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Friday, December 31, 2010

सरकारी नौकरों की सेवानिवृति होती है तो सरकार चलाने वालों की सेवानिवृति क्यों नहीं होती?

कानूनन सरकारी नौकरों को अधिकतम साठ साल की उम्र तक ही काम करने दिया जा सकता है।
  • क्या साठ साल की उम्र पार होते ही उनकी कार्यक्षमता समाप्त हो जाती है जो उन्हें सेवानिवृत कर दिया जाता है?
  • यदि ऐसा है तो साठ साल की उम्र के बाद नेताओं की कार्यक्षमता क्यों और कैसे बनी रहती है?
  • एक सरकारी नौकर यदि 60 साल की उम्र के बाद कार्यालय चलाने में अक्षम हो जाता है तो फिर 78 साल की उम्र में भी हमारे प्रधानमन्त्री देश कैसे चला रहे हैं?
  • क्या देश में कानून सभी के लिए एक जैसे नहीं होने चाहिए?
  • यदि 78 साल की उम्र में भी हमारे प्रधानमन्त्री देश कैसे चला रहे हैं तो 60 साल की उम्र के बाद सरकारी नौकरों को दफ्तर चलाने की अनुमति नहीं देना चाहिए?
  • क्या जनता और नेता के लिए अलग अलग नियम-कानून हैं?

Thursday, December 30, 2010

अमर शहीद ऊधम सिंह

"मैं परवाह नहीं करता, मर जाना कोई बुरी बात नहीं है। क्या फायदा है यदि मौत का इंतजार करते हुए हम बूढ़े हो जाएँ? ऐसा करना कोई अच्छी बात नहीं है। यदि हम मरना चाहते हैं तो युवावस्था में मरें। यही अच्छा है और यही मैं कर रहा हूँ।

"मैं अपने देश के लिए मर रहा हूँ।"


(‘I don’t care, I don’t mind dying. What Is the use of waiting till you get old? This Is no good. You want to die when you are young. That is good, that Is what I am doing’.

‘I am dying for my country’.)

उपरोक्त शब्द अमर शहीद ऊधम सिंह के अन्तिम शब्द थे।

देश को अंग्रेजों के अत्याचार तथा गुलामी से स्वतन्त्र कराने के लिए अनगिनत देशभक्त क्रान्तिकारियों ने हँसते-अपने प्राणों की आहुति दी है। उन्हीं शूरवीरों में अमर शहीद ऊधम सिंह का नाम आदर व श्रद्धा से लिया जाता है।

13 अप्रैल 1919 को बैसाखी का दिन था। उस दिन डा. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी तथा रोलट एक्ट के विरोध में अमृतसर के जलियाँवाला बाग में एक सभा का आयोजन किया गया था। देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत लगभग 10,000 से भी अधिक लोग उस सभा में उपस्थित थे। ऊधम सिंह वहाँ पर प्यासे लोगों को पानी पिलाने के पुनीत कार्य में लीन थे।

अंग्रेज सरकार से भारतीयों का देशप्रेम देखा नहीं गया। अत्याचारी अंग्रेज अधिकारी जनरल ओ’डायर के सैनिकों ने पूरे बाग को घेर लिया और निहत्थे आबालवृद्ध लोगों पर मशीनगनों से अंधाधुंध गोलीबारी करनी शुरू दी। हजारों भारतीय मारे गए। पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोग मारे गए थे।

इस घटना ने वीर ऊधम सिंह को विचलित करके रख दिया। तत्काल ही उन्होंने ओ’डायर को सबक सिखाने के लिए शपथ ले लिया। ऊधम सिंह ने बहुत प्रयास किया किन्तु ओ’डायर के भारत में रहते तक उन्हे अपने शपथ को पूरा करने का मौका नहीं मिला। ओ’डायर वापस इंगलैंड चला गया। ओ’डायर के वापस चले जाने पर भी ऊधम सिंह अपना शपथ नहीं भूले। प्रतिशोध लेने के लिए उन्होंने 20 मार्च 1933 के दिन लाहौर में अपना पासपोर्ट बनवाया और इंगलैंड चले गए। अपना उद्देश्य पूर्ण करने के लिए उन्हें वहाँ लगभग सात साल और इंतजार करना पड़ा।

अन्ततः इंतजार की घड़ियाँ खत्म हुईं। 13 मार्च 1940 को ओ’डायर लंदन के काक्सटन हाल में एक सभा में शामिल होने के लिए गया। ऊधम सिंह ओ’डायर का वध करने के लिए 45 स्मिथ एण्ड वेसन रिवाल्वर पहले ही खरीद चुके थे। एक मोटी किताब के पन्नों को बीच से काटकर तथा किताब के भीतर अपने रिवाल्वर को छिपाकर ऊधम सिंह भी उस सभा में पहुँच गए। मौका मिलते ही उन्होंने मंच पर उपस्थित ओ’डायर को लक्ष्य करके 6 राउंड गोलियाँ दाग दीं। ओ’डायर को दो गोलियाँ लगीं और उसके प्राण पखेरू उड़ गए।

प्रतिशोध के पूर्ण हो जाने पर ऊधम सिंह कायरतापूर्वक भागे नहीं बल्कि उन्होंने वीरतापूर्वक स्वयं गिरफ्तार करवा दिया। उन्होंने कहा "मेरी उससे शत्रुता थी इसीलिए मैंने उसे मारा। वह इसी लायक था। ऐसा मैंने किसी अन्य या किसी संस्था के कहने से नहीं किया है वरन् ऐसा करना मेरा अपना फैसला था।" (“I did it because I had a grudge against him, he deserved it. I don’t belong to any society or anything else.)


ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव में हुआ था। 1901 में उनकी मां और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया और उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। ऊधम सिंह के बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्ता सिंह था, जिन्हें अनाथालय में क्रमश: ऊधम सिंह और साधु सिंह के रूप में नए नाम दिए गए। 1917 में उनके बड़े भाई का भी स्वर्गवास हो गया। 1919 में वे अनाथालय छोड़ क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए।

मेट्रोपोलिटन पोलिस रिपोर्ट फाइल क्र. MEPO 3/1743, दिनांक 16 मार्च 1940 के में लिखा है "हमें उसके जीवन के विषय में सूचना मिली है कि वह एक बेहद सक्रिय, अनेक स्थानों की यात्रा किया हुआ,  राजनीति से प्रेरित, धर्मनिरपेक्ष विचारधारा वाला युवक था तथा उसके पास अपने जीवन का महान उद्देश्य था। वह साम्यवाद का समर्थक था और भारत में ब्रिटश शासन के प्रति उसके हृदय में प्रबल घृणा थी।" (we find information concerning his life, which reveals him to be a highly active, well-travelled, politically motivated, secular-minded young man with some great purpose in his life, a supporter of Bolshevism and driven by an ardent hatred of British rule in India.)


दुःख का विषय है कि हमें बताए जाने वाले इतिहास में देशभक्तो के विषय में नहीं के बराबर ही सामग्री पाई जाती है।

Wednesday, December 29, 2010

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 6 (Hindi Proverbs)

प्रस्तुत हैं हिन्दी की कुछ लोकोक्तियाँ तथा मुहावरे और उनके अर्थ। उनके अर्थ मैंने अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार बनाए हैं और उनमें त्रुटि की सम्भावना है अतः यदि आपको त्रुटियाँ नजर आएँ तो कृपया टिप्पणी करके सही अर्थ बताने का कष्ट करें।

इन तिलों में तेल नहीं

अर्थः किसी प्रकार का आसरा न होना।

इसके पेट में दाढ़ी है

अर्थः कम उम्र में बुद्धि का अधिक विकास होना।

इस हाथ दे उस हाथ ले

अर्थः किसी कार्य का फल तत्काल चाहना।

ईद का चॉद

अर्थः लम्बे अरसे के बाद दिखाई देने वाला

उँगली पकड़ कर पहुँचा पकड़ना

अर्थः थोड़ा आसरा पाकर पूर्ण अधिकार पाने का प्रयास करना।

उल्टा चोर कोतवाल को डॉंटे

अर्थः दोषी होने पर भी दूसरों पर धौंस जमाना।

उगले तो अंधा, खाए तो कोढ़ी

अर्थः दुविधा में पड़ना।

उत्त़र जाए या दक्खिन, वही करम के लक्ख़न

अर्थः स्थान बदल जाने पर भी व्यक्ति के लक्षण नहीं बदलते।

उलटी गंगा पहाड़ चली

अर्थः असंभव कार्य।

उलटे बाँस बरेली को

अर्थः विपरीत कार्य करना।

ऊँची दुकान फीका पकवान

अर्थः तड़क-भड़क करके स्तरहीन चीजों को खपाना।

ऊँट किस करवट बैठता है

अर्थः सन्देह की स्थिति में होना।

ऊँट के मुँ‍ह में जीरा

अर्थः अत्यन्त अपर्याप्त।

ऊधो का लेना न माधो का देना

अर्थः किसी के तीन-पाँच में न रहना, स्वयं में लिप्त होना।

एक अंडा वह भी गंदा

अर्थः बेकार की वस्तु।

एक अनार सौ बीमार

अर्थः किसी वस्तु की मात्रा बहुत कम किन्तु उसकी माँग बहुत अधिक होना।

एक आवे के बर्तन

अर्थः सभी का एक जैसा होना।

एक और एक ग्यारह होते हैं

अर्थः एकता में बल है।

एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा

अर्थः बहुत अधिक खराब होना।

एक गंदी मछली सारे तलाब को गंदा कर देती है

अर्थः अनेकों अच्छाई पर भी एक बुराई भारी पड़ती है।

Tuesday, December 28, 2010

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 5 (Hindi Proverbs)

