Tuesday, November 30, 2010

क्या आर्य जाति ने सिन्धु घाटी सभ्यता पर आक्रमण करके उसे विनष्ट किया था?

पश्चिमी विद्वानों का मत है कि आर्यों का एक समुदाय भारत मे लगभग 2000 इस्वी ईसा पूर्व आया। इन विद्वानों की कहानी यह है कि आर्य इण्डो-यूरोपियन बोली बोलने वाले, घुड़सवारी करने वाले तथा यूरेशिया के सूखे घास के मैदान में रहने वाले खानाबदोश थे जिन्होंने ई.पू. 1700 में भारत की सिन्धु घाटी की नगरीय सभ्यता पर आक्रमण कर के उसका विनाश कर डाला और इन्हीं आर्य के वंशजों ने उनके आक्रमण से लगभग 1200 वर्ष बाद आर्य या वैदिक सभ्यता की नींव रखी और वेदों की रचना की।

इस बात के सैकड़ों पुरातात्विक प्रमाण हैं कि सिन्धु घाटी के के लोग बहुत अधिक सभ्य और समृद्ध थे जबकि इन तथाकथित घुड़सवार खानाबदोश आर्य जाति के विषय में कहीं कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है। आखिर सिन्धु घाटी के लोग इनसे हारे कैसे? यदि यह मान भी लिया जाए कि वे घुड़सवार खानाबदोश अधिक शक्तिशाली और बर्बर थे इसीलिए वे जीत गए तो सवाल यह पैदा होता है कि इस असभ्य जाति के लोग आखिर इतने सभ्य कैसे हो गए कि वेद जैसे ग्रंथों की रचना कर डाली? और यह स्वभाव से घुमक्कड़ जाति 1200 वर्षों तक कहाँ रही और क्या करती रही। दूसरी ओर यह भी तथ्य है कि आर्यो के भारत मे आने का कोई प्रमाण न तो पुरातत्त्व उत्खननो से मिला है और न ही डी एन ए अनुसन्धानो से। मजे की बात यह भी है कि उन्हीं आर्यों द्वारा रचित वेद आदि ग्रंथों में भी आर्यों के द्वारा सिन्धु घाटी सभ्यता पर आक्रमण करने का कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता। आर्य शब्द तो स्वयं ही कुलीनता और श्रेष्ठता का सूचक है फिर यह शब्द असभ्य, घुड़सवार, घुमन्तू खानाबदोश जाति के लिए कैसे प्रयुक्त हो सकता है?

वास्तविकता यह है कि उन्नीसवीं शताब्दी में एब्बे डुबोइस (Abbé Dubois) नामक एक फ्रांसीसी पुरातत्ववेत्ता भारत आया। वह कितना ज्ञानी था इस बात का अनुमान तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने प्राचीन भारतीय साहित्य में प्रलय के विषय में पढ़कर प्रलय को नूह और उसकी नाव के साथ जोड़ने का प्रयास किया था जो कि एकदम मूर्खतापूर्ण असंगत बात थी। एब्बे की पाण्डुलिपि आज के सन्दर्भ में पूरी तरह से असामान्य हो चुकी है। इन्हीं एब्बे महोदय ने भारतीय साहित्य का अत्यन्त ही त्रुटिपूर्ण तथा कपोलकल्पित वर्णन, आकलन और अनुवाद किया जिस पर जर्मन पुरातत्ववेत्ता मैक्समूलर ने, जो कि तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के नाक के बाल बने हुए थे, अपनी भूमिका लिखकर सच्चाई का ठप्पा लगा दिया। मैक्समूलर के द्वारा सच्चाई का ठप्पा लग जाने ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने आर्यों के द्वारा सिन्धुघाटी सभ्यता पर आक्रमण की कपोलकल्पित कहानी को इतिहास बना दिया।

Monday, November 29, 2010

हम ब्लोगर इसलिए हैं क्योंकि हममें लेखन प्रतिभा है

ईश्वर ने हमें अपने विचारों को लेखनीबद्ध करने कि प्रतिभा दी है इसीलिए हम ब्लोगर हैं। जाने कितने ही लोग हैं जो चाहकर भी अपने विचारों को कागज पर उतार नहीं सकते। तीनेक साल पहले तक मैं भी स्वयं को लेखन प्रतिभा से विहीन समझता था किन्तु अभ्यास करके मैंने इस प्रतिभा को अपने भीतर विकसित कर लिया। और मुझमें जब अपने विचारों को लेखनीबद्ध करने की योग्यता आ गई तो मैं ब्लोगर बन गया।

मनुष्यमात्र का यह स्वभाव है कि वह अपनी प्रतिभा का उपयोग करता है। यह उपयोग या तो सदुपयोग हो सकता है या दुरुपयोग हो सकता है या फिर महज एक उपयोग ही हो सकता है। जब कोई अपनी योग्यता का उपयोग करता है और उस उपयोग से समाज का, राष्ट्र का या अन्य अनेक लोगों का कल्याण होता है, राष्ट्र, समाज और लोगों तक उसकी योग्यता के माध्यम से कोई सार्थक सन्देश पहुँचता है तो योग्यता का यह उपयोग निःसन्देह सदुपयोग ही होता है और यदि इसके विपरीत होता है तो दुरुपयोग। किन्तु किसी की प्रतिभा से यदि किसी का न तो कल्याण होता है और न ही राष्ट्र, समाज और लोगों को किसी प्रकार की हानि ही पहुँचती है तो यह योग्यता का महज उपयोग हुआ।

कई बार मेरे मन में प्रश्न उठता है कि मैं अपनी प्रतिभा का उपरोक्त तीन प्रकार के उपयोगों में से किस प्रकार का उपयोग कर रहा हूँ? स्वयं को ही लगने लगता है कि मैं अपनी प्रतिभा का महज उपयोग मात्र कर रहा हूँ। और शायद वह भी इसलिए क्योंकि अपनी प्रतिभा का प्रयोग करने के लिए मुझे ब्लोगर रूपी मुफ्त मंच (free plateform) मिल गया है। जी हाँ, यह सही है कि यदि मुझे ब्लोगर बनने के लिए अपनी जेब से रुपये खर्च करने पड़ते तो मैं कदापि ब्लोगर न बना होता।

मैं जानता हूँ कि जिनमें लेखन की यह प्रतिभा नहीं है वे दूसरों को पढ़ना पसन्द करते हैं। किन्तु वे लोग मुझे पढ़ने के लिए लालायित कभी नहीं होते क्योंकि मैं अपनी प्रतिभा का महज उपयोग कर रहा हूँ, सदुपयोग नहीं।

यदि कभी मैं अपनी इस प्रतिभा से राष्ट्र, समाज, भाषा तथा अन्य लोगों का किंचित मात्र भी भला कर पाया तो मैं स्वयं को धन्य मानूँगा।

Sunday, November 28, 2010

गद्य की विधाएँ - कहानी

अंग्रेजी में जिसे 'शार्ट स्टोरी' कहते हैं उसी का प्रचलन हिंदी में कहानी के नाम से हुआ। बंगला में इसे गल्प कहा जाता है। कहानी ने अंग्रेजी से हिंदी तक की यात्रा बंगला के माध्यम से की। कहानी गद्य कथा साहित्य का एक अन्यतम भेद तथा उपन्यास से भी अधिक लोकप्रिय साहित्य का रूप है।

मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और कहानी कहना तथा सुनना मानव का आदिम स्वभाव बन गया। इसी कारण से प्रत्येक सभ्य तथा असभ्य समाज में कहानियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में कहानियों की बड़ी लंबी और सम्पन्न परंपरा रही है। वेदों, उपनिषदों तथा ब्राह्मणों में वर्णित 'यम-यमी', 'पुरुरवा-उर्वशी', 'सौपणीं-काद्रव', 'सनत्कुमार-नारद', 'गंगावतरण', 'श्रृंग', 'नहुष', 'ययाति', 'शकुन्तला', 'नल-दमयन्ती' जैसे आख्यान कहानी के ही प्राचीन रूप हैं।

प्राचीनकाल में सदियों तक प्रचलित वीरों तथा राजाओं के शौर्य, प्रेम, न्याय, ज्ञान, वैराग्य, साहस, समुद्री यात्रा, अगम्य पर्वतीय प्रदेशों में प्राणियों का अस्तित्व आदि की कथाएँ, जिनकी कथानक घटना प्रधान हुआ करती थीं, भी कहानी के ही रूप हैं। 'गुणढ्य' की "वृहत्कथा" को, जिसमें 'उदयन', 'वासवदत्ता', समुद्री व्यापारियों, राजकुमार तथा राजकुमारियों के पराक्रम की घटना प्रधान कथाओं का बाहुल्य है, प्राचीनतम रचना कहा जा सकता है। वृहत्कथा का प्रभाव 'दण्डी' के "दशकुमार चरित", 'वाणभट्ट' की "कादम्बरी", 'सुबन्धु' की "वासवदत्ता", 'धनपाल' की "तिलकमंजरी", 'सोमदेव' के "यशस्तिलक" तथा "मालतीमाधव", "अभिज्ञान शाकुन्तलम्", "मालविकाग्निमित्र", "विक्रमोर्वशीय", "रत्नावली", "मृच्छकटिकम्" जैसे अन्य काव्यग्रंथों पर साफ-साफ परिलक्षित होता है।

इसके पश्‍चात् छोटे आकार वाली "पंचतंत्र", "हितोपदेश", "बेताल पच्चीसी", "सिंहासन बत्तीसी", "शुक सप्तति", "कथा सरित्सागर", "भोजप्रबन्ध" जैसी साहित्यिक एवं कलात्मक कहानियों का युग आया। इन कहानियों से श्रोताओं को मनोरंजन के साथ ही साथ नीति का उपदेश भी प्राप्त होता है। प्रायः कहानियों में असत्य पर सत्य की, अन्याय पर न्याय की और धर्म पर अधर्म की विजय दिखाई गई हैं।

किन्तु वर्तमान कहानियों पर सर्वाधिक प्रभाव अमेरिका के कवि-आलोचक-कथाकार 'एडगर एलिन पो' का है जिनके अनुसार एक सफल कहानी में एक केन्द्रीय कथ्य होता है जिसे प्रभावशाली और सघन बनाने के लिये कहानी के सभी तत्वों - कथानक, पात्र, चरित्र-चित्रण, संवाद, देशकाल, उद्देश्य - का उपयोग किया जाता है। श्री पो के अनुसार कहानी की परिभाषा इस प्रकार हैः

"कहानी वह छोटी आख्यानात्मक रचना है, जिसे एक बैठक में पढ़ा जा सके, जो पाठक पर एक समन्वित प्रभाव उत्पन्न करने के लिये लिखी गई हो, जिसमें उस प्रभाव को उत्पन्न करने में सहायक तत्वों के अतिरिक्‍त और कुछ न हो और जो अपने आप में पूर्ण हो।"


हिंदी कहानी को सर्वश्रेष्ठ रूप देने वाले 'प्रेमचन्द' ने भी श्री पो के विचारों को स्वीकारते हुये कहानी की परिभाषा इस प्रकार से की हैः

"कहानी वह ध्रुपद की तान है, जिसमें गायक महफिल शुरू होते ही अपनी संपूर्ण प्रतिभा दिखा देता है, एक क्षण में चित्त को इतने माधुर्य से परिपूर्ण कर देता है, जितना रात भर गाना सुनने से भी नहीं हो सकता।"


कहानी के तत्व

रोचकता, प्रभाव तथा वक्‍ता एवं श्रोता या कहानीकार एवं पाठक के बीच यथोचित सम्बद्धता बनाये रखने के लिये सभी प्रकार की कहानियों में कमोबेस निम्नलिखित तत्व महत्वपूर्ण हैं:

कथावस्तु: किसी कहानी के ढाँचे को कथानक अथवा कथावस्तु कहा जाता है। प्रत्येक कहानी के लिये कथावस्तु का होना अनिवार्य है क्योंकि इसके अभाव में कहानी की रचना की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कथानक के चार अंग माने जाते हैं - आरम्भ, आरोह, चरम स्थिति एवं अवरोह।
  • 'आरम्भ' में कहानीकार कहानी के शीर्षक तथा प्रारमंभिक अनुच्छेदों के द्वारा पाठक को कथासूत्र से अवगत कराता है जिससे कि वह कहानी के प्रति आकर्षित होकर उसमें रमने लगे। सफल आरम्भ वह होता है जिसमें कि कहानी शुरू करते ही पाठका का मन कुतूहल और जिज्ञासा से भर जाये।
  • कहानी के विकास की अवस्था को कहानी का 'आरोह' कहते हैं। आरोह में कहानीकार घटनाक्रम को सहज रूप में प्रस्तुत करता है और पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं का उद्‍घाटन करता है।
  • जब कहानी पढ़ते-पढ़ते पाठक कौतूहल की पराकाष्ठा में पहुँच जाये तो उसे कहानी की 'चरम स्थिति' कहते हैं।
  • पाठक को जब कहानी के उद्‍देश्य का प्रतिफल प्राप्त होता है उसे कहानी का 'अवरोह' अथवा 'अंत' कहते हैं। कहानी के अवरोह में संक्षिप्तता तथा मार्मिकता पर अधिक जोर दिया जाता है।
पात्र अथवा चरित्र-चित्रण: कहानी का संचालन उसके पात्रों के द्वारा ही होता है तथा पात्रों के गुण-दोष को उनका 'चरित्र चित्रण' कहा जाता है। जब पात्रों का चरित्र चित्रण कहानीकार के द्वारा किया जाता है तो उसे 'प्रत्यक्ष' चरित्र चित्रण कहते हैं और जब पात्रों का चरित्र चित्रण संवादों के द्वारा होता है तो उसे 'अप्रत्यक्ष' अथवा 'परोक्ष चरित्र' चित्रण कहा जाता है। परोक्ष चरित्र चित्रण को अधिक उपयुक्‍त माना जाता है।

कथोपकथन अथवा संवाद: कहानी के पात्रों के द्वारा किये गये उनके विचारों की अभिव्यक्‍ति को संवाद अथवा कथोपकथन कहते हैं। संवाद के द्वारा पात्रों के मानसिक अन्तर्द्वन्द एवं अन्य मनोभावों को प्रकट किया जाता है।

देशकाल अथवा वातावरण: कहानी में वास्तविकता का पुट देने के लिये देशकाल अथवा वातावरण का प्रयोग किया जाता है। यदि किसी कहानी में शाहजहाँ और मुमताज महल को आधुनिक कार में घूमते हुये बताया जाता है तो उसे हास्यास्पद ही माना जायेगा।

भाषा-शैली: कहानीकार के द्वारा कहानी के प्रस्तुतीकरण के ढंग को उसकी भाषा शैली कहा जाता है। प्रायः अलग-अलग कहानीकारों की भाषा-शैली भी अलग-अलग होती है।

उद्देश्य: कहानी केवल मनोरंजन के लिये ही नहीं होती, उसे एक निश्‍चित उद्देश्य लेकर लिखा जाता है।

Saturday, November 27, 2010

फोकट में पाइस अउ मरत ले खाइस

छत्तीसगढ़ी में एक लोकोक्ति है "फोकट में पाइस अउ मरत ले खाइस" जिसका अर्थ है मुफ्त में खाने को मिला तो इतना खाया कि प्राण ही निकल गए। इस लोकोक्ति से यही सन्देश मिलता है कि अधिक लालच प्राणघाती होता है। इसीलिए तो कबीरदास जी ने भी कहा हैः

माखी गुड़ में गड़ि रहै पंख रह्यौ लिपटाय।
हाथ मलै और सिर धुनै लालच बुरी बलाय॥


लालच अर्थात् लोभ व्यक्ति को हमेशा नुकसान ही पहुँचाता है। छत्तीसगढ़ी के एक अन्य लोकोक्ति में कहा गया है - "लोभिया ला लबरा ठगे" जिसका अर्थ है "लोभी व्यक्ति को झूठा आदमी ठग लेता है"।

वास्तविकता तो यह है कि संसार का प्रत्येक व्यक्ति लोभी या लालची होता है, लालच या लोभ प्राणीमात्र की स्वाभाविक मानसिकता है। चारे की लालच में मछली बंशी में फँस कर जान गवाँ देती है, पक्षी जाल में फँस जाते हैं, वन्य पशु भी मनुष्य की गिरफ्त में आ जाते हैं। मछली, पक्षी, वन्य पशुओं आदि के लालच का फायदा मनुष्य उठाता है चारे की लालच देकर।

मनुष्य न केवल अन्य प्राणियों के बल्कि मनुष्यों के भी लालच की मानसिकता का फायदा उठाता है चारे के रूप में "फोकट" या "मुफ्त" शब्द का इस्तेमाल करके। वास्तव में "फ्री", "मुफ्त", "फोकट" जैसे शब्द अचूक हथियार हैं लोगों के भीतर की लालच को उभारने के लिए। ये शब्द लोगों को बरबस ही आकर्षित कर लेते हैं। मुफ्त में मिलने वाली चीज को छोड़ देना कोई भी पसंद नहीं करता। वो कहते हैं ना “माले मुफ्त दिले बेरहम”। किन्तु इस मुफ्त पाने के चक्कर में हम लोगों को कितना लूटा जाता है यह बहुत कम लोगों को ही पता होगा।

बाजार में आप "दो साबुन खरीदने पर एक साबुन बिल्कुल मुफ्त!" जैसी स्कीम रोज ही देखते होंगे। और इस स्कीम को जान कर हम खुश हो जाते हैं यह सोचकर कि एक साबुन हमें मुफ्त मिल रहा है, परिणामस्वरूप हम एक के बजाय तीन साबुन खरीद लेते हैं। तीन साबुन की फिलहाल हमें कतइ जरूरत नहीं है फिर भी हम तीन साबुन खरीद लेते हैं। क्यों? सिर्फ लालच में आकर। किन्तु हमें यह पता होना चाहिए कि जिसने हमें दो साबुन की कीमत में तीन साबुन दिए हैं उसने घाटा खाने के लिए दुकान नहीं खोला है, उसने हमसे कुछ न कुछ कमाया ही है। उसने अपनी कमाई के लिए हमारी लालच की मानसिकता का लाभ उठाते हुए हमें बेवकूफ बनाया है।

कैसे बेवकूफ बनाया है उसने?

मान लीजिये एक साबुन की कीमत पन्द्रह रुपये हैं तो दो साबुन के दाम अर्थात् तीस रुपये में आपको तीन साबुन मिलते हैं। जरा सोचिये, साबुन बनाने वाली कम्पनी बेवकूफ तो है नहीं जो कि बिना किसी लाभ के साबुन बेचेगी। तीस रुपये में तीन साबुन बेचने पर भी उसे लाभ ही हो रहा है। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि एक साबुन का मूल्य मात्र दस रुपये हैं। तो इस हिसाब से कम्पनी को साबुन का दाम पन्द्रह रुपये से कम करके दस रुपये कर देना चाहिये। पर कम्पनी दाम कम न कर के आपको एक मुफ्त साबुन का लालच देती है और आप लालच में आकर एक साबुन के बदले तीन साबुन खरीद लेते हैं जबकि दो अतिरिक्त खरीदे गये साबुनों की आपको फिलहाल बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। यदि कम्पनी ने दाम कम कर दिया होता तो आप दस रुपये में एक ही साबुन खरीदते और बाकी बीस रुपये का कहीं और सदुपयोग करते। इस तरह से दाम न घटाने का कम्पनी को एक और फायदा होता है वह यह कि यदि आप केवल एक साबुन खरीदेंगे तो आपको पन्द्रह रुपये देने पड़ेंगे। इस प्रकार से सिर्फ एक साबुन खरीदने पर मुनाफाखोर कम्पनी आपके पाँच रुपये जबरन लूट लेगी। बताइये यह व्यापार है या लूट?

भाई मेरे, यदि साबुन बिल्कुल मुफ्त है तो मुफ्त में दो ना, चाहे कोई दो साबुन खरीदे या ना खरीदे। ये दो साबुन खरीदने की शर्त क्यों रखते हो?

विडम्बना तो यह है कि अपनी गाढ़ी कमाई की रकम को लुटाने के लिये हम सभी मजबूर हैं क्योंकि सरकार ऐसे मामलों अनदेखा करती रहती है। इन कम्पनियों से सभी राजनीतिक दलों को मोटी रकम जो मिलती है चन्दे के रूप में।


सच बात तो यह है कि फ्री या मुफ्त में कोई किसी को कुछ भी नहीं देता। किसी जमाने में पानी मुफ्त मिला करता था पर आज तो उसके भी दाम देने पड़ते हैं।

यदि कोई कुछ भी चीज मुफ्त में देता है तो अवश्य ही उसका स्वार्थ रहता है उसमें।

Friday, November 26, 2010

गद्य की विधाएँ - निबन्ध

"निबन्ध" शब्द का मूल है "बन्ध", निबन्ध का अर्थ होता है बाँधना। किसी विषयवस्तु से सम्बन्धित ज्ञान को क्रमबद्ध रूप से बाँधते हुए लेखन को निबन्ध कहा जाता है। बाबू गुलाबराय ने निबन्ध को इस प्रकार से परिभाषित किया है -

एक सीमित आकार के भीतर किसी विषय या वर्णन या प्रतिपादन एक विशेष निजीपन, स्वच्छन्दता, सौष्ठव, सजीवता तथा सम्बद्धता के साथ किया जाना ही निबन्ध कहलाता है।

निबन्ध के निम्न मुख्य भेद होते हैं -
  • विचारात्मक
  • वर्णनात्मक
  • विवराणात्मक
  • भावात्मक
विचारात्मक निबन्ध - जब निबन्ध में किसी विषयवस्तु का तर्कपूर्ण विवेचन, विश्लेषण तथा खोज किया जाए तो उसे विचारात्मक निबन्ध कहा जाता है। विचारात्मक निबन्ध में बुद्धितत्व की प्रधानता होती है और इनमें लेखक के चिन्तन, मनन, अध्ययन, मान्यताओं तथा धारणाओं का प्रभाव स्पष्टतः दिखाई पड़ता है।

वर्णनात्मक निबन्ध - जब किसी निबन्ध में किसी वस्तु, स्थान, व्यक्ति, दृश्य आदि का निरीक्षण के आधार पर रोचक तथा आकर्षक वर्णन किया जाए तो उसे वर्णनात्मक निबन्ध कहा जाता है।

विवरणात्मक निबन्ध - जब किसी निबन्ध में ऐतिहासि तथा सामाजिक घटनाओं, स्थानों, दृश्यों आदि का रोचक तथा आकर्षक विवरण दिया जाए तो उसे विवरणात्मक निबन्ध कहा जाता है।

भावात्मक निबन्ध - जब किसी निबन्ध में हृदय में उत्पन्न होने वाले भावों तथा रागों को दर्शाया जाए तो उसे भावात्मक निबन्ध कहा जाता है। ऐसे निबन्धों की भाषा सरल, मधुर, ललित तथा संगीतमय होती है और ये निबन्ध कवित्वपूर्ण तथा प्रवाहमय प्रतीत होते हैं।

Thursday, November 25, 2010

1947 मे काश्मीर के महाराजा हरी सिंह के द्वारा पाक आक्रमण के सन्दर्भ में स्वतन्त्र भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन को लिखे गए पत्र का हिन्दी भावानुवाद

जिस समय भारत का विभाजन होकर पाकिस्तान का निर्माण हुआ तभी से ही पाकिस्तान की नीयत काश्मीर को हड़पने की थी और इसके लिए उस देश ने काश्मीर, जिसका विलय उस समय तक भारत में नहीं हुआ था, में छद्मरूप में अपने सैनिकों को भेजना शुरू कर दिया था। एक छोटा राज्य होने के कारण काश्मीर के राजा हरी सिंह के पास पाकिस्तान की सेना से निबटने का सामर्थ्य नहीं था अतः उन्होंने भारत सरकार को पत्र लिखकर सहायता का अनुरोध किया था। प्रस्तुत है अंग्रेजी में लिखे गए उसी पत्र का हिन्दी भावानुवादः
प्रिय लॉर्ड माउंटबेटन,

महामहिम को सूचित करना पड़ रहा है कि मेरे राज्य में एक गम्भीर आपात उत्पन्न हो गई है और मैं आपकी सरकार से तत्काल सहायता हेतु अनुरोध कर रहा हूँ। जैसा कि महामहिम को विदित है, जम्मू और काश्मीर राज्य ने भारत या पाकिस्तान में से किसी में भी अपना विलय स्वीकार नहीं किया है। भौगोलिक रूप से मेरा राज्य दोनों ही देशों को स्पर्श करता है। इसके अलावा, मेरे राज्य की सीमाएँ सोवियत सोशलिस्ट गणराज्यों के संघ (Union of Soviet Socialist Republics) तथा चीन की सीमाओं को भी छूती हैं। भारत और पाकिस्तान दोनों ही अपने वैदेशिक सम्बन्धों के अन्तर्गत इस सत्य की उपेक्षा नहीं कर सकते। यह तय करने के लिए कि मेरे राज्य का विलय भारत में हो या पाकिस्तान पाकिस्तान में या दोनों ही देशों से मित्रतापूर्ण सम्बन्ध बनाए रखते हुए मेरे देश स्वतन्त्र रहे, मैं समय लेना चाहता था। तदनुसार मैंने, मेरे राज्य के साथ ठहराव वाले समझौता हेतु, भारत और पाकिस्तान से सम्पर्क किया। पाकिस्तान की सरकार ने इस समझौते को स्वीकार किया। भारत सरकार इस सन्दर्भ में मेरे राज्य के प्रतिनिधि से आगे और भी बातचीत करना चाहती है। नीचे दर्शाए घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए मैं इसकी (भारत सरकार से आगे बातचीत करने की) व्यवस्था नहीं कर पाया। वास्तविकता यह है कि इस समझौते के अन्तर्गत पाकिस्तान सरकार मेरे राज्य के डाक-तार प्रणाली का परिचालन कर रही है। यद्यपि हमारा पाकिस्तान सरकार के साथ समझौता है, पाकिस्तान सरकार ने मेरे राज्य में भोज्य पदार्थ, नमक और पेट्रोल जैसी वस्तुओं की आपूर्ति के लिए एक सतत बढ़ते क्रम में गला घोंटने वाली स्वीकृति प्रदान की है।

आधुनिक हथियारों से सुसज्जित आफरीदी, सादे वस्त्र वाले सैनिक और आतताइयों को मेरे राज्य में घुसपैठ करने दिया जा रहा है, पहले पूंछ में फिर सियालकोट में और अन्त में रामकोट की ओर हजारा जिले से लगे एक बहुत बड़े क्षेत्र में घुसपैठ की गई। इसका परिणाम यह हुआ कि राज्य की सीमित संख्या की सैनिक टुकड़ियों को अनेक बिन्दुओं पर स्थित शत्रुओं का एक साथ सामना करने हेतु तितर-बितर हो जाना पड़ा और जीवन तथा संपत्ति के प्रचण्ड विनाश को रोकना दुःसाध्य हो गया, इसके अलावा महुरा पॉवर हाउस, जहाँ से सम्पूर्ण श्रीनगर को विद्युत प्रदाय होती है, को लूटकर जला डाला गया। अपहृत तथा बलात्कार की गई औरतों की संख्या ने मेरे हृदय को विदीर्ण कर दिया है। क्रूर सैनिकों की टुकड़ियाँ श्रीनगर, जो कि मेरे राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी है, पर अधिकार करने के उद्देश्य से राज्य के अनेक स्थानों पर कवायद कर रही हैं। उत्तर-पश्चिम सीमान्त प्रान्त के सुदूर क्षेत्रों से मनवेरा-मजफ्फराबाद मार्ग से मोटरट्रकों में भर-भर कर आने वालों हथियारों से लैस आदिवासियों के द्वारा सामूहिक घुसपैठ करना नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रान्त और पाकिस्तान सरकार की जानकारी में आए बिना सम्भव नहीं है। मेरे सरकार के द्वारा बारम्बार अनुरोध करने के बावजूद भी इन हमलावरों को रोकने या मेरे राज्य में घुसपैठ न करने देने के लिए किसी भी प्रकार का प्रयास नहीं किया गया है। सच्चाई यह है कि पाकिस्तान के रेडिओ और प्रेसे दोनों को ही इन घटनाओं की सूचना है। पाकिस्तान रेडियो ने यह कहानी गढ़ ली है कि एक अस्थायी सरकार कश्मीर में स्थापित किया गया है। मेरे राज्य के मुस्लिम और गैर-मुस्लिम लोगों का इन घटनाओं में सामान्यतः किसी भी प्रकार से सम्मिलित नहीं है। मेरे राज्य की वर्तमान स्थिति और आपात् अवस्था को ध्यान में रखते हुए मेरे पास भारत सरकार से सहायता प्राप्त करने के अलावा और कोई भी विकल्प नहीं रह गया है। स्वाभाविक है कि मेरे द्वारा अपने राज्य का भारत में विलय स्वीकार किए बगैर भारत सरकार मेरी सहायता नहीं कर सकती। अतः मैंने तदनुसार अपने राज्य का भारत में विलय स्वीकार करने का निश्चय कर लिया है और सम्बन्धित दस्तावेज आपकी सरकार की स्वीकृति हेतु इस पत्र के साथ नत्थी कर रहा हूँ। दूसरा विकल्प अपने राज्य एवं प्रजा को पदाक्रान्तित करने वालों को सौंपना ही होगा। इस आधार पर कोई सभ्य सरकार जीवित नहीं रह सकती है या अपना अस्तित्व बनाए रख सकती है।

जब तक मैं इस राज्य का शासक हूँ और जब तक मेरे प्राणों में प्राण हैं, मैं इस दूसरे विकल्प को कदापि स्वीकार नहीं कर सकता। मैं आपके महाहिम के सरकार को सूचित करना चाहता हूँ कि मेरा इरादा तत्काल एक अन्तरिम सरकार की स्थापना करने का तथा इस आपात् काल में उसकी जिम्मेदारियों को मेरे प्रधानमन्त्री के साथ मिलकर निबाहने के लिए शेख अब्दुला को निमन्त्रित करने का है। श्री वी.पी. मेनन स्थिति की गम्भीरता से पूर्णतः भिज्ञ हैं और, इस विषय में यदि आपको आवश्यकता हो तो, किसी भी प्रकार की स्पष्टीकरण दे सकते हैं।

शीघ्रता में तथा कृपालु सम्बन्धों सहित,

भवदीय

हरी सिंह
26 अक्टूबर, 1947
मूल अंग्रेजी पत्रः
My dear Lord Mountbatten,

I have to inform Your Excellency that a grave emergency has arisen in my State and request the immediate assistance of your Government. As Your Excellency is aware,the State of Jammu and Kashmir has not acceded to either the Dominion of India or Pakistan. Geographically my State is contiguous wit h both of them. Besides, my State has a common boundary with the Union of Soviet Socialist Republics and with China. In their external relations the Dominion of India and Pakistan cannot ignore this fact. I wanted to take time to decide to which Dominion I should accede or whether it is not in the best interests of both the Dominions and of my State to stand independent, of course with friendly and cordial relations with both. I accordingly approached the Dominions of India and Pakistan to enter into standstill agreement with my State. The Pakistan Government accepted this arrangement. The Dominion of India desired further discussion with representatives of my Government. I could not arrange this in view of the developments indicated below. ln fact the Pakistan Goernment under the standstill agreement is operating the post and telegraph system inside the State. Though we have got a standstill agreement with the Pakistan Government, lhe Govemment permitted a steady and increasing strangulation of supplies like food, salt and petrol to my State.

Afridis, soldiers in plain clothes, and desperadoes wnh modern weapons have been allowed to infiltrate into the State, at first in the Poonch area, then from Sia1kot and finally in a mass in the area adjoining-Hazara district on the Ramkote side. The result has been that the limited number of troops at the disposal of the State had to be dispersed and thus had to face the enemy at several points simultaneously, so that it has become difficult to stop the wanton destruction of life ad property and the looting of the Mahura power house, which supplies electric current to the whole of Srinagar and which has been burnt. The number of women who have been kidnpped and raped makes my heart bleed. The wild forces thus let loose on the State are marching on with the aim of capturing Srinagar, the summer capital of my government, as a first step to overrunning the whole State.The mass infiltration of tribesman drawn from distant areas of the North-West Frontier Province, coming regularly in motortrucks, using the Manwehra-Mazaffarabad road and fully armed with up-to-date weapons, cannot possibly be done without the knowledge of the Provincial Govemment of the North-West Frontier Province and the Government of Pakistan. Inspite of repeated appeals made by my Government no attempt has been made to check these raiders or to stop them from coming into my State. In fact, both radio and the Press of Pakistan have reported these occurences. The Pakistan radio even put out the story that a provisional government has been set up in Kashmir. The people of my State, both Muslims and non-Muslims, generally have taken no part at all.

With the conditions obtaining at present in my State and the great emergency of the situation as it exists, I have no option but to ask for help from the Indian Dominion. Naturally they cannot send the help asked for by me without my State acceding to the Dominion of India. I have accordingly decided to do so, and I attach the instrument of accession for acceptance by your Government. The other alternative is to leave my state and people to free booters. On this basis no civilised government can exist or be maintained.

This alternative I will never allow to happen so long as I am the ruler of the State and I have life to defend my country. I may also inform your Excellency's Government that it is my intention at once to set up an interim government and to ask Sheikh Abdullah to carry the responsibilities in this emergency with my Prime Minister.

If my State is to be saved, immediate assistance must be available at Srinagar. Mr. V.P. Menon is fully aware of the gravity of the situation and will explain it to you, if further explanation is needed.

In haste and with kindest regards,

Yours sincerely,

Hari Singh
October 26, 1947
महाराजा हरी सिंह के पत्र का लॉर्ड माउण्टबेटन के द्वारा जवाब का भावानुवादः
प्रिय राजा साहब,

आपका राजकीय पत्र दिनांक 26 अक्टूबर 1947 मुझे श्री वी.पी. मेनन के द्वारा सौंपा गया। राजकीय पत्र में उल्लेखित परिस्थियों को ध्यान में रखते हुए मेरे सरकार ने कश्मीर राज्य के भारत में विलय को स्वीकार करने का फैसला किया है। इस नीति के तहत कि यदि किसी राज्य के विलय में किसी प्रकार का विवाद हो तो उस विवाद का हल उस राज्य की जनता की इच्छानुसार तय किया जाना चाहिए, मेरी सरकार की इच्छा है कि जैसे ही कश्मीर में कानून और व्यवस्था फिर से बहाल होगी तथा उसकी भूमि आक्रमणकारियों से मुक्त हो जाएगी, जनता की मतानुसार ही कश्मीर के विलय को मंजूरी दी जाएगी।

इस बीच, सैन्य सहायता हेतु आपके राजकीय अनुरोध के जवाब में, आज कार्यवाही की गई है और आपकि सेना की सहायता तथा आपके राज्य तथा जनता के सम्मान, सम्पत्ति तथा जीवन की सुरक्षा हेतु काश्मीर में भारतीय सैनिक भेजे जा रहे हैं। एक अन्तरिम सरकार के गठन तथा उसकी जिम्मेदारियों को आपके प्रधानमन्त्री के साथ मिलकर वहन करने के लिए शेख अब्दुल्ला को आमन्त्रित करने के आपके निर्णय से मेरी सरकार तथा मैं सन्तुष्ट हैं।

बर्मा का माउण्टबेटन
27 अक्टूबर 1947
मूल अंग्रेजी पत्रः
My dear Maharaja Sahib,

Your Highness' letter dated 26 October 1947 has been delivered to me by Mr. V.P. Menon. In the circumstances mentioned by Your Highness, my Government have decided to accept the accession of Kashmir State to the Dominion of India. In consistence with their policy that in the case of any State where the issue of accession has been the subject of dispute, the question of accession should be decided in accordance with the wishes of the people of the State, it is my Government's wish that, as soon as law and order have been restored in Kashmir and its soil cleared of the invader, the question of the State's accession should be settled by a reference to the people.

Meanwhile, in response to Your Highness' appeal for military aid, action has been taken today to send troops of the Indian Army to Kashmir, to help your own forces to defend your territory and to protect the lives, property, and honour of your people. My Government and I note with satisfaction that Your Highness has decided to invite Sheikh Abdullah to form an interim Government to work with your Prime Minister.

Mountbatten of Burma
October 27, 1947
काश्मीर में भारतीय सैन्य सहायता पहुँचने तक पाकिस्तान ने काश्मीर राज्य के एक बहुत बड़े भाग को हड़प लिया था जो कि आज आजाद काश्मीर के नाम से जाना जाता है। काश्मीर का भारत में विलय स्वीकार हो जाने पर क्या भारत सरकार को पाकिस्तान द्वारा हड़पे गए काश्मीर के उस भाग को वापस प्राप्त नहीं करना चाहिए था? आज भी जब पाकिस्तान काश्मीर का राग अलापता है तो भारत सरकार को आजाद काश्मीर के विवाद को सामने नहीं लाना चाहिए? क्या काश्मीर के महाराजा हरीसिंह ने सम्पूर्ण काश्मीर का भारत में विलय नहीं चाहा था?

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(मूल अंग्रेजी पत्रों का, जो कि http://www.kashmir-information.com/LegalDocs/Maharaja_letter.html से साभार लिए गए हैं, हिन्दी भावानुवाद मैंने अपनी बुद्धि और समझ के अनुसार किया है, यदि इसमें आपको त्रुटि का आभास हो तो कृपया आप अपने अनुसार सुधार कर पढ़ें।)

Wednesday, November 24, 2010

महानता का पैमाना

कौन महान है और कौन महान नहीं है और यदि कोई महान है तो कितना महान है जैसी बातों को जानने का एक पैमाना होता है जिसका मूल्य न केवल समय-काल-परिस्थितियों के अनुसार बल्कि महान व्यक्ति के कार्य के प्रकार के अनुसार बदलता रहता है। कभी राजा हरिश्चन्द्र के द्वारा अपने राज्य को विश्वामित्र को दे देना और श्मशान के डोम के यहाँ नौकरी कर लेने को महान कार्य माना जाता था किन्तु आज यदि कोई इसी जैसा कार्य करे तो उस कार्य को मूर्खता ही माना जाएगा।

एक जमाना था में मनुष्य के द्वारा किया सफल कार्य उसे महान बना देता था। जब बाबू देवकीनन्दन खत्री ने "चन्द्रकान्ता" उपन्यास का लेखन आरम्भ किया होगा तो क्या उन्हें पता रहा होगा कि उनका वह उपन्यास इतना लोकप्रिय होगा कि उसे पढ़ने के लिये लाखों लोग हिन्दी सीखने के लिए विवश हो जाएँगे? मुंशी प्रेमचंद ने कभी कल्पना भी नहीं की रही होगी कि उनकी कहानियाँ और उपन्यास उन्हें "कथा सम्राट" तथा "उपन्यास सम्राट" बना कर उन्हें चिरकाल के लिए अमर बना देंगे। चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी ने "उसने कहा था" लिखते समय क्या सोचा भी न रहा होगा कि उनकी इस कहानी का अनुवाद संसार के समस्त प्रमुख भाषाओं में हो जाएगी? किन्तु इन महानुभावों की कृतियों की सफलता ने उन्हें इतिहासपुरुष तथा महान बना दिया। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी काल में व्यक्ति कार्य कार्य करता था और कार्य सफल हो जाने पर उसका कार्य उस व्यक्ति को महान बना देता था।

पर आज के जमाने में आदमी को पहले महान बनना पड़ता है क्योंकि आज सफल कार्य व्यक्ति को महान नहीं बनाता वरन महान व्यक्ति के द्वारा किया गए कार्य को सफल होना ही पड़ता है। इसलिये आजकर सफल करने के बजाय महान बनने के लिये उद्योग करना ही उचित है क्यों जमाने के अनुसार चलने में ही भलाई है। कहा भी गया है - जैसी बहे बयार पीठ तैसी कर लीजे!

Tuesday, November 23, 2010

अलग-अलग भाषाओं में रामायण

तुलसीदास ने लिखा है ‘रामायण सतकोटि अपारा’!

अलग-अलग भाषाओं में कुछ रामायण हैं -

अध्यात्म रामायण - संस्कृत
वाल्मीकि कृत रामायण - संस्कृत
आनन्द रामायण - संस्कृत
अद्भुत रामायण -
रामचरितमानस - हिन्दी
सुन्दरानन्द रामायण तथा आदर्श राघव - नेपाली
कथा रामायण - आसामी
कृत्तिवास रामायण - बंगाली
जगमोहन रामायण - उड़िया
राम बालकिया - गुजराती
रामावतार - पंजाबी
रामावतार चरित - काश्मीरी
कम्ब रामायण - तमिल
रामचरितम् - मलयालम
रंगनाथ रामायण - तेलुगु
रघुनाथ रामायणम् - तेलुगु
कुमुदेन्दु रामायण - कन्नड़
तोरवे रामायण - कन्नड़

Monday, November 22, 2010

जिन्दगी से हारा आदमी कभी सफल नहीं बन सकता

संसार में प्रत्येक व्यक्ति अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक अपनी जिन्दगी से सतत् संघर्ष करते रहता है और इस संघर्ष में प्रायः जिन्दगी ही जीतते रहती है। जो जिन्दगी से जीतने की क्षमता रखते हैं वे सफलता की ऊँचाई में पहुँच जाते हैं और जो हारते हैं वे नीचे ही रह जाते हैं। जिन्दगी से संघर्ष में जीत और हार मानव समाज को दो हिस्सों में बाँट देती है, ये बँटवारा हैः

जीतने वालों का और हारने वालों का!

ऊपर वालों का और नीचे वालों का!


और यह भी तय है कि अगर आप ऊपर नहीं है तो इसका मतलब है आप नीचे हैं। आप जिन्दगी की लड़ाई हारे हुए हैं। जिन्दगी के क्रिकेट में या तो जीत होती है या हार, जिन्दगी के क्रिकेट में ड्रा नहीं होता।

जिन्दगी से हारा हुआ आदमी कभी भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता, कभी भी ऊँचाई पर नहीं पहुँच सकता।

हो सकता है कि आप भी जिन्दगी की लड़ाई हारे हुए हों। आप सफलता चाहते हैं किन्तु आपको सफलता मिलती नहीं। आप ऊपर न होकर नीचे हों। आप जिन्दगी की दौड़ में आगे न होकर पीछे हों।

किन्तु चिन्ता करने और निराश होने की कोई जरूरत नहीं है। आप जिन्दगी की लड़ाई जीत सकते हैं। आप नीचे से ऊपर पहुँच सकते हैं। याद रखिए कि नीचे दुनिया भर की भीड़ होती है किन्तु ऊपर हमेशा जगह खाली रहती है, आपके लिए भी ऊपर एक जगह है जो आपकी प्रतीक्षा कर रही है।

वास्तव में जिन्दगी की लड़ाई जीतना एक कला है। आपको यह कला सीखनी होगी।

क्या करना होगा आपको इस कला को सीखने के लिए?

सबसे पहले तो आपको इस प्रश्न का उत्तर खोजना होगा किः

जिन्दगी की लड़ाई में सफलता प्राप्त कर ऊपर चले जाने वाले लोग आखिर इस लड़ाई को जीत कैसे लेते हैं और आप इस लड़ाई में हार क्यों जाते हैं?


इस प्रश्न का सीधा सा उत्तर है कि जो लोग जिन्दगी की लड़ाई जीतते हैं वे आत्मविश्वास से भरे होते हैं और आपमें आत्मविश्वास की कमी होती है। रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातें बता देती हैं कि आपमें कितना आत्मविश्वास है। जरा याद करके बताइए कि क्या आप दूसरों से आँखों में आँखें डाल कर बात करते हैं? आप किसी से अकड़कर सख्ती के साथ हाथ मिलाते हैं या मरियल सा होकर?

आत्मविश्वास की इस कमी के कारण आप निराशावादी हो जाते हैं। आप को स्वयं के ऊपर भरोसा नहीं रह पाता। याद रखिए कि इस संसार में आपको यदि कोई व्यक्ति सफलता दिला सकता है तो वह व्यक्ति आप और केवल आप ही हैं। और यदि आपको खुद पर भरोसा न हो तो आप अपने आप को कभी सफलता नहीं दिला सकते। सफलता पाने के लिए स्वयं पर भरोसा करना अनिवार्य है और कोई व्यक्ति खुद पर भरोसा तभी कर सकता है जब उसके भीतर भरपूर आत्मविश्वास हो।

इस बात को कभी भी न भूलें कि कोई दूसरा व्यक्ति आपको सफलता कभी दिला ही नहीं सकता क्योंकि जिस सफलता को आप प्राप्त करना चाहते हैं, उसी सफलता को वह दूसरा व्यक्ति भी प्राप्त करना चाहता है। फिर क्यों वह आपको सफलता दिलाएगा? वह तो आपका प्रतिद्वन्द्वी है। सच पूछा जाए तो सफलता प्राप्त करने के मामले में संसार का प्रत्येक व्यक्ति आपका प्रतिद्वन्द्वी है और आपको उन सभी से द्वन्द्व करते हुए, उन्हें हरा कर, आगे बढ़ते जाना है।

और विश्वास मानिए कि आप स्वयं में भरपूर आत्मविश्वास पैदा कर सकते हैं। इसके लिए आपको अभ्यास की आवश्यकता है। वृन्द कवि ने कहा हैः

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान॥


जब एक कमजोर रस्सी पत्थर पर निशान बना सकती है तो आप भला क्यों जिन्दगी की लड़ाई नहीं जीत सकते?

तो बिना एक पल की देर किए जुट जाइए जिन्दगी की लड़ाई जीतने के कार्य में। आप जीतेंगे तो आपका परिवार जीतेगा, आपका समाज जीतेगा, आपका देश जीतेगा!

Sunday, November 21, 2010

भारत में प्रथम महिला (First Woman in India)

  • राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष - एनी बेसेंट
  • प्रधानमन्त्री - श्रीमती इन्दिरा गांधी
  • राष्ट्रपति - श्रीमती प्रतिभा पाटिल
  • राज्यपाल - श्रीमती सरोजनी नायडू
  • लोकसभा अध्यक्ष - मीरा कुमार
  • राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने वाली - कैप्टन लक्ष्मी सहगल
  • मुख्यमन्त्री - श्रीमती सुचेता कृपलानी
  • केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल में मन्त्री - राजकुमारी अमृत कौर
  • सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश - न्यायमूर्ति मीरा साहिब फातिमा बीबी
  • उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश - न्यायमूर्ति लीला सेठ
  • आई.ए.एस. - अन्ना जार्ज (मल्होत्रा)
  • आई.पी.एस - किरण बेदी
  • पायलट - फ्लाइंग आफीसर सुषमा मुखोपाध्याय
  • माउंट एवरेस्ट विजेता पर्वतारोही - सुश्री बछेन्द्री पाल
  • इंग्लिश चैनल को पार करने वाली - आरती साहा
  • उत्तरी ध्रुव पर पहुँचने वाली - प्रीति सेनगुप्ता
  • अन्टार्टिका पहुँचने वाली - मेहर मूसा
  • नोबल पुरस्कार विजेता - मदर टेरेसा (शान्ति हेतु)
  • भारत रत्न पुरस्कार प्राप्त करने वाली - श्रीमती इन्दिरा गांधी
  • साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने वाली - अमृता प्रीतम

Saturday, November 20, 2010

ब्लोग और टिप्पणियाँ

ब्लोग टिप्पणियों पर बहस न केवल हिन्दी ब्लोगर्स के बीच होता है बल्कि अंग्रेजी ब्लोगर्स भी इस विषय पर बहस करते हैं, उदाहरण के लिए आप इस अंग्रेजी पोस्ट को देख सकते हैं - A New Debate on Blog Comments is Brewing

अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लोगर सेठ गॉडिन के ब्लोग में टिप्पणी करने का प्रावधान बंद रहता है जबकि उनके पाठक उनसे टिप्पणी बॉक्स खोलने का आग्रह करते रहते हैं। अपने पोस्ट Why I don't have comments में वे बताते हैं कि उन्हें टिप्पणियाँ क्यों नहीं चाहिए। उनका कहना है कि टिप्पणियों में उठाई गई आपत्तियाँ उन्हें विवश करती हैं कि वे उन आपत्तियों का जवाब दें जिसके लिए उनके पास समय नहीं है। साथ ही वे समझते हैं कि टिप्पणियों से प्रभावित होकर कहीं वे आम पाठकों के लिए लिखना छोड़ कर सिर्फ टिप्पणीकर्ताओं के लिए ही लिखना न शुरू कर बैठें।

अंग्रेजी का मशहूर ब्लोग एनगाडगेट (Engadget) एक और उदाहरण है जिसने अपने पाठकों के लिए टिप्पणियों का विकल्प बंद कर दिया। अपने पोस्ट We're turning comments off for a bit में वे कहते हैं पिछले कुछ दिनों से उन्हें एक बहुत बड़ी तादाद में टिप्पणियाँ मिल रही हैं जिनमें से अधिकतर उनके पाठकों की टिप्पणियाँ न होकर अन्य लोगों की होती हैं और उनमें उनके लोकप्रिय ब्लोग के लिए विरोधपूर्ण स्वर होते हैं।

ब्लोग में टिप्पणियों का विकल्प रखने का मुख्य उद्देश्य है ब्लोगर और उसके पाठकों के बीच सीधे संवाद स्थापित करके ब्लोग को सामाजिक रूप से अधिक से अधिक शक्तिशाली तथा उपयोगी बनाना। पोस्ट के जरिए की गई ब्लोगर की अभिव्यक्ति के प्रतिक्रियास्वरूप पाठकों के मस्तिष्क में जो विचार आते हैं, उन विचारों से ब्लोगर को अवगत कराने की सुविधा पाठकों को उपलब्ध कराना ही टिप्पणी विकल्प का कार्य होता है।

किन्तु, जैसा कि आप जानते ही हैं कि, लोग किसी भी अच्छे उद्देश्य के लिए बनाई गई चीज का दुरुपयोग करने के रास्ते निकाल ही लेते हैं। ब्लोग टिप्पणी विकल्प के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। टिप्पणियों के माध्यम से कोई किसी ब्लोगर से अपना विरोध जताता है तो कोई किसी ब्लोगर या स्वयं को लोकप्रिय बनाने के लिए टिप्पणियों का प्रयोग करता है।

कितना अच्छा हो यदि लोग टिप्पणियों का प्रयोग अपना तुच्छ स्वार्थ सिद्ध करने के लिए न करके केवल सामाजिक उन्नति के लिए ही करें।

Friday, November 19, 2010

कुछ काम की बातें... यदि आपको पसंद आए तो

नीचे कुछ बातें, जिन्हें विभिन्न स्थानों से संकलित किया गया है, दी जा रही हैं जो शायद आपको पसंद आएँ -

दूसरों के प्रति स्वयं का व्यवहार
  • दूसरों को अपमानित न करें और न ही कभी दूसरों की शिकायत करें। याद रखें कि अपमान के बदले में अपमान ही मिलता है।
  • दूसरों में जो भी अच्छे गुण हैं उनकी ईमानदारी के साथ दिल खोल कर प्रशंसा करें। झूठी प्रशंसा कदापि न करें। यदि आप किसी की प्रशंसा नहीं कर सकते तो कम से कम दूसरों की निन्दा कभी भी न करें। किसी की निन्दा करके आपको कभी भी किसी प्रकार का लाभ नहीं मिल सकता उल्ट आप उसकी नजरों गिर सकते हैं।
  • अपने सद्भाव से सदैव दूसरों के मन में अपने प्रति तीव्र आकर्षण का भाव उत्पन्न करने का प्रयास करें।
सभी को पसंद आने वाला व्यक्तित्व
  • दूसरों में वास्तविक रुचि लें। यदि आप दूसरों में रुचि लेंगे तो दूसरे भी अवश्य ही आप में रुचि लेंगे। दूसरों को सच्ची मुस्कान प्रदान करें।
  • प्रत्येक व्यक्ति के लिये उसका नाम सर्वाधिक मधुर, प्रिय और महत्वपूर्ण होता है। यदि आप दूसरों का नाम बढ़ायेंगे तो वे भी आपका नाम अवश्य ही बढ़ायेंगे। व्यर्थ किसी को बदनाम करने का प्रयास कदापि न करें।
  • अच्छे श्रोता बनें और दूसरों को उनके विषय में बताने के लिये प्रोत्साहित करें।
  • दूसरों की रुचि को महत्व दें तथा उनकी रुचि की बातें करें। सिर्फ अपनी रुचि की बातें करने का स्वभाव त्याग दें।
  • दूसरों के महत्व को स्वीकारें तथा उनकी भावनाओं का आदर करें।
  • अपने सद्विचारों से दूसरों को जीतें।
  • तर्क का अंत नहीं होता। बहस करने की अपेक्षा बहस से बचना अधिक उपयुक्त है।
  • दूसरों की राय को सम्मान दें। 'आप गलत हैं' कभी भी न कहें।
  • यदि आप गलत हैं तो अपनी गलती को स्वीकारें।
  • सदैव मित्रतापूर्ण तरीके से पेश आयें।
  • दूसरों को अपनी बात रखने का पूर्ण अवसर दें।
  • दूसरों को अनुभव करने दें कि आपकी नजर में उनकी बातों का पूरा-पूरा महत्व है।
  • घटनाक्रम को दूसरों की दृष्टि से देखने का ईमानदारी से प्रयास करें।
  • दूसरों की इच्छाओं तथा विचारों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनायें।
  • दूसरों को चुनौती देने का प्रयास न करें।
अग्रणी बनें
  • बिना किसी नाराजगी के दूसरों में परिवर्तन लायें
  • दूसरों का सच्चा मूल्यांकन करें तथा उन्हें सच्ची प्रशंसा दें।
  • दूसरों की गलती को अप्रत्यक्ष रूप से बतायें।
  • आपकी निन्दा करने वाले के समक्ष अपनी गलतियों के विषय में बातें करें।
  • किसी को सीधे आदेश देने के बदले प्रश्नोत्तर तथा सुझाव वाले रास्ते का सहारा लें।
  • दूसरों के किये छोटे से छोटे काम की भी प्रशंसा करें।
  •  आपके अनुसार कार्य करने वालों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन करें।

Thursday, November 18, 2010

अज्ञात का भय

प्रायः रोज ही हमसे हमारे परिजन, परिचत तथा मित्र रोज ही सैकड़ों प्रकार के प्रश्न पूछते हैं और उन्हें उत्तर देकर या जवाब न मालूम होने पर बिना उत्तर दिए हम उन लोगों को सन्तुष्ट कर देते हैं। ऐसा करने में कभी भी हमें किसी प्रकार का भय नहीं होता। किन्तु यदि हमें किसी साक्षात्कार के लिए, जहाँ कि इसी प्रकार के सवाल ही पूछे जाने हैं, जाना पड़े तो भय होने लगता है। किसका भय होता है यह?

परिजनों और मित्रों से रोज ही कुछ न कुछ बोलते हैं किन्तु यदि हमें मंच में बुला कर माइक पकड़ा दिया जाए तो हम भय के कारण बोल नहीं पाते। किसका भय है यह?

हम लोगों में अधिकांश लोगों को इस प्रकार के भय होते ही रहते हैं। कुछ लोगों को तो किसी अपरिचित से बात करने में भी भय होता है। ऐसे भय को अज्ञात का भय कहा जाता है। "अज्ञात का भय" (Fear Of The Unknown) याने कि हमें यह ज्ञात ही नहीं है कि हम किससे डर रहे हैं।

प्रायः जब हमें किसी अनभिज्ञ व्यक्ति से मिलना होता है या किसी अनभिज्ञ माहौल से गुजरना होता है तो ही हमारे भीतर अज्ञात का भय उत्पन्न होता है। याने कि अज्ञात का भय वास्तव में हमारी अनभिज्ञता का भय होता है।

इस अज्ञात के भय का मूल कारण क्या है?

हमारे शरीर में एक निश्चित सुरक्षा केन्द्र होता है जो कि हमें विभिन्न खतरों की चेतावनी देता है। एक बच्चा ज्यों-ज्यों बड़ा होता है त्यों-त्यों उसे अपने माता-पिता तथा गुरुजनों की शिक्षा के द्वारा तथा अपने स्वयं के अनुभवों से जीवन के विभिन्न खतरों का ज्ञान होते जाता है तथा वे विभिन्न खतरे हमारे शरीर के सुरक्षा केन्द्र के डेटाबेस में संकलित होते जाते हैं। ये खतरे ही हमारे भीतर भय पैदा करते हैं। जब किसी बच्चे को भूत-प्रेत इत्यादि के विषय में उसके गुरुजन बताते हैं तो वह भूत-प्रेत आदि को खतरा समझने लगता है और यह खतरा उसके शरीर के भीतर का सुरक्षा केन्द्र डेटाबेस में चला जाता है। पाप और पुण्य का भय भी बचपन में मिली सीख का ही परिणाम होते हैं।

यहाँ पर यह कहना भी अनुपयुक्त नहीं होगा कि यह सुरक्षा केन्द्र प्रायः सभी प्राणियों के शरीर में पाया जाता है। आपने देखा होगा कि कुत्ता जब कुछ खाते रहता है तो उसका ध्यान खाने से अधिक इस बात पर रहता है कि कहीं कोई खतरा न आ जाए। अन्य प्राणियों तथा मनुष्य में अन्तर यह है कि अन्य प्राणी केवल अपने अनुभवों से ही खतरों के बारे में जानते हैं किन्तु मनुष्य को खतरों की जानकारी अपने अनुभव के साथ ही साथ गुरुजनों की सीख से भी मिलती है। यही कारण है कि मनुष्य को भूत-प्रेत जैसी अदृश्य और काल्पनिक चीजों का भी भय होता है जबकि अन्य प्राणियों में यह भय होता ही नहीं है।

अस्तु, हमारे शरीर का सुरक्षा केन्द्र जब कभी भी हमें किसी प्रकार के खतरे की चेतावनी देता है तो हम चिन्तित और किसी सीमा तक भयभीत हो जाते हैं।

यह अज्ञात का भय हमारे लिए अनावश्यक तो है ही, हमारे जीवन पद्धति के लिए हानिकर भी है। हानिकर इस प्रकार से है कि जब भी हम भयभीत होते हैं हमारे हृदय की धड़कन सामान्य से कई गुना अधिक हो जाती है, मुँह सूख जाता है, सही प्रकार से न बोलकर हकलाने लगते हैं यहाँ तक कि सही प्रकार से सोच भी नहीं सकते। ये सारे लक्षण हमें अस्वस्थ बनाते हैं।

इस अनावश्यक भय को खत्म कर देना ही बेहतर है अन्यथा यह हमारे जीवन पद्धति को अत्यन्त दुरूह बना सकती है। अज्ञात के इस भय को दूर करना कुछ मुश्किल तो है किन्तु असम्भव नहीं। यदि आप स्वयं में अधिक से अधिक आत्मविश्वास उत्पन्न कर लें तो यह भय अपने आप ही खत्म हो जाएगा।

भय की बात चली है तो यह बताना भी उचित होगा कि कुछ प्रकार के भय हमारे जीवन के लिए आवश्यक होते हैं और कुछ अनावश्यक। समाज में दण्ड का विधान रखने का उद्देश्य है भय उत्पन्न कर के मनुष्य को सामाजिक मर्यादाओं का पालन करवाना। पाप और पुण्य का भय हमें नैतिकता प्रदान करते हैं। ऐसे ही और भी अनेक भय हैं जो कि मनुष्य के कल्याण के लिए बनाए गए हैं।

Wednesday, November 17, 2010

देखें झाँसी की रानी फिल्म का एक दुर्लभ पोस्टर


यह झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का वास्तविक चित्र नहीं है बल्कि सन् 1953 में सोहराब मोदी द्वारा निर्मित तथा निर्देशित फिल्म "झाँसी की रानी" का पोस्टर है, जो कि राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय (National Film Archive of India), पूना में आज भी सुरक्षित है।

झाँसी की रानी का एक और चित्र जिसके विषय में पर्याप्त जानकारी प्राप्त नहीं है कि यह मूल चित्र है या किसी फिल्म का पोस्टरः

Tuesday, November 16, 2010

भारत - कुछ जानकारी

  • हिन्दी नाम - भारत
  • अंग्रेजी नाम - इण्डिया, इंडिया
  • राष्ट्रीयता - भारतीय
  • राष्ट्रध्वज में रंग - ऊपर में केसरिया, मध्य में सफेद, नीचे में हरा और सफेद रंग के बीच में बना 24 तीलियों (स्पोक्स) वाला नीले रंग का अशोक चक्र
  • राष्ट्रध्वज में लंबाई और चौड़ाई का अनुपात - 3:2
  • राष्ट्रीय चिह्न - सारनाथ (वाराणसी) स्थित अशोक के सिंह स्तम्भ की शीर्ष अनुकृति
  • राष्ट्रीय आदर्श वाक्य - सत्यमेव जयते (मुण्डकोपनिषद से उद्धृत सूत्र)
  • राष्ट्रगान - जन-गण-मण रचयिता रवीन्द्रनाथ टैगोर,
  • राष्ट्रगान के गायन में लगने वाला समय - लगभग सेकंड
  • राष्ट्रगीत - वन्दे मातरम बंकिमचन्द्र की रचना आनन्दमठ से उद्धृत
  • राष्ट्रीय पर्व - स्वतन्त्रता दिवस  अगस्त, गणतन्त्र दिवस  जनवरी, गांधी जयन्ती  अक्टूबर
  • सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार - भारत रत्न
  • अन्य राष्ट्रीय पुरस्कार - पद्मविभूषण, पद्मभूषण, पद्मश्री
  • राष्ट्रीय पशु - बाघ
  • राष्ट्रीय पक्षी - मयूर
  • राष्ट्रीय वृक्ष - वट वृक्ष बरगद
  • राष्ट्रीय फल - आम
  • राष्ट्रीय नदी - गंगा
  • राष्ट्रीय खेल - हॉकी
  • राष्ट्री अभिवादन - नमस्कार
  • राजभाषा - हिन्दी
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यदि पोस्ट पढ़ने में मजा आया हो तो इस प्रश्नावली को हल करने में भी अवश्य ही मजा आएगा -

सामान्य ज्ञान प्रश्नावली – 11 (General Knowledge Quiz in Hindi)

Monday, November 15, 2010

जब हमने मिठाई चोरी की

ऐसा शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिसने अपने जीवन में कभी भी किसी प्रकार की चोरी न की हो। भले ही वह चोरी अपने घर में ही की गई हो। बचपन में एक बार हमने भी अपने घर में चोरी की थी वह भी मिठाई की। यद्यपि हम उस समय चौथी या पाँचवीं कक्षा में पढ़ते थे किन्तु वह घटना आज भी हमें अच्छी प्रकार से याद है।

दिवाली के दिनों की बात है। बाबूजी के परिचित लोग दिवाली में उनसे भेंट करने आते थे। बाबूजी भी उन्हें दिवाली के प्रसादस्वरूप मिठाई का पैकेट उपहार में दिया करते थे। दिवाली के बाद लगभग दस दिन बीत चुके थे पर मिठाई का एक पैकेट अल्मारी में रखा ही हुआ था।

लक्ष्मी पूजा के दिन से भाईदूज तथा उसके भी एक-दो दिन बाद तक इतनी मिठाइयाँ खाने को मिली थीं कि उनसे जी भर गया था और मिठाई देखने की भी इच्छा नहीं होती थी। सो मिठाई के लालची होने के बावजूद भी हमने उस पैकेट की ओर झाँका तक नहीं। किन्तु पाँच-छः दिन और बीत जाने के बाद वह पैकेट हमें ललचाने लगा। पर हमें पता था कि जिन सज्जन के लिए वह उपहार रखा हुआ है वे बाबूजी के बहुत ही प्रिय व्यक्तियों में से हैं। हमें यह भी मालूम था कि किसी कारण से वे अब तक नहीं आ पाए हैं किन्तु देर-सबेर आएँगे जरूर। इसलिए माँ से जिद कर के भी माँगने पर वे हमें उस पैकेट से मिठाई नहीं देने वाली हैं।

माँ हमें मिठाई देने वाली नहीं थीं और पहले कभी चोरी की नहीं थी इसलिए चुराकर खाने की हिम्मत भी नहीं होती थी। पर हमारा बाल मन था कि पैकेट को देख-देख कर ललचाए जाता था। पूजा वाला कमरा ही घर का भण्डारगृह था और वहाँ से कुछ भी सामान लाना हो तो माँ हमें ही वहाँ से सामान लाने के लिए आदेश कर दिया करती थीं। हम जब भी पूजागृह में जाते सामने मिठाई का पैकेट नजर आता और मुँह में पानी भर आता था।

ईश्वर ने हमें रसना अर्थात् जीभ के रूप में बड़ी विचित्र चीज प्रदान किया है। नजर किसी स्वादिष्ट वस्तु को देखती है और जीभ लार टपकाने लगती है। सोचा जाए तो किसी स्वादिष्ट पदार्थ का स्वाद हमें केवल कुछ क्षणों के लिए ही मिलता है। ज्योंहीं वह जीभ के नीचे गले में उतरी कि स्वाद गायब। किन्तु केवल कुछ क्षणों का यह स्वाद बड़े-बड़ों को बेईमान बना देती है। इसीलिए तो कहा गया हैः

रूखी सूखी खाय के ठण्डा पानी पी।
देख पराई चूपड़ी मत ललचाए जी॥


जीभ मामले में एक बात और है कि यदि यह मीठा बोल दे तो शत्रु भी मित्र बन जाए और कड़वा तथा तीखा बोल दे तो भाई भी भाई का दुश्मन हो जाए। द्रौपदी ने यदि अपने जबान से सिर्फ "अन्धे के अन्धे ही होते हैं" न कहा होता तो महाभारत के युद्ध में अठारह अक्षौहिणी सेना न कट मरी होती।

अस्तु, इस रसना ने हमें भी इतना ललचाया कि हम अपने आप को वश में नहीं रख पाए। होश संभालने के बाद से ही मिली हमारी "चोरी करना पाप है" जैसी शिक्षा न जाने कहाँ पानी भरने चली गई और हम चोर बनने के लिए विवश हो गए। चुपके से झाँक कर देखा बाबूजी बैठक में पुस्तक पढ़ने में तल्लीन हैं, माँ रसोई में खाना बनाने में व्यस्त है, दादी माँ हमारी सात वर्षीय बहन को तथा पाँच वर्षीय भाई को लेकर कहीं पड़ोस में गई हैं। बच गए हमारे तीन वर्षीय तथा एक वर्षीय दो और भाई सो उनसे किसी प्रकार का भय था ही नहीं। दबे पाँव पूजागृह में गए और लगे हाथ मारने मिठाई पर। जी भरकर खा लेने पर भी मिठाई का डिब्बा एक चौथाई भी खाली नहीं हुआ सो डिब्बे का ढक्कन बंद कर जैसे का तैसा रख दिया।

मिठाई खाते समय तो बड़ा मजा आया। पर वह आनन्द पूजागृह से निकलते ही काफूर हो गया। यद्यपि किसी ने हमें चोरी करते देखा नहीं था पर हम थे कि एक कम प्रयोग होने वाले कमरे में जाकर छुपकर बैठे हुए थे। मिठाई खाने के मजे का स्थान अब ग्लानि ने ले लिया था। बार-बार लगता था कि आज मैंने बहुत बड़ी गलती की है, चोरी करके बहुत बड़ा पाप किया है। जब आदमी अकेला होता है तो उसका अन्तर्मन उससे बात करने लगता है। अब मेरे ही भीतर से किसी ने मुझे भयभीत करना आरम्भ कर दिया। बाबूजी ने तो कभी हम पर हाथ नहीं उठाया था किन्तु माँ की मार आज भी याद है। पता चलने पर माँ कितना मारेगी यही सोच-सोच कर कँपकँपी छूटने लगी। यह सोचकर कि हमारी चोरी का किसी को पता नहीं चलने वाला है स्वयं को जितना तसल्ली देने की कोशिश करते मन उतना ही भयभीत होता। पता नहीं क्यों दादी माँ की सुनाई गई कृष्ण-सुदामा वाली कहानी याद आने लगी जिसमें सुदामा ने चोरी से कृष्ण के हिस्से के चने भी खा लिए थे। बार-बार लगता कि चोरी के परिणामस्वरू सुदामा ने जिस प्रकार से जीवन भर दरिद्रता भोगी उसी प्रकार से मैं भी जीवन भर कंगाल बना रहूँगा।

ग्लानि और भय ने इतना सताया कि आँख से आँसू बहने लगे। पता नहीं किस शक्ति ने मुझे बाबूजी के सामने जाने के लिए मजबूर कर दिया और मैंने रोते हुए उन्हें अपनी चोरी के बारे में सब कुछ बता दिया। सुनकर बाबूजी कुछ क्षण तो अवाक् से रह गए क्योंकि उन्होंने सपने में भी कभी नहीं सोचा रहा होगा कि मैं चोरी भी कर सकता हूँ। फिर उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए सिर्फ इतना कहा, "अच्छा किया जो तुमने यह सब मुझे बता दिया, अब जाओ खेलो। पर भविष्य में फिर कभी चोरी मत करना।"

पता नहीं क्यों, बचपन की यह घटना मुझे आज भी भुलाए नहीं भूलती।

Sunday, November 14, 2010

भारतीय रचनाकार तथा उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ

रचनाकारप्रसिद्ध रचनाएँ
आदिकवि वाल्मीकिरामायण
चरकचरक संहिता
पाणिनीअष्टाध्यायी
पतंजलिमहाभाष्य
वाराह मिहिरवृहत् संहिता
वात्सायनकामसूत्र
वेदव्यासमहाभारत, भगवद्गीता
महाकवि कालिदासअभिज्ञान, शाकुन्तलम्, रघुवंशम्, कुमार सम्भव, मेघदूत, ऋतुसंहार
महाकवि भासस्वप्नवासवदत्ता, प्रतिज्ञा यौगन्धरायण
विशाखदत्तमुद्रा राक्षस
शूद्रकमृच्छकटिकम्
बाणभट्टहर्षचरित, कादम्बरी
कल्हणराजतरंगिणी (काश्मीर का इतिहास)
जयदेवगीत गोविन्द, चन्द्रालोक
हर्षवर्धननागानंद, प्रियदर्शिका, रत्नावली
कौटिल्यअर्थशास्त्र
विष्णु शर्मापंचतन्त्र
चन्द बरदाईपृथ्वीराज रासो
गोस्वामी तुलसीदासरामचरितमानस, विनय पत्रिका, कवितावली, दोहावली, हनुमान चालीसा
सूरदाससूरसागर, सूरसारावली
कबीरदासबीजक (रमैनी, सबद और साखी)
रहीमरहीम दोहावली, बरवै, नायिका भेद, मदनाष्टक, रास पंचाध्यायी
मलिक मोहम्मद जायसीपद्मावत
बाबरबाबरनामा
गुलबदन बेगमहुमायूँनामा
अबुल फजलअकबरनामा
अमीर खुसरोतुगलकनामा
मिर्जा गालिबदीवाने-गालिब
देवकीनन्दन खत्रीचन्द्रकान्ता, चन्द्रकान्ता सन्तति
वृन्दावनलाल वर्माझाँसी की रानी, मृगनयनी
मुंशी प्रेमचन्दगोदान, गबन, सेवा सदन, सोजे-वतन,
भारतेन्दु हरिश्चन्द्रसत्य हरिश्चन्द्र, भारत दुर्दशा, अन्धेर नगरी
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्यायआनन्द मठ, कपाल कुण्डला
विष्णु प्रभाकरआवारा मसीहा, मेरा वतन
भगवतीचरण वर्माचित्रलेखा
जयशंकर 'प्रसाद'कामायनी, चन्द्रगुप्त, आँसू
मैथिलीशरण गुप्तसाकेत, यशोधरा
फणीश्वरनाथ रेणुमैला आँचल
हरिवंशराय 'बच्चन'मधुशाला
लाला लाजपतरायअनहैप्पी इण्डिया
मौलाना अबुल कलम आजादइण्डिया
मोहनदास करमचन्द गांधीसत्य के प्रयोग
डॉ. राजेन्द्र प्रसादइण्डिया डिवाइडेड
जवाहरलाल नेहरूडिस्कव्हरी ऑफ इण्डिया
जगजीवनरामकास्ट चैलेंज इन इण्डिया
जयप्रकाश नारायणप्रिजन डायरी
भीष्म साहनीतमस
कैफी आज़मीआवारा सजदे
कमलेश्वरकाली आँधी, कितने पाकिस्तान
कुलदीप नैय्यरजजमेंट
किरण बेदीफ्रीडम बिहाइन्ड वार्स

Saturday, November 13, 2010

क्या वास्तव में हम भारतीय हैं?

जरा हम अपने हृदय पर हाथ रख कर सोचें कि क्या हम बारह भारतीय महीनों के नाम भी जानते हैं? शायद ही हम में से कुछ ही लोग जानते होंगे और क्रमवार तो उनमें से भी बहुत ही कम लोग जानते होंगे। ईसवी सन् कौनसा है यह हम सभी जानते हैं किन्तु पूछ दिया जाये कि कौन सा संवत् चल रहा है तो हम बगलें झाँकने लगते हैं। यदि सोते से उठा कर भी हमें अंग्रेजी के छब्बीस अक्षर बताने के लिये कहा जाये तो हम उन्हें तुरन्त बोल देंगे, किन्तु बहुत सोचने के बाद भी हमें देवनागरी के अक्षर पूरे याद नहीं आते।

हम केवल दीवाली, होली जैसे प्रमुख त्योहारों को मना कर आत्मप्रवंचना कर लेते हैं कि हम भारतीय हैं। अपने पश्चिमी संस्कारों के ऊपर भारतीय संस्कार का एक मुलम्मा चढ़ा लेते हैं। हम अंग्रेजी माध्यम के कन्व्हेंट स्कूलों में पढ़े हुये लोग हैं। अपने त्योहारों को मनाते हुये हम गर्व का अनुभव करते हैं और सभ्य लोगों के बीच अपनी ही भाषा बोलने में हमें शर्म और संकोच होता है। किसी साक्षात्कार में यदि हमसे हिन्दी में भी प्रश्न किया जाये तो उसका उत्तर अंग्रेजी में दे कर हम स्वयं को बुद्धिमान सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। यदि उत्तर हिंदी में ही देते हैं तो भी उसमें अंग्रेजी के शब्दों को घुसेड़ कर यह तो अवश्य ही बता देते हैं कि हम हिंदी जानें या न जानें, अंग्रेजी अवश्य ही जानते हैं।

फिर जैसे हमारे माता-पिता ने किया था वैसे ही हम भी अपने बच्चों को बचपन से ही माँ-पिताजी, चाचा-चाची कहना सिखाने के बदले मम्मी-डैडी, अंकल-आंटी कहना सिखलाते हैं। उन्हें कन्व्हेंट स्कूलों में भेज कर उन्हें अंग्रेजी की शिक्षा दिलवाते हैं। हिन्दी हमारे बच्चों के लिये द्वितीय भाषा हो जाती है। हमारे बच्चों को हम याद नहीं आते बल्कि वे हमें 'मिस' करते हैं।
अब तो हमारी फिल्में और टी।व्ही। चैनल्स जैसी प्रभावशाली माध्यमों ने भी हममें एक खिचड़ी भाषा का संस्कार भरना शुरू कर दिया है। फिल्मों के नाम आधा हिन्दी और आधा अंग्रेजी में होते हैं। टी.व्ही. का कोई भी 'सीरियल', कोई भी विज्ञापन देख लें, भाषा खिचड़ी पायेंगे।

इन सभी बातों को ध्यान में रख कर सोचें कि क्या हम वास्तव में भारतीय हैं?

Friday, November 12, 2010

सेवा? व्यापार? या लूट?

"ग्रेट कन्वेंट स्कूल के यूनीफॉर्म वाली स्वेटर है क्या?"

"वो तो साहब आपको सिर्फ फलाँ दूकान में ही मिलेगी, उस दूकान के अलावा और कहीं भी नहीं मिल सकती।" होजियरी दूकानदार ने बताया। साथ ही उस दूकान का पता भी उसने बता दिया।

अब हम और हमारे परिचित गुप्ता जी उस दूकान में गए। गुप्ता जी का पुत्र उस स्कूल में पीपी-1 कक्षा में पढ़ता है। उस स्कूल का नियम है कि बच्चों को वहाँ के यूनीफॉर्म में ही आना पड़ेगा। वहाँ यूनीफॉर्म के वस्त्र भी आपको स्कूल से ही खरीदना पड़ेगा। अब चूँकि सर्दियाँ आ गई हैं इसलिए बच्चों के लिए स्वेटर भी जरूरी है। इसलिए स्कूल वालों ने एक विशिष्ट रंग तथा डिजाइन का स्वेटर भी जोड़ दिया यूनीफॉर्म में। मगर उनके यूनीफॉर्म वाला वह विशिष्ट स्वेटर आपको केवल एक विशिष्ट दूकान के अलावा पूरे रायपुर के अन्य दूकानों में कहीं नहीं मिल सकती।

खैर साहब हम उस विशिष्ट दूकान में गए और गुप्ता जी ने अपने बच्चे के लिए स्वेटर खरीद ली। अब उन्हें अपने पुत्र के लिए एक पुस्तक की जरूरत थी। अब हम उस पुस्तक की तलाश में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर कि पुस्तक दूकानों की खाक छानने लगे। पच्चीसों दूकानों में गए किन्तु पुस्तक कहीं उपलब्ध नहीं थी।

फिर एक भले दूकानदार ने कहा, "अरे साहब, यह तो ग्रेट कन्वेन्ट स्कूल में चलने वाली किताब है, इस पुस्तक को आपको उसी स्कूल से ही खरीदना पड़ेगा।"

"वहाँ से हमने खरीदा था पर बच्चे ने उस पुस्तक को कहीं गुमा दिया। अब यह पुस्तक स्कूल के स्टॉक में खत्म हो गई है।" गुप्ता जी बोले।

"तब तो साहब आप फलाँ पुस्तक दूकान में चले जाइए क्योंकि उस स्कूल को वही दूकान पुस्तकें सप्लाई करती है। पर वो दूकान तो आउटर एरिया में है, अब तक तो बंद हो चुकी होगी; आप कल वहाँ जाकर पता कर लेना।"

अब हम सोचने लगे कि ये स्कूल शिक्षा देने का काम कर रहा है या कपड़े, पुस्तकें आदि बेचने का? यह हाल सिर्फ उस स्कूल का ही नहीं बल्कि आज के अधिकतर विद्यालयों तथा महाविद्यालयों का है। ये सब कपड़े, पुस्तकें आदि बेचने के साथ ही बच्चों को घर से स्कूल तथा स्कूल से घर तक पहुँचाने के लिए ट्रांसपोर्टेशन का भी धंधा करते हैं।

याने नाम शिक्षा जैसी सेवा का और काम व्यापारी का। पर इसे व्यापार कहना भी गलत है क्योंकि ये जो भी चीजें बेचते हैं उनके दाम उन वस्तुओं की वास्तविक कीमतों से चौगुनी होती है। याने कि यह व्यापार नहीं लूट है।

अब हम एक जाने-माने डॉक्टर साहब के यहाँ गए क्योंकि हमें दो दिन से कुछ तकलीफ थी। अस्पताल के रिसेप्शन में बैठी सुन्दर सी महिला ने हमसे हमारा नाम, उम्र आदि पूछ कर एक पर्ची बना कर हमें देते हुए कहा, "डॉक्टर साहब की फीस, रु.150.00 जमा कर दीजिए।"

हमने फीस जमा कर दी। हमारा नंबर आने पर जब हम डॉक्टर साहब से मिले तो उन्होंने तकलीफ पूछी। तकलीफ बताने पर न तो उन्होंने नाड़ी देखी, न ही जीभ देखी और न ही छाती और पीठ पर स्टेथिस्कोप लगाकर धड़कन देखी, बस एक पर्ची देते हुए कहा, "यहाँ जाकर खून और पेशाब का जाँच करवा लीजिए। कल रिपोर्ट देखने के बाद इलाज शुरू करेंगे।"

अब आप ही बताइए कि डॉक्टर साहब की फीस किस बात की थी? क्या सिर्फ यह बताने की थी कि फलाँ लेबोरेटरी में जाकर खून और पेशाब की जाँच करवा लो?

यह भी तो हो सकता है कि कल को हम डॉक्टर साहब के पास फिर जाने के पहले ही "टें" बोल जाएँ।

इतना सारा बकवास करने का लब्बोलुआब सिर्फ यह है कि हमें तो लगता है कि शिक्षा, चिकित्सा आदि कार्य आज सेवाएँ न रहकर लूट का माध्यम बन कर रह गई हैं।

Thursday, November 11, 2010

कहाँ खो गई वो खुशी?

कितने खुश होते थे हम भाई-बहन जब हम सभी को एक साथ बैठा कर माँ खाना परसती थी! हम चार भाई और एक बहन में कोई एक भी अनुपस्थित होता तो हम सभी उसके आने की प्रतीक्षा करते और उसके आ जाने के बाद ही एक साथ खाना खाते थे। एक-दूसरे को देखे बिना हम भाई-बहन रह नहीं पाते थे और हमारे माता-पिता हमारे इस सौहार्द्र को देखकर खुशी से फूले नहीं समाते थे।

आज माता-पिता दोनों ही परलोक सिधार चुके हैं। हम सभी के अपने-अपने परिवार हो गए हैं। सब अलग-अलग घरों में रहते हैं। एक ही शहर में रहते हुए भी महीनों एक दूसरे से मुलाकात नहीं होती। अभी भाई दूज के दिन बहन ने हम सभी भाइयों को निमन्त्रित किया था किन्तु सभी अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार अलग-अलग समय में बहन के घर पहुँचे। किसी ने किसी की भी प्रतीक्षा नहीं की।

सोच-सोच कर हैरान हूँ कि कहाँ गया वो बचपन का सौहार्द्र? कहाँ गई वो खुशी?

Wednesday, November 10, 2010

मान सहित मरिबो भलो… अपमान सहकर जीने से सम्मान के साथ मर जाना अच्छा है

रहिमन मोहि न सुहाय, अमिय पियावत मान बिनु।
बरु विष देय बुलाय, मान सहित मरिबो भलो॥


रहीम कवि कहते हैं कि यदि कोई बिना सम्मान के अमृत भी पिलाता है तो मुझे अच्छा नहीं लगता। यदि प्रेम से बुलाकर विष भी दे तो अधिक अच्छा है क्योंकि उससे सम्मान के साथ मृत्यु प्राप्त होगी।

Tuesday, November 9, 2010

कोई पास न रहने पर भी जन-मन मौन नहीं रहता

कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता;
आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता।
बीच-बीच मे इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी,
मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई नई-

क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा;
है स्वच्छन्द-सुमंद गंधवह, निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप,
पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप!

है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर,
रवि बटोर लेता है उनको, सदा सवेरा होने पर।
और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है,
शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है।

सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है,
अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है!
अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है,
पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥

(राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के खण्डकाव्य "पंचवटी" से उद्रृत)

Monday, November 8, 2010

मिठाइयाँ इधर-उधर फेकी हुईं पड़ी हैं

आज घर में यह हालत है कि जिस कमरे में देखो मिठाइयों से भरे बर्तन तथा डिब्बे इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। रिश्तेदारों और परिचितों के घर से बैने के रूप में प्रसाद आते जा रहे हैं जिनमें अनेक प्रकार की मिठाइयाँ ही मिठाइयाँ हैं। जिन मिठाइयों को देखकर ही मुँह में पानी आ जाता था आज उन्हीं मिठाइयों को देखने की इच्छा तक नहीं हो रही है। जब किसी वस्तु की मात्रा बहुत अधिक हो जाती है तो उसका कोई मूल्य नहीं रह जाता; इसीलिए तो वृन्द कवि ने कहा हैः

अति परिचै ते होत है अरुचि अनादर भाय।
मलयागिरि की भीलनी चन्दन देति जराय॥


सही बात तो यह है कि कौन सी चीज कब अच्छी लगेगी और कब बुरी कहा नहीं जा सकता। दिवाली के समय अच्छी लगने वाली मिठाई भी बुरी लगने लगती है जबकि हमेशा बुरी लगने वाली गाली भी विवाहोत्सव के समय समधन के द्वारा देने पर अच्छी लगने लगती है। इस पर भी वृन्द कवि ने निम्न दोहा लिखा हैः

निरस बात सोई सरस जहाँ होय हिय हेत।
गारी भी प्यारी लगै ज्यों-ज्यों समधिन देत॥


उद्धरण के रूप में वृन्द के उपरोक्त दो दोहे आ जाने से हमें वृन्द के और भी दोहे याद आ रहे हैं जो कि अत्यन्त सरस होने के साथ ही साथ नीतिपूर्ण भी हैं, आइए आप भी उनका रस लें:

उत्तम विद्या लीजिए जदपि नीच पै होय।
पर्यौ अपावन ठौर में कंचन तजप न कोय॥

सरसुति के भंडार की बडी अपूरब बात।
ज्यौं खरचै त्यौं-त्यौं बढै बिन खरचे घटि जात॥

जो जाको गुन जानही सो तिहि आदर देत।
कोकिल अंबहि लेत है काग निबौरी लेत॥

उद्यम कबहुँ न छोडिए पर आसा के मोद।
गागरि कैसे फोरिये उनयो देखि पयोद॥

जो पावै अति उच्च पद ताको पतन निदान।
ज्यौं तपि-तपि मध्यान्ह लौं अस्तु होतु है भान॥

मोह महा तम रहत है जौ लौं ग्यान न होत।
कहा महा-तम रहि सकै उदित भए उद्योत॥

ऊँचे बैठे ना लहैं गुन बिन बडपन कोइ।
बैठो देवल सिखर पर बायस गरुड न होइ॥

कछु कहि नीच न छेडिए भले न वाको संग।
पाथर डारै कीच मैं उछरि बिगारै अंग॥

सबै सहायक सबल के कोउ न निबल सहाय।
पवन जगावत आग कौं दीपहिं देत बुझाय॥

अति हठ मत कर हठ बढे बात न करिहै कोय।
ज्यौं-ज्यौं भीजै कामरी त्यौं-त्यौं भारी होय॥

मनभावन के मिलन के सुख को नहिंन छोर।
बोलि उठै, नचि नचि उठै मोर सुनत घन घोर॥

भली करत लागति बिलम बिलम न बुरे विचार।
भवन बनावत दिन लगै ढाहत लगत न वार॥

जाही ते कछु पाइए करिए ताकी आस।
रीते सरवर पै गए कैसे बुझत पियास॥

अपनी पहुँच बिचार कै करतब करिए दौर।
तेते पाँव पसारिए जेती लांबी सौर॥

नीकी पै फीकी लगै बिन अवसर की बात।
जैसे बरनत युद्ध में रस श्रृंगार न सुहात॥

विद्याधन उद्यम बिना कहौ जु पावै कौन?
बिना डुलाये ना मिले ज्यों पंखा की पौन॥

कैसे निबहै निबल जन कर सबलन सों गैर।
जैसे बस सागर विषै करत मगर सों बैर॥

फेर न ह्वै हैं कपट सों जो कीजै व्यौपार।
जैसे हांडी काठ की चढ़ै न दूजी बार॥

बुरे लगत सिख के बचन हियै विचारौ आप।
करुवी भेषज बिन पियै मिटै न तन की ताप॥

करिए सुख की होत दुःख यह कहो कौन सयान।
वा सोने को जारिए जासों टूटे कान॥

भले बुरे सब एक सौं जौं लौं बोलत नाहि।
जानि परतु है काक पिक ऋतु वसंत के माहि॥

नयना देत बताय सब हियौ की हेत अहेत।
जैसे निर्मल आरसी भली बुरी कहि देत॥

रोष मिटै कैसे कहत रिस उपजावन बात।
ईंधन डारै आग मों कैसे आग बुझात॥

अति परिचै ते होत है अरुचि अनादर भाय।
मलयागिरि की भीलनी चंदन देति जराय॥

कारज धीरे होत है काहे होत अधीर।
समय पाय तरुवर फरै केतक सींचौ नीर॥

जिहि प्रसंग दूषण लगे तजिए ताको साथ।
मदिरा मानत है जगत दूध कलाली हाथ॥

करै बुराई सुख चहै कैसे पावै कोइ।
रोपै बिरवा आक को आम कहाँ ते होइ॥

उत्तम जन सो मिलत ही अवगुन सौ गुन होय।
घन संग खारौ उदधि मिलि बरसै मीठो तोय॥

कुल सपूत जान्यौ परै लखि सुभ लच्छन गात।
होनहार बिरवान के होत चीकने पात॥

क्यों कीजै ऐसो जतन जाते काज न होय।
परवत पर खोदी कुआँ कैसे निकसे तोय॥

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान॥

Sunday, November 7, 2010

Saturday, November 6, 2010

दीपावली तो आज है... कल तो लक्ष्मीपूजा थी...

दीपावली तो आज है... कल तो लक्ष्मीपूजा थी...

अधिकतर लोग लक्ष्मीपूजा के दिन को ही दीपावली समझते हैं जबकि वास्तव में दीपावली लक्ष्मीपूजा के दूसरे दिन का नाम है।

आप सभी को दीपावली की अनेकों अनेक शुभकामनाएँ!

deepavali greetings on orkut

Diwali Diyas

diwali lamps

Friday, November 5, 2010

दिवाली की दिली शुभकामनाए और एक और दुर्लभ किन्तु मधुर छत्तीसगढ़ी गाना रफी साहब की आवाज में

दीपावली के इस शुभ बेला में माता महालक्ष्मी आप पर कृपा करें और आपके सुख-समृद्धि-धन-धान्य-मान-सम्मान में वृद्धि प्रदान करें!

मोहम्मद रफी की आवाज में दुर्लभ किन्तु मधुर छत्तीसगढ़ी गानाः




यूट्यूब लिंकः

http://www.youtube.com/watch?v=OAZb8tmuZUA

Thursday, November 4, 2010

सुख-समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक दीपावली


Festival Greetings
संसार में भारत ही ऐसा देश है जहाँ पर वर्ष भर में अनगिनत त्यौहार मनाए जाते हैं जिनमें दीपावली सबसे बड़ा त्यौहार होता है। त्यौहार का अर्थ है खुशी मनाना। जब पेट भरा होता है और गाँठ में अतिरिक्त पैसा होता है तो आदमी को मस्ती सूझती है। जाहिर है कि भारत में प्रायः लोग समृद्ध होते थे याने कि लोगों का पेट भरा होता था और गाँठ में भरपूर पैसे होते थे इसीलिए मस्ती करने के लिए अधिकतर त्यौहारों का प्रचलन हुआ। आप ही सोचिए कि बेहाल आदमी भला क्या त्यौहार मनाएगा?

किन्तु त्यौहारों का उद्देश्य मात्र मस्ती करना ही नहीं होता था बल्कि त्यौहारों के अन्य अनेक उद्देश्य हुआ करते थे जैसे कि अपनी संस्कृति, सभ्यता, परम्परा आदि को बनाए रखना, मर्यादा बनाए रखना, स्वच्छता का ध्यान रखना आदि। जहाँ दिवाली में लक्ष्मी-पूजन का उद्देश्य है अपनी संस्कृति, सभ्यता, परम्परा आदि को बनाए रखना वहीं छोटों के द्वारा बड़ों का चरणस्पर्श तथा बड़ों के द्वारा उन्हें आशीर्वाद देना मर्यादा को बनाए रखना है और पूरे घर की साफ-सफाई, लिपाई-पुताई आदि स्वच्छता का ध्यान रखना है। दीपावली में ही घर की दीवालों को पेंट करने के पीछे कारण यह होता है कि चार माह की बरसात घरों की सुन्दरता को नष्ट कर चुकी होती है अतः घर का फिर से काया-पलट करना आवश्यक होता है। जहाँ रंग-रोगन से घरों की सुन्दरता फिर से लौट आती है वहीं पूरे घर की सफाई करने से तथा अंधेरे घर में फैली धूल-गंदगी खत्म हो जाती है बीमारी फैलाने वाले कई प्रकार के कीटाणुओं का नाश हो जाता है।

वास्तव में देखा जाए तो दीपावली मुख्यतः फसल काटने का त्यौहार है। कृषक अपने परिश्रम का फल फसल के रूप में पाकर आनन्द तथा उल्लास से सराबोर हो जाते हैं और त्यौहार मनाते हैं। चूँकि अन्न लक्ष्मी देवी का एक रूप है अतः दीपावली की रात्रि को लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है।

कुछ और जानकारी

दीपावली शब्द "दीप" (दिया) तथा "आवली" (कतार) शब्दों के मेल से बना है अर्थात् दीपावली का अर्थ है "दिये की कतार"।

दीपावली को "लक्ष्मी पूजा" के नाम से भी जाना जाता है। लक्ष्मी पूजा के दिन घरों के द्वारों पर सभी दिशाओ की ओर अनेकों दिये आलोकित किये जाते हैं। ।

दीपावली रोशनी का त्यौहार है। दिया या प्रकाश बुराई पर भलाई के विजय का प्रतीक है।

दीपावली हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक चन्द्रमास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है जो कि अंग्रेजी कैलेन्डर के अनुसार अक्टूबर या नवम्बर महीने में आता है।

लक्ष्मी पूजा के पूर्व का दिन "नर्क चतुर्दशी" कहलाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर पर विजय प्राप्त किया था। नर्क चतुर्दशी के दिन घरों के द्वारों पर दक्षिण दिशा की ओर चौदह दिये आलोकित किये जाते हैं।

लक्ष्मी पूजा के दूसरे दिन "गोवर्धन पूजा" मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने इन्द्र को पराजित किया था।

दीपावली मनाने के कुछ अन्य कारणः

जैन धर्म के अनुसार भगवान महावीर को 15 अक्टूबर १५५२७ (ईसवी पूर्व) के दिन, जो कि दीपावली का दिन था, निर्वाण की प्राप्ति हुई थी। (अंग्रेजी विकीपेडिया http://en.wikipedia.org/wiki/Diwali#In_Jainism)

सिख समुदाय के लोग अनेकों कारण से दीपावली का त्यौहार मनाते हैं। इस दिन उनके छठवें गुरु, गुरु हरगोविंद जी, को 52 हिन्दू राजाओ के साथ कारागार से मुक्ति मिली थी और वे अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में मत्था टेकने गये थे जहाँ पर अनेकों दिये प्रकाशित करके उनका स्वागत किया गया था।

कहा जाता है किस चौदह वर्ष का वनवास काट कर भगवान श्री रामचन्द्र जी दीपावली के दिन ही अयोध्या वापस लौटे थे और अनेकों दीप प्रज्जवलित कर के उनका स्वागत किया गया था।

स्कन्द पुराण के अनुसार देवी शक्ति ने भगवान शिव का आधा शरीर प्राप्त करने के लिये 21 दिनों का व्रत किया था जिसका आरम्भ कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी से हुआ था और उन्हें दीपावली के दिन व्रत का फल मिला था।

Wednesday, November 3, 2010

मोहम्मद रफी की आवाज में दुर्लभ किन्तु मधुर छत्तीसगढ़ी गाना

सन् 1965 में पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म बनी थी "कहि देबे सन्देश"। फिल्म के निर्माता थे मनु नायक। "कहि देबे सन्देश" का संगीतकार मलय चक्रवर्ती ने इस फिल्म में अत्यन्त ही मधुर एवं कर्णप्रिय संगीत प्रदान किया था किन्तु वे गीत आज दुर्लभ हो गए हैं।

प्रस्तुत है उसी फिल्म कहि देबे सन्देश का गीत जिसे मोहम्मद रफी साहब ने मधुर आवाज प्रदान किया थाः

Monday, November 1, 2010

फटाके याने कि आतिशबाजी याने कि आग का खेल-तमाशा

सदियों से न केवल हमारे देश में बल्कि विश्व के प्रायः देशों में उत्सव या खुशी के अवसर पर आतिशबाजी अर्थात् फटाके चलाने की परम्परा रही है। फटाके से उत्पन्न कर्णभेदी ध्वनी जहाँ मनुष्य को एक भयमिश्रित प्रसन्नता प्रदान करती है वहीं आग का सितारों के रूप में नाचना, ऊपर से नीचे गिरना मनुष्य को नयनाभिराम प्रतीत होता है। यह भी हो सकता है कि हमारे प्राचीन ग्रंथों में देवताओं के द्वारा आकाश से फूल बरसाने का उल्लेख आतिशबाजी के द्वारा आग का फूलों के रूप में आकाश से नीचे गिरने का सांकेतिक रूप हो।

आतिशबाजी उर्दू का शब्द है जिसमें "आतिश" का अर्थ होता है "आग" और "बाजी" का अर्थ है "खेल" या "तमाशा" याने कि "आतिशबाजी" का अर्थ हुआ "आग का खेल-तमाशा"। जहाँ अन्य समस्त प्राणियों के लिए आग भय की वस्तु है वहीं मनुष्य ने आग को भी खेल-तमाशे की वस्तु बना लिया; यह केवल मनुष्य के विलक्षण मस्तिष्क का ही कमाल है। हमें पता नहीं है कि मनुष्य ने आतिशबाजी की कला की खोज कब और कैसे की, हो सकता है कि आग में नमक पड़ जाने से जो चड़चड़ाहट होती है उसी ने मनुष्य का ध्यान आतिशबाजी की ओर आकर्षित किया हो। यह भी सम्भाव है कि कभी अनजाने में मनुष्य ने आग में कोई ऐसी वस्तु डाल दी हो जिसमें किसी रूप में शोरा (पोटेशियम नाइट्रेट) और गंधक रहा हो और उसके परिणामस्वरूप मनुष्य को आतिशबाजी की कला का ज्ञान हो गया हो।

अस्तु, माना जाता है कि इस कला का विकास चीन में लगभग दो हजार वर्ष पूर्व हुआ जहाँ से यह शनैः-शनैः पूरे विश्व में फैल गया। आतिशबाजी की कला के लिए बारूद का प्रयोग किया जाता है जो कि कोयला, गंधक और शोरा के चूरे का मिश्रण होता है। कालान्तर में आतिशबाजी को रंगीन करके और भी नयनाभिराम बनाने के लिए बारूद में पोटेशियम क्लोरेट (potassium chlorate), बेरियम (barium), स्ट्रोन्टियम नाइट्रेट (strontium nitrate), एल्युमीनियम (aluminium), मैग्नेशियम (magnesium) आदि को मिलाने का प्रचलन होने लगा नयनाभिराम, रंग-बिरंगी, चमकीली सितारों के रूप में आग के फौवारे छोड़ने वाले रॉकेट, गोले आदि फटाके बनाए जा सकें।

जहाँ फटाके हमें प्रसन्नता प्रदान करते हैं वहीं अनेक बार भयंकर दुर्घटनाओं के कारण भी बन जाते हैं। इसी बात को ध्यान में रखकर फटाकों के निर्माण, क्रय-विक्रय आदि के लिए नियम-कानून बनाए गए। भारत में "भारतीय विस्फोट नियम" (Indian Explosives Rules) की शुरुवात पहली बार सन् 1940 में हुई जिसके अन्तर्गत् फटाकों के निर्माण एवं विक्रय के लिए लायसेंस का प्रावधान बनाया गया।

दिवाली की रात सम्पूर्ण भारत में अरबों-खरबों रुपयों के फटाके जल जाते हैं और प्रतिवर्ष फटाकों के खपत में 10% की वृद्धि हो जाती है। आपको शायद ही पता हो कि भारत में दिवाली की रात को तीन घण्टे के भीतर जितने फटाके चलते हैं उनका निर्माण करने के लिए शिवाकाशी में स्थित अनेक फटाके निर्माता कम्पनियों को तीन सौ से भी अधिक दिन लगते हैं। यद्यपि भारत में अनेक स्थानों में फटाके बनाने वाली फैक्टरियाँ हैं किन्तु सबसे अधिक फैक्टरियाँ शिवाकाशी में ही है क्योंकि वहाँ की कम वर्षा और शुष्क वातावरण इसके लिए अत्यन्त उपयुक्त है।

एक अरसे तक विश्व भर के देशों को फटाका निर्यात करने में चीन का एकाधिकार रहा है किन्तु अब भारत से भी अनेक देशों में फटाकों का निर्यात किया जाता है।

 
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