग॥

कुत्ता

मेम साब को देखकर, फौरन पूँछ हिलाय,
तीन देवियाँ साथ हैं, हलवा, रोटी, चाय॥

Friday, January 8, 2010

सोच रहा हूँ कि टिप्पणियों की एक दूकान खोल ही लूँ

"क्या बात है टिप्पण्यानन्द जी? किस सोच में डूबे हुए हैं?"

"भाई लिख्खाड़ानन्द जी! क्या बतायें हाथ बहुत तंग है आज कल। कुछ कमाई-धमाई की जुगत में लगा हुआ हूँ। सोच रहा हूँ कि टिप्पणियों की एक दूकान खोल ही लूँ।"

"टिप्पणियों की दूकान?"

"हाँ भई, टिप्पणियों की दूकान! आजकल हिन्दी ब्लॉगजगत में खूब माँग है टिप्पणियों की। वहाँ पर हाल यह है कि लोग यही चाहते हैं कि पोस्ट को भले ही कोई मत पढ़े पर टिप्पणी अवश्य कर दे। होड़ मची है हमारे ब्लोगरों में अधिक से अधिक टिप्पणी पाने के लिये। करोड़ों हिन्दीभाषी इंटरनेट यूजरों के होते हुए भी हिन्दी ब्लोगों के पाठकों की संख्या मात्र कुछ सौ तक ही सीमित है इससे साफ है कि हिन्दी ब्लोगर को हिन्दी ब्लोगर लोग ही पढ़ते हैं। अब जब पाठक ही नहीं हैं तो पाठकों की संख्या को भला पोस्ट की लोकप्रियता और गुणवत्ता का पैमाना कैसे माना जाये? इसलिये टिप्पणियों की संख्या ही इस पैमाने का काम करती हैं। इसीलिये आपस में एक दूसरे के पोस्ट पर टिप्पणी करने का चलन हो गया है। यदि एक ब्लोगर ने किसी दूसरे ब्लोगर के पोस्ट पर टिप्पणी किया है तो दूसरे ब्लोगर का कर्तव्य बनता कि कि वह भी जाकर पहले ब्लोगर के पोस्ट में टिप्पणी करे। टिप्पणियाँ पाने के लिये बहुत से गुट बन गये हैं। जैसे नेता लोग भीड़ बढ़ाने के लिये रुपये देकर ट्रकों में लोगों को लाते हैं उसी प्रकार से टिप्पणियाँ पाने के लिये एक से बढ़कर एक हथकंडे अपनाये जाते हैं, लोग ईमेल और फोन कर के एक दूसरे को बताते हैं कि मेरी पोस्ट लग गई है और अब आपको टिप्पणी करना है। पर बहुत से ऐसे ब्लॉगर भी हैं जो लिखते तो बहुत अच्छे हैं पर उनके पोस्ट में टिप्पणियाँ ही नहीं आती। हम तो ऐसे ब्लोगरों को ही अपना ग्राहक बनायेंगे। जोरदार चलेगी अपनी दूकान। उचित दाम लेकर सही टिप्पणी देंगे तो भला कोई क्यों नहीं खरीदेगा हमसे टिप्पणियाँ?"

"विचार तो आपका बहुत अच्छा है! सच में खूब चलेगी आपकी दूकान। पर यह तो बताइये कि आपने ऐसे कैसे कह दिया कि लोग यही चाहते हैं कि पोस्ट को भले ही कोई मत पढ़े पर टिप्पणी अवश्य कर दे?"

"अरे आप किसी पोस्ट और उसकी टिप्पणियों को पढ़ कर तो देखिये! आप को खुद पता चल जायेगा कि हमने ऐसा क्यों कहा। पोस्ट गम्भीर है तो उसमें टिप्पणी हँसी-मजाक और नोंक-झोंक वाली मिलेंगी। ऐसी टिप्पणियाँ मिलेंगी जिनका पोस्ट के विषय से दूर-दूर का भी कोई सम्बन्ध नहीं है। तो ऐसी टिप्पणी पोस्ट को पढ़ने के बाद तो नहीं की जा सकती ना? और यदि पोस्ट को पढ़ने के बाद की गई होंगी तो स्पष्ट है कि टिप्पणी करने वाला या तो गम्भीर पोस्ट लिखने वाले की खिल्ली उड़ाना चाहता है या फिर उसे नीचा दिखा कर उसका कद छोटा कर देना चाहता है। भाई टिप्पणी करके किसी का सहयोग करने का यह अर्थ तो नहीं है ना कि हमारे ही सहयोग से सामने वाले का कद हमसे भी ज्यादा ऊँचा हो जाये?

"अच्छा अब यह बताइये कि रेट क्या रखेंगे आप टिप्पणियों के?"