आधा तीतर आधा बटेर

अर्थः बेमेल वस्तु।

आधी छोड़ पूरी को धावै, आधी मिले न पूरी पावै

अर्थः लालच करने से हानि होती है।

आप काज़ महा काज़

अर्थः अपने उद्देश्य की पूर्ति करना चाहिए।

आप भला तो जग भला

अर्थः भले आदमी को सब लोग भले ही प्रतीत होते हैं।

आप मरे जग परलय

अर्थः मृत्यु के पश्चात कोई नहीं जानता कि संसार में क्या हो रहा है।

आप मियाँ जी मँगते द्वार खड़े दरवेश

अर्थः असमर्थ व्यक्ति दूसरों की सहायता नहीं कर सकता।

आपा तजे तो हरि को भजे

अर्थः परमार्थ करने के लिए स्वार्थ को त्यागना पड़ता है।

आम खाने से काम, पेड गिनने से क्या मतलब

अर्थः निरुद्देश्य कार्य न करना।

आए की खुशी न गए का गम

अर्थः अपनी हालात में संतुष्ट रहना।

आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास

अर्थः लक्ष्य को भूलकर अन्य कार्य करना।

आसमान का थूका मुँह पर आता है

अर्थः बड़े लोगों की निंदा करने से अपनी ही बदनामी होती है।

आसमान से गिरा खजूर पर अटका

अर्थः सफलता पाने में अनेक बाधाओं का आना।

इक नागिन अरु पंख लगाई

अर्थः एक के साथ दूसरे दोष का होना।

इतना खाए जितना पावे

अर्थः अपनी औकात को ध्यान में रखकर खर्च करना।

इतनी सी जान, गज भर की ज़बान

अर्थः अपनी उम्र के हिसाब से अधिक बोलना।

इधर कुआँ उधर खाई

अर्थः हर हाल में मुसीबत।

इध्‍ार न उधर, यह बला किधर

अर्थः अचानक विपत्ति आ पड़ना।

Monday, December 27, 2010

हम कुछ भी तो नहीं कर सकते

पिछले डेढ़ दो साल के भीतर पेट्रोलियम उत्पादों के दाम चार बार बढ़े। पर हम क्या कर सकते हैं?

हम कुछ भी तो नहीं कर सकते।

दाल न मिलने पर आदमी प्याज के साथ रोटी खा लेता था भले ही प्याज काटने पर आँख से आँसू निकलते थे पर अब प्याज की कीमत सुनते ही आँख से आँसू निकलने लगते हैं। प्याज की कीमत आसमान छू रही है। पर हम क्या कर सकते हैं?

हम कुछ भी तो नहीं कर सकते।

टमाटर की लाली से हमारा मोहभंग हो गया है क्योंकि टमाटर खरीदने का अब हममें साहस नहीं रह पाया है। टमाटर के दाम सुनकर अब हम टमाटर खाने की इच्छा को भीतर ही भीतर कहीं दफन कर देते हैं। टमाटर के दाम इतने बढ़ चुके हैं की हम खरीद नहीं सकते। पर हम क्या कर सकते हैं?

हम कुछ भी तो नहीं कर सकते।

दाल खाना तो पहले ही मुहाल हो गया था, अब रोटी के भी लाले पड़ने लगे हैं। गेहूँ का दाम बढ़ गया है। पर हम क्या कर सकते हैं?

हम कुछ भी तो नहीं कर सकते।

हम तो जनता-जनार्दन हैं। वोट देकर सरकार बनाते हैं। फिर वही सरकार हमें महँगाई के गर्त में धकेलती चली जाती है। पर हम सब तो जनता होने के नाते निरीह प्राणी हैं। हम कर ही क्या सकते हैं?

हम कुछ भी तो नहीं कर सकते।

Sunday, December 26, 2010

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 4 (Hindi Proverbs)

प्रस्तुत हैं हिन्दी की कुछ लोकोक्तियाँ तथा मुहावर और उनका अर्थ। उनके अर्थ मैंने अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार बनाए हैं और उनमें त्रुटि की सम्भावना है अतः यदि आपको त्रुटियाँ नजर आएँ तो कृपया टिप्पणी करके सूचित करने का कष्ट करें।

आँख ओट पहाड़ ओट

अर्थः अनुपलब्ध व्यक्ति से किसी प्रकार का सहारा करना व्यर्थ है।

आँख और कान में चार अंगुल का फर्क

अर्थः सुनी हुई बात की अपेक्षा देखा हुआ सत्य अधिक विश्वसनीय होता है।

आँख के अंधे नाम नैनसुख

अर्थः व्यक्ति के नाम की अपेक्षा गुण प्रभावशाली होता है।

आ बैल मुझे मार

अर्थः जानबूझकर मुसीबत मोल लेना।

आई तो ईद, न आई तो जुम्मेरात

अर्थः आमदनी हुई तो मौज मौज मनाना नहीं तो फाका करना।

आई मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूँक

अर्थः विरक्त व्यक्ति को किसी चीज की परवाह नहीं होती।

आई है जान के साथ जाएगी जनाज़े के साथ

अर्थः लाइलाज बीमारी।

आग कह देने से मुँह नहीं जल जाता

अर्थः कोसने से किसी का अहित नहीं हो जाता।

आग का जला आग ही से अच्छा होता है

अर्थः कष्ट देने वाली वस्तु कष्ट का निवारण भी कर देती है।

आग खाएगा तो अंगार उगलेगा

अर्थः बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है।

आग बिना धुआँ नहीं

अर्थः बिना कारण कुछ भी नहीं होता।

आगे जाए घुटना टूटे, पीछे देखे आँख फूटे

अर्थः दुर्दिन झेलना।

आगे नाथ न पीछे पगहा

अर्थः पूर्णत: स्वतन्त्र रहना।

आज का बनिया कल का सेठ

अर्थः परिश्रम करते रहने से आदमी आगे बढ़ता जाता है।

आटे का चिराग, घर रखूँ तो चूहा खाए,बाहर रखूँ तो कौआ ले जाए

अर्थः ऐसी वस्तु जिसे बचाना मुश्किल हो।

आदमी-आदमी में अंतर कोई हीरा कोंई कंकर

अर्थः व्यक्तियों के स्वभाव तथा गुण भिन्न-भिन्न होते हैं।

आदमी का दवा आदमी है

अर्थः मनुष्य ही मनुष्य की सहायता करते हैं।

आदमी को ढाई गज कफन काफी है

अर्थः अपनी हालत पर संतुष्ट रहना।

आदमी जाने बसे सोना जाने कसे

अर्थः आदमी की पहचान नजदीकी से और सोने की पहचान सोना कसौटी से होती है।

आम के आम गुठलियों के दाम

अर्थः दोहरा लाभ होना

Saturday, December 25, 2010

विश्व-साहित्य की प्रमुखतम कृति - रामायण

जरा कल्पना करें कि आपने कभी कोई रचना नहीं पढ़ी है और आपके पास किसी प्रकार का सन्दर्भ नहीं है। ऐसी स्थिति में क्या आप कुछ लिख पाएँगे? वाल्मीकि के साथ ऐसी ही स्थिति थी, वे आदिकवि थे, प्रथम काव्य रचने वाले। किसी भी प्रकार का सन्दर्भ उनके पास नहीं था किन्तु उन्होंने रामायण जैसा महाकाव्य रच डाला जो कि विश्व-साहित्य में आज भी अपना प्रमुख स्थान रखता है। रामायण के प्रमुख पात्र 'राम' जहाँ आज्ञाकारी पुत्र हैं वहीं आदर्श पति भी हैं; वे आदर्श राजा हैं, प्रजा की भावना के समक्ष उनके लिए अपने सुख का कुछ भी मूल्य नहीं है; जहाँ दीन-हीनों के प्रति उनके हृदय में करुणा तथा दया का भाव है वहीं दुष्टों के प्रति वे अत्यन्त कठोर भी हैं; वे प्रबल योद्धा और परम शूरवीर हैं; राम समस्त मर्यादाओं को निबाहने वाले हैं अतः मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। समस्त विश्व-साहित्य में राम जैसा कोई अन्य पात्र देखने में नहीं आता। राम, रावण जैसे महान अत्याचारी और उसके समर्थकों का विनाश करने वाले हैं, आर्य-संस्कृति की पताका को देश-देशान्तर में फहराने वाले हैं; कहा जाए तो राम भारत के आदिनिर्माता हैं।

राम की कीर्ति-गाथा देश-देशान्तर में फैली हुई है। उनके चरित्र पर अनगिनत ग्रंथों की रचना हुई हैं। इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है-’रामायण सत कोटि अपारा’। न केवल हमारे देश की प्रमुख भाषाओं में बल्कि विश्व के अन्य देशों की भी प्रमुख भाषाओं में रामायण की रचना हुई है। समस्त विश्व में रामकथा की लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि राम की कीर्ति-गाथा ने मलेशिया में ‘हिकायत सिरी राम’, थाईलैंड में रामकथा को ‘रामकियेन’ या ‘रामकीर्ति’, कम्बोडिया में ‘रामकोर’, लाओस में ‘फालाक फालाम’ तथा दूसरा ‘फोमचक्र’ जैसे ग्रंथों का रूप धारण किया हुआ है। राम के प्रति श्रद्धा विश्व के सभी समुदाय के लोगों के हृदय में पाई जाती है। जावा, वियतनाम, बर्मा, चीन, जापान, मैक्सिको तथा मध्य अमरीका में रामकथा अत्यन्त लोकप्रिय है।

रामकथा ग्रंथों में वाल्मीकि रचित रामायण का अत्यन्त उच्च स्थान है। वाल्मीकि रामायण एक विशद् ग्रंथ है और आज के जमाने में विस्तृत ग्रंथों को पढ़ने के लिए लोगों के पास समय की कमी है। इसी बात को ध्यान में रखकर हमने वाल्मीकि रामायण का संक्षिप्तीकरण किया है ताकि सभी लोग उसे पढ़ सकें। अब हमारा लक्ष्य है "संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" के सात काण्डों को ईपुस्तक के रूप में अत्यन्त सस्ते दाम में प्रत्ये कम्प्यूटर तक पहुँचाना। अब संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण ईपुस्तक के रूप में उपलब्ध है!

