Wednesday, March 31, 2010

डॉ. जमालगोटा का करम खोटा... बन गया वो बिन पेंदी का लोटा

अब डॉ. जमालगोटा का करम ही खोटा है तो भला कोई क्या कर सकता है? ये जहाँ भी जाते हैं गाली ही खाते हैं। पर बड़ी मोटी चमड़ी है इनकी, इसीलिये गाली खाकर भी मुस्कुराते हैं। पहले ये हकीमी करते थे किन्तु "नीम हकीम खतरा-ए-जान" समझकर कोई इनसे इलाज ही नहीं करवाता था। परेशान होकर इन्होंने डॉ. नाईक को अपना उस्ताद बना लिया और उस्ताद ने इनके नाम के साथ "डॉ." का तमगा लगा दिया।

एक बार इन्होंने एक मरीज को, अपने नाम के अनुरूप, जमालगोटा खिला दिया। मरीज की हालत बिगड़ गई तो गिरी जी ने गुस्से में आकर इन्हें जमीन पर गिरा दिया और अवध्य बाबू ने इनका कपड़ा फाड़ डाला। इस घटना के बाद ये पागल हो गये और इनके दिमाग का ऑपरेशन करवाया गया। ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर ने इन्हे ठीक करने के लिये इनके दिमाग में बहुत सारे गन्दगी के कीड़े भर दिये। तभी से इनके दिमाग से सिर्फ गंदे विचार ही निकलते हैं।

दिमाग का ऑपरेशन हो जाने के बाद ये पूरे पागल की जगह अब नीम पागल हो गये हैं पर स्वयं को बहुत बड़ा तालीमयाफ्ता और ब्रह्मज्ञानी समझते हैं। लोगों को जबरन ज्ञान बाँटते फिरते हैं। बिन पेंदी के लोटे के जैसे कभी वेद की तरफ लुढ़कते हैं तो कभी कुरआन की तरफ, कभी गायत्री का गान करते हैं तो कभी काबा की तरीफ करने लग जाते हैं। बिन पेंदी का यह लोटा सदा गंदे नाले की गंदगी से आधा भरा रहता है और आप तो जानते ही हैं कि "अधजल गगरी छलकत जाय"। इस लोटे से गंदगी हमेशा छलकती ही रहती है।

पर गिरी जी और अवध्य बाबू जब भी इन्हें दिखाई पड़ जाते हैं, इनका सारा ज्ञान घुसड़ जाता है और नीम पागल की जगह फिर से पूरे पागल बन कर अनाप शनाप बकने लगते हैं। गिरी और अवध्य बाबू इनके लिये लाइलाज बीमारी बन गये हैं जिसका इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं हैं। अब क्या करें ये बेचारे जमालगोटा साहब? सिर्फ अपने करम को कोसते रहते हैं। चलनी  में दूध दुहने वाला करम को कोसने के सिवाय और कर ही क्या सकता है?

अन्त में हम इतना ही लिखना चाहेंगे मित्रों कि न तो हमारे संस्कार इस प्रकार के लेखन की हमें इजाजत देते हैं और न ही ऐसा लेखन हमें शोभा देता है। हम यह भी जानते हैं कि गंदगी में ढेला मारने से छींटे अपने आप पर ही आते हैं। किन्तु हम इतने कायर भी नहीं हैं कि चुपचाप आतताई को सहन कर लें। अन्याय करना जितना बड़ा अपराध है, अन्याय सहना उससे भी बड़ा अपराध है। इसीलिये कभी-कभी "जिन मोहे मारा ते मैं मारे" वाले अंदाज में भी आना पड़ता है, ईंट का जवाब पत्थर से देना ही पड़ता है।

Tuesday, March 30, 2010

कहाँ गई आत्मा?


इधर कई सालों से मैंने आत्मा को नहीं देखा है; क्या आपने देखा है उसे?

नेता हैं पर जनता का ही रक्त चूस रहे हैं और राष्ट्र तक को बेच खा रहे हैं। कहाँ गई उनकी आत्मा?

व्यापारी है किन्तु व्यापार के नाम से ग्राहकों को लूट रहे हैं; उचित मुनाफा लेकर जीवनयापन करने के बदले ग्राहकों को लूट-लूट कर तिजोरी भरना ही उनका उद्देश्य बन गया है? कहाँ गई उनकी आत्मा?

चिकित्सक हैं किन्तु सिर्फ उन्हीं की चिकित्सा करते हैं जो बदले में मोटी रकम दे सके; गरीब चिकित्सा के बिना मर रहे हैं। कहाँ गई उनकी आत्मा?

शिक्षा संस्थान हैं किन्तु विद्या का दान नहीं व्यापार कर रहे हैं। कहाँ गई उनकी आत्मा?

संगीत है किन्तु मेलॉडी नहीं है; शोर-शराबा संगीत ही का पर्याय बन गया है। कहाँ गई संगीत की आत्मा?

कविताएँ हैं किन्तु काव्यात्मक विकलता नहीं है; क्रौञ्च वध से उत्पन्न करुणा नहीं है। कहाँ गई कविता की आत्मा?

कहाँ गई आत्मा?

क्या आत्मा मर चुकी है?

Monday, March 29, 2010

जो तोको काँटा बुवै ताहि बोउ तू भाला

प्रतिशोध ...

अर्थात् बदला ...

संसार में भला ऐसा कौन है जिसके भीतर कभी बदले की भावना न उपजी हो? मनुष्य तो क्या पशु-पक्षी तक के भीतर बदले की भावना उपजती है। यही कारण है कि कुत्ता तक कुत्ते पर और कभी कभी इन्सान पर भी गुर्राने लगता है।

बड़े-बड़े ऋषि-मुनि तक प्रतिशोध की भावना से मुक्त नहीं रह पाये हैं। विश्वमोहिनी की आसक्ति में डूबे हुए देवर्षि नारद तक ने भी भगवान विष्णु से बदला लेने के लिये उन्हें शाप दे डाला। फिर भला हम जैसे तुच्छ जन की औकात ही क्या है जो इस भावना से मुक्त रह पायें।

जिस प्रकार से किसी का किसी के प्रति प्रेम दूसरे के भीतर प्रेम उपजाता है उसी प्रकार से किसी का किसी दूसरे के प्रति बदले की भावना दूसरे के भीतर भी बदले की भावना ही उपजाती है। रावण ने बदले की भावना से सीता का हरण किया तो राम के भीतर भी उससे बदला लेने की भावना ही उत्पन्न हुई और उन्होंने रावण का वध कर डाला।

बदले की भावना के मूल में बैर होता है और बैर के मूल में क्रोध। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कहा है "बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है"। यह बैर ही प्राणी को बदला लेने के लिये उकसाता है। बदले की भावना का आरम्भ सामने वाले को उकसाने से होता है और अन्त उसे कुण्ठाग्रस्त करने से। मनोविज्ञान में इस भावना की व्याख्या अंग्रेजी के चार शब्दों के द्वारा की जाती है - Provocation (अर्थात उकसाना), Irritation (अर्थात जलाना), Aggravation (अर्थात गम्भीर करना) और Frustration (अर्थात कुण्ठाग्रस्त करना)। अंग्रेजी के इन चारों शब्दों का आपस में बहुत ही गहरा सम्बन्ध होता है।

यह केवल बदले की भावना ही रही होगी जिसने कवि को लिखने के लिये प्रेरित कर दिया होगा किः

जो तोको काँटा बुवै ताहि बोउ तू फूल।
तोको फूल को फूल है वाको है तिरसूल॥

किन्तु
आजकल लोगों ने इस दोहे का बदल डाला है और इसे इस प्रकार से कहते हैं:

जो तोको काँटा बुवै ताहि बोउ तू भाला।
बन जा बदले के लिये आफत का परकाला॥

उपरोक्त
पहले दोहे में बदला लेने के लिये विवेक के प्रयोग पर जोर दिया गया है जबकि दूसरे दोहे में विवेक को ताक में रख देने की सलाह दी गई है। समय समय पर दोनों ही प्रकार से काम लेना पड़ता है। विवेक कहता है कि बदला लेने के लिये धैर्य आवश्यक है। धैर्य के साथ चुप बैठकर देखने से बहुत ही जल्दी पता चल जाता है कि बड़े-बड़े महापण्डित, जो कि वैदिक शिक्षा देते फिरते हैं, का महाज्ञान "धान पान" में बदल जाता है और वे सिर्फ "मे में" करके मिमियाने लगते हैं। किन्तु यह भी सही है कि कुत्ते की पूँछ को बारह साल तक भी पोंगली में रखो पर पोंगली से निकालने के बाद वह रहता है टेढ़ा का टेढ़ा ही। ऐसे कुत्ते की पूँछ जैसे लोगों के लिये उपरोक्त दूसरा दोहा ही उपयुक्त है क्योंकि उन्हें अच्छी शिक्षा देना भैंस के सामने बीन बजाना ही साबित होता है। लात के भूत क्या कभी बात से मानते हैं?

Saturday, March 27, 2010

कुत्ते का भी अपना एक दिन आता है

अंग्रेजी कहावत है कि Every dog has its day याने कि "कुत्ते का भी अपना एक दिन आता है"। इसी को हिन्दी मुहावरे के रूप में कहते हैं - "घूरे के भी दिन बदलते हैं"। कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो इसी बात को ध्यान में रख सोचने लगते हैं कि क्या हुआ जो कल तक हमें किसी ने नहीं पूछा, पर आज अब अपना दिन आ गया है और फिर बड़ी बड़ी बातें करके लोगों पर अपनी विद्वता का रोब झाड़ना शुरु कर देते हैं।

किन्तु इनका ज्ञान बाँटना Empty vessels make most noise/sound याने कि "खाली बर्तन अधिक आवाज करते हैं", जिसे "अधजल गगरी छलकत जाय" भी कहा जाता है, जैसा ही होता है क्योंकि इनके पास अपनी बुद्धि न होकर सिर्फ सिखाई गई बुद्धि ही होती है। छत्तीसगढ़ी में मुहावरा है "सिखोवन बुद्धि उपजारन माया" अर्थात् सिखाई गई बुद्धि और उपजाई गई माया काम नहीं करती। किन्तु ये अपने आदत से मजबूर होते हैं और लोगों को मूर्ख बनाने के अपने प्रयास में लगे ही रहते हैं।

लोग भी जानते हैं कि Fool me once, shame on you. Fool me twice, shame on me याने कि "यदि तुमने मुझे एक बार मूर्ख बनाया तो यह तुम्हारे लिये लज्जाजनक है किन्तु तुमने मुझे दो बार मूर्ख बनाया तो वह मेरे लिये लज्जाजनक है" और वे तैश में आकर उन्हें लात मारने पर उतारू हो जाते हैं। वैसे Even a dog can distinguish between being stumbled over and being kicked याने कि "ठोकर लगने और लात खाने में क्या अन्तर है यह एक कुत्ता भी जानता है" पर ये लोग इस अन्तर को समझ कर भी नहीं समझते और पूरी तल्लीनता के साथ लगे ही रहते हैं अपने काम में। धन्य हैं ऐसे लोग!

