Thursday, September 30, 2010

इलाहाबाद हाई कोर्ट का साइट नहीं खुल रहा

लखनऊ जिला मजिस्ट्रेट श्री अनिल कुमार सागर के द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार फैसलों को अदालत की वेबसाइट पर भी लगाया जाएगा। इन फैसलों का सभी को बेसब्री से इंतजार है।  बजने बाद से ही अदालत की वेबसाइट को लोग खोलने का प्रयास कर रहे हैं किन्तु वेबसाइट खुल ही नहीं रहा है, वेबप्रॉक्सी साइट के माध्यम से भी नहीं। ट्विटर पर तो अदालत की वेबसाइट के क्रैश हो जाने की शंका वाले ट्वीट् तक आ रहे हैं।

लोगों की उत्सुक्ता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि पूरा का पूरा गूगल सर्च अयोध्याविवादमय हो रहा है। इस पोस्ट के लिखते समय तक गूगल इंडिया ट्रेंड्स में हाट टॉपिक्स में पहले और दूसरे नंबर पर क्रमशः india ayodhya और high court allahabad हैं जबकि गूगल यूएसए ट्रेंड्स में इनका नंबर क्रमशः दूसरा और तीसरा है।





इलाहाबाद हाईकोर्ट के वेबसाइट के बनने के बाद यह पहला मौका है जबकि देश विदेश के करोड़ों लोग एक साथ उस पर हिट कर रहे हैं। अब देखना यह है कि अदालत की वेबसाइट कितने समय बाद खुलता है।

आज जरूरत है भारत में सदियों से चली आ रही धार्मिक उदारता को बनाए रखने की

भारत में सदियों से धार्मिक उदारता की परम्परा रही है। भारतवासी सदा ही एक दूसरे की आस्थाओं तथा धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते रहे हैं। भारत के हिन्दुओं और मुस्लिमों में परस्पर इतनी धार्मिक उदारता रही है कि वे आपस में दूध और पानी की तरह से मिल गए थे। मुहम्मद पैगम्बर साहब ने सातवीं शताब्दी के आरम्भ में इस्लाम की शिक्षा देना आरम्भ किया था किन्तु उसके पहले ही दक्षिण भारत में अरबों की अनेक बस्तियाँ बस चुकी थीं। ये समस्त अरब व्यापारी थे और भारतीयों से उनके अच्छे सम्बन्ध थे। पैगम्बर साहब की शिक्षा का प्रभाव भारत में बसे इन अरबों पर भी पड़ा था और वे मुसलमान बन गए थे। इसका अर्थ यह हुआ कि भारत में मुस्लिमों के आक्रमण होने के बहुत पहले ही से इस्लाम भारत में आ चुका था। उन दिनों भी इस्लाम, जो कि भारत के लिए एक नया धर्म था, के विपरीत किसी प्रकार की घृणा की भावना नहीं थी। तत्कालीन भारत के वैष्णव, शाक्त, तान्त्रिक, वाममार्गी, कापालिक, शैव और पाशुपत आदि अनेक धर्मों के जैसे ही इस्लाम को भी भारत का एक धर्म मान लिया गया था। यहाँ तक कि नवीं शताब्दी के आरम्भ ही में मलाबार के राजा ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया था और भारत में इस्लाम की प्रतिष्ठा बढ़ी।

उन दिनों भारत में जो भी मुसलमान फकीर और विद्वान अरब तथा ईरान से आकर भारत में बसते जाते थे, उनका आदर-सत्कार किया जाता था, सैकड़ों हिन्दू उनके चेले भी बन जाया करते थे। बहुत सारे फकीर इतने प्रसिद्ध हो गए थे कि हिन्दू और मुसलमान सभी उनके भक्त बन गए थे। धीरे-धीरे करके इस्लाम कोंकण, काठियावाड़ और मध्य भारत में भी जा पहुँचा। उस समय के ये इस्लाम के प्रचारक अपनी सच्चरित्रता और त्याग के कारण लोगों में अपना प्रभाव जमा चुके थे।

तेरहवीं शताब्दी के अन्त से सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक, जब तक कि मुसलमान भारत में अपने साम्राज्य-स्थापना के प्रयत्न करते रहे, कभी भी हिन्दू-मुस्लिम के बीच वैमनस्य कभी देखने में नहीं आया। इस काल में अरब के इस नये मत का प्रभाव न केवल उन लाखों भारतीयों पर ही नहीं पड़ा, जिन्होंने इस्लाम ग्रहण कर लिया था, अपितु भारतीयों के आम विचार, धर्म, साहित्य, कला और विज्ञान पर भी पड़ा था; कहना चाहिए कि समूची भारतीय सभ्यता ही भारत में मुग़ल-साम्राज्य की स्थापना से पहले ही इस्लाम के प्रभावित हो चुकी थी।

अकबर ने मुगल साम्राज्य की स्थापना धार्मिक उदारता की आधार शिला पर ही की थी। अकबर, जहांगीर और शाहजहां के काल में मुग़ल सम्राटों के दरबार में हिन्दू और मुसलमान दोनों के मुख्य त्यौहार समान उत्साह और वैभव से मनाए जाते थे। शाही दरबार के अलावा सामान्य जन भी एक दूसरे के त्यौहारों में प्रसन्नता के साथ शरीक हुआ करते थे। यहाँ तक कि मुस्लिम लोग तो अपने त्यौहारों में आने वाले हिन्दू अतिथियों की भावना का सम्मान करते हुए उनके भोजन के लिए अलग से भोजन पकाने वाले ब्राह्मणों की व्यवस्था किया करते थे तथा होली, दिवाली जैसे हिन्दुओं के त्यौहारों को स्वयं भी बड़े धूम-धाम के साथ मनाया करते थे। सभी भारतीय, चाहे वह हिन्दू हो चाहे मुसलमान, हर बात को एक ही दृष्टिकोण से देखते और घटनाओं को एक ही ढंग से अपनाते थे जिसके परिणामस्वरूप कभी भी किसी भी प्रकार के साम्प्रदायिक झगड़े कभी होते ही नहीं थे।

भारत में अंग्रेजों ने अपने कदम जमाने के उद्देश्य से ही उन दिनों के राजा-महाराजाओं तथा नवाबों के बीच फूट डालने के साथ ही साथ हिन्दू और मुसलमानों के बीच वैमनस्यता के बीच बोना आरम्भ किया। उनका बोया हुआ वह बीज जड़ पकड़ता गया और भारत के हिन्दू-मुसलमानों के बीच खाई बनने लगी। आज जरूरत है अंग्रेजों के लगाए इस वैमनस्यता के पेड़ को जड़ से उखाड़ फेंकने की और भारत में सदियों से चली आ रही धार्मिक उदारता को बनाए रखने की!

Wednesday, September 29, 2010

सातवीं से अठारहवीं शताब्दी तक का भारत (2)

औरंगजेब के समय तक भारत के अन्दर अंग्रेज व्यापारियों की स्थिति लगभग वैसी ही थी, जैसी हींग बेचने वाले काबुलियों की आपने देखी होगी। औरंगजेब की अनुदार नीति ने चारों ओर छोटी-छोटी परस्पर प्रतिस्पर्धा करने वाली रियासतें भारत में पैदा कर दी, जिससे केन्द्रीय शक्ति निर्बल हो गई और हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य खण्डित हो गया। औरंगजेब की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद ही मद्रास और बंगाल में ईस्ट इंडिया कम्पनी के षड्यन्त्र चलने लगे, जिनके फलस्वरूप औरंगजेब की मृत्यु के पचास वर्ष बाद प्लासी का युद्ध हुआ। उस समय अंग्रेजों का हित इस बात में था कि औरंगजेब की अनुदार नीति के कारण जो अव्यवस्था और अनैक्य भारत के हिन्दू-मुसलमानों में स्थापित हो चुका था, वह कायम ही रखा जाए और उन्होंने यही अपनी नीति बना ली।

इस समय भी सभ्यता, शक्ति और व्यवस्था में भारतीय अंग्रेजों से श्रेष्ठ थे। परन्तु उनमें एक बात की कमी थी। वह थी राष्ट्रीयता या देश-भक्ति, जो जनोत्थान और उद्योग-क्रान्ति से प्रभावित थी। अंग्रेजों और दूसरी यूरोपियन जातियों ने यह बात जान ली और उन्होंने इससे लाभ उठाकर एक शक्ति को दूसरी शक्ति से लड़ाने का धन्धा आरम्भ कर दिया। दिखाने के लिए उन्होंने अपना रूप निष्पक्ष का रखा, परन्तु भीतर ही भीतर भाँति-भाँति की साजिशों और चालों को चलकर उन्होंने बिखरी हुई भारतीय शक्तियों में ऐसा संग्राम खड़ा कर दिया कि वे शक्तियाँ स्वयं ही एक-दूसरे से टकराकर चकनाचूर होने लगीं।

इंगलैंड के पीछे किसी जातीय सभ्यता का इतिहास न था। किसी प्राचीन संस्कृति की छाप न थी। यद्यपि वह ईसाई धर्म स्वीकार कर चुका था, पर इस समय वह धर्मतंत्र भी साम्प्रदायिक कलह का रूप धारण कर रहा था। पाप-पुण्य, धर्माधर्म, नीति-अनीति के सांस्कृतिक आदर्श जैसे भारत में प्राचीन वैदिक, बौद्ध, जैन और हिन्दू धर्म के वेद, श्रुति, स्मृति, दर्शन और आचारशास्त्र के आधार पर भारतीय जनता में सहस्रों वर्षों से उनकी पैतृक सांस्कृतिक सम्पत्ति के रूप में चले आते थे, वैसा इंगलैंड में एक भी सांस्कृतिक सूत्र न था। इंगलैंड अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ तक घोर दरिद्रता, निरक्षरता और अन्धविश्वासों का दास बना हुआ था। नैतिक आदर्शों  पर सुसभ्य जीवन का इंगलैंड में जन्म ही हुआ था।

भारत जैसे समृद्ध देश के धन, सम्पदा, वैभव और जाहो-जलाली का हाल जब अंग्रेजों के कानों में पहुँचा तो उनकी लोलुप दृष्टि भारत की ओर गई और उनकी आवारा और साहसिक प्रकृति सत्रहवीं शताबदी के आरम्भ में उन्हें भारत तक खींच लाई। सौ वर्ष तक वे भारत की गलियों में कंधे पर बोझें का थैला लादे माल बेचते, व्यापार करते और धन कमाते फिरते रहे। बंदर की भाँति लाल-लाल चेहरेवाले फिरंगी के मुँह से उनकी अटपटी भाषा सुनने को बालक और स्त्रियाँ आतुर रहते, उनके आने पर उनके काँच के सस्ते सामान को हँसी उड़ाते और उन्हें तंग करते थे।

अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ ही में औरंगजेब की मृत्यु हुई और एकबारगी ही महान मुग़ल-तख्त डगमगा गया। इन सौ वर्षों में इन फिरंगियों की लालस बेहद बढ़ चुकी थी। किसी प्रकार के न्याय-अन्याय और धर्माधर्म का उन्हें विचार-संस्कार था ही नहीं। अब उनकी इच्छापूर्ति में बाधक कोई शक्ति भारत में नहीं थी। उन्होंने तिजारती कोठियों के बदले जगह-जगह किलेबंदियाँ करनी आरम्भ कर दीं। दुर्भाग्य से अपने ही में सीमित भारतीय राजाओं ने इस बात की कुछ परवाह नहीं की। उन्हें अनुमतियाँ और सुविधाएँ मिलती ही गईं। उनका बल बढ़ता गया। वे उचित-अनुचित उपायों से धन कमाते गए और सेना रखते गए। इस सेना के बल पर उन्होंने मद्रास और बंगाल के राजाओं के आपसी झगड़ों में पैर फँसाकर कभी इसका और कभी उसका पक्ष लेना आरम्भ कर दिया। कूटनीति और साजिशों द्वारा इनका बल बढ़ता गया। दिल्ली का दुर्बल साम्राज्य-केन्द्र अब इस योग्य न था कि वह केन्द्रीय शक्ति के रूप में इस स्थिति को समझे और उसपर नियन्त्रण करे। अतः उन्होंने भारतीय नरेशों को एक-दूसरे से लड़ाकर इलाके दखल करने आरम्भ कर दिए।

एक ही शब्द में यह कहा जा सकता है कि अंग्रेजों ने आँखें बंद करके भारत को हाथ में लिया।

(आचार्य चतुरसेन के उपन्यास "सोना और खून" से लिया गया अंश)

Tuesday, September 28, 2010

सातवीं से अठारहवीं शताब्दी तक का भारत (1)

सातवीं शताब्दी के आरम्भ ही में इस्लाम के पैगम्बर मुहम्मद ने अरब में इस्लाम की शिक्षा दी और उनके जीवन-काल में ही समूचा अरब मुसलमान हो गया था। इसके बाद उनकी मृत्यु के बाद सौ वर्षों के भीतर ही मेसोपोटामिया, सीरिया, जेरूसलम, ईरान, तातार, तुर्किस्तान और चीन का कुछ भाग, मिस्र, कारबेज तथा सम्पूर्ण उत्तरी अफ्रीका मुसलमानों ने जीतकर अपना महान साम्राज्य स्थापित कर लिया। विशाल रोमन साम्राज्य भी इनके हमलों से न बच पाया और इसके बाद स्पेन भी उसके अधीन हो गया। यह इस्लाम की शानदार पहली शताब्दी थी। इसके बाद तो रूस, यूनान, बलकान, पोलैंड, दक्षिण इटली, सिसली को लेकर आधे यूरोप पर इस्लाम की हुकूमत कायम हो गई, जो शताब्दियों तक रही।

भारत में मुहम्मद की मृत्यु के चार वर्ष बाद ही खलीफा उमर के जमाने में बंबई के निकट के थाना नामक स्थान में मुसलमानों की जल-सेना ने प्रवेश किया था, परन्तु खलीफा की आज्ञा से उसे वापस बुला लिया गया था। इसके बाद आठवीं शताब्दी के प्रथम चरण में मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में अरबों ने सिंध जय किया और मुलतान पर अधिकार कर लिया। इसके तीन सौ वर्ष बाद महमूद गज़नवी के आक्रमण हुए और इसके दो सौ वर्ष बाद तेरहवीं शताब्दी के प्रथम चरण में पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद भारत में इस्लामी राज्य स्थापित हो गया।

मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के कोई सौ वर्ष पूर्व ही सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु हो चुकी थी और उसके बाद ही राजपूतों की नजई जाति का उदय हुआ था। उन्होंने पश्चिम से चलकर उत्तर-पूर्वीय भारत तथा मध्य-भारत में अनेक छोटी-छोटी रियासतें स्थापित कर ली थीं। मुसलमानों के आने के ठीक पहले पंजाब से दक्षिण तक और बंगाल से अरब सागर तक लगभग समस्त देश राजपूतों के शासन में आ गया था। परन्तु कोई बड़ी शक्ति इन छोटी-छोटी रियासतों पर अंकुश रखने वाली न थी। इससे ये रियासतें निरन्तर परस्पर लड़ती थीं। प्राचीन महाराज्यों के अब केवल ध्वंस ही दिखाई देते थै।

इस समय धर्म-क्षेत्र में जभी वैसी ही अव्यवस्था हो गई थी। भारत में सम्प्रदायवाद का जोर था। वैष्णव, शाक्त, तान्त्रिक, वाममार्गी, कापालिक, शैव और पाशुपत धर्म वाले बड़ी कट्टरता से परस्पर संघर्ष करते रहते थे। कुछ लोग बड़े-बड़े विवादों, दार्शनिक विचारों में फँसे थे, पर सर्वसाधारण घोर अंधकार में था। जाति-भेद पूरे जोरों पर था। स्त्रियों और शूद्रों की दशा दयनीय थी। ब्राह्मणों और पुरोहितों के विशेषाधिकार स्थापित हो चुके थे। अधिकांश जनता जाति-पाँति, देवी-देवा, भूत-प्रेत, जप-तप, यज्ञ-हवन, पूजा-पाठ तथा ब्राह्मणौं को दान देने में, तीर्थयात्रा करने में, जंतर-मंतर और जादू-टोनों से अंधविश्वास में फँसी थी। संक्षेप में उस काल का भारत अनगिनत छोटी-छोटी अनियन्त्रित रियासतों, सैकड़ों मत-मतांतरों और अनगिनत कुरीतियों और अंधविश्वासों का केन्द्र बना हुआ था।

इसी समय भारत में इस्लाम ने प्रवेश किया। इस्लाम के जन्म से पूर्व ही दक्षिण भारत में अरबों की अनेक बस्तियाँ बस चुकी थीं। वे सब व्यापारी थे तथा भारतीयों से उनके अच्छे सम्बन्ध थे। इसलिए आक्रमण से पूर्व ही इस्लाम इन व्यापारियों के साथ भारत में सातवीं शताब्दी ही में आ चुका था तथा बहुत से भारतीय मुसलमान हो चुके थे। उस समय इस्लाम के विपरीत कोई घृणा का भाव न था। भारत के तत्कालीन असंख्य समप्रदायों में एक यह भी समझ लिया गया था। नवीं शताब्दी के आरम्भ ही में मलाबार के राजा ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया था। इससे इस राज्य की वृद्धि हुई तथा इस राज्य  की सहायता से इस्लाम की भी भारत में प्रतिष्ठा हुई। इस बीच बहुत-से मुसलमान फकीर और विद्वान अरब तथा ईरान से आ-आकर भारत में बसते गए। उनका खूब आदर-सत्कार होता था और सैकड़ों हिन्दू उनके चेले बनते थे। इनमें कुछ फकीर बहुत प्रसिद्ध हो गए। अब इस्लाम के प्रभाव कोंकण, काठियावाड़ और मध्य भरत में भी फैल चुका था। उस समय के ये इस्लाम के प्रचारक अपनी सच्चरित्रता और त्याग के कारण लोगों में अपना प्रभाव जमा चुके थे। इसके अतिरिक्त इस्लाम के सिद्धांत, तत्कालीन जटिल हिन्दू समप्रदायों की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली और आकर्षक थे। इसी से खासकर, छोटी जाति के बहुत-से लोग, जो हिन्दू वर्ण-व्यवस्थअ के शिकार थे, स्वेच्छा से मुसलमान होना पसन्द करते जाते थे।

तेरहवीं शताब्दी के अन्त से सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक, जब तक कि मुसलमान भारत में अपने साम्राज्य-स्थापन के प्रयत्न करते रहे, यही दशा रही। इस काल में अरब के इस नये मत का प्रभाव केवल उन लाखों भारतीयों पर ही नहीं पड़ा, जिन्होंने इस्लाम ग्रहण कर लिया था, अपितु भारतीयों के आम विचार, धर्म, साहित्य, कला और विज्ञान पर भी पड़ा था; कहना चाहिए कि समूची भारतीय सभ्यता ही भारत में मुग़ल-साम्राज्य की स्थापना से पहले ही इस्लाम के प्रभावित हो चुकी थी।