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जी.के. अवधिया, द्वारा अभय फ्यूल्स, विधानसभा मार्ग, लोधीपारा, रायपुर छ.ग. के पते पर ड्राफ्ट, चेक या मनीआर्डर करके भी ईपुस्तक खरीदी जा सकती है।

रामायण महाकाव्य आयु तथा सौभाग्य को बढ़ाता है और पापों का नाश करता है। इसका नियमित पाठ करने से मनुष्य की सभी कामनाएँ पूरी होती हैं और अन्त में परमधाम की प्राप्ति होती है। सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में एक भार स्वर्ण का दान करने से जो फल मिलता है, वही फल प्रतिदिन रामायण का पाठ करने या सुनने से होता है। यह रामायण काव्य गायत्री का स्वरूप है। यह चरित्र धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों को देने वाला है। इस प्रकार इस पुरान महाकाव्य का आप श्रद्धा और विश्‍वास के साथ नियमपूर्वक पाठ करें। आपका कल्याण होगा।

Friday, December 24, 2010

तुम क्यों लिखते हो?

पोस्ट का शीर्षक मेरा अपना नहीं है बल्कि रामाधारी सिंह 'दिनकर' जी की एक कविता का है। पता नहीं दिनकर जी ने अपनी कविता में यह प्रश्न किससे पूछा था, किन्तु कई सालों बाद इस कविता को फिर से पढ़ कर मुझे लगा कि कहीं उन्होंने यह प्रश्न मुझ जैसे अकिंचन ब्लोगर, जिसने 'नक्कारखाने में तूती की आवाज' जैसा अपना एक ब्लोग बना रखा है, से तो नहीं किया है! लीजिए आप भी पढ़ें दिनकर जी की इस कविता को -

तुम क्यों लिखते हो? क्या अपने अन्तरतम को
औरों के अन्तरतम के साथ मिलाने को?
अथवा शब्दों की तह पर पोशाक पहन
जग की आँखों से अपना रूप छिपाने को?

यदि छिपा चाहते हो दुनिया की आँखों से
तब तो मेरे भाई! तुमने यह बुरा किया।
है किसे फिक्र कि यहाँ कौन क्या लाया है?
तुमने ही क्यों अपने को अदभुत मान लिया?

कहनेवाले, जाने क्या-क्या कहते आए,
सुनने वालों ने मगर, कहो क्या पाया है?
मथ रही मनुज को जो अनन्त जिज्ञासाएँ,
उत्तर क्या उनका कभी जगत ने पाया है?

अच्छा बोलो, आदमी एक मैं भी ठहरा,
अम्बर से मेरे लिए चीज़ क्या लाए हो?
मिट्टी पर हूँ मैं खड़ा, जरा नीचे देखो,
ऊपर क्या है जिस पर टकटकी लगाए हो?

तारों में है संकेत? चाँदनी में छाया?
बस यही बात हो गई सदा दुहराने को?
सनसनी, फेन, बुदबुद, सब कुछ सोपान बना,
अच्छी निकली यह राह सत्य तक जाने की।

दावा करते हैं शब्द जिसे छू लेने का,
क्या कभी उसे तुमने देखा या जाना है?
तुतले कंपन उठते हैं जिस गहराई से,
अपने भीतर क्या कभी उसे पहचाना है?

जो कुछ खुलता सामने, समस्या है केवल,
असली निदान पर जड़े वज्र के ताले हैं;
उत्तर शायद, हो छिपा मूकता के भीतर
हम तो प्रश्नों का रूप सजाने वाले हैं।

तब क्यों रचते हो वृथा स्वांग, मानो सारा,
आकाश और पाताल तुम्हारे कर में हों?
मानो, मनुष्य नीचे हो तुमसे बहुत दूर,
मानो, कोई देवता तुम्हारे स्वर में हो।

मृतिका रचते हो? रचो; किन्तु क्या फल इसका?
खुलने की जोखिम से वह तुम्हें बचाती है?
लेकिन, मनुष्य की द्वाभा और सघन होती,
धरती की किस्मत और भरमती जाती है।

धो डालो फूलों का पराग गालों पर से,
आनन पर से यह आनन अपर हटाओ तो
कितने पानी में हो, इसको जग भी देखे,
तुम पल भर को केवल मनुष्य बन जाओ तो।

सच्चाई की पहचान कि पानी साफ़ रहे,
जो भी चाहे, ले परख जलाशय के तल को;
गहराई का वे भेद छिपाते हैं केवल,
जो जान बूझ गंदला करते अपने जल को।

Thursday, December 23, 2010

क्या किसी ब्लोगर को यह दिखाई नहीं पड़ता ....

हम लुटते रहे थे, लुटते रहे हैं और लुटते रहेंगे

हजारों वर्षों पूर्व सिकन्दर, मोहम्मद बिन कासिम, महमूद गज़नवी, मोहम्मद गोरी आदि के द्वारा हम लुटते रहे थे। फिर पुर्तगाली, फ्रांसीसी आदि लुटेरों ने आकर हमें लूटा और व्यापारी का भेष धारण कर भारत को लूटने वाले अंग्रेज लुटेरों ने तो विश्व के समृद्धतम देश भारत को कंगाल बना कर ही छोड़ा। हमारे देश की धन-सम्पदा हमारे यहाँ न रहकर विदेशों में चली गई।

आज हम बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा धन-लोलुप तथाकथित व्यापारियों और सत्ता-लोलुप राजनीतिबाजों के द्वारा लुट रहे हैं। आज भी हमारे देश की धन-सम्पदा को बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपने देशों में ले जा रही हैं और हमारे ही देश के स्वार्थी तत्व उसे स्विस बैंकों में भेजे जा रहे हैं।

आज अमरीका, रूस, जर्मनी, प्रांस और चीन जैसे शक्तिशाली देशों के राष्ट्रध्यक्ष, प्रधानमन्त्री आदि का भारत आगमन हो रहा है। क्या वे भारत की विदेशों में बढ़ी हुई साख या सुदृढ़ आर्थिक अर्थ-व्यवस्था से प्रभावित होकर यहाँ आ रहे हैं? कदापि नहीं! उनका मात्र उद्देश्य भारत के बाजार का दोहन करना ही है। स्पष्ट है कि भविष्य में भी हम लुटते ही रहेंगे क्योंकि हमारे देश के कर्ता-धर्ता, अपने राष्ट्र के हितों को ताक में रखकर, उनकी योजनाओं को स्वीकार करते हुए हमारे लुटे जाने के दस्तावेजों पर मुहर लगाए चले जा रहे हैं।

पर हम हैं कि अपनी रचनाओं और उन पर मिली टिप्पणियों पर मुग्ध हैं। हमें अपना लुटना दिखाई ही नहीं देता। हमें लगता ही नहीं कि हम ऐसा कुछ लिखें जिसे देश के करोड़ों लोग पढ़ें और उन्हें समझ में आ जाए कि हम सब लुटे जा रहे हैं, वे अपना लुटना देखकर आक्रोश में आ जाएँ, क्रान्ति करने की ठान लें।

पर क्यों लिखें हम कुछ ऐसा? ऐसा लिखने से हमें टिप्पणियाँ तो नहीं मिलने वाली हैं, गैर-ब्लोगर लोग हमारे पोस्टों को पढ़कर या तो अप्रभावित ही चले जाते हैं या फिर प्रभावित होकर कुछ करने की ठान लेते हैं (सिवा टिप्पणी करने के)। और यह तो जग जाहिर है कि हम टिप्पणी न मिलने वाली कोई बात लिखते ही नहीं हैं क्योंकि टिप्पणियाँ ही तो हम ब्लोगरों की वास्तविक सम्पदा है।

Wednesday, December 22, 2010

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 3 (Hindi Proverbs)

प्रस्तुत हैं हिन्दी की कुछ लोकोक्तियाँ तथा मुहावर और उनका अर्थ। उनके अर्थ मैंने अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार बनाए हैं और उनमें त्रुटि की सम्भावना है अतः यदि आपको त्रुटियाँ नजर आएँ तो कृपया टिप्पणी करके सूचित करने का कष्ट करें।


अपनी गॉंठ पैसा तो पराया आसरा कैसा

अर्थः समर्थ व्यक्ति को दूसरे के आसरे की आवश्यकता नहीं होती।

अपनी चिलम भरने के लिए दूसरे का झोपड़ा जलाना

अर्थः अपने छोटे से स्वार्थ के लिए दूसरे की भारी हानि कर देना।

अपनी छाछ को कोई खट्टा नहीं कहता

अर्थः अपनी चीज़ को कोई खराब नहीं बताता।

अपनी जाँघ उघारिए आपहि मरिए लाज

अर्थः अपने अवगुणों को दूसरों के समक्ष प्रस्तुत करके आप ही पछताना।

अपनी नींद सोना, अपनी नींद जागना

अर्थः मर्जी का मालिक होना।

अपनी नाक कटे तो कटे दूसरों का सगुन तो बिगड़े

अर्थः दूसरों का नुकसान करने के लिए अपने नुकसान की भी परवाह न करना।

अपनी पगड़ी अपने हाथ

अर्थः व्यक्ति अपनी इज्जत की रक्षा स्वयं ही कर सकता है।

अपने किए का क्या इलाज

अर्थः अपने द्वारा किए गए कर्म का फल भोगना ही पड़ता है।

अपने मरे बिना स्वर्ग नहीं दिखता

अर्थः दूसरों के भरोसे काम नहीं होता, सफलता पाने के लिए स्वयं परिश्रम करना पड़ता है।

अपने पूत को कोई काना नहीं कहता

अर्थः अपनी चीज को कोई बुरा नहीं कहता।

अपने मुँह मिया मिट्ठू बनाना

अर्थः अपनी बड़ाई आप करना।

अब की अब, तब की तब

अर्थः भविष्य की चिंता छोड़कर वर्तमान की ही चिंता करनी चाहिए।

अब सतवंती होकर बैठी लूट लिया सारा संसार

अर्थः उम्र भर बुरे कर्म करने के बाद अच्छा होने का दिखावा करना।

अभी तो तुम्हारे दूध के दाँत भी नहीं टूटे

अर्थः अभी तुम नादान हो।

अभी दिल्ली दूर है

अर्थः सफलता अभी दूर है।

अरहर की टट्टी गुजराती ताला

अर्थः मामूली वस्तु की रक्षा के लिए खर्च की परवाह न करना।

अजब तेरी माया, कहीं धूप कहीं छाया

अर्थः जीवन में सुख और दुःख आते ही रहते हैं।

अशर्फियाँ लुटाकर कोयलों पर मोहर लगाना

अर्थः अच्छे-बुरे का ज्ञान न होना।

आँख एक नहीं कजरौटा दस-दस

अर्थः व्यर्थ का आडम्बर करना।

Tuesday, December 21, 2010

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 2 (Hindi Proverbs)