Friday, March 26, 2010

सपनों के बारे में कुछ विस्मयकारी तथ्य ... अंधे भी सपने देखते हैं

अंधे भी सपने देखते हैं

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि अंधे लोग भी सपने देखते हैं। वे लोग, जो जन्म से अंधे नहीं होते, अपने सपनों में चित्र, प्रतिबिंब, छाया आदि देख सकते हैं किन्तु जन्मांध लोग आंख को छोड़ कर अन्य इंद्रियों के क्रियाकलाप से सम्बन्धित विषयों जैसे कि ध्वनि, गंध, स्पर्श आदि से सम्बद्ध सपने देखते हैं। वास्तव में आदमी सपनों में अपने चेतन तथा अचेतन में उभरी कल्पनाओं को साकार होते देखता है।

लोग 90% सपनों को भूल जाते हैं

जागने के 5 मिनट के भीतर ही आदमी अपने द्वारा देखे गये आधे सपनों को भूल जाता है और 10 मिनट के भीतर 90% सपनों को।

प्रत्येक व्यक्ति सपने देखता है

अन्वेषणों से यह सिद्ध हो चुका है कि प्रत्येक व्यक्ति सपने देखता है (कुछ चरम मनोवैज्ञानिक रोगों के प्रकरण वाले व्यक्ति इसके अपवाद हो सकते हैं)। पुरषों और महिलाओं के द्वारा देखे गये सपने अलग अलग प्रकार के होते हैं और उन पर उनकी भौतिक प्रतिक्रियाएँ भी अलग अलग होती हैं। जहाँ पुरूषों का झुकाव अधिकतर अन्य परुषों से सम्बन्धित सपने देखने में होता है वहीं महिलाओं का झुकाव अधिकतर अन्य महिलाएँ तथा अन्य परुषों दोनों से सम्बन्धित सपने देखने में होता है।

सपने मनोविकृति से बचाव करते हैं

मनोवैज्ञनिक परीक्षणों के दौरान कुछ विद्यार्थियों को सपने देखते समय जगा दिया गया और कुछ देर के बाद उन्हें अपनी नींद पूरी करने के लिये फिर से सोने दिया गया। इस परीक्षण के परिणाम से पता चला कि सपने के पूरे न हो पाने की वजह से वे विद्यार्थी ध्यान केन्द्रित करने में असमर्थता, चिड़चिड़ापन जैसी मनोविकृतियों के अस्थाई रूप से शिकार हो गये। इससे सिद्ध होता है कि सपने मानसिक विकृतियों से बचाव करते हैं।

सपने में हम उन्हें ही देखते हैं जिन्हें हम जानते हैं

हमें ऐसा लगता है कि सपनों में हम बहुत से अपरिचित चेहरों को देखते हैं किन्तु आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि उन सारे चेहरों को हमने अपने जीवन में कभी न कभी देखा होता है किन्तु भूल चुके होते हैं। हो सकता है कि जिस व्यक्ति को बचपन में कभी आपने रिक्शा चलाते हुये देखा हो वही व्यक्ति कल आपके सपने में ड़रावना रूप ले कर हत्यारे के रूप में आया हो। जीवन में हम हजारों-लाखों लोगों को देखते हैं और भूल जाते हैं इसलिये हमारे सपनों में आने वाले चरित्रों में कभी कमी नहीं आती।

सभी लोग रंगीन सपने नहीं देख सकते

अन्वेषणों से सिद्ध हो चुका है कि 12% लोग सिर्फ श्वेत-श्याम रंगों में ही सपने देखते हैं, वे कभी रंगीन सपने देख ही नहीं सकते। प्रायः लोगों का झुकाव स्कूल जाने, स्वयं का पीछा किये जाने, किसी स्थान में टहलने, कार्यालय में देर से जाने, किसी जीवित व्यक्ति की मृत्यु, दांत टूटने, परीक्षा में फेल हो जाने, आसमान में उड़ने जैसे सामान्य प्रसंगों के सपने देखने में होता है। इस बात की जानकारी अभी तक नहीं हो पाई है कि रंगीन सपनों का प्रभाव अधिक होता है या श्वेत-श्याम सपनों का।

सपने किसी विषय के होते हैं और हम उन्हें किसी और विषय का समझते हैं

प्रायः सपनों को हम जिस विषय का समझते हैं वे उस विषय के नहीं होते। वास्तव में सपने सांकेतिक भाषा बोलते हैं। हमारा अचेतन मन उस सांकेतिक भाषा वाले सपने की तुलना किसी न किसी वस्तु से करने लगता है। यह तुलना ठीक उस प्रकार की होती है जैसे कोई कवि अपनी कविता में लिखे कि चीटियाँ अनवरत क्रियाशील रहती हैं अतः वे एक मशीन हैं।

सिगरेट तम्बाखू की लत छोड़ने वालों को अधिक भड़कीले सपने दिखाई देने लगते हैं

एक विस्मयकारी तथ्य यह भी है कि यदि व्यक्ति अपने लंबे समय से लगे सिगरेट तम्बाखू के लत को छोड़ दे तो उसे सामान्य से अधिक भड़कीले सपने दिखाई देने लगते हैं। असामान्य मनोविज्ञान से सम्बन्धित एक पत्रिका के अनुसार लत छोड़े हुये 33% लोग लत छोड़ने के 1 से 4 सप्ताह तक अपने लत को पूरा करने तथा किसी के द्वारा पकड़े जाने एवं स्वयं में अपराधबोध होने का सपना देखते हैं।

ये तो हुये सपनों के विषय में विस्मयकारी मनोवैज्ञानिक तथ्य किन्तु कुछ प्रचलित धारणाएँ भी हैं जो कि मनोवैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं है जैसे कि सपनों में मिले संकेतों का अर्थ होना, भोर के सपनों का सत्य होना आदि।

Thursday, March 25, 2010

कितना हित हो रहा है हिन्दी का हिन्दी ब्लोगिंग से?

माना कि हिन्दी ब्लोगिंग अभी भी अपने शैशव काल में हैं लेकिन यह भी सही है कि इसे शुरू हुए एक अच्छा खासा-समय भी बीत चुका है और इस अन्तराल में हजारों की संख्या में हिन्दी पोस्ट आ चुके हैं। पर इन पोस्टों में कितने पोस्ट ऐसे हैं जिनमें हिन्दी ब्लोगिंग से अनजान लोग, नेट में कुछ खोजते-खोजते, आते हैं? क्या कोई पोस्ट कालजयी बन पाया है?

ऐसा लगता है कि जिस प्रकार से लोकतन्त्र "जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन है", उसी प्रकार से हिन्दी ब्लोगिंग "ब्लोगरों द्वारा, ब्लोगरों के लिए, ब्लोगरों की ब्लोगिंग है"। जैसे लोकतन्त्र में कोई राष्ट्र के हित के लिये नहीं सोचता वैसे ही हिन्दी ब्लोगिंग में कोई हिन्दी के हित के लिये नहीं सोचता। लोकतन्त्र नेतागिरी कर के पैसे पीटने के लिये है और हिन्दी ब्लोगिंग अधिक से अधिक संख्या मे टिप्पणी बटोरकर आत्म-तुष्टि के लिये है।

हमारे पोस्ट की अधिकतम उम्र उतनी ही होती है जब तक वह लोकप्रिय संकलकों में दिखाई देता है याने कि मात्र चौबीस घंटे की!

जरा हृदय पर हाथ रख कर सोचें कि हम क्या दे रहे हैं हिन्दीभाषी लोगों को? क्या स्तर है हमारे लेखन का? क्या हमारे लेखन से हिन्दी "सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय" वाली भाषा बन कर नेट में एकछत्र राज्य करने लायक बन पायेगी?

मैं उपरोक्त बातों को कई बार कह चुका हूँ (और भविष्य में भी कहता ही रहूँगा), कभी व्यंगात्मक लहजे में तो कभी रो-धो कर। मैं जानता हूँ कि मेरे इन पोस्ट को पढ़कर प्रायः लोग यह सोचते हैं कि यह तो दूसरों को नीचा दिखाने के लिये और स्वयं को हिन्दी का बहुत बड़ा हितचिन्तक बताने के लिये ऐसा लिखता रहता है। किन्तु मैं बार-बार इस मुद्दे को सिर्फ इसलिये उछालते रहता हूँ कि कोई तो मेरे व्यंग से तिलमिला कर या मेरे रुदन पर तरस खाकर यह सोचने लगे कि बुढ्ढे की बात कुछ तो सही है और ऐसा सोचकर ही आत्म-तुष्टि की भावना को त्याग कर हिन्दी के हित के लिए कुछ करने की ठान ले।

मेरे विषय में यदि कोई गलत राय बना भी लेता है तो क्या फर्क पड़ना है मुझे उससे?

पर मुझे पढ़ कर यदि कोई हिन्दी के हित के लिये जूझने के लिये तत्पर हो जाता है तो मुझे अवश्य ही बहुत फर्क पड़ेगा, सफलता प्राप्त करके भला किसे फर्क नहीं पड़ता?

Wednesday, March 24, 2010

उपजा जब ग्याना प्रभु मुसकाना ... प्रभु की यह मुस्कान ही तो माया है

रामनवमी पर विशेष

राम ...

दो अक्षरों का एक ऐसा नाम जिस पर संसार का प्रत्येक हिन्दू की अथाह श्रद्धा है। राम हिन्दुओं के आराध्य देव हैं और राम का नाम उनके लिये भवसागर से मुक्ति देने वाला मन्त्र है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में राम के नाम को महामन्त्र बताते हुए कहा है "महामंत्र जोइ जपत महेसू"

राम साक्षात् ब्रह्म के अवतार हैं। ब्रह्म और माया एक दूसरे के पूरक हैं। विशुद्ध ज्ञान ही ब्रह्म है और सांसारिक मोह ही माया है। कृपालु भगवान जिस किसी के समक्ष प्रकट होते हैं तो वह विशुद्ध ज्ञान से परिपूरित हो जाता है और माया से मुक्त हो जाता है इसीलिये जब श्री राम माता कौसल्या के समक्ष प्रकट हुए तो उनके भीतर विशुद्ध ज्ञान उत्पन्न हो गया और वे कहने लगीं:

ब्रह्माण्ड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति प्रति बेद कहै।

अर्थात् हे नाथ! वेद कहते हैं कि आपके प्रत्येक रोम में माया के रचते हुए अनेकों ब्रह्माण्डों के समूह हैं।

प्रभु के दर्शन से उत्पन्न माता कौसल्या का यह विशुद्ध ज्ञान प्रभु की लीला में बाधक बन रहा था। इस ज्ञान के कारण ही माता कौसल्या प्रभु को अपना पुत्र मानने के लिये तैयार नहीं हो पा रही थीं अतः प्रभु के लिये उन्हें मोहबन्धन बाँधना आवश्यक हो गया और मुसका दियेः

उपजा जब ग्याना प्रभु मुसकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।

प्रभु की इस मुसकान में ही माया का वास है अतः माता कौसल्या मोह के बन्धन में बँध गईं और उनका ज्ञान लुप्त हो गया। और वे कहने लगीं:

माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥

अर्थात् माता की मति डोल गई और बोलीं, "हे तात्! यह रूप छोड़कर अत्यन्त प्रिय तथा अनुपम सुख प्रदान करने वाली बाललीला कीजिये।

आज राम जन्मोत्सव के विशिष्ट अवसर पर आप सभी को रामनवमी पर्व की शुभकामनाएँ!

Tuesday, March 23, 2010

क्या आपने SMS जोक्स पढ़े हैं?

मोबाइल सेवा के अन्तर्गत् आपके मनोरंजन के लिये एक सुविधा होती है SMS से Jokes याने लतीफे प्राप्त करना। इस सेवा को प्राप्त करने के लिये आपको प्रति माह एक निश्चित राशि का भुगतान करना पड़ता है। क्या कभी आपने कभी पढ़ा है इन लतीफों को? अभद्र भाषा में ऐसे अश्लील लतीफे होते हैं कि तौबा तौबा! पर धड़ल्ले के साथ यह सेवा चल रही है। और क्यों न चले भाई? इन्सान मूलतः आखिरकार एक जानवर ही तो है जिसे हिंसा और अश्लीलता हमेशा लुभाती है। तो लोगों के इस लोभ का फायदा क्यों नहीं उठाया जा सकता?

और सबसे मजे की बात तो यह है कि ये अश्लील लतीफे जहाँ आपके मोबाइल सेट में आते हैं वहीं आपके बेटे-बेटियों के भी मोबाइल सेट में आते हैं क्योंकि इन लतीफों के जितने शौकीन आप हैं उतने ही शौकीन आपके बेटे-बेटियाँ भी हैं। इन्हें आप अपने मित्रों को सुना-सुना कर आनन्द लेते हैं और आपके बेटे-बेटियाँ अपने दोस्त-यारों को! वाह! कितनी सुन्दर बनते जा रही है हमारी भारतीय संस्कृति!

मोबाइल सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों का यह काम किसी को भी अवैधानिक नहीं लगता। क्या सरकार को इस प्रकार से गैरकानूनी रूप से अभद्रता और अश्लीलता फैलाने के बारे में जानकारी नहीं है? या मोबाइल सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों को इससे होने वाले मोटे मुनाफे की रकम सरकार चलाने वालों को भी मिलती है? क्या देश की युवा सोच को इस प्रकार से वासना में डुबो देना उचित है?

Monday, March 22, 2010

जो जलाता है किसी को खुद भी जलता है जरूर ..

ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं होगा जो कभी किसी से जला न हो। वह मुझसे आगे बढ़ गया, बस हो गई जलन शुरू। मैं जिस वस्तु की चाह रखता हूँ वह किसी और को प्राप्त हो गई और मेरा उससे जलना शुरू हो गया। कई बार तो लोग दूसरों से सिर्फ इसीलिये जलते हैं वे अधिक सुखी क्यों हैं। पर जो अधिक सुखी हैं वे भी अपने से अधिक सुखी से जलते हैं।

विचित्र भावना है यह जलन अर्थात् ईर्ष्या भी! आमतौर पर जलन की यह भावना असुरक्षा, भय, नकारात्मक विचारों आदि के कारण उत्पन्न होती है। क्रोध और उदासी ईर्ष्या के मित्र हैं और इसके उत्पन्न होते ही इसके साथ आ जुड़ते हैं। ये क्रोध और उदासी फिर आदमी को भड़काने लगते हैं कि तू अकेला क्यों जले? तू जिससे जल रहा है उसे भी जला। और आदमी शुरु कर देता है दूसरों को जलाना। किसी शायर ने ठीक ही कहा हैः

जो जलाता है किसी को खुद भी जलता है जरूर
शम्मा भी जलती रही परवाना जल जाने के बाद

इस ईर्ष्या के अलावा जलने और जलाने के और भी अर्थ होते हैं। चारों ओर यदि सिर्फ अन्धकार हो तो हमारी आँखें किस काम की हैं? छोटा सा दिया स्वयं जलकर हमें रात्रि के अन्धकार से निजात दिलाता है। दीपक की छोटी सी टिमटिमाहट रात्रि के गहन तम का नाश कर देती है।

किसी फिल्म के गीत की सुन्दर पंक्तियाँ याद आ रही हैं:

जगत भर की रोशनी के लिये
हजारों की जिन्दगी के लिये
सूरज रे जलते रहना ...

सूरज भी स्वयं जलकर हमारा कल्याण करता है।

जलने-जलाने की बात हो और अग्नि की चर्चा न हो तो बात ही अधूरी रह जाती है। अग्नि के बिना हमारा गुजारा ही नहीं हो सकता। अग्नि न हो तो खाना कैसे पके? अग्नि में हविष्य की आहुति देकर ही मानवकल्याण हेतु हवन किये जाते हैं। अग्नि को देवता माना गया है। ज्वलन, पावक, अनल, धनञ्जय, शुक्र, चित्रभानु आदि अग्नि के अन्य नाम हैं। संस्कृत में तो अग्नि के और भी बहुत सारे नाम हैं जिनमें से कुछ हैं:

वैश्वानर,वह्नि, वीतिहोत्र, कृपीटयोनि, जातवेराः, तनूनपाद्, वर्हिःशुष्मा, शोचिष्केश, उपबुर्ध, आश्रयाश, वृहद्भानु, कृशानु, लोहिताश्व, वायुजशख, शिखावान्, आशुशुक्षणि, हिरण्यरेताः, हुतभुग्, दहन, हव्यवाहन, सप्तार्चि, दमुनाः, विभावसु, शुचि और अप्पित्त

तो हम यदि ईर्ष्या की आग में जलेंगे तो स्वयं के साथ-साथ दूसरों का भी अहित ही करेंगे किन्तु हम यदि सूर्य और दीपक की भाँति जलें तो बहुत से लोगों का कल्याण कर सकते हैं।

Sunday, March 21, 2010

केक नहीं काट रहे ललित जी आज अपने जन्म दिन पर

जन्मदिन में केक काटना क्या जरूरी है? क्या हमारी यही प्रथा रही है?

ये प्रश्न मेरे मन में इसलिये उठे क्योंकि आज मेरे प्रिय मित्र ललित शर्मा जी का जन्मदिन है। मोबाइल लगाकर बधाई देने के बाद मैंने उनसे कहा कि मैं आ रहा हूँ अभनपुर आपके जन्मदिन के जश्न में शामिल होने के लिये। वे सहर्ष बोले कि आ जाइये, केक आपका इंतजार कर रहा है। इस पर मैंने कह दिया कि भाई मैं न तो कोई उपहार दूँगा और न ही केक खाउँगा। मैं तो बस बड़े खाउँगा वो भी उड़द दाल के और उपहार के बदले सिर्फ अपना स्नेह और आशीर्वाद ही दूँगा।

हमारे छत्तीसगढ़ में किसी के जन्मदिन मनाने के लिये आँगन में चौक पूरा (रंगोली डाला) जाता था, सोहारी-बरा (पूड़ी और बड़ा) बनाये जाते थे। बड़े उड़द दाल के होते थे, हाँ स्वाद बढ़ाने के लिये थोड़ा सा मूँगदाल भी मिला दिया जाता था। सगे-सम्बन्धियों तथा मित्र-परिचितों को निमन्त्रित किया जाता था। जिसका जन्मदिन होता था उसे टीका-रोली आदि लगाकर उसकी आरती उतारी जाती थी। वह स्वयं अपने से बड़ों के पैर छूता था और उससे कम उम्र वाले उसके पैर छूते थे। फिर प्रेम के साथ खा-पीकर खुशी-खुशी सभी विदा लेते थे। न कोई भेटं न कोई उपहार, भेंट-उपहार की प्रथा ही नहीं थी।

जब मैंने ललित जी को अपने छत्तीसगढ़ के उपरोक्त प्रथा की याद दिलाई तो वे आज इसी प्रथा के अनुसार अपना जन्मदिन मनाने के लिये राजी हो गये। ललित जी से मेरा परिचय मात्र तीन-चार माह ही पुरानी है, पिछले दिसम्बर में पहली मुलाकात हुई थी मेरी उनसे। पर आज लगता है कि हमारी जान-पहचान बरसों पुरानी है। उम्र में लगभग उन्नीस साल छोटे हैं वे हमसे किन्तु हमारे बीच उम्र की यह दूरी कभी बाधा नहीं बनी। बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं ललित जी। छत्तीसगढ़ी, हिन्दी के साथ साथ पंजाबी, हरयाणवी आदि अनेक भाषाओं पर अधिकार रखते हैं। संस्कृत का गहन अध्ययन किया है उन्होंने। साहित्य-सृजन में तो सानी नहीं है उनका, अपने लेखन से चारों ओर अपने प्रदेश छत्तीसगढ़ और अपने देश भारत का परचम फहरा रहे हैं। फोटोग्राफी और कम्प्यूटर ग्राफिक्स में महारत हासिल है सो अलग।

आज उनके जन्मदिन के शुभ अवसर पर मैं उनके दीर्घायु की कामना करता हूँ।

हम ... याने कि धोबी का गधा घर का ना घाट का

एक बार इस हिन्दी ब्लोगिंग में क्या घुस गये कि लत लग गई इसकी और इसने हमें "धोबी का गधा घर का ना घाट का" बना कर रख दिया। अंग्रेजी ब्लोगिंग करते थे तो जहाँ एडसेंस से चेक मिलता था वहीं क्लिक बैंक के प्रोडक्ट बिकने पर कमीशन की रकम सीधे हमारे बैंक खाते में जमा हो जाया करती थी। अंग्रेजी ब्लोगिंग का मतलब ही है "आम के आम और गुठलियों के दाम"। तो हम बता रहे थे कि हमारे साथ तो वही मिसल हो गई कि "कौवा चला हंस की चाल, भूल गया अपनी भी चाल"। बड़े लोगों ने ठीक ही कहा है कि "जब गीदड़ की मौत आती है तो शहर की ओर भागता है"। हम भी अंग्रेजी ब्लोगगिंग के जंगल को छोड़ कर हिन्दी ब्लोगिंग के शहर में चले आये। "चौबे जी आये थे छब्बे बनने और दुबे बन कर रह गये"

कमाई-धमाई तो खतम ही हो गई ऊपर से नेट का बिल अलग से पटाना पड़ रहा है।इसी को कहते हैं "धन जाये और धर्मो का नाश"। पर किसी को क्या दोष दें, हम खुद ही तो "आ बैल मुझे मार" जैसे यहाँ आये थे। लगता है कि यह हिन्दी ब्लोगिंग अब हमारे लिये "आई है जान के साथ, जायेगी जनाजे के साथ" बनकर रह गई है। लाख सोचते हैं कि आज नहीं तो कल इस हिन्दी ब्लोगिंग से कमाई होनी शुरू हो जायेगी पर लगता है "इन तिलों में तेल ही नहीं है"। हिन्दी ब्लोगिंग से कमाई तो करमहीन की खेती है, कहते हैं ना "करमहीन खेती करे, बैल मरे या सूखा पड़े"। कमाई तो पाठकों से ही होनी है पर यहाँ तो पाठक आने से रहे। यहाँ पर तो पाठक मिलना "टेढ़ी खीर" है। इतने दिनों से भिड़े हुए हैं यहाँ पर पर अब तक नतीजा सिर्फ "कोयल होय ना उजली सौ मन साबुन लाइ" है।

कमीशन मिलने की आस में अपने ब्लोग के साइडबार में कुछ भारतीय कम्पनियों के विज्ञापन लगा रखे हैं पर उन्हें कोई देखने वाला हो तब ना। ऐसा भी नहीं है कि इन विज्ञापनों से कमाई होती ही नही है, कभी कभी हो भी जाती है पर कमीशन के रूप में मिलने वाली रकम "ऊँट के मुँह में जीरा" ही होती है। आप तो जानते ही है कि "ओस चाटे प्यास नहीं बुझती"। चार छः महीने में यदि हमारे विज्ञापन के माध्यम से कोई फ्लाईट या होटल बुकिंग करा ले तो समझते हैं कि "अंधे के हाथ बटेर" लग गया।

अंग्रेजी ब्लोगिंग में तो लोग आते ही हैं कमाई करने के उद्देश्य से पर हिन्दी ब्लोगिंग वाले तो संतुष्ट प्राणी हैं, उनमें से अधिकतर को तो ब्लोगिंग से धन कमाने की चाह ही नहीं है। हिन्दी ब्लोगिंग तो "अनजान सुजान, सदा कल्याण" वाली दुनिया है, यहाँ पर सभी मस्त लोग हैं। हर कोई अपने ब्लोग को "अपना मकान कोट समान" मान कर चलते हैं, "अपनी अपनी खाल में सब मस्त" हैं और "अपनी अपनी ढपली, अपना अपना राग" अलापते हुए अलमस्त रहते हैं।

तो हम भी हिन्दी ब्लोगिंग के रंग में पूरी तरह से रंग गये हैं। जब अंग्रेजी ब्लोग लिखते थे इंटरनेट मार्केटिंग के लिये प्लानिंग किया करते थे, अब हिन्दी ब्लोग लिखते हैं तो योजना बनाते हैं कि किसकी टाँगें खींची जाये, किसके धर्म की बखिया उधेड़ी जाये, पुरुष हैं इसलिये कैसे नारी को नीचा दिखाया जाये किसी ने कहा है "काजर की कोठरी में कैसे हु जतन करो, काजर की रेख एक लागिहैं पै लागिहैं"। यहाँ एक रेख लगना तो क्या पूरी तरह से कजरारे बन गये हैं और "नवपंक लोचन पंक मुख कर पंक पद पंकारुणम" वाला हमारा एक नया ही रूप उभर कर सामने आ रहा है।

अब तो हम भी यहाँ आकर मस्त हो गये हैं। विषय आधारित ब्लोग न बना कर अपने "आधा तीतर आधा बटेर" ब्लोग से ही खुश रहते हैं। भले ही अब हमारा हाल "आये थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास" हो गया है पर किसी को बताते नहीं कि हम "धोबी के गधे, घर के ना घाट के" हो गये हैं। आखिर बताने से "अपनी जाँघ उघारिये, आपहि मरिये लाज" वाली मिसल ही तो चरितार्थ होगी। इसलिये "अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत" मंत्र को ध्यान में रखकर अपने ब्लोग में जो मन मे आता है वो लिख दिया करते हैं।

Saturday, March 20, 2010

विज्ञापन देखकर कमाई ... पहला चेक मिला

शुक्र है कि विज्ञापन देखकर कुछ तो कमाई होने लग गई है और मेरा पहला चेक मुझे मिल चुका है। विज्ञापनदेखकर कमाई से मुझे रु.471/-. नगद राशि का चेक मिला है और रु.900/- के गिफ्ट व्हाउचर्स मिले हैं। इन गिफ्ट व्हाउचर्स के बदले में घरेलू उपयोग की वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं।

ऐसा जरूर लग सकता है कि विज्ञापनदेखकर कमाई की यह रकम तो "ऊँट के मुँह में जीरा" है, किन्तु "बूँद-बूँद से ही तो घड़ा भरता है"