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चौदहवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में तैमूर ने भारत पर आक्रमण किया। उस समय दिल्ली के तख्त पर मुहम्मद तुगलक था। तैमूर केवल पन्द्रह दिन भारत में रहा और लूट-खसोट और कत्ले-आम करके लौट गया। इसके कोई सवा सौ वर्ष बाद बाबर ने आक्रमण किया। इस समय तक मुकलों की प्रकृति में अन्तर पड़ चुका था। वे अपनी जन्मभूमि मंगोलिया से कहीं अधिक सभ्य देश ईरान में वर्षों रह चुके थे। इससे वे चंगेज़खां और तैमूर की अपेक्षा सभ्यता-प्रेमी बन चुके थे। पानीपत के मैदान में बाबर ने इब्राहीम लोधी को शिकस्त दी और मुग़ल-तखत की स्थापना की। उसने भारत को ही अपना घर बना लिया और हुमायूं के अतिरिक्त उसके शेष वंशज भारत ही में पैदा हुए। इधर सम्राट हर्षवर्धन के बाद अर्थात् ईसा की सातवीं शताब्दी के मध्य से लोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक लगभग नौ सौ वर्ष के समय में कोई सशक्त राजनीतिक शक्ति ऐसी न उत्पन्न हो पाई थे, जो समस्त भारत को एक सूत्र में बाँध सके। इन नौ सौ सालों में भारत छोटी-बड़ी, एक-दूसरे  से प्रतिस्पर्धा करने वाली रियासतों के युद्ध का अखाड़ा बना रहा। ड़ाजनीति निर्बलता, अनैक्य और अव्यवस्था इस काल के भारत की सच्ची तस्वीर थी। इस अवस्था में एक ऐसी केन्द्रीय शक्ति की भारत में बड़ी आवश्यकता थी, जो सारे देश के ऊपर एक समान शासन कायम कर सके और देश की बिखरी हुई शक्तियों को एक सूत्र में गांठ सके।

यह काम सोलहवीं शताब्दी से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक दिल्ली के मुग़ल-साम्राज्य ने किया। उसने राजनीति, सामाजिक व्यवस्था, उद्योग, कला-कौशल, समृद्धि, शिक्षा और सुशासन की दृष्टि से भारत में एक नये युग का सूत्रपात किया। मुग़लों से पहले अशोक और चन्द्रगुप्त के साम्राज्य भारत में थे, पर मुग़ल-साम्राज्य उस सबसे बड़ा था। इसके अतिरिक्त एक बात यह भी थी कि अशोक और चन्द्रगुप्त के सम्राज्य का अन्तःगठन ऐा न था जैसा मुग़ल-साम्राज्य का था। उस काल में विविध प्रान्तों की विविध भाषाएँ और अलग-अलग शासन-पद्धतियाँ थीं तथा अलग-अलग प्रान्तीय जीवन थे। परन्तु मुग़ल-साम्राज्य के सौ वर्षों में, अकबर के सिंहासारूढ़ होने के बद से मुहम्मद शाह की मृत्यु तक, समस्त उत्तरी भारत और अधिकांश दक्षिण भारत की एक सरकारी भाषा, एक शासन-पद्धति, एक समान सिक्का और हिन्दू पुरोहितों तथा ग्रामीणों को छोड़कर सब श्रेणी के नागरिकों की एक सार्वजनिक भाषा थी। जिन प्रान्तों पर सम्राट का सीधा शासन न था, वहाँ के हिन्दू राजा भी लगभग मुग़ल-प्रणाली को ही काम में लाते थे।

प्राचीनकाल में बौद्ध-युग में भारत का सांस्कृतिक सम्बन्ध भारत से बाहर के देशों से स्थापित हुआ था, जो मुग़ल अमलदारी में नये सिरे से फिर स्थापित हुआ। मुग़ल-साम्राज्य की समाप्ति तक अफ़गानिस्तान दिल्ली के बादशाह के अधिन था तथा अफ़गानिस्तान के जरिये बुखारा, समरकंद, बलख, खुरासान, खाजिम और ईरान से हजारों यात्री तथा व्यापारी भारत में आते रहते थे। बादशाह जहांगीर के राज्यकाल में तिजारती माल से लदे चौदह हजार ऊँट प्रतिवर्ष बोलान दर्रे से भारत आते थे। इसी प्रकार पश्चिम में भड़ोंच, सूरत, चाल, राजापुर, गोआ और करबार तथा पूर्व में मछलीपट्टनम तथा अन्य बन्दरगाहों से सहस्रों जहाज प्रतिवर्ष अरब, ईरान, टर्की, मिस्र, अफ्रीका, लंका, सुमात्रा, जावा, स्या और चीन आते-जाते थे।

अकबर ने धार्मिक उदारता की आधार शिला पर ही मुग़ल-साम्राज्य की स्थापना की थी। अकबर, जहांगीर और शाहजहां तक इस उदारता का व्यवहार रहा। मुग़ल सम्राटों के दरबार में हिन्दू और मुसलमान दोनों के मुख्य त्यौहार समान उत्साह और वैभव से मनाए जाते थे। इसी से मुग़ल-साम्राज्य का वैभव बढ़ा। शाहजहां का समय भारतीय इतिहास में सबसे अधिक समृद्ध था। उसे हम उस काल का स्वर्णयुग कह सकते हैं। औरंगजेब ने धार्मिक संकीर्णता को अपनी राजनीतिक आवश्यकता बताया और तभी से मुग़ल-प्रताप अस्त होना आरम्भ हुआ। राजपूत, मराठे, सिख और हिन्दू राजा उससे असन्तुष्ट हो गए। भारत की राजनीतिक सत्ता निर्बल हो गई और इसके साथ ही देश के उद्योग-धंधे, व्यापार, साहित्य और सुख-समृद्धि के नाश के बीज उगने लगे।

औरंगजेब के निर्बल उत्तराधिकारियों ने एक बार फिर समन्वय की नीति अपनाने की चेष्टा की। परन्तु अभी औरंगजेब की गलती के परिणाम ताजा ही थे कि एक ऐसी तीसरी शक्ति ने भारत के राजनीतिक मंच पर प्रवेश किया जिसका हित हर प्रका भारतवासियों के हित के विरुद्ध था। वह भारतीय हित का विरोधिनी शक्ति ब्रिटेन थी।

(आचार्य चतुरसेन के उपन्यास "सोना और खून" से लिया गया अंश)

Monday, September 27, 2010

चंचल नार के नैन छिपे नहीं... कवि गंग

तारो के तेज में चन्द्र छिपे नहीं
सूरज छिपे नहीं बादल छायो
चंचल नार के नैन छिपे नहीं
प्रीत छिपे नहीं पीठ दिखायो
रण पड़े राजपूत छिपे नहीं
दाता छिपे नहीं मंगन आयो
कवि गंग कहे सुनो शाह अकबर
कर्म छिपे नहीं भभूत लगायो।


कवि गंग (1538-1625 ई.), जिनका वास्तविक नाम गंगाधर था, बादशाह अकबर के दरबारी कवि थे। कवि गंग के के विषय में कहा गया हैः

उत्तम पद कवि गंग के कविता को बलवीर।
केशव अर्थ गँभीर को सूर तीन गुन धीर॥


बादशाह अकबर के साथ ही रहीम, बीरबल, मानसिंह तथा टोडरमल आदि अकबर के दरबारीगण कवि गंग के चाहने वाले थे। उनकी रचनाओं को शब्दों का सारल्य के साथ साथ वैचित्र्य, अलंकारों का प्रयोग और जीवन की व्याहारिकता अत्यन्त रसमय एवं अद्भुत बना देते हैं। उनकी रचनाओं में जीवन का यथार्थ स्पष्ट रूप से झलकता है। इस यथार्थ को कि "गाँठ में रुपया होने से सभी लोग चाहने लगते हैं" कवि गंग इस प्रकार से व्यक्त करते हैं:

माता कहे मेरो पूत सपूत
बहिन कहे मेरो सुन्दर भैया
बाप कहे मेरे कुल को है दीपक
लोक लाज मेरी के है रखैया
नारि कहे मेरे प्रानपती हैं
जाकी मैं लेऊँ दिनरात बलैया
कवि गंग कहे सुन शाह अकबर
गाँठ में जिनकी है ढेरों रुपैया


उनके द्वारा व्यक्त एक और जीवन दर्शन और देखें:

जिनके हिरदे श्री राम बसे फिर और को नाम लियो ना लियो
कवि गंग कहे सुन शाह अकबर इक मूरख मित्र कियो ना कियो


बुराई के विषय में वे कहते हैं:

एक बुरो प्रेम को पंथ , बुरो जंगल में बासो
बुरो नारी से नेह बुरो , बुरो मूरख में हँसो
बुरो सूम की सेव , बुरो भगिनी घर भाई
बुरी नारी कुलक्ष , सास घर बुरो जमाई
बुरो ठनठन पाल है बुरो सुरन में हँसनों
कवि गंग कहे सुन शाह अकबर सबते बुरो माँगनो

कहा जाता है कि प्रायः अकबर कवि गंग को एक पंक्ति अथवा वाक्यांश दे दिया करते थे जिस पर उन्हें काव्य रचना करनी होती थी। एक बार अकबर ने "आस अकबर की" पर काव्य रचने को कहा तो उन्होंने निम्न रचना कीः

मृगनैनी की पीठ पै बेनी लसै, सुख साज सनेह समोइ रही।
सुचि चीकनी चारु चुभी चित मैं, भरि भौन भरी खुसबोई रही॥
कवि 'गंग जू या उपमा जो कियो, लखि सूरति या स्रुति गोइ रही।
मनो कंचन के कदली दल पै, अति साँवरी साँपिन सोइ रही॥

करि कै जु सिंगार अटारी चढी, मनि लालन सों हियरा लहक्यो।
सब अंग सुबास सुगंध लगाइ कै, बास चँ दिसि को महक्यो॥
कर तें इक कंकन छूटि परयो, सिढियाँ सिढियाँ सिढियाँ बहक्यो।
कवि 'गंग भनै इक शब्द भयो, ठननं ठननं ठननं ठहक्यो॥

लहसुन गाँठ कपूर के नीर में, बार पचासक धोइ मँगाई।
केसर के पुट दै दै कै फेरि, सुचंदन बृच्छ की छाँह सुखाई॥
मोगरे माहिं लपेटि धरी 'गंग बास सुबास न आव न आई।
ऐसेहि नीच को ऊँच की संगति, कोटि करौ पै कुटेव न जाई॥
रती बिन राज, रती बिन पाट, रती बिन छत्र नहीं इक टीको।

रती बिन साधु, रती बिन संत, रती बिन जोग न होय जती को॥
रती बिन मात, रती बिन तात, रती बिन मानस लागत फीको।
'गंग कहै सुन शाह अकबर, एक रती बिन पाव रती को॥
एक को छोड बिजा को भजै, रसना जु कटौ उस लब्बर की।

अब तौ गुनियाँ दुनियाँ को भजै, सिर बाँधत पोट अटब्बर की॥
कवि 'गंग तो एक गोविंद भजै, कुछ संक न मानत जब्बर की।
जिनको हरि की परतीत नहीं, सो करौ मिल आस अकबर की॥

उपरोक्त रचना की अंतिम पंक्ति अकबर को अपमानजनक लगी इसलिए अकबर ने कवि गंग को उसका साफ अर्थ बताने के लिए कहा। कवि गंग इतने स्वाभिमानी थे कि उन्होंने अकबर को यह जवाब दियाः

एक हाथ घोडा एक हाथ खर
कहना था सा कह दिया करना है सो कर


कवि गंग अत्यन्त स्वाभिमानी थे। उनकी स्पष्टवादिता के कारण ही उन्हें हाथी से कुचलवा दिया गया था।

अपनी मृत्यु के पूर्व कवि गंग ने कहा थाः

कभी न रानडे रन चढ़े कभी न बाजी बंध
सकल सभा को आशीष है ,विदा होत कवि गंग

कवि गंग के विषय में भिखारीदास जी का कथन हैः "तुलसी गंग दुवौ भए, सुकविन में सरदार"

कवि गंग के मुख्य ग्रंथ हैं -'गंग पदावली, "गंग पचीसी" और "गंग रत्नावली"।

चलते-चलते

कवि गंग के विषय में हमारे पास भी अधिक जानकारी नहीं थी। दरअसल हमने पोस्ट "पत्नी बिना चैन कहाँ रे" में निम्न पंक्तियाँ उद्धरित की थीः

भभूत लगावत शंकर को, अहिलोचन मध्य परौ झरि कै।
अहि की फुँफकार लगी शशि को, तब अंमृत बूंद गिरौ चिरि कै।
तेहि ठौर रहे मृगराज तुचाधर, गर्जत भे वे चले उठि कै।
सुरभी-सुत वाहन भाग चले, तब गौरि हँसीं मुख आँचल दै॥
(अज्ञात)

अर्थात् (प्रातः स्नान के पश्चात्) पार्वती जी भगवान शंकर के मस्तक पर भभूत लगा रही थीं तब थोड़ा सा भभूत झड़ कर शिव जी के वक्ष पर लिपटे हुये साँप की आँखों में गिरा। (आँख में भभूत गिरने से साँप फुँफकारा और उसकी) फुँफकार शंकर जी के माथे पर स्थित चन्द्रमा को लगी (जिसके कारण चन्द्रमा काँप गया तथा उसके काँपने के कारण उसके भीतर से) अमृत की बूँद छलक कर गिरी। वहाँ पर (शंकर जी की आसनी) जो मृगछाला थी वह (अमृत बूंद के प्रताप से जीवित होकर) उठ कर गर्जना करते हुये चलने लगा। सिंह की गर्जना सुनकर गाय का पुत्र - बैल, जो शिव जी का वाहन है, भागने लगा तब गौरी जी मुँह में आँचल रख कर हँसने लगीं मानो शिव जी से प्रतिहास कर रही हों कि देखो मेरे वाहन (पार्वती का एक रूप दुर्गा का है तथा दुर्गा का वाहन सिंह है) से डर कर आपका वाहन कैसे भाग रहा है।

उपरोक्त पंक्तियाँ कई साल पहले, जब हम बस्तर के नारायणपुर में कार्यरत थे, हमें एक अध्यापक महोदय ने सुनाई थीं। यह रचना हमें इतनी अच्छी लगी कि हमें यह कण्ठस्थ हो गया किन्तु इनके रचयिता के विषय में हमें पता नहीं था और उनके विषय में जानने के लिए हमें बहुत अधिक उत्सुकता थी। नेट में भटकते-भटकते अचानक हमें यही रचना दो और रूपों में मिलीं

अंग भस्मी लगावत शंकर ने तब
अहि लोचन बीच परी झर के
अहि फुंकार लगी शशि के तब
अमृत बूँद परी झर के
सजीव भाई मृगराज त्वचा तब
सुरभि सूत भागे डर के
कवी "गंग" कहे सुन शाह अकबर
गौर हंसी मुख यूँ करके
(लिंक)

भस्म रमा रहीं शंकर के
तनि लोचन-मध्य गिरी अहि के
विष की फुसकार लगी शशि के
और अमृत-बूंद गिरी झर के
मृगराज-त्वचा हुंकार उठी
सुरुभी-सुत भागे हैं बाँआ... कर के
लखि पार्वती सकुचाई रहीं
महादेव निहार रहे हँस के
(लिंक)

उपरोक्त एक रूप को पढ़कर लगता है कि यह रचना कवि गंग की है क्योंकि कवि गंग अपनी रचना की किसी न किसी पंक्ति में अन्य कई कवियों की तरह अपने नाम का उल्लेख करते थे। किन्तु अन्य दो रूपों में कवि गंग का नाम नहीं आता इससे लगता है कि यह कवि गंग की रचना नहीं हो सकती, उस रूप में शब्दों का चयन भी कवि गंग के काल का सा प्रतीत नहीं होता। अस्तु, कवि गंग के विषय में जानने की हमारी उत्सुकता बढ़ गई जिसका परिणाम इस पोस्ट के रूप में आपके समक्ष है।

Sunday, September 26, 2010

पोस्ट चोरी का है ये मेरा...

मुझको ब्लोगर बना दीजिये
मेरी रचना पढ़ा दीजिये

अच्छा लिखूँ मैं या ना लिखूँ
टिप्पणी तो करा दीजिये

लोकली मैं छपूँ ना छपूँ
नेट पर तो छपा दीजिये

पोस्ट चोरी का है ये मेरा
मत किसी को बता दीजिये

मूल गज़ल

लज़्ज़त-ए-गम बढ़ा दीजिये
आप यूँ मुस्कुरा दीजिये

कीमत-ए-दिल बता दीजिये
खाक लेकर उड़ा दीजिये

चांद कब तक गहन में रहे
आप ज़ुल्फें हटा दीजिये

मेरा दामन अभी साफ है
कोई तोहमद लगा दीजिये

आप अंधेरे में कब तक रहें
फिर कोई घर जला दीजिये

एक समुन्दर ने आवाज दी
मुझको पानी पिला दीजिये

मूल गजल सुनें:

Saturday, September 25, 2010

"वो सुबह हमीं से आयेगी" या "वो सुबह कभी तो आयेगी"?