प्रस्तुत हैं हिन्दी की कुछ लोकोक्तियाँ तथा मुहावर और उनका अर्थ। उनके अर्थ मैंने अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार बनाए हैं और उनमें त्रुटि की सम्भावना है अतः यदि आपको त्रुटियाँ नजर आएँ तो कृपया टिप्पणी करके सूचित करने का कष्ट करें।


अक्ल बड़ी या भैंस

अर्थः शारीरिक शक्ति की अपेक्षा बुद्धि का अधिक महत्व होता है।

अच्छी मति जो चाहों, बूढ़े पूछन जाओ

अर्थः बड़े-बूढ़ों के अनुभव का लाभ उठाना चाहिये।

अटकेगा सो भटकेगा

अर्थः दुविधा या सोच-विचार में पड़ने से काम नहीं होता।

अधजल गगरी छलकत जाए

अर्थः ओछा आदमी थोड़ा गुण या धन होने पर इतराने लगता है।

अनजान सुजान, सदा कल्याण

अर्थः मूर्ख और ज्ञानी सदा सुखी रहते हैं।

अब पछताए होत क्या जब चिडिया चुग गई खेत

अर्थः नुकसान हो जाने के बाद पछताना बेकार है।

अढ़ाई हाथ की ककड़ी, नौ हाथ का बीज

अर्थः अनहोनी बात।

बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख

अर्थः सौभाग्य से कोई बढिया चीज़ अपने-आप मिल जाती है और दुर्भाग्य से घटिया चीज़ प्रत्यत्न करने पर भी नहीं मिलती।

अपना-अपना कमाना,अपना-अपना खाना।

अर्थः किसी दूसरे के भरोसे नहीं रहना।

अपना ढेंढर देखे नहीं, दूसरे की फुल्ली निहारे।

अर्थः अपने बड़े से बड़े दुर्गुण को न देखना पर दूसरे के छोटे से छोटे अवगुण की चर्चा करना।

अपना मकान कोट समान।

अर्थः अपना घर सबसे सुरक्षित स्थान होता है।

अपना रख पराया चख।

अर्थः अपनी वस्तु बचाकर रखना और दूसरों की वस्तुएँ इस्तेमाल करना।

अपना लाल गँवाय के दर-दर माँगे भीख।

अर्थः अपनी बहुमूल्य वस्तु को गवाँ देने से आदमी दूसरों का मोहताज हो जाता है।

अपना ही सोना खोटा तो सुनार का क्या दोष।

अर्थः अपनी ही वस्तु खराब हो तो दूसरों को दोष देना उचित नहीं है।

अपनी- अपनी खाल में सब मस्त

अर्थः अपनी परिस्थिति से सतुष्ट रहना।

अपनी-अपनी ढफली, अपना-अपना राग

अर्थः सभी का अलग-अलग मत होना।

अपनी करनी पार उतरनी

अर्थः अच्छा परिणाम पाने के लिए स्वयं काम करना पड़ता है।

अपनी गरज से लोग गधे को भी बाप बनाते हैं

अर्थः येन-केन-प्रकारेण स्वार्थपूर्ति करना।

अपनी गरज बावली

अर्थः स्वार्थी आदमी दूसरों की परवाह नहीं करता।

अपनी गली में कुत्ता शेर

अर्थः अपने घर में आदमी शक्तिशाली होता है।

Monday, December 20, 2010

भारत में मुसलमानों की सफलता के कारण

(सामग्री 'आचार्य चतुरसेन' के उपन्यास "सोमनाथ" से साभार)

हिन्दू और मुस्लिम संस्कृतियाँ

लगभग चार हजार वर्षों तक हिन्दू संस्कृति निरन्तर विकसित होती रही। देश-देशान्तरों में भी उसका प्रचार हुआ। उसका सम्पर्क दूसरी संस्कृतियों से हुआ, उनका प्रभाव भी उस पर पड़ा, परन्तु उसका अपना रूप बिल्कुल स्थिर ही रहा। विदेशी विजेताओं तक ने उस संस्कृति के आगे सिर झुकाया और उसमें अपने को लीन कर लिया। यद्यपि ये विदेशी-शक, ग्रीक, हूण, सीथियन, सूची, कुशान आदि-हिन्दुओं की वर्ण-व्यवस्था एवं विभिन्न जातीय समुदायों के कारण उनमें पूर्णतया नहीं मिल पाए, परन्तु उन्होंने हिन्दू धर्म, हिन्दू भाषा, साहित्य, रीति-रिवाज, कला और विज्ञान को पूर्णतया अपनाकर हिन्दुओं की अनेक जातियों की भाँति अपनी एक जाति बना ली, और ये हिन्दू जाति का अविच्छिन्न अंग बन गए-ये ही आज राजपूत, गूजर, जाट, खत्री, अहीर आदि के रूप में हैं।

परन्तु मुसलमानों में एक ऐसा जुनून था कि वे ईरान, ग्रीस, स्पेन, चीन और भारत कहीं की भी संस्कृति से प्रभावित नहीं हुए। किसी भी देश की संस्कृति उन्हें अपने में नहीं मिला सकी। वे जहाँ-जहाँ गए, अपनी विजयिनी संस्कृति का डंका बजाते ही गए। उनके सामने एकेश्वरवाद, मुहम्मद साहब की पैगंबरी, कुरान का महत्व, बहिश्त और दोज़ख के स्पष्ट कड़े सिद्धान्त ऐसे थे, कि किसी भी संस्कृति को उनसे स्पर्द्धा करना असम्भव हो गया। उनके धर्म में तर्क को स्थान न था, तलवार को था। तलवार लेकर अपनी अद्भुत संस्कृति की वर्षा करते हुए, वे जहाँ-जहाँ गए, अपनी राजनैतिक सत्ता एवं सांस्कृतिक सत्ता स्थापित करते गए। इसमें कोई सन्देह नहीं कि भारतवर्ष अन्य देशों की अपेक्षा अपनी सांस्कृतिक सत्ता पर विशेषता रखता था, और भारत पर मुस्लिम संस्कृति की विजय, अन्य देशों की अपेक्षा भिन्न प्रकार की ही थी। भारत की राजनैतिक सत्ता संयोजक और विभाजक द्वन्द्वों से परिपूर्ण थी। संयोजक सत्ता की प्रबलता होने पर मौर्य, गुप्त, वर्धन आदि साम्राज्य सुगठित हुए, परन्तु जब विभाजक सत्ता का प्रादुर्भाव हुआ, तो केन्द्रीय शक्ति के खण्ड-खण्ड हो गए और देश छोटे-छोटे टुकड़ों में बँट गया।

विभाजक सत्ता

जिस समय भारत में मुस्लिम आगमन हुआ; उस समय विभाजक सत्ता का बोलबाला था। भारत छोटे-छोटे अनियन्त्रित टुकड़ों में बँट गया था। एकदेशीयता की भावना उनमें न रही थी। ये अनियन्त्रित राज्य परस्पर राजनैतिक सम्बन्ध नहीं रखते थे। प्रत्येक खण्ड राज्य अपने ही में सीमित था। यदि किसी एक खण्ड राज्य पर कभी विदेशी आक्रमण होता, तो वह भारत पर आक्रमण नहीं समझा जाता था। यदि कुछ राजा मिलकर एक होते भी थे, तो वैयक्तिक सम्बन्धों से। यह नहीं समझते थे कि यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है। धार्मिक और सामाजिक भिन्नताएँ भी इसमें सहायक थीं। दिल्ली का पतन चौहानों का, और कन्नौज का पतन राठौरों का समझा जाता था। इसमें हिन्दुत्व के पतन का भी समावेश है, इस पर विचार ही नहीं किया जाता था। ये छोटी-छोटी रियासतें, साधारण कारणों से ही परस्पर ईर्ष्या-द्वेष और शत्रुभाव से ऐसी विरोधिनी शक्तियों के अधीन हो गई थीं, कि सहायता तो दूर रही, एक के पतन से दूसरी को हर्ष होता था। ऐसी हालत में एक शक्ति को श्रेष्ठ मानकर विदेशी आक्रान्ताओं का सामना करना तो दूर की बात थी।

भ्रातृत्व, एकता और अनुशासन

मुसलमान एकदेशीयता और एकराष्ट्रीयता के भावों से ग्रथित थे। सब मुसलमान बन्धुत्व के भावों से बँधे थे। सामूहिक रोज़ा-नमाज़, खानपान ने उनमें ऐक्यवाद को जन्म दे दिया था। उनकी संस्कृति में एक का मरना सब का मरना, और एक का जीना सबका जीना था। राजपूतों में अनैक्य ही नहीं, घमण्ड भी बड़ा था। इससे कभी यदि वे एकत्र होकर लड़े भी, तो अनुशासन स्थिर न रख सके। मुसलमानों का अनुशासन अद्भुत था। उनके अनुशासन और धार्मिक कट्टरता ने ही उन्हें यह बल दिया, कि अपने से कई गुना अधिक हिन्दू सेना पर भी उन्होंने विजय पाई। युद्ध में जहाँ उन्हें लूट का लालच था, वहाँ धार्मिक पुण्य की भावना भी थी। धन और पुण्य दोनों को तलवार के बल पर वे लूटते थे। काफिरों को मौत के घाट उतारना या उन्हें मुसलमान बनाना, ये दोनों काम ऐसे थे, जिनसे उन्हें लोक-परलोक के वे सब सुख प्राप्त होने का विश्वास था, जिनके लुभावने वर्णन वे सुन चुके थे। और जिन पर बड़े-से-बड़े मुसलमान को भी अविश्वास न था। इसी ने उनमें स्फूर्ति और एकता एवं विजयोन्माद उत्पन्न कर दिया। हिन्दुओं में ऐसा कोई भाव न था। जात-पाँत के झगड़ों ने उनकी बन्धुत्व-भावना नष्ट कर दिया था, और विभाजक सत्ता ने उनकी राजनैतिक एकता को छिन्न-भिन्न कर दिया था। तिस पर सत्ताधारियों की गुलामी ने उनमें निराशा, विरक्ति और खिन्नता के भाव भी भर दिए थे। ऐसी हालत में देश-प्रेम या राष्ट्र-प्रेम उनमें उत्पन्न ही कहाँ से होता? राजपूतों में राजपूतीपन का जरूर जुनून था, पर इस रत्ती-भर उत्तेजक शक्ति के बल पर वे सिर्फ पतंगे की भाँति जल ही मरे, पाया कुछ नहीं।