विज्ञापनदेखकर कमाई का अधिक से अधिक फायदा तभी मिलता है जब आप अपने रेफरल से अधिक से अधिक लोगों को सदस्य बना पायें। इसके लिये अपने ब्लोग में अपने रेफरल वाला विज्ञापन लगाना एक बहुत अच्छा उपाय है। हमने तो अपने "हिन्दी वेबसाइट" और "इंटरनेट भारत" ब्लोग्स में बाकायदा इस बारे में पोस्ट लिखे और उसे पढ़कर बहुत से लोग हमारे नीचे सदस्य बन गये। हमें मिले ये चेक और गिफ्ट व्हाउचर उसी का नतीजा है। यहाँ पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि आपके ब्लोग के जितने अधिक पाठक होंगे उतनी ही अधिक कमाई आप की होगी।

आप लोगों में से अधिकतर लोग तो विज्ञापनदेखकर कमाई साइट के सदस्य बन ही गये होंगे, यदि नहीं बने हैं तो यहाँ क्लिक करके अब बन सकते हैं। अब देख लीजिये कि हम आपको भी अपने नीचे सदस्य बनने के लिये प्रेरित कर रहे हैं, इसी को तो इंटरनेट मार्केटिंग कहते हैं।

विज्ञापन देखकर कमाई साइट का सदस्य बनने के लिये आपको सिर्फ यह करना है -

1) यहाँ अर्थात् व्हियूबेस्टएड्स पर क्लिक करके साइट पर पहुँचें।

2) ई-मेल आईडी भरकर रजिस्टर करवायें।

3) आपके मेल बाक्स में एक मेल आयेगी, उस लिंक पर क्लिक करके कन्फ़रमेशन करें।

4) अपना सही-सही प्रोफ़ाइल पूरा भरें, ताकि यदि पैसा (चेक) मिले तो आप तक ठीक पहुँचे।

5) बस, विज्ञापन देखिये और खाते में अंक और पैसा जुड़ते देखिये (दिन में सिर्फ एक बार)

6) आप चाहें तो अपने मित्रों को अपनी लिंक फ़ारवर्ड करके उन्हें अपनी डाउनलिंक में सदस्य बनने के लिये प्रोत्साहित कर सकते हैं ताकि कुछ अंक आपके खाते में भी जुड़ें (हालांकि ऐसा कोई बन्धन नहीं है)…

Friday, March 19, 2010

बेचारी हिन्दी ... ये वो थाली है जिसमें लोग खाते हैं और फिर उसी में छेद करते हैं

अंग्रेजी के 26 अक्षर तो रटे हुए हैं आपको, पूछने पर तत्काल बता देंगे। किन्तु यदि मैं पूछूँ कि हिन्दी के बावन अक्षर आते हैं आपको तो क्या जवाब होगा आपका? अधिकतर लोगों को यह भी नहीं पता कि अनुस्वार, चन्द्रबिंदु और विसर्ग क्या होते हैं। हिन्दी के पूर्णविराम के स्थान पर अंग्रेजी के फुलस्टॉप का अधिकांशतः प्रयोग होने लगा है। अल्पविराम का प्रयोग तो यदा-कदा देखने को मिल जाता है किन्तु अर्धविराम का प्रयोग तो लुप्तप्राय हो गया है।

परतन्त्रता में तो हिन्दी का विकास होता रहा किन्तु जब से देश स्वतन्त्र हुआ, हिन्दी का विकास तो रुक ही गया उल्टे उसकी दुर्गति होनी शुरू हो गई। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद शासन की नीति तुष्टिकरण होने के कारण हिन्दी को राष्ट्रभाषा के स्थान पर "राजभाषा" बना दिया गया। विदेश से प्रभावित शिक्षानीति ने हिन्दी को गौण बना कर अग्रेजी के महत्व को ही बढ़ाया। हिन्दी की शिक्षा धीरे-धीरे मात्र औपचारिकता बनते चली गई। दिनों-दिन अंग्रेजी माध्यम वाले कान्वेंट स्कूलों के प्रति मोह बढ़ते चला गया और आज हालत यह है कि अधिकांशतः लोग हिन्दी की शिक्षा से ही वंचित हैं।

हिन्दी फिल्मों की भाषा हिन्दी न होकर हिन्दुस्तानी, जो कि हिन्दी और उर्दू की खिचड़ी है, रही और इसका प्रभाव यह हुआ कि लोग हिन्दुस्तानी को ही हिन्दी समझने लगे। टीव्ही के निजी चैनलों ने हिन्दी में अंग्रेजी का घालमेल करके हिन्दी को गर्त में और भी नीचे ढकेलना शुरू कर दिया और वहाँ प्रदर्शित होने वाले विज्ञापनों ने तो हिन्दी की चिन्दी करने में "सोने में सुहागे" का काम किया।

रोज पढ़े जाने वाले हिन्दी समाचार पत्रों, जिनका प्रभाव लोगों पर सबसे अधिक पड़ता है, ने भी वर्तनी तथा व्याकरण की गलतियों पर ध्यान देना बंद कर दिया और पाठकों का हिन्दी ज्ञान अधिक से अधिक दूषित होते चला गया।

हिन्दी के साथ जो कुछ भी हुआ या हो रहा है वह "जिस थाली में खाना उसी में छेद करना" नहीं है तो और क्या है?

अब ब्लोग एक सशक्त एवं प्रभावशाली माध्यम बन कर उभर रहा है किन्तु वहाँ पर भी हिन्दी की दुर्दशा ही देखने के लिये मिल रही है।

यदि हम अपनी रचनाओं के माध्यम से हिन्दी को सँवारने-निखारने का कार्य नहीं कर सकते तो क्या हमारा यह कर्तव्य नहीं बनता कि कम से कम उसके रूप को विकृत करने का प्रयास न करें।

चलिये बात हिन्दी के वर्णमाला से आरम्भ किया था तो उसे भी पढ़वा दें आपकोः

अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ॠ ऌ ॡ
क ख ग घ ङ
च छ ज झ ञ
ट ठ ड ढ ण

प फ ब भ म
य र ल व
श ष स ह
क्ष त्र ज्ञ

वास्तव में यह देवनागरी लिपि है। संस्कृत में उपरोक्त सभी अर्थात् बावन वर्णों का प्रयोग होता है किन्तु हिन्दी में ॠ, ऌ, ॡ आदि का प्रयोग नहीं होता। ङ और ञ का प्रयोग भी नहीं के बराबर ही होता है या कहा जा सकता है कि आजकल होता ही नहीं। यहाँ पर यह बताना भी उचित रहेगा कि ड़ और ढ़ अक्षर नहीं बल्कि संयुक्ताक्षर हैं।

Thursday, March 18, 2010

टॉप ब्लोगर रहस्य

"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!"

"नमस्काऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!"

"लिख्खाड़ानन्द जी! आप तो ब्लोगिंग के आसमान की ऊँचाइयों को छू रहे हैं! ब्लोगिस्तान में डंका बजता है आपका! ऐसा कोई भी ब्लोगर नहीं है जो आपके नाम से परिचित न हो। आज हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि आखिर आप इस मुकाम तक पहुँचे कैसे?"

"हे हे हे हे, आप तो बस हमें चने के झाड़ पर चढ़ा रहे हैं।"

"नहीं नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है, मैंने जो कुछ भी कहा है वह सच है। अब बताइये ना जो हमने पूछा है।"

"वो क्या है टिप्पण्यानन्द जी, हमारी सफलता के पीछे कई बातें हैं। पहली बात तो यह है कि आपको पोस्ट निकालना आना चाहिये। पोस्ट किसी भी चीज से निकाला जा सकता है। जैसे नदी में तरबूज-खरबूज आदि की खेती हो रही है तो उस पर पोस्ट निकाल लो। आपके घर के पास कुतिया ने पिल्ले दिये हैं तो झटपट उन पिल्लों के फोटो ले लीजिये और एक पोस्ट निकाल कर चेप दीजिये उन फोटुओं को। यात्रा के दौरान आपका सूटकेस चोरी हो गया तो उससे भी पोस्ट निकाला जा सकता है। आपको रास्ते में कोई विक्षिप्त दिख गया तो उससे एक पोस्ट निकाल लीजिये। जब लोगों को किसी भी ग्राफिक्स में अल्लाह नजर आ जाता है, सिगरेट के धुएँ में चाँद-सितारे आदि दिख जाते हैं तो किसी भी चीज से पोस्ट क्यों नहीं निकाला जा सकता? हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि पोस्ट कहीं से भी निकल सकता है।

"दूसरी बात है पोस्ट का प्रभावशाली होना। पोस्ट में प्रभाव उत्पन्न होता है उसे दर्शन का रूप देने से! किसी एक बात से दूसरी किसी ऐसी बात को जोड़ने से जिसका कि पहली बात से दूर-दूर का कुछ भी सम्बन्ध न हो जैसे कि भैंसों के पगुराने को रेलगाड़ी की सीटी से जोड़ दो। पोस्ट में प्रभाव उत्पन्न होता है उसमें अरबी, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी आदि के शब्द डालने से! बल्कि इन भाषाओं और हिन्दी के शब्दों को तोड़-मरोड़ कर नये-नये शब्द बनाने से। जैसे कि हिन्दी के शब्द "निश्चित" में अंग्रेजी का प्रत्यय "ली" जोड़कर "निश्चितली" बना दीजिये या अंग्रेजी के शब्द "स्ट्रिक्ट" में हिन्दी का प्रत्यय "ता" जोड़कर "स्ट्रिक्टता" बना दीजिये। कहने का लब्बो-लुआब यह है कि जो कुछ भी आप लिखें उसे भले ही न समझ सके किन्तु उसमें प्रभाव अवश्य होना चाहिये।

"अगली बात है पढ़ने वालों का जुगाड़ करना! आप तो जानते ही हैं कि हमारे पाठक अन्य ब्लोगर्स ही होते हैं। तो सबसे जरूरी है उन्हें खुश रखना ताकि वे आपके पोस्ट में जरूर आयें और सिर्फ आये ही नहीं बल्कि टिप्पणी भी करें। दूसरे ब्लोगर्स खुश होते हैं टिप्पणी पाकर। याद रखिये कि टिप्पणी ही हिन्दी ब्लोगिंग का सार है! हम तो बस यही याद रखते हैं कि यारों टिप्पणी राखिये, बिन टिप्पणी सब सून!

"इन सब के अलावा यह याद रखना जरूरी है कि "विद्या विनयेन शोभते!" विद्या, योग्यता आदि की शोभा विनय से ही होती है अतः हमेशा विनम्र बने रहिये। आपकी विनयशीलता दूसरे ब्लोगर्स पर सबसे अधिक प्रभाव डालती है।

"अंत में हम आपको यह भी बता दें कि सफलता पाने के लिये थोड़ी बहुत राजनीति भी करनी पड़ती है, कुछ लोगों को अपने साथ मिला कर रखना पड़ता है जो आपकी और आपस में एक दूसरे की पब्लिसिटी करें। इस विषय में विस्तार से फिर कभी आपको बतायेंगे।"

"वाह! वाह!! आज तो आपने हमें बहुत अच्छी जानकारी दी है। बहुत-बहुत धन्यवाद आपका! अच्छा अब यह तो बताइये कि आप टॉप लिस्ट में सबसे ऊपर कैसे रहते हैं। हमारा मतलब है कि आपका नाम टॉप फाइव्ह में ही कैसे रहता है? और ये पहले पाँच नाम ही क्यों हमेशा ऊपर नीचे होते रहते हैं?"

"आप भी अजीब हो! अरे भाई ये भला हम कैसे बता सकते हैं? ये तो टॉप लिस्ट बनाने वाले ही बता पायेंगे!"

"अब आप हमें बहलाइये मत लिख्खाड़ानन्द जी। आप अवश्य इस रहस्य को जानते हैं पर हमें बताना नहीं चाहते। भाई हम आपके इतने पुराने मित्र हैं, कम से कम हमें तो बता दीजिये।"

"अब हम क्या बतायें टिप्पण्यानन्द जी? टॉप लिस्ट को तो एक स्वचालित तंत्र बनाता है जो चिट्ठों की आवृति, बैकलिंक्स आदि के आधार पर टॉप चिट्ठों की लिस्टिंग करता है।"

"पर हमने तो देखा है कि कई ऐसे ब्लोगर हैं जो दिन में दो-दो पोस्ट लिखते हैं और टॉप लिस्ट से बाहर ही रहते हैं। इधर आप और आपके साथी हैं जो कि सप्ताह में सिर्फ दो पोस्ट लिखकर टॉप फाइव्ह में ही बने रहते हैं। हमने यह भी देखा है कि 88 बैकलिंक्स वाला 1 नंबर पर होता है और 184 बैकलिंक्स वाला 4 नंबर पर होता है। 33 बैकलिंक्स वाला टॉपलिस्ट के भीतर होता है 35 बैकलिंक्स वाला लिस्ट के बाहर। कई सालों से ब्लोगिंग करने वाले ब्लोगर का लिस्ट में नाम ही नहीं होता और जिन्हें ब्लोगिंग में आये जुम्मा-जुम्मा कुछ ही समय हुआ है ऐसे ब्लोगर लिस्ट में जगह पा जाते है। आखिर ये माजरा क्या है? कुछ हम भी तो जानें।"

"छोड़िये इन बातों को टिप्पण्यानन्द जी, आप तो बस इतना समझ लीजिये कि एक सीक्रेट फॉर्मूले के द्वारा हम उन्हीं ब्लोगर को लिस्ट में लेते हैं जिन्हें हमें लेना है। दूसरे चाहे लाख कोशिश कर लें पर हमारे चाहे बगैर लिस्ट में शामिल हो ही नहीं सकते। आखिर हम लोगों ने इतनी मेहनत की है फॉर्मूला बनाने में तो कम से कम उसका फायदा तो हमें ही मिलना चाहिये ना!"

"अच्छा तो ऐसी बात है! मान गये आप लोगों को लिख्खाड़ानन्द जी! जो जानने के लिये आये थे सो जान चुके। अब चलते हैं। नमस्कार!"

"नमस्कार!"

Wednesday, March 17, 2010

ब्लोगवाणी के द्वारा दुर्भाव का जहर उगलने वाले ब्लोग्स की सदस्यता बनाये रखने का क्या औचित्य है?

हिन्दी ब्लोग संकलकों में ब्लोगवाणी सर्वाधिक लोकप्रिय है। यह प्रायः समस्त हिन्दी ब्लोग्स के अपडेट्स को एक ही स्थान पर दिखाता है और अधिकांश हिन्दी ब्लोगर्स नये पोस्ट की जानकारी के लिये ब्लोगवाणी का ही सहारा लेते हैं। हिन्दी ब्लोग जगत के लिये ब्लोगवाणी का कार्य अत्यन्त सराहनीय है।

सभी सोशल बुकमार्किंग साइट्स तथा संकलकों की अपनी नियम और शर्तें होती हैं। ये नियम और शर्तें ही तय करती हैं कि किसे सदस्यता दी जाये और किसे नहीं। एक बार सदस्य बन जाने के बाद यदि कोई नियम और शर्तों की अवहेलना करता है तो उसकी सदस्यता समाप्त कर देने का भी प्रावधान रहता है। नियम व शर्तें बनाये ही इसलिये जाते हैं ताकि सद्भावना बनी रहे, किसी की भावनाओं को ठेस न पहुँचे, किसी प्रकार की घृणा न फैलने पाये।

इस बात से तो आप सभी सहमत होंगे कि ब्लोग का महत्व दिनों दिन बढ़ते ही जा रहा है। एक ब्लोग को समस्त संसार में कोई भी पढ़ सकता है। जहाँ किसी ब्लोग में निहित विचार आपसी भाई-चारे का सन्देश देकर "वसुधैव कुटुम्बकम" बना सकता है तो वहीं किसी अन्य ब्लोग में प्रस्तुत किये गये विचार हमारे बीच आपसी कलह भी करवा सकता है। कहने का तात्पर्य है कि आज ब्लोग दुनिया भर में नई क्रान्ति ला सकता है।

आज यह जग जाहिर है कि कुछ हिन्दी ब्लोग्स दुर्भाव का जहर उगल-उगल कर सिर्फ दुर्भावना फैलाने का कार्य कर रहे हैं। ब्लोगवाणी में इनकी सदस्यता होने के कारण ही लोग इन ब्लोग्स में जाते हैं। यदि ब्लोगवाणी में इनकी सदस्यता न रहे तो कोई भी इन ब्लोग्स में नहीं जाने वाला है। तो क्या औचित्य है ऐसे ब्लोग्स की सदस्यता ब्लोगवाणी में बरकरार रखने की?

मैं ब्लोगवाणी के संचालकों से अनुरोध करता हूँ कि वे ऐसे ब्लोग्स, जो महज दुर्भाव फैला रहे हैं, की सदस्यता को तत्काल रद्द करें।

मुझे विश्वास है कि आप सभी मेरे इस विचार का अनुमोदन अवश्य ही करेंगे।

जिसके अपने खुद के घर शीशे के होते हैं, वे दूसरों के घरों में पत्थर नहीं फेंका करते

शीशा याने कि काँच ...

बहुत नाजुक होता है शीशा! इसीलिये कहते हैं कि "जिसके अपने खुद के घर शीशे के होते हैं, वे दूसरों के घरों में पत्थर नहीं फेंका करते।"

हजारों साल से मनुष्य के जीवन में शीशा अर्थात् काँच के महत्वपूर्ण तथा विशिष्ट प्रयोग होते रहे हैं। ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं होगा जिसने काँच से बनी वस्तु का इस्तेमाल न किया हो। काँच से बने दर्पन का प्रयोग तो हम सभी हर रोज करते ही हैं। रंग बिरंगी काँच की चूड़ियाँ नारी की सुन्दरता में चार चांद लगाती हैं। काँच के गिलास, काँच की कटोरी, काँच के बोतल, काँच की बरनी आदि हमारी दैनिक उपयोग की वस्तुएँ हैं। कारों, बसों, रेलगाड़ियों आदि की खिड़कियों में शीशे का ही इस्तेमाल होता है। इत्र, सेंट रखने के लिये काँच की आकर्षक शीशियाँ भला किसने नही देखी होगी? मदिरा को तो काँच के खूबसूरत और आकर्षक बोतलों में ही रखा जाता है और मदिरापान के लिये काँच के ही सुन्दर सुन्दर प्यालियों का ही प्रयोग किया जाता है।

काँच सिलिका अर्थात् रेत का एक अवयव होता है। यह एक अकार्बनिक पारदर्शी ठोस पदार्थ होता है जो कि आम तौर पर रंगहीन या तथा अनेक रंगों में पाया जाता है। भौतिक रूप से यह कड़ा और ठोकर लगने पर टूट जाने वाला होता है तथा हवा, धूप, पानी आदि के प्रभाव से मुक्त होता है।

पृथ्वी में प्राकृतिक काँच का अस्तित्व आरम्भ से ही रहा है। समझा जाता है कि ज्वालामुखी फूटने अथवा उल्कापात होने आदि के कारण उत्पन्न उच्च ताप से विशेष प्रकार के चट्टान पिघल गये रहे होंगे और तापमान कम होने पर पुनः ठोस होने पर उनका रूप काँच में बदल गया रहा होगा। यह भी विश्वास किया जाता है कि पाषाणयुग के मानव ने भी कठोर वस्तुओं को काटने के लिये प्राकृतिक काँच से बने हथियारों तथा उपकरणों का ही प्रयोग करते रहे होंगे।

प्राचीन-रोमन इतिहासकार Pliny (ई. 23-79) के अनुसार 5000 ई.पू. के आसपास सीरिया के क्षेत्र में काँच की खोज हुई थी। एक अन्य जानकारी के अनुसार मनुष्य ने 3000 ई.पू. कांस्य युग के दौरान पहली बार काँच का निर्माण किया। मिस्र में मिले काँच में लगभग 2500 ई.पू. के मनके पाये गये हैं। काँच के बर्तन बनाने की शुरुवात लगभग 1500 ई.पू. में हुई। सीरिया में प्रथम शताब्दी के आसपास काँच को मनचाहे रूप में ढालने की कला विकसित हुई।

काँच बनाने के लिये रेत को कुछ अन्य सामग्री के साथ 1500 डिग्री सैल्सियस पर पिघलाया जाता है और इस प्रकार से प्राप्त पिघले द्रव को मनचाहा रूप देने के लिये खाँचों में बूंद-बूंद करके डाला जाता है। आजकल ये प्रक्रियाएँ स्वचालित मशीनों से की जाती हैं।

Tuesday, March 16, 2010

हमारा पोस्ट ब्लोगवाणी में टॉप पर कैसे आता है?

आदमी तिकड़मी न हो तो किस काम का? हम भी बहुत बड़े तिकड़मी हैं और अपने पोस्ट को ब्लोगवाणी में टॉप में लाकर छोड़ते हैं। हमारे लिये तो चुटकी बजाने जैसा है यह काम तो। अब आप पूछेंगे कि कैसे?

वो ऐसे कि सबसे पहले तो हम अपने आकाओं के द्वारा तैयार किये गये मैटर को लेकर एक पोस्ट लिखते हैं। सही बात तो यह है कि हम जो कुछ भी लिखते हैं वो हमारे महान आकाओं का ही लिखा हुआ होता है। हमारे ये आका लोग भले ही अपने सम्प्रदाय के विषय में न जानें पर इनका काम है दूसरों की संस्कृति में टाँग घुसेड़ना और विकृत विचार प्रस्तुत करना। तो हम बता रहे थे कि अपने पोस्ट में हम एक सम्प्रदायविशेष के लोगों को बताते हैं आपके सम्प्रदाय के ग्रंथों और हमारे सम्प्रदाय के ग्रंथों में सभी बातें एक जैसी हैं। क्या हुआ जो आपके ग्रंथ किसी और भाषा में हैं और हमारे किसी और भाषा में, विचार तो दोनों में एक ही जैसे हैं। हम बताते हैं कि आपकी मान्यताओं को हम भी मानते हैं। अपनी बात को सिद्ध करने के लिये हम उनकी किसी आस्था पर तहे-दिल से अपनी भी आस्था बताते हैं। उनके ग्रंथों को महान बताते हैं। ऐसा करने के पीछे हमारा उद्देश्य मात्र चारा डालना होता है। भाई सीधी सी बात है कि, भले ही हमें उनकी आस्था-श्रद्धा से हमें कुछ कुछ लेना देना ना हो पर, यदि हम हम उनको दर्शायें कि हम उनकी बातों को मानते हैं तो वे भी हमारी बातों को मानने लगेंगे। और वो यदि हमारी बातों को मानेंगे तो मात्र दिखावे के लिये नहीं बल्कि सही-सही तौर पर मानेंगे। ये दिखावा-सिखावा तो वो लोग जानते ही नहीं हैं। एक बार यदि वे हमारी बातों को मानना शुरू कर देंगे, फिर तो हमारी ओर खिंचते ही चले आयेंगे। यह बात अलग है कि उनमें कुछ लोग एक नंबर के उजड्ड हैं और अनेक प्रकार के तर्क-वितर्क कर के हमारे पोस्ट को महाबकवास साबित करने पर तुले रहते हैं। पर हम भी कम नहीं हैं, हम उनके इस व्यवहार से भीतर ही भीतर उबलते तो बहुत हैं, पर ऊपर से बड़ी विनम्रता दिखाते हुये अपनी बात पर अड़े रहते हैं कि आप आप नहीं हो बल्कि आप हममें से ही एक हो। जब हममें से ही हो तो आकर मिल जाओ हममें।

क्या कहा? विषयान्तर हो रहा है?