साहिर साहब ने एक गीत लिखा था "वो सुबह हमीं से आयेगी" किन्तु फिल्म "फिर सुबह होगी" में उन्होंने अपने उसी गीत को "वो सुबह कभी तो आयेगी" के रूप में बदल दिया था। प्रस्तुत हैं दोनों गीतः

साहिर लुधियानवी

वो सुबह हमीं से आयेगी

जब धरती करवट बदलेगी, जब क़ैद से क़ैदी छूटेंगे
जब पाप घरौंदे फूटेंगे, जब ज़ुल्म के बन्धन टूटेंगे
उस सुबह को हम ही लायेंगे, वो सुबह हमीं से आयेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी

मनहूस समाजों ढांचों में, जब जुर्म न पाले जायेंगे
जब हाथ न काटे जायेंगे, जब सर न उछाले जायेंगे
जेलों के बिना जब दुनिया की, सरकार चलाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी

संसार के सारे मेहनतकश, खेतो से, मिलों से निकलेंगे
बेघर, बेदर, बेबस इन्सां, तारीक बिलों से निकलेंगे
दुनिया अम्न और खुशहाली के, फूलों से सजाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी

अब देखिए साहिर जी अपने उसी गीत को कैसे दूसरा रूप दे देते हैः

वो सुबह कभी तो आयेगी

इन काली सदियों के सर से, जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा, जब धरती नज़्में गायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

जिस सुबह की खातिर जुग-जुग से, हम सब मर-मर कर जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में, हम जहर के प्याले पीते हैं
इन भूखी प्यासी रूहों पर, इक दिन तो करम फर्मायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

माना कि अभी तेरे मेरे, अरमानों की कीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर, इन्सानों की कीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब झूठे, सिक्कों में न तोली जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

दौलत के लिये जब औरत की, इस्मत को न बेचा जायेगा
चाहत को न कुचला जायेगा, ग़ैरत को न बेचा जायेगा
अपनी काली करतूतों पर, जब ये दुनिया शर्मायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर, ये भूख के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर, दौलत की इजारादारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

मजबूर बुढ़ापा जब सूनी, राहों की धूल न फांकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी, गलियों में भीख न मांगेगा
ह़क मांगने वालों को जिस दिन, सूली न दिखाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

फ़ाको की चिताओं पर जिस दिन, इन्सां न जलाये जायेंगे
सीनों के दहकते दोज़ख में, अर्मां न जलाये जायेंगे
ये नरक से भी गन्दी दुनिया, जब स्वर्ग बनाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

Friday, September 24, 2010

पितृ पक्ष अर्थात् मृतक पूर्वजों की स्मृति का प्रावधान

आज हमारा अस्तित्व सिर्फ इसलिए है क्योंकि कभी हमारे पूर्वजों का अस्तित्व था, यदि हमारे पूर्वज न होते तो हमारा होना भी असम्भव था। मृत्यु के पश्चात् मृतक की स्मृति मात्र ही रह जाती है जो कि समय बीतने के साथ क्षीण होते जाती है। यह स्मृति क्षीण न होने पाए इसीलिए हिन्दू दर्शन में पितृपक्ष का प्रावधान है। वर्ष में पन्द्रह दिन अर्थात् भाद्रपद के सम्पूर्ण कृष्णपक्ष को पितरों को समर्पित किया गया है। हिन्दू दर्शन के अनुसार मृत्यु सिर्फ शरीर की होती है और आत्मा को अमर माना गया है अतः पितरों की आत्मा की शान्ति के लिए पितृपक्ष में उनके नाम से तर्पण तथा श्राद्ध किया जाता है।

हिन्दू दर्शन में पितरों को मोक्ष दिलवाने के लिए उनका श्राद्ध करना पुत्र का अनिवार्य कर्तव्य माना गया है। पितरों के मोक्ष का महत्व इतना अधिक है कि राजा सगर के साठ हजार पुत्रों, जिन्हें कपिल ऋषि ने शाप देकर भस्म कर दिया था, की मुक्ति के लिए सगर के पौत्र अंशुमान तथा अंशुमान के पुत्र दिलीप ने देवलोक से गंगा को भूलोक में लाने के लिए घोर तपस्या की किन्तु सफल न पाये तो दिलीप के पुत्र भगीरथ ने इस कार्य को पूरा किया और अपने पूर्वजों को मुक्ति दिलाई (लिंक)। मनुष्य जीवन में सफलता के लिए माता-पिता की सेवा कर तथा पितरों की आत्मा की शान्ति प्रदान कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने की बड़ी महत्ता है।

पितृ पक्ष में पितरों की क्षुधा-शान्ति के लिए कौओं को भोजन कराने का विधान है। कौए के साथ साथ गौ, श्वानादि प्राणियों को भी भोजन दिया जाता है। इन विधानों का प्रत्यक्षतः पितरों से कुछ सम्बन्ध नहीं है ये मात्र लोकरीतियाँ ही प्रतीत होती हैं। शायद ये लोकरीतियाँ प्राणीमात्र पर दया करने के उद्देश्य ही बनाई गई हैं।

Thursday, September 23, 2010

भारत में आलू का इतिहास

भारत में शायद ही कोई ऐसा रसोईघर होगा जहाँ पर आलू ना मिले। हमारे देश में सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली फसलों में गेहूँ, धान तथा मक्का के बाद आलू का ही नंबर आता है। सब्जी तथा बहुत से स्वादिष्ट व्यञ्जन बनाने के लिए सम्पूर्ण भारत में आलू का प्रयोग किया जाता है। पर शायद आपको यह जानकर आश्चर्य हो कि आज से लगभग 400 साल पहले भारत में आलू के बारे में लोग जानते ही नहीं थे।

ज्ञात जानकारी के अनुसार लगभग 7000-10000 वर्ष पहले आलू का घरेलू प्रयोग मध्य पेरु मे होता था। माना जाता है कि आलू की खेती सर्वप्रथम कैरिबियन में आरम्भ हुआ जहाँ पर इसे 'कमाटा' (camata) या 'बटाटा' (batata) के नाम से जाना जाता था। 16वीं शताब्दी में यह 'बटाटा' स्पेन पहुँचा और वहाँ पर उसकी खेती होने लगी तथा स्पेन से सम्पूर्ण यूरोप में 'बटाटा' का निर्यात् होने लगा। इस बीच 'बटाटा' का नाम परिवर्तित होकर 'पटाटा' (patata) बन गया जो कि इंग्लैंड जाकर 'पोटाटो' (potato) हो गया। स्पेन से निकल कर यह 'पोटाटो' पुर्तगाल, इटली, फ्रांस, बेल्जियम तथा जर्मनी तक फैल गया। कालान्तर में सम्पूर्ण यूरोप तथा एशिया के कई देशों में आलू की खेती होने लगी।

माना जाता है कि 17वीं शताब्दी के आरम्भ में पुर्तगालियों ने भारत के पश्चिमी समुद्रतटों में आलू को बटाटा के नाम से उगाना शुरू किया। एक मान्यता यह भी है कि आलू भारत में 17वीं शताब्दी के अन्तिम दौर में ब्रिटिश मिशनरियों के साथ आया और ब्रिटिश व्यापारियों ने उसी समय बंगाल में कलकत्ता के आसपास के इलाकों में इसे बेचना शुरू किया, उसी काल में पोटाटो का हिन्दी नाम आलू बना। सन् 1841-42 में अंग्रेजों ने नैनीताल जैसे पहाड़ी इलाकों में आलू की खेती शुरू कर दी और आलू दिनों-दिन तेजी के साथ लोकप्रिय होते चला गया।

विश्व भर में आलू के अनेक व्यञ्जन बनाय॓ जाते हैं।

Wednesday, September 22, 2010

तू मानव है, तू चाहे तो ...

तू मानव है, तू चाहे तो
पत्थर को भी पानी कर दे
जन जन के जीवन में तू
सुख समृद्धि और वैभव भर दे!

मरुस्थली में फूल खिला दे
मिट्टी से सोना उपजा दे
तेरे हाथों में वो बल है
चट्टानों को मोम बना दे
अतुल शक्ति का स्वामी है तू
विष को भी तू अमृत कर दे!

जन-जन के जीवन में तू
सुख समृद्धि और वैभव भर दे!

शांतिदूत तू समस्त विश्व का
दुःख-दारिद्य का महाकाल है
अवनि और अंबर हैं तेरे
तू ज्ञान का महाजाल है
एक बार फिर आत्मज्ञान से
विश्वपटल आलोकित कर दे!

जन जन के जीवन में तू
सुख समृद्धि और वैभव भर दे!

उठ जाये तो देवतुल्य तू
गिर जाये तो पशु से बदतर
गिरने में अपयश है तेरा
उठ जाना ही है श्रेयस्कर
एक बार फिर इतना उठ तू
देवगणों को विस्मित कर दे!

जन जन के जीवन में तू
सुख समृद्धि और वैभव भर दे!

Tuesday, September 21, 2010

क्या हम अपनी प्राचीन गौरव-गाथा को भुलाते नहीं जा रहे हैं?

भारत की प्राचीन गौरव-गाथा को सम्पूर्ण विश्व मानता है। किन्तु दुःख की बात तो यह है कि हम भारतीय ही अपनी प्राचीन सभ्यता, जीवन और परिपाटी को भूल चुके हैं। आज से हजारों वर्ष पूर्व पंजाब का आविष्कार और संस्थापन करने वाले आर्यों की उन असाधारण विजयों के संस्कार क्या हमें याद हैं? मैं उन्हीं आर्यों की बात कर रहा हूँ जो दुरूह उत्तर के उत्तुंग हिमालय के अंचलों को विदीर्ण करके भारत की शश्य-श्यामला भूमि में आए थे और प्रबल राज्यों की स्थापना की थी। उन्हीं आर्यों ने भारत के प्रशान्त वातावरण में अगम्य-अगाध अध्यात्मतत्व को खोज निकाला था जो कि अत्यन्त प्राचीन होते हुए भी आज तक ताजे और बहुमूल्य बने हुए हैं। क्या हम जानते हैं कि कुरुओं और पांचालों की प्राचीन राजधानियाँ कहाँ थीं? क्या हमें पता है कि मगध के राजसिंहासन पर बैठ कर कब-कब किन-किन हिन्दू सम्राटों ने शासन किया था? हम तो यह भी नहीं जानते कि हमारे किन पूर्वजों ने विशाल महासागरों को अतिक्रान्त करके चीन, अरब, यवद्वीप और पाताल में अपने उपनिवेश कायम किए थे। क्या हमें आन्ध्र, गुप्त, नाग आदि महाराज्यों के विषय में जानकारी है? शकों ने किस प्रकार से भारत को आक्रान्त किया था और विक्रम ने उन्हें कैसे पददलित किया था? एलोरा और अजन्ता की गुफाएँ, साँची के स्तूप, भुवनेश्वर और जगन्नाथ के मन्दिरों का निर्माण किस-किस ने किया था?

इस उद्देश्य से कि हम भारतीय अपनी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति, गौरव को भूल जाएँ, एक सुनियोजित शिक्षा-नीति के तहत भारतीयों को अंग्रेजी की शिक्षा देने का आरम्भ सन् 1835 में आरम्भ किया गया, जो कि कमोबेश आज तक चली आ रही है। इस शिक्षा-नीति का निर्माण लॉर्ड मैकॉले ने किया था जिसने सन् 1833 में चार्टर पर पार्लियामेंट में भाषण देते हुए कहा था, "मैं चाहता हूँ कि भारत में यूरोप के समस्त रीति-रिवाजों को जारी किया जाए, जिससे हम अपनी कला और आचारशास्त्र, साहित्य और कानून का अमर साम्राज्य भारत में कायम करें। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हम भारतवासियों की एक ऐसी श्रेणी उत्पन्न करें जो हमारे और उन करोड़ों के बीच में, जिन पर हमें शासन करना है, दुभाषिए का काम दें; जिनके खून तो हिन्दुस्तानी हों, पर रुचि अंग्रेजी हो। संक्षेप में अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीय तन से भारतीय, पर मन से अंग्रेज हो जाएँ, जिससे अंग्रेजों का विरोध करने की उनकी भावना ही नष्ट हो जाए।"

परन्तु, जिन दिनों मैकॉले ने अपने उपरोक्त विचार व्यक्त किए थे, उसी काल में अनेक पाश्चात्य विद्वानों की नजर भारतीय सांस्कृतिक सम्पदा पर भी पड़ रही थी। उन दिनों के पहले तक यूरोप भारत को धन-धान्य से भरा-पूरा, नवाबों और मुग़लों का देश समझता था और उसकी दृष्टि लूट-खसोट पर थी, सभ्यता और संस्कृति के उद्गम के सम्बन्ध में यूरोप का विश्वास था कि उसका आरम्भ यूनान और फिलिस्तीन से हुआ है; वे यह भी समझते थे कि वही देश संसार में सबसे प्राचीन सभ्यता वाले हैं। भारत को तब तक यूरोप के लोग एक अर्द्धसभ्य देश समझते थे। परन्तु जब यूरोप के निवासियों ने संस्कृत सीखी तो उनका परिचय उपनिषद् तथा कुछ जैन और बौद्ध ग्रन्थों से हुआ। जिन दिनों प्लासी का युद्ध हो रहा था, उन्हीं दिनों दुपरोन नामक एक फ्रेंच नवयुवक भारत में प्राचीन पाण्डुलिपयाँ यत्नपूर्वक खोजता फिर रहा था। वह भारत से लगभग अस्सी पाण्डुलिपयाँ अपने साथ फ्रांस ले गया। इन पाण्डुलिपियों में एक पाण्डुलिपि दाराशिकोह द्वारा फारसी-अनूदित उपनिषदों की भी थी। दुपरोन ने लैटिन में इसका अनुवाद करके 'औपलिखत' नाम से प्रकाशित किया, जिसे पढ़कर जर्मन का प्रसिद्ध दार्शनिक शॉपेनहार आश्चर्यविमूढ़ हो गया और उसके मुँह से ये उद्गार निकले कि 'इसने मेरी आत्मा की गहराई को हिलकोर दिया है। इसके प्रत्येक शब्द से मौलिक विचार ऊपर उठते हैं जिससे भारतीय विचारधारा का वातावरण आप ही उठ खड़ा होता है। ऐसा प्रतीत होता है मानों ये विचार हमारे अपने आत्मिक बन्धु के विचार हों। हमारे मनों पर जो यहूदी-संस्कारों की रूढ़ियाँ और अंधविश्वास छाए हुए हैं, वे इन विचारों के स्पर्श-मात्र से एकबारगी ही गायब हो जाते हैं। सारे संसार में इसके जोड़ का कोई और ग्रन्थ नहीं हो सकता। जीवन-भरफ में मुझे यही एक आश्वासन प्राप्त हुआ है और मृत्युपर्यन्त यह मेरे साथ रहेगा।'

जर्मनी में उपनिषदों के अध्ययन से विचारों का जागरण उसी प्रकार से हुआ जैसे रिनासां के समय में प्राचीन यूनानी साहित्य के सम्पर्क से सारे यूरोप में हुआ था। इसके बाद जोहान फिक्टे और पॉल दूसान ने वेदान्त के सत्य को संसार का सबसे बड़ा सत्य माना, और नीत्शे ने मनुस्मृति को पढ़ा तो उसने उसे बाइबिल से कई गुना श्रेष्ठ कहा।

न्याय के क्षेत्र में हिन्दुओं पर शासन उन्हीं के धर्मशास्त्रो के अनुसार करने के विचार से वारेन हेस्टिंग्ज ने पहले-पहल धर्मशास्त्रों का अनुवाद फारसी और अंग्रेजी भाषा में कराया। इसके अतिरिक्त विलायत से आए हुए जजों और वकीलों को उसने संस्कृत पढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने यद्यपि कचहरी की आवश्यकता के लिए संस्कृत पढ़ी, पर जब उन्होंने वहाँ का भाव-गाम्भीर्य और विचारों का मार्दव देखा तो वे एकबारगी अभिभूत हो उठे। इसके बाद सन् 1784 में सर विलियम जोन्स ने, जो उन दिनों कलकत्ता के प्रधान न्यायाधीश थे, एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना की तथा स्वयं कालिदास की 'शकुन्तला' का अनुवाद किया और 'ऋतुसंहार' का एक सम्पादित संस्करण प्रकाशित कराया।

इसके एक बरस बाद सर चार्ल्स विलिकिन्स ने 'भगवद्गीता' का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया। सर जोन्स संस्कृत पर मुग्ध हो गए। उन्होंने सन् 1784 में मानव-धर्मशास्त्र नाम से मनुस्मृति का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया और जब सन् 1786 में एशियाटिक सोसाइटी का अधिवेशन हुआ तो यह घोषणा कर दी कि संस्कृत परम अद्भुत भाषा है, और लैटिन और ग्रीक से अधिक सम्पन्न है। उन्होंने यह भी विचार प्रकट किया कि गोथिक और केल्टिक भाषा-परिवार का उद्गम संस्कृत ही है। आगे इसी बुनियाद पर फ्रांजवाय, मैक्समूलर और ग्रिम ने तुलनात्मक भाषा-विज्ञान का महल खड़ा किया। इसके तत्काल बाद यूरोप के पण्डितों ने निरुक्त और व्याकरण का मनन किया और फोनेटिक्स लिखना आरम्भ किया।

विलियम जोन्स की मृत्यु के बाद उनके कनिष्ठ सहकारी हेनरी टॉमस कोलब्रुक एक महान प्राच्यविद्या-विशारद प्रसिद्ध हुए। इन्होंने हिन्दू-धर्मशास्त्र, दर्शन, व्याकरण, ज्योतिष और धर्म का बड़ा ही गम्भीर अध्ययन एशियाटिक रिसर्चेज में प्रकाशित किया। वेदों का भी एक प्रामाणिक विवरण 'आन द वेदाज' सबसे प्रथम उन्होंने निकाला।

मैक्समूलर, जो कि एक जर्मन होने के बावजूद अंग्रेजी शासन का एक स्तम्भ था, ने सायण के भाष्य पर महत्वपूर्ण अध्ययन किया और उसके बाद उसने वेदों का भाष्य किया, जिसने पूरे यूरोप की आँखें खोल दीं। वेदभाष्य से बढ़कर एक काम उसने  यह किया कि तुलनात्मक भाषा-विज्ञान और तुलनात्मक अध्ययन की परम्परा स्थापित की। इसका परिणाम यह हुआ कि यूरोप के मोह-अन्धकार का पर्दा फट गया। अब तक वे जो यह मानते आ रहे थे कि फिलिस्तीन और यूनान सबसे पुराने देश हैं, और हिब्रू भाषा सबसे पुरानी है, ये सब मान्ताएँ बिखर गईं। मैक्समूलर ने प्रमाणित कर दिया कि संसार की प्राचीनतम जाति आर्य है और प्राचीनतम साहित्य वेद है। इस प्रकार जर्मन विद्वानों ने भारतीय साहित्य, दर्शन और धर्म का जो बखान किया, उसने ईसाइयों के उस प्रचार को भी मिथ्या कर दिया जो वे भारत से बाहर करते थे कि भारत अर्द्ध-शिक्षित देश है।

श्लीगल बन्धुओं ने जर्मन भाषा के द्वारा यूरोप में भारतीय ज्ञान का काफी विस्तार किया। वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, मनुस्मृति, शकुन्तला और वेणीसंहार को देखकर जर्मन कवि और विद्वान विस्मय से मूढ़-मुग्ध हो गए। इस साहित्य के भाव और विचार नये क्षितिज के थे। श्लीगल ने गीता की प्रशंसा पागलों की भाँति की और कहा, "ओ ईश्वरत्व के व्याख्याता, तुम्हारी वाणी के प्रभाव से मनुष्य का हृदय ऐसे अकथनीय आनन्द की भूमि में पहुँच जाता है, जो अत्यन्त उच्च, सनातन और ईश्वरीय है। मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ और तुम्हारे चरणों में अपना अभिनन्दन भेंट करता हूँ।" भारतीय काव्यों की विलक्षणता पर सकर्ट ने प्रकाश डाला। गेटे ने शकुन्तला पर प्रशस्ति लिखी। गेटे आदि ने संस्कृत-परम्पराओं को अपनाया और श्लीगल से हाइने तक जर्मन कविता में भारतीय भाव फैलत ही रहे।

यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि हम समस्त संसार द्वारा स्तुत्य अपनी ही संस्कृति, सभ्यता, और गौरव को निरन्तर रूप से भुलाते ही चले जा रहे हैं।

टीपः इस पोस्ट में विचार, भाव तथा सामग्री आचार्य चतुरसेन के उपन्यास "सोना और खून" से लिए गए हैं।

Monday, September 20, 2010

ब्राह्मण ब्लोगर नाऊ जात देख गुर्राऊ

छत्तीसगढ़ी में एक हाना (लोकोक्ति) है "बाम्हन कूकुर नाऊ जात देख गुर्राऊ"! मतलब यह कि एक ब्राह्मण स्वयं को दूसरे ब्राह्मण से श्रेष्ठ बताने की कोशिश करता है, एक नाई दूसरे नाई को सहन नहीं कर सकता और एक गली के कुत्ते अपनी गली में दूसरी गली के कुत्ते के आ जाने पर उस पर गुर्राने लगते हैं। इस हाने (लोकोक्ति) से हमारा परिचय कल ही हुआ है। कल जब हम अपनी बेटी के घर गए तो उसकी गली के कुत्ते हम पर भौंकने लगे।

हमने जवाँई जी को बताया कि उनकी गली के कुत्ते हम पर भौंक रहे थे तो उन्होंने कहा, "पापा जी ऐसा तो होता ही है, जब किसी दूसरी गली का इस गली में आता है तो ..."