हिन्दू समाज व्यवस्था ही पराजय का कारण

जब कोई नया आक्रमणकारी आता, प्रजा राजा को सहयोग देने की जगह अपना माल-मत्ता लेकर भाग जाती थी। राजा के नष्ट होने पर वह दूसरे राजा की अधीनता बिना आपत्ति स्वीकार कर लेती थी। राजपूत अन्य जाति के किसी योद्धा या राजनीतिज्ञ को कुछ गिनते ही न थे। इसी से कड़े से कड़े समय में भी राजा और प्रजा में एकता के भाव नहीं उदय होते थे। परन्तु मुसलमानों में भंगी से लेकर सुलतान तक एक ही जाति थी। प्रत्येक मुसलमान तलवार चलाकर काफिरों को मारकर पुण्य कमाने का या मरकर गाज़ी होने का इच्छुक रहता था। इस प्रकार हिन्दू समाज-व्यवस्था ही हिन्दुओं की पराजय का एक कारण बनी।

दूषित युद्धनीति

राजपूतों की युद्धनीति भी दूषित थी। सबसे बड़ा दूषण हाथियों की परम्परा थी। सिकन्दर के आक्रमण तथा दूसरे अवसरों पर प्रत्यक्ष ही हाथी पराजय का कारण बने थे। मुस्लिम अश्वबल विद्युत-शक्ति से शत्रु को दलित करता था। परन्तु हिन्दू सेनानी तोपों का आविष्कार होने पर भी हाथी पर ही जमे बैठे रहकर स्थिर निशाना बनने में वीरता समझते थे।

दूसरी वस्तु स्थिर होकर लड़ना तथा पीछे न हटना, उनके नाश का कारण बने। अवसरवादिता को वहाँ स्थान ही न था। युद्ध-योजना दुस्साहस पर ही निर्भर थी। बौद्धिक प्रयोग तो वहाँ होता ही न था। पीठ दिखाना घोर अपमान समझा जाता था। युद्ध में जय-प्राप्ति की भावना न थी, किन्तु जूझ मरने की थी। यद्यपि राजपूत साधारण कारणों से आपस में तो आक्रमण करते थे, पर विदेशियों पर इन्होंने कभी आक्रमण नहीं किया।

तीसर दोष, सेनापतियों का आगे होकर उस समय तक युद्ध करना, जब तक कि वे मर न जावें, युद्ध न था, वरन् मृत्यु-वरण था। यह नीति महाभारत से लेकर राजपूतों के पतन तक भारत में देखी गई। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि भारतीय युद्ध-कला का नेतृत्व योद्धाओं के हाथ में रहा, सेनापति के हाथ में नहीं। सेनापति का तो भारतीय युद्धों में अभाव ही रहा। भारतीय युद्धों के इतिहास में तो आगे चलकर केवल दो ही रणनीति-पण्डित हुए, एक मेवाड़ के महाराज राजसिंह, दूसरे छत्रपति शिवाजी। और दैव-विपाक से दोनों ही ने अपनी क्षुद्र शक्ति से आलमगीर औरंगजेब की प्रबल वाहिनी से टक्कर ली, तथा उसे सब तरह से नीचा दिखाया।

मुसलमानों का भर्ती क्षेत्र अद्वितीय था। अफगानिस्तान और उसके आस-पास की मुस्लिम जातियाँ, जो भूखी और खूँखार थीं, जिन्हें लूट-लालच और जिहाद का जुनून था, जो काफिरों से लड़कर मरना, शहीद होना और जीतना मालामाल होना समझते थे, भर्ती के समाप्त न होने वाले क्षेत्र थे। मुसलमानों को कभी भी सैनिकों की कमी न रही। महमूद गज़नवी और मुहम्मद गोरी की सेनाओं में अनगिनत मनुष्यों की मृत्यु होती थी, परन्तु टिड्डी दल की भाँति उन्हें अनगिनत और सैनिक मिल जाते थे। उन्हें इन अभियानों में तो धन-जन की क्षति होती थी, उससे उन्हें अधैर्य और निराशा नहीं होती थी, क्योंकि उन्हें अटूट धन-रत्न, सुन्दर दास-दासी और ऐश्वर्य प्राप्त होते थे, साथ ही धार्मिक ख्याति और लाभ होने का भी विश्वास था। वे इन्हें धर्मयुद्ध समझते और सदा उत्साहित रहते थे।

हिन्दुओं का भर्ती क्षेत्र सदा संकुचित था, वह एक राज्य या एक जाति और एक वर्ग तक ही सीमित था। छोटी-छोटी रियासतें थीं। उनमें भी केवल क्षत्रिय लड़ते थे। अन्य वर्गों की उन्हें कोई सहायता ही नहीं प्राप्त होती थी। इसलिए वे युद्धोत्तर-काल में निरन्तर क्षीण होते जाते थे। उनकी युद्धकला ऐसी दूषित थी कि एक-दो दिन के युद्ध में ही उनके भाग्यों का समूल निपटारा हो जाता था। फिर कुछ करने-धरने-संभलने की तो कोई गुंजाइश ही न थी।

यदि आप कौटिल्य अर्थशास्त्र में वर्णित युद्ध-नीति पर गम्भीर दृष्टि डालें, तो आपको आश्चर्यचकित हो जाना पड़ेगा। उसमे ऐसी विकसित युद्ध-कला की व्याख्या है, कि जिसके आधार पर सब मानवीय और अमानवीय तत्वों तथा गुण-दोषों को युद्ध के उपयोग में लिया है। बड़े दुःख का विषय है कि राजपूतों को इस युद्ध-कला से वंचित रहना पड़ा; उनकी युद्ध-कला केवल मृत्यु-वरण कला थी।

सेनानायक की जब तक मृत्यु न हो जाए, तब तक युद्ध में आगे बढ़कर वैयक्तिक पराक्रम प्रकट करते रहना बड़ी भयानक बात थी। इसकी भयानकता तथा घातकता का यह एक अच्छा उदाहरण है कि पृथ्वीराज ने संयोगिता के वरण में अपने सौ वीर सामन्तों में से साठ को कटा डाला और फिर किसी भाँति वह उनकी पूर्ति न कर सका। जिससे तराइन के युद्धों में उसे पराजित होकर अपना और भारतीय हिन्दू राज्य का नाश देखना पड़ा। राणा साँगा, राणा प्रताप तथा पानीपत के तृतीय युद्ध के अवसरों पर सेनानायकों की इस प्रकार क्षति होने पर, उसकी पूर्ति न होने पर ही हिन्दुओं को पराजय का सामना करना पड़ा।

मुसलमानों की सेना में प्रत्येक महत्वाकांक्षी योद्धा को उन्नत होने, आगे बढ़ने तथा युद्ध-क्षेत्र में तलवार पकड़ने का अधिकार तथा सुअवसर प्राप्त था। यहाँ तक, कि क्रीत दासों को भी अपनी योग्यता के कारण, न केवल सेनापतियों के पद प्राप्त होने के सुअवसर मिले, प्रत्युत वे बादशाहों तक की श्रेणी में अपना तथा अपने वंश का नाम लिखा सके। कुतुबुद्दीन, इल्तमश, बलवन आदि ऐसे व्यक्ति थे जो दास होते हुए भी अद्वितीय पराक्रमी और शक्तिशाली थे। इस प्रकार आप देखते हैं कि मुसलमान आक्रान्ताओं ने भारत में आकर यहाँ की जनता को अस्त-व्य्त, राज्यों को खण्ड-खण्ड, राजाओं को असंगठित और राजनीति तथा युद्ध-नीति में दुर्बल पाया। अलबत्ता उनमें शौर्य, साहस और धैर्य अटूट था। परन्तु केवल इन्हीं गुणों के कारण वे सब भाँति सुसंगठित मुसलमानों पर जय प्राप्त न कर सके - उन्हें राज्य और प्राण दोनों ही खोने पड़े।

Sunday, December 19, 2010

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 1 (Hindi Proverbs)

प्रस्तुत हैं हिन्दी की कुछ लोकोक्तियाँ तथा मुहावर और उनका अर्थ। उनके अर्थ मैंने अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार बनाए हैं और उनमें त्रुटि की सम्भावना है अतः यदि आपको त्रुटियाँ नजर आएँ तो कृपया टिप्पणी करके सूचित करने का कष्ट करें।