हाँ भाई, अपनी बात कहने के चक्कर में हम भूल गये थे कि हम अपने पोस्ट को ब्लोगवाणी में टॉप में लाने वाली बात बता रहे थे। तो चलिये उसी बात पर आगे बढ़ते हैं।

अपने पोस्ट को पब्लिश करते ही हम स्वयं उसमें टिप्पणी करते हैं।

उसके बाद हम बेनामी बन जाते हैं और अपने पोस्ट में टिप्पणी करते हैं।

फिर अपने मित्रों को फोन करके कहते हैं कि हमारा पोस्ट प्रकाशित हो गया है, आप उसमें टिप्पणी करो।

एक मित्र टिप्पणी करता है।

हम टिप्पणी करके उस मित्र को जवाब देते हैं।

उसके बाद हम फिर बेनामी बनकर टिप्पणी करते हैं।

फिर स्वयं बनकर बेनामी जी की टिप्पणी का जवाब देते हैं।

एक बार फिर से हम बेनामी बनकर टिप्पणी करते हैं।

अब बेनामी जी को धन्यवाद देना जरूरी है इस लिये फिर से हम स्वयं बनकर टिप्पणी करते हैं।

फिर हमारा दूसरा मित्र टिप्पणी करता है।

हम टिप्पणी करके अपने मित्र को धन्यवाद देते हैं।

फिर हम एक टिप्पणी करके लोगों से आग्रह करते हैं कि हमारा यह पोस्ट एक बहुत अच्छा पोस्ट है और आकर इसे पढ़िये।

इस बीच में दूसरे सम्प्रदाय वाले कुछ लो फँस जाते हैं हमारे झाँसे में और अपनी टिप्पणी करते हैं।

हम उन सभी टिप्पणी करने वालों को अलग-अलग टिप्पणी करके धन्यवाद देते हैं।

इस प्रकार से सिलसिला चलते चला जाता है, चालीस पचास टिप्पणियाँ हो जाती हैं और इन टिप्पणियों के दम पर हमारा पोस्ट ब्लोगवाणी के टॉप में पहुँच जाता है।

अब ब्लोगवाणी थोड़े ही समझता है कि हमने अपने पोस्ट में टिप्पणियों की संख्या कैसे बढ़ाई है! इस प्रकार से हम ब्लोगवाणी के इस कमजोरी का भरपूर फायदा उठाते हैं और अपने पोस्ट को टॉप पर ले आते हैं।

हैं ना हम महातिकड़मी?

Monday, March 15, 2010

आना लंगूर के हाथ में हूर का ... बाद में पछताना लंगूर का

आप जितने भी जोड़े देखते होंगे उनमें से पंचान्बे प्रतिशत बेमेल ही मिलेंगे। पता नहीं क्या जादू है कि हमेशा हूर लंगूर के हाथों ही आ फँसती है। हमारे हाथ में भी आखिरकार एक हूर लग ही गई थी आज से चौंतीस साल पहले।

जब शादी नहीं हुई थी हमारी तो बड़े मजे में थे हम। अपनी नींद सोते थे और अपनी नींद जागते थे। न ऊधो का लेना था न माधो का देना। हमारा तो सिद्धान्त ही था "आई मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूँक"। याने कि अपने बारे में हम इतना ही बता सकते हैं कि आगे नाथ न पीछे पगहाकिसी के तीन-पाँच में कभी रहते ही नहीं थे हम। आप काज महाकाज समझ कर बस अपने काम से काम रखते थे हमारे लिये सभी लोग भले थे क्योंकि आप तो जानते ही हैं कि आप भला तो जग भला

पर थे एक नंबर के लंगूर हम। पर पता नहीं क्या देखकर एक हूर हम पर फिदा हो गई। शायद उसने हमारी शक्ल पर ध्यान न देकर हमारी अक्ल को परखा रहा होगा और हमें अक्ल का अंधा पाकर हम पर फिदा हो गई रही होगी। या फिर शायद उसने हमें अंधों में काना राजा समझ लिया होगा। या सोच रखा होगा कि शादी उसी से करो जिसे जिन्दगी भर मुठ्ठी में रख सको।

बस फिर क्या था उस हूर ने झटपट हमारी बहन से दोस्ती गाँठ ली और रोज हमारे घर आने लगी। "अच्छी मति चाहो, बूढ़े पूछन जाओ" वाले अन्दाज में हमारी दादी माँ को रिझा लिया। हमारे माँ-बाबूजी की लाडली बन गई। इधर ये सब कुछ हो रहा था और हमें पता ही नहीं था कि अन्दर ही अन्दर क्या खिचड़ी पक रही है

इतना होने पर भी जब उसे लगा कि दिल्ली अभी दूर है तो धीरे से हमारे पास आना शुरू कर दिया पढ़ाई के बहाने। किस्मत का फेर, हम भी चक्कर में फँसते चले गये। कुछ ही दिनों में आग और घी का मेल हो गया। आखिर एक हाथ से ताली तो बजती नहीं। हम भी "ओखली में सर दिया तो मूसलो से क्या डरना" के अन्दाज में आ गये। उस समय हमें क्या पता था कि अकल बड़ी या भैंस। गधा पचीसी के उस उम्र में तो हमें सावन के अंधे के जैसा हरा ही हरा सूझता था। अपनी किस्मत पर इतराते थे और सोचते थे कि बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले ना भीख

अब अपने किये का क्या इलाज? दुर्घटना घटनी थी सो घट गई। उसके साथ शादी हो गई हमारी। आज तक बन्द हैं हम उसकी मुठ्ठी में और भुगत रहे हैं उसको। अपने पाप को तो भोगना ही पड़ता है। ये तो बाद में समझ में आया कि लंगूर के हाथ में हूर फँसती नहीं बल्कि हूर ही लंगूर को फाँस लेती हैं कई बार पछतावा भी होता है पर अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत

Saturday, March 13, 2010

पानी पीना छान के चेला बनाना जान के

पुराने समय में गुरु लोग चेला बनाया करते थे किन्तु आज के युग में चेले लोग ही गुरु बनाते हैं। उन दिनों गुरु लोग चेला बनाते थे ज्ञान देने के लिये पर आज के युग में चेले लोग गुरु बनाते हैं मौज लेने के लिये। जब भी मौज लेने का मन करे झट से किसी को गुरु बना लो और उसको हेडमास्टर या बड़े गुरूजी जैसा बताते हुए एक पोस्ट लिख दो और उसके बाद तो मौज ही मौज है। पोस्ट पढ़ने वाला पोस्ट पढ़कर मौज लेता है और पोस्ट लिखने वाला टिप्पणियों को पढ़ कर। इस प्रकार के पोस्ट लिखने का मकसद ही यह बताना होता है कि गुरु गुड़ रह गये और चेला शक्कर हो गया।

पहले के शिष्य कहा करते थेः

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े का के लागूँ पाय।
बलिहारी गुरु आपकी गोविन्द दियो बताय॥

पर आज के गुरु कहते हैं

पोस्ट लिख-लिख मैं थका कोउ ना पाठक आय।
चेले की बलिहारि है टिप्पणी दियो कराय॥

आप के पास कितना ही ज्ञान क्यों न हो, बगैर चेलों के आप कुछ नहीं कर सकते, आखिर अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता ना! पहले कहा जाता था कि "गुरु बिना ज्ञान नहीं होता" पर आज कहा जाता है कि "चेलो के बिना काम नहीं होता"। ये आपके चेले ही हैं जो आपको अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बना कर रखते हैं। जहाँ आपके चेले आपको ऊपर चढ़ाते हैं वहीं वे आपके विरोधी की टाँग खींच कर उसे नीचे भी गिराते हैं। यही कारण है कि आज के दौर में अधिक से अधिक चेलों का होना बहुत ही जरूरी हो गया है। पर अधिक से अधिक चेलों को रिझाना कि वे आपको गुरु बनाले वास्तव में टेढ़ी खीर है।

चेलों का महत्व आप इसी से समझ सकते हैं कि यदि आप ब्लोगर हैं तो आपके जितने भी चेले हैं वो सब आपके पोस्ट में टिप्पणी करने अवश्य ही आयेंगे और आपका पोस्ट हिट हो जायेगा। ज्यादा क्या कहें बस इतने से समझ लीजिये कि ब्लोगिंग में चेलों का उतना ही महत्व है जितना नेतागिरी में चमचों का।

यद्यपि आप किसी को चेला नहीं बना सकते क्योंकि आज के जमाने में चेले लोग ही मनमाफिक गुरु बनाने का काम करते हैं तथापि यदि कोई आपको गुरु बनाता है तो इतना ध्यान अवश्य रखिये कि "पानी पीना छान के चेला बनाना जान के", क्योंकि ये चेले कभी भी आपकी लुटिया भी डुबो सकते हैं।

Friday, March 12, 2010

मैं चला मैं चला ....

सम्भालो अपने इस ब्लोगिस्तान को। अब मेरी यहाँ कुछ भी जरूरत नहीं है। मेरे कुछ कह देने से बहुत से लोगों का दिल दुख जाता है यहाँ पर। तो फिर मैं यहाँ रहूँ ही क्यों? और फिर यहाँ के अन्य लोगों के कारण से मेरी भी भावनाओं को तो ठेस पहुँचती है। अच्छा तो यही होगा कि न मेरे कारण दूसरों का दिल दुखे और न ही उनके कारण मैं स्वयं को व्यथित करूँ।

इसलिये ...

मैं चला मैं चला ...

पर मैं आखिर बता के क्यों जाना चाहता हूँ? बगैर बताये चुपचाप भी तो जा सकता हूँ। ये मेरा बता के जाना क्या सिद्ध करता है?

जब किसी अपने से लड़ाई हो जाती है तो कई बार लोग स्वयं अपना गाल पीट लेते हैं किन्तु किसी पराये से लड़ाई होने पर कभी कोई खुद को नहीं पीटता। कारण स्पष्ट है कि स्वयं को चोट पहुँचाने वाला जानता है कि उसे चोट पहुँचने से सामने वाले को दुःख होगा।

इसी प्रकार से जब कोई इस ब्लोग जगत से जाने की बात करता है तो वह भी जानता है कि उसके जाने से अन्य ब्लोगर्स को दुःख अवश्य ही होगा, यदि वह अन्य ब्लोगर्स को अपना नहीं समझता तो बगैर सूचना के चुपचाप चला जाता।

यह सब बताकर मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि इस ब्लोग जगत में सभी अपने हैं और यह हमारा परिवार है। अब जहाँ चार बर्तन होते हैं तो कभी न कभी टकरा भी जाते हैं।

जब हम सभी एक दूसरे के हैं तो फिर आइये संकल्प लें कि एक दूसरे की भावनाओं को समझेंगे और प्रेम की गंगा बहायेंगे इस ब्लोग जगत में!

अब तो आप समझ ही गये होंगे कि ...

मैं रुका मैं रुका ...

दम है किसी में तो यहाँ से निकाल के दिखाये मुझे।

तो पोस्ट का सार यह कि बुड्ढा पैग मारकर चढ़ गया था टंकी पर और नशा उतरने पर बगैर कूदे सीढ़ी से वापस उतर आया।

Thursday, March 11, 2010

व्यथा बड़े गुरूजी की

चेलों ने परेशान कर रखा है बड़े गुरूजी को। सारे चेले उनके ऊपर "मान ना मान मैं तेरा मेहमान" बन कर पिल पड़े हैं। रोज ऐसा पोस्ट लिख देते हैं जिससे साबित हो जाये कि बड़े गुरूजी की सोच "अधजल गगरी छलकत जाय" है, बड़े गुरूजी "आँख के अन्धे और नाम के नैनसुख" हैं। बड़े गुरूजी के साथ साथ उनके ब्लोग को भी नहीं छोड़ते, उनके ब्लोग को चेलों ने "ऊँची दुकान फीका पकवान" बना कर रख दिया है। बेचारा बड़े गुरूजी का ब्लोग क्या जाने कि "गेहूँ के साथ घुन भी पिसता है"। चेलों के पोस्ट ऐसे होते हैं जैसे कि "हींग लगे ना फिटकिरी और रंग आये चोखा!" चेलों के इन पोस्ट को टिप्पणियाँ भी खूब मिल जाती हैं और बड़े गुरूजी की धुलाई भी हो जाती है। इसी को कहते हैं "आम के आम और गुठलियों के दाम!"

बड़े गुरूजी यदि कुछ कहते हैं तो उसके कथन को "थोथा चना बाजे घना" बता देते हैं। ये "उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे" नहीं है तो क्या है भला? बड़े गुरूजी ने चेलों को शिक्षा देने की कोशिश क्या कर दी कि चेलों के लिये "बिल्ली के भागों छींका टूटा" हो गया। "रानी रूठेगी तो अपना सुहाग लेगी" और बड़े गुरूजी रूठेंगे तो अपना पोस्ट वापस लेंगे।

बड़े गुरूजी को तो यह भी पता नहीं है कि "अकल बड़ी या भैंस?"। सही बात तो यह है कि "अब आया है ऊँट पहाड़ के नीचे"। उनका हाल तो "खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे" जैसा होकर रह गया है और पछता रहे हैं इन्हें चेला बनाकर। पर "अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत!"

