Monday, May 31, 2010

ब्लोगिंग से कमाई तो होने से रही ... काश ज्ञानेश्वरी एक्प्रेस में ही रहे होते ...

एक आदमी वो होता है कि काल का ग्रास बन जाने जैसे हादसे का शिकार होकर भी रुपया कमा लेता है और एक हम हैं कि ब्लोगिंग कर के कुछ भी नहीं कमा सकते। दो-दो लाख रुपये मिल गये ज्ञानेश्वरी एक्प्रेस में मरने वालों के परिवार को किन्तु यदि ब्लोगिंग करते हुए यदि हम इहलोक त्याग दें तो हमारे परिवार को दो रुपये भी नसीब नहीं होगे।

हम पहले भी कई बार बता चुके हैं कि नेट की दुनिया में हम कमाई करने के उद्देश्य से ही आये थे और आज भी हमारा उद्देश्य नहीं बदला है। पर क्या करें? फँस गये हिन्दी ब्लोगिंग के चक्कर में। याने कि "आये थे हरि भजन को और ओटन लगे कपास"। इस हिन्दी ब्लोगिंग से एक रुपये की भी कमाई तो होने से रही उल्टे कभी-कभी हमारा लिखा किसी को पसन्द ना आये तो चार बातें भी सुनने को मिल जाती हैं। अब कड़ुवी बातें सुनने से किसी को खुशी तो होने से रही, कड़ुवाहट ही होती है।

हाँ ब्लोगिंग से टिप्पणियाँ अवश्य मिल जाती हैं! पर इन टिप्पणियों के मिलने से खुशी एक, और सिर्फ एक, आदमी को ही मिलती है और वो हैं हम! ये टिप्पणियाँ हमारे सिवा और किसी को भी खुशियाँ नहीं देतीं, यहाँ तक कि हमारी श्रीमती जी को भी नहीं। यदि हम श्रीमती जी को बताते हैं कि आज हमने अनुवाद करके दो हजार रुपये कमाये हैं तो वे अत्यन्त प्रसन्न हो जाती हैं किन्तु जब हम उन्हें लहक कर बताते हैं की आज हमारे पोस्ट को बहुत सारी टिप्पणियाँ मिली हैं और वह टॉप में चल रहा है तो वे मुँह फुला कर कहती हैं "तो ले आईये इन टिप्पणियों से राशन-पानी और साग-सब्जी"।

उनका मुँह फुलाना नाजायज भी नहीं है। क्योंकि ज्येष्ठ होने के नाते हमने हमेशा उनकी अपेक्षा अपने माँ-बाप और भाई-बहनों की ओर ही अधिक ध्यान दिया। कभी चार पैसे इकट्ठे हुए और सोचा कि श्रीमती जी के लिये एक नेकलेस ले दें तो पता चला कि माता जी की साँस वाली बीमारी ने फिर जोर पकड़ लिया है। उनके इलाज में वे सारे रुपये तो खत्म हो गये और ऊपर से चार-पाँच हजार की उधारी हो गई सो अलग। फिर कभी कुछ रुपये जमा हुए तो बेटे ने बाइक लेने की जिद पकड़ ली और श्रीमती जी के नेकलेस का सपना सपना ही रह गया। चाहे बहन की शादी हो या भाई-बहू का ऑपरेशन, आर्थिक जिम्मेदारी हमारे ही सिर पर आ जाती थी।कुछ कुढ़ने के बावजूद भी, भले ही बेमन से सही, वे हमारे इस कार्य में हमारा साथ देती रहीं।

आज माँ-बाप रहे नहीं और भाई-बहनों के अपने परिवार हो गये। सभी का साथ छूट गया, साथ रहा तो सिर्फ श्रीमती जी का। पर कभी भी तो उन्हें खुशी नहीं दे पाये हम। तो आज उनके मुँह फुलाने को नाजायज कैसे कहें? और आज भी हम इतने स्वार्थी हैं कि टिप्पणियाँ बटोर खुद खुश होने की सोचते हैं। पहले अपनी खुशी का खयाल आता है और बाद में उनकी खुशी का। इस हिन्दी ब्लोगिंग ने बेहद स्वार्थी बना दिया है।

इतना सब कुछ होने के बावजूद भी जब देखते हैं कि उन्हें पहले हमारी खुशी का ही ध्यान रहता है तो सोचने लगते हैं -

ब्लोगिंग से कमाई तो होने से रही ... काश ज्ञानेश्वरी एक्प्रेस में ही रहे होते ...

Sunday, May 30, 2010

अपने ब्लोग का प्रचार अवश्य कीजिये किन्तु इस तरह से नहीं ...

आप एक पोस्ट लिखते हैं और उसमें एक टिप्पणी भी आ जाती है कुछ इस तरह सेः

"मेरे फलाँ ब्लोग में आकर कृपया अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करें।"

याने कि आपने अपने पोस्ट में क्या लिखा है, क्यों लिखा है, सही लिखा है या गलत लिखा है इन बातों से टिप्पणी करने वाले को कुछ भी मतलब नहीं है, मतलब है तो सिर्फ अपने ब्लोग के प्रचार से।
आप अपना ईमेल खोलते हैं कई ईमेल आपको सिर्फ यह सूचना देते हुए मिलते हैं कि मेरे ब्लोग में नया पोस्ट आ चुका है।

ऐसी बातों की कैसी प्रतिक्रिया होती है आप पर? क्या ये अच्छा लगता है आपको? या दिमाग भन्ना जाता है?

हमारा मानना तो यह है कि यदि किसी ने प्रभावशाली एवं पठनीय पोस्ट लिखा है तो पढ़ने वाले तो आयेंगे ही! ऐसा कैसे हो सकता है कि गुड़ हो और मक्खियाँ ना आयें?

पर हम प्रचार को भी गलत नहीं समझते। आखिर बाजारवाद का जमाना है आजकल। विज्ञापन, सेल्समेनशिप आदि लोगों को लुभाने के समस्त तरीके बिल्कुल जायज हैं। आपका पोस्ट आपका उत्पाद है और अपने उत्पाद को बेचने के लिये एक अच्छा विक्रेता (सेल्समेन) बनना जरूरी है।

एक सफल विक्रेता (सेल्समेन) के पास विक्रयकला (सेल्समेनशिप) का होना निहायत जरूरी है। आज ही नहीं बल्कि सदियों से विक्रयकला का चलन चलता ही चला आ रहा है। लगभग सौ साल पहले लिखी गई पुस्तक "भूतनाथ" में 'खत्री' जी ने उस जमाने के विज्ञापन और विक्रयकला को कुछ इस प्रकार से पेश किया हैः

(विज्ञापन की बानगी)
इस जमींदार सूरत वाले आदमी की निगाह चौक की एक बहुत बड़ी दूकान पर पड़ी जिसके ऊपर लटकते हुए तख्ते पर बड़े हरफों में यह लिखा हुआ था -

"यहाँ पर ऐयारी का सभी सामान मिलता है, ऐयारी सिखाई जाती है, और ऐयारों को रोजगार भी दिलाया जाता है। आइये दूकान की सैर कीजिये - "
(विक्रयकला सेल्समेनशिप की बानगी)
कुछ देर देखने के बाद वह आदमी दूकान के अन्दर चला गया और वहाँ की चीजों को बड़े गौर से देखने लगा। एक आदमी जो शायद सौदा बेचने के लिये मुकर्रर था उसके सामने आया और बड़ी लनतरानी के साथ तारीफ करता हुआ तरह-तरह की चीजें दिखाने लगा जो कि शीशे की सुन्दर आलमारियों में करीने से सजाई हुई थीं, दूकानदार ने कहा, "देखिये, तरह-तरह की दाढ़ी और मूँछें तैयार हैं, बीस से लेकर सौ वर्ष का आदमी बनना चाहे तो बन सकता है। जो पूरी तौर पर ऐयारी नहीं जनते, बनावटी दाढ़ी-मूछें तैयार करने का जिन्हें इल्म नहीं  वे इन दाढ़ी-मूछों को बड़ी आसानी से लगा कर लोगों को धोखे में डाल सकते हैं, मगर जो काबिल ऐयार हैं और मनमानी सूरत बनाया करते हैं अथवा जो किसी की नकल उतारने में उस्ताद हैं उनके लिये तरह-तरह के खुले हु बाल अलग रक्खे हुए हैं। (लकड़ी के डिब्बों को खोलकर दिखाते हुए) इन सुफेद और स्याह बालों से वे अपनी मनमानी सूरतें बना सकते हैं, देखिये बारीक, मोटे, सादे और घुँघराले वगैरह सभी तरह के बाल मौजूद हैं, इसके अलावा यह देखिये (दूसरी आलमारी की तरफ इशारा करके) तरह-तरह की टोपियाँ जो कि पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्खिन के मुल्कों वाले पहिरा करते हैं तैयार है और इसी तरह हर एक मुल्क की पोशाकें इधर-उधर खूँटियों पर देखिये तैयार लटक रही हैं। साफे, पगड़ियों और मुड़ासों की भी कमी नहीं है, बस सर पर रख लेने की देर है। आइये इधर दूसरे कमरे में देखिये ये तरह-तरह के बटुए लटक रहे हैं जिनमें रखने के लिये हर एक तरह का सामान भी इस दूकान में मौजूद रहता है। (तीसरे कमरे में जाकर) इन छोटे-बड़े हल्के-भारी सभी तरह के कमन्द और हर्बों की सैर कीजिये जिनकी प्रायः सभी ऐयारों को जरूरत पड़ती है। ....."
तो बन्धु, आप भी अपने पोस्ट का प्रचार अवश्य कीजिये किन्तु इस तरह से नहीं कि आपके प्रचार का उलटा ही प्रभाव पड़े।

Saturday, May 29, 2010

थोड़ा अध्ययन, थोड़ा अनुभव और थोड़ी कल्पनाशीलता ... और क्या चाहिये पोस्ट लिखने के लिये?

बड़े जोश और उत्साह के साथ लोग आ रहे हैं ब्लोगिंग के क्षेत्र में। जब कोई अपना ब्लोग बना लेता है उसे कुछ कुछ अन्तराल में अपडेट भी करना होता है जिसके लिये सामग्री (content) की जरूरत होती है याने कि पोस्ट लिखनी पड़ती है।

अंग्रेजी ब्लोगिंग में तो ये पोस्ट लिखना एक भारी समस्या बनकर रह गई है। विषय आधारित ब्लोग्स हैं वहाँ पर और प्रत्येक विषय में लाखों करोड़ों-पोस्ट पोस्ट पहले से ही लिखे जा चुके हैं। वहाँ का आलम तो यह है कि मशीनी लेखन किया जा रहा है। ऐसे ऐसे सॉफ्टवेयर्स बन गये हैं जो कि किसी भी अच्छे पोस्ट के आशय को ज्यों का त्यों रखते हुए उसकी भाषा को बदल देते हैं और पुराना लेख नया लगने लगता है। अंग्रेजी ब्लोग में कमाई होने के कारण लेख और बने बनाये ब्लोग्स की खरीदी-बिक्री हो रही है वहाँ पर। शायद आपको पता हो कि तीन डालर से लेकर पच्चीस डालर तक एक लेख की कीमत है वहाँ पर, लेख की जैसी गुणवत्ता, वैसी ही कीमत!

अस्तु, बात हो रही थी अपने ब्लोग को अपडेट करने की, प्रसंगवश बात जरा दूसरी दिशा में मुड़ गई थी। शुरू-शुरू में लगने लगता है कि रोज-रोज आखिर लिखने के लिये हमेशा कुछ नया कहाँ से लायें? किन्तु वास्तव में देखा जाये तो यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। आपका अध्ययन, आपका अनुभव और आपकी कल्पनाशीलता आपको पूरी-पूरी क्षमता प्रदान करती है लेखन की। बस एक बार लिखना शुरू कीजिये और देखिये कि कितना अच्छा लिख लेते हैं आप। गहन अध्ययन है आपका इसलिये लिखने के लिये विषय की कमी नहीं है आपके पास। आप बहुत सी ऐसी बातें जानते हैं जिन्हें शायद दूसरे लोग नहीं जानते। तो अपनी जानकारी को अपने पोस्ट के जरिये दूसरों तक पहुँचाइये ना! आपका ब्लोग अपडेट होता रहेगा और लोगों की जानकारी भी बढ़ती रहेगी। और फिर जितना अधिक आप लिखेंगे उतना ही अधिक आपका आत्मविश्वास भी बढ़ता चला जायेगा।

विश्वास मानिये कि अच्छे-अच्छे विषयों पर लिखे गये आपके पोस्ट हिन्दी को इंटरनेट के आकाश में एक नई ऊँचाई तक पहुचा देंगे।

Friday, May 28, 2010

कुछ छुपा-छुपा सा कुछ झलक रहा सा ...