अंडा सिखावे बच्चे को चीं-चीं मत कर

अर्थः छोटे के द्वारा बड़े को उपदेश देना।

अंडे सेवे कोई, बच्चे लेवे कोई

अर्थः परिश्रम कोई करे लाभ किसी और को मिले।

अंडे होंगे तो बच्चे बहुतेरे हो जाएंगे

अर्थः मूल वस्तु रहने पर उससे बनने वाली वस्तुऍं मिल ही जाती हैं।

अंत भला सो सब भला

अर्थः कार्य का परिणाम सही हो जाए तो सारी गलतियाँ भुला दी जाती हैं।

अंत भले का भला

अर्थः भलाई करने वाले का भला ही होता है।

अंधा बाँटे रेवड़ी अपने-अपने को देय

अर्थः अपने अधिकार का लाभ अपनों लोगों को ही पहुँचाना।

अंधा क्या चाहे, दो आँखें

अर्थः मनचाही वस्तु प्राप्त होना।

अंधा क्या जाने बसंत बहार

अर्थः जो वस्तु देखी ही नहीं गई, उसका आनंद कैसे जाना जा सकता है।

अंधा पीसे कुत्ता‍ खाय

अर्थः एक की मजबूरी से दूसरे को लाभ हो जाता है।

अंधा बगुला कीचड़ खाय

अर्थः भाग्यहीन को सुख नहीं मिलता।

अंधा सिपाही कानी घोड़ी,विधि ने खूब मिलाई जोड़ी

अर्थः बराबर वाली जोड़ी बनना।

अंधे अंधा ठेलिया दोनों कूप पड़ंत

अर्थः दो मूर्ख एक दूसरे की सहायता करें तो भी दोनों को हानि ही होती है।

अंधे की लाठी

अर्थः बेसहारे का सहारा।

अंधे के आगे रोये, अपनी आँखें खोये

अर्थः मूर्ख को ज्ञान देना बेकार है।

अंधे के हाथ बटेर लगना

अर्थः अनायास ही मनचाही वस्तु मिल जाना।

अंधे को अंधा कहने से बुरा लगता है

अर्थः किसी के सामने उसका दोष बताने से उसे बुरा ही लगता है।

अंधे को अँधेरे में बड़े दूर की सूझी

अर्थः मूर्ख को बुद्धिमत्ता की बात सूझना।

अंधेर नगरी चौपट राजा , टके सेर भाजी टके सेर खाजा

अर्थः जहाँ मुखिया मूर्ख हो और न्याय अन्याय का ख्याल न रखता हो।

अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता

अर्थः अकेला व्यक्ति किसी बड़े काम को सम्पन्न करने में समर्थ नहीं हो सकता।

अकेला हँसता भला न रोता भला

अर्थः सुख हो या दु:ख साथी की जरूरत पड़ती ही है।

Saturday, December 18, 2010

हम.... याने कि करमहीन खेती करे, बैल मरे या सूखा पड़े

शिरीष के सूखे फल की भाँति, जो कि वृक्ष के फूल-पत्ते झड़ जाने तथा पेड़ के ठूँठ जैसा हो जाने के बावजूद भी, पेड़ से लटकते और खड़खड़ाते ही रहता है, हम भी, साठ साल की उम्र पार कर जाने परवाह न करते हुए, ब्लोगिंग और इंटरनेट के संसार रूपी वृक्ष के सूखे फल बनकर लटके ही हुए हैं। साफ जाहिर है कि "कब्र में पाँव लटक रहा है" फिर भी हम "सींग कटा कर बछड़ों में शामिल" हैं। हमें पता है कि "अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता" और "अकेला हँसता भला न रोता भला", फिर भी हम यह सोचकर कि "जब ओखली में सर दिया तो मूसलों से क्या डरना" अपने ब्लोग में अकेले "अपनी ही हाँके जा रहे हैं" क्योंकि यह ब्लोगिंग हमारे लिए "उगले तो अंधा, खाए तो कोढ़ी" याने कि "साँप के मुँह में छुछूंदर" बनकर रह गई है।

पाँच-छः साल पहले स्वेच्छा से सेवानिवृति लेकर अतिरिक्त आमदनी की आशा लेकर नेट की दुनिया में आए थे, शुरू-शुरू में अंग्रेजी ब्लोगिंग से कुछ कमाई की भी, भले ही वह "ऊँट के मुँह में जीरा" जैसी रही हो। किन्तु बाद में फँस गए हिन्दी ब्लोगिंग के चक्कर में और हमारी "गरीबी में आटा गीला" होने लगा क्योंकि इस चक्कर में फँस जाने के बाद ही हमें पता चला कि "इन तिलों में तेल नहीं है"। अब तो आप समझ ही चुके होंगे कि हम सिर्फ यही कहना चाहते हैं कि "आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास"। हमारे साथ तो अब तक "करमहीन खेती करे, बैल मरे या सूखा पड़े" जैसी ही स्थिति बनी रही है पर हमने भी सोच लिया है "जितना पावे उतना खावे, ना पावे तो भूखे सो जावे" क्योंकि ये हिन्दी ब्लोगिंग तो हमारे पास "आई है जान के साथ पर जाएगी जनाजे के साथ"। इतना पढ़कर अब तो आप यही सोच रहे होंगे कि अजब सनकी बुड्ढा है ये तो, "अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग" वाला।

भले ही हमारा ब्लोग "कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानमती ने कुनबा जोड़ा" हो पर हम तो "कर लिया सो काम, भज लिया सो राम" का सिद्धान्त अपना कर अपने इस ब्लोग में पोस्ट पेले ही चले जाएँगे। कभी न कभी तो "अंधे को अंधेरे में बड़ी दूर की सूझी" जैसे हमारा भी कोई पोस्ट आप लोगों को पसंद आएगा ही। हम तो सिर्फ यही जानते हैं कि "अटकेगा सो भटकेगा", और फिर "खाली बनिया क्या करे, इस कोठी का धान उस कोठी में धरे"। हो सकता है "कर सेवा तो खा मेवा" जैसे कभी हिन्दी ब्लोगिंग से आमदनी होना भी चालू हो जाए क्योंकि आप तो जानते ही हैं "बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख"। पर हमें तो यह भी सोचना पड़ता है कि ऐसा होना हमारे लिए "का वर्षा जब कृषी सुखाने" जैसा न हो जाए क्योंकि वैसा समय आने तक कहीं हम लुढ़क ना चुके हों। पर चिंता करने की कोई बात ही नहीं है क्योंकि "आदमी को ढाई गज कफन काफी है"!

Friday, December 17, 2010

हर कोई यह सोचता है कि मैं संसार को बदल दूँगा

हर कोई यह सोचता है कि मैं संसार को बदल दूँगा पर यह कोई नहीं सोचता कि मैं स्वयं को बदल लूँ।
लियो टॉल्स्टाय

अपनी तुलना इस संसार के किसी अन्य व्यक्ति से कभी भी न करें। यदि आप ऐसा करते हैं तो स्वयं का अपमान करते हैं।
एलेन स्ट्राइक

यदि हम उस व्यक्ति से प्रेम नहीं कर सकते जिसे कि हम देख रहे हैं तो हम भगवान से कैसे प्रेम कर सकेंगे जिन्हें कि हम देख नहीं सकते?
मदर टेरेसा

विजय का अर्थ हमेशा सर्वप्रथम होना नहीं होता बल्कि विजय का अर्थ होता है कि आप किसी काम को पहले से बेहतर ढंग से कर रहे हैं।
बोनी ब्लेयर

मैं यह नहीं कहूँगा कि मैं 1000 बार असफल हुआ बल्कि मैं यह कहूँगा कि असफल होने के 1000 रास्ते हैं।
थामस एडीसन


हर किसी पर विश्वास कर लेना खतरनाक बात है पर उस से भी खतरनाक बात है किसी पर भी विश्वास न करना।
अब्राहम लिंकन

यदि कोई यह समझता है कि उसने अपने जीवन में कभी भी कोई गलती नहीं की है तो इसका मतलब हुआ कि उसने अपने जीवन में कभी भी कुछ नया नहीं किया।
आइंसटीन

विश्वास, वादा, सम्बन्ध और दिल - इन चारों में से कभी किसी को न तोड़ें टूटने पर ये आवाज उत्पन्न नहीं करते सिर्फ अत्यधिक दर्द उत्पन्न करते हैं।
चार्ल्स

Thursday, December 16, 2010

देवनागरी लिपि - पूर्णतः वैज्ञानिक लिपि

शायद आपको पता होगा कि हमारी हिन्दी की वर्णमाला, वास्तव में देवनागरी वर्णमाला, पूर्णतः वैज्ञानिक है। वर्ण या अक्षर ध्वनि को प्रदर्शित करने वाले संकेत होते हैं और देवनागरी वर्णमाला को पूर्णतः ध्वनि की उत्पत्ति के आधार पर ही बनाया गया है। मनुष्य ध्वनि उत्पन्न करने के लिये अर्थात् बोलने के लिये कंठ से होठों तक के तंत्र का प्रयोग करता है और देवनागरी वर्णमाला में इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि एक ही प्रकार से उत्पन्न होने वाली ध्वनियों का विशेष वर्ग हो।

कंठ से निकलने वाली ध्वनियों को स्वर कहा जाता है और उन ध्वनियों को जिनके उच्चारण के लिये उनके साथ स्वरों का मेल होना आवश्यक होता है व्यंजन कहा जाता है। देवनागरी के स्वर अ, आ इ, ई, उ, ऊ ए, ऐ, ओ, औ, अं तथा अः सीधे कंठ से उत्पन्न होते हैं तथा इनके बोलने में अन्य स्वर तंत्र जैसे कि जीभ, तालू, मूर्धा, होठ आदि का कहीं प्रयोग नहीं होता। इन 12 स्वरों के अतिरिक्त देवनागरी के चार और स्वर ऋ, ॠ, ऌ तथा ॡ हैं जो कि सीधे कंठ से उत्पन्न नहीं होते किन्तु माने स्वर ही जाते हैं। इनमें से अंतिम तीन स्वरों का प्रयोग केवल संस्कृत में ही होता है, इनका प्रयोग हिन्दी में बिल्कुल ही नहीं होता। अन्य लिपियों में भी सीधे कंठ से निकलने वाली ध्वनियों को स्वर (vowel) कहा जाता है जैसे कि अंग्रेजी में a e i o u स्वर (vowel) हैं।

शेष 36 व्यंजन हैं जिन्हें कि उनकी उत्पत्ति के आधार पर आठ वर्गों में बाँटा गया है जो कि नीचे दर्शाये जा रहे हैं

क ख ग घ ङ (क वर्ग)
च छ ज झ ञ (ख वर्ग)
त थ द ध न (त वर्ग)
ट ठ ड ढ ण (ट वर्ग)
प फ ब भ म (प वर्ग)
य र ल व
स श ष ह
क्ष त्र ज्ञ

एक वर्ग के वर्णो के उच्चारण करने पर हर बार ध्वनि तंत्रों की एक ही जैसी क्रिया होती है जैसे कि प वर्ग के वर्णों को बोलने में दोनों होठ आपस में जुड़ कर अलग होंगे।

यहाँ पर यह भी बता देना उचित है कि ड़ तथा ढ़ की गणना देवनागरी के 52 अक्षरों में नहीं होती बल्कि ये संयुक्ताक्षर कहलाते हैं।

देवनागरी लिपि का पूर्णतः वैज्ञानिक आधार पर होने के ही कारण माना जाता है कि यह कम्प्यूटर के लिये सर्वथा उपयुक्त लिपि है किन्तु अक्षरों के अनेकों प्रकार से मेल होने की जटिलता के कारण इस लिपि में कैरेक्टर्स की संख्या का निर्धारण न हो पाने के कारण इसका कम्प्यूटर की भाषा में सही सही प्रयोग हो पाना अभी तक सम्भव नहीं हो सका है।

Wednesday, December 15, 2010

महमूद गजनवी का सत्रह बार आक्रमण - इतिहास का सच या कपोल कल्पना?