अब बड़े गुरूजी इस जुगाड़ में लगे हैं कि चेले मान जायें, पर उनकी कोशिश "का वर्षा जब कृषी सुखाने" बनकर रह जाती है। बड़े गुरूजी तो अब बस इतना ही चाह रहे हैं कि कैसे भी "अन्त भला सो भला" हो जाये।

Wednesday, March 10, 2010

डॉक्टर हैं पर क्यों दे अपने ब्लोग में डॉक्टरी जानकारी? ... बेवकूफ समझ रखा है हमें?

"यार, ठीक है कि तुम अपने ब्लोग में अपनी कविताएँ लिखते हो। पर तुम चिकित्सक भी हो। क्यों नहीं चिकित्सा सम्बन्धी जानकारी वाला अपना एक और ब्लोग बना लेते?"

"तुम तो जानते हो यार, कितना बिजी रहता हूँ मैं। पेशेन्ट्स से हमेशा घिरा रहता हूँ। कई बार तो खाना-पीना, यहाँ तक कि नींद-चैन भी, हराम हो जाती है अपने इस पेशे के कारण। ऐसे में बड़ी मुश्किल से समय निकाल कर कविता लिखता हूँ और अपने पोस्ट में प्रकाशित भी करता हूँ। अब समय कहाँ है मेरे पास दूसरा ब्लोग बनाने के लिये। और मानलो मैं अपना दूसरा ब्लोग बनाकर उसमें बताऊँ कि इथिकल क्या होता है, जेनरिक क्या होता है तो भला उसे कौन समझेगा?"

"अरे भाई, यदि तुम अच्छे से समझाओगे तो कोई क्यों नहीं समझेगा?"

"तुम तो बस बाल की खाल निकालने बैठ जाते हो। अरे भाई, अगर मैं लोगों को बता दूँ कि मैं उन्हें तीन-तीन, चार-चार सौ रुपये कीमत वाली जो इथिकल दवाइयाँ प्रेस्क्राइब करता हूँ उसके बदले में वह यदि मात्र दो-तीन रुपये वाली जेनरिक दवा खा ले तो भी ठीक हो जायेगा तो मेरे रेपुटेशन का क्या होगा? इथिकल कंपनी के जो एमआर मेरे पास आते हैं और हर साल मुझे नई कार दे जाते हैं वो क्या ऐसे में मेरे पास आयेंगे? ये जो मैं हर साल कार, टीव्ही, फ्रिज बदल लेता हूँ ये सब उन्हीं की मेहरबानी से तो है। अब मैं अपने ब्लोग में इथिकल के बदले जेनरिक जैसी सस्ती दवाओं से इलाज के बारे में लिखने लगूँगा तो वो सारी इथिकल कंपनियाँ और उनके एमआर खुश होंगे क्या?

"और यदि अपने ब्लोग में लोगों को बताऊँ कि एक्झर्शन के कारण हल्का बुखार है तो एक पैरॉसीटामोल की गोली खा लो, साधारण सा दर्द है तो निमुसुलाइड गोली खा लो तो भला लोग मेरे पास इलाज कराने क्यों आने लगे? वो लोग मेरे पास नहीं आयेंगे तो मैं खून, पेशाब आदि जाँच करवाने के लिये पैथॉलाजिकल लैब किन्हें भेजूँगा? उन सारे लैब से मिलने वाले मेरे कमीशन का क्या होगा?

"तुम तो भैया, हमारा धंधा ही चौपट करवाने पर तुले हो पर हम इतने बेवकूफ नहीं हैं जो तुम्हारा कहना मान लें। इतना खर्च करके डॉक्टर बने हैं तो पैसा पीटने के लिये बने हैं, ब्लोग लिखकर फोकट में जानकारी देने के लिये थोड़े ही बने हैं। इसलिये समझ लो कि हम अपने ब्लोग में सिर्फ कविताएँ ही लिखेंगे।"

Tuesday, March 9, 2010

ये बुड्ढा तो सठियाने की सीमा पार कर गया है

सठियाने की भी एक सीमा होती है पर ये बुड्ढा तो सठियाने की सीमा पार कर गया है। कब्र में पाँव लटकाये बैठा है पर ब्लोगिंग का शौक नहीं गया। है तो पिद्दी जैसा पर अपने आपको बहुत बड़ा ब्लोगर बताता है। अकल तो ऐसी है इसकी कि कहे खेत की और सुने खलिहान की पर कमली ओढ़कर खुद को फकीर समझता है"कहीं की ईँट कहीं का रोड़ा भानमती ने कुनबा जोड़ा" जैसे पोस्ट लिखकर तुर्रम खाँ बन जाता है। पर क्या कभी कागज की नाव चली है? इसे पढ़कर तो लोग सिर्फ यही कहते हैं कि क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा।

किस्मत का धनी है इसलिये अब तक टिका हुआ है यहाँ। "कबीर दास की उलटी बानी, बरसे कंबल भीगे पानी" जैसी उल्टी-उल्टी बातें करता है। किसी के बारे में कुछ भी लिख देता है, इसे पता नहीं है कि कमान से निकला तीर और मुँह से निकली बात वापस नहीं आती। जब गरीबी में आटा गीला होगा तब पता चलेगा बच्चू को! इस पर गुस्सा तो बहुत आता है पर क्या करें, ककड़ी के चोर को फॉंसी तो दी नहीं जाती। पर देख लेना एक दिन अपने किये की सजा जरूर पायेगा, कहते हैं ना कि कभी नाव गाड़ी पर तो कभी गाड़ी नाव पर! भला गधा कभी घोड़ा बना है? देर सबेर अपने किये को जरूर भुगतेगा, भगवान के घर देर है अन्धेर नहीं है!

पर क्या करें भाई, जब तक टपकेगा नहीं तब तक तो इसे झेलना ही पड़ेगा।

Monday, March 8, 2010

तरबूज तो मीठे ही होते हैं ... यदि नहीं होते तो सैक्रीन का इंजेक्शन लगाकर उन्हें मीठा बना दिया जाता है

वाह बन्धु! आप जानकारी दे रहे हैं महानदी के तरबूजों के बारे में कि वे बहुत मीठे होते हैं। अरे भाई! तरबूज चाहे महानदी के हों या और किसी नदी के, वे तो मीठे ही होते हैं, यदि नहीं भी होते तो सैक्रीन का इंजेक्शन लगाकर उन्हें मीठा बना दिया जाता है।

किन्तु बन्धु! आज हमें बहुत अधिक निराशा हुई है आपके पोस्ट को पढ़कर। आप हमारे छोटे भाई हैं और हमें आप पर गर्व भी बहुत है क्योंकि आपने आज तक बहुत सारी अच्छी-अच्छी प्रविष्टियाँ लिखी हैं। पर आज हमें लग रहा है कि हमारा गर्व चूर-चूर हो गया है। हिन्दी तथा संस्कृत सहित और भी बहुत सी भाषाओं पर अधिकार एवं ज्ञान का विशद भण्डार रखने वाले अपने छोटे भाई से हमें इतनी तुच्छ जानकारी वाले पोस्ट की किंचित मात्र भी अपेक्षा नहीं थी।

भला ये भी कोई जानकारी हुई कि महानदी के किनारे तरबूज की खेती हो रही है। अरे भाई तरबूज की खेती तो प्रायः देश भर की नदियों के रेत में होती है। महानदी के विषय में बताना ही था तो यह बताया होता कि इस पवित्र सरिता को छत्तीसगढ़ में पुण्य सलिला गंगा की भाँति ही कलुषहारिणी माना जाता है। आप यह जानकारी दे सकते थे कि जिस प्रकार से प्रयाग में पुण्य-सलिला गंगा के साथ यमुना और सरस्वती का त्रिवेणी संगम होता है उसी प्रकार छत्तीसगढ़ के राजिम में पवित्र महानदी के साथ पैरी और सोढ़ुर नदियों का त्रिवेणी संगम होता है। आप अच्छी तरह से जानते हैं कि महानदी का प्राचीन नाम चित्रोत्पला है, प्राचीनकाल में इसे महानन्दा एवं नीलोत्पला के नाम से भी जाता था। आपने ही हमें बताया था कि महानदी का उल्लेख मत्स्य पुराण, ब्रह्मपुराण तथा महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथो में भी पाया जाता है। तो क्या आपने अपने पोस्ट में इतनी अच्छी जानकारी देना उचित नहीं समझा?

आप बता सकते थे कि महानदी छत्तीसगढ़ तथा उड़ीसा अंचल की सर्वाधिक लंबी नदी है। इसका उद्गम छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में स्थित सिहावा नामक पर्वत श्रेणी से हुआ है। महानदी का प्रवाह दक्षिण दिशा से उत्तर दिशा की ओर है। सिहावा से निकलकर महानदी बंगाल की खाड़ी तक निरन्तर लगभग 855 कि.मी. प्रवाहित होती है और अन्ततः बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती है। महानदी के तट पर धमतरी, कांकेर, चारामा, राजिम, चम्पारण, आरंग, सिरपुर, शिवरी नारायण आदि छत्तीसगढ़ में प्रमुख स्थान हैं और सम्बलपुर, कटक आदि उड़ीसा के। पैरी, सोंढुर, शिवनाथ, हसदेव, अरपा, जोंक, तेल आदि महानदी की प्रमुख सहायक नदियाँ हैं। कटक नगर से लगभग सात मील पहले महानदी का डेल्टा शुरू हो जाता है जहाँ से यह अनेक धाराओं में विभक्त हो जाती है। रुद्री, गंगरेल और हीराकुंड महानदी पर बने प्रमुख बाँध हैं।

उपरोक्त सभी बातें जानते हुए भी आपने अपने पोस्ट में नहीं बताया इससे हमें बहुत ही दुःख हुआ है।

हम आप पर अपना अधिकार समझते हैं इसलिये ये सब कह दिया हमने; और हमें विश्वास है कि भविष्य में आप अच्छे पोस्ट लिख कर हमारे गर्व को बनाये रखेंगे।

Sunday, March 7, 2010

अरे भाई हम हिन्दी ब्लोगर हैं!

जितने भी पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों ने हमारी रचनाओं को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया था उन्हें हम बता देना चाहते हैं कि हमें भी अब उनकी कोई परवाह नहीं है। अब हम उन्हें अपनी कोई भी रचना छापने के लिये नहीं भेजने वाले। बड़े आये थे कहने वाले कि हमारी रचनाएँ कूड़ा-कर्कट हैं, उनका कोई स्तर नहीं है। अब धरे रहो अपनी पत्र-पत्रिकाओं को। नहीं छपना अब हमें तुम्हारी पत्र-पत्रिकाओं में। अब हम हिन्दी ब्लोगर बन गये हैं। किसी में दम है तो रोक ले हमें अपने ब्लोग में छपने से।

क्या कहा? तुम्हारे ब्लोग को पढ़ेगा कौन? अरे तुम लोगों ने क्या सिर्फ हमारी रचनाओं को ही रद्दी की टोकरी में फेंका है? तुमने तो हमारे कई मित्रों की रचनाओं का भी तो यही हाल किया है। तो तुम्हें जान लेना चाहिये कि वे सब भी ब्लोगर बन गये हैं। अब हम सब एक-दूसरे के ब्लोग को पढ़ते हैं और टिपियाते भी हैं। हम तो अभी और भी बहुत से लोगों को ब्लोगर बनाने में जुटे हुए हैं, वो सब भी पढ़ेंगे हमारी रचनाओं को।

येल्लो! अब कहने लग गये कि हमारी पत्र-पत्रिकाओं को तो आम लोग पढ़ते हैं तुम्हारे ब्लोग को नहीं। तो जान लो कि तुम ऐसा कह कर हमें जरा भी हतोत्साहित नहीं कर सकते। भाड़ में जायें आम लोग, न तो वे पहले हमें पढ़ते थे और न अब पढ़ते हैं। दरअसल उनके पास इतनी अकल ही कहाँ है कि हम जो लिख रहे हैं उसे समझ पायें। हमारे लिखे को तो सिर्फ हमारे ब्लोगर मित्र ही समझ सकते हैं और वे ही हमें पढ़ने के काबिल हैं। आखिर हम सब हिन्दी ब्लोगर हैं भाई!

Saturday, March 6, 2010

कौवा स्नान ... सर्वोत्तम स्नान ...

चाहे ठंड का मौसम हो या बरसात के दिन हों या फिर ग्रीष्म ऋतु ही क्यों न हो, कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें अपने शरीर से पानी के छू जाने से भी बहुत डर लगता है। ऐसे लोगों के लिये नहाना एक बहुत बड़े पराक्रम का कार्य होता है। लोटे में पानी भर कर सिर पर डालने के पहले बहुत देर तक हिम्मत जुटानी पड़ती है। ऐसे लोगों के लिये कौवा स्नान ही सर्वोत्तम स्नान है। कहा जाता है कि कौवा अपने चोंच को पानी में डुबाकर सोच लेता है कि उसने नहा लिया। इस कथन में कहाँ तक सच्चाई है यह तो पता नहीं पर इस प्रकार के स्नान को ही कौवा स्नान कहा जाता है।

पूजा-अर्चना के समय आखिर देवी देवताओं को भी एक फूल को पानी में डुबा कर फूल के उस पानी को देवी देवता की प्रतिमा पर छिड़कते हुए "स्नानं ध्यानं समर्पायामि" कहते हुए कौवा स्नान ही तो कराया जाता है। यह बात अलग है कि देवी-देवताओं के इस स्नान को कौवा स्नान न कह कर मन्त्र स्नान कह दिया जाता है। पर आप ही सोचिये क्या नाम बदल देने से काम भी बदल जाता है?

तो हम कह रहे थे कि मनुष्य के लिये भी यह कौवा स्नान ही सर्वोत्तम स्नान है। बस उँगली को पानी में डुबाकर निकालिये और उँगली में लगे पानी को "स्नानं ध्यानं समर्पयामि" कहते हुए अपने शरीर पर छिड़क लीजिये। बस हो गया नहाना।

कौवा स्नान के फायदेः

  • शरीर की गर्मी न निकल पाने की व्याकुलता में आप ठंडई और लस्सी जैसे पौष्टिक चीजों का सेवन अधिक करते हैं जिससे आपको पर्याप्त स्वास्थ्य-लाभ होता है।
  • शरीर पर मैल की परत जम जाने के कारण आप अधिक मोटे-ताजे याने कि हृष्ट-पुष्ट नजर आते हैं।
  • इत्र-सेंट आदि का अधिक से अधिक इस्तेमाल करने लगते हैं (भाई आखिर शरीर के दुर्गन्ध को तो किसी न किसी प्रकार से छिपाना भी तो जरूरी है ना!) और नवाब की संज्ञा पाते हैं।
  • मन्दिर आदि पवित्र किन्तु गैरजरूरी स्थानों में जाने की जहमत से बचे रहते हैं।
चलते-चलते

"यार, मैंने सुना है कि कई लोग महीनों तक बिना नहाये रह जाते हैं।"

"पता नहीं यार लोग कैसे महीनों तक बिना नहाये रह जाते हैं, यहाँ तो अठारह-बीस दिनों में ही खुजली छूटने लग जाती है।"

Friday, March 5, 2010

ललित जी ने उचकाया ... हमने फाग गाया

फाग तो बहुत सारे पढ़े आपने, लीजिये आज रंगपंचमी के दिन सुन भी लीजिये। बहुत बेसुरा गला है हमारा पर क्या करें दो पैग लगाने के बाद ललित जी ने उचका दिया और हम चढ़ गये चने के झाड़ पर याने कि शुरू कर दिया फाग गाना। आज रंग पंचमी है तो सोचा कि आपको भी सुना दे हमारा गाया हुआ फाग। आज तक आपने अदा जी और शैल जी के कर्णप्रिय स्वर सुने हैं पर आज हमारा कर्कश गान सुन लीजिये।


पतली कमर मोर लचके

Thursday, March 4, 2010

एक छोटी सी खुशी में आपको शामिल करना चाहता हूँ

कहते है कि "दुःख बाँटने से आधा हो जाता है और खुशी बाँटने से चौगुनी हो जाती है"। इसलिये मैं भी आप लोगों के साथ अपनी एक खुशी बाँटना चाहता हूँ। गूगल के "है बातों में दम प्रतियोगिता" टीम से मेरे पास अभी अभी एक मेल आया है जिसमें लिखा हैः

Dear Hai Baaton Mein Dum Contestant,

Thank you for participating in the Hai Baaton Mein Dum Contest.

Congratulations on the superb quality of your submission and the
excitement that you brought to the contest. From a pool of more than
3000 entries, your entry made it into the final list of winners of the Hai
Baaton Mein Dum Contest!

पढ़कर आपको मेरी खुशी का अन्दाजा तो लग ही गया होगा।

मेरे हिन्दी नोल्स यदि आप पढ़ना चाहें तो यहाँ क्लिक करें

क्या हिन्दी से कमाई की उम्मीद है?

मेरे पास प्रायः मेल आते रहते हैं हिन्दी से कमाई के विषय में जानकारी पूछने के लिये। मेल भेजने वालों में से कुछ ब्लोगर भी होते हैं और कुछ नहीं भी। अतः मैंने इस विषय पर एक पोस्ट लिख देना उचित समझा ताकि जिन्हें भी इस विषय में रुचि है उन्हें कुछ जानकारी मिल जाये।

नेट में कमाई मुख्य रूप से 'पे पर क्लिक', 'एफिलियेट प्रोग्राम' और 'स्वयं के प्रोडक्ट बेचने' से होती है पर दुर्भाग्य से अभी तक हिन्दी के लिये ये चीजें विकसित नहीं हो पाई हैं। क्लिकबैंक.कॉम के डिजिटल प्रोडक्ट्स बेचने से अच्छी खासी कमाई होती है किन्तु हिन्दी का प्रयोग करके हम क्लिकबैंक के डिजिटल प्रोडक्ट्स बेच नही सकते। 'एड्स फॉर इंडियन्स' नाम का एक नेटवर्क है किन्तु मैं उसके विषय में अधिक बता नहीं सकता क्योंकि मैंने उसे प्रयोग नहीं किया है। हाँ, भारत के लिये डीजीएमप्रो.कॉम एक एफिलियेट नेटवर्क है जिससे कुछ कमाई की सम्भावना दिखाई पड़ती है। यदि हम अपने वेबसाइट या ब्लोग के माध्यम से एयर बुकिंग, होटल बुकिंग, आनलाइन शॉपिंग करवा पायें तो डीजीएमप्रो से अवश्य ही कमाई हो सकती है, और मैं इससे कुछ आमदनी कर भी रहा हूँ। किन्तु अभी हमारे देश में आनलाइन बुकिंग और शॉपिंग का चलन बहुत कम है इसलिये यह कमाई बहुत ही कम है। पर धीरे धीरे यह चलन बढ़ते जा रहा है इससे उम्मीद बढ़ती है।

अभी नेट में हिन्दी इतनी व्यावसायिक नहीं हो पाई है कि हिन्दी वेबसाइट या ब्लोग से कमाई हो सके। इसका मुख्य कारण हिन्दी के पाठकों की संख्या नगण्य होना ही है। वर्तमान हिन्दी ब्लोगिंग को देखते हुए ऐसा लग भी नहीं रहा है कि निकट भविष्य में पाठकों की संख्या बढ़ पायेगी किन्तु उम्मीद पर दुनिया कायम है अतः हम लोग भी उम्मीद तो लगा ही सकते हैं।

जब तक हम विषय आधारित वेबसाइट या ब्लोग नहीं बनायेंगे और पाठकों की संख्या नहीं बढ़ेगी, हिन्दी का व्यावसायिक होना मुश्किल है।

इस दिशा में मेरे एक प्रयास को आप मेरे "इंटरनेट भारत" ब्लोग में देख सकते हैं।

Wednesday, March 3, 2010

ठेलना तो कचरे को पड़ता है ... जल को ठेलने की आवश्यकता ही नहीं होती

आपने गंदी नाली के कचरे को बहाने के लिये उसे ठेलते हुए अवश्य ही देखा होगा किन्तु क्या कभी आपने नदी निर्झर-आदि के जल को प्रवाहित होने के लिये कभी उसे ठेलते देखा है?

नदी-निर्झर आदि का जल तो अपने आप ही अनवरत रूप से प्रवाहित होते रहता है, उसे कभी भी ठेलना नहीं पड़ता। क्या कलकल नाद करने वाली पुण्यसलिला गंगा को कभी ठेलने की आवश्यकता पड़ती है? झर-झर झरते निर्झर को क्या ठेलने की जरूरत है?

जल अपने आप प्रवाहित होता है किन्तु कचरा अपने आप नहीं बह सकता, उसे बहाने के लिये ठेलना पड़ता है।

क्या प्रेमचंद जी ने "गोदान", "पंच परमेश्वर" आदि को कभी ठेला था? क्या चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी ने "उसने कहा था" को विश्वविख्यात करने के लिये ठेला था? क्या "देवदास" को शरतचन्द्र जी ने ठेलकर लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया था? सआदत हसन मंटो ने "टोबा टेकसिंह" को ठेलकर आपके सामने लाया था? क्या हरिवंशराय बच्चन जी के ठेलने से ही "मधुशाला" लोकप्रिय हो पाई?

यदि आप सार्थक एवं स्वच्छ प्रविष्टियाँ देंगे तो वह साहित्य-सरिता के समान अनवरत रूप से स्वयमेव ही प्रवाहित होने लगेगी, उसे ठेलने की कभी भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

Tuesday, March 2, 2010

घेटो शब्द का प्रयोग जितने बार हुआ, हर बार प्रयोग करने का मन्तव्य अलग-अलग था

साठ साल की उमर हो गई है पर मेरा दुर्भाग्य कि पहले एक ब्लोग में आने से पहले घेटो शब्द से मेरा कभी परिचय नहीं हो पाया था। चलिये अब हो गया, आखिर कुछ नया सीखने-जानने के लिये उम्र की कोई सीमा थोड़े ही होती है। पहली बार जब इस शब्द को पढ़ा तो लगा कि घेटो ने तो हमारी अकल को ही घोंट कर रख दिया है। इस शब्द का अर्थ जानने की जिज्ञासा तो हुई किन्तु उतनी नहीं हुई जितनी कि किसी नये शब्द को पढ़ते ही होती है। मुझे अब भी याद आता है कि तीस-पैंतीस साल पहले जब मैंने व्लादिमीर नोबोकोव (Vladimir Nabokov) के उपन्यास लोलिता (Lolita) में जब पहली बार निम्फेट (nymphet) शब्द पढ़ा था तो उपन्यास को पढ़ना छोड़ कर सबसे पहले शब्दकोश निकाल कर उसका अर्थ खोजा था और अर्थ जान जाने के बाद ही उपन्यास को आगे पढ़ना शुरू किया था। पर घेटो शब्द पढ़ते समय ऐसा नहीं हुआ। कारण था कि घेटो शब्द को प्रयोग करने का मन्तव्य किसी नये शब्द से परिचय करना नहीं बल्कि कुछ और था और हमारा दिमाग उसी मन्तव्य की तरफ ही दौड़ गया। बाद में इस शब्द से सुसज्जित और भी कुछ पोस्ट पढ़ने के लिये मिले और उन प्रविष्टियों में भी उसके प्रयोग करने के मन्तव्य भिन्न-भिन्न ही थे।

शब्दों की यही तो विशेषता होती है कि उनका प्रयोग अलग-अलग मन्तव्य को व्यक्त करने के लिये किया जा सकता है। "घोंचू" शब्द का प्रयोग सामान्यतः किसी की खिल्ली उड़ाने के लिये किया जाता है किन्तु इसी का प्रयोग कोई इस तरह करे कि "काय घोंचू! आज तो जँच रहे हो!" तो घोंचू शब्द बड़ा प्यारा और अपनत्व भरा लगने लगता है। इसी प्रकार से कभी कभी "बड़े भाई" का प्रयोग ऐसे किया जाता है - "देखो बड़े भाय! हम से ना उलझना।" ऐसा प्रयोग "बड़े भाई" के अर्थ को ही बदल कर रख देता है।

कवि और साहित्यकार "सही शब्दों का प्रयोग" करते हैं जबकि अधिवक्तागण "शब्दों का सही प्रयोग" करते हैं। शब्दों के प्रयोग के द्वारा अभिव्यक्ति को मन माफिक मोड़ा जा सकता है। धन्य है शब्दों की महिमा!

चलते-चलते

पुलिसवाले ने सायकल वाले से पूछा, "तुम्हारे सायकल में डायनेमो क्यों नहीं है?"

सायकल वाले ने कहा, "ऐ आरक्षी, चन्द्र की शुभ्र ज्योत्सना में कृत्रिम प्रकाश की क्या आवश्यकता है?"

जब तक पुलिसवाला उसके कहे का मतलब समझे तब तक सायकल वाला जा चुका था।

 
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