हम भौंचक से हो गए और हमारे मुँह से निकल पड़ा, "क्याऽऽऽ"

तो जमाई जी ने कहा, "आपने तो सुना ही होगा 'बाम्हन कूकुर नाऊ जात देख गुर्राऊ'!"

इस प्रकार से इस छत्तीसगढ़ी लोकोक्ति से हमारा परिचय हो गया। पर इस हाने को सुनकर हमारे भीतर का गब्बर जाग उठा और कहने लगा, "गलत है ये हाना। 'दोपाये दो और चौपाया एक', बहुत बेइन्साफी है ये। या तो तीनों के तीनों चौपाये होने चाहिए या फिर तीनों के तीनों दोपाये! इसलिए अब हम तीनों को ही दोपाये बनाय देते हैं - 'ब्राह्मण ब्लोगर नाऊ जात देख गुर्राऊ'!"

हमें लगा कि हमारे भीतर का गब्बर ठीक ही तो कह रहा है। दो आदमियों के साथ एक जानवर होने का भी भला कोई तुक है? तीनों को आदमी ही होना चाहिए। तीसरे आदमी के लिए ब्लोगर ही सबसे अधिक उपयुक्त है क्योंकि एक ब्लोगर ऊपरी तौर पर दूसरे ब्लोगर के पोस्ट में मिश्री की डली जैसी टिप्पणी तो करता है पर भीतरी तौर से गुर्राता भी है 'उसके पोस्ट में मेरे पोस्ट से टिप्पणियाँ ज्यादा क्यों?' अब मैं ऐसा पोस्ट लिख कर दिखाउँगा जिसमें सबसे ज्यादा टिप्पणियाँ होंगी।

हम खुश हुए कि हमारे भीतर के गब्बर से प्रेरणा पाकर हमने एक नई लोकोक्ति की रचना कर डाली है। हो सकता है कि भविष्य में इस नई लोकोक्ति के लिए लोग यह कह कर हमारी तारीफ करें कि  'स्साला एक जी.के. अवधिया था यार, जिसने इस लोकोक्ति को बनाया'!

चलिए जब लोकोक्ति की बात चली है तो हम इतना और लिख दें कि "जब जीवन का यथार्थ ज्ञान नपे-तुले शब्दों में मुखरित होता है तो वह लोकोक्ति बन जाता है" याने कि लोकोक्ति एक प्रकार से "गागर में सागर" होता है। छत्तीसगढ़ी में लोकोक्ति को "हाना" के नाम से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ी भाषा में बहुत से सुन्दर हाने हैं जिन्हें उनके हिन्दी अर्थसहित जानकर आपको बहुत आनन्द आयेगा। यहाँ पर हम कुछ ऐसे ही रोचक छत्तीसगढ़ी हाना उनके हिन्दी अर्थ सहित प्रस्तुत कर रहे हैं:

  • "अपन पूछी ला कुकुर सहरावै" अर्थात् अपनी तारीफ स्वयं करना, हिन्दी में इसके लिए है "अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना"।
  • "चलनी में दूध दुहय अउ करम ला दोष दै" अर्थात् खुद गलत काम करना और किस्मत को दोषी ठहराना।
  • "घर के जोगी जोगड़ा आन गाँव के सिद्ध" अर्थात् घर के ज्ञानी को नहीं पूछना और दूसरे गाँव के ज्ञानी को सिद्ध बताना याने कि आप कितने ही ज्ञानी क्यों न हों घर में आपको ज्ञानी नहीं माना जाता।
  • "अपन मरे बिन सरग नइ दिखय" अर्थात् स्वयं किये बिना कोई कार्य नहीं होता।
  • "रद्दा में हागै अउ आँखी गुरेड़ै" अर्थात् रास्ते में गंदगी करना और मना करने वाले पर नाराज होना, इसी को हिन्दी में कहते हैं "उल्टा चोर कोतवाल को डाँटै"।
  • "आज के बासी काल के साग अपन घर में काके लाज!" अर्थात् अपने घर में रूखी-सूखी खाने में काहे की शर्म याने कि "रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पी, देख पराई चूपड़ी मत ललचावे जी"।
  • "अड़हा बैद परान घातिया" अर्थात् नीम-हकीम खतरा-ए-जान।
  • "कउवा के रटे ले बइला नइ मरय" अर्थात् कौवा के रटने से बैल मर नहीं जाता याने कि किसी के कहने से किसी की मृत्यु नहीं होती।
  • "उप्पर में राम-राम तरी में कसाई" अर्थात् "मुँह में राम बगल में छुरी"।
  • "करनी दिखय मरनी के बेर" अर्थात् किये गये अच्छे या बुरे कर्मों की परीक्षा मृत्यु के समय होती है।
  • "खेलाय-कुदाय के नाव नइ गिराय पराय के नाव" अर्थात् प्रशंसा कम मिलती है और अपयश अधिक।

Sunday, September 19, 2010

हे विकराले! हे कटुभाषिणी! हे देवि! हे भार्या!

हे आर्यावर्त की आधुनिक आर्या!
हे विकराले! हे कटुभाषिणी!
हे देवि! हे भार्या!

पाणिग्रहण किया था तुझसे
सोच के कि तू कितनी सुन्दर है,
पता नहीं था
मेरी बीबी मेरी खातिर
"साँप के मुँह में छुछूंदर है"

निगल नहीं पाता हूँ तुझको
और उगलना मुश्किल है
समझा था जिसको कोमलहृदया
अब जाना वो संगदिल है

खब्त-खोपड़ी-खाविन्द हूँ तेरा
जीवन भर तुझको झेला हूँ
"पत्नी को परमेश्वर मानो"
जैसी दीक्षा देने वाले गुरु का
सही अर्थ में चेला हूँ

बैरी है तू मेरे ब्लोगिंग की
क्यूँ करती मेरे पोस्ट-लेखन पर आघात है?
मेरे ब्लोगिंग-बगिया के लता-पुष्प पर
करती क्यों तुषारापात है?

हे विकराले! हे कटुभाषिणी!
हे देवि! हे भार्या!

बस एक पोस्ट लिखने दे मुझको
और प्रकाशित करने दे
खाली-खाली हृदय को मेरे
उल्लास-उमंग से भरने दे
तेरे इस उपकार के बदले
मैं तेरा गुण गाउँगा
स्तुति करूँगा मैं तेरी
और तेरे चरणों में
नतमस्तक हो जाउँगा।

यह मत कहना कि पुराने पोस्ट को फिर से लगा दिया, भई इतवार का दिन है आज...

Saturday, September 18, 2010

भारत में शिक्षा व्यवस्था

अत्यन्त प्राचीनकाल से ही भारतवर्ष में ज्ञान और विद्या के क्षेत्र में संसार का अग्रणी रहा है। हमारे देश में नालन्दा, विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय रहे हैं जहाँ पर समस्त संसार से आने वाले लोग शिक्षा ग्रहण किया करते थे। कालान्तर में वारानसी शिक्षा का बहुत बड़ा केन्द्र बन गया।

देखा जाए तो भारत में शिक्षा का इतिहास वैदिक काल से भी पूर्व तक चला जाता है। पतञ्जलि तथा कात्यायन की कृतियों में स्पष्ट उल्लेख है कि वैदिक युग में शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं का समानाधिकार था। यहाँ पर पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान को सहेजा जाता रहा है। कठोपनिषद का निम्न सूत्र बताता है कि भारत में ज्ञान तथा शिक्षा का क्या महत्व थाः

"जिस प्रकार से एक उत्साही सारथी युद्धाश्वों को नियन्त्रित रखता है उसी प्रकार से मन को एकाग्र कर के परम ज्ञान को प्राप्त करने वाला अपने इन्द्रियों को नियन्त्रित रखता है।"

रामायण काल हो चाहे महाभारत काल, प्रत्येक काल में हमारे देश में गुरु-शिष्य परम्परा रही है। जहाँ रामायण काल में वशिष्ठ, विश्वामित्र जैसे गुरु रहे हैं जिन्होंने राम, गुह आदि को विद्यादान दिया वहीं महाभारत काल में संदीपनी, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य जैसे गुरु थे जिन्होंने कृष्ण, सुदामा, पाण्डवों, कौरवों आदि को शिक्षा प्रदान किया था। प्राचीनकाल से लेकर मध्यकाल तक शिष्यों को विद्यार्जन के लिए गुरु के आश्रम में जाकर रहने की परम्परा थी जहाँ पर गुरु उन्हें ज्ञान प्रदान किया करते थे। विद्या का मोल नहीं होता था इसीलिए विद्याग्रहण करने के पश्चात् गुरु-दक्षिणा की प्रथा थी।

सहस्त्राब्दी तक उत्तर भारत आर्य हिन्दू साहित्य और संस्कृति का केन्द्र बना रहा किन्तु गज़नवी, तुगलक और तैमूर ने एक के बाद एक आक्रमण करके वहाँ के धर्म, संस्कृति और साहित्य की प्रगति को छिन्न-भिन्न कर दिया। परिणामस्वरूप हिन्दू विद्या, साहित्य, धर्म और संस्कृति को सुदूर-पूर्व की ओर भाग कर बंगाल की शरण लेनी पड़ी। बनारस और मिथिला के अनेक विद्वान गुरुओं ने बंगाल में आकर न्यायशास्त्र के विद्धापीठ स्थापित किए क्योंकि बनारस, पाटलिपुत्र आदि विद्या-केन्द्र आतताइयों के पैरों तले रौंदे जा चुके थे। चौदहवीं शताब्दी में कल्लण भट्ट ने अपनी मानव-धर्मशास्त्र की टीका रची। बाद में पन्द्रहवीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु ने वैष्णव-पन्थ चलाकर देश की धर्म-ग्लानि को दूर किया। विद्वान ब्राह्मण अपने यजमानों का कल्याण करने के साथ ही साथ उनके सन्तानों को शिक्षा देने का कार्य किया करते थे और दक्षिणा के रूप में सम्पन्न यजमानों से उन्हें अनेक गाँव तक प्रदान किए जाते थे।

सत्रहवी शताब्दी तक भारत शिक्षा के प्रचार में यूरोप के सभी देशों से आगे था और हमारे देश में पढ़े-लिखे लोगों का प्रतिशत अन्य देशों की अपेक्षा बहुत अधिक था।
सहस्त्रों की संख्या में ब्राह्मण अध्यापक अपने-अपने घरों में लाखों शिष्यों को मुफ्त शिक्षा प्रदान किया करते थे। समस्त भारत में जहाँ संस्कृत-साहित्य की शिक्षा के लिए विद्यापीठ थे वहीं साथ ही साथ उर्दू-फारसी की शिक्षा के लिए विद्यापीठ तथा मक़तब और मदरसे कायम थे। छोटे-छोटे गाँवों में भी ग्राम-पंचायतों के नियन्त्रण में पाठशालाएँ चला करती थीं।

परन्तु बाद में वे दिन नहीं रहे। अंग्रेज एक नया युग लेकर आए। लोभ और अर्थ-संग्रह ही उनके यहाँ आने के उद्देश्य थे। तलवार और बन्दूक की लड़ाई करके उन्होंने हमारे देश पर हुकूमत कायम कर लिया था किन्तु उस हुकूमत को चलाते रहने के लिए हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था एक बहुत बड़ी बाधा थी। इसलिए उन्होंने कलम की लड़ाई आरम्भ कर दिया। इस देश की सन्तानों को उन्होंने अपनी भाषा और साहित्य पढ़ाना शुरू कर दिया और वे अंग्रेज वीरों की वीरता के गुणगाण करने लगे। अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों की एक अलग जमात बन गई जिन्हें अपने देशवासियों से सहानुभूति ही नहीं रही या रही भी तो बहुत कम। देश के प्राचीन गौरव, परम्परा, इतिहास आदि से उन्हें कुछ मतलब ही नहीं रहा। ऐसा करने के लिए लॉर्ड मैकॉले ने एक ऐसी शिक्षा-प्रणाली बना दिया, जो कि भारतीयों को अपनी संस्कृति और सभ्यता से दूर ले जाए और उनमें राष्ट्रीय भावना पैदा ही ना होने दे। और आज तक हमारे देश की शिक्षा-नीति कमोबेश वही बनी हुई है जिसे कि लॉर्ड मैकॉले ने बनाया था परिणामस्वरूप आज हम तथा हमारे बच्चे अपनी संस्कृति और सभ्यता को हेय दृष्टि से देखते हैं।

टीपः उपरोक्त लेख में मेरे अपने विचारों के साथ ही साथ अनेक स्थान पर आचार्य चतुरसेन के उपन्यास "सोना और खून" से विचार लिए गए हैं।

Friday, September 17, 2010

ललित शर्मा के ललितकला पोर्टल का छत्तीसगढ़ के मुख्य मन्त्री रमणसिंह के द्वारा लोकार्पण


आज विश्वकर्मा पूजा का अत्यन्त शुभ दिन है और हर्ष की बात है कि आज ललित शर्मा के ललितकला पोर्टल का छत्तीसगढ़ के मुख्य मन्त्री रमणसिंह के द्वारा लोकार्पण किया गया।


उल्लेखनीय है कि ललित शर्मा जी यथानाम तथा गुण हैं अर्थात् ललित जी की ललितकलाओं में गहरी रुचि है और वे देश भर के कलाकारों तथा शिल्पियों की कलाकृतियों को इंटरनेट के माध्यम से जनसाधारण के समक्ष लाने के लिए प्रयासरत हैं। ललितकला पोर्टल का निर्माण उनके इस प्रयास का ही परिणाम है। हमारी परमपिता परमात्मा से प्रार्थना है कि वे उन्हें अपने इस प्रयास में सफलता प्रदान करें!

Thursday, September 16, 2010

अंग्रेजी कहावतें - हिन्दी भावार्थ-1 (English Proverbs with Hindi meaning-1)

आम बोलचाल की भाषा में कहावतों की बहुत महत्‍वपूर्ण भूमिका रहती है। आम लोगों के लिये अति उपयोगी तथ्यों को प्रकट करने वाले संक्षिप्त किन्तु महत्वपूर्ण कथनों को कहावतें कहा जाता है। कहावतें प्रायः सांकेतिक रूप में होती हैं। थोड़े शब्दों में कहा जाये तो "जीवन के दीर्घकाल के अनुभवों को छोटे वाक्य में कहना ही कहावतें होती हैं।" जिस प्रकार से अलंकार काव्य के सौन्दर्य को बढ़ा देता है उसी प्रकार कहावतों का प्रयोग भाषा के सौन्दर्य सौन्दर्य को बढ़ा देता है। बोलचाल की भाषा में कहावतों के प्रयोग से वक्ता के कथन के प्रभाव में वृद्धि होती है और साहित्यिक भाषा में कहावतों के प्रयोग से साहित्य की श्रीवृद्धि होती है। जिस भाषा में जितनी अधिक कहावतें होती हैं उस भाषा का मान उतना ही अधिक होता है। प्रायः एक भाषा के कहावतों को अन्य भाषाओं के द्वारा मूल या बदले हुये रूप में अपना भी लिया जाता है। कहावतों के मामले में अंग्रेजी भाषा भी अत्यन्त सम्पन्न है तथा उनके हिन्दी भावार्थ भी रस प्रदान करते हैं।

हमने ऐसे ही अंग्रेजी कहावतों का संकलन किया है और उनका हिन्दी भावार्थ करने का प्रयास किया है जिन्हें आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।

  • A journey of a thousand miles begins with one step.
    हजारों मील की यात्रा भी एक कदम से शुरू होती है।

  • A bad penny always turns up.
    खोटा सिक्का खोटा ही होता है।

  • A bean in liberty is better than a comfit in prison.
    सम्पन्नतायुक्त गुलामी से विपन्नतायुक्त स्वतंत्रता बेहतर है।

  • A bellyful is one of meat, drink, or sorrow.
    एक पेट मांस-मदिरा से भरा होता है तो एक दुःखों से।

  • A big tree attracts the woodsman's axe.
    एक बड़ा पेड़ सदा लकड़हारे की कुल्हाड़ी को आकर्षित करता है।

  • An apple a day keeps the doctor away.
    प्रतिदिन एक सेब खाना डॉक्टर से दूरी बनाये रहता है।

  • A bad workman always blames his tools.
    खराब कारीगर हमेशा हथियारों के दोष निकालता है।

  • A banker is someone who lends you an umbrella when the sun is shining, and who asks for it back when it starts to rain.
    बैंकर वो होता है जो कि साधारण धूप रहने के वक्त आपको छाता उधार दे और पानी बरसते वक्त वापस माँग ले।

  • A bird in the hand is worth two in the bush.
    झाड़ पर के दो पक्षियों से हाथ आया एक पक्षी कीमती होता है।

  • A chain is no stronger than its weakest link.
    कोई भी जंजीर अपने कमजोर कड़ी से अधिक मजबूत नहीं होती।

  • A constant guest never welcomes.
    हमेशा आने वाला मेहमान अपना सम्मान खो देता है।

  • A coward dies a thousand times before his death.
    कायर आदमी अपनी मौत से पहले हजारों बार मरता है।

  • A friend in need is a friend indeed.
    समय पर काम आने वाला ही सच्चा मित्र होता है।

  • A friend to all is a friend to none.
    जो सभी का मित्र होता है वह किसी का मित्र नहीं होता।

  • A good beginning makes a good ending.
    एक अच्छी शुरुवात आधी सफलता होती है।

  • A good man in an evil society seems the greatest villain of all.
    खराब समाज में अच्छा आदमी सबसे बड़ा खलनायक होता है।

  • A guilty conscience needs no accuser.
    भले आदमी को किसी पर दोष मढ़ने की आवश्यकता नहीं होती।

  • A half truth is a whole lie.
    आधा सच पूरे झूठ के बराबर होता है।

  • A jack of all trades is master of none.
    सभी धंधों का गुलाम किसी धंधे का मालिक नहीं होता।

  • A lie can be halfway around the world before the truth gets its boots on.
    सत्य से पराजित होने के पूर्व झूठ आधी दुनिया की यात्रा कर लेता है।

  • A little knowledge is a dangerous thing.
    अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है। (नीम-हकीम खतरा-ए-जान।)

  • A loaded wagon makes no noise.
    अधजल गगरी छलकत जाये।

  • A miss by an inch is a miss by a mile.
    एक इंच की भूल अंततः एक मील की गलती साबित होती है।

  • A paragraph should be like a lady's skirt: long enough to cover the essentials but short enough to keep it interesting.
    एक पैराग्राफ किसी महिला के स्कर्ट के जैसे होता है, इतना लंबा कि सभी आवश्यक बातें निहित हो जायें और इतना छोटा कि रोचक लगे।

  • A picture is worth a thousand words.
    एक चित्र हजार शब्दों के मूल्य के बराबर होता है।

  • A pot of milk is ruined by a drop of poison.
    एक बूंद विष बर्तन भर दूध को को नष्ट कर देती है।

Wednesday, September 15, 2010

कुछ पोस्ट ऐसे भी होते हैं जिन्हें बार बार पढ़कर भी मन नहीं भरता

कुछ ब्लोग पोस्ट भी ऐसे होते हैं जिन्हें हम केवल एक बार पढ़कर भूल जाते हैं और कुछ पोस्ट ऐसे भी होते हैं जिन्हें बार बार पढ़कर भी मन नहीं भरता। उदाहरणस्वरूप मैं कहूँगा कि आप खुशदीप सहगल जी की "शोले पुराण" वाली पोस्ट कभी भी पढ़ेंगे तो आपको मजा ही आएगा। मजे की बात तो यह है कि पोस्ट तो मजा देता ही है, उस पोस्ट की टिप्पणियाँ और भी ज्यादा मजा देती हैं।

यही बात कथा-कहानियों, उपन्यासों आदि के बारे में भी लागू होती हैं। "चन्द्रकान्ता सन्तति" (देवकीनन्दन खत्री), "गोदान" (प्रेमचंद), "चित्रलेखा" (भगवतीचरण वर्मा) जैसी अनेक पुस्तकें हैं जिन्हें मैंने कई-कई बार पढ़ा है और हर बार नया मजा मिला है। ऐसे लेखन में इतनी अधिक रोचकता होती है कि पाठक उसे एक ही बैठक में पढ़ लेना चाहता है।

अब आप ही बताइये कि निम्न कथा रोचक है या नहीं:

बड़े नवाब मिर्जा अलीबेग अस्सी की उम्र में जब मरे तो उनके साहबज़ादे मिर्जा अख़्तरबेग की उम्र बीस बरस की थी। बड़ी मानता-मनौती मानने पर बड़े नवाब को बुढ़ौती में बेटे का मुँह देखना नसीब हुआ था। इसीलिए उनकी परवरिश भी लाड़-प्यार में हुई थी। उन दिनों जहांगीराबाद की रियासत में ऐशो-इशरत की कमी न थी। सिर्फ इतना ही नहीं कि छोटे नवाब ऐशो-इशरत की गोद में पलकर किसी कदर आवार हो गए, उनकी तालीम भी बहुत मामूली हुई। इन सब कारणों से ज्यों ही बड़े नवाब मरे और इन्हें हाथ की छूट हुई तो बेहद फिज़ूलखर्चियाँ करने लगे। बदइन्तजामी इतनी बढ़ी कि आमदनी आधी भी न रही।

इनकी ऐयाशी और फिज़ूलखर्ची बड़े नवाब के जमाने में आरम्भ हो गई थीं। उन्होंने यह सोचकर कि शादी कर देने से वह खानादारी में फँसकर ठीक हो जाएगा, उनकी शादी चौदह साल की उम्र में ही कर दी थी। शुरू-शुरू में तो नए मियाँ-बीबी खूब घुल-मिल कर रहे। बीबी का मिज़ाज़ जरा तेज था। वह भी एक नवाब की बेटी थी। पर मियाँ की वह बहुत लल्लो-चप्पो करती रहती थी।......... परंतु धीरे-धीरे यह प्रेम का पौधा सूखने लगा और छोटे नवाब इधर-उधर फिर दिल का सौदा करने लगे। इससे बेग तिनक गईं। और फिर आए दिन मान-मनौवल, फसाद-झगड़े उठने लगे। इसी बीच बड़े नवाब का इन्तकाल हो गया और छोटे नवाब की पगड़ी बँधी। इसके एक साल बाद ही नवाब के लड़का पैदा हुआ। लड़का सुन्दर और स्वस्थ था। पहला बच्चा था, इसलिये हवेली में बाजे बजने लगे। बधाइयाँ गाई जाने लगीं। तवायफ़ों की महफ़िल हुई। लेकिन जब दाई ने छठवीं के दिन लड़के को लाकर नवाब की गोद में डाला और उम्मीद की कि कोई भारी इनाम मिलेगा, तो नवाब ने बिगड़कर कहा, "इस लड़के की सूरत हमसे नहीं मिलती, चुनाँचे यह हमारा लड़का ही नहीं।"

नवाब साहब की इस बात से तहलका मच गया। हकीकत यह थी कि उनके आवारा दोस्तों ने कुछ ऐसी इशारेबाजियाँ पहले ही से कर रखी थीं, जिनसे नवाब का दिल वहम से भर गया था। वह अनपढ़ और बेवकूफ़ तो था ही, लड़के को देखते ही ऐसी बेहूदा बात कह बैठा।

बेगम ने सुना तो अपना सिर पीट लिया। रो-धोकर उसने सारा घर सिर पर उठा लिया। ..... इसी दौरान बेगम को पता लगा कि नवाब ने एक तवायफ़ से आशनाई कर ली है। ...... बेगम से एक दिन उसकी मुँह-दर-मुँह नोक-झोंक हो गई।

नवाब ने कहा, "बेगम, तुमने यह हक-नाहक का कैसा हंगामा खड़ा कर दिया है? बखुदा इससे बाज आओ, वरना हमसे बुरा कोई न होगा।"

"क्या कर लोगे तुम?"

"कसम कलामे-पाक की, मैं तुम्हारी खाल खिंचवाकर भूसा भरवा दूँगा।"

"तो तुफ़ है तुम पर जो करनी में कसर करो।"

"नाहक एक खूने-नाहक का अजाब मेरे सिर होगा।"

"तुम्हें क्या डर है! करनी कर गुजरो, ज्यादा से ज्यादा फाँसी हो जाएगी।"

"फाँसी क्यों हो जाएगी?"

"यह कम्पनी बहादुर की अमलदारी है। तुम्हारी खाला का राज नहीं।"

"बखुदा, बड़ी मुँहफट हो।"

"मगर अस्मतदार हूँ।"

"चे खुश। अस्मतदार हो तो कहो यह लौंडा कहाँ से पेट में डाल लाईं?"

"शरम नहीं आती यह बेहूदा कलाम जुबान पर लाते?"

"हम तो लाखों में कहेंगे। कुछ डर है!"

"नकटा जिए बुरे हवाल, डर काहे का! डर तो उसे हो जिसे अपनी इज्जत का कुछ खयाल हो।"

"हम खानदानी रईस हैं। हमारी इज्जत का तुम क्या जानो।"

"बड़े आए इज्जतवाले। तभी तो मुई उस वेसवा का थूक चाटते हो।"

"तो इससे तुम्हें क्या! यह हमने कोई नई बात नहीं की। हमारे हमकौम रईस-नवाब सभी कोई रखैल, रंडी रखते हैं। हमने रख ली तो तुम्हारा क्या नुकसान किया?"

"अच्छा, हमारा कोई नुकसान ही नहीं किया?"

"हमारा फर्ज ब्याहता के साथ रहने का है, हर्गिज फरामोश न करेंगे। और अगर ज्यादा बावेला न मचाकर घर में खामोश बैठोगी तो हम तुम्हारी खातिरदारी मिस्ल साबिक बल्कि उससे भी ज्यादा करेंगे। हालाँकि तुम इस सलूक के काबिल नहीं।"

"क्या कहने हैं! मियाँ होश की दवा करो। मेरा जो हक है मुँह पर झाड़ू मारकर लूँगी। होई हँसी-ठठ्ठा है!"

"तुमने बेहयाई पर कमर कस ली है तो लाचारी है।"

"मैं बेहया लोगों के कहने का बुरा नहीं मानती। अब्बाजान को मैंने सब हकीकत लिख दी है। वे आया ही चाहते हैं। उनसे निबटना। देखूँगी, कैसे तीसमारखां हो!"

"देखूँगा उन्हें, कितनी तोपें लेकर आते हैं!"

यह कहते और गुस्से से काँपते हुए नवाब बाहर चले गए।

............................

बेटी का खत पाकर नवाब इकरामुल्ला आगबबूला हो गए। वे फौरन हाथी पर बैठकर जहांगीराबाद पहुँचे। दामाद को बहुत लानत-मलामत दी। बेटी से सलाह की और बेटी से एक लाख रुपयों के मेहर का दावा अदालत दीवानी में ठुकवा दिया। अदालत से बेगम को डिग्री मिल गई, इसपर नवाब ने कलकत्ता के सुप्रीम कोर्ट में अपील की, पर नीचे का हुक्म वहाँ भी बहाल रहा परन्तु इस खींचतान में तीन बरस लग गए। इस बीच नवाब और बेग में खूब फुलझड़ियाँ छूटीं। बेगम को तंग करने के नवाब और उनके बेफिकरे दोस्तों ने नये-नये नुस्खे ईजाद किए। अब बेग अलहदा मकान में जहांगीराबाद में ही रहती थीं। नवाब ने उनके पीछे गुण्डे लगा दिए, जो उनकी हवेली के नीचे खड़े होकर अश्लील गज़लें गाते और दूसरे प्रकार की बेजा हरकतें करते। कभी नंगी और फाँस तस्वीरे उनके दरवाजों पर चिपका देते। कभी डाक से बैरंग लिफाफे में गालियाँ, गंदी तस्वीरें भेजते। बेगम उन्हें जरूरी अदालती कागज़ात समझकर महसूल देकर ले लेती, और खोलने पर ये सब चीजें पाती। रात को उसके मकान पर ईंट-पत्थर बरसते। आखिर तंग आकर बेगम ने थानेदार की शरण ली। तब तक कांस्टेबल पुलिस का इन्तजाम नहीं हुआ था, बरकन्दाजी पुलिस थी। सिपाही को पाँच रुपये और थानेदार को बीस रुपये तनख्वाह मिलती थी। थानेदार ने बेगम से सब हाल सुनकर उनकी हिफाजत का जिम्मा लिया और एक बरकन्दाज उसकी हवेली पर पहरे के लिए बिठा दिया। यह सिलसिला कई महीने तक चलता रहा। पर कोई चोर नहीं पकड़ा गया। ढेलेबाजी और छेड़खानी उसी तरह चलती रही। असल बात यह थी कि बरकन्दाज अढीमची था। वह शाम को ही अफीम का गोला गटककर पीनक में अंटागफील हो जाता था। फिर भला उसे दीनो-जहान की क्या खबर रह सकती थी!

आखिर थानेदार पर बेगम का तकाजा हुआ कि हम खर्च भी करते हैं, मगर हमारा काम कुछ नहीं होता। थानेदार ने बरकन्दाज को हुक्म दिया कि यदि आज ही मुलजिम न पकड़ा गया तो उसकी खैर नहीं है। अब आप ही कहिए कि जब तीन महीने तक मुलजिम नहीं पकड़ा जा सका तो भला एक दिन में कैसे पकड़ा जा सकता है। मगर थानेदार साहब का हुक्म भी बजा लाना जरूरू जथा। फिर बेगम ने भी गुनहगार के पकड़े जाने पर इनाम देने का वादा किया था, बस किसी आसामी की खोज में उसने चक्कर लगाना शुरू किया। इतने ही में उसने एक आदमी को शराब के नशे में धुत कलवार की दुकान से आते हुए देखा और झट से उसे ले जाकर थानेदार के हवाले कर दिया, और एक गहरा सलाम झुकाया। थानेदार ने बेगम को इत्तला दी कि एक आदमी ढेला फेंकता हुआ पकड़ा गया है, उसे छोड़ देने के लिए नवाब मुझे पचार रुपये घूँस दे रहे थे, परन्तु मैं इस मर्दूद मूँजी को हर्गिज बिना सजा दिलाए नहीं छोड़ूँगा, जिसने बेगम साहिबा को तंग करने की हिमाकत की है।

बेगम ने पचास रुपये बांदी के हाथों थानेदार के पास भिजवा दिए और कहा - ठसे पूरी सजा दिलवाओगे तो और इनाम दूँगी। जंट साहब की कचहरी में उस पर इस आशय का मुकदमा चला दिया कि दो अंग्रेज लड़के एक खुली बग्घी में सवार चले जाते थे, यह शराबी नशे की धुत गली से खौफ़नाक तरीके से चीखता-चिल्लाता निकल पड़ा, जिससे बग्घी से टट्टू ऐसे भड़के कि बड़ी मुश्किल से बरकन्दाज ने रोके जो मौके पर हाजिर था। अगर वह बरकन्दाज अपनी जान पर खेलकर उन्हें न रोक लेता तो बेशक दोनों लड़कों की जान जाने में जरा भी शक न था। लिहाजा फिदवी उम्मीदवार है कि इस शराबी को सख्त सजा हुज़ूरेवाला से फर्माई जाए। अभियुक्त ने जंट साहब के सामने शराब पीने का इकबाल किया और कहा कि उस वक्त मुझे तन-बदन की खबर न थी। इसपर पच्चीस रुपया जुर्माना कर दिया।

इस खुशखबरी को थानेदार ने बेगम के पास स्वयं हाजिर होकर इस तरह पहुँचाया कि हाकिम उस कम्बख्त गुनहगार को जेला या कालेपानी भेजना चाहता था, मगर आपके हमसायों ने आपकी ओर से गवाही देने से इन्कार कर दिया। उधर दुश्मनों ने जोर बाँधा, लाट साहब तक सिफारिश पहुँचाई। अब मैं क्या कर सकता था! हकीकत यह है कि पुलिस के अलावा हर शख्स आपका दुश्मन है। सिर्फ पुलिस आपकी दोस्त है। बेगम ने खुश होकर थानेदार को और पचास रुपये नज़राने के दिए और दस रुपये बरकन्दाज को इनाम।
(आचार्य चतुरसेन के उपन्यास "सोना और खून का एक अंश)

Tuesday, September 14, 2010

हिन्दी दिवस मनाने के आडम्बर का क्या अर्थ है?

साल भर चाहे हिन्दी की चिन्दी होती रहे पर साल में कम से कम एक दिन के लिए तो उसकी पूछ हो ही जाती है याने कि प्रतिवर्ष 14 सितम्बर के दिन हिन्दी को, दिखावे के लिए ही सही, रानी बना दिया जाता है। हिन्दी दिवस मनाया जाता है, शासकीय कार्यालयों में हिन्दी से सम्बन्धित अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं जिनमें बड़े-बड़े शासकीय अधिकारी अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी में भाषण दिया करते हैं। भारत सरकार ने आखिर हिन्दी को "राजभाषा" का दर्जा जो दिया है!

न राज रहे न राजा, रह गई है तो सिर्फ राजभाषा। भारत एक राष्ट्र है न कि एक राज। जब राज ही नहीं है तो यह बात समझ से परे है कि भारत की संविधान सभा ने 14 सितम्बर,  1949 को हिन्दी को राजभाषा बनाने का फैसला किस आधार पर किया? इस प्रकार से तो राष्ट्रपिता के स्थान पर राजपिता होना चाहिए था। भारत के पास अपना राष्ट्रीय ध्वज है, राष्ट्रीय गान है, राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न है .... नहीं है तो सिर्फ राष्ट्रभाषा नहीं है।

आखिर क्यों हो एक राष्ट्रभाषा? भारत में अनेक भाषाएँ और बोलियाँ है भाई! संविधान के अनुच्छेद 344 (1) और 351 के अनुसार उनमें से निम्न भाषाएँ मुख्य तौर पर बोली जाती हैं

अंग्रेजी, आसामी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिन्दी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू।

अब भारत शासन यदि हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दे देती तो शेष भाषाओं को क्या दोयम दर्जा देना नहीं होगा? तो निश्चय किया गया कि भारत में राष्ट्रभाषा न होकर राजभाषा होनी चाहिए! इस प्रकार से सभी सन्तुष्ट रहेंगे। भारत में तो तुष्टिकरण का शुरू से ही रवैया रहा है।

भारत में अधिकृत रूप से कोई भी भाषा राष्ट्रभाषा नहीं है किन्तु देखा जाए तो आज भी परोक्ष रूप से अंग्रेजी ही इस राष्ट्र की राष्ट्रभाषा है। शासकीय नियम के अनुसार हिन्दीभाषी क्षेत्र के कार्यालयों के नामपटल द्विभाषीय अर्थात् हिन्दी और अंग्रेजी में तथा अन्य क्षेत्रों में त्रिभाषीय अर्थात् क्षेत्रीय भाषा, हिन्दी और अंग्रेजी में होने चाहिए। याने कि क्षेत्र चाहे हिन्दीभाषी हो या अन्य, अंग्रेजी का वहाँ होना आवश्यक है। तो है कि नहीं परोक्ष रूप से भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी!

भारत का राष्ट्रीय शासन अपने संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संकल्प लेती है कि संघ की राजभाषा हिंदी रहेगी और उसके अनुच्छेद  351  के अनुसार हिंदी  भाषा का प्रसार,  वृद्धि करना और उसका विकास करना ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति  के सब तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम हो सके, संघ का कर्तव्य है।
हिंदी के प्रसार एंव विकास की गति बढ़ाने के हेतु तथा संघ के विभिन्न राजकीय प्रयोजनों के लिए उत्तरोत्तर इसके प्रयोग हेतु भारत सरकार द्वारा एक अधिक गहन एवं व्यापक कार्यक्रम तैयार किया जाएगा और उसे कार्यान्वित किया जाएगा। (लिंक)

इस संकल्प को पूरा करने का कितना प्रयास किया गया और जा रहा है यह तो इसी बात से पता चल जाता है कि हमारे बच्चे आज हमसे पूछते हैं कि "चौंसठ" का मतलब "सिक्स्टी फोर" ही होता है ना? उन्हें "सिक्स्टी फोर" की समझ है, "चौंसठ" की नहीं। बच्चों की बात छोड़िए आज हममें से ही अधिकतर लोगों को यह भी नहीं पता है कि अनुस्वार, चन्द्रबिंदु और विसर्ग क्या होते हैं। हिन्दी के पूर्णविराम के स्थान पर अंग्रेजी के फुलस्टॉप का अधिकांशतः प्रयोग होने लगा है। अल्पविराम का प्रयोग तो यदा-कदा देखने को मिल जाता है किन्तु अर्धविराम का प्रयोग तो लुप्तप्राय हो गया है।

विडम्बना तो यह है कि परतन्त्रता में तो हिन्दी का विकास होता रहा किन्तु जब से देश स्वतन्त्र हुआ, हिन्दी का विकास ही रुक गया उल्टे उसकी दुर्गति होनी शुरू हो गई। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद शासन की नीति तुष्टिकरण होने के कारण हिन्दी को राष्ट्रभाषा के स्थान पर "राजभाषा" बना दिया गया। विदेश से प्रभावित शिक्षानीति ने हिन्दी को गौण बना कर अग्रेजी के महत्व को ही बढ़ाया। हिन्दी की शिक्षा धीरे-धीरे मात्र औपचारिकता बनते चली गई। दिनों-दिन अंग्रेजी माध्यम वाले कान्वेंट स्कूलों के प्रति मोह बढ़ते चला गया और आज हालत यह है कि अधिकांशतः लोग हिन्दी की शिक्षा से ही वंचित हैं।

भाषा के प्रचार के लिए सिनेमा एक सशक्त माध्यम है किन्तु भारतीय सिनमा में हिन्दी फिल्मों की भाषा हिन्दी न होकर हिन्दुस्तानी, जो कि हिन्दी और उर्दू की खिचड़ी है, रही। और इसका प्रभाव यह हुआ कि लोग हिन्दुस्तानी को ही हिन्दी समझने लगे। दूसरा प्रभावशाली माध्यम है मीडिया किन्तु टीव्ही के निजी चैनलों ने हिन्दी में अंग्रेजी का घालमेल करके हिन्दी को गर्त में और भी नीचे ढकेलना शुरू कर दिया और वहाँ प्रदर्शित होने वाले विज्ञापनों ने तो हिन्दी की चिन्दी करने में "सोने में सुहागे" का काम किया। इसी प्रकार से रोज पढ़े जाने वाले हिन्दी समाचार पत्रों, जिनका प्रभाव लोगों पर सबसे अधिक पड़ता है, ने भी वर्तनी तथा व्याकरण की गलतियों पर ध्यान देना बंद कर दिया और पाठकों का हिन्दी ज्ञान अधिक से अधिक दूषित होते चला गया।

अब अन्तरजाल में ब्लोग्स का साम्राज्य है। हिन्दी ब्लोग्स की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है किन्तु प्रायः हिन्दी ब्लोग्स में "हम मुर्ख हैं", "बातें कि जाये" आदि पढ़ने के लिए मिलता है। यह सोचकर कि वर्तमान में हिन्दी भाषा के लिए उन्नत तकनीक उपलब्ध नहीं हैं और अनेक अहिन्दीभाषी लोग भी हिन्दी ब्लोग लिख रहे हैं तथा उनसे ऐसा होना स्वाभाविक है, एक बार इसे अनदेखा किया भी जा सकता है मगर दुःख तो इस बात का होता है कि कई बार उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे हिन्दीभाषी क्षेत्र के ब्लोगरों के ब्लोग्स में भी हिज्जे और व्याकरण की गलतियाँ मिलती हैं। इसका मुख्य कारण सिर्फ यही लगता है कि हम हिन्दीभाषी ब्लोगर्स अपनी प्रविष्टियाँ आनन फानन में बिना जाँचे ही प्रकाशित कर देते हैं। यदि हम अपनी प्रविष्टियाँ प्रकाशित करने के पहले एक बार उसे पढ़ लें तो इस प्रकार की गलतियाँ हो ही नहीं सकती।

हिन्दी ब्लोग्स में अंग्रेजी-हिन्दी की खिचड़ी वाले ऐसे-ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है जिनका अर्थ न तो नलंदा विशाल शब्दसागर जैसे हिन्दी से हिन्दी शब्दकोश में खोजने पर भी नहीं मिलता और न ही आक्फोर्ड, भार्गव आदि अंग्रेजी से हिन्दी शब्दकोशों में।

इन्सान गलतियों का पुतला है, मुझसे भी अपने पोस्ट में अनेक बार हिज्जों तथा व्याकरण की गलतियाँ होती हैं, हो सकता है कि इस पोस्ट में भी हुई हों। मेरा प्रयास तो यही रहता है कि ऐसी गलतियाँ न हों किन्तु कई बार प्रयास के बावजूद भी रह जाती हैं, पता चलने पर उन्हें सुधारता भी हूँ। अनजाने में हुई गलती क्षम्य है किन्तु जानबूझ कर की जाने वाली गलतियों के विषय में क्या कहा जा सकता है?

यदि हम अपनी रचनाओं के माध्यम से हिन्दी को सँवारने-निखारने का कार्य नहीं कर सकते तो क्या हमारा यह कर्तव्य नहीं बनता कि कम से कम उसके रूप को विकृत करने का प्रयास तो न करें।

चलते-चलते

राष्ट्रभाषा के उद्‍गार

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

मैं राष्ट्रभाषा हूँ -
इसी देश की राष्ट्रभाषा, भारत की राष्ट्रभाषा

संविधान-जनित, सीमित संविधान में,
अड़तिस वर्षों से रौंदी एक निराशा
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।
तुलसी, सूर, कबीर, जायसी,
मीरा के भजनों की भाषा,
भारत की संस्कृति का स्पन्दन,
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

स्वाधीन देश की मैं परिभाषा-
पर पूछ रही हूँ जन जन से-
वर्तमान में किस हिन्दुस्तानी
की हूँ मैं अभिलाषा?
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

चले गये गौरांग देश से,
पर गौरांगी छोड़ गये
अंग्रेजी गौरांगी के चक्कर में,
भारत का मन मोड़ गये
मैं अंग्रेजी के शिविर की बन्दिनी
अपने ही घर में एक दुराशा
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

मान लिया अंग्रेजी के शब्द अनेकों,
राष्ट्रव्यापी बन रुके हुये हैं,
पर क्या शब्दों से भाषा निर्मित होती है?
तब क्यों अंग्रेजी के प्रति हम झुके हये हैं?
ले लो अंग्रेजी के शब्दों को-
और मिला दो मुझमें,
पर वाक्य-विन्यास रखो हिन्दी का,
तो, वो राष्ट्र! आयेगा गौरव तुझमें।

'वी हायस्ट नेशनल फ्लैग एण्ड सिंग
नेशनल सांग के बदले
अगर बोलो और लिखो कि
हम नेशनल फ्लैग फहराते-
और नेशनल एन्थीम गाते हैं-
तो भी मै ही होउँगी-
नये रूप में भारत की राष्ट्रभाषा
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

मैं हूँ राष्ट्रभाषा
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

(रचना तिथिः गुरुवार 15-08-1985)

Monday, September 13, 2010

देवपूजा ठानी मैं, नमाज हूँ भुलानी, हूँ तो मुगलानी, हिंदुआनी बन रहूँगी मैं... मुस्लिम कवियों की हिन्दी रचनाएँ

यहाँ पर हम चर्चा कर रहे हैं मुस्लिम कवियों की हिन्दी रचनाओं की। अनेक मुस्लिम कवियों का हिन्दी के सा था अटूट प्रेम रहा है जिसने बहुत सी रसमय काव्यों को जन्म दिया।

पहले हम जिक्र करेंगे मुस्लिम कवियों की भक्ति रचनाओं की और उसके बाद उनकी अन्य हिन्दी रचनाओं की। भक्ति एक विशुद्ध भावना है जिसने अनेक मुस्लिम कवियों को प्रभावित किया है। बाबा फरीद कहते हैं

कागा सब तन खाइयो, मेरा चुन-चुन मांस।
दो नैना मत खाइयो, मोहि पिया मिलन की आस॥


उपरोक्त दोहे में पिया मिलन का अर्थ है भगवान से मिलन!

बादशाह औरंगजेब की भतीजी ताज़ बेगम, जो कि ताज़बीबी के नाम से रचनाएँ लिखती थी, ने श्री कृष्ण जी का बड़ा ही मनमोहक वर्णन इस प्रकार से किया हैः

छैल जो छबीला, सब रंग में रंगीला
बड़ा चित्त का अड़ीला, कहूँ देवतों से न्यारा है।
माल गले सोहै, नाक-मोती सेत जो है कान,
कुण्डल मन मोहै, लाल मुकुट सिर धारा है।
दुष्टजन मारे, सब संत जो उबारे ताज,
चित्त में निहारे प्रन, प्रीति करन वारा है।
नन्दजू का प्यारा, जिन कंस को पछारा,
वह वृन्दावन वारा, कृष्ण साहेब हमारा है॥
सुनो दिल जानी, मेरे दिल की कहानी तुम,
दस्त ही बिकानी, बदनामी भी सहूँगी मैं।
देवपूजा ठानी मैं, नमाज हूँ भुलानी,
तजे कलमा-कुरान साड़े गुननि गहूँगी मैं॥
नन्द के कुमार, कुरबान तेरी सुरत पै,
हूँ तो मुगलानी, हिंदुआनी बन रहूँगी मैं॥


कबीर साहब तो भक्त कवि थे ही पर उनके पुत्र कमाल साहब ने भी भक्ति रचनाएँ लिखी हैं, वे कहते हैं

राम नाम भज निस दिन बंदे और मरम पाखण्डा,
बाहिर के पट दे मेरे प्यारे, पिंड देख बह्माण्डा ।
अजर-अमर अविनाशी साहिब, नर देही क्यों आया।
इतनी समझ-बूझ नहीं मूरख, आय-जाय सो माया।


रसखान तो अपने अगले जन्म में भी श्रीचरणों के प्रति अनुरक्ति की कामना करते हैं

मानुस हों तो वही रसखान, बसौं बृज गोकुल गांव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहां बस मेरौ, चरौं नित नन्द की धेनु मंझारन।
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धरयो कर छत्र पुरंदर धारन।
जो खग हौं तो बसेरौ करों, नित कालिंदी कूल कदंब की डारन॥


और कारे बेग तो श्री कृष्ण पर इस प्रकार से दावा जताते हैं

एहौं रनधीर बलभद्र जी के वीर अब,
हरौ मेरी पीर क्या, हमारी बेर-बार की

हिंदुन के नाथ हो तो हमारा कुछ दावा नहीं,
जगत के नाथ हो तो मेरी सुध लिजिए


अब बात करते हैं मुस्लिम कवियों की अन्य हिन्दी रचनाओं की। मीर तकी मीर को भला कौन नहीं जानता होगा, उनकी निम्न रचना तो सुविख्यात हैः

पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है …


मीर का निम्न दोहा अतिशयोक्ति अलंकार का एक अनुपम उदाहरण हैः

बिरह आग तन में लगी जरन लगे सब गात।
नारी छूअत बैद के परे फफोला हाथ॥


अब जरा अमीर खुसरो के इन दोहों का आनन्द लीजिएः

खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार।
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार॥

खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग।
तन मेरो मन पियो को, दोउ भए एक रंग॥


अबुल हसन यमीनुद्दीन ख़ुसरो देहलवी ने तो अपनी निम्न रचना में एक पंक्ति फारसी और दूसरी पंक्ति हिन्दी की लिखकर एक अनूठा प्रयोग ही कर डालाः

ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल
दुराये नैना बनाये बतियाँ
कि ताब-ए-हिज्राँ न दारम ऐ जाँ
न लेहु काहे लगाये छतियाँ
चूँ शम्म-ए-सोज़ाँ, चूँ ज़र्रा हैराँ
हमेशा गिरियाँ, ब-इश्क़ आँ माह
न नींद नैना, न अंग चैना
न आप ही आवें, न भेजें पतियाँ
यकायक अज़ दिल ब-सद फ़रेबम
बवुर्द-ए-चशमश क़रार-ओ-तस्कीं
किसे पड़ी है जो जा सुनाये
प्यारे पी को हमारी बतियाँ
शबान-ए-हिज्राँ दराज़ चूँ ज़ुल्फ़
वरोज़-ए-वसलश चूँ उम्र कोताह
सखी पिया को जो मैं न देखूँ
तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ

Sunday, September 12, 2010

सुनहरा धोखा

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

रक्तिम उषा,
स्वर्णिम अरुणोदय,
रवि की चमक-दमक,
चन्द्र-रजत की ललक,
उष्ण-शीत दिवस,
झर झर झरता पावस,
इन सबमें पलता मानव,
कभी दिव्य, कभी दानव।

अहं त्वं अन्य का जाल,
क्षणिक काल अनन्त काल,
शून्य नभ में सुनहरा धोखा है,
उद्भव-स्थिति-संहार का-
न लेखा है न जोखा है।

पर धोखे की धुरी सत्य,
सतत अमिट अमर्त्य,
लहराता बन कर्तव्य जड़ में चेतन,
चेतन में स्वयं सकाम-निष्काम,
पर, अनादि अनन्त अभिराम

(रचना तिथिः शनिवार 24-12-1983)

Saturday, September 11, 2010

इस वर्ष गणेश चतुर्थी और ईद एक ही दिन मनाया जा रहा है हो सकता है कि किसी वर्ष होली और ईद एक ही दिन मनाया जाये

सबसे पहले तो आप सभी को गणेश चतुर्थी की शुभकामनाएँ और ईद मुबारक!



आज का दिन एक विशेष दिन है क्योंकि आज गणेश चतुर्थी और ईद एक साथ मनाए जा रहे हैं। हिन्दू भाई भी खुश और मुसलमान भाई भी खुश! यह भी हो सकता है कि किसी वर्ष होली और ईद एक ही दिन मनाया जाये! जी हाँ, मैं गलत नहीं कह रहा हूँ, अवश्य ही ऐसा हो सकता है। अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसा कैसे और क्यों होता है?

दरअसल यह समय की गणना का एक रोचक खेल है। आप यह तो जानते ही हैं कि समय की गणना पंचांग अर्थात् कैलेंडर के द्वारा की जाती है। पंचांग में समय की गणना मुख्यतः दो आधारों पर होती हैं - या तो सूर्य की गति के आधार पर या फिर चन्द्र की गति के आधार पर। हिन्दू और हिजरी कैलेंडरों में समय की गणना चन्द्रमा की गति के आधार पर होती है जबकि ग्रैगेरियन अर्थात अंग्रेजी कैलेंडर में समय की गणना सूर्य की गति के आधार पर होती है। सूर्य की गति के आधार पर समय की गणना करने पर एक साल में दिनों की कुल संख्या लगभग 365.25 होती है जबकि चन्द्र की गति से समय की गणना करने पर साल में दिनों की कुल संख्या घट कर लगभग 354.37 ही रह जाती है इस प्रकार से चन्द्र वर्ष सूर्य वर्ष से लगभग 10.88 कम दिनों का होता है। मोटे तौर पर कहें तो जूलियन अर्थात अंग्रेजी वर्ष में हिन्दू और हिजरी वर्षों से लगभग 10 अधिक दिन होते हैं। इस प्रकार से प्रत्येक हिन्दू और मुस्लिम त्यौहार प्रति वर्ष 10 दिन पीछे होते चले जाते हैं। तीन वर्ष में लगभग 30 दिन कम हो जाने पर हिन्दू पंचांग में तो एक अधिक मास जोड़ दिया जाता है और प्रत्येक हिन्दू त्यौहार पुनः एक माह आगे बढ़ जाते हैं किन्तु हिजरी पंचांग में मुस्लिम त्यौहार निरन्तर रूप से हर साल 10 दिन पीछे ही होते चले जाते हैं। इसी कारण से ईद का त्यौहार कभी किसी हिन्दू त्यौहार के साथ मिल जाता है तो कभी किसी अन्य हिन्दू त्यौहार के साथ। बहरहाल यह एक अच्छी बात ही है कि हिन्दू और मुसलमान एक साथ मिल कर एक ही दिन अपने-अपने त्यौहार मनाकर खुश होते हैं।

प्रति वर्ष ईद के लगभग दस दिन पीछे हो जाने के कारण एक और भी रोचक बात होती है वह है एक ही अंग्रेजी साल में दो बार ईद का मनाया जाना, एक बार जनवरी माह में और दूसरी बार दिसम्बर माह में! ऐसा सन् 2000 में हुआ था जब माह रमज़ान की ईद 8 जनवरी और अगली ईद 28 दिसम्बर को पड़ी थी। है ना यह एक मजेदार बात! सन् 2000 के बाद लगभग 35-36 बीत जाने पर फिर से ईद एक ही अंग्रेजी साल में दो बार मनाया जाएगा!

चलते-चलते

कल भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी जिसे कि हरतालिका तीज कहा जाता है। हरतालिका तीज को छत्तीसगढ़ में "तीजा" के नाम से जाना जाता है और यह इस क्षेत्र की महिलाओं के लिए एक विशिष्ट दिन होता है। समस्त महिलाएँ, चाहे वे कुमारी हों या विवाहित, आज निर्जला व्रत रख कर रात्रि जागरण और गौरी-शंकर की पूजा करेंगी। व्रत-पूजा करके जहाँ विवाहित महिलाएँ अपने लिये अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं वहीं कुमारियों का उद्देश्य होता है स्वयं के लिये योग्य वर की प्राप्ति। मान्यता है कि आज के दिन ही शिव-पार्वती का विवाह हुआ था।

छत्तीसगढ़ में तीजा व्रत की अत्यधिक मान्यता है। इस व्रत को मायके में ही आकर रखा जाता है। यदि किसी कारणवश मायके आना नहीं हो पाता तो भी व्रत तोड़ने के लिये मायके से जल और फलाहार का आना आवश्यक होता है क्योंकि इस व्रत को मायके के ही जल पीकर तोड़ा जाता है।

महिलाएँ रात भर जागरण करके भजन-पूजन करती हैं और भोर होने के बाद अपना व्रत तोड़ती हैं।

Friday, September 10, 2010

अन्धे को अंधेरे में बड़े दूर की सूझी

एक मित्र महोदय अक्सर हमारे पास आ धमकते हैं और जो थोड़ा बहुत दिमाग नाम की चीज हमारे पास बची हुई है (पता नहीं बची भी है या नहीं पर हमें तो खुशफहमी है कि बची हुई है) उसे बेतहाशा चाटने लगते हैं। उनसे निजात पाने के लिए हमने सोचा कि क्यों न इन्हें ब्लोगर बना दिया जाए! 'अन्धा बगुला कीचड़ खाय' के जैसे हमारी बात मानकर यदि ये ब्लोगिंग में लग गए तो फिर तो हमें छुट्टी ही मिल जाएगी इनसे; बस एक बार टिप्पणियों का चसका लग भर जाए बच्चू को, हमारे पास आना ही भूल जाएगा!

सो हमने उनसे कहा, "यार, तुम ब्लोगिंग क्यों शुरू नहीं कर देते? बहुत मजेदार चीज है ये ब्लोगिंग!"

"ब्लोगिंग में भला क्या मजा है?"

"येल्लो, तुम्हें ये भी नहीं मालूम कि ब्लोगिंग में क्या मजा है? याने कि 'अन्धा क्या जाने बसन्त बहार'! एक बार ब्लोगिंग शुरू तो करके देखो गुरू! खुद ही पता चल जाएगा कि ब्लोगिंग में कितना मजा है।"

"तुम्हें भी यार 'अन्धे को अंधेरे में बड़ी दूर की सूझी' जैसे जोरदार बातें सूझती रहती हैं। हम और ब्लोगर! हा हा हा हा! ब्लोगर बन कर हम लिखेंगे क्या भाई? लिखना तो हमें आता ही नहीं। हमारे ब्लोगर बन जाने का मतलब तो होगा 'आँख के अन्धे नाम देखो तो नैनसुख'! ना भाई ना, हम नहीं बनने वाले ब्लोगर-स्लोगर,  हमें तो बस फेसबुक और आर्कुट ही मजेदार लगता है।"

उनका जवाब सुनकर हमें लगा कि हम 'अन्धे के आगे रोवे अपनी आँखे खोवे' जैसे अपना समय तो बर्बाद नहीं कर रहे हैं। पर यह सोचकर कि शायद 'अन्धे के हाथ बटेर' लग जाए, हमने उन्हें और उचकाना शुरू किया, "अरे लिखने में क्या धरा है? स्कूल में तुमने गाय पर निबन्ध तो लिखा था कि नहीं? बस यहाँ भी वैसा ही कुछ लिख दिया करना। ब्लॉग में कुछ भी लिखो सब चलता है क्योंकि ब्लॉग तो एक निजी डायरी है जिसे लोग सार्वजनिक करना चाहते हैं और निजी डायरी में तो आदमी कुछ भी लिख सकता है ना? 'घरवाली ने समोसे कुरकुरे बनाए थे... चटनी में मिर्ची तेज थी... खाते समय बड़ा मजा आया पर दूसरे दिन भुगतना पड़ा' जैसा कुछ भी लिख सकते हो। वास्तविक जीवन में अन्धे को अन्धा कहने से बुरा लग जाता है पर ब्लोगिंग में तो तुम 'आँख वाले को भी अन्धा बनाना' जैसा काम कर सकते हो हो। बस इतने से ही समझ लो कि हमारे जैसा 'अक्ल का अन्धा' भी ब्लोगिंग के क्षेत्र में 'अन्धों में काना राजा' बना हुआ है और 'अन्धा पीसे कुत्ता खाय' जैसा काम किए जा रहा है।"

"पर निजी को निजी इसलिए कहते हैं कि वह सार्वजनिक करने की चीज नहीं होती और तुम कहते हो कि लोग निजी डायरी को सार्वजनिक करना चाहते हैं। भला ये क्या बात हुई?"

"यही तो गुरू ब्लोगिंग है! इसमें सब कुछ गोल-गोल गोल होता है। निजी चीज सार्वजनिक होती है और सार्वजनिक बातें निजी हो जाती हैं! यही तो मजा है ब्लोगिंग का! बस तुम तो पोस्ट लिख दो। पहली टिप्पणी हमारी ही होगी तुम्हारे पोस्ट में।"

"मैं पोस्ट लिखूँ और तुम टिप्पणी करो। हा हा हा हा! 'अन्धे अन्धा ठेलिया दोनों कूप पड़ंत'!"

"पर मेरे पोस्ट में तुम टिप्पणी क्यों करोगे?"

"इसलिए कि बाद में मेरे पोस्ट पर तुम टिप्पणी करोगे। ये ब्लोगिंग तो टिप्पणियों का ही खेल है गुरू! तुम मुझे टिप्पणी दो, मैं तुम्हें टिप्पणी दूँ, तुम मुझे प्रोत्साहित करो, मैं तुम्हें प्रोत्साहित करूँ। और फिर टिप्पणियाँ कोई पोस्ट पढ़कर थोड़े ही दी जाती हैं, टिप्पणियाँ तो अपनों को ही दी जाती हैं।"

"याने कि 'अन्धा बाँटे रेवड़ी अपने-अपने को देय'!"

"आगे चल कर देखना प्यारे कि ब्लोगिंग में हमारी तुम्हारी जोड़ी खूब आगे निकलेगी।"

"याने कि 'अन्धा सिपाही कानी घोड़ी,विधि ने खूब मिलाई जोड़ी'!"

"यार तुम शुरू तो करो ब्लोगिंग एक बार, धूम मचा दोगे धूम!

"ठीक है दोस्त, तुम कहते हो तो चलो मैं भी ब्लोगर बन जाता हूँ।"

उनके इस प्रकार से हामी भरने से हम बहुत खुश हुए, 'अन्धा क्या चाहे, दो आँखें'!

Thursday, September 9, 2010

हमारे लिए यही बहुत है कि हम ब्लोगिंग में टिके हुए हैं

हिन्दी ब्लोगिंग में टिके रहना कोई छोटी-मोटी बात नहीं है, बहुत बड़ी बात है यह! इसीलिए यह सोचकर हम खुश होते हैं कि हमारे लिए यही बहुत है कि हम ब्लोगिंग में टिके हुए हैं। 03 सितम्बर 2007 को हमने अपना ब्लोग "धान के देश में" बनाया था। तब से आज तक लगभग सवा छः सौ पोस्ट लिख चुके हैं। वैसे हमें अच्छी तरह से मालूम है कि उनमें से अधिकतर बकवास ही हैं और यदि उन्हें किसी स्तर के पत्र/पत्रिका में छपने के लिए भेजा जाए तो उनका स्थान रद्दी की टोकरी में ही होगा। अब इससे अच्छी बात क्या होगी कि हमारे पोस्ट रद्दी की टोकरी में न होकर हमारे ब्लोग की शोभा बढ़ा रहे हैं। यह अलग बात है कि नेट में आने वाले करोड़ों हिन्दीभाषियों में शायद ही उन्हें पढ़ने आता हो। पर यह क्या कम है कि उनमें से अनेक पोस्टों को उनके प्रकाशित होने के चौबीस घंटों में बहुत से ब्लोगरों ने पढ़ा और टिप्पणी के रूप में दाद भी दी।

विदेशियों का तो शुरू से ही व्यपार की ओर अधिक झुकाव रहा है; इसीलिए अंग्रेजी ब्लोगिंग में प्रायः ब्लोगिंग के द्वारा होने वाली आय का ध्यान रखा जाता है। शायद विदेशी ब्लोगरों का मानना है कि 'नाम मिलने से धन मिले या न मिले किन्तु धन मिलने से नाम अपने आप ही मिल जाता है'। धन प्राप्त होता है व्यापार से, व्यापार होता है ग्राहकों से और ग्राहक होते हैं उनके ब्लोग के पाठकगण जो कि लाखों करोड़ों की संख्या में होते हैं। वे ग्राहक ब्लोग के माध्यम से खरीदी करते हैं और ब्लोगर महोदय स्वयं का या अन्य लोगों का सामान बेचकर कमाई करता है। पाठक आते हैं स्तर की सामग्री पढ़ने के लिए, सो उन्होंने "कांटेंट इज़ किंग" को मूलमंत्र मान लिया है। पर हम भारतीय हैं, हमारी प्रवृति व्यापार की नहीं है। हम तो नाम होने से ही खुश होते हैं, नाम होता है अच्छा ब्लोगर बनने से और अच्छा ब्लोगर वह होता है जिसे खूब सारी टिप्पणियाँ मिले। हमारे लिए "कांटेंट इज़ किंग" का कुछ भी मतलब नहीं है, हमें तो "टिप्पणी महारानी" से ही मतलब होता है।

गूगल भी एक व्यापारी है और उसने शायद यही सोचकर हिन्दी ब्लोगिंग के लिए मुफ्त में सबडोमेन और होस्टिंग देना शुरू कर दिया कि हिन्दी ब्लोगिंग से भी व्यापार होगा और उसकी कमाई होने लगेगी। पर ऐसा अभी तक तो नहीं हो पाया है फिर भी गूगल आस लगाए बैठा है कि शायद कुछ समय के बाद ऐसा होना शुरू हो जाए। इसी आस में वह हिन्दी ब्लोगिंग के फ्री होस्टिंग के लिए बेशुमार धन खर्च किए जा रहा है इन्वेस्टमेंट के रूप में। यदि इतना धन इन्वेस्ट करने के बावजूद भी उसकी कमाई होनी शुरू नहीं हुई तो शायद वह आगे और इन्वेस्ट करना बंद कर दे। खैर यदि वह ब्लोगिंग की मुफ्त सुविधा देना बंद कर देगा तो हमारा क्या बिगड़ेगा, हम भी ब्लोगिंग बंद कर के "पुनर्मूष भव मूष" वाली कहावत को चरितार्थ कर लेंगे। लेकिन हमने भी ठान लिया है कि जब तक गूगल यह सुविधा हमें देता रहेगा तब तक तो हम ब्लोगिंग में बने ही रहेंगे।

Wednesday, September 8, 2010

संसार में रुपया ही सबसे बड़ा नहीं है किन्तु

ऐसा नहीं है कि संसार में रुपया ही सबसे बड़ा है, रुपये से बढ़ कर एक से एक मूल्यवान वस्तुएँ हैं जैसे कि विद्या, शिक्षा, ज्ञान, योग्यता आदि, किन्तु मुश्किल यह है कि इन सभी वस्तुओं को केवल रुपये अदा करके ही प्राप्त किया जा सकता है। आज के जमाने में हर चीज बिकाऊ हैं, पानी तक तो बिकने लगा है फिर शिक्षा हो या चिकित्सा की बात ही क्या है।

यदि आपके पास रुपया नहीं है तो क्या आप अपने औलाद को, उच्च शिक्षा तो दूर, साधारण शिक्षा ही दिलवा सकते हैं? मैं उन दिनों के मुंबई, कलकत्ता जैसे महानगरों की बात तो नहीं करता किन्तु हमारे समय कम से कम रायपुर में तो लोग के.जी., पी.पी. क्या होता है नहीं जानते थे और न ही म्युनिसिपालटी के स्कूलों अलावा अन्य खर्चीले प्रायवेट स्कूल हुआ करते थे। पिताजी हमें म्युनिसिपालटी के स्कूल में ले गये थे जहाँ हमें अपने सीधे हाथ को सिर पर से घुमा कर उलटे कान को छूने के लिये कहा गया (ऐसा माना जाता था कि छः वर्ष की उम्र हो जाने पर हाथों की लंबाई इतनी हो जाती है कि हाथ को सिर पर से घुमाते हुये दूसरी ओर के कान को छूआ जा सकता है, छः वर्ष से कम उम्र में नहीं) और हम भर्ती हो गये थे पहली कक्षा में। कपड़े की एक थैली में एक बाल-भारती पुस्तिका और स्लेट पेंसिल, यही था हमारा बस्ता। आज यदि आप किसी तरह से अपने बच्चे को किसी स्कूल में भर्ती करा भी लें तो उसके बस्ते का खर्च उठाते उठाते ही बेदम हो जायेंगे और बच्चा उसका बोझ उठाते उठाते।

उन दिनों प्रायमरी स्कूल में पढ़ने के लिये कोई फीस नहीं पटानी पड़ती थी। मिडिल स्कूल के लिये आठ आना और हाई स्कूल के लिये भी कुछ ऐसा ही मामूली सा फीस पटाना होता था। चिकित्सा के लिये बड़े बड़े अस्पताल न हो कर गिनी चुनी डिस्पेंसरियाँ ही थीं किन्तु उनके मालिक डॉक्टर की फीस नियत नहीं थी, जहाँ पैसे वालों से अधिक फीस ले लेते थे वहीं गरीबों का मुफ्त इलाज भी कर दिया करते थे। आज आप गरीब हैं या अमीर, इससे डॉक्टर को कोई फर्क नहीं पड़ता। उनकी नियत फीस आपको देना ही होगा।

सोचता हूँ कि पचास सालों में जमाना कहां से कहाँ पहुँच गया। सब कुछ बदल चुका है। अधिक वय के लोगों को अतीत की यादें बहुत प्रिय होती हैं। मैं भी उनमें से एक हूँ इसीलिये आज मेरे विचार भी अतीत में भटकने लग गये थे।

पुराने लोगों को सदैव ही अतीत अच्छा और वर्तमान बहुत बुरा प्रतीत होते रहा है और नये लोगों को पुराने लोग पुराने लोग दकियानूस। खैर यह मानव प्रकृति है। क्या शिक्षा और चिकित्सा का व्यापार उचित है? क्या इन पर सभी का समान अधिकार नहीं होना चाहिये चाहे वह अमीर हो या गरीब?

Monday, September 6, 2010

खुशी

भारत में आज मुम्बई, कोलकाता, दिल्ली जैसे विशाल महानगर हैं जिनमें देश भर के पढ़े-लिखे लोग आजीविका के चक्कर में आकर निवास करते हैं; छोटे-छोटे मगर आलीशान फ्लैटों में रहते हैं जिनमें न तो आँगन ही होता है और न ही अतिथि के लिए स्थान। सुबह नौ-दस बजे वे टिड्डीदलों की भाँति दफ्तर की तरफ निकल पड़ते दिखाई दिया करते हैं। पापी पेट के लिए लाखों-करोड़ों स्त्री-पुरुष गाँव-देहातों को छोड़कर महानगरों में आ बसे हैं। इन महानगरों में बड़े-बड़े मिल और कल कारखाने हैं जिनमें लाखों मजदूर एक साथ मजदूरी करके पेट पालते हैं और गन्दी बस्तियों में, मुर्गे-मुर्गियों के दड़बों की भाँति, झोपड़पट्टियों में रहते हैं।

और सभी खुश हैं!

एक समय वह भी था जब भारत में लोग गाँव-देहातों-कस्बों में रह कर खेती करते या घर पर अपने-अपने हजारों धन्धे करते थे। छोटे से छोटा गाँव भी उन दिनों अपनी हर जरूरत के लिए आत्मनिर्भर हुआ करता था। प्रत्येक आदमी बहुत कम खर्च में सीधे-सादे ढंग से मजे में रहता था। अपना मालिक आप! अपने आप में सम्पूर्ण आत्मनिर्भर! परिश्रम, सादा जीवन और आत्मनिर्भरता उनके स्वभाव के अंग थे क्योंकि उनके बगैर एक क्षण भी काम नहीं चल सकता था। स्थानीय शासकों मसलन मालगुजारों, जमींदारों आदि की स्वेच्छाचारिता से तंग भी होते थे और उनकी दयाशीलता से निहाल भी।

और सभी भी खुश थे!

Sunday, September 5, 2010

आत्म निर्भर होना बेहतर है कि नौकरी कर के नौकर बनना?

आटोरिक्शा में बैठा तो देखा कि आटोचालक तो अपना परिचित सुखदेव है जो कि पेट्रोल पंप में काम किया करता था। पूछने पर उसने बताया कि पेट्रोल पंप की नौकरी से उसे मालिक ने निकाल दिया तो उसने आटो चलाना शुरू कर दिया। प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा था कि वह अब पहले से ज्यादा खुश है क्योंकि जितनी अधिक मेहनत करता है उसी के हिसाब से कमाई भी होती है, नौकरी में तो सिर्फ बँधी-बँधाई तनख्वाह ही मिलती थी और साथ में मालिक की घुड़की भी।

नौकरी करने का अर्थ होता है किसी का नौकर बन जाना। चाहे कोई कितना भी बड़ा अफसर क्यों ना हो, उसके ऊपर हुक्म चलाने वाला कोई ना कोई बड़ा अफसर अवश्य ही होता है। नौकरी करने वाले को भले ही बड़े से बड़ा पद मिल जाए पर वह अपना मालिक आप कभी बन ही नहीं सकता।

किन्तु विडम्बना यह है कि आज शिक्षा का उद्देश्य ही नौकरी पाना बन कर रह गया है। हर कोई चाहता है कि उसे बड़ी से बड़ी नौकरी मिले। भले ही नौकरी मिल जाने के बाद याने कि नौकर बन जाने के बाद उसे प्रतिदिन बारह से पन्द्रह घंटों तक पिसना ही क्यों ना पड़े, अपने से ऊपर वाले अफसर का घर के नौकर से भी बदतर व्यहार सहन करना पड़े, तीज-त्यौहार, जन्मदिन तथा अन्य पारिवारिक खुशियों के अवसर पर भी परिवार से दूर रहना पड़े, हुक्म होने पर आधी रात को नींद से जागकर भी दफ्तर दौड़ना पड़े।

क्यों कमाते हैं हम? अपने परिजनों की खुशी के लिए ही ना! किन्तु नौकरी कर के हम धन तो कमा सकते हैं पर क्या अपने बीबी-बच्चों को क्या वह खुशी दे सकते हैं जसके कि वे हकदार हैं? बेटे का जन्मदिन है, वह पापा का बेसब्री से इन्तजार कर रहा है पर पापा को आज ही प्रोजेक्ट पूरा कर के देना है वरना नौकरी छूट जाने का डर है। मजबूर है वह इसलिए अपने बच्चे के जन्मदिन में उपस्थित नहीं रह सकता।

आज हमें नौकर बनना पसन्द है और आत्मनिर्भरता की तो हमारे दिमाग में कल्पना तक भी  नहीं आ पाती। हमारी ऐसी सोच हमारी शिक्षा की देन है हमें। हमारी सरकार की शिक्षानीति ही यही है कि वह राष्ट्र में नौकर तैयार करे, ऐसे नौकर जिनका उद्देश्य मात्र रुपया कमाना हो चाहे उसके लिए उसे अपना स्वाभिमान भी खोना पड़े। यह शिक्षा हमें स्वार्थ सिखाती है, ऐसे लोगों का निर्माण करती है जो अपने स्वार्थ के लिए राष्ट्र को भी बेच देने के लिए तत्पर हो जाएँ।

कभी हमारे बुजुर्ग हमसे कहा करते थेः

उत्तम खेती मध्यम बान।
निषिद चाकरी भीख निदान।।

अर्थात् कृषिकार्य सर्वोत्तम कार्य है और व्यापार मध्यम, नौकरी करना निषिद्ध है क्योंकि यह निकृष्ट कार्य है और भीख माँगना सबसे बुरा कार्य है।

पर आज की शिक्षा नीति ने उपरोक्त कथन की कुछ भी कीमत नहीं रहने दिया है। क्या ऐसी शिक्षानीति जारी रहनी चाहिए या इसमे परिवर्तन की जरूरत है? क्या एक ऐसी शिक्षानीति की आवश्यकता नहीं है जो हमें आत्मनिर्भरता की ओर ले जाये, हममें राष्ट्रीय भावना पैदा करे, हमें अपनी सभ्यता, संस्कृति और गौरव का सम्मान करना सिखाए?

Saturday, September 4, 2010

दूसरों को बदलने की कोशिश करने से अच्छा है कि स्वय को ही बदल लें... कल की कहानी का अगला किश्त..

मैं किश्तों में कही जाने वाली किसी पोस्ट की अगली किश्त लिखने के पहले यह सुनिश्चित कर लेना उचित समझता हूँ कि पहले वाली किश्त कितनी सफल रही थी? चिट्ठाजगत के धड़ाधड़ पठन में मेरे पोस्ट को अच्छा स्थान मिलना सिद्ध करता है कि कल की कथा को बहुत सारे लोगों ने पढ़ा और इस बात की मुझे खुशी है। टिप्पणियों की संख्या से किसी पोस्ट के स्तर को मापना मेरी फितरत में शामिल नहीं है इसलिए मुझे धड़ाधड़ टिप्पणियाँ से कुछ खास मतलब नहीं रहता। मैं टिप्पणियों को बुरा-भला नहीं कहता किन्तु आजकल अधिक से अधिक टिप्पणियाँ पाने का जो क्रेज बन गया है उसे अवश्य ही मैं अच्छा नहीं समझता। खैर, मेरे विचार से सभी सहमत हों यह जरूरी नहीं है, 'मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना'! मैं दूसरों के समक्ष अपने विचार तो अवश्य ही रख सकता हूँ जरूरी नहीं हैं कि वे मेरे विचार से प्रभावित हों। वैसे भी दूसरों को बदलने की कोशिश करने से अच्छा है कि स्वय को ही बदल लें।

तो अब प्रस्तुत है आचार्य चतुरसेन जी "सोना और खून" के कल के अंश से आगे की कहानीः

(कृपया पूर्व की कथा यहाँ पढ़ें - एक बार पढ़ा है और बार-बार पढ़ने की इच्छा है)

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बादशाह ने उसका नाम रखा कुदसिया बेगम। उसे नवाब का खिताब दिया, जो किसी दूसरी बेगम को प्राप्त न था। और उसे ताज पहनने का भी अधिकार दे दिया। अपने सौन्दर्य, प्रतिभअ और खुशअखलाक के कारण वह उस विशाल महलसरा में सब बेगमों की सरताज बन गई। नसीरुद्दीन हैदर उसके गुलाम बने हुए थे। सम्पत्ति उसकी ठोकरों में थी। वह खुले हाथों खर्च करती थी। रुपये-अशर्फियाँ उसके लिए कंकर-पत्थरों का ढेर थीं। उसका केवल पानों का खर्च रोजाना आठ सौ रुमया था। सेरों मोती चूने के लिए रोज पीसे जाते थै। रोज सौ रुपये के फूलों के हार उसके लिए मोल लिए जाते थे। सात सौ रुपये माहवार उसकी चूड़ियों का खर्च था, जो उसकी दासियाँ पहनती थीं। उसके बावर्चीखाने में छः सौ रुपया रोज खर्च होता था। सोने के थाल में सब प्रकार के रत्नों का सतनजा प्रति सन्ध्या को अपने सिरहाने रखकर सोती थी। और प्रातःकाल होते ही वह गरीबों को खैरात कर दिया जाता था। उसकी पोशाक के लिए हजार रुपये रोज खर्च किए जाते थे, जिसे वह सिर्फ एक बार पहनकर शैदानियों को दे देती थी।

गर्मियों में जो खस की टट्टियाँ उसके लिए लगाई जाती थीं, वह केवड़ा और गुलाब से छिड़की जाती थीं। सर्दियों में ऊनी कपड़ों के गट्ठे के गट्ठे उसके अमलों में बाँटे जाते थे। दस-दस हजार रुपयों की लागत की उसकी रजाइयाँ बनती थीं। और एक बार ओढ़ लेने के बाद जिसके भाग्य में होती थीं, उसे बख्श दी जाती थीं। वह एक-एक लाख रुपये रुपये जल्सेवालियों को दे डालती थी। उसे नवाब का खिताब दिया गया था और वह रत्नजटित ताज सिर पर पहनती थी।

बसन्त की ऋतु थी बेगममहल में हर कोई बसन्ती बाना पहने था। बादशाह का खास बाग सजाया गया था। मैदान में अपने-अपने डेरे-तम्बू डालकर दरबारी अमीर-उमरा और राजकर्मचारी जश्न मना रहे थे।

बादशाह को बड़ी लालसा थी कि इस बेगम के गर्भ से पुत्र उत्पन्न हो और उसे वह अपना वारिस बनाए। इस काम के लिए बड़े-बड़े उपचार किए गए थे। बड़े-बड़े हकीम, तबीब, वैद्य, स्याने-दीवाने बुलाए गए थे। बड़े-बड़े पीर, फकीर, शाह और औलिया वहाँ पहुँचे थे। उनकी अच्छी बन पड़ी थी। सबने अच्छी लूट मचाई थी। बहुत-से निर्धन धनी हो गए। राज्य भर के फकीरों को निमन्त्रण दिया क्योंकि बेगम को गर्भ रह गया था। रियाया में जश्न मनाने का हुक्म जारी हो गया था।

चारों तरफ फव्वारे चल रहे थे। खवासनियाँ दौड़-धूप कर रही थीं। बादशाह एक मसनद पर अधलेटे पड़े थे। कुदसिया बेगम उनके पहलू में थीं। खवासें शराब के प्याले बादशाह को देतीं और बादशाह उन्हें कुदसिया बेग के होंठों से लगाकर और आँखें बन्द करे पी जाते थे। नाचनेवालियाँ नाच रही थीं। एक नाचनेवाली की अदा पर फिदा होकर बेगम ने जअपने गले का जड़ाऊ हार उसकी ओर फेंककर सबको वहाँ से भाग जाने का संकेत किया। सबके चले जाने पर हँसकर उसने बादशाह के गले में हाथ डाल दिया और कहा, "मेरे मालिक, तुम्हारी इनायत से मैं नाचीज क्या से क्या हो गई। तुमने मुझको इस कदर निहाल कर दिया कि अब मैं दुनिया को आनन-फानन में निहाल कर सकती हूँ।"

बादशाह ने उसका मधर चुम्बन लिया। एक आह भरी और कहा, "प्यारी बेगम, तुमसे मुझे जो राहत मिली है, उसके सामने यह बादशाहत भी हेच है। लाओ, अपने हाथ से एक प्याला दो। अपने होंठों से छूकर उसमें अमृत डालकर।"

बेगम ने हँसकर दो प्याले शराब लबालब भरे और बादशाह को दिए।

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आज लखनऊ के बाजार में बड़ी उत्तेजना फैली हुई थी। पहर दिन चढ़ गया, परन्तु अभी तक आधी से अधिक दूकानें बन्द थीं। बकरू नानबाई ने दूकान में तंदूर को गरमाने के बाद पाव-रोटी सजाते हुए पड़ोस के लाला मटरूमल से कहा, "चाचा मटरू, अभी तक दूकान नहीं खोली, इस तरह गुमसुम कैसे बैठे हो? दोपहर दिन चढ़ गया।

मटरू लाला सिकुड़े हुए दूकान के आगे हाथ में चाबियों का गुच्छा लिए बैठे थे। उन्होंने नाक-भौं सिकोड़कर कहा, "क्या करूँ दूकान खोलकर? अभी सरकारी हाथी आएँगे और सब जिन्स चबा जाएँगे। कौन लड़ेगा भला इन काली बलाओं से?"

"सचमुच चचा यह तो बड़ा अन्धेर है। कल ही की लो, पाँच सेर आटा गूंधकर रखा था, एक ही चपेट में सफा कर गया। तंदूर तोड़ गया घाट में। खुदा गारत करे। नवाब आसफुद्दौला के जमाने से दूकानदारी करता हूँ पर ऐसा अन्धेर तो देखा नहीं।"

"तुम अपने तंदूर और पाँच सेर आटे की गाते हो म्याँ! मेरी तो मन भर मक्का साफ कर गया। महावत साथ था। महावत को मैंने डाँटा तो वह शेर हो गया औ‌र उल्टा मुझी को आँख दिखाने लगा। कहने लगा 'मैं क्या करूँ? सरकार से फीलखाने के खर्च का रुपया मिलता ही नहीं; इसलिए एक-एक महावत अपने हाथी के साथ तीसरे दिन बाजार आता है। जो हाथ लगा उससे पेट भरता है।'.."

इतने में नसीबन कुंजड़िन वहाँ आ गई। उसने कहा, "अधेले की रोटी और अधेले का सालन दो म्याँ बकरू, जरी बोटियाँ ज्यादा डालना।"

"अधेले में क्या तुम्हें सारी देग उलट दूँ?"

"तो मरे क्यों जाते हो, सालन के नाम तो नीला पानी ही है।"

"लखनऊ भर में कोई साला मेरे जैसा सालन बना तो दे, टाँगों तले निकल जाऊँ। ला प्याला दे। कल हाथी ने तेरा भी तो नुकसान किया था।"

"ए खुदा की मार इस हाथी पर, मुआ टोकरे-भर खरबूजे खा गया। धेले तक की बोहनी न हुई थी, बस लाकर रखे ही थे। मैंने डराया तो मुआ सूंड उठाकर झपटा मेरे ऊपर। मैं भागी गिरती-पड़ती। पर किससे कहें, यहाँ लखनऊ में तो बस इन दाढ़ीजार फिरंगियों की चलती है। और किसी की दाद-फरियाद कोई नहीं सुनता।"

इसी समय मियाँ नियामत हुसैन चकलादार हाथ में ऐनक लिए आ बरामद हुए। फटा पायजामा, फिड़क जूतियाँ और पुरानी शेरवानी, दुबले-पतले, फूँस से आदमी। आते ही बोले, "म्याँ बकरू, झपाके से दमड़ी का रोगनजोश, दमड़ी की रोटी और अधेले की कलेजी दो।"

"खूब हैं आप, पैसे के तीन अधेले भुनाते हैं। लाइए पैसा नगद।"

"म्याँ अजब अहमक हो, चकलेदार हैं हम, कोई उठाईगीर नहीं।"

"माना आप चकलेदार हैं, इज्जतवाले हैं; मगर सुबह-सुबह उधार के क्या मानी? फिर पिछला भी बकाया है। अब आपको उधार भी दे् और अहमक भी बनें।"

"अगले-पिछले सभी देंगे, तनख्वाह मिलने पर।"

"यह तो मैं साल भर से सुनता आ रहा हूँ।"

"तो भई, मैं क्या करूँ? तीन बरस से तलब नहीं मिली।"

"तो छोड़ दो नौकरी।"

"नौकरी छोड़कर क्या करूँ?"

"घास खोदो।"

"कमजर्फ आदमी, हमें घास छीलने को कहता है। हम चकलादार हैं नहीं जानता!"

"तो हजरत, पैसा नगद दीजिए और सौदा लीजिए। क्या जरूरी है कि हम अपना माल दें और गालियाँ खाएँ?"

"अजब जमाना आ गया है, रज़ील लोग शरीफों का मुँह फेरते हैं, सरकारी अफसरों को आँखें दिखाते हैं।"

"तो साहब, हम तो अपना पैसा माँगते हैं। उधार बेचें तो खाएँ क्या?"

"तुफ है उसपर जो इस बार तनख्वाह मिलने पर तुम्हारा चुकता न करे। लो लोगों हम चले।"

"खैर इस वक्त तो लेते जाइए चकलादार साहब, हम रज़ील लोग हैं, मुल दुकान के आगे गाहक को खाली नहीं भेज सकते।"

"चकलादार साहब नर्म हुए। कहने लगे, "भई, हम क्या करें, मुल्केजमानिया साहब लोगों को लाखों रुपये रोज देते हैं, पर नौकरों को तलब नहीं मिलती। हाथी आवारा बाजारों में फिरते हैं, उन्हें राशन नहीं दिया जाता।"

इसी वक्त मौलाबख्श खानसामा आ गया। पिछली बात सुनकर कहा, "भई अब तो दो साल और तलब नहीं मिलेगी। नवाब कुदसिया बेगम को लड़का हुआ है। उसके जश्न मनान का हुक्म है। करोड़ों रुपया खर्च होगा। सुना नहीं तुमने, बेगम ने करोड़ रुपये का चबूतरा लुटवा दिया।"

"हाँ भाई, बादशाह हैं। पर रियाया का भी तो ख्याल रखना लाजिम है।"

"सामने की दुकान पर करीमा फुल्कियाँवाला गर्मागर्म फुल्कियाँ उतार रहा था। मियाँ अमजद तहमद कड़काते आए - एक पैसा झन्नाटे से थाल में फेंककर कहा, "म्याँ दे तो एक पैसे का गर्मागर्म।"

"एक पैसे की क्या लेते हो, कल्ला भी गर्म न होगा। दो पैसे की तो लो।"

"दो ही पैसे की दे दो यार, मगर चटनी जरा ज्यादा देना।"

फुल्कीवाले ने बीस फुल्कियाँ दोने में भरकर अमजद के हाथ में दीं और चटनी की हांडी आगे सरकाकर कहा, "ले लो जितनी जी चाहे।"

अमजद ने चटनी दोनो में भरी और कहा, "यार, चटनी तो बासी मालूम पड़ती है।"

"लो और हुई। म्याँ, अभी तो पाव भर खटाई की चटनी बनाई है। आप पहचानने में खूब मश्शाक हैं।"

"तो तेज क्यों होत हो म्याँ? मैंने बात ही तो कही।"

"और मैंने क्या तमाचा मारा? क्या जमाना आ गया! लखनऊ शहर में अब तमीजदारों की गुजर नहीं।"

"आक्खाह, तो आप तमीजदार है!"

ये बातें हो ही रहीं थीं कि हुसेनखां जमदार रकाबी लिए लपकत आए। बोले, "म्याँ करीम, जरा दो पैसे की फुल्कियाँ तो देना, यर घान जरा खरा करके निकालो, खूब फुल्कियाँ बनते हो यार! इस कदर मुँह लग गई हैं कि खुदा ही पनाह। नखास से आना पड़ता है तुम्हारी दुकान पर।"

"तो पैसे निकालिए साहब।"

"इसके क्या माने? शरीफों से ऐसी बात?"

"तो हुज़ूर, मैं उधार कहाँ से दूँ। गरीब दुकानदार हूँ। पेट भरने को सुबह-सुबह यहाँ पर खून जलाता हूँ। आप हैं कि सुबह-सुबह हाजिर। एक दिन, दो दिन, तीन दिन, आखिर कब तक? पूरे नौ आने उधार हो गए हैं।"

"इसे कहते हैं कमीनापना। न किसी की इज्जत का ख्याल, न रुतबे का। मुँह में आया बक गए। अबे, हम सरकारी जमादार हैं, चरकटे नहीं।"

"तो जमादार साहब, पैसे नकद दीजए, उधार की सनद नहीं।"

जमादार ने दो पैसे टेंट से निकालकर फेंक दिए। तैश में आकर बोले, "अबे, कौन तुमसे मुँह लगे। अब से जो तुम्हारी दुकान पर आए उसपर सात हर्फ।"

दुकानदार ने पैसे उठाए और जरा नर्म होकर कहा, "नाराज न हों। हम टके के आदमी, इतनी गुंजाइश कहाँ कि उधार सौदा दें, जमदार साहब! लीजिए चटनी चखिए, क्या नफ़ीस बनाई है। ये मियाँ कहते हैं - बासी है।"

उसने रक़ाबी में गर्मागर्म फुल्कियाँ और चटनी रख दी। जमादार साहब ने खुश होकर कहा, "ये फुल्कियाँ-चटनी तो तुम लखनऊ में बनाने वाले एक ही हो।"

"हुज़ूर यह आँच का खेल है, निगाह चूकी कि बिगड़ा।"

"भअई बड़ी कारीगरी का काम है, बस तुम्हारा ही दम है। पैसों का खयाल न करना, हाँ, बस तनख्वाय मिली कि तुम्हारे पैसे खरे। अजी बरसों से हम तुम्हारी दुकान से फुल्कियाँ लेते हैं। अब चलता हूँ। हसनू की दुकान से धेले का तम्बाकू और रज्जब कूंजड़े से धेले की अरबियाँ लेनी है। मगर यार हसनू का जंगी हुक्का हर वक्त तैयार रहता है। उर से जानेवाले पर लाजिम है कि एक कश जरूर लगाए। सौदा ले या न ले। ओफ्फो, दो पैसे की अफीम की पुड़या भी लेनी है। लो भई, अब तो सदर तक दौड़ना पड़ा।" जमादार तेजी से चल दिए।

चलते-चलते

कुछ लोगों ने मुझे मेल कर के "सोना और खून" उपन्यास को पढ़ने की इच्छा जाहिर की है और पूछा है कि क्या यह उपन्यास खरीदने के लिए उपलब्ध है? तो उनकी जानकारी के लिए मैं बता दूँ कि आचार्य चतुरसेन रचित सोना और खून उपन्यास चार भागों में हैं। चारों भाग आनलाइन खरीदी के लिए उपलब्ध है जिन्हें आप निम्न लिंक से खरीद सकते हैं


आचार्य चतुरसेन रचित सोना और खून भाग 1 यहाँ खरीदें
आचार्य चतुरसेन रचित सोना और खून भाग 2 यहाँ खरीदें
आचार्य चतुरसेन रचित सोना और खून भाग 3 यहाँ खरीदें
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