"रेट तो टिप्पणी की क्वालिटी के अनुसार रखेंगे। "nice", "वाह! वाह!!", "बेहतरीन!", "बहुत सुन्दर!", "क्या खूब!" जैसी एक दो शब्दों वाली टिप्पणियों के रेट रहेंगे मात्र दस रुपये प्रति टिप्पणी! "गहरी बात कह गये!", "बहुत अच्छा लिखा है!" जैसी एक वाक्य वाली टिप्पणियों के रेट होंगे बीस रुपये प्रति टिप्पणी!"

"इतने कम रेट टिप्पण्यानन्द जी? भाई माना कि ये टिप्पणियाँ छोटी हैं पर लोगों के ब्लोग में जाने और टिप्पणी करने में समय तो लगता ही है। इतना अधिक समय गवाँ कर इतने सस्ते में कैसे टिप्पणियाँ बेच पायेंगे आप?"

"दिक्कत की कोई बात नहीं है लिख्खाड़ानन्द जी! हमें कौन सा किसी ब्लॉग में जाना है, पोस्ट को पढ़ना है और टिप्पणी करना है? ऐसी टिप्पणियों के लिये ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर आती है ना, बस वही खरीद लेंगे। एक बार उसमें टिप्पणियों और ब्लोगों के यूआरएल को फीड भर कर देना है। फिर तो अपने आप ही टिप्पणियाँ होती रहेंगी। हाँ टिप्पणी खरीदने वाले के लिये शर्त सिर्फ यही रहेगी कि कम से कम एक हजार रुपये की टिप्पणी खरीदना होगा उसे, क्योंकि मात्र पाँच दस टिप्पणियों के लिये तो हम ऑटोमेटेड साफ्टवेयर में बार बार ब्लोगों के यूआरएल तो बदलने से रहे।"

"वाह! तब तो खूब कमाई होगी आपकी!"

"बिल्कुल होगी जी! और फिर किसी की टाँगें खींचने, गाली गलौज करने जैसी स्पेशल टिप्पणियाँ करवाने वाले भी बहुत लोग मिलेंगे। इस प्रकार की स्पेशल टिप्पणियों के रेट भी स्पेशल रखेंगे हम। हमारे नियम के अनुसार टिप्पणियों के दाम मिल जाने के बाद चौबीस घंटे के भीतर टिप्पणियाँ की जायेंगी और यदि कोई तुरन्त टिप्पणी करवाना चाहेगा तो फिर अर्जेंट चार्जेस अलग लगेंगे।"

"अच्छा यदि कोई लंबी टिप्पणी खरीदना चाहे तो?"

"तब तो उनके रेट भी तगड़े रहेंगे, कम से कम एक हजार रुपये प्रति टिप्पणी क्योंकि ऐसी टिप्पणियों के लिये तो ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर से तो काम लिया नहीं जा सकता, खुद ब्लोग में जाकर पोस्ट को पढ़ना पड़ेगा।"

"तो चलिये जल्दी खोलिये अपनी टिप्पणियों की दूकान। हम भी कुछ टिप्पणियाँ खरीद लिया करेंगे आपसे।"

"अरे आपको भला टिप्पणियाँ खरीदने की क्या क्या जरूरत है, आप तो महान और धुरन्धर लिख्खाड़ हैं! लोग तो आपके पोस्ट का इंतजार करते बैठे रहते हैं। इधर पोस्ट प्रकाशित हुई नहीं कि टिप्पणियाँ आनी चालू हो जाती हैं।"

"हाँ भाई, टिप्पणियाँ तो खूब मिल जाती हैं हमें! पर ऐसे ही थोड़े मिल जाती हैं हमें ये टिप्पणियाँ। खूब मेहनत करनी पड़ती है हमें इनके लिये। हजारों ब्लोगों में जा जा कर टिप्पणी करते हैं हम तब कहीं जाकर सौ-पचास टिप्पणी मिल पाती है। हाँ तो हम कह रहे थे कि टिप्पणियाँ तो जरूर खरीदेंगे हम आपसे। टिप्पणियाँ जितनी अधिक मिले उतना ही ज्यादा अच्छा होता है।"

"फिर तो लिख्खाड़ानन्द जी हम भी आपके लिये डिस्काउंटेड रेट लगायेंगे। आखिर आप हमारे मित्र जो हैं।"

"तो कब खुल रही है आपकी टिप्पणियों की दूकान?"

"बहुत ही जल्दी! ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर के लिये ऑर्डर दे रखा है। बस सॉफ्टवेयर आई कि दूकान खुली।"


(मेरे लिये हर्ष की बात है कि यह धान के देश में ब्लोग का 401वाँ पोस्ट है!)

 
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