Friday, April 30, 2010

हमने बनाया मैट्रिमॉनी कम कम्युनिटी साइट .. अब जरूरत है आप सबके सहयोग की

शादी विवाह हेतु उपयुक्त रिश्ता खोजना शुरू से ही दुष्कर कार्य रहा है। यद्यपि इंटरनेट में अनेक वैवाहिक साइट उपलब्ध हैं जो इस दुष्कर कार्य को सहज बनाने का कार्य कर रही हैं किन्तु इन साइट्स को फीस के रूप में अपनी गाढ़ी कमाई की मोटी रकम देनी पड़ती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए बहुत दिनों से हमारे मन में एक विचार चल रहा था कि क्यों न एक मैट्रिमॉनी साइट बनाया जाये जिसकी सेवा मुफ्त में उपलब्ध हों और समाजसेवा का कार्य भी सम्पन्न हो। हर्ष की बात है कि हमने "बन्धन" नामक एक मैट्रिमॉनी कम कम्युनिटी साइट बना लिया है जिसमें समस्त सेवाएँ मुफ्त में उपलब्ध हैं।

"बन्धन" में प्रोफाइल इस प्रकार से बनाया जाता है कि सदस्य का गोत्र, जाति, राशि आदि के साथ साथ अन्य मूल जानकारी, शारीरिक गठन, शैक्षणिक योग्यताएँ, आजीविका विषयक योग्यताएँ आदि सभी कुछ ज्ञात हो जाये और रिश्ते तय करने में पूरी पूरी आसानी रहे।

"बन्धन" न केवल उपयुक्त रिश्ते सुझाने का कार्य करेगा बल्कि यह समुदाय विकास करने का कार्य भी करेगा क्योंकि इसमें तत्काल एवं आफलाइन संदेश भेजने, फोटो तथा व्हीडियो गैलरी तैयार करने, ब्लोगिंग करने आदि की सुविधाएँ भी उपलब्ध हैं। निकट भविष्य में चैट तथा फोरम की सुविधाएँ भी उपलब्ध करा दी जायेंगी।

अब हमें जरूरत है आप सभी के सहयोग की क्योंकि "बन्धन" साइट के सभी क्रिया कलापों की जाँच परख करना जरूरी है जो कि सदस्यों के अभाव में नहीं हो सकता। अतः आप सभी से अनुरोध है कि आप "बन्धन" के मुफ्त सदस्य बनकर अन्य परिचितों को भी सदस्य बनवा कर हमें सहयोग प्रदान करें।

"बन्धन" हमारा ही नहीं बल्कि आप सभी का अपना साइट है और हमें विश्वास है कि "बन्धन" से आप सभी को सामाजिक लाभ अवश्य ही होगा।

तो देर किस बात की है? यहाँ  क्लिक कर के तत्काल "बन्धन" में मुफ्त रजिस्ट्रेशन करा लीजिये और हमें सहयोग प्रदान कर समाजसेवा का पुण्यलाभ भी प्राप्त कीजिये।

चलते-चलते

"बन्धन" में फिलहाल एकमात्र सदस्य याने कि हम ही हैं। हमें यहाँ सदस्य के रूप में देखकर कहीं यह ना सोच लीजियेगा कि हम स्वयं के लिये कोई रिश्ता देख रहे हैं और हमारी श्रीमती जी को खबर कर दें (बहुत डरते हैं हम उनसे)। भाई साइट को टेस्ट करने के लिये हमारा प्रथम सदस्य बनना निहायत जरूरी था।

Thursday, April 29, 2010

क्या कोई मुझे बतायेगा कि स्क्रोल लॉक की का उपयोग क्या है?

कम्प्यूटर कीबोर्ड में स्क्रोल लॉक नाम का एक की होता है जो कि प्रायः प्रिंट स्क्रीन और पाउज की के बीच में पाया जाता है। आज तक मैं समझ नहीं पाया कि इस की का क्या उपयोग है? अन्य प्रोग्राम्स पर इस की के आन होने का कुछ असर तो मैं देख नहीं पाया किन्तु यदि यह की आन रहे तो एक्सेल के स्क्रोलिंग पर इसका अवश्य ही प्रभाव पड़ता है।

क्या कोई मुझे बतायेगा कि स्क्रोल लॉक की का उपयोग क्या है?

Wednesday, April 28, 2010

बिना बात कोई नापसंद का चटका लगाता है क्या?

नापसन्द है .. नापसन्द है .. नापसन्द है ..

अब नापसन्द है तो नापसन्द है। कोई हमें नापसन्द का चटका लगाने से रोक सकता है क्या? हम तो लगायेंगे जी नापसन्द का चटका।

कल के हमारे पोस्ट "ट्रिक्स टिप्पणियाँ बढ़ाने के"  में अदा बहन ने अपनी टिप्पणी में यह लिखते हुए कि "आज कल एक नया ट्रेंड चला है पोस्ट को नीचे लाने का...बिना बात के लोग नापसंद का चटका जो लगा रहे हैं" हमसे नापसन्द के बारे में लिखने के लिये अनुरोध किया था। हमें भी लगा कि इस पर कुछ लिखा जाये। और कुछ हो या न हो कुछ नापसन्द के चटके ही मिल जायेंगे हमें।

बिना बात के कोई बात नहीं होती। प्रत्येक कार्य के लिये कुछ ना कुछ कारण होना जरूरी होता है। नापसन्द करने के लिये भी कारण होते हैं। नापसन्द का चटका लगाने के पीछे पोस्ट का नापसन्द होना कारण नहीं होता बल्कि पोस्ट लिखने वाले का नापसन्द होना होता है। पोस्ट लिखने वाले को नापसन्द करने के भी अनेक कारण होते हैं मसलनः

  • हम इतना अच्छा लिखते हैं पर ब्लोगवाणी के हॉटलिस्ट में कभी आ ही नहीं पाता। और इस स्साले को देखो रोज ही इसका पोस्ट चढ़ जाता है हॉटलिस्ट में। नापसन्द का चटका लगा कर खींच दो इसकी टाँगे।

  • अरे इस स्साले ने तो बड़ी छीछालेदर की थी हमारी, आज देखते हैं इसका पोस्ट कैसे ऊपर चढ़ पाता है?

  • ये तो फलाँ क्षेत्र का ब्लोगर है जहाँ से बहुत सारे ब्लोगर हिट हो रहे हैं, क्यों ना इसके पोस्ट को नापसन्द का चटका लगाया जाये?

  • ये आदमी तो हमें फूटी आँखों नहीं सुहाता।

  • अरे इसने तो उसके बारे में पोस्ट लिखा है जो हमें फूटी आँखों नहीं सुहाता। लगा दो स्साले को नापसन्द का चटका।

  • ये तो विधर्मी है और हमारे धर्म के विरुद्ध लिखता है।
आदि आदि इत्यादि ...

दोस्तों, नापसन्द बटन बनाने का उद्देश्य पोस्ट के विषयवस्तु के लिये था किन्तु इसका प्रयोग पोस्ट लिखने वाले के लिये हो रहा है। कई बार आपने ब्लोगवाणी में ऐसे पोस्ट भी देखे होंगे जिसका व्ह्यू 0 होता है किन्तु  पसन्द दिखाता है -1, याने कि पोस्ट को बिना पढ़े और उसकी विषयवस्तु को बिना जाने ही नापसन्द का चटका लगा दिया जाता है।

धन्य है ऐसे लोग! ऐसे ही लोगों के लिये गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा हैः

पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं॥

Tuesday, April 27, 2010

ट्रिक्स टिप्पणियाँ बढ़ाने के

हिन्दी ब्लोगिंग के लिये बने संकलकों के हॉटलिस्ट के तीन मुख्य आधार, व्ह्यूज़, पसंद और टिप्पणियों की संख्या हैं। इन्हीं तीनों के बढ़ने से कोई पोस्ट हॉटलिस्ट में ऊपर चढ़ते जाता है। इसका सीधा-सीधा मतलब यह है कि यदि कोई अपने पोस्ट में येन-केन-प्रकारेण टिप्पणियों की संख्या बढ़ाता जाये तो वह पोस्ट हॉटलिस्ट में चढ़ते चला जायेगा। टिप्पणियों की संख्या बढ़ाना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। इसके लिये कई तरीके हैं जैसे किः
  • पोस्ट लिखने के बाद स्वयं ही टिप्पणी करना।
  • बेनामी बनकर खुद ही टिप्पणी करना।
  • मित्रों से सम्पर्क कर टिप्पणियाँ करवाना।
  • एक ही टिप्पणी को बार-बार दोहराते चले जाना।
आदि-आदि इत्यादि ...

यदि संकलक चाहे तो इन सारे तरीकों को खत्म कर सकते हैं, बस इसके लिये उन्हें सिर्फ ऐसी व्यवस्था करना पड़ेगा कि पोस्टकर्ता की और एक ही टिप्पणीकर्ता की एक से अधिक टिप्पणियाँ टिप्पणियों की संख्या में जुड़ने ना पाये। ऐसी व्यवस्था करना मुश्किल कार्य नहीं है।

Monday, April 26, 2010

हिन्दी और हिन्दी ब्लोगिंग ... इक समुन्दर ने आवाज दी मुझको पानी पिला दीजिये

हिन्दी भाषा भी तो एक समुन्दर ही है; एक ऐसा महासागर जिसने अपनी गहराइयों में अनेक रत्नों को छिपा कर रखा हुआ है। इन रत्नों की प्राप्ति के लिये हिन्दी ब्लोगिंग इसके मंथन का कार्य कर रहा है।

पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि समुद्र मंथन से निकलने वाली वस्तुएँ रत्न होती हैं। जब देवताओं और दैत्यों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था तो चौदह रत्न प्राप्त हुए थे जिनके नाम हैं – (1) हलाहल (विष), (2) कामधेनु, (3) उच्चैःश्रवा घोड़ा, (4) ऐरावत हाथी, (5) कौस्तुभ मणि, (6) कल्पवृक्ष (कल्पद्रुम), (7) रम्भा, (8) लक्ष्मी, (9) वारुणी (मदिरा), (10) चन्द्रमा, (11) पारिजात वृक्ष, (12) शंख, (13) धन्वन्तरि वैद्य और (14) अमृत।

इससे स्पष्ट होता है कि जब भी किसी समुद्र का मंथन होता है तो सबसे पहले हलाहल अर्थात् विष ही निकलता है। आज हिन्दी ब्लोगिंग की स्थिति देख कर मुझे लगता है कि हिन्दी रूपी सागर के मंथन से पहला रत्न निकल चुका है। इस प्रथम रत्न, हलाहल अर्थात् विष, के कारण एक अस्थाई व्याकुलता व्याप्त हो गई है और हिन्दी रूपी समुद्र पानी पीने के लिये तरस रहा है, किसी शायर ने सही कहा हैः

"इक समुन्दर ने आवाज दी मुझको पानी पिला दीजिये"

किन्तु यह स्थिति अस्थाई ही है, शीघ्र ही ज्ञान, विद्या, जागृति, आलोक रूपी रत्न भी निकलेंगे और अन्त में अमृत की भी प्राप्ति होगी।

Sunday, April 25, 2010

क्या आप जानना चाहते हैं कि आप कौन हैं? तो किसी से पूछिये मत ...

क्या आप जानना चाहते हैं कि आप कौन हैं? तो किसी से पूछिये मत। कार्य करना शुरू कर दें। आपका कार्य आपको परिभाषित एवं चित्रित कर देगा। - थॉमस जेफर्सन

Do you want to know who you are? Don't ask. Act! Action will delineate and define you. - Thomas Jefferson

मैं यह नहीं कहूँगा कि मैं 1000 बार असफल हुआ, मैं यह कहूँगा कि ऐसे  1000 रास्ते हैं जो आपको असफलता तक पहुँचाते हैं। - थॉमस एडिसन

I will not say I failed 1000 times, I will say that I discovered threre are 1000 ways that can cause failure. - Thomas Edision

हर कोई इस संसार को बदल डालने के विषय में सोचता है किन्तु स्वयं को बदल डालने के विषय में कोई भी नहीं सोचता। - लियो टॉल्स्टाय

Everyone thinks of changing th world but no one thinks of changing himself. - Leo Tolsty

हर किसी पर विश्वास कर लेना खतरनाक है; किसी पर भी विश्वास न करना बहुत खतरनाक है। - अब्राहम लिंकन

Believing everybody is dangerous; believing nobody is very dangerous. - Abraham Lincoln

यदि कोई समझता है कि उसने जीवन में कभी कोई गलती नहीं की है तो इसका मतलब है कि उसने जीवन में कभी भी कुछ नया करने का प्रयास ही नहीं किया। - आइन्स्टीन

If someone feels that they had never mad a mistake in their life, then it means they had never tried a new thing in their life. - Einstein

Saturday, April 24, 2010

क्या आप चाहेंगे कि आपके बच्चों के साथ गरीब बच्चे भी एक ही स्कूल में पढ़ें?

आज लाखों रुपये सालाना फीस वसूलने वाली अनेक शिक्षण संस्थाएँ हैं और हम बड़े ही गर्व के साथ अपने बच्चों को उन्हीं संस्थाओं में भर्ती करवाते हैं। कहीं हमारे इस कार्य के पीछे हमारे अचेतन में छुपी यह भावना तो काम नहीं कर रही कि हमारे बच्चों और गरीबों के बच्चों में कोई समानता नहीं है और उन्हें साथ-साथ  नहीं पढ़ना चाहिये?

आज सम्पन्नों के लिये अलग और विपन्नों के लिये अलग स्कूल क्यों हैं?

मुझे याद है कि जब मैं पढ़ता था तो उस जमाने में निजी शिक्षण संस्थाओं का अभाव था। हम साधारण शिक्षक के बेटे थे किन्तु हमारे साथ हमारे शहर के पूँजीपति व्यापारियों के बेटे भी गव्हर्नमेंट स्कूल में पढ़ते थे। हमारे बीच कभी भी गरीबी-अमीरी का भेद-भाव नहीं आया। हमारे पास पुस्तकों की कमी होने के कारण वे प्रेमपूर्वक दो-चार दिनों के लिये हमें अपनी पुस्तकें उधार दे दिया करते थे और गणित, भाषा आदि में कुछ अधिक होशियार होने के नाते प्रश्नों को हल कराने में हम उनकी भरपूर सहायता किया करते थे।

हमारे देश में शुरू से ही 'नारायण' और 'दरिद्रनारायण' की एक साथ शिक्षा की व्यवस्था रही है । जिस आश्रम में राजपुत्र राम को शिक्षा मिलती थी वहीं केवटपुत्र भी शिक्षा पाते थे। संदीपनी जहाँ कृष्ण को ज्ञान प्रदान करते थे वहीं सुदामा को भी। भेद-भाव का कहीं भी स्थान नहीं होता था। सुदामा के साथ कृष्ण को भी लकड़ी काटने जाना पड़ता था। सम्पन्न कृष्ण को आखिर विपन्न सुदामा के जैसे ही लकड़ी काटने की शिक्षा देने के पीछे मात्र उद्देश्य यही होता था कि वे दोनों ही स्वावलम्बी बनें। गुरु जानते थे कि जो आज सम्पन्न है वह कल विपन्न भी हो सकता है और उस स्थिति में लकड़ी काट कर भी अपनी आजीविका चला सकता था। तात्पर्य यह कि शिक्षा के मूल में मुख्य रूप से स्वावलम्बन हुआ करता था।
आज की शिक्षानीति भेद-भाव को कम कर रही है या बढ़ा रही है?

चलते-चलते

कृष्ण और सुदामा की चर्चा से कवि श्री नरोत्तमदास जी की रचना 'सुदामा चरित' का स्मरण हो आया, रस से सराबोर इस काव्य को को पढ़ने का अपना अलग ही आनन्द हैः

सुदामा चरित

विप्र सुदामा बसत हैं, सदा आपने धाम।
भीख माँगि भोजन करैं, हिये जपैं हरि-नाम॥
ताकी घरनी पतिव्रता, गहै वेद की रीति।
सलज सुशील सुबुद्धि अति, पति सेवा सौं प्रीति॥
कह्यौ सुदामा एक दिन, कृस्न हमारे मित्र।
करत रहति उपदेस तिय, ऐसो परम विचित्र॥

(भामिनी: सुदामा की पत्नी)
लोचन कमल, दुख-मोचन, तिलक भाल,
स्रवननि कुंडल, मुकुट धरे माथ हैं।
ओढ़े पीत बसन, गरे में बैजयंती माल,
संख-चक्र-गदा और पद्म लिये हाथ हैं।
विप्र नरोत्तम संदीपनि गुरु के पास,
तुम ही कहत हम पढ़े एक साथ हैं।
द्वारिका के गये हरि दारिद हरैंगे पिय,
द्वारिका के नाथ वै अनाथन के नाथ हैं॥

(सुदामा)
सिच्छक हौं, सिगरे जग को तिय, ताको कहा अब देति है सिच्छा।
जे तप कै परलोक सुधारत, संपति की तिनके नहि इच्छा॥
मेरे हिये हरि के पद-पंकज, बार हजार लै देखि परिच्छा।
औरन को धन चाहिये बावरि, बामन को धन केवल भिच्छा॥

(भामिनी)
कोदों, सवाँ जुरितो भरि पेट, तौ चाहति ना दधि दूध मठौती।
सीत बितीत भयो सिसियातहिं, हौं हठती पै तुम्हें न हठौती॥
जो जनती न हितू हरि सों तुम्हें, काहे को द्वारिका पेलि पठौती।
या घर ते न गयौ कबहूँ पिय, टूटो तवा अरु फूटि कठौती॥

(सुदामा)
छाँड़ि सबै जक तोहि लगी बक, आठहु जाम यहै हठ ठानी।
जातहि दैहैं, लदाय लढ़ा भरि, लैहैं लिवाय यहै जिय जानी॥
पैहे कहाँ ते अटारी अटा, विधि दीन्हि जो बस एक टूटी सी छानी।
जो पै दारिद्र लिखो है लिलार तौ, का्हू पै मेटि न जात अजानी॥

(भामिनी)
विप्र के भगत हरि जगत के विदित बंधु,
लेत सब ही की सुधि ऐसे महादानि हैं।
पढ़े एक चटसार कही तुम कैयो बार,
लोचन अपार वै तुम्हैं न पहिचानि हैं।
एक दीनबंधु कृपासिंधु फेरि गुरुबंधु,
तुम सो को दीन जाकौ जिय जानि हैं।
नाम लेते चौगुनी, गये तें द्वार सौगुनी सो,
देखत सहस्त्र गुनी प्रीति प्रभु मानि हैं॥

(सुदामा)
द्वारिका जाहु जू द्वारिका जाहु जू, आठहु जाम यहै जक तेरे।
जौ न कहौ करिहों तो बड़ौ दुख, जैहे कहाँ अपनी गति हेरे॥
द्वार खरे प्रभु के छरिया तहँ, भूपति जान न पावत नेरे।
पाँच सुपारि तै देखु बिचार कै, भेंट को चारि न चाउँर मेरे॥

यह सुनि कै तब ब्राह्मनी, गई परोसिन पास।
पाव सेर चाउँर लिये, आई सहित हुलास॥
सिद्धि सिरी गनपति सुमिरि, बाँधि दुपटिया खूँट।
माँगत खात चले तहाँ, मारग वाली बूट॥

दीठि चकचौंधि गई देखत सुबर्नमई,
एक तें सरस एक द्वारिका के भौन हैं।
पूछे बिन कोऊ कहूँ काहू सों न करे बात,
देवता से बैठे सब साधि-साधि मौन हैं।
देखत सुदामा धाय पौरजन गहे पाँय,
कृपा करि कहौ विप्र कहाँ कीन्हौ गौन हैं।
धीरज अधीर के हरन पर पीर के,
बताओ बलवीर के महल यहाँ कौन हैं?

(श्रीकृष्ण का द्वारपाल)
सीस पगा न झगा तन में प्रभु, जानै को आहि बसो केहि ग्रामा।
धोती फटी सि लटी दुपटी अरु, पाँयउ पानहु की नहिं सामा॥
द्वार खरो द्विज दुर्बल एक, रह्यौ चकि सो वसुधा अभिरामा।
पूछत दीन दयाल को धाम, बतावत आपनो नाम सुदामा॥

बोल्यौ द्वारपालक ’सुदामा नाम पाँड़े’ सुनि,
छाँड़े राज-काज ऐसे जी की गति जानै को?
द्वारिका के नाथ हाथ जोरि धाय गहे पाँय,
भेंटे भरि अंक लपटाय ऐसे दुख सानै को?
नैन दोऊ जल भरि पूछत कुसल हरि,
बिप्र बोल्यौ विपदा में मोहि पहिचाने को?
जैसी तुम करी तैसी करै को कृपा के सिंधु,
ऐसी प्रीति दीनबंधु! दीनन सौं माने को?

अंत:पुर कों लै गये जहँ दूसर नहिं जाय।
मणि-मांडित चौकी-कनक ता ऊपर बैठाय।
पानी धरो परात में, पग धोवन कों लाय।।

ऐसे बेहाल बेवाइन सों भये, पग कंटक-जाल लगे पुनि जोये।
हाय! महादुख पायो सखा तुम, आये इतै न कितै दिन खोये॥
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिके करुनानिधि रोये।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैंनन के जल सौं पग धोये॥

(श्री कृष्ण)
कछु भाभी हमकौ दियो, सो तुम काहे न देत।
चाँपि पोटरी काँख में, रहे कहौ केहि हेत॥

आगे चना गुरु-मात दये ते, लये तुम चाबि हमें नहिं दीने।
श्याम कह्यौ मुसकाय सुदामा सों, चोरि की बानि में हौ जू प्रवीने॥
पोटरि काँख में चाँपि रहे तुम, खोलत नाहिं सुधा-रस भीने।
पाछिली बानि अजौं न तजी तुम, तैसेइ भाभी के तंदुल कीने॥

देनो हुतौ सो दै चुके, बिप्र न जानी गाथ।
मन में गुन्यो गोपाल जू, कछू न दीन्हों हाथ॥
वह पुलकनि वह उठि मिलन, वह आदर की बात।
यह पठवनि गोपाल की, कछू ना जानी जात॥

घर-घर कर ओड़त फिरे, तनक दही के काज।
कहा भयौ जो अब भयौ, हरि को राज-समाज॥

हौं कब इत आवत हुतौ, वाही ने पठ्यौ ठेलि।
अब कहिहौं समुझाइके, बहु धन धरौ सकेलि॥

वैसोई राज-समाज बनो, गज-बाजि घने, मन संभ्रम छायौ।
कै तो परो कहूँ मारग भूलि, कै फेरि के मैं अब द्वारिका आयौ।
भौन बिलोकिबे को मन लोचत, सोचत ही सब गाँव मँझायौ।
पूछत पाँड़े फिरे सबसों पर झोपरी को कहूँ खोज न पायौ॥

कनक-दंड कर में लिये, द्वारपाल हैं द्वार।
जाय दिखायौ सबनि लै, या है महल तुम्हार॥

टूटी सी मड़ैया मेरी परी हुती याही ठौर,
तामैं परी दुख काटे कहाँ हेम-धाम री।
जेवर-जराऊ तुम साजे सब अंग-अंग,
सखी सोहै संग वह छूछी हुती छाम री।
तुम तो पटंबर री ओढ़े हो किनारीदार,
सारी जरतारी वह ओढ़े कारी कामरी।
मेरी वा पंडाइन तिहारी अनुहार ही पै,
विपदा सताई वह पाई कहाँ पामरी?

कै वह टूटी सी छानि हती कहँ, कंचन के अब धाम सुहावत।
कै पग में पनही न हती कहँ, लै गजराजहु ठाढ़े महावत॥
भूमि कठोर पै रात कटै कहँ, कोमल सेज पै नींद न आवत।
जुरतो न कोदो सवाँ भरि पेट, प्रभु के परताप तै दाख न भावत॥

Friday, April 23, 2010

किसके लिये और क्यों ब्लोगिंग कर रहे हैं हम?

ये है ब्लोगवाणी के हॉटलिस्ट में सर्वोच्च पाँच पोस्ट का स्क्रीनशॉट, जिसे मैंने आज दिनांक 23 अप्रैल 2010 को सुबह 9.33 बजे लिया हैः


इन सर्वाधिक हॉट पोस्टों से भाषा, समाज, देश का कितना हित हो रहा है?

क्या इन पोस्टों को ब्लोगरों को छोड़कर कोई अन्य पढ़ना चाहेगा?

यदि वह पढ़ भी ले तो हिन्दी ब्लोगिंग के स्तर के विषय में क्या सोचेगा?

और इन्हें पढ़ने के बाद क्या वह भविष्य में हिन्दी ब्लोग्स की तरफ झाँकने की भी कोशिश करेगा?

किसके लिये और क्यों ब्लोगिंग कर रहे हैं हम?

Thursday, April 22, 2010

जूता जब पुराना होता है तभी तो पालिश की जरूरत पड़ती है

"लाख समझाओ इनको पर नतीजा 'वही ढाक के तीन पात'। फिर बैठ गये आप कम्प्यूटर के सामने?" श्रीमती जी बोलीं।

"अरे भई, हम हैं रिटायर्ड आदमी! ब्लोग ना पढ़ें और पोस्ट-टिप्पणियाँ ना लिखें तो समय कैसे कटे? 'खाली बनिया क्या करे, इस कोठी का धान उस कोठी में धरे'।" हमारा उत्तर था।

"सब्जी लेने जाने में भी समय कटता है इसलिये अब थोड़ा समय सब्जी लेने जाकर भी काटिये। अगर आप सब्जी लेने नहीं गये तो इस कम्प्यूटर को उठा कर फेंक दूँगी, 'ना नौ मन तेल होगा ना राधा रानी नाचेगी'।"

"सब्जी लेने के लिये अपने सुपुत्र को क्यों नहीं भेजती? अभी तक सोये पड़े हैं नवाबजादे, 'काम के ना काज के दुश्मन अनाज के'।"

"अच्छा, अब लड़के का आराम करना भी नहीं देखा जाता आपसे? आज आपकी नजरों में यह निठल्ला हो गया है, जब इसका जन्म हुआ था तो कहते थे 'पूत के पाँव पालने में नजर आते हैं'।"

"अच्छा भाई बहुत बड़ा सपूत है तुम्हारा लड़का! 'अपने पूत को भला कोई काना कहता है?', अब उसे उठाकर सब्जी लाने के लिये कहो।"

"नहीं जायेगा लड़का। आप को ही जाना पड़ेगा। जब देखो उसे ही काम में जोतने के लिये उतारू रहते हैं। कभी उसकी भलाई का भी सोचा है आपने? अपनी सारी कमाई भाई-बहनों को झोंक दिया, एक पैसा तो बचा कर रखा नहीं है उसके लिये।"

"क्यों, क्या वो अपने पैरों पर खुद खड़े होने के काबिल नहीं है? हमारे ही पिताजी ने हमारे लिये क्या छोड़ा था? फिर भी हमने क्या कमी की तुम्हें खुश रखने के लिये? 'पूत सपूत तो का धन संचय? पूत कपूत तो का धन संचय?'।"

"हाँ हाँ, बहुत खुश रखा है आपने मुझे! तन में ना कोई गहना और तीज-त्यौहार में ना कोई अच्छा कपड़ा। मेरे तो करम फूटे थे जो आपके पल्ले पड़ी। करमजली ना होती तो आपके साथ शादी के पहले जिस रईस की औलाद से मेरी शादी की बात चल रही थी उसी के साथ मेरी शादी ना हो गई होती? पर 'अपने किये का क्या इलाज'? आपकी बहन की बातों के चक्कर में आकर मैंने ही मना कर दिया था उससे शादी करने के लिये।

"अरे अभी तो लड़के से सब्जी मँगवा लो, शाम को मैं बाजार जाउँगा तो तुम्हारे लिये बढ़िया मेकअप का सामान लेते आउँगा।" हमने श्रीमती जी को खुश करने के उद्देश्य से कहा।

"हाय राम! अब क्या इस उमर में मैं मेकअप करूँगी?"

"क्यों, जूता जब पुराना होता है तभी तो पालिश की जरूरत पड़ती है।"

"क्या कहा?"

"अरे कुछ नहीं भई ..."

"क्या कुछ नहीं भई?"

"वो तो जरा ऐसे ही ..."

"क्या ऐसे ही?"

"वो जरा दिल की भड़ास निकल गई थी।" कहकर हमने श्रीमती जी को कुछ और सोचने और बोलने का मौका दिये बगैर जल्दी से कहा, "लाओ थैला दो, जा रहा हूँ सब्जी लेने के लिये।"

भुनभुनाते हुए वे थैला लाने चली गईं और हम अपनी आधी लिखी पोस्ट को सेव्ह करके कम्प्यूटर शटडाउन करने में लग गये।

Wednesday, April 21, 2010

ऊँचाई पर पहुँचना बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात है ऊँचाई पर बने रहना

क्षेत्र चाहे बल्लोगिंग हो, कला हो, क्रीड़ा हो या चाहे जो भी हो, अपने क्षेत्र में आगे ही आगे बढ़े जाने की चाह भला किसे नहीं होती? आगे बढ़ते-बढ़ते सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर लेना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात है एक बार ऊँचाई में पहुँचने के बाद वहाँ बने रहना।

सर्वोच्च स्थान पर बने रहना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि और भी बहुत सारे लोग उस स्थान के दावेदार होते हैं जो वहाँ पहले से ही पहुँचे हुए व्यक्ति को नीचे खींच कर स्वयं उसका स्थान ले लेना चाहते हैं। दूसरी ओर यह बात भी है कि जो व्यक्ति सर्वोच्च स्थान पर होता है वह कभी भी यह नहीं चाहता कि उसे नीचे धकेल कर कोई अन्य उसके स्थान पर आ जाये। यही कारण है कि सदुद्देश्य का कार्य करते करते जो भला आदमी एक बार ऊँचाई पर पहुँच जाता है वही वहाँ पहुँचने के बाद भलाई का त्याग कर देता है और वहाँ बने रहने के लिये नये नये हथकंडे सीख लेता है। अंग्रेजी का एक प्रॉव्हर्ब है "Ability can take you to the top, but it takes character to keep you there." अर्थात् "योग्यता आपको सफलता की ऊँचाई तक पहुँचा सकती है किन्तु चरित्र आपको उस ऊँचाई पर बनाये रखती है"। पर होता यह है कि ऊँचाई पर बने रहने का स्वार्थ चरित्र पर भारी पड़ने लगता है और एक न एक दिन यह स्वार्थ व्यक्ति को ऊँचाई से नीचे खींच लाता है।

इसलिये सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर लेने वाले को याद रखना चाहिये कि "जिस किसी का भी उत्थान होता है उसका कभी न कभी पतन भी अवश्य ही होता है"

Tuesday, April 20, 2010

आप अंधेरे में कब तक रहें फिर कोई घर जला दीजिये

आज के जमाने में अगर जीना है तो जमाने के चलन को अपनाना ही पड़ेगा। आज आप आगे तभी बढ़ सकते हैं जब अपने घर में रोशनी करने के लिये दूसरे के घर को जला देने में आपको जरा भी झिझक न हो। अपने सौ रुपये के फायदे के लिये यदि किसी का हजार रुपये नुकसान होता हो तो बेहिचक उसका नुकसान कर दीजिये। यही है आज के जमाने का चलन।

कल ही की बात है, हम आटो रिक्शे में जा रहे थे कि ट्रैफिक वाले ने उसे रोक लिया ओव्हरलोड के आरोप में। दो सौ रुपये का चालान बनाने की धमकी देकर उसने आटो वाले की कड़ी धूप में गाढ़ी मेहनत से की गई अस्सी रुपये की कमाई को हड़प लिया। माँग तो वह सौ रुपये रहा था किन्तु उस वक्त तक आटो वाले ने केवल अस्सी रुपये ही कमाये थे, उससे अधिक रुपये उसके पास नहीं थे। आटो वाले का दोष सिर्फ इतना था कि उसने महज पाँच अतिरिक्त कमाने के लिये अपने आटो पर एक सवारी अधिक बिठा लिया था।

ऐसी बातें देखकर हम अक्सर सोचने लगते हैं कि अब हमें भी स्वयं को बदल लेना चाहिये, बड़े लोगों ने ठीक ही कहा है "जैसी चले बयार पीठ तैसी कर लीजे"। किन्तु हमारा यह विचार कुछ समय तक ही के लिये रहता है और बाद में हम वैसे ही रह जाते हैं जैसे सदा से थे। बहुत बड़ी कमजोरी है यह हमारी।

पोस्ट का शीर्षक मुन्नी बेगम के गाये एक गज़ल के शेर से लिया गया है इसलिये वह गज़ल भी सुनवा देते हैं, हमें तो पसंद है ही शायद आपको भी पसंद आयेः

Monday, April 19, 2010

कहाँ गईं वो घड़ों-सुराहियों की दूकानें

गर्मी की शुरुवात होते ही घड़ों-सुराहियों की दूकानें दिखनी शुरू हो जाती थीं किन्तु आज इन दूकानों को खोजना पड़ता है। मिट्टी के घड़ों में शीतल किये गये सोंधी-सोंधी मनभावन गंध लिये हुए पानी का स्वाद ही निराला होता था जो किसी भी प्यासे को तृप्त कर देता था। आज फ्रिज, वाटरकूलर आदि के प्रयोग ने इन घड़ों-सुराहियों की दूकानों को विलुप्तप्राय कर दिया है।

स्कूल के जमाने में पढ़े "किस्सा हातिमताई" का उद्धरण याद आता है कि सवाल का जवाब खोजते-खोजते यवन के शहजादे हातिम को भारत आना पड़ जाता है और प्यास लगने पर पानी माँग करने पर उसे दूध का गिलास थमा दिया जाता है जिससे उसके मुख से बरबस निकल जाता है कि धन्य है यह देश जहाँ प्यासे को पानी की जगह दूध पिलाया जाता है।

प्यासे की प्यास बुझाने को हमारी संस्कृति में बहुत महान और पुण्य का कार्य माना गया है। किन्तु आज के इस बाजारवाद ने हमारी मानसिकता को इस प्रकार से बदल दिया है कि हम अपनी संस्कृति को पूरी तरह से भूल गये हैं और पानी बेचने की चीज बन गई है। पानी को पॉलीथीन पैकेट और बोतलों में बंद करके बेचने के कार्यरूप राक्षस ने ही परम्परागत कुम्भकारों की घड़ों-सुराहियों की दूकानों को निगल डाला है।

भारत जैसे देश में पानी को बेचना ही घिनौना कार्य है पर यहाँ तो लोग प्यासों की मजबूरी का फायदा उठा कर पानी की अधिक से अधिक कीमत वसूल कर रहे हैं। जलपानगृहों और भोजनालयों में जानबूझ कर घड़े नहीं रखे जाते ताकि पैकेज्ड पानी की अधिक से अधिक बिक्री हो।

पता नहीं हमारी यह आधुनिकता की अंधी दौड़ हमें पतन के गर्त में और कितनी गहराई तक ले जायेगी?

Sunday, April 18, 2010

हिन्दी ब्लोगिंग आखिर कब तक संकलकों तक ही सिमटी रहेगी?

क्या आपको नहीं लगता कि हिन्दी ब्लोगिंग सिर्फ संकलकों तक ही सिमट कर रह गई है? इंटरनेट यूजर्स के मामले में विश्व में आज भारत का स्थान चौथे नंबर पर है और हमारे देश में लगभग आठ करोड़ दस लाख इंटरनेट यूजर्स हैं (देखें: http://www.internetworldstats.com/top20.htm)। इनमें से कई करोड़ लोग हिन्दीभाषी हैं किन्तु इन हिन्दीभाषी इंटरनेट यूजर्स में से कितने लोग हमारे संकलकों और ब्लोग्स में आते हैं? सिर्फ नहीं के बराबर लोग।

आखिर क्यों है ऐसा? भारत में हिन्दीभाषी इंटरनेट यूजर्स की एक विशाल संख्या होने के बावजूद भी ये लोग हिन्दी ब्लोग्स में क्यों नहीं झाँकने आते? हमें मानना पड़ेगा कि हममें कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ खामी अवश्य है जिसके कारण हम इन लोगों को अपने ब्लोग्स की ओर आकर्षित नहीं कर पाते। यदि ये लोग हिन्दी ब्लोग्स में आना शुरू कर दें तो यह तय है कि हिन्दी ब्लोग्स के वारे न्यारे हो जायेंगे।

जो कुछ भी आपने ऊपर पढ़ा वह मैं पहले भी कई बार लिख चुका हूँ और आगे भी समय समय पर इस बात को स्मरण कराते ही रहूँगा। हो सकता है कि मेरे इस प्रकार से स्मरण कराते रहने से किसी दिन हिन्दी ब्लोगर्स को अपनी शक्ति का एहसास हो जाये और वे एक विशाल पाठकवर्ग तैयार करने में सक्षम हो जायें।

Saturday, April 17, 2010

चूमा सामने वाले ने और झापड़ मुझे खाना पड़ा

ट्रेन चली जा रही थी। फर्स्ट क्लास के एक कूपे में चार लोग बैठे थे - एक अधेड़ महिला, एक खूबसूरत युवती, एक अपने देश का युवक और एक पड़ोसी देश का युवक।

चारों एक दूसरे के लिये बिल्कुल अपरिचित।

रास्ते में एक टनल आया। पता नहीं इलेक्ट्रिक सिस्टम में क्या खराबी थी कि बिजली का बल्ब जला नहीं। कूपे में घुप्प अंधेरा छा गया। हाथ को हाथ सुझाई नहीं दे रहा था।

अपने देश के युवक को एक शरारत सूझी। उसने अपने बायें हाथ को जोरदार चुम्मी की आवाज करते हुए चूमा और दायें हाँथ से पड़ोसी देश के युवक के गाल पर एक जोर का झापड़ दन्ना दिया।

कूपे के बाकी लोगो ने चूमने की और झापड़ पड़ने की आवाज को सुना और उसी के विषय में सोचने लगे।

अधेड़ औरत ने सोचा इनकी तो छेड़-छाड़ की उमर ही है। यदि लड़के ने मौके का फायदा उठा कर युवती को चूम ही लिया तो इतने जोर से झापड़ तो नहीं मारना चाहिये था।

युवती ने सोचा पता नहीं इनमें से किस युवक ने अधेड़ महिला को चूमा है। पर जिसने भी चूमा है अवश्य ही बहुत बड़ा बेवकूफ है। मेरे जैसी खुबसूरत लड़की को छोड़कर अधेड़ औरत को चूमेगा तो झापड़ तो पड़ेगा ही।

और पड़ोसी देश के युवक ने सोचा क्या अन्याय है। चूमा सामने वाले ने और झापड़ मुझे खाना पड़ा।

इसी को कहते हैं मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना!

Friday, April 16, 2010

दीवारों में दरारें या दरारों के कारण दीवारें

यदि कोई दीवार है तो कभी ना कभी उसमें दरार भी पड़ेगी ही। किन्तु कई बार सोचता हूँ कि आखिर ये दीवारें बनती क्यों हैं? मुझे तो यही लगता है कि भाई-भाई, मित्र-मित्र, आदि अपनों के बीच जब दरार पैदा हो जाती है अर्थात् प्रेमभाव का अभाव हो जाता है तो ये दीवारें खड़ी हो जाती हैं। अब दरारों के कारण उत्पन्न दीवारों में अन्त-पन्त दरारें नहीं पड़ेंगी तो और क्या होगा?

Thursday, April 15, 2010

ना दुश्मनी के ढब हैं ना दोस्ती का तौर

प्रत्येक आदमी किसी ना किसी का दोस्त होता है और किसी ना किसी का दुश्मन भी होता है। शायद ही कोई ऐसा हो जिसकी न तो किसी से दोस्ती हो और न ही किसी से दुश्मनी। यदि कोई ऐसा बिरला व्यक्ति मिल जाये जिसकी किसी न दोस्ती हो और न ही दुश्मनी तो आपका बहुत बड़ा सौभाग्य है क्योंकि वह व्यक्ति पूर्णतः विरक्त ही होगा। ऐसे विरक्त लोगों में सर्वोच्च स्थान कबीरदास जी का ही होना चाहिये क्योंकि वे लिखते हैं

कबिरा खड़ा बजार में माँगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर॥


दोस्ती और दुश्मनी दोनों के ही बारे में बहुत सारे मुहावरे भी बने हैं मसलन "वक्त में काम आने वाला ही सच्चा दोस्त होता है", "मूर्ख दोस्त से समझदार दुश्मन अच्छा होता है", "दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है" आदि।

कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि "न इनकी दोस्ती अच्छी और न ही दुश्मनी"। किसी जमाने में दोस्ती के मूल में प्रेम और दुश्मनी के मूल में क्रोध हुआ करता था। पर अब जमाना बदल गया है और आजकल दोस्ती और दुश्मनी दोनों ही के मूल में बस स्वार्थ ही हुआ करता है।

Wednesday, April 14, 2010

क्यों प्रेम से खिलाये? ... जिसे खाना है खाये जिसे नहीं खाना न खाये

"एक पूरी तो और लीजिये, बिल्कुल गरम है!"

"बस, अब और नहीं ले सकता, पेट भर गया है।"

"अच्छा एक गुलाबजामुन ले लीजिये!"

एक जमाना था जब किसी निमन्त्रण में जाते थे तो ऐसे संवाद सुनने को मिलते थे। खाने वाले का पेट भर जाता था पर परसने वाले थे कि प्रेमपूर्वक आग्रह पर आग्रह किया करते थे और खिलाने के लिये। खाकर निकलते समय दरवाजे पर खड़ा निमन्त्रण देने वाले परिवार का बुजुर्ग हाथ जोड़ कर पूछता था कि खाया या नहीं? यदि पता चल जाये कि किसी ने किसी कारणवश खाना नहीं खाया तो परिवार के सारे लोग जुट जाते थे मान मनौवल करने के लिये। निमन्त्रण में आकर कोई बिना खाना खाये चला जाये यह निमन्त्रण देने वाले के लिये बहुत बड़ा अपमान माना जाता था।

पर आज जमाना बदल गया है। निमन्त्रण देना हमारा काम था सो दे दिया, खाना खाना आपका काम है सो खाना है तो खाओ, नहीं खाना तो मत खाओ। बफे सिस्टम में परसने का भला क्या काम? निकालो और खाओ। हमें तो यह 'बफे सिस्टम' नहीं 'बफेलो सिस्टम' लगता है, हुबेल हुबेल कर खाओ।

आज निमन्त्रित करने वाले को न तो प्रेम से खिलाने की ललक है और न निमन्त्रण में आये व्यक्ति को मान सम्मान पाने की उम्मीद। आज जो भी होता है उसके पीछे प्रेम कम और मजबूरियाँ अधिक होती हैं। प्रेम का स्थान स्वार्थ ने ले लिया है। निमन्त्रित करने वाले को गिफ्ट की उम्मीद होती है और निमन्त्रण में आने वाला सोचता है कि जब रु.101/- का गिफ्ट दिया है तो कम से कम उतने का खाना तो खाना ही चाहिये। प्लेट तो छोटा होता है किन्तु खाने के सभी सामान उसमें एक बार में ही भर लेता है वो, डर लगा रहता है कि बाद में कहीं कोई सामान खत्म न हो जाये। एक सब्जी में दूसरी सब्जी मिल रही है और दोनों सब्जियों में रसगुल्ले या गुलाबजामुन की चाशनी। पापड़ रखने की जगह ही नहीं बची है इसलिये उसे सलाद के ऊपर रख दिया और वह एकदम नरम पड़ गया।

न कोई प्रेम से परसने वाला और न कोई पूछने वाला कि खाया या नहीं? क्यों पूछें? हमें तो पहले से पता है कि गिफ्ट दिया है तो बिना खाये तो जायेगा ही नहीं।

प्रेम के साथ खाने खिलाने का जमाना क्या फिर कभी लौट कर वापस आयेगा?

Tuesday, April 13, 2010

मेरी ईपुस्तक का रिव्ह्यू श्री समीर लाल 'समीर' के द्वारा

मैं आभारी हूँ श्री समीर जी का जिन्होंने मेरी ईपुरस्तक "अंग्रेजी कहावतें हिन्दी भावार्थ" पर रिव्ह्यू लिख कर मेरी ईपुस्तक के विषय में अपने विचार प्रकट किया। प्रस्तुत है उनके द्वारा लिखा गया रिव्ह्यूः

अंग्रेजी कहावतें हिन्दी भावार्थ: एक संग्रहणीय पुस्तक: समीर लाल

एक इन्सान अपने सारे जीवन नित नये अनुभव करता है, अनुभवों से सीखता है और आने वाली पुश्तों को अपने अनुभवों से परिचित कराता है, ताकि उन्हें उस प्रक्रिया से पूरा गुजरने की बजाय पहले से यह भान रहे कि इस राह की मंजिल क्या है और वो नये अनुभव प्राप्त करें.

उदाहरण के तौर पर किसी ने कभी अपनी बीमारी की हालत में दवाई ली होगी और उसी तरह की बीमारी की हालत में किसी और ने दवा के बदले खान पान में परहेज किया होगा. परहेज करने वाला जल्दी ठीक हो गया होगा तो इससे एक सीख प्रप्प्त हुई कि बीमारी की स्थिति में दवा से ज्यादा असरकारक परहेज होता है. चूँकि यह बात और ऐसी ही कई बातें इन्सान ने एक लम्बे अनुभव से सीखीं तो इन्हें अपने आने वाली पुश्तों को समझाने के लिए बड़ी बड़ी कहानियाँ विस्तार से कहने की बजाय, एक एक वाक्य में पूरा अनुभव समेट दिया और उसे नाम मिला मुहावरों को.

विद्वान Miguel de Cervantes ने मुहावरों को परिभाषा दी: "a short sentence based on long experience." अर्थात एक लम्बे अनुभव से सीखे तथ्यों को एक छोटे से वाक्य में कह देना ही मुहावरा है.

पुनः उपर वर्णित बीमारी, दवा और परहेज के अनुभव को मुहावरे के रुप में कहा गया: ’दवा से अधिक प्रभाव परहेज का होता है’ या अंग्रेजी में इसे कहा गया: ’An ounce of prevention is worth a pound of cure'

एक पूरे लम्बे अनुभव का सार: मुहावरा. कैसे बना, क्यूँ बना, किसने बनाया से ज्यादा महत्वपूर्न बात है कि यह एक लम्बे अनुभव के आधार पर बना है, लोग इसे अपना कर लाभांवित हो चुके हैं और यह प्रचलित है. अतः पुनः पूरी प्रक्रिया से गुजरे बिना इसे मान लेने में जीवन का सार है.

अनेकानेक मुहावरे जिन्हें अंग्रेजी में प्रोवर्ब (Proverb) कहते हैं, दुनिया भर में प्रचलित है.

ऐसे ही अनेकों मुहावरों को संकलित करके उसका अंग्रेजी एवं हिन्दी अनुवाद हम तक पहुँचाने का साधुवादी प्रयास किया है श्री जी. के. अवधिया जी ने अपनी पुस्तक "English proverbs with Hindi meaning' 'अंग्रेजी कहावतें हिन्दी भावार्थ’ में. यह एक ई पुस्तक के रुप में उपलब्ध है (पी डी एफ).

आज जैसे ही यह पुस्तक मेरे हाथ लगी, मात्र कुछ ही देर में मैं इसे पूरी पढ़ गया. संकलन, अनुवाद और भावार्थ बहुत प्रभावी ढंग से किया गया है और सभी अंग्रेजी प्रोवर्ब को वर्णक्रमानुसार जमा कर प्रस्तुत किया है.

मेरी समझ से यह एक अनूठा प्रयास है एवं सभी के लिए यह पुस्तक संग्रहणीय है. इस अनुपम प्रयास के लिए श्री जी.के. अवधिया जी का साधुवाद एवं आभार.
समीर लाल
’उड़न तश्तरी’
http://udantashtari.blogspot.com/
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अधिक से अधिक लोग इस ईपुस्तक का फायदा उठा पायें, इसलिये हमने इसकी कीमत मात्र रु.100/- रखा है। डाउनलोड किये गये नमूने को देखने के बाद यदि आप "English Proverbs With  Hindi meaning अंग्रेजी कहावतें - हिन्दी भावार्थ" को खरीदना चाहें निम्न तरीके से खरीद सकते हैं

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इस ईपुस्तक के रिव्ह्यु लिखने के इच्छुक तीन लोगों को मैं यह ईपुस्तक मुफ्त में प्रदान करूँगा ताकि उनके द्वारा किये गये रिव्ह्यु को पढ़कर लोगों को इस पुस्तक के विषय में अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त हो सके।

हमें पूर्ण विश्वास है कि "English Proverbs With  Hindi meaning अंग्रेजी कहावतें - हिन्दी भावार्थ" ईपुस्तक न केवल आपके लेखन को परिष्कृत करेगी बल्कि आपके बच्चों का ज्ञानवर्धन भी करेगी।

भविष्य में हम आप लोगों के लिये और भी गुणवत्ता से परिपूर्ण बहुत सी ईपुस्तके प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।

Monday, April 12, 2010

नया ब्लोगर आया है स्वागत करो! स्वागत करो!! ... फलाँ ब्लोगर चला गया बिदाई दो! बिदाई दो!! ...

कोई नया ब्लोगर आया और शुरू हो गया धूम-धाम के साथ उसका स्वागत्। दौड़-दौड़ कर पुराने ब्लोगर्स आने लग जाते हैं टिप्पणी कर के उसका स्वागत करने के लिये। उसने क्या लिखा है यह पढ़ें या न पढ़ें किन्तु स्वागत जरूर करेंगे। क्यों ना करें भाई स्वागत्? आखिर नये ब्लोगर के आने से ब्लोगर कुनबा में सदस्य तो बढ़ेगा ही, एक और टिप्पणीकर्ता मिलेगा ही। उसके लेखन से भाषा, समाज, देश का कुछ हित हो रहा है या नहीं इससे हमें भला क्या मतलब है? हमें तो मतलब है सिर्फ उसका स्वागत् करने से।

खैर नये ब्लोगर की स्वागत् की यह प्रथा तो बहुत पहले से ही चली आ रही है पर अब एक नई प्रथा ने जन्म लिया है जाने वाले ब्लोगर को विदाई देने का।

अच्छी प्रथा है! विदाई के रूप में मगरमच्छ के आँसू भी बहा लिये और मन ही मन खुश भी हो लिये कि चलो एक प्रतिद्वन्दी से तो जान छूटी, नाक में दम कर रखा था साले ने? हमसे आगे निकल जाना चाहता था ब्लोगरी में।

Sunday, April 11, 2010

तेरे वादे से कहाँ तक मेरा दिल फरेब खाये

तेरे वादे से कहाँ तक मेरा दिल फरेब खाये
कोई ऐसा कर बहाना मेरा दिल ही टूट जाये


पता नहीं आज पोस्ट लिखने को जी नहीं कर रहा है। वैसे भी आज इतवार है छुट्टी का दिन, पढ़ने वाले कम ही आते हैं। तो आज कुछ पसंदीदा शेर ही पोस्ट किये देते हैं। पर है ये "कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा ...", याने कि इन शेरों का आपस में सम्बन्ध हो भी सकता है और नहीं भी। तो प्रस्तुत है मेरी पसंद की कुछ पंक्तियाँ:

तेरे वादे से कहाँ तक मेरा दिल फरेब खाये
कोई ऐसा कर बहाना मेरा दिल ही टूट जाये
मैं चला शराबखाने जहाँ कोई गम नहीं है
जिसे देखनी हो जन्नत मेरे साथ साथ आये

अपने ज़जबात में नगमात रचाने के लिये
मैंने धड़कन की तरह दिल में बसाया है तुम्हें
मैं तसव्वुर भी जुदाई का भला कैसे करूँ
मैंने किस्मत की लकीरों से चुराया है तुम्हें
(ज़जबात=भावनाएँ, नगमात=कविताएँ, तसव्वुर=कल्पना)

अंदाज़ अपने देखते हैं आईनें में वो
और ये भी देखते हैं कोई देखता ना हो

हबीबों से तो रकीब अच्छे जो जल कर नाम लेते हैं
गुलों से तो ख़ार अच्छे जो दामन थाम लेते हैं
(हबीब=अपने, रकीब=प्रतिद्वन्दी, गुल=फूल, ख़ार=काँटे)

तुम पूछो और मैं ना बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं
एक जरा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं

आसमां से उतारा गया
जिंदगी दे के मारा गया
मौत से भी न जो मर सका
उसको नजरों से मारा गया

तुम्हें गैरों से कब फुरसत हम अपने ग़म से कब खाली
चलो बस हो गया मिलना न तुम खाली न हम खाली

हमें तो अपनों ने मारा गैरों में कहाँ दम था
मेरी कश्ती वहाँ डूबी जहाँ पानी कम था

एक शहंशाह ने बनवा के हँसी ताजमहल
हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक

नादान जवानी का जमाना गुजर गया
अब आ गया बुढ़ापा सुधर जाना चाहिये
आवारगी में हद से गुजर जाना चाहिये

भाई! बुढ़ापा तो हमारा कब का आ गया है, इसलिये अब सुधर जाते हैं और इस पोस्ट को यहीं बंद करते हैं।

Saturday, April 10, 2010

बहुत बड़े दिल गुर्दा का काम है हिन्दी ब्लोगिंग में बने रहना

हिन्दी ब्लोगिंग शुरू करना आसान है किन्तु इसमें बने रहना बहुत बड़े दिल गुर्दे का काम है। बहुत सी चोटें, मिलती हैं बेगानों से भी और अपनों से भी। चोटें भी ऐसी कि असहनीय। इन चोटों को सहन करना सभी के वश की बात नहीं होती। लोग टूट जाते हैं।

यह हिन्दी ब्लोग जगत है ही ऐसा कि लोग अपने स्वार्थवश दो अभिन्न लोगों को भिन्न करने का प्रयास करने लगते हैं और सुप्रयास सफल हो या न हो किन्तु कुप्रयास तो सफल ही होता है।

किन्तु कुप्रयास को विफल कर सुप्रयास को ही सफल बनाना क्या हम सबका कर्तव्य नहीं है?

Friday, April 9, 2010

शवयात्रा से वापस आने पर नीमयुक्त पानी से स्नान

हमारे छत्तीसगढ़ में एक परम्परा है कि जब कोई व्यक्ति किसी की शवयात्रा में जाता है तो उसके घर में गृहणी घर के दरवाजे के पास मिट्टी के चूल्हा जला कर उस पर पानी से भरी हुई मिट्टी की हांडी चढ़ा देती है साथ ही हांडी के भीतर के पानी में नीम की पत्तियाँ डाल दी जाती हैं। जब व्यक्ति शवयात्रा से वापस आता है तो उसे उसी पानी से स्नान करना पड़ता है और स्नान के बाद बचे पानी में अपने कपड़े को डाल देना होता है।

कमोबेश पूरे भारत में इस प्रकार की परम्पराएँ पाई जाती हैं। स्पष्ट है कि हमारे पूर्वज अच्छी प्रकार से जानते थे कि शवदाह से उत्पन्न धुएँ में विषाक्त कीटाणु होते हैं। इन्हीं कीटाणुओं को जो कि व्यक्ति के शरीर और कपड़ों में चिपक कर घर तक आ जाते हैं नीमयुक्त पानी, जो कि प्राकृतिक एंटीसेप्टिक है, नष्ट कर देता है।

कितनी विज्ञानसम्मत हैं हमारी परम्पराएँ! हमें अपनी परम्पराओं पर गर्व है!

Thursday, April 8, 2010

सपने वो नहीं होते जिन्हें आप नींद में देखते हैं .. सपने वो होते हैं जो आपकी नींद गायब कर देते हैं

क्या किसी सपने ने कभी आपकी नींद हराम की है? मैं उन सपनों की बात नहीं कर रहा हूँ जिन्हें आप सोते हुए देखते हैं, मैं बात कर रहा हूँ आपके जीवन के सपने की, आपकी महत्वाकांक्षओं की, जीवन में आपके लक्ष्य की। महत्वाकांक्षाएँ आखिर हमारे सपने ही तो हैं और इन सपनों को यदि हम पूरा करने में जुट जायें तो हमारी नींद हराम हो जाती है। अंग्रेजी में एक बहुत ही सुन्दर कहावत हैः

Dreams are not the ones which come when you sleep, but they are the ones which will not let you sleep.

इसका भावार्थ है सपने वो नहीं होते जिन्हें आप सोते हुए देखते हैं, बल्कि सपने वो होते हैं जो आपकी नींद गायब कर देते हैं।

भाषाएँ सभी महान होती हैं और उनमें सुन्दर-सुन्दर कहावतें, मुहावरे होती हैं जिनका प्रयोग हमारे लेखने और बोलचाल में चार चाँद लगा देता है। हमने अंग्रेजी के दो सौ से भी अधिक सुन्दर-सुन्दर कहावतों का संग्रह किया है और उनके हिन्दी भावार्थ को लिखा है जो कि ईपुस्तक के रूप में एक डिजिटल प्रोडक्ट बन गया है। इस ईपुस्तक का हमने नाम दिया है "English Proverbs With  Hindi meaning अंग्रेजी कहावतें - हिन्दी भावार्थ"। इस ईपुस्तक का नमूना आप यहाँ क्लिक कर के मुफ्त में डाउनलोड कर सकते हैं।

हमारा भी एक सपना था नेट में अपने गुणवत्ता से परिपूर्ण उत्पाद बेचकर कुछ आमदनी करने का। सो जब ईपुस्तक के रूप में जब यह डिजिटल प्रोडक्ट तैयार हो ही गया है तो हमने अपने सपने को पूरा करने के लिये इसे ऑनलाइन बेचने का निश्चय कर लिया है। अधिक से अधिक लोग इस ईपुस्तक का फायदा उठा पायें, इसलिये हमने इसकी कीमत मात्र रु.100/- रखा है। डाउनलोड किये गये नमूने को देखने के बाद यदि आप "English Proverbs With  Hindi meaning अंग्रेजी कहावतें - हिन्दी भावार्थ" को खरीदना चाहें निम्न तरीके से खरीद सकते हैं

  • हिन्दी ईपुस्तकें साइट में जाकर पेपल के माध्यम से मात्र $2 का सुरक्षित भुगतान करके इसे तत्काल डाउनलोड किया जा सकता है।
  • भारतीय स्टेट बैंक के खाता क्रमांक 10470296177 में मात्र रु.100/- इंटरनेट बैंकिंग द्वारा ट्रांसफर करके या नगद जमा करने के पश्चात  में सूचित करके इसे मेल द्वारा मँगाया जा सकता है।
इस ईपुस्तक के रिव्ह्यु लिखने के इच्छुक तीन लोगों को मैं यह ईपुस्तक मुफ्त में प्रदान करूँगा ताकि उनके द्वारा किये गये रिव्ह्यु को पढ़कर लोगों को इस पुस्तक के विषय में अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त हो सके।

हमें पूर्ण विश्वास है कि "English Proverbs With  Hindi meaning अंग्रेजी कहावतें - हिन्दी भावार्थ" ईपुस्तक न केवल आपके लेखन को परिष्कृत करेगी बल्कि आपके बच्चों का ज्ञानवर्धन भी करेगी।

भविष्य में हम आप लोगों के लिये और भी गुणवत्ता से परिपूर्ण बहुत सी ईपुस्तके प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।

Wednesday, April 7, 2010

खल वन्दना

खल ...

अर्थात् दुष्ट ...

दुष्टता के मूल में व्यक्ति की हीन भावना ही होती है। हीन भावना से ग्रसित व्यक्ति जानता है कि उसमें बहुत सारी कमियाँ हैं और इसी कारण से वह भीतर ही भीतर क्षुब्ध रहता है। अपनी क्षुब्धता से प्रेरित हो वह अपनी कमियों को छिपाने के लिये विवश हो अन्य लोगों को यह दर्शाता है कि वह महान है। उसकी यह झूठी महानता उसमें अहंकार उत्पन्न करती है। और अहंकार से उत्पन्न होती है दुष्टता। दुष्ट व्यक्ति का कार्य होता है दूसरों को दुःख पहुँचाना। इसके लिये वह सदैव दूसरों को उकसाने, जलाने, भड़काने और कुण्ठाग्रस्त करने का प्रयास करते रहता है।

किन्तु हमारी संस्कृति में खल कि भी वन्दना करने की परम्परा रही है इसीलिये "रामचरितमानस" की रचना करते समय गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी खल-वन्दना की है। दुष्टों की वन्दना करते हुए वे कहते हैं किः

अब मैं सच्चे भाव से दुष्टों की वन्दना करता हूँ जो बिना किसी प्रयोजन के दायें-बायें होते रहते हैं। दूसरों की हानि करना ही इनके लिये लाभ होता है तथा दूसरों के उजड़ने में इन्हें हर्ष होता है और दूसरों के बसने में विषाद। ये हरि (विष्णु) और हर (शिव) के यश के लिये राहु के समान हैं (अर्थात् जहाँ कही भी भगवान विष्णु या शिव के यश का वर्ण होता है वहाँ बाधा पहुँचाने वे पहुँच जाते हैं)। दूसरों की बुराई करने में ये सहस्त्रबाहु के समान हैं। दूसरों के दोषों को ये हजार आँखों से देखते हैं। दूसरों के हितरूपी घी को खराब करने के लिये इनका मन मक्खी के समान है (जैसे मक्खी घी में पड़कर घी को बर्बाद कर देती है और स्वयं भी मर जाती है वैसे ही ये दूसरों के हित को बर्बाद कर देते हैं भले ही इसके लिये उन्हें स्वयं ही क्यों न बर्बाद होना पड़े)। ये तेज (दूसरों को जलाने वाले ताप) में अग्नि और क्रोध में यमराज के समान हैं और पाप और अवगुणरूपी धन में कुबेर के समान धनी हैं। इनकी बढ़ती सभी के हित का नाश करने के समान केतु (पुच्छल तारा) के समान है। ये कुम्भकर्ण के समान सोये रहें, इसी में सभी की भलाई है। जिस प्रकार से ओला खेती का नाश करके खुद भी गल जाता है उसी प्रकार से ये दूसरों का काम बिगाड़ने के लिये खुद का नाश कर देते हैं। ये दूसरों के दोषों का बड़े रोष के साथ हजार मुखों से वर्णन करते हैं इसलिये मैं दुष्टों को (हजार मुख वाले) शेष जी के समान समझकर उनकी वन्दना करता हूँ। ये दस हजार कानों से दूसरों की निन्दा सुनते हैं इसलिये मैं इन्हें राजा पृथु (जिन्होंने भगवान का यश सुनने के लिये दस हजार कान पाने का वरदान माँगा था) समझकर उन्हें प्रणाम करता हूँ। सुरा जिन्हें नीक (प्रिय) है ऐसे दुष्टों को मैं इन्द्र (जिन्हे सुरानीक अर्थात देवताओं की सेना प्रिय है) के समान समझकर उनका विनय करता हूँ। इन्हें वज्र के समान कठोर वचन सदैव प्यारा है और ये हजार आँखों से दूसरों के दोषों को देखते हैं। दुष्टों की यह रीत है कि वे उदासीन रहते हैं ( अर्थात् दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिये यह नहीं देखते कि वह मित्र है अथवा शत्रु)। मैं दोनों हाथ जोड़कर प्रेमपूर्वक दुष्टों की वन्दना करता हूँ।

मैंने अपनी ओर से वन्दना तो की है किन्तु अपनी ओर से वे चूकेंगे नहीं। कौओं को बड़े प्रेम के साथ पालिये , किन्तु क्या वे मांस के त्यागी हो सकते हैं?

यह तो हुआ तुलसीदास जी के कथन का भावार्थ, अब मूल पाठ भी पढ़ लीजियेः

बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥
पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें॥
हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से॥
जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी॥
तेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा॥
उदय केत सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके॥
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं॥
बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा॥
पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस दस काना॥
बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही॥
बचन बज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर दोष निहारा॥
दो0-उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति।
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति॥

मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा॥
बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा॥

भयानक युद्ध - युद्धकाण्ड (19)

राक्षस सेना को रावण के साथ आया देखकर वानर सेना भी ललकारती हुई सामने आ पहुँची। उसे देखकर रावण का क्रोध और भड़क गया। अत्यन्त क्रोधित हो उसने भारी मारकाट मचा दी। कितने ही वानरों के सिर काट डाले, कितनों के मस्तक कुचल डाले, कितनों ही की वक्ष चीर डाले। जिधर भी उसकी द‍ृष्टि घूम जाती, वहीं उसके बाण वीर यूथपतियों को अपनी मार से व्याकुल कर देते। अन्त में बचे घायल वानरों ने दौड़कर श्री रामचन्द्र जी के पास गुहार लगाई। उनके पीछे-पीछे रावण भी श्री राम के सामने जा पहुँचा।

वानर सेना की दुर्दशा देखकर सुग्रीव ने सेना को संयत रखने का भार वीर सुषेण पर सौंपा और स्वयं एक विशाल वृक्ष उखाड़कर शत्रु पर आक्रमण करने के लिये दौड़ा। अनेक यूथपति भी बड़े-बड़े वृक्ष और पत्थर लेकर उसके पीछे-पीछे चले। उनकी मार से राक्षस सेना धराशायी होने लगी। राक्षस सेना को नष्ट होते देख विरूपाक्ष गर्जना करते हुये सुग्रीव पर आक्रमण करने के लिये दौड़ा। सुग्रीव ने एक बड़ा वृक्ष उस पर दे मारा जिससे विरूपाक्ष का हाथी वहीं मरकर ढेर हो गया। हाथी की पीठ से कूदकर हाथ में तलवार ले विरूपाक्ष सुग्रीव पर झपटा। दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। उसकी तलवार से घायल हो सुग्रीव ने क्रोध से दाँत किटकिटाकर उसके वक्ष पर मुक्के का प्रहार किया। इससे वह और क्रुद्ध हो गया और तलवार के एक ही वार से सुग्रीव का कवच काट डाला। तब अत्यन्त कुपित हो सुग्रीव ने उस पर लगातार अनेक प्रहार किये। उसके शरीर से रक्‍त बहने लगा, एक आँख फूट गई। अन्त में उसने वहीं दम तोड़ दिया।

विरूपाक्ष के वध से कुपित  महोदर ने वानर सेना में भयंकर संहार आरम्भ कर दिया। जब घायल होकर वानर इधर-उधर भागने लगे तो सुग्रीव ने एक बड़ी शिला उस पर दे मारी जिसे महोदर ने अपने बाणों से बीच में ही काट डाला। फिर सुग्रीव ने एक साल वृक्ष से उस पर आक्रमण किया, किन्तु उसने उसे भी काट डाला। जब सुग्रीव ने मारने के लिये परिध उठाया तो महोदर ने गदा से आक्रमण करना आरम्भ कर दिया। युद्ध में जब परिध और गदा दोनों टूट गये तो वे दोनों एक दूसरे पर मुक्कों से वार करने लगे। दोनों में से कोई भी हार मानने को तैयार नहीं था। तभी सुग्रीव और महोदर ने वहाँ पड़ी तलवारों को उठा लिया। महोदर ने तलवार से सुग्रीव का कवच काटने के लिये आक्रमण किया तो तलवार कवच में अटक गई। जब वह तलवार को खींच रहा था तभी सुग्रीव ने उसके सिर को धड़ से अलग कर उसे यमलोक पहुँचा दिया।

महोदर को मर जाने पर महापार्श्‍व सुग्रीव पर तीक्ष्ण हथियारों की मार करता हुआ टूट पड़ा। सामने जाम्बवन्त और अंगद को देखकर उसने अपने बाणों से दोनों को घायल कर दिया। इससे अंगद के नेत्र क्रोध से लाल हो गये। उसने एक परिध को उसकी ओर इतने वेग से फेंका कि उसके हाथ से धनुष और सिरस्त्राण छूटकर दूर जा गिरे। इससे क्रोधित होकर महापार्श्‍व ने एक तीक्ष्ण परशु अंगद पर फेंका किन्तु अंगद ने उसका वार बचाकर पूरी शक्‍ति से राक्षस के सीने पर घूँसा मारा। वज्र के समान घूँसा पड़ते ही उसका हृदय फट गया और वह वहीं मरकर धराशायी हो गया।

इधर जब रावण ने अपने तीनों पराक्रमी वीरों की मृत्यु का समाचार सुना तो उसने अपने तामस नामक अस्त्र से वानरों को भस्म करना आरम्भ कर दिया। रावण को विशाल वानर सेना का संहार करते देख राम और लक्ष्मण अपने-अपने धनुष बाणों को लेकर युद्ध करने के लिये तैयार हुये। सबसे पहले लक्ष्मण ने अपने बाणों से रावण पर आक्रमण किया। रावण लक्ष्मण के बाणों को काटते हुये श्री राम के सामने जा पहुँचा और उन पर बाणों की वर्षा करने लगा। राम ने भी इसका उचित उत्तर दिया और दोनों ओर से भयंकर युद्ध होने लगा। दोनों ही दो भयानक यमराजों की भाँति एक दूसरे से भिड़ रहे थे और नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से आक्रमण कर रहे थे। रावण ने सिंह, बाघ, कंक, चक्रवाक, गीध, बाज, मगर, विषधर जैसे मुख वाले बाणों की वर्षा की तो श्रीराम ने अग्नि, सूर्य, चन्द्र, धूमकेतु, उल्का तथा विद्युत प्रभा के समान बाणों से आक्रमण किया। दोनों ही वीर उन अस्त्रों का निवारण कर नया आक्रमण कर देते थे। कुपित रावण ने दस बाण एक साथ छोड़कर रघुनाथ जी को घायल कर दिया। उसकी चिन्ता न करते हये उन्होंने भी रावण को बुरी तरह से घायल कर दिया।

Tuesday, April 6, 2010

गर्मी बढ़ रही है .. पारा चढ़ रहा है .. प्यास है कि बुझती ही नहीं ..

गर्मी के दिनों में प्रायः प्यास से कण्ठ सूखने लगता है। क्या करते हैं हम प्यास बुझाने के लिये? कोकाकोला, पेप्सी जैसे शीतल पेयों सेवन करके मुनाफाखोर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी गाढ़ी कमाई लुटाते हैं। इनके विज्ञापनों के (कु)प्रभाव के कारण हम अपनी कमाई लुटा कर खुश भी होते हैं। हमारा इस प्रकार से ब्रेनवाशिंग कर दिया गया है कि हमें प्याऊ में उपलब्ध शीतल जल हानिप्रद लगने लगता है और न जाने कितने दिनों पहले पैक किया हुआ सड़ा पानी लाभप्रद। हम पैसे देकर पानी खरीदते हैं।

पहले के समय में भी तो आखिर गर्मी के दिन आते थे और लोग उस गर्मी और लू से मुकाबला भी किया करते थे। उन्हें पता था कि गर्मी से मुकाबला करने के लिये प्रकृति ने हमें मौसमी फलों के रूप में बहुत से उपहार दिये हैं। आइये जानें इन मौसमी फलों के बारे में।

तरबूज

प्यास बुझाने के लिये सर्वोत्तम है तरबूज का सेवन करना। तरबूज जहाँ सुस्वादु होता है वहीं इसमें पानी की इतनी अधिक मात्रा होती है कि प्यासे आदमी को यह तरोताजा कर देता है। तरबूज खाने से जहाँ प्यास बुझती है वहीं यह कैंसर के खतरे से भी मुक्त करता है। इसके सेवन से प्रोटीन और फैट भी मिलता है। गर्मी के दिनों में बाजार में तरबूज अटे पड़े होते हैं और आपको आसानी से प्राप्य है।

खरबूज

तरबूज के जैसे ही खरबूज में भी पर्याप्त मात्रा में पानी होता है और इसे खाने से प्यास बुझती है।

ककड़ी और खीरा

ककड़ी और खीरा में पानी की पर्याप्त मात्रा होती है। इनमें पोटेशियम की भी मात्रा होती है जो कि आपके शरीर में मिनरल का संतुलन बनाये रखते हैं। इनके भीतर पाया जाने वाला स्ट्रोल कोलोस्ट्रोल के स्तर को कम करता है। चूँकि स्ट्रोल खीरे के छिलके में अधिक होता है, इसलिये इसे छिलके के साथ ही खाना अधिक लाभप्रद है।

प्याज

प्याज में पाये जाने वाले तत्व शरीर को लू से लड़ने की पर्याप्त क्षमता प्रदान करते हैं। यही कारण है कि गर्मी के दिनों में प्याज के सेवन का चलन परम्परागत रूप से चला आ रहा है। पुराने समय में तो लोग गर्मी की दोपहरी में निकलते समय कम से कम एक प्याज अपने साथ ही रख लिया करते थे।

टमाटर

टमाटर को लाल रंग प्रदान करने वाला रसायन लिंकोपेन गर्मियों में सूर्य के ताप से त्वचा की रक्षा करने की क्षमता प्रदान करता है। टमाटर विटामिन से भरपूर होते हैं और साथ ही साथ इसमें फैट की भी थोड़ी बहुत मात्रा पाई जाती है। कैंसर से लड़ने की शक्ति तो इसमें होती ही है।

स्ट्राबेरी

स्ट्राबेरी में पानी की पर्याप्त मात्रा होने के साथ ही साथ विटामिन सी भी भरपूर होता है। इसमें पाया जाने वाले एंटी ऑक्सीडेंट्स सूर्य के प्रकाश से त्वचा की रक्षा करते हैं। कैंसर से रक्षा करने वाले तत्व भी इसमें विद्यमान होते हैं।

आम

गर्मी के दिनों की बात हो और आम की बात न हो तो बात ही अधूरी रह जाती है। आम ग्रीष्म ऋतु का प्रमुख फल है और इस फलों का राजा माना गया है। रसीले आमों में पाया जाने वाला पोटेशियम शरीर में मिनरल की कमी को पूरा करता है।

और अन्त में प्रस्तुत है सेनापति का ग्रीष्म ऋतु वर्णनः

वृष को तरनि तेज सहसौं किरन करि
ज्वालन के जाल बिकराल बरखत हैं।
तचति धरनि, जग जरत झरनि, सीरी
छाँह को पकरि पंथी पंछी बिरमत हैं॥
सेनापति नैकु दुपहरी के ढरत, होत
धमका विषम, जो नपात खरकत हैं।
मेरे जान पौनों सीरी ठौर कौ पकरि कोनों
घरी एक बैठी कहूँ घामैं बितवत हैं॥

Monday, April 5, 2010

यात्रा में निकलने के पहले

छुट्टियाँ बिताने के लिये पूरे परिवार के साथ यात्रा में जाने का शौक भला किसे नहीं होता। घूमने जाने के नाम से बच्चे सबसे अधिक रोमांचित होते हैं पर साथ ही साथ बड़े भी उत्साहित रहते हैं। पर अक्सर होता यह है कि लोग बिना किसी पूर्व योजना तथा तैयारी के यात्रा में निकल पड़ते हैं जिससे उन्हें अनेकों कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। घूमने का सारा मजा किरकिरा हो जाता है। इसलिये अच्छा यही है कि पूरी तरह से सोच-समझ कर यात्रा की पूर्व योजना बनायें और समस्त तैयारियों के साथ ही यात्रा में निकलें।