सौन्दर्य एक ऐसी अनुभूति है जिसका अनुभव प्रत्येक व्यक्ति करता है। जहाँ हम प्राकृतिक सौन्दर्य से अभिभूत होते हैं वहीं नारी का सौन्दर्य हमें सदा ही आकर्षित करता है। ईश्वर ने नारी को सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति ही बनाकर भेजा है। प्रेम, ममता, वात्सल्य और सौन्दर्य नारी के सहज गुण हैं।

(चित्र गूगल इमेजेस से साभार)
आप सोच रहे होंगे कि बुड्ढा शायद सनक गया है। हो सकता है कि मैं सनक ही गया होऊँ क्योंकि बुड्ढे प्रायः सनकी तो हो ही जाते हैं। हमेशा अतीत में जीने वाले होते हैं ये। आज सौन्दर्य की बात इसी लिये लिख रहा हूँ कि अतीत की कुछ बातें याद आ गईं। संगीत का भी अपना एक सौन्दर्य होता है और बात याद आ गई उसी संगीत के सौन्दर्य की।

बात सन् 1973-74 की है जब मेरी नौकरी लगी थी और मुझे पहली बार रायपुर छोड़कर नरसिंहपुर में जाकर रहना पड़ा था। मनोरंजन के लिये सिर्फ सिनेमा और रेडियो था। उन दिनों हम सभी फिल्म संगीत के दीवाने हुआ करते थे। संगीतकारों की भी अपनी अपनी स्टाइल थी जो कि उनकी अपनी पहचान हुआ करती थी। प्रायः सभी संगीतकार अपने संगीत में कहीं न कहीं किसी विशिष्ट वाद्ययंत्र का प्रयोग किया करते थे जैसे कि शंकर जयकिशन के संगीत में एकार्डियन और बाँसुरी का, रवि के संगीत में पियानो का, कल्याणजी आनन्दजी के संगीत में क्लार्नेट का, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत में ढोलक का विशिष्ट प्रभाव हुआ करता था। गाने के आरम्भ होते ही समझ में आ जाता था कि संगीतकार कौन है।

हमारे साथ श्री व्ही.जी. वैद्य भी कार्य करते थे जिनसे हमारी मित्रता हो गई। वे थे मस्त-मौला आदमी और ओ.पी. नैयर के संगीत के दीवाने! (थे इसलिये लिख रहा हूँ कि कई सालों से उनसे सम्पर्क नहीं है)। आलम यह था कि रास्ता चलते यदि कहीं उन्हें कहीं पर भी नैयर जी का संगीत सुनाई पड़ गया तो वहीं पर रुक कर खड़े हो जाते थे, साथ ही जो कोई भी उनके साथ हो उन्हें भी रुक जाने के लिये मजबूर कर देते थे और तब तक वहाँ से न हिलते जब तक कि गाना पूरा न हो जाये।

एक दिन मैंने मित्र से पूछ ही लिया कि यार वैद्य, तुम्हें ओ.पी. नैयर का संगीत इनता प्रिय क्यों लगता है? प्रश्न सुनकर कुछ पल के लिये वह सोचता रहा फिर बोला कि वो क्या है अवधिया, अगर कोई महिला गहनों-कपड़ों से पूरी तरह से ढँकी हो तो उसका एक अलग सौन्दर्य होता है और कोई महिला बिल्कुल भी न ढँकी हो तो उसमें भी एक अलग सौन्दर्य होता है पर यदि कोई महिला कुछ-कुछ ढँकी हो हुई हो और कुछ-कुछ छुपी हुई हो तो उसका सौन्दर्य निराला होता है जो मन को एक अलग ही अनुभूति से भर देता है। मेरे लिये नैयर जी का संगीत तीसरे प्रकार का सौन्दर्य है इसीलिये मैं उनके संगीत का दीवाना हूँ।

Thursday, May 27, 2010

'ररुहा सपनाय दार-भात' याने कि दरिद्र को सपने में भी दाल-भात नजर आता है

दरिद्र व्यक्ति भरपेट भोजन करने की व्यवस्था नहीं कर पाता। या तो आधा पेट खाता है या फिर भूखा ही रह जाता है। नींद में भी उसके अचेतन में भूख ही बसी रहती है इसलिये उसको सपने में दाल-भात अर्थात् भोजन ही नजर आता है। इसीलिये छत्तीसगढ़ी में, जो कि मुहावरों के मामले में अत्यन्त सम्पन्न भाषा है, हाना मुहावरा है "ररुहा सपनाय दार-भात" छ्तीसगढ़ी में दरिद्र को ररुहा कहते हैं।

ये दरिद्र शब्द भी बड़ा विचित्र है! हम समझते हैं कि जिसके पास कुछ भी नहीं है वह दरिद्र है किन्तु देखा जाये तो जिसके पास सब कुछ होता है वे भी दरिद्र की श्रेणी में आ जाते हैं क्योंकि सब कुछ होते हुए भी कुछ और पाने की चाह उन्हें बनी ही रहती है। हमें याद है कि बचपन में हम सायकल चलाने के लिये तरसते थे, सोचा करते थे कि काश हमारे पास भी एक सायकल होता। आज हमने अपने बच्चों को मोटरसायकल दिला दिया है किन्तु फिर भी सन्तुष्ट नहीं हैं वे और कार के लिये तरसते रहते हैं। बचपन में हमारे घर में रेडियो ना होने की वजह से बिनाका गीतमाला सुनने के लिये प्रत्यके बुधवार को रात के आठ बजने से पहले "मान ना मान मैं तेरा मेहमान" बनकर कभी किसी के घर तो कभी किसी के घर पहुँच जाया करते थे। आज गाने मोबाइल से सुने जाते हैं और हमने अपने बच्चों को अपनी हैसियत के अनुसार अच्छे मोबाइल सेट्स दिला दिये हैं किन्तु उन्हें और भी मँहगा मोबाइल सेट्स चाहिये। स्पष्ट है कि कभी सायकल और रेडियो के मामले में दरिद्र थे हम और कार तथा मोबाइल के मामले में हमारे बच्चे दरिद्र हैं आज।

हर वह वस्तु जो हमारी पहुँच में नहीं होती हमें ललचाती है और जिस दिन हमारी हैसियत बढ़ जाती है ‌और हम उसे प्राप्त कर लेते हैं, उसी वस्तु की हमारी नजर में कुछ भी कीमत नहीं रह जाती तथा हम किसी अन्य वस्तु की लालसा करने लग जाते हैं जो कि हमसे समृद्ध लोगों के पास है किन्तु हमारे पास नहीं है।

जिन्हें भरपेट भोजन नहीं मिल पाता उनके लिये अच्छे भोजन का कितना महत्व होता है इसे वे ही समझ सकते हैं जो स्वयं कभी उस स्थिति से गुजर चुके हों। 'मानव मन के कुशल चितेरे' "प्रेमचंद" जी ने अपनी कहानी "कफ़न" में इस तथ्य को बहुत सुन्दर ढंग से चित्रित किया है। वे लिखते हैं:

...दोनो आलू निकाल-निकालकर जलते-जलते खाने लगे। कल से कुछ नही खाया था। इतना सब्र ना था कि उन्हें ठण्डा हो जाने दे। कई बार दोनों की ज़बान जल गयी। छिल जाने पर आलू का बहरी हिस्सा बहुत ज़्यादा गरम ना मालूम होता, लेकिन दोनों दाँतों के तले पड़ते ही अन्दर का हिस्सा ज़बान, हलक और तालू जला देता था, और उस अंगारे को मुँह में रखने से ज़्यादा खैरियत तो इसी में थी कि वो अन्दर पहुंच जाये। वहाँ उसे ठण्डा करने के लिए काफी समान था। इसलिये दोनों जल्द-जल्द निगल जाते । हालांकि इस कोशिश में उन्ही आंखों से आँसू निकल आते ।

घीसू को उस वक़्त ठाकुर कि बरात याद आयी, जिसमें बीस साल पहले वह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वो उसके जीवन में एक याद रखने लायक बात थी, और आज भी उसकी याद ताज़ा थी।

बोला, “वह भोज नही भूलता। तबसे फिर उस तरह का खाना और भर पेट नही मिला। लड़कीवालों ने सबको भरपेट पूड़ियाँ खिलायी थी, सबको! छोटे-बड़े सबने पूड़ियाँ खायी और असली घी की! चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई, अब क्या बताऊँ कि उस भोग में क्या स्वाद मिल, कोई रोक-टोक नहीं थी, जो चीज़ चाहो, मांगो, जितना चाहो खाओ। लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया, कि किसी से पानी न पीया गया। मगर परोसने वाले हैं कि पत्तल में गरम-गरम गोल-गोल सुवासित कचौड़ियां डाल देते हैं। मन करते हैं कि नहीं चाहिए, पत्तल को हाथ से रोके हुए हैं, मगर वह हैं कि दिए जाते हैं और जब सबने मुँह धो लिया, तो पान इलाइची भी मिली। मगर मुझे पान लेने की कहाँ सुध थी! खड़ा हुआ ना जाता था। झटपट अपने कम्बल पर जाकर लेट गया। ऐसा दिल दरियाव था वह ठाकुर!”

माधव नें पदार्थों का मन ही मन मज़ा लेते हुए कहा, “अब हमें कोई ऐसा भोजन नही खिलाता।”

“अब कोई क्या खिलायेगा। वह ज़माना दूसरा था। अब तो सबको किफायत सूझती है। शादी-ब्याह में मत खर्च करो। क्रिया-कर्म में मत खर्च करो। पूछो, गरीबों का माल बटोर-बटोर कर कहाँ रखोगे? बटोरने में तो कमं नही है। हाँ, खर्च में किफायती सूझती है।”

“तुमने बीस-एक पूड़ीयां खायी होंगी?”

“बीस से ज़्यादा खायी थी!”

“मैं पचास खा जाता!”

“पचास से कम मैंने भी ना खायी होगी। अच्छा पट्ठा था। तू तो मेरा आधा भी नही है ।” ...
पूरी कहानी आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

सिर्फ वही व्यक्ति दरिद्रता से दूर रह सकता है जो अपनी हालत में सन्तुष्ट रहते हुए आगे बढ़ते रहने का उद्योग करता रहे। इसीलिये कहा गया है  आयो रे सब सन्तोष धन बाबा सब धन धूल समान रे ....

Wednesday, May 26, 2010

एक कप चाय और ब्लोगवाणी के तलब ने भट्ठा बैठा दिया दिमाग का

आपने भी अनुभव किया होगा कि जब कभी भी परेशानी आती है केवल एक ही परेशानी नहीं आती बल्कि एक के बाद एक परेशानियाँ आती ही चली जाती हैं। कहावत भी है कि "विपत्ति कभी अकेली नहीं आती"। आज सुबह ही सुबह एक कप चाय और ब्लोगवाणी के तलब ने हमें ऐसा परेशान किया कि हमारी हालत खराब हो गई।

आदत के मुताबिक हम रोज सुबह छः बजे उठ जाते हैं और घर के लोगों के सुबह की मीठी नींद में खलल डालना उचित ना समझ कर अपने लिये स्वयं ही एक कप चाय बना लेते हैं। तो ब्रुश करने के बाद रोज की तरह चाय बनाने के लिये जब हम रसोईघर में आये तो देखा कि चाय बनाने के लिये बर्तन एक भी नहीं है। सारे बर्तन पड़े थे क्योंकि कल कामवाली बाई आई ही नहीं थी। दिमाग भन्ना गया हमारा। ये दिमाग का भन्ना जाना या झल्ला जाना ही सभी मुसीबतों की जड़ है। झल्लाहट में आदमी की बुद्धि सही तरीके से काम करना बंद कर देती है। इस झल्लाहट ने हमारी भी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया।

तो हम बता रहे थे कि सारे बर्तन जूठे पड़े थे पर हम कर ही क्या सकते थे। झखमारी एक गंजी को साफ किया और गैस चूल्हे में चाय के लिये दूध चढ़ा दिया। अब जो देखते हैं तो चायपत्ती खत्म है। दिमाग और ज्यादा भन्ना गया। चूल्हा बुझा कर चायपत्ती लेने निकल लिये किन्तु निकलते-निकलते कम्प्यूटर चालू करते गये ताकि हमारे आते तक वो अपने चालू होने की प्रक्रिया को पूरी कर ले। भाई "समय प्रबन्धन" भी तो आखिर कोई चीज है! मुहल्ले की दुकान से चायपत्ती लाकर हमने फिर से चूल्हे को जलाया और दूध में चायपत्ती और शक्कर डाल दिया।

यह सोचकर कि जब तक चाय उबलना शुरू हो क्यों ना ब्लोगवाणी खोल लिया जाये हम कम्प्यूटर रूम में आ गये। पर यह क्या? कम्प्यूटर में किसी भी आइकान को डबल क्लिक करने पर कुछ खुल ही नहीं रहा है। जो कुछ भी कर सकते थे सब कुछ कर के थक गये पर किसी भी प्रोग्राम नहीं खुलना था सो नहीं खुला। इतने में याद आया कि 'अरे हम तो चाय चढ़ा कर आये हैं'। रसोई में जाकर देखा तो उफन कर आधी चाय नीचे गिरी हुई थी और बची हुई चाय इतनी उबल चुकी थी कि काढ़ा बन गया था।

कप में चाय को छाना तो तो पता चला कि मात्र चौथाई कप से भी कम है। दिमाग का पारा एकदम ऊपर चढ़ गया और जी में आया कि फेंक दें इसको। किन्तु ईश्वर ने थोड़ी सी सद्‍बुद्धि दी और हम सोचने लगे कि यदि हम इसे फेंक देंगे तो फिर से चाय बनानी पड़ेगी इसलिये इतनी ही चाय पीकर काम चलाया जाये। सो उतनी ही चाय को लेकर हम फिर से कम्प्यूटर रूम में आये और चुस्की लगाने लगे।

चाय की चुस्की ने दिमाग को थोड़ा शान्त किया तो अचानक हमें नजर आया कि कम्प्यूटर के कीबोर्ड में 'आल्ट की' (ALT Key) तो भीतर ही धँसी हुई है याने कि दब कर अटक गई है। तुरन्त समझ में आ गया कि इस की के दबे रह जाने के कारण ही कोई भी प्रोग्राम खुल नहीं पा रहा है। थोड़ी सी कोशिश करने पर उसका स्प्रिंग काम करने लग गया और सामने ब्लोगवाणी हाजिर हो गई।

सारी झल्लाहट पल भर में काफ़ूर हो गई और हम सोचने लगे कि हम ही हैं जो दूसरों को सैकड़ों बार उपदेश देते रहते हैं कि झल्लाहट के समय दिमाग को शान्त रखने का प्रयास करना चाहिये पर आज खुद पर गुजरी तो समझ में आया कि हम भी "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" ही हैं। वास्तव में झल्लाहट के समय दिमाग को शान्त रखना बहुत ही मुश्किल काम है, सिर्फ स्वयं पर पूर्ण नियन्त्रण रखने वाला व्यक्ति ही इस कार्य को कर सकता है।

पर परेशानियाँ कभी कभी फायदेमंद भी हो जाती हैं। अब देखिये ना, आज की परेशानियों नें इस पोस्ट को जन्म दे दिया।

Tuesday, May 25, 2010

उसने तेरहवीं के भोज में शराब की व्यवस्था की

मैं कोई काल्पनिक नहीं बल्कि सच्ची बात बता रहा हूँ आपको। बात कुछ ही महीने पुरानी है। हम और हमारे दो और मित्र याने कि तीन "डेली ड्रिंक्स" वाले रोज ही रात को इकट्ठे हो जाते हैं। मैंने "डेली ड्रिंक्स" कह कर अपनी टोली को कुछ सम्माननीय बनाने की कोशिश की है क्योंकि अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग कर लेने से सम्मान स्वतः ही बढ़ जाता है, यदि मैंने अपनी टोली के लिये "डेली ड्रिंक्स" के स्थान पर "पियक्कड़" या छत्तीसगढ़ के बस्तरिहा भाषा का शब्द "मंदू भाई" (बस्तरिहा भाषा में दारू को मंद कहा जाता है) प्रयोग किया होता तो हमारी टोली का तो भट्ठा ही बैठ जाता।

हाँ तो मैं बता रहा था कि एक दिन हमारे एक मित्र ने कहा, "यार हमारे यहाँ के एक कर्मचारी के पिता की तेरहवीं है और उसने हमें मित्रों सहित भोज में बुलाया है।"

दूसरे मित्र ने कहा, "छोड़ यार, जाना जरूरी है क्या? वैसे भी मुझे मृत्यु भोज में जाना अच्छा नहीं लगता।"

पहले मित्र ने कहा, "बेचारा चतुर्थवर्ग कर्मचारी है यार और बहुत मानता है मुझको। हम नहीं जायेंगे तो बहुत 'फील' करेगा।"

दूसरा मित्र बोला, "अगर वहाँ जायेंगे तो फिर हमारे 'प्रोग्राम' का क्या होगा?"

मैंने कहा, "एक फुल रख लेते हैं साथ में और किसी ढाबे के पास कार के भीतर ही निबटा लेंगे।"

बात तय हो गई। हम पहुँच गये वहाँ अपनी व्यवस्था के साथ। जिसने निमन्त्रित किया था वह बहुत खुश हुआ हम लोगों को देखकर।

शहर के भीतर ही भीतर जाना हुआ था इसलिये रास्ते में कोई ढाबा नहीं मिला था। ढाबा उसके घर के तीन-चार कि.मी. आगे ही था, इसलिये उससे कहा गया कि हम लोग आधे घंटे में वापस आ रहे हैं खाना खाने के लिये।

सुनकर वह हम लोगों को थोड़े अलग में ले गया और हमें एक 'आरएस' की बोतल हमें देते हुए उसने कहा, "मैं जानता हूँ सर, आप लोग डेली लेने वाले हैं, इसलिये व्यवस्था कर रखी थी। आप लोग इसे निबटा कर जल्दी से आ जाइये और हाँ थोड़ा एहतियात रखिये कि दूसरे लोगों को पता ना चले नहीं तो मेरे समाज में मेरी बहुत बदनामी होगी।"

अब सोचने की बात यह है कि किस ओर चले जा रहे हैं हम और हमारा समाज? आज आलम यह हो गया है कि होली हो तो हम पियेंगे, दिवाली हो तो हम पियेंगे। शादी विवाह हो तो फिर तो बात ही क्या है!  पर्व-तीज-त्यौहार और मांगलिक कार्यों में दारू ने तो पहले से ही अपनी अनिवार्यता बना ली है और अब मृत्यु भोज में भी....

Monday, May 24, 2010

हिन्दी ब्लोगरों के दो, और केवल दो, प्रकार होते हैं - एक महान ब्लोगर दूसरा क्षुद्र ब्लोगर

हिन्दी ब्लोगिंग में हम लगभग तीन साल से हैं और इस दौरान हमने जो कुछ भी देखा, पढ़ा और अनुभव किया उससे सिर्फ यही निष्कर्ष निकलता है कि हिन्दी ब्लोगरों के दो, और केवल दो, प्रकार होते हैं - एक महान ब्लोगर दूसरा क्षुद्र ब्लोगर।

महान ब्लोगर वे होते हैं जो हिन्दी ब्लोगिंग के उद्देश्य एवं लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल रहते हैं और यह तो आप जानते ही हैं कि हिन्दी ब्लोगिंग का उद्देश्य न तो रुपया कमाना है, न अपने मातृभाषा की सेवा करना और नेट में उसे बढ़ावा देना है और ना ही पाठकों को उसके पसन्द की जानकारी ही देना है क्योंकि रुपया की हमें कुछ विशेष जरूरत ही नहीं है, हम आगे बढ़ेंगे तो हिन्दी अपने आप ही आगे बढ़ जायेगी (आखिर हिन्दी हम से है भाई, हम हिन्दी से नहीं) और पाठकों के पसन्द से हमें कुछ लेना देना ही नहीं है। हिन्दी ब्लोगिंग का तो उद्देश्य है महान ब्लोगर बनकर अन्य ब्लोगरों से सर्वाधिक टिप्पणी प्राप्त करना। अतः सफल ब्लोगर वे ही होते हैं जिन्हें सर्वाधिक टिप्पणी प्राप्त होती है।

एक जमाना था जब कि जिसमें मनुष्य के द्वारा किया गया कार्य सफल होता था तो वह मनुष्य महान हो जाता था। बाबू देवकीनन्दन खत्री की कृति "चन्द्रकान्ता" ऐसी लोकप्रिय हुई कि उसे पढ़ने के लिये लाखों लोगों को हिन्दी सीखनी पड़ी और खत्री जी इतिहासपुरुष हो गये। प्रेमचन्द जी की कहानियों और उपन्यासों ने पाठकों के हृदय में घर कर लेने में ऐसी सफलता पाईं कि प्रेमचन्द महान हो गये, "कथा सम्राट" तथा "उपन्यास सम्राट" के नाम से विख्यात हो गये। चन्द्रधर शर्मा गुलेरी जी ने "उसने कहा था" लिखते समय सोचा भी न रहा होगा कि उनकी इस कहानी का अनुवाद संसार के समस्त प्रमुख भाषाओं में हो जायेगा और वे महानता की सीमा को छूने लगेंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि उस जमाने में व्यक्ति का कार्य व्यक्ति को महान बनाता था।

पर आज का जमाना ऐसा है कि महान व्यक्ति के द्वारा किया गया हर कार्य सफल माना जाता है याने कि महान व्यक्ति कार्य को सफल बनाता है। इसीलिये आज के जमाने में आदमी को पहले महान बनना पड़ता है। यही कारण है महान ब्लोगर जो कुछ भी लिख देता है वह हमेशा सफल ही होता है और उसे सर्वाधिक टिप्पणियाँ मिलती ही हैं। इसलिये आजकर सफल पोस्ट लिखने के बजाय महान ब्लोगर बनने के लिये उद्योग करना ही उचित है।

सावधान! कहीं धोखे मे आकर अपना यूजरनेम और पासवर्ड किसी को ना दे दीजियेगा

अभी ज्योंहीं मैने अपना जीमेल खोला तो एक मेल पर नजर पड़ी जो इस प्रकार से हैः

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यह मेल किसी बदनीयत आदमी या संस्था की ओर से भेजा गया है जो लोगों के यूजरनेम और पासवर्ड चुराना चाहता है वो भी "चोरी और सीनाजोरी" के तौर पर। मैं समझता हूँ कि ऐसा मेल उसने सिर्फ मुझे ही नहीं बल्कि बहुत सारे लोगों को भेजा होगा। हो सकता है कि आपको भी यह मेल मिला हो। अतः मैं आपको सावधान कर देना चाहता हूँ कि भूल कर भी माँगी गई जानकारी न दें।

हमेशा याद रखें कि कोई भी मेल सेवा प्रदान करने वाली ख्यातिप्राप्त संस्था कभी भी आपसे आपका यूजरनेम और पासवर्ड की जानकारी नहीं नहीं माँगती।

Sunday, May 23, 2010

बैंड बाजा से दिल्ली ब्लोगर्स मिलन से क्या सम्बन्ध? ... आखिर कितनी टिप्पणियाँ मिटायें हम?

कल के हमारे पोस्ट का विषय था बैंड बाजा। लोगों ने उसे पढ़ा भी और और उस पर अपनी राय भी व्यक्त किया। बहुत अच्छा लगा हमें, आखिर हम भी जाने माने नहीं तो कम से कम एक तुच्छ ब्लोगर ही हैं जो अपने पोस्ट में टिप्पणियाँ पा कर फूला नहीं समाता। किन्तु उनमें दो टिप्पणियाँ दिल्ली ब्लोगर्स मिलन के सम्बन्ध में थीं। बहुत सोचने विचारने के बाद भी हमारी अल्पबुद्धि यह समझ ही नहीं पाई कि आखिर बैंड बाजा से दिल्ली ब्लोगर्स मिलन से सम्बन्ध ही क्या है? हमें लगा कि वे टिप्पणियाँ हमारे टाट रूपी पोस्ट में मखमल रूपी पैबंद हैं। अब मखमल और टाट का मेल तो अच्छा लग ही नहीं सकता ना? इसीलिये तो मुहावरा बनाया गया है "मखमल में टाट का पैबंद"। और फिर यहाँ तो बात ही उलटी थी याने कि यहाँ पर "टाट में मखमल का पैबंद" था।

हमें लगा कि ये दोनों टिप्पणियाँ तो हमारे "क्या आपको याद है कि पिछली बार कब सुना था आपने बैंड बाजा?" का ही बैंड बाजा बजा दे रही हैं। अतः विवश होकर हमें वे दोनों टिप्पणियाँ मिटानी पड़ीं। हाँ टिप्पणीकर्ता की भावनाओं को ध्यान में रखकर हमने अपने उसी पोस्ट में अपनी यह टिप्पणी भी कर दीः

कुमार जलजला जी,

आपने मेरे पोस्ट पर दो दो बार टिप्पणियाँ की जिसके लिये मैं आपको धन्यवाद देता हूँ किन्तु आपकी दोनों टिप्पणियों का इस पोस्ट के विषय से कुछ भी सम्बन्ध ना होने के कारण विवश होकर मैं इन्हें मिटा रहा हूँ जिसके लिये मुझे खेद है।
मित्रों, ऐसा नहीं है कि कुमार जलजला, जो कि किसी का छद्मनाम है, ही ऐसी टिप्पणी करते हैं बल्कि और भी बहुत से लोग भी ऐसा करते हैं। मेरे साथ बहुत बार ऐसा हुआ है कि मेरे पोस्ट का विषय कुछ और होता है और उसमें टिप्पणियाँ किसी ऐसे विषय पर आती हैं जिनका मेरे पोस्ट के विषय से दूर-दराज का भी सम्बन्ध नहीं होता। ऐसी टिप्पणियों को पढ़कर क्या आपको नहीं लगता कि लोग पोस्ट को पढ़े बिना ही कुछ भी टिप्पणी कर देते हैं? लोग ऐसा क्यों करते हैं यह समझ के बाहर की बात है। पुरानी कहावत है "अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग" पर आज तो लगता है कि अपना राग अलापने के लिये अपनी ढपली की भी आवश्यकता नहीं रही है, दूसरे की ढपली पर ही अपना राग अलाप दो याने कि किसी के ब्लोग पर जा कर कुछ भी अनर्गल टिप्पणी कर दो।

अन्ततः हम यही कहना चाहते हैं कि ऐसी टिप्पणियों को मिटाना एक विवशता हो जाती है। किन्तु टिप्पणी मिटाने के लिये भी कुछ ना कुछ समय तो बर्बाद होता ही है ना? तो आखिर कितनी टिप्पणियाँ मिटायें हम?

Saturday, May 22, 2010

क्या आपको याद है कि पिछली बार कब सुना था आपने बैंड बाजा?

कल हम रास्ते में थे कि एकाएक ठिठक कर रुक जाना पड़ा हमें। सामने से एक बारात आ रही थी जिसके आगे आगे लकदक ड्रेस पहने बैंड बाजा वाले सुरीली धुन बजाते हुए चल रहे थे। क्लॉर्नेट से निकलती हुई फिल्म 'मुगल-ए-आज़म' के मेलॉडियस और कर्णप्रिय गाने "मोहे पनघट पे नन्दलाल ..." की धुन ने बरबस ही वहाँ पर तब तक के लिये रोक लिया जब तक कि वह धुन पूरी ना हो गई। संगीत के सम्मोहन ने बहुत देर तक बाँध रखा हमें।

हम सोचने लगे कि पिछली बार कब सुना था हमें बैंड बाजा? बहुत सोचने पर भी याद नहीं आया। सुनें भी तो कैसे? आज बैंड बाजे का चलन रह ही कहाँ गया है? और रहे भी तो कैसे? आजकल जो गाने बनते हैं उन्हें बैंड बाजे पर बजाया भी तो नहीं जा सकता। जी हाँ, बैंड बाजे में मैलॉडी तो बजाई जा सकती है पर शोर को बजाना मुश्किल ही नहीं असम्भव है।

एक जमाना था कि बैंड बाजा के बिना शादी-विवाह जैसे शुभ कार्य सम्पन्न ही नहीं हो पाते थे। वैसे तो रायपुर में उन दिनों बहुत सी बैंड पार्टियाँ थीं किन्तु सबसे अधिक नाम था "सिद्दीक बैंड पार्टी" और "गुल मोहम्मद बैंड पार्टी का"। शादी बारातों और गनेश विसर्जन के जुलूसों में इन्हीं का वर्चस्व दिखाई पड़ता था। ये बैंड वाले जब "कुहूँ कुहूँ बोले कोयलिया ..." की धुन बजाया करते थे तो ऐसा कोई भी न था जो मन्त्रमुग्ध न हो जाये!

आज बैंड बाजा लुप्त हो चुका है, डी.जे. और धमाल पार्टियों के शोर ने बैंड बाजे की मैलॉडी और मधुरता को निगल डाला है।

Friday, May 21, 2010

आपसे एक सवाल, यदि आपकी शादी हो चुकी है

शादी-विवाह का सीज़न चल रहा है आजकल। अक्षय तृतीया के रोज से ही खूब जोर शुरू हो गया है शादियों का। कहीं बारात ले जाने की तैयारी चल रही है तो कहीं बारात स्वागत् की। इन सबको देखकर याद आया कि चौंतीस साल पहले हम भी इस प्रक्रिया से गुजरे थे और विवाह के समय पण्डित जी ने हमसे हमारी श्रीमती जी को सात वचन दिलवाये थे और हमें भी उनसे एक वचन दिलवाया था।

तो आज हमने उन वचनों को याद करने का बहुत प्रयास किया किन्तु एक वचन भी याद नहीं आ सका (सठिया जाने के कारण स्मरणशक्ति का कमजोर हो जाना ही इसका कारण हो सकता है)। और उन वचनों को जानने की जिज्ञासा है कि शान्त ही नहीं हो पा रही है।

तो बन्धुओं आप लोगों से हमारा सवाल है कि क्या आपको वे वचन याद हैं? यदि हैं तो कृपया हमें भी बताने का कष्ट करें।

Thursday, May 20, 2010

भाड़ में जाये अलेक्सा रैंक, गूगल पेज रैंक और गूगल खोज परिणाम ... हिन्दी ब्लोगिंग को इनकी जरूरत ही क्या है?

"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!"

"नमस्काऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!"

"लिख्खाड़ानन्द जी! अभी हाल ही में हमने एक पोस्ट पढ़ी 'हिन्दी ब्लोगर्स - गूगल खोज परिणाम के अनुसार'। हमने सोचा कि लगे हाथों आपके भी गूगल खोज परिणाम देख लें। सच कहें तो आपके इतने कम गूगल खोज परिणाम देखकर हमें बड़ी ही निराशा हुई। अलेक्सा रैंक और गूगल पेज रैंक के मामले में भी आप बहुत पीछे हैं। जल्दी कुछ करिये इस मामले में।"

"टिप्ण्यानन्द जी!  आप तो यह बताइये कि हम हिन्दी ब्लोगिंग में महत्व का स्थान रखते हैं कि नहीं? लोग हमें उस्ताद जी कहते हैं कि नहीं? हमारा पोस्ट आते ही टिप्पणियों की बौछार शुरू हो जाती या नहीं? चिट्ठाजगत और ब्लोगवाणी की हॉट लिस्ट में हम टॉप में रहते हैं या नहीं? फिर क्यों करें कुछ भाई? आप भी ना बस ... आलतू-फालतू की फिकर करते रहते हैं आप।"

"अंग्रेजी ब्लोग वाले तो इन्ही सब चीजों की फिकर में दुबले हुए जाते हैं। पोस्ट प्रकाशित करने के बाद डिग, टेक्नोराटी जैसे कितने ही सोशल बुकमार्किंग साइट्स में अपने पोस्ट का लिंक देते रहते हैं।"

"लगता है टिप्पण्यानन्द जी कि आप हिन्दी ब्लोगिंग की बातों के लिये अंग्रेजी ब्लॉगिंग की नजीर रखने वाले लोगों में से ही एक हैं।"

"लिख्खाड़ानन्द जी! आखिर ब्लोगिंग तो अंग्रेजी से ही आई है ना हमारे पास।"

"तो क्या हुआ? हमने उनसे ब्लोग ले लिया तो इसका मतलब यह तो नहीं कि उनकी हर बात की हम नकल करें? ब्लोग हमारे काम की चीज थी इसलिये हमने उसे ले लिया पर ये अलेक्सा रैंक, गूगल पेज रैंक, गूगल खोज परिणाम, डिग, टेक्नोराटी आदि हमारे किस काम के? आखिर हिन्दी ब्लोगिंग को इनकी जरूरत ही क्या है? भाड़ में जाये अलेक्सा रैंक, गूगल पेज रैंक और गूगल खोज परिणाम।"

"क्यों नहीं है हिन्दी ब्लोगिंग को इनकी जरूरत?"

"इसलिये नहीं है क्योंकि ये सब तो पाठकों की संख्या बढ़ाने वाली चीजे हैं। हमें क्या जरूररत है पाठकों की संख्या बढ़ाने की? हमारे पाठक तो गिनती के सिर्फ कुछ सौ हिन्दी ब्लोगर्स ही हैं और उनमें से अधिकतर हमारे मुरीद हैं ही। तो क्यों हम अपना समय बरबाद करें उन कामों को करने में जिन्हें अंग्रेजी ब्लोगर किया करते हैं। उसके बदले में तो हम समझते हैं कि हमें उस बहुमूल्य समय को अपने मुरीदों को देना चाहिये उन्हें संतुष्ट रखने के लिये ताकि वे हमारे विरोधियों के तरफ ना चले जायें।"

"सही कह रहे हैं आप उस्ताद जी! अब हमें समझ में आ गया कि हम ही गलत थे।"

"शुक्र है कि समझ गये आप! नहीं तो आपको समझाने के लिये बहुत मेहनत करनी पड़ती हमें।"

"लिख्खाड़ानन्द जी! बधाई हो! आपकी पिछले पोस्ट ने तो टिप्पणियाँ पाने में रेकॉर्ड तोड़ दिये। एकदम लाजवाब लिखते हैं आप!"

"टिप्पण्यानन्द जी! यह तो सही है कि हमारे पिछले पोस्ट ने हमें हमारी उम्मीद से भी ज्यादा टिप्पणियाँ दिलाई हैं किन्तु आप भी अन्य टिप्पणी देने वालों के जैसे ही हमारे पोस्ट की तारीफ करेंगे यह हमने नहीं सोचा था।"

"क्यों भाई आपकी पोस्ट जोरदार है तो क्यों तारीफ ना करें?"

"क्या जोरदार है उसमें? भला बताइये तो सही क्या समझा आपने हमारे उस पोस्ट को पढ़कर?"

परेशान होकर सिर खुजाते हुए "कुछ दर्शन-वर्शन की बातें थीं उस पोस्ट में!"

"कैसा दर्शन था?"

"जीऽऽऽऽऽ ......"

"जाने दीजिये, नहीं बता पायेंगे आप। आप क्या कोई भी नहीं बता पायेगा। सरिता-तट पर होने वाली बातें, स्याह-सुर्ख हो पाने की चाहत, दामन में लगने वाले धब्बे, एक भाषा में दूसरी भाषा का घालमेल करके नये-नये शब्दों की ईजाद, सिगरेट के टोटे, घोड़े की लीद आदि बातों से हम पोस्ट कैसे बना लेते हैं यह हम खुद भी नहीं बता सकते तो दूसरा कोई क्या खाक बता पायेगा?

देखिये टिप्पण्यानन्द जी! आप हमारे मित्र हैं इसलिये हम आपको बता देते हैं कि हम क्या लिखते हैं। हम हिन्दी के जाने माने ब्लोगर हैं और जाने माने ब्लोगर ही बने रहना चाहते हैं। जाने माने बने रहने के लिये हिन्दी ब्लोगिंग में अधिक से अधिक टिप्पणियाँ बटोरनी और संकलकों में टॉप में बने रहना बहुत जरूरी है इसलिये हम वही लिखते हैं जिसे कोई पढ़कर समझ पाये या ना समझ पाये, पर हमें महान अवश्य समझे। महान बनने के लिये बहुत सारे फॉर्मूले हैं जिन्हें अपनाना पड़ता है। हम अपने पोस्ट में ऐसा कुछ लिखते हैं जिसे हर आदमी अपने हिसाब से समझ ले। हम दो बातों को, चाहे उनमें समानता हो या ना हो, जोड़ देते हैं ताकि लोग अपने-अपने हिसाब से अटकल लगाते रहें। एक-एक लाइन को सोच-समझ कर लिखना पड़ता है हमें। हमारा काम है अपने लेखन से सभी लोगों को सन्तुष्ट रखना इसीलिये यह जानते हुए भी कि रास्ते में गंदगी तो कुत्ते-बिल्ली भी करते हैं किन्तु हम गाय के गोबर करने को ही रास्ते में गंदगी बतायेंगे जिससे सारे लोग संतुष्ट रहें। हम अपने लेखन से किसी को भी नाराज होने का जरा भी मौका नहीं देना चाहते, यहाँ तक कि विरोधियों तक को भी नहीं, हाँ  छुपे रूप से "देखन में छोटन लगे घाव करै गम्भीर" जैसी एक दो-बातें अवश्य डाल देते हैं ताकी हमारे विरोधी थोड़ा तिलमिला जरूर जायें किन्तु नाराज कदापि ना हों।

अब आप ही बताइये कि यदि हम 'भरत मुनि' के 'नाट्यशास्त्र', 'विशाखदत्त' के 'मुद्राराक्षस', 'कालिदास' के 'कुमारसम्भव', 'भास' के 'प्रतिज्ञायौगन्धरायण', 'सैयद इंशाअल्ला खाँ' के 'रानी केतकी की कहानी', 'कालिदास' के 'कुमारसम्भव', 'सदल मिश्र' के 'नासिकेतोपाख्यान', 'बाबू देवकीनन्दन खत्री' के 'चन्द्रकान्ता सन्तति', 'वृन्दावनलाल वर्मा' के 'झाँसी की रानी', 'शरतचन्द्र' के 'पथ के दावेदार', 'आचार्य चतुरसेन' के 'सोना और खून' जैसे विषयों पर कुछ लिखेंगे तो क्या कोई झाँकने आयेगा हमारे पोस्ट में? इधर-उधर से कुछ पाठक शायद आ जायें उसे पढ़ने के लिये किन्तु टिप्पणी देने वाले हमारे ब्लोगर मित्र तो बिल्कुल ही नहीं आयेंगे क्योंकि इस प्रकार के पोस्ट में उन्हें मजा नहीं आता और वे पोस्ट संकलकों के गर्त में जाकर गुम हो जाते हैं।"

"वाह लिख्खाड़ानन्द जी! महान हैं आप! जब भी हम आपसे मिलने आते हैं, ज्ञान और मर्म की बातें ही लेकर जाते हैं।"

"हमारा तो काम ही ज्ञान बाँटना है टिप्पण्यानन्द जी! हम और भी बहुत सारी बातें बतायेंगे आपको किन्तु आज बस इतना ही क्योंकि हमारे पोस्ट लिखने का समय हो गया है।"

"तो अब मैं चलता हूँ, नमस्कार!"

"नमस्काऽर!"

Wednesday, May 19, 2010

ब्लोगरों का पाश्‍चुराइजेशन - याने कि उनके लेखन स्तर को लंबे समय तक बरकरार रखना

"अवधिया जी, लगता है कि अब ब्लोगर्स का भी पाश्‍चुराइजेशन करना पड़ेगा।" हमसे ललित शर्मा जी ने कहा जो कल एक विवाह समारोह में सम्मिलित होने के लिये रायपुर आये थे।

हमने पूछा, "क्यों भाई?"

"आपने अनुभव किया होगा कि ब्लोगर्स के आज का लेखन स्तर उनके पहले के लेखन स्तर से गिरता जा रहा है। आप तो जानते ही हैं कि दूध को कुछ समय रखने पर वह खराब हो जाता है किन्तु यदि उसे पाश्‍चुराइज्ड कर दिया जाये तो वह तीन से चार महीने तक खराब नहीं होता। ऐसे ही ब्लोगर्स को भी यदि पाश्‍चुराइज्ड कर दिया जाये तो उनका लेखन स्तर लंबे समय तक ज्यों का त्यों बना रहेगा।"

"बात में तो आपके दम है ललित जी! पर पहले यह बताइये कि आखिर ये पाश्‍चुराइजेशन है क्या बला?"

हमारे इस प्रश्न पर ललित जी ने बताया, "पाश्‍चुराइजेशन एक प्रक्रिया है जो भोजन में माइक्रोबियल विकास को धीमा कर देती है जिससे उसका खराब होना रुक जाता है। सबसे पहले भोजन को खराब होने से रोकने के प्रयोग फ्रांसीसी रसायनज्ञ और सूक्ष्मजीव विज्ञानी लुई पाश्‍चर ने किये थे इसलिये इस प्रक्रिया का नाम पाश्‍चुराइजेशन हो गया। वैसे अवधिया जी, आपकी जानकारी के लिये मैं बता दूँ कि पाश्चुराइजेशन बादाम, पनीर, क्रीम, अंडे, दूध, फलों के रस, मधुरस, डिब्बाबंद भोजन, सोया सॉस, बीयर, शराब आदि का किया जा सकता है। हमारे देश में प्रायः दूध का पाश्चुराइजेशन अधिक होता है और निकट भविष्य में ब्लोगर्स का भी अधिक से अधिक पाश्चुराइजेशन होने लगेगा।"

"तो ब्लोगर्स को पाश्चुराइज्ड करने के लिये क्या योजना बनाई है आपने?"

"सबसे पहले तो अवधिया जी, किसी एक ब्लोगर पर पाश्चुराइजेशन का प्रयोग किया जायेगा। यह तो आप मानेंगे ही कि आपका लेखन स्तर दिनों दिन गिरते ही जा रहा है। इसलिये मैंने सोचा है कि यह प्रयोग आप पर ही किया जाये। आप पर प्रयोग करने के दो फायदे हैं, एक तो यह कि हमें हमारे बुजुर्ग ब्लोगर से स्तर के पोस्ट मिलते रहेंगे और दूसरा यह कि यदि प्रयोग में कुछ गड़बड़ी हो जाये और आपका पाश्चुराइजेशन होने के बजाय परलोकगमन हो जाये तो भी हिन्दी ब्लोगजगत को कोई विशेष क्षति नहीं होगी। हाँ तो आपके पाश्चुराइजेशन के लिये आपको लोहे के पाइप के भीतर रखकर उसे  15-20 सेकंड के लिए 71.7 डिग्री सेल्सियस (161 ° एफ) के लिए गर्म किया जायेगा। उसके बाद आपको पैकेज्ड कर दिया जायेगा। तीन माह बाद आपको पैकेज से निकाल कर आपके लेखन स्तर को चेक किया जायेगा। बस इतना छोटा सा ही तो प्रयोग है। प्रयोग के सफल हो जाने पर ब्लोगर्स पाश्‍चुराइजेशन प्लांट भी बना लिया जायेगा।"

"ललित भाई, आप तो हमें बख्श ही दो। आप कहें तो हम ब्लोगिंग ही छोड़ देंगे पर अपने ऊपर ये प्रयोग नहीं होने देंगे।"

"अवधिया जी, इतनी जल्दी निर्णय मत ले लीजिये। जरा सोचिये कि आपके इस कार्य के लिये भविष्य में हिन्दी ब्लोगजगत में आपका कितना नाम होगा। फिलहाल तो मैं कुछ दिनों के लिये दिल्ली जा रहा हूँ तब तक आप अच्छे से सोच लीजियेगा फिर अपना निर्णय बताइयेगा।"

इतना कहकर उन्होंने हमसे विदा लिया और हम सोच रहे हैं कि क्या निर्णय लिया जाये।

Tuesday, May 18, 2010

हिन्दी ब्लोगर्स - गूगल खोज परिणाम के अनुसार

कुछ अत्यन्त लोकप्रिय ब्लोगर्स

समीर लाल
खोज परिणाम लगभग 92,700

अनूप शुक्ल
खोज परिणाम लगभग 75,600






ज्ञानदत्त पाण्डेय
खोज परिणाम लगभग 76,300







P.C. Rampuria (ताऊ)
खोज परिणाम लगभग 3,620






कुछ नियमित लेखन करने वाले ब्लोगर्स

raviratlami (रवि रतलामी)
खोज परिणाम लगभग 161,000






पी.सी.गोदियाल
खोज परिणाम लगभग 128,000






दिनेशराय द्विवेदी
खोज परिणाम लगभग 74,700






राज भाटिया
खोज परिणाम लगभग 16,400
 





कुछ छत्तीसगढ़ के ब्लोगर्स

ललित शर्मा
खोज परिणाम लगभग 139,000






अनिल पुसदकर
खोज परिणाम लगभग 20,800






राजकुमार सोनी
खोज परिणाम लगभग 29,700






जी.के. अवधिया
खोज परिणाम लगभग 178,000






अपने पसंदीदा ब्लोगर्स के खोज परिणाम आप स्वयं भी गूगल सर्च करके देख सकते हैं, ध्यान रहे कि खोज करते समय ब्लोगर का नाम इनव्हर्टेड कामाज के बीच होना चाहिये।

भूल सुधार

ललित शर्मा जी ने निम्न टिप्पणी करके बताया है कि ताऊ जी के खोज परिणाम के मामले में हमसे एक गलती हो गई हैः

ऊपर जो P.C. ramapuria के नाम से सर्च रिजल्ट दिये गये हैं वो ताऊ के असली
सर्च रिजल्ट नही हैं. ताऊ ने उपरोक्त नाम से कमेंट करना काफ़ी पहले बंद कर दिया है.
ताऊ अब ताऊ के नाम से कमेंट करते हैं और इस ताऊ शब्द से सर्च करने पर मुझे
2,52,000 रिज्ल्ट प्राप्त हुये. यह सुधार अपेक्षित है.
अतः कृपया ताऊ जी के खोज परिणाम को 3,620 स्थान पर 2,52,000 पढ़ा जाये।


ललित जी को धन्यवाद देते हुए हम अपनी भूल के लिए खेद प्रकट करते हैं।

Monday, May 17, 2010

हम डोकरे हैं तो क्या हुआ पर छोकरे हैं

क्या आपको लगता है कि हम डोकरे (बुड्ढे) हो गये हैं? हमें तो यही लगता है कि अब तक हम छोकरे ही हैं। इसीलिये तो सींग कटा कर बछड़ों में शामिल रहा करते हैं। अब छोकरे ना बनें तो क्या करें? वो दिन तो अब रहे नहीं कि सारा-सारा दिन और सारी-सारी रात अपनी घरवाली के साथ काट दें। और यदि कोशिश करके भी ऐसा करना चाहें तो भी हो नहीं सकता, आखिर वो भी तो डोकरी हो गई हैं। समय काटने के लिये किसी हमउम्र दोस्त भी नहीं खोज सकते। हमारे बहुत सारे मित्र तो बहुत पहले से ही सटक लिये हैं और जो बचे हैं वे अपनी परेशानियों से परेशान रहते हैं, हमसे मिलने का समय ही नहीं रहता उनके पास। कभी जिनके साथ दिन-रात का हमारा साथ हुआ करता था अब उनसे महीनों और कभी-कभी तो सालों मुलाकात नहीं होती। इसी कारण से सींग कटा कर बछड़ों में शामिल रहना हमारी मजबूरी बन गई है।

ये समय भी बड़ा विचित्र है। पल-पल करके बढ़ते ही चला जाता है। दिन पर दिन और रात पर रात बीतते चले जाते हैं और इसके साथ ही उमर चुकती चली जाती है। पता ही नहीं चलता कि कब बचपना बीत गया, कब जवानी ने साथ छोड़ दिया और कब बुढ़ापे ने दबोच लिया। कभी पहली कक्षा में पढ़ी "किसी मित्र ने पत्र लिखा था एक चित्र भी साथ रखा था" जैसी पंक्तियाँ याद आ जाती हैं तो लगने लगता है कि अभी भी हम रायपुर के अपने तात्यापारा प्राथमिक शाला की पहली कक्षा में बैठे हुए हैं। कभी "दोहा एक मात्रिक छंद है जिसके चार चरण होते हैं, प्रथम और तृतीय तथा द्वितीय और चतुर्थ चरणों में क्रमशः तेरह-तेरह और ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती हैं" याद आ जाता है तो लगता है कि अब हम सातवीं-आठवीं कक्षा में पहुँच गये हैं। कभी गव्हर्नमेंट स्कूल के पास से गुजरना होता है तो लगने लगता है अरे अभी कल ही तो हम केमेस्ट्री लैब में हाथ में परखनली लिये हुए प्रयोग करने में जुटे हुए थे। किन्तु ज्योंही उसके आस-पास निगाहें जाती हैं और सब कुछ बदला-बदला नजर आने लगता है तो फिर हम आज के अपने जमाने में पहुँच जाते हैं और एहसास हो जाता है कि हमारी बहुत लंबी उम्र बीत चुकी है।

जिस प्रकार से काने को काना कहा जाना सहन नहीं हो पाता उसी प्रकार से डोकरे को भी स्वयं का डोकरा कहा जाना पसन्द नहीं आता। हमारे भीतर की आवाज कहती है कि 'बस भी करो अब, डोकरे हो गये हो' किन्तु हम हैं कि खुद को डोकरा मानने के लिये तैयार ही नहीं हैं। कभी "अभी तो मैं जवान हूँ ..." गाने को गुनगुनाने लगते हैं तो कभी पोस्ट लिख देते हैं "हम डोकरे हैं तो क्या हुआ पर छोकरे हैं"।

Sunday, May 16, 2010

पोस्ट का शीर्षक धाँसू ना हो तो उसे पढ़ेगा कौन?

अपने पोस्ट को पढ़वा लेना हँसी खेल नहीं है। बहुत मेहनत करनी पड़ती है इसके लिये। यह बात मैं नामी-गिरामी ब्लोगरों के लिये नहीं, बल्कि अपने जैसे साधारण ब्लोगरों के लिये कह रहा हूँ। नामी-गिरामी ब्लोगरों के तो पोस्ट आने से पहले ही पाठक आ धमकते हैं पर हम जैसे साधारण ब्लोगरों को तो पाठकों को आकर्षित करना पड़ता है।

जैसे मदारी साँप-नेवले की लड़ाई दिखाने की बात करके भीड़ इकट्ठा करता है और आखिर में ताबीज बेचने लगता है उसी तरह से हमारे जैसे ब्लोगरों को भी पाठक जुटाने के लिये कोई धाँसू शीर्षक खोजना पड़ता है ताकि हम अपना पोस्ट रूपी ताबीज बेच सकें। यदि हम अपने पोस्ट का शीर्षक "अक्षय तृतीया" या "आज अक्षय तृतीया है" जैसा कुछ रखते तो क्या आप आते इसे पढ़ने के लिये? नहीं आते ना!

लेकिन अब आ ही गये हैं तो हम जानते हैं कि आप में से कुछ लोग आगे भी हमें झेल लेंगे। कहने का मतलब यह है कि पोस्ट तो है हमारा अक्षय तृतीया पर किन्तु शीर्षक है कुछ और, जो आपको खींच कर ला सके।

तो लीजिये अब झेलिये थोड़ा सा अक्षय तृतीया के बारे में भीः
  • मान्यता है कि वैशाख मास के शुक्ल पक्ष तृतीया के दिन किये गये किसी भी शुभ कार्य का अक्षय फल मिलता है इसीलिये इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है।
  • अक्षय तृतीया के दिन शुभ कार्य करने के लिये मुहूर्त नहीं देखा जाता क्योंकि यह तिथि ही स्वयंसिद्ध मुहूर्त है। इस दिन विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों या जमीन-जायजाद, वाहन आदि की खरीददारी जैसे किसी भी मांगलिक कार्य करने के लिये पंचांग में शुभ मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती।
  • अक्षय तृतीया के दिन से ही वर-विवाह करने का आरम्भ होता है। भारतवर्ष के अनेक क्षेत्रों में इस दिन गुड्डे गुड्डियों के विवाह रचाने का चलन है।
  • भविष्य पुराण के अनुसार सतयुग और त्रेतायुग का आरम्भ अक्षय तृतीया के दिन से ही हुआ था।
  • भगवान परशुराम का जन्म अक्षय तृतीया के दिन ही हुआ था।
  • भारत के प्रमुख तीर्थ बद्रीनाथ तथा केदारनाथ के कपाट इसी दिन से खोले जाते हैं।
  • अक्षय तृतीया के दिन ही महाभारत के युद्ध का समापन हुआ था।
  • छ्तीसगढ़ में अक्षय तृतीया को 'अकती' त्यौहार के रूप में मनाते हैं। इसी दिन से खेती-किसानी का वर्ष प्रारम्भ होता है। इसी दिन पूरे वर्ष भर के लिये नौकर लगाये जाते हैं। शाम के समय हर घर की कुँआरी लड़कियाँ आँगन में मण्डप गाड़कर गुड्डे-गुड्डियों का ब्याह रचाती हैं।

Saturday, May 15, 2010

क्या अंग्रेजी और अन्य भाषाओं के ब्लोगर्स में भी कभी बड़े छोटे ब्लोगर्स का विवाद हुआ है?

हम गूगल कर-कर के थक गये यह जानने के लिये कि क्या अंग्रेजी और अन्य भाषाओं के ब्लोगर्स में भी कभी बड़े छोटे ब्लोगर्स का विवाद हुआ है? अनेक प्रकार से सर्च किया  कभी सर्च बॉक्स में history of blogging लिखकर, कभी who is big blogger लिखकर, तो कभी और भी इसी प्रकार के कीवर्ड्स लिखकर  किन्तु हमें हमारे प्रश्न का उत्तर नहीं मिल पाया।

इसका निष्कर्ष तो यही निकलता है कि अन्य भाषाओं के ब्लोगर्स बेवकूफ हैं जो यह तक नहीं बता सकते कि उनमें कौन बड़ा ब्लोगर है और कौन छोटा। उनकी बेवकूफी का एक और उदाहरण यह है कि वे टिप्पणियों की परवाह नहीं करते, उन्हें तो सिर्फ यही चिन्ता खाती है कि मैं ऐसा क्या लिखूँ कि उसे पढ़ने के लिये मेरे ब्लोग में लाखों करोड़ों की संख्या में पाठक आ जायें। है ना बेवकूफी? पाठकों की संख्या का भी भला कोई महत्व है? महत्व तो टिप्पणियों की संख्या का होता है, जितनी ज्यादा टिप्पणियाँ उतना ही बड़ा ब्लोगर!

इससे सिद्ध होता है कि विद्वान और महान तो हम हिन्दी के ब्लोगर्स ही हैं।

Friday, May 14, 2010

कौन है बड़ा ब्लोगर?

ब्लोगरी न हुई लड़ाई का मैदान हो गया। घमासान मचा हुआ है किसी को बड़ा ब्लोगर और किसी को छोटा ब्लोगर सिद्ध करने के लिये।

ब्लोगर तो ब्लोगर होता है, न वह छोटा होता है और न ही बड़ा। ब्लोगर का काम है अपने ब्लोग के माध्यम से अपनी भाषा के साथ ही साथ लोगों का और स्वयं का भला करना। इसमें बड़े और छोटे का प्रश्न कहाँ से आ गया? क्यों किसी को बड़ा और किसी को छोटा माना जाये?

क्या ब्लोगिंग का उद्देश्य किसी को बड़ा और किसी को छोटा दर्शाना ही रह गया है?

हमारे विचार से तो जो ब्लोगिंग के माध्यम से "सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय" का कार्य कर रहा है वही सबसे अच्छा ब्लोगर है।

Thursday, May 13, 2010

आज जरूरत है तो श्रेष्ठता, महत्ता आदि को भूल कर निस्वार्थ भाव से ब्लोगिंग करने की

हिन्दी ब्लोगिंग से कमाई कुछ भी नहीं होती, कमाई होना तो दूर अपने जेब के पैसे भी घुस जाते हैं। आखिर इंटरनेट कनेक्शन मुफ्त में थोड़े ही प्राप्त होता है। हिन्दी का ब्लोगर अपना बहुमूल्य समय और गाढ़ी कमाई खर्च करके ब्लोगिंग कर रहा है। आखिर क्यों? क्या उद्देश्य है ब्लोगिंग करने का?

बिना उद्देश्य के कोई कार्य नहीं होता। ब्लोगिंग करने के लिये भी अवश्य ही उद्देश्य हैं। ब्लोगिंग करने का उद्देश्य महज अपने विचारों को लोगों के समक्ष रखना ही है। ब्लोगिंग के रूप में एक बहुत अच्छा मंच मिल गया है अपने विचारों की प्रस्तुति के लिये।

स्वाभाविक है कि जब बहुत सारे लोग ब्लोगिंग करेंगे तो सभी एक बराबर तो रहेंगे नहीं, कुछ लोग आगे निकल जायेंगे और कुछ लोग पीछे रह जायेंगे। और ये आगे निकल जाना और पीछे रह जाना ही तरह-तरह के उठा-पटक पैदा करने लग जाता है; अनेक प्रकार के विवादों को जन्म देने लगता है। हम ब्लोगिंग करने के लिये आते हैं एक भला उद्देश्य लेकर किन्तु महत्ता प्राप्त करने के चक्कर में भूल जाते हैं अपने उद्देश्य को और जुट जाते हैं एक दूसरे को नीचा दिखाने में। तरह-तरह के हथकंडे अपनाने लगते हैं।

आज जरूरत है तो श्रेष्ठता, महत्ता आदि को भूल कर निस्वार्थ भाव से ब्लोगिंग करने की।

Wednesday, May 12, 2010

सेवा? व्यापार? या लूट?

"ग्रेट कन्वेंट स्कूल के यूनीफॉर्म वाली स्वेटर है क्या?"

"वो तो साहब आपको सिर्फ फलाँ दूकान में ही मिलेगी, उस दूकान के अलावा और कहीं भी नहीं मिल सकती।" होजियरी दूकानदार ने बताया। साथ ही उस दूकान का पता भी उसने बता दिया।

अब हम और हमारे परिचित गुप्ता जी उस दूकान में गए। गुप्ता जी का पुत्र उस स्कूल में पीपी-1 कक्षा में पढ़ता है। उस स्कूल का नियम है कि बच्चों को वहाँ के यूनीफॉर्म में ही आना पड़ेगा। वहाँ यूनीफॉर्म के वस्त्र भी आपको स्कूल से ही खरीदना पड़ेगा। अब चूँकि सर्दियाँ आ गई हैं इसलिए बच्चों के लिए स्वेटर भी जरूरी है। इसलिए स्कूल वालों ने एक विशिष्ट रंग तथा डिजाइन का स्वेटर भी जोड़ दिया यूनीफॉर्म में। मगर उनके यूनीफॉर्म वाला वह विशिष्ट स्वेटर आपको केवल एक विशिष्ट दूकान के अलावा पूरे रायपुर के अन्य दूकानों में कहीं नहीं मिल सकती।

खैर साहब हम उस विशिष्ट दूकान में गए और गुप्ता जी ने अपने बच्चे के लिए स्वेटर खरीद ली। अब उन्हें अपने पुत्र के लिए एक पुस्तक की जरूरत थी। अब हम उस पुस्तक की तलाश में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर कि पुस्तक दूकानों की खाक छानने लगे। पच्चीसों दूकानों में गए किन्तु पुस्तक कहीं उपलब्ध नहीं थी।

फिर एक भले दूकानदार ने कहा, "अरे साहब, यह तो ग्रेट कन्वेन्ट स्कूल में चलने वाली किताब है, इस पुस्तक को आपको उसी स्कूल से ही खरीदना पड़ेगा।"

"वहाँ से हमने खरीदा था पर बच्चे ने उस पुस्तक को कहीं गुमा दिया। अब यह पुस्तक स्कूल के स्टॉक में खत्म हो गई है।" गुप्ता जी बोले।

"तब तो साहब आप फलाँ पुस्तक दूकान में चले जाइए क्योंकि उस स्कूल को वही दूकान पुस्तकें सप्लाई करती है। पर वो दूकान तो आउटर एरिया में है, अब तक तो बंद हो चुकी होगी; आप कल वहाँ जाकर पता कर लेना।"

अब हम सोचने लगे कि ये स्कूल शिक्षा देने का काम कर रहा है या कपड़े, पुस्तकें आदि बेचने का? यह हाल सिर्फ उस स्कूल का ही नहीं बल्कि आज के अधिकतर विद्यालयों तथा महाविद्यालयों का है। ये सब कपड़े, पुस्तकें आदि बेचने के साथ ही बच्चों को घर से स्कूल तथा स्कूल से घर तक पहुँचाने के लिए ट्रांसपोर्टेशन का भी धंधा करते हैं।

याने नाम शिक्षा जैसी सेवा का और काम व्यापारी का। पर इसे व्यापार कहना भी गलत है क्योंकि ये जो भी चीजें बेचते हैं उनके दाम उन वस्तुओं की वास्तविक कीमतों से चौगुनी होती है। याने कि यह व्यापार नहीं लूट है।

अब हम एक जाने-माने डॉक्टर साहब के यहाँ गए क्योंकि हमें दो दिन से कुछ तकलीफ थी। अस्पताल के रिसेप्शन में बैठी सुन्दर सी महिला ने हमसे हमारा नाम, उम्र आदि पूछ कर एक पर्ची बना कर हमें देते हुए कहा, "डॉक्टर साहब की फीस, रु.150.00 जमा कर दीजिए।"

हमने फीस जमा कर दी। हमारा नंबर आने पर जब हम डॉक्टर साहब से मिले तो उन्होंने तकलीफ पूछी। तकलीफ बताने पर न तो उन्होंने नाड़ी देखी, न ही जीभ देखी और न ही छाती और पीठ पर स्टेथिस्कोप लगाकर धड़कन देखी, बस एक पर्ची देते हुए कहा, "यहाँ जाकर खून और पेशाब का जाँच करवा लीजिए। कल रिपोर्ट देखने के बाद इलाज शुरू करेंगे।"

अब आप ही बताइए कि डॉक्टर साहब की फीस किस बात की थी? क्या सिर्फ यह बताने की थी कि फलाँ लेबोरेटरी में जाकर खून और पेशाब की जाँच करवा लो?

यह भी तो हो सकता है कि कल को हम डॉक्टर साहब के पास फिर जाने के पहले ही "टें" बोल जाएँ।

इतना सारा बकवास करने का लब्बोलुआब सिर्फ यह है कि हमें तो लगता है कि शिक्षा, चिकित्सा आदि कार्य आज सेवाएँ न रहकर लूट का माध्यम बन कर रह गई हैं।

विनाश से सृजन की ओर

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

विनाश से सृजन की ओर-
मुख मोड़ और चल,
धूर्त-पथ त्याग कर,
मानव मन बन निश्छल।

विनाशिनी संहारिणी शक्ति-
तेरी ही कृति का प्रतिफल,
मोड़ दे अपनी दिशा,
उत्फुल्ल कर शतदल कमल,
कृत्रिम से प्रकृति उत्तम
शान्त सुन्दर धवल,
तो फिर ओ अशान्त मन,
चल वापस, प्रकृति ओर वापस चल।

(रचना तिथिः शनिवार 24-12-1983)

Tuesday, May 11, 2010

आपस की लड़ाई का निश्चित परिणाम विनाश ही होता है

इतिहास गवाह है कि जब भी भाई भाई आपस में लड़ते हैं तो उसका निश्चित परिणाम विनाश ही होता है। हजार से भी अधिक सालों की हमारी गुलामी सिर्फ हमारे देश के नरेशों का आपस में लड़ने का ही परिणाम था। कौरव-पाण्डव आपस में लड़े तो अठारह अक्षौहिणी सेना लड़-कट कर मर गई। श्री कृष्ण के वंश अर्थात् यदुवंश का नाश का कारण भी आपस की लड़ाई ही थी।

किन्तु दुःख की बात है कि हम अपने इतिहास को भूल जाते हैं और उससे कुछ भी शिक्षा नहीं ले पाते।


चलते-चलते


यदुवंश के नाश की बात चली है तो उस रोचक कथा को भी जान लीजिये

यदुवंश का नाश

महाभारत के युद्ध से विदुर जी को, जो कि तीर्थयात्रा से लौटे थे, अत्यन्त सन्ताप हुआ और वे पुनः तीर्थयात्रा के लिये निकल पड़े। यमुना के तट पर उनकी भेंट भगवान श्री कृष्णचन्द्र के परम भक्त और सखा उद्धव जी से हुई और विदुर जी ने उनसे भगवान श्री कृष्णचन्द्र का हाल पूछा।

रुँधे कंठ से उद्धव ने बताया - "हे विदुर जी! महाभारत के युद्ध के पश्चात् सान्तवना देने के उद्देश्य से भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी गांधारी के पास गये। गांधारी अपने सौ पुत्रों के मृत्यु के शोक में अत्यंत व्याकुल थी। भगवान श्री कृष्णचन्द्र को देखते ही गांधारी ने क्रोधित होकर उन्हें श्राप दे दिया कि तुम्हारे कारण से जिस प्रकार से मेरे सौ पुत्रों का आपस में लड़ कर के नाश हुआ है उसी प्रकार तुम्हारे यदुवंश का भी आपस में एक दूसरे को मारने के कारण नाश हो जायेगा।

भगवान श्री कृष्णचन्द्र ने माता गांधारी के उस श्राप को पूर्ण करने के लिये यादवों की मति को फेर दिया। एक दिन अहंकार के वश में आकर कुछ यदुवंशी बालकों ने दुर्वासा ऋषि का अपमान कर दिया। इस पर दुर्वासा ऋषि ने शाप दे दिया कि यादव वंश का नाश हो जाये। उनके शाप के प्रभाव से यदुवंशी पर्व के दिन प्रभास क्षेत्र में आये। पर्व के हर्ष में उन्होंने अति नशीली मदिरा पी ली और मतवाले हो कर एक दूसरे को मारने लगे। इस तरह से भगवान श्री कृष्णचन्द्र को छोड़ कर एक भी यादव जीवित न बचा। इस घटना के बाद भगवान श्री कृष्णचन्द्र महाप्रयाण कर के स्वधाम चले जाने के विचार से सोमनाथ के पास वन में एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ कर ध्यानस्थ हो गये। जरा नामक एक बहेलिये ने भूलवश उन्हें हिरण समझ कर विषयुक्त बाण चला दिया जो के उनके पैर के तलुवे में जाकर लगा और भगवान श्री कृष्णचन्द्र स्वधाम को पधार गये।

Monday, May 10, 2010

प्रसन्नता की बात है कि हम ब्लोगर्स को माया नहीं व्यापती!

माया याने कि धन याने कि रुपया!

हर किसी को व्यापती है यह, हर कोई दीवाना है इसका और हर कोई भाग रहा है इसके पीछे। सभी को सिर्फ यही चिन्ता खाते रहती है कि चार पैसे कैसे बना लिये जायें? कोई कुछ कार्य करता है तो उस कार्य के बदले में सिर्फ धन की ही अभिलाषा रखता है। जिसे देखो वही "हाय पैसा!" "हाय पैसा!!" कर रहा है। धन कमाने के लिये आदमी अपना सुख-चैन यहाँ तक कि खाना-पीना तक को भी भूल जाता है।

ऐसा नहीं है कि संसार में रुपया ही सबसे बड़ा है, रुपये से बढ़ कर एक से एक मूल्यवान वस्तुएँ हैं जैसे कि विद्या, शिक्षा, ज्ञान, योग्यता, चिकित्सा आदि, किन्तु मुश्किल यह है कि, आज के जमाने में, वे वस्तुएँ भी केवल रुपये अदा करके प्राप्त की जा सकती हैं।

धन की यह महिमा आज से ही नहीं बल्कि सैकड़ों हजारों-वर्षों से चलती चली आ रही है। लगभग सौ साल पहले लिखी गई पुस्तक "भूतनाथ" में 'खत्री' जी लिखते हैं:

अहा, दुनिया में रुपया भी एक अजीब चीज है! इसकी आँच को सह जाना हँसी-खेल नहीं है। इसे देखकर जिसके मुँह में पानी न भर आवे समझ लो कि वह पूरा महात्मा है, पूरा तपस्वी है और सचमुच का देवता है। इस कमबख्त की बदौलत बड़े-बड़े घर सत्यानाश हो जाते हैं, भाई-भाई में बिगाड़ हो जाता है, दोस्तों की दोस्ती में बट्टा लग जाता है, जोरू और खसम का रिश्ता कच्चे धागे से भी ज्यादे कमजोर होकर टूट जाता है, और ईमानदारी की साफ और सफेद चादर में ऐसा धब्बा लग जाता है जो किसी तरह छुड़ाये नहीं छूटता। इसे देखकर जो धोखे में न पड़ा, इसे देखकर जिसका ईमान न टला, और इसे जिसने हाथ-पैर का मैल समझा, बेशक कहना पड़ेगा कि उस पर ईश्वर की कृपा है और वही मुक्ति का पात्र है।
किन्तु प्रसन्नता की बात है कि हम ब्लोगर्स को यह माया नहीं व्यापती! अंग्रेजी तथा अन्य भाषा के ब्लोग्स में भी ब्लोगर्स पोस्ट लिखते हैं तो धन कमाने के लिये। वे लिखते हैं किसी उत्पाद को प्रमोट करने के लिये ताकि उत्पाद उनके ब्लोग के माध्यम से बिके और उनका कमीशन बने। पर हमें भला ब्लोग से कमाई से क्या लेना-देना है? क्यों सोचें हम उन तरीकों के बारे में जिनसे ब्लोग के माध्यम लोगों का भला होने के साथ ही साथ हम ब्लोगर्स की कमाई भी हो? हम तो खुश हैं एक से एक विवाद करके? विवाद करने में, एक-दूसरे की टाँगें खींचने में, छिद्राण्वेशन करने में जो सुख है वह धन प्राप्त करने में भला कहाँ है!

कितने महान हैं हम ब्लोगर! माया हमें व्यापती ही नहीं है!!

Sunday, May 9, 2010

जब दिवस मना कर एक दिन में माँ को प्रसन्न किया जा सकता है तो क्या जरूरत है जन्म भर मातृ-भक्ति की?

किसी प्रकार का दिवस मनाने का अर्थ होता है किसी घटना, वस्तु, व्यक्ति आदि को याद कर लेना। किसी का जन्मदिवस मना कर हम याद करते हैं कि फलाँ दिन उसका जन्म हुआ था, स्वतन्त्रता दिवस मना कर हम याद कर लेते हैं है कि पन्द्रह अगस्त के दिन हमें परतन्त्रता से मुक्ति मिली थी आदि। किसी के जन्म या अपनी स्वतन्त्रता का महत्व पूरे साल में हो या न हो उसके दिवस के दिन अवश्य ही बहुत अधिक हो जाता है।

आजकल 'मदर्स डे' मनाने का रिवाज चल पड़ा है। 'मदर्स डे' मना कर अब साल में एक दिन माँ को भी याद कर लेते है। साल भर माँ का महत्व हो या न हो मदर्स डे के दिन अवश्य ही माता का महत्व बहुत अधिक होता है।

हमारे आदि पुरुष मनु ने माता-पिता की सेवा को ही सबसे बड़ा धर्म कहा है। "मनुस्मृति" में कहा गया है कि उपाध्याओं से दस गुना श्रेष्ठ आचार्य, आचार्य से सौ गुना श्रेष्ठ पिता और पिता से सहस्त्र गुना श्रेष्ठ माता का गौरव होता है। माता की कृतज्ञता से संतान सौ वर्षो में भी मुक्त नहीं हो सकती। किन्तु आज इस कथन का क्या महत्व है? आज तो महत्व है मदर्स डे का। अब जब साल में एक दिन मदर्स डे मना कर माँ को खुशी प्रदान की जा सकती है तो भला जीवन-पर्यन्त मातृ-भक्ति करने के कार्य को महज मूर्खता के सिवाय और क्या कहा जा सकता है?

आज हम वात्सल्य, स्नेह, प्रेम की अमृत धाराएँ प्रदान करने वाली माता के मातृ-ऋण को भले ही भूल जायें, पर हम इतने कृतघ्न भी नहीं है कि साल में एक दिन मदर्स डे मनाकर अपनी माँ को खुश भी ना कर सकें। 'मदर्स डे' के दिन माता के चरणस्पर्श करके एक अच्छा सा उपहार उसे दे दो, बस माता खुश!

Saturday, May 8, 2010

याद आता है वो गर्मी के दिनों में आँगन में हाथ पंखा डुलाते हुए सोना

आज तो गर्मी के दिनों में हम बंद कमरे में कूलर चलाकर मस्त खर्राटे लेते हैं किन्तु कभी वो दिन भी थे जब ग्रीष्म ऋतु में आँगन में खाट डालकर हाथ पंखा डुलाते हुए सोना पड़ता था। सूर्यास्त होते ही दिन भर की कड़ी धूप में तपे हुए आँगन को ठंडा करने के लिये बाल्टियों में पानी भर कर छिड़काव करने का कवायद शुरू हो जाता था। आठ-दस बाल्टी पानी पड़ जाने पर शनैः-शनैः आँगन ठंडा हो जाता था और बड़े मजे में हम वहाँ खाटें डाल दिया करते थे। बिजली के पंखे के नाम पर केवल एक टेबल फैन हुआ करता था जो हवा देने का कम और घर्र घर्र आवाज करने का काम ज्यादा किया करता था। इसीलिये सभी के पास हाथ से डुलाने वाले पंखे का होना अति आवश्यक हुआ करता था।

रायपुर की गर्मी में रात को भी गरम हवाएँ चलने की वजह से बड़ी मुश्किल से रात को एक-दो बजे नींद लग पाती थी और सुबह साढ़े पाँच बजे नहीं कि दादी माँ की गुहार शुरू हो जाती थी "अरे गोपाल, उठ, जल्दी तैयार हो जा, दूधाधारी मन्दिर की आरती में जाना है"। हम जल्दी से उठकर तैयारी करने लगते थे नहाने-धोने की। कभी-कभी आलस में आकर कह दिया करते थे कि आज हमें मन्दिर नहीं जाना, बड़े जम की नींद आ रही है। किन्तु सो फिर भी नहीं पाते थे क्योंकि छः-सवा छः बजते न बजते भगवान भुवनभास्कर उदित हो कर धूप को भेज देते थे हमें जगाने के लिये। आज तो हमारे बच्चे बंद कमरे में कूलर का आनन्द लेते हुए नौ-साढ़े नौ बजे तक भी सोये पड़े रहते हैं।

पिछले पचीस-तीस सालों में विज्ञान और तकनीकी में जितना विकास हुआ है उतना तो शायद उसके पहले के तीन-चार सौ वर्षों में नहीं हुआ होगा और यही कारण है कि आज हम भी बंद कमरे में कूलर चला कर सोने लगे हैं। उन दिनों हम कुढ़ा करते थे कि और लोगों के यहाँ तो कई कई बिजली के पंखे हैं और हमारे यहाँ केवल हवा कम तथा आवाज अधिक देने वाला एक ही पंखा है और आज भी हमें कुढ़न होती है कि और लोगों के यहाँ तो एसी है और हमें अपने कूलर में बार बार पानी डालने की कवायद करना पड़ता है। उन दिनों से लेकर आज तक हम अपनी कुढ़न को सिर्फ यही कह कर दबाने की कोशिश करते हैं कि "रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पी, देख पराई चूपड़ी मत ललचाये जी"

जो भी हो पर आँगन की क्यारियों में लगे हुए मोंगरे के फूलों की भीनी-भीनी खुशबू का आनन्द लेते हुए और हाथ से पंखा डुलाते हुए सोने का अपना एक अलग ही मजा था।

Friday, May 7, 2010

महाकवि भास का प्रसिद्ध नाटक स्वप्नवासवदत्ता

स्वप्नवासवदत्ता महाकवि भास की अमर एवं प्रसिद्ध रचना है। प्रस्तुत है इस नाटक की कथावस्तुः

संस्कृत नाटक स्वप्नवासवदत्ता के नायक पुरुवंशीय राजा उदयन हैं। वे वत्स राज्य राज्य के अधिपति थे। कौशाम्बी उनकी राजधानी थी। उन दिनों राजगृह मगध राज्य की राजधानी थी और वहाँ का राजा अजातशत्रु का पुत्र दर्शक था। अवन्ति राज्य की राजधानी उज्जयिनी थी तथा वहाँ के राजा प्रद्योत थे। महाराज प्रद्योत का सैन्य-बल अत्यन्त विशाल था और इसीलिये उन्हें महासेन के नाम से भी जाना जाता था।

महाराज उदयन के पास घोषवती नामक एक दिव्य वीणा थी। उनका वीणा-वादन अपूर्व था। एक बार प्रद्योत के अमात्य शालंकायन ने छल करके उदयन को कैद कर लिया। उदयन के वीणा-वादन की ख्याति सुनकर प्रद्योत ने उन्हे अपनी पुत्री वासवदत्ता के लिये वीणा-शिक्षक नियुक्त कर दिया। इस दौरान उदयन और वासवदत्ता एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो गये।

इधर उदयन के मन्त्री यौगन्धरायण उन्हें कैद से छुड़ाने के प्रयास में थे। यौगन्धरायण के चातुर्य से उदयन, वासवदत्ता को साथ ले कर, उज्जयिनी से निकल भागने में सफल हो गये और कौशाम्बी आकर उन्होंने वासवदत्ता से विवाह कर लिया।

उदयन वासवदत्ता के प्रेम में इतने खोये रहने लगे कि उन्हें राज-कार्य की सुधि ही नहीं रही। इस स्थिति का लाभ उठा कर आरुणि नामक उनके क्रूर शत्रु ने उनके राज्य को उनसे छीन लिया।

आरुणि से उदयन के राज्य को वापस लेने के लिये उनके मन्त्री यौगन्धरायण और रुम्णवान् प्रयत्नशील हो गये। किन्तु बिना किसी अन्य राज्य की सहायता के आरुणि को परास्त नहीं किया जा सकता था। वासवदत्ता के पिता प्रद्योत उदयन से नाराज थे और यौगन्धरायण को उनसे किसी प्रकार की उम्मीद नहीं थी।

यौगन्धरायन को ज्योतिषियों के द्वारा पता चलता है कि मगध-नरेश की बहन पद्मावती का विवाह जिन नरेश से होगा वे चक्रवर्ती सम्राट हो जायेंगे। यौगन्धरायण ने सोचा कि यदि किसी प्रकार से पद्मावती का विवाह उदयन से हो जाये तो उदयन को अवश्य ही उनका वत्स राज्य आरुणि से वापस मिल जायेगा साथ ही वे चक्रवर्ती सम्राट भी बन जायेंगे।

यौगन्धरायण भलीभाँति जानते थे कि उदयन अपनी पत्नी वासवदत्ता से असीम प्रेम करते हैं और वे अपने दूसरे विवाह के लिये कदापि राजी नहीं होंगे। अतएव उन्होंने वासवदत्ता और रुम्णवान् के साथ मिलकर एक योजना बनाई। योजना के अनुसार उदयन को राजपरिवार तथा विश्वासपात्र सहयोगियों के साथ लेकर आखेट के लिये वन में भेजा गया जहाँ वे सभी लोग शिविर में रहने लगे। एक दिन, जब उदयन मृगया के लिये गए हुए थे, शिविर में आग लगा दी गई। उदयन के वापस लौटने पर रुम्णवान ने उन्हें बताया कि वासवदत्ता शिविर में लगी आग में फँस गईं थी और उन्हें बचाने के लिये यौगन्धरायण वहाँ घुसे जहाँ पर दोनों ही जल मरे। उदयन इस समाचार से अत्यन्त दुःखी हुए किन्तु रुम्णवान तथा अन्य अमात्यों ने अनेकों प्रकार से सांत्वना देकर उन्हें सम्भाला।

इधर यौगन्धरायन वासवदत्ता को साथ लेकर परिव्राजक के वेश में मगध राजपुत्री पद्मावती के पास पहुँच गए और प्रच्छन्न वासवदत्ता (अवन्तिका) को पद्मावती के पास धरोहर के रूप में रख दिया। अवन्तिका पद्मावती की विशेष अनुग्रह पात्र बन गईं। उन्होंने महाराज उदयन का गुणगान कर कर के पद्मावती को उनके प्रति आकर्षित कर लिया।

उदयन दूसरा विवाह नहीं करना चाहते थे किन्तु रुम्णवान् ने उन्हें समझा-बुझा कर पद्मावती से विवाह के लिये राजी कर लिया। इस प्रकार उदयन का विवाह पद्मावती के साथ हो गया। विवाह के पश्चात मगध-नरेश की सहायता से उदयन ने आरुणि पर आक्रमण कर दिया और उसे परास्त कर अपना राज्य वापस ले लिया। अन्त में अत्यन्त नाटकीय ढंग से यौगन्धरायण और वासवदत्ता ने स्वयं को प्रकट कर दिया। यौगन्धरायण ने अपनी धृष्टता एवं दुस्साहस के लिये क्षमा निवेदन किया। यही इस नाटक ‘स्वप्नवासवदत्ता’ की कथावस्तु है। एक दृश्य में उदयन समुद्रगृह में विश्राम करते रहते हैं। वे स्वप्न में ‘हा वासवदत्ता’, ‘हा वासवदत्ता’ पुकारते रहते हैं उसी समय अवन्तिका (वासवदत्ता) वहाँ पहुँ जाती हैं। वे उनके लटकते हुये हाथ को बिस्तर पर रख कर निकल जाती हैं साथ ही उदयन की नींद खुल जाती है किन्तु वे निश्चय नहीं कर पाते कि उन्होंने वास्तव में वासवदत्ता को देखा है अथवा स्वप्न में। इसी घटना के के कारण नाटक का नाम ‘स्वप्नवासवदत्ता’ रखा गया।

Thursday, May 6, 2010

यदि आप सफलता चाहते हैं तो आपको कष्टों को अपनाना ही होगा

  • यदि आप सफलता चाहते हैं तो आपको कष्टों को अपनाना ही होगा। स्मरण रखें कि प्रत्येक सफल व्यक्ति की एक कष्टमय कहानी होती है और प्रत्येक कष्टमय कहानी का एक सफल अंत होता है।
  • जीवन में सफलता पाने के लिये आशावादी बनना तथा चिंता को त्यागना अत्यावश्यक है। यदि आप सोचते हैं कि किसी समस्या को हल किया जा सकता है तो चिंता करने की क्या आवश्यकता है और यदि आप सोचते हैं कि किसी समस्या को हल नहीं किया जा सकता तो चिंता करने से फायदा ही क्या है?
  • यदि सफलता ही आपका उद्देश्य है तो कभी भी पीछे जा कर खराब शुरुवात को बदलने का प्रयास न करें बल्कि इसी क्षण से एक नई शुरुवात कर दें।
  • स्वयं की गलतियों को पहचानने वाला व्यक्ति अवश्य ही सफलता प्राप्त करता है। दूसरों की गलती निकालना बहुत सरल है किन्तु स्वयं की गलती को स्वीकार करना अत्यन्त मुश्किल काम है।
  • गलतियाँ ही अनुभव का आधार है। यद्यपि गलती कष्ट देती है किन्तु स्वयं के द्वारा की गई अनेकों गलतियों का संग्रह ही अनुभव है।
  • दूसरों की शिकायत करने वाला व्यक्ति हमेशा अशांत रहता है और कभी भी सफल नहीं हो पाता। सफलता और शांति पाने के लिये बेहतर है कि स्वयं को बदलें।
  • अश्रु कायर बहाते हैं। अतः साहसी बनें और किसी अवसर के खो जाने पर कभी भी आँसू न बहायें।
  • जीवन में परिवर्तन एक प्राकृतिक नियम है। अतः परिवर्तन को स्वीकारें। परिवर्तन को स्वीकारने पर अन्य सभी बातें अपने आप ही परिवर्तित हो जायेंगी।
  • दुःखी होने वाले व्यक्ति की जग हँसाई होती है और प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्न रहने वाले को प्रसंशा मिलती है। दूसरों को प्रसन्न रखने वाले को जीवन सलाम करती है।

Wednesday, May 5, 2010

गधा, कुत्ता, बन्दर और मनुष्य

ब्रह्मा जी ने प्राणियों का निर्माण करना आरम्भ किया। सबसे पहले उन्होंने गधा बनाया और उससे कहा, "तुम गधे हो। तुम घास खाओगे और सुबह से शाम तक बिना थके अपने पीठ पर बोझ लादने का काम करोगे। बुद्धि से तुम्हारा कुछ भी लेना-देना नहीं रहेगा। तुम्हारी आयु 50 वर्ष होगी।"

गधे ने कहा, "देव! 50 वर्ष तो बहुत अधिक होते हैं, कृपा करके मुझे 20 वर्ष की ही आयु दीजिये।"

ब्रह्मा जी ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।

फिर उन्होंने कुत्ता बनाया और उससे कहा, "तुम कुत्ते हो। तुम मनुष्यों के वफादार रहोगे, उनकी चौकीदारी करोगे और उनके दिये गये टुकड़े खाकर जीवनयापन करोगे। तुम्हारी आयु 30 वर्ष होगी।"

कुत्ते ने कहा, "स्वामी! 30 वर्ष तो बहुत अधिक होते हैं, कृपा करके मुझे 15 वर्ष की ही आयु दीजिये।"

ब्रह्मा जी ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।

फिर उन्होंने बन्दर बनाया और उससे कहा, "तुम बन्दर हो। अपनी उदर-पूर्ति के लिये तुम जीवन भर इस शाखा से उस शाखा पर कूदते फिरोगे। तुम्हारी आयु 20 वर्ष होगी।"

बन्दर ने कहा, "भगवन्! 20 वर्ष तो बहुत अधिक होते हैं, कृपा करके मुझे 10 वर्ष की ही आयु दीजिये।"

अन्त में उन्होंने मनुष्य बनाया और उससे कहा, "तुम मनुष्य हो। तुम पृथ्वी के एकमात्र बुद्धिमान प्राणी होओगे। अपनी बुद्धिमत्ता के कारण तुम अन्य समस्त प्राणियों के मालिक बनोगे और समस्त संसार के ऊपर तुम्हारा ही वर्चस्व होगा। तुम्हारी आयु 20 वर्ष होगी।"

मनुष्य ने कहा, "प्रभु! 20 वर्ष तो बहुत कम होते हैं। कृपा करके मेरी आयु में गधे, कुत्ते और बन्दर के द्वारा छोड़े गये 30, 15 और 10 वर्षों को भी जोड़ दीजिये।"

ब्रह्मा जी ने उसकी भी प्रार्थना स्वीकार कर ली।

तभी से मनुष्य अपनी आयु के प्रथम 20 वर्षों को मनुष्य के रूप में जीता है, फिर गृहस्थी के जंजाल में फँस कर आगे के 30 वर्षों तक बिना थके बोझ ढोते रहता है और जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तो  15 वर्षों तक उनकी चौकीदारी करता है और फिर अपनी आयु के अन्तिम १० वर्षों में में क्षुधा-निवारण के लिये कभी इस बच्चे के घर तो कभी उस बच्चे के घर जाकर रहने लगता है।

टीपः यह मेरी मौलिक रचना नहीं है। कभी इसे कहीं पर अंग्रेजी में पढ़ा था और आज याद आ जाने से इसका हिन्दी रूपान्तरण कर मैंने आपके समक्ष प्रस्तुत कर दिया है। आशा है कि आपको पसन्द आई होगी।

Tuesday, May 4, 2010

नापसन्द बटन याने कि बन्दर के हाथ में उस्तरा

कितना लिखें इस नापसन्द के बारे में? अब तो इस विषय में लिखने के लिये हमारी लेखनी भी सकुचाती है। वैसे भी नापसन्द के विषय में बहुत से लोगों के विचार पोस्ट और टिप्पणियों के माध्यम से आ ही चुके हैं। इतना होने के बावजूद भी हमें इस विषय में लिखना ही पड़ रहा है क्योंकि यह नापसन्द बटन कुछ विघ्नसन्तोषियों के लिये वरदान सिद्ध हो रहा है।

भले ही ब्लोगवाणी ने नापसन्द बटन को इसके सदुपयोग के लिये बनाया होगा किन्तु इस बटन का सदुपयोग तो आज तक कहीं नजर नहीं आया, दिखाई देता है तो सिर्फ इसके दुरुपयोग ही दुरुपयोग। डॉ. श्रीमती अजित गुप्ता, पं.डी.के.शर्मा"वत्स", प्रशान्त प्रियदर्शी जैसे और भी कई अन्य ब्लोगर्स, जो बगैर किसी के निन्दाचारी किये सामान्य पोस्टें लिखते हैं, के पोस्टों पर भी नापसन्द के चटके लग चुके हैं। और तो और ब्लोगर्स के जन्मदिन दर्शाने वाले ब्लोग पर प्रायः ही नापसन्द का चटका पाया जाता है, पता नहीं किन लोगों को ब्लोगर्स के जन्मदिन भी नापसन्द हैं?

कल तो हमारा पोस्ट "क्या आपने कभी आलू, प्याज, टमाटर के विज्ञापन देखे हैं?" ब्लोगवाणी में प्रकाशित होते ही फटाफट दो नापसन्द के चटके लग गये उस पर जबकि हमने उस पोस्ट में ऐसी कोई बात नहीं लिखी थी जिसे कोई भला आदमी नापसन्द कर पाये। ऐसा लगा हमें कि ये नापसन्दीलाल लोग इन्तिजार करते हुए बैठे थे कि कब हमारा पोस्ट प्रकाशित हो और हम उस पर नापसन्द का चटका लगायें। वैसे इन लोगों के नापसन्द करने से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हम तो नापसन्द के इन चटकों से निरुत्साहित होने से रहे, उलटे हम और उत्साहित हो कर दस बीस और पोस्ट लिख दें और कहें कि करो नापसन्द जितना कर सकते हो। तुम जितना नापसन्द करोगे उससे दुगुना हम पोस्ट लिख देंगे।

हमारे विचार से तो कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि खुन्नस रखने वालों के लिये नापसन्द का यह बटन "बन्दर के हाथों उस्तरा" ही साबित हो रहा है।

Monday, May 3, 2010

अदा जी का यह सहयोग बहुत मायने रखता है

अभी अभी हमें honestyprojectrealdemocracy वाले श्री जय कुमार झा का मेल मिला है। उनके मेल के इस स्क्रीनशॉट को पढ़कर आप स्वयं जान जायेंगे कि अदा जी ने हमारे मेट्रीमॉनी साइट "बन्धन" के प्रचार प्रसार के लिये अदा जी ने स्वेच्छा से हमें सहयोग दिया हैः


अदा जी का यह सहयोग हमारे लिये बहुत मायने रखता है क्योंकि इससे हमारा बहुत ही अधिक उत्साहवर्धन हुआ है।

आप सभी से हमें "बन्धन" के निर्माण के लिये बहुत बहुत बधाइयाँ मिली हैं जिसके लिये हम आपका तहेदिल से शुक्रिया अदा करते हैं और आप लोगों से अपेक्षा रखते हैं कि आप अपने समस्त परिचितों को  "बन्धन" का सदस्य बनवा कर अवश्य ही हमें सहयोग प्रदान करेंगे। "बन्धन" को अपना लक्ष्य प्राप्त करने के सदस्यों की अधिक से अधिक संख्या की आवश्यकता है।

और यह तो आप मानेंगे ही कि "बन्धन" के अधिक से अधिक सदस्य बनवाना एक महान सामाजिक एवं पुण्य का कार्य होगा। तो देर किस बात की है? अभी ही अपने परिचितों को "बन्धन" का सदस्य बनवाना शुरू कर दीजिये। हम आपके इस सहयोग के लिये सदैव आभारी रहेंगे।

क्या आपने कभी आलू, प्याज, टमाटर के विज्ञापन देखे हैं?

यह तो तय है कि आपने आज तक कभी आलू, प्याज, टमाटर, लहसुन, अदरक, गेहूँ, दाल, चाँवल (कृपया बासमती को अपवाद मानें), साग-सब्जियाँ आदि के विज्ञापन न तो कभी देखे होंगे और न ही भविष्य में कभी देखेंगे। ये सब तो रोजमर्रा की जरूरत है और इन वस्तुओं को तो आप खरीदेंगे ही। जब आप इन्हें वैसे ही खरीदेंगे तो भला इन चीजों का विज्ञापन कर के कौन बेवकूफ अपने रुपये गारत करेगा?

विज्ञापन तो उन वस्तुओं का होता है जो आपके लिये कतइ जरूरी नहीं हैं और उनके बिना आपका काम मजे के साथ चल सकता है। किन्तु विज्ञापन के माध्यम से आपका ब्रेन-वाशिंग करके आपके दिमाग में बुरी तरह से घुसा दिया जाता है कि जिस वस्तु का विज्ञापन किया जा रहा है वह आपके लिये निहायत जरूरी है; उसके बिना आपका जीवन निरर्थक है। उदाहरणार्थ यदि आप कोल्ड-ड्रिंक नहीं पियेंगे, तो आपको कोई घास नहीं डालेगा, फलाँ साबुन इस्तेमाल नहीं करेंगे तो जमाने से पीछे रह जायेंगे आदि।

सही बात तो यह है कि इन विज्ञापनों से आपको लुभाकर व्यापार के नाम से आप को लूटा जाता है। मात्र बीस-पच्चीस पैसे के त्रिफला (हर्रा-बहेरा-आँवला) चूर्ण को दो-तीन रुपये में बेच दिया जाता है, मुफ्त के पानी को आकर्षक पैकिंग में डालकर दो से पन्द्रह रुपये में बेचा जाता है। और मजे की बात यह है कि आप बड़ी खुशी के साथ इन चीजों को खरीदने के लिये अपनी गाढ़ी कमाई के रुपये खर्च कर डालते हैं।

इन विज्ञापनों की तासीर यह है कि ये बच्चों पर बहुत अधिक प्रभाव डालते हैं और वे लोग ही आपको विज्ञापित चीजें खरीदने के लिये मजबूर करते हैं। सही है कि यदि आपके जिगर का टुकड़ा किसी चीज के लिये जिद करे तो आप उसकी इच्छा कैसे पूरी नहीं करेंगे?

तो अब से जब भी किसी वस्तु को खरीदना हो तो कृपया पहले सोचें कि वह वस्तु क्या आपके लिये जरूरी है? साथ ही अपने बच्चों को भी शिक्षा दें कि विज्ञापन लुभाते अवश्य है किन्तु वास्तव में यह सिर्फ हमें उल्लू बनाते हैं और विज्ञापनरूपी इस मरीचिका के पीछे भागने के बजाय इससे बच कर रहना ही उचित है।

Sunday, May 2, 2010

खोलो रेल्वे की साइट को और झेलो पॉप-अप विज्ञापनों को

पता नहीं आप लोगों को आती है या नहीं पर मुझे पॉप-अप विज्ञापनों से बड़ी खुन्दक आती है और गुस्सा तब और बढ़ जाता है जब ये पॉप-अप विज्ञापन अधिकतर उपयोग किये जाने वाले महत्वपूर्ण साइट्स में हों। बैनर विज्ञापन तो एक बार चलता है क्योंकि इनकी तरफ ध्यान देना या ना देना आप के ऊपर निर्भर करता है किन्तु पॉप-अप विज्ञापन जबरन आपके ध्यान को भटका देते हैं। आप इन्हें देखना ना भी चाहें तो भी "मान ना मान मैं तेरा मेहमान" जैसे जबरन आये हुए इन विज्ञापनों को बंद करने के लिये इन्हें देखना ही पड़ता है।

पीएनआर स्टेटस की जानकारी, रेलगाड़ियों की जानकारी, आरक्षण के विषय में जानकारी आदि के लिये अक्सर भारतीय रेल्वे के साइट को खोलना ही पड़ता है। और इसे खोलने पर पॉप-विज्ञापनों को झेलना एक बहुत बड़ी मजबूरी बन जाती है। एक बार पॉप-अप विज्ञापन आये तो चलो झेल भी लिया जाये पर आप भारतीय रेल्वे के साइट में जितने बार भी किसी लिंक को क्लिक करेंगे उतने ही बार पॉप-अप विज्ञापन आते हैं।

पता नहीं भारतीय रेल्वे ने अपना यह साइट सेवा प्रदान करने के लिये बनाया है या फिर विज्ञापनों से कमाई करने के लिये?

पर किया ही क्या जा सकता है? रेल्वे की साइट हमारी मजबूरी है इसलिये खोलो रेल्वे की साइट को और झेलो पॉप-अप विज्ञापनों को।

Saturday, May 1, 2010

बाप की कटिंग बीस रुपये में और बेटे की सौ रुपये में

बाल बढ़ जाते हैं तो कटवाना तो पड़ता ही है। कल हमारे लड़के ने बाल कटवाने के लिये हमसे पैसे माँगे तो हमने उसे बीस रुपये दे दिये। दो ढाई घंटे बाद वह एकदम स्मार्ट बनकर आया और हमसे सौ रुपये माँगने लगा। पूछने पर उसने बताया कि साठ रुपये तो सिर्फ बाल कटवाने के लगे और फेस मसाज के साथ और भी ना जाने क्या क्या के चालीस रुपये अलग लगे। मित्र से उधारी लेना पड़ा। अब हम क्या करते? सौ का एक नोट निकाल कर देना पड़ा उसे।

पहले तो हमें यह खयाल आया कि कि हम तो मात्र बीस रुपये में बाल कटवाते हैं और हमारा बेटा सौ रुपये में, फिर हमें अपने कॉलेज के दिनों की याद आ गई जब हमारे पिताजी दो रुपये में कटिंग करवाते थे तो हम पाँच रुपये में।

याने कि सदा से यही परम्परा रही है कि बाप के कटिंग से बेटे की कटिंग की कीमत ज्यादा होती है।

चलते-चलते

नाई की दुकान में एक आदमी एक बच्चे को लेकर पहुँचा और नाई से अपनी और बच्चे की कटिंग करने के लिये कहा। नाई बच्चे की कटिंग करने के लिये कुर्सी पर पाटा लगा रहा था तो आदमी ने कहा, "देखो भाई, मुझे बाजार में कुछ जरूरी काम है। तुम पहले मेरी कटिंग बना दो ताकि जब तक तुम बच्चे की कटिंग करोगे मैं अपना काम निबटा लूंगा।"

नाई ने वैसा ही किया। कटिंग बन जाने पर आदमी बाजार के लिये निकल गया और नाई ने बच्चे की कटिंग करना शुरू किया।

बच्चे की कटिंग बन जाने पर भी आदमी वापस नहीं आया तो नाई ने बच्चे से पूछा, "बेटे, पापा किधर गये हैं?"

"वो मेरे पापा नहीं हैं।" बच्चे ने बताया।

"तो चाचा होंगे।"

"वो मेरे चाचा भी नहीं हैं।"

"तो कौन हैं?"

"उन अंकल को तो मैं जानता ही नहीं। मैं खेल रहा था तो वे आकर बोले कि बेटे फ्री का कटिंग करवाओगे? और मेरे हाँ कहने पर मुझे अपने साथ यहाँ ले आये।" बच्चे ने उत्तर दिया।

 
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