हमारा इतिहास हमें बताता है कि महमूद गज़नवी ने सन् 1000-1027 के बीच भारत के राजाओं के साथ 17 बार आक्रमण किया था तथा भारत के पंजाब, मथुरा, गुर्जर आदि विस्तृत क्षेत्रों पदाक्रान्त किया था।

मथुरा किसी अन्य दिशा में है तो सोमनाथ किसी अन्य दिशा में। इसका अर्थ यह हुआ कि महमूद ने चतर्दिक् आक्रमण किया था और जिन क्षेत्रों में उसने आक्रमण किया था वह हजारों मील के दायरे में विस्तीर्ण था। उसके साथ हजारों-लाखों की संख्या में घुड़सवारों के साथ ही पैदलों की सेना थी। उस काल में आज जैसे मोटरयान, रेलयान और वायुयान जैसी सुविधाए उपलब्ध नहीं थीं अर्थात् महमूद की कुछ सेना तो घोड़ों पर चला करती थी और अधिकतर सेना पैदल चला करती थी। अब सवाल यह उत्पन्न होता है कि हजारों मील के क्षेत्र को पार करने के लिए उस पैदल सेना को कितना समय लगा होगा? आखिर उसकी सेना की गति क्या थी? क्या उसकी सेना दिन-रात चौबीसों घंटे चलते ही रहती थी या उन्हें पड़ाव भी डालना पड़ता रहा होगा?

भारत के क्षेत्र उसके लिए अनजाने स्थान थे इसलिए भारत के विभिन्न आक्रमणस्थलों तक पहुँचने के मार्गों का पता लगाने के लिए अवश्य ही उसे अपने जासूसों के साथ ही स्थानीय लोगों की सहायता भी लेनी पड़ती रही होगी। अपने आक्रमण के लिए सहायता पहुँचाने वाले स्थानीय लोग क्या तत्काल प्राप्त हो जाया करते थे? और यदि तत्काल नहीं प्राप्त होते थे तो वैसे लोगों को बहलाने-फुसलाने या खरीदने के लिए उसे कितना समय लगता था?

गज़नी से विभिन्न आक्रमण स्थलो तक के मार्ग भौगोलिक रूप से सिर्फ मैदानी ही नहीं थे जो कि आसानी के साथ पार कर लिए जा सकते हैं, बल्कि उनके मध्य अनेक अगम्य पर्वत-मालाएँ, अथाह जल को कलकल ध्वनि से प्रवाहित करने वाली चौड़ी तथा गहरी नदियाँ, जलरहित, कँटीले कैक्टस के रक्तवर्ण पुष्पों तथा रेत से सुसज्जित विशाल मरुभूमि भी थे। इन दुर्गम पहाड़ों-नदियों-मरुभूमि आदि को वह तथा उसकी सेना कैसे और कितने समय में पार किया करती थी?

मार्ग के मध्य अवश्य ही अनेक छोटे-मोटे राज्य, जागीर आदि भी थे जिनकी सुरक्षा के लिए उनके अपने दुर्ग थे। हो सकता है कि उनमें से अधिकांश ने महमूद के समक्ष समर्पण कर दिया हो, पर कुछ ने अवश्य ही युद्ध किया होगा। उस काल में युद्ध के दौरान अनेक बार दुर्गों को महीनों तक घेरा भी डालना होता था। ऐसे दुर्गों को जीतने के लिए उसकी सेना ने कितने समय तक घेरा डाला होगा?

इतिहास यह भी बताता है कि प्रायः अपनी जीत के पश्चात् वह लूटी अपार सम्पदा को सुरक्षित करने तथा युद्धबन्दियों को गुलाम के रूप में बेचने के लिए वापस गज़नी चला जाया करता था। कुछ काल वहाँ रह कर वह पुनः आक्रमण के लिए भारत आता था। इस प्रकार बार-बार आने-जाने में उसने कितना समय व्यतीत किया होगा?

उस काल की परिस्थितियों तथा सुविधाओं को दृष्टिगत रखते हुए सत्रह बार आक्रमण करने के लिए क्या सत्ताइस-अट्ठाइस वर्षों का समय पर्याप्त है? यदि यह समय पर्याप्त नहीं है तो गज़नी के महमूद द्वारा भारत पर सत्रह बार आक्रमण करना इतिहास का सच है या मात्र कपोल कल्पना?

Tuesday, December 14, 2010

भारत में नापतौल पद्धति

मनुष्य जीवन के लिए नापतौल की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है। यह कहना अत्यन्त कठिन है कि नापतौल पद्धति का आविष्कार कब और कैसे हुआ होगा किन्तु अनुमान लगाया जा सकता है कि मनुष्य के बौद्धिक विकास के साथ ही साथ आपसी लेन-देन की परम्परा आरम्भ हुई होगी और इस लेन-देन के लिए उसे नापतौल की आवश्यकता पड़ी होगी। प्रगैतिहासिक काल से ही मनुष्य नापतौल पद्धतियों का प्रयोग करता रहा है। समय मापने के लिए वृक्षों की छाया को नापने चलन से लेकर कोणार्क के सूर्य मन्दिर के चक्र तक अनेक पद्धतियों का प्रयोग किया जाता रहा है।

भारत में विभिन्न कालों में नापतौल की विभिन्न पद्धतियाँ प्रचलित रही हैं। मनुस्मृति के 8वें अध्याय के 403वें श्लोक में कहा गया हैः

राजा को प्रति छः माह पश्चात् भारों (बाटों) तथा तुला (तराजू) की सत्यता सुनिश्चित करके राजकीय मुहर द्वारा सत्यापित करना चाहिए।

इससे स्पष्ट है कि भारत में अत्यन्त प्राचीनकाल से नापतौल की पद्धतियाँ रही हैं। प्रचलित जानकारी के अनुसार सिन्धु घाटी की पुरातात्विक खुदाई में मिले नापतौल के विभिन्न अवशेषों से ज्ञात होता है कि ईसा पूर्व 3000-1500 में सिन्धु घाटी सभ्यता के निवासियों ने मानकीकरण की एक परिष्कृत प्रणाली विकसित किया था। सिन्धु घाटी सभ्यता के इस नापतौल पद्धति को विश्व के प्राचीनतम पद्धतियों में से एक माना जाता है। सिन्धु घाटी सभ्यता की नापतौल प्रणाली कितनी परिष्कृत थी यह इसी से पता चलता है कि उस काल में भवन निर्माण के लिए प्रयोग की जाने वाली ईंटों की लम्बाई, चौड़ाई तथा ऊँचाई की माप सुनिश्चित थी जो कि 4:2:1 के अनुपात में होती थीं।

आज से लगभग 2400 वर्ष पहले चंद्रगुप्त मौर्य काल में भी माप तथा नापतौल के लिए अच्छी प्रकार से परिभाषित पद्धति का प्रयोग किया जाता था तथा राज्य के द्वारा माप के भारों (बाटों) एवं तुला (तराजू) की सत्यता सत्यापिक करने की परम्परा थी। उस काल की प्रणाली के अनुसार भार की सबसे छोटी इकाई एक परमाणु तथा लंबाई की सबसे छोटी इकाई अंगुल थी। लम्बी दूरी के लिए योजन का प्रयोग किया जाता था।

मध्यकाल में मुगल बादशाह अकबर ने भी नापतौल की एकरूप (uniform) प्रणाली विकसित किया था जिसका प्रयोग सम्पूर्ण देश में किया जाता था। अबुल फज़ल रचित आईने अकबरी के अनुसार उस काल में भूमि नापने की इकाई "इलाही गज" हुआ करती थी जो कि वर्तमान 33 इंच से 34 के बराबर थी। वजन नापने की इकाई "सेर" हुआ करता था।

ब्रिटिश काल में अंग्रेजों ने भी देश भर में नापतौल की एकरूप (uniform) प्रणाली विकसित किया वजन की इकाइयाँ मन, सेर, छँटाक, तोला, माशा और रत्ती थीं। भूमि मापने के लिए मील, एकड़, गज, फुट, इंच का प्रयोग किया जाता था। अंग्रेजों के द्वारा विकसित उस प्रणाली का प्रयोग स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भी सन् 1956 तक होता रहा। सन् 1956 में भारत सरकार ने नापतौल के नए मानक स्थापित किया और देश भर में नापतौल की मीटरिक पद्धति का चलन हो गया।

नीचे नापतौल की कुछ ब्रिटिश पद्धतियों के रूप दिए जा रहे हैं:

वजन

8 रत्ती     = 1 माशा
12 माशा = 1 तोला
5 तोला     = 1 छँटाक
16 छँटाक = 1 सेर
40 सेर = 1 मन

लंबाई

12 इंच = 1 फुट
3 फुट = 1 गज
220 गज = 1 फर्लांग
8 फर्लांग = 1 मील

मुद्रा

4 पैसा = 1 आना
16 आना = 1 रुपया

Monday, December 13, 2010

हिन्दी ब्लोगरों के गुणवत्तादल (Bloggers' Quality Circles)

यद्यपि अन्य भाषाओं, विशेषतः अंग्रेजी भाषा, में ब्लोगिंग की तुलना में हिन्दी ब्लोगिंग का विकास बहुत धीरे हुआ किन्तु यह भी सही है कि हिन्दी ब्लोगिंग अब बड़ी तेजी के साथ पैर पसारते जा रही है। हिन्दी ब्लोगिंग को अब मीडिया भी महत्व देने लगी है। निकट भविष्य में केन्द्र तथा राज्यों के सरकारों को भी हिन्दी ब्लोगिंग को महत्व देने के लिए विवश होना पड़ेगा। हिन्दी ब्लोग्स को अब सर्च इंजिन से भी पाठक प्राप्त होने लग गए हैं तथापि हिन्दी ब्लोग्स के पाठकों की संख्या आज भी बहुत कम है।