पूर्व योजनाः
  • यात्रा में जाने की योजना पर्याप्त समय पहले ही बनायें और अपना कार्यक्रम निश्‍चित कर लें जैसे कि कहाँ जाना है, कब जाना है, वहाँ रहने के दौरान वहाँ का अनुमानित मौसम कैसा रहेगा इत्यादि।
  • यह भी विचार कर लें कि किस स्थान पर किस माध्यम से जायेंगे फ्लाइट, रेल या टैक्सी/बस से। यह भी तय कर लें कि किस स्थान में कितने दिनों तक ठहरना है।
  • अपने जेब को ध्यान में रखते हुये अपना बजट भी पहले ही निश्‍चित कर लें।
  • हवाई जहाज से घूमने की इच्छा भला किसे नहीं होती। आजकल कई कंपनियाँ पर्यटकों को सस्ते दर पर टिकिट देती हैं इसलिये पहले ही पता कर लें कि कौन सी कंपनी आपके बजट के अनुरूप दर पर टिकिट दे रही है।
  • सब कुछ तय हो जाने के बाद अपने जाने तथा आने के लिये फ्लाइट, रेल आदि के आरक्षण की उचित व्यवस्था कर लें। जहाँ तक हो सके होटल आदि की व्यवस्था भी पहले ही कर लें जिससे कि गंतव्य स्थान में पहुँचने के बाद जगह ढूँढने में आपका समय बर्बाद न हो। आजकल इंटरनेट की सुविधा होने से आरक्षण, होटल बुकिंग आदि कार्य घर बैठे ही आसानी के साथ किया जा सकता है।
  • यात्रा के दौरान अपने साथ ले जाने वाली वस्तुओं की सूची भी बना लें ताकि ऐन वक्‍त पर कोई चीज छूट न जाये।
तैयारियाँ
  • घर से निकलने के पहले निश्‍चित कर लीजिये कि टूथब्रश, टूथपेस्ट, साबुन, शैम्पू, तौलिया, शेविंग किट, बाल सँवारने के सामान आदि रख लिया गया है। प्रायः लोग इन्हीं चीजों को रखना भूल जाते हैं।
  • बुखार तथा दर्दनिवारक गोलियाँ, बैंडएड आदि जैसी कुछ आवश्यक दवाएँ और फर्स्ट-एड बाक्स रखना कदापि न भूलें। सम्पूर्ण यात्रा के दौरान कभी भी इनकी जरूरत पड़ सकती है।
  • एक छोटा टार्च, एक छोटा चाकू और एक छोटा ताला अपने साथ अवश्य रखें, ये यात्रा में बहुत काम आती हैं।
  • यद्यपि आजकल सभी पर्यटन स्थलों मे खान-पान की पर्याप्त व्यवस्था होती है, फिर भी अपने साथ कुछ हल्के नाश्ते का सामान भी रख लें।
  • अपने साथ अनावश्यक और भारी सामान कभी भी न रखें। छोटी-छोटी पैकिंग करें जिन्हें परिवार के लोग स्वयं ही उठा सकने में समर्थ हों क्योंकि यात्रा के दौरान अपने सामानों को स्वयं उठा कर ले जाने के अवसर अनेकों बार आते हैं।
कुछ सुझाव
  • महत्वपूर्ण कागजातों जैसे कि टिकिट, पासपोर्ट, क्रेडिट तथा एटीएम कार्ड्स, ड्राइव्हिंग लायसेंस आदि की छायाप्रति बनवा लें ताकि यदि कोई कागजात खो जाता है तो छायाप्रति से काम चलाया जा सके।
  • आवश्यकता से अधिक नगद रकम साथ न रखें और प्लास्टिक मनी अर्थात् क्रेडिट तथा एटीएम कार्ड्स का पूरा-पूरा उपयोग करें।
  • अपने सभी पैकिंगों पर अपना नाम व पता लिख दें, उनके भीतर भी अपने नाम व पते की स्लिप डाल दें।
  • परिचित लोगों के फोन नंबरों की सूची साथ रखें।
  • कहीं पर भी कूड़ा-करकट न फैलायें बल्कि उपयोग करने के बाद पालीथिन झिल्ली, डिस्पोजेबल गिलास आदि को कूड़ेदान में ही डालें।
  • नियम और कानून की अवहेलना ना करें।
  • हमेशा अपना व्यवहार सम्भ्रान्त रखें और अनजान लोगों पर एकाएक विश्‍वास न करें।
यदि आप उपरोक्‍त बातों का ध्यान रखेंगे तो आपको निश्‍चिंत होकर अपनी छुट्टियों तथा यात्रा का पूरा-पूरा मजा लेने का मौका अवश्य ही मिलेगा।

यात्रा सुविधा प्रदान करने वाली साइट्सः

Sunday, April 4, 2010

मौन मूर्खता को छिपाता है

मौन रह कर लोगों को सोचने दो कि तुम मूर्ख हो या नहीं, मुँह खोल कर उन्हे समझ जाने का अवसर मत दो कि तुम वास्तव में मूर्ख हो!

(Better to remain silent and be thought a fool, than to open your mouth and remove all doubt.)

Saturday, April 3, 2010

काम की लगे तो इस पोस्ट को पढ़ें ... अन्यथा बीच में ही छोड़ दें

कौन सी पोस्ट काम की है और कौन सी नहीं यह तो पाठक ही तय कर सकता है। कोई पोस्ट किसी के काम की होती है तो वही पोस्ट किसी अन्य के काम की नहीं होती। सुभाषित अर्थात् सद्‍वचन भी आजकल बहुत से लोगों को काम के नहीं लगते। इस पोस्ट में मैं कुछ अंग्रेजी के कुछ सुभाषितों को उनके हिन्दी अर्थ के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ इसलिये शायद कुछ लोगों को काम की लगे और कुछ को नहीं। इसीलिये पहले ही अनुरोध कर दिया कि यदि काम की लगे तो इस पोस्ट को पढ़ें, अन्यथा बीच में ही छोड़ दें।


Ability may get you to the top, but it takes character to keep you there.

योग्यता आपको सफलता की ऊँचाई तक पहुचा सकती है किन्तु चरित्र आपको उस ऊँचाई पर बनाये रखती है।


The foundation stones for a balanced success are honesty, character, integrity, faith, love and loyalty.

संतुलित सफलता के लिये ईमानदारी, चरित्र, अखंडता, विश्वास, प्रेम और निष्ठा नींव के पत्थर हैं।


Character is higher than intellect.

बुद्धि से चरित्र का स्थान ऊँचा है।


Weakness of attitude becomes weakness of character.

प्रवृति की दुर्बलता चरित्र की दुर्बलता बन जाती है।


If you want to judge a man's character, give him power.

किसी के चरित्र को परखना हो तो उसे अधिकार देकर देखो।

Friday, April 2, 2010

धकड़िक फकछक धकड़िक फकछक और सुहानी रात ढल चुकी ...

हम ऑटो में बैठे तो उसमें लगे एफएम रेडियो से गाना सुनाई पड़ा "सुहानी रात ढल चुकी ..."।

हम खुश हो गये कि चलो पुराना गाना सुनने को मिलेगा। पर ज्योंही बोल खत्म हुआ कि "धकड़िक फकछक" "धकड़िक फकछक"। ये कौन सा ताल है भाई? और ये क्या? "ना जाने तुम कब आओगे" के बदले "ना जाने तुम कब आओगे"? ये "आओगे" से जाओगे" कैसे हो गया?

गम्भीर अर्थ लिये हुए गानों के साथ बेमेल ताल और बीच-बीच में कुछ भी समझ में न आने वाले अंग्रेजी बोल। ये हैं आज के रीमिक्स गाने। धकड़िक फकछक धकड़िक फकछक .... दम्म दम्म ...। ये हैं आज के ताल। हमें तो ऐसा लगता है कि कोई सर के ऊपर हथौड़ा मार रहा है। पर किया ही क्या जा सकता है? यही आज की पसंद है।

क्या ये रीमिक्स दूसरों की संपत्ति पर दिन दहाड़े डाका नहीं है? एक डाकू क्या करता है? केवल दूसरों की संपत्ति को लूट खसोट कर अपना करार देने के सिवाय? आज पुराने गानों का रीमिक्स बनाने वाला भी लुटेरों की श्रेणी में ही तो आता है। उसके भीतर इतनी कल्पनाशीलता तो होती ही नहीं है कि कोई नई यादगार धुन का निर्माण कर सके, हाँ, दूसरों के द्वारा परिश्रम करके बनाये गये सुरीले धुनों को विकृत अवश्य कर सकता है।

आपको जानकारी होगी कि पुराने लोकप्रिय गीतों की रचना का श्रेय किसी एक व्यक्ति ने कभी भी नहीं लिया क्योंकि वे गीत सामूहिक परिश्रम के परिणाम थे। आज भी यदि आप में से किसी के पास पुराने गीतों के रेकार्ड (लाख या प्लास्टिक का तवा) तो आप उस पर छपे हुये विवरण में पढ़ सकते हैं कि गायक/गायिका - अबस, संगीत निर्देशक - कखग, गीतकार - क्षत्रज्ञ आदि आदि इत्यादि। मेरे कहने का आशय यह है कि एक फिल्मी गीत की संरचना किसी व्यक्तिविशेष की नहीं होती।

फिर इतने लोगों के परिश्रम से बनी संरचना को मनमाने रूप में बदल देने का अधिकार किसी को कैसे मिल जाता है?

एक घटना याद आ रही है। प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र ने फिल्म श्री 420 के एक गीत में लिखा था -

"रातों दसों दिशाओं में कहेंगी अपनी कहानियाँ.........."

इसी पर संगीतकार जयकिशन और गीतकार शैलेन्द्र के बीच जोरदार तकरार हो गया था। जयकिशन का ऐतराज था कि दिशाएँ दस नहीं आठ होती हैं और शैलेन्द्र को शब्द बदलने के लिये दबाव डालने का प्रयास किया था। पर शैलेन्द्र अपने बोलों पर अड़े रहे। उन्होंने साफ साफ कह दिया कि तुम्हें धुन बनाने से मतलब होना चाहिये, गीत के बोलों से नहीं। गीत लिखना मेरा काम है और मैं जानता हूँ कि मुझे क्या लिखना है, यदि धुन बना सकते बनाओ अन्यथा किसी और से गीत लिखवा लो।

तात्पर्य यह कि वे गीतकार इतने स्वाभिमानी थे कि अपने लिखे गीत के एक शब्द में जरा भी परिवर्तन सहन नहीं कर पाते थे। (हमारे यहाँ पृथ्वी और आकाश को भी दिशा ही माना गया है और इस प्रकार से वास्तव में दस दिशायें ही होती हैं।)

हमारा प्रश्न यह है कि रीमिक्स बनाने वालों को गाने के ताल को बदलने के साथ ही साथ गीतकार के शब्दों को बदलने का अधिकार किसने दे दिया?

जिन गानों के रीमिक्स आज बन रहे हैं उनके गीतकार, संगीतकार, गायक, री-रेकार्डिंग तकनीशियन आदि में से प्रायः बहुतों का स्वर्गवास हो चुका है। क्या उनकी आत्मा इन रीमिक्स गानो को सुनकर रोती नहीं होंगी?

Thursday, April 1, 2010

किसे मूर्ख बना रहे हैं आप? ... हम तो पहले से ही मूर्ख हैं

हाँ भाई, हम स्वीकार कर रहे हैं कि हम पहले से ही मूर्ख हैं। अब आप खुद सोचें कि किसी मूर्ख को मूर्ख बनाकर आप खुद ही मूर्ख बनेंगे कि नहीं? आज हम "एप्रिल फूल डे" मना कर खुश हो रहे हैं यह हमारी मूर्खता नहीं है तो क्या है? क्या कोई बुद्धिमान अपनी संस्कृति, सभ्यता, रहन सहन आदि को भूल कर विदेशियों का अनुकरण कर सकता है? ऐसा काम तो सिर्फ मूर्ख ही करते हैं। अब तो आप समझ ही गये होंगे कि हम पक्के मूर्ख हैं। तो कृपया हम मूर्ख को और मूर्ख बना कर अपनी बुद्धि को बर्बाद करने की कोशिश ना करें।

मूर्ख होना हमारी नियति है; हम मूर्ख थे, मूर्ख हैं और मूर्ख ही रहेंगे।

 
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