देखा जाए तो अंग्रेजी ब्लोगिंग और हिन्दी ब्लोगिंग में बहुत सारे अन्तर हैं किन्तु सबसे बड़ा अन्तर यह है कि जहाँ अंग्रेजी ब्लोगिंग एक आभासी दुनिया (virtual world) के रूप में लोगों के समक्ष आया वहीं हिन्दी ब्लोगिंग एक ब्लोगर परिवार या ब्लोगर समाज के रूप में उभर रहा है। हिन्दी ब्लोगिंग का परिवार या समाज के रूप में उभरने का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि देश-विदेश के हिन्दी ब्लोगरों में परस्पर प्रेम बढ़ते जा रहा है और वे एक-दूसरे के सुख-दुःख के सहभागी होते जा रहे हैं। किन्तु इसका एक ऋणात्मक पहलू यह भी है कि हिन्दी ब्लोगरों को पाठकों से जितना जुड़ना चाहिए, उतना वे जुड़ नहीं पा रहे हैं। पोस्ट लेखन के समय जितना ध्यान ब्लोगरों तथा उनसे मिलने वाली टिप्पणियों का रखा जा रहा है, उतना ध्यान पाठकों की रुचि की ओर नहीं दिया जा रहा है और इसीलिए ब्लोगरों के पोस्टों को प्रायः ब्लोगर ही पढ़ते हैं तथा उन्हें सामान्य पाठक नहीं मिल पाते। यदि हम सिर्फ अपनी और अन्य ब्लोगरों की रुचि को ही ध्यान में रखकर पोस्ट लिखेंगे और नेट पर आने वाले लोग क्या चाहते हैं इस बात का ध्यान ही नहीं रखेंगे तो हमें सामान्य पाठक कैसे मिल पाएँगे? ब्लोगरों में परस्पर सौहार्द्र यद्यपि बहुत अच्छी बात है किन्तु ब्लोगरों के लिए एक बड़ी संख्या में सामान्य वर्ग के पाठकों का होना भी अति आवश्यक है।

ब्लोग के रूप में हमें एक बहुत ही सशक्त माध्यम मिला है। ब्लोग में आपके द्वारा लिखे गए पोस्ट को अस्वीकार करके छपने से रोक देने वाला कोई संपादक नहीं है। यहाँ पर आपको अपनी बात कहने से कोई रोक नहीं सकता। आप चाहें तो अपने ब्लोग के माध्यम से देश और समाज को एक नई दिशा दे सकते हैं। आप अपनी भाषा का चतुर्दिक विकास कर सकते हैं। क्या यह दुःख की बात नहीं है कि हमारी भाषा हिन्दी आज भी अपने ही देश में अंग्रेजी की तुलना में दोयम दर्जे की बनी हुई है? हमारे बच्चों को अंग्रेजी की वर्णमाला रटे हुए हैं किन्तु वे हिन्दी की वर्णमाला जानते तक नहीं, वे अंग्रेजी के बारह माह का नाम बता सकते हैं किन्तु भारतीय कैलेण्डर के महीनों नाम नहीं जानते, यहाँ तक कि कभी चौंसठ कहने पर उन्हें पूछना पड़ता है कि चौंसठ का अर्थ "सिक्स्टी फोर" ही होता है न? याने कि हमारे बच्चे हिन्दी की गिनती तक नहीं जानते। हम अपने पोस्ट के माध्यम से सरकार को एक ऐसी शिक्षा नीति बनाने के लिए विवश कर सकते हैं जो अंग्रेजी की अपेक्षा हिन्दी को प्रधानता दे। ऐसा कहने में मेरा मन्तव्य अंग्रेजी का विरोध करना नहीं है, मैं अंग्रेजी तो क्या विश्व के किसी भी भाषा का विरोध कर ही नहीं सकता क्योंकि मेरा मानना है कि सभी भाषाएँ महान हैं। किन्तु मैं अपनी भाषा को अपने ही देश में किसी दूसरी भाषा की तुलना में दोयम दर्जे का होते देखना भी सहन नहीं कर सकता। और मेरा विश्वास है कि हिन्दी के ब्लोगर होने के नाते आप भी मेरे मत से सहमत होंगे। हम अपनी ब्लोगिंग से अपनी भाषा को उच्च स्थान दिला सकते हैं।

विक्रम संवत और शक संवत की अपेक्षा हमारे देश में ग्रैगेरियन कैलेण्डर को ही प्रधानता मिली हुई है। शक संवत को भारतीय पंचांग बनने के लिए ग्रैगेरियन कैलेण्डर का सहारा लेना पड़ता है। हमारे देश की नीतियों ने हमारी ही संस्कृति और सभ्यता को हमारी नजरों में गौण बना कर रख दिया है। आप अपने पोस्ट में इन बातों को उभार कर अपनी संस्कृति और सभ्यता को पुनः उनका स्थान दिला सकते हैं।

आज देश भर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पाद छाए हुए हैं। साधारण नमक तक हमें दूसरे देश की कम्पनियों से खरीदना पड़ता है। हमारी सरकार की नीति ने ही उन्हें बढ़ावा दे रखा है भारी मुनाफे लेकर अपने उत्पाद बेचकर हमें लूटने के लिए। हमारे देश के कुटीर उद्योग इनके कारण से पंगु हो गए हैं। हम ब्लोगर्स चाहें तो अपने पोस्ट के माध्यम से अपने देश की संपत्ति को दूसरे देशों में लूट कर ले जाने से रोक सकते हैं।

हम ब्लोगर सब कुछ करने में समर्थ हैं किन्तु सब कुछ तभी सम्भव होगा जब हमारे पास पाठकों की विशाल संख्या हो, हम अपने पोस्ट के माध्यम से देश के लाखों-करोड़ों लोगों को प्रभावित कर सकें। हमारे ब्लोग के पाठकों का न होना हमारे लिए एक बहुत बड़ी समस्या है और इस समस्या का निराकरण करने के लिए सबसे अच्छा तरीका होगा हिन्दी ब्लोगरों के गुणवत्ता दल (Bloggers' Quality Circles) बनाना।

क्या है गुणवत्ता दल (Quality Circle)

गुणवत्ता दल उन व्यक्तियों का समूह है जो किसी विशेष क्रिया-कलाप या प्रक्रिया का मूल्यांकन करने, उसकी समस्याओं को समझ कर समस्या-समाधान का प्रयास करते हैं। प्रायः यह समूह स्वयंसेवी व्यक्तियों का होता है। समूह के सदस्यों का कार्य होता है समस्यों को पहचानना, उनका विश्लेषण करना और उनका समाधान ढूँढना। वैसे तो प्रायः गुणवत्ता दलों का गठन संस्था आदि के प्रबंधन की समस्याओं के निराकरण के लिए होता है किन्तु ऐसे लोगों के भी गुणवत्ता दल बनाए जा सकते हैं जो कि एक ही प्रकार के कार्य में रत हों जैसे कि एक ही संस्थान के विद्यार्थियों, एक ही क्षेत्र के उपभोक्ताओं, एक ही मुहल्ले के सदस्यों आदि के गुणवत्ता दल। चूँकि हिन्दी के समस्त ब्लोगर भी एक ही प्रकार के कार्य में रत हैं इसलिए हिन्दी ब्लोगरों के भी गुणवत्ता दल बनाए जा सकते हैं जिनका उद्देश्य हिन्दी ब्लोगिंग की समस्याओं, जैसे कि पाठकों की कमी, किसी प्रकार के आय का न होना, सरकारी विभाग से ब्लोगों को मान्यता तथा विज्ञापनादि दिलवाना आदि, का निराकरण करना हो।

गुणवत्ता दल की अवधारणा

कहा जाता है कि जूता पहनने वाले को ही पता होता है कि जूता कहाँ काटता है, किसी अन्य को इसका पता नहीं होता। इसी प्रकार से एक ही प्रकृति के कार्य में रत व्यक्तियों को ही अपने कार्य की समस्याओं का सही आकलन कर सकते हैं तथा उनका निराकरण कर सकते हैं। समस्या समाधान हेतु किसी एक ही व्यक्ति के प्रयास की अपेक्षा यदि उस समस्या से जुड़ा प्रत्येक व्यक्ति स्वेच्छापूर्वक समस्या का समाधान सुझाए तो वह समाधान अधिक प्रभावशाली और सार्थक होगा। मूलतः यही सिद्धान्त गुणवत्ता दल की परिकल्पना का आधार है।

गुणवत्ता दल का इतिहास

द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् जापान के उत्पादों की विश्वनीयता निम्नतम स्तर पर पहुँच गई जिसके परिणामस्वरूप जापान की अर्थ-व्यवस्था चरमरा गई। जापान सरकार ने इस स्थिति से उबरने के लिए सन् 1950 में अमरीकी प्रबंधन विद्वानों डॉ. डेमंग तथा डॉ. जुरान को आमन्त्रित कर सेमिनार करवाए किन्तु उसका भी कुछ अधिक प्रभाव परिलक्षित नहीं हुआ। अन्ततः सन् 1962 में डॉ. इशिकावा ने गुणवत्ता नियन्त्रक दल के विचार को जन्म दिया जो कि समस्याओं के निराकरण में अनअपेक्षित रूप से प्रभावशाली रहा। उस समय उपजी गुणवत्ता दल के सिद्धान्त की उस चिंगारी ने आज दावानल का रूप धारण कर लिया है तथा समस्त विश्व में करोड़ों की संख्या में लोग गुणवत्ता दलों का गठन कर चुके हैं।

मेरा मानना है कि यदि हिन्दी ब्लोगर्स भी गुणवत्ता दलों का गठन करें तो हिन्दी ब्लोगिंग की समस्याओं का आसानी के साथ निराकरण हो सकेगा।

Sunday, December 12, 2010

सौ साल पहले चाँवल और गेहूँ के दाम

यह जानना कि आज से सौ साल पहले याने कि सन् 1910 में अनाजों के दाम क्या थे क्या आपको रोचक नहीं लगेगा? यहाँ प्रस्तुत है आज से सौ साल पहले विभिन्न प्रान्तों के प्रमुख नगरों के अनुसार चाँवल गेहूँ इत्यादि अनाजों के औसत दामः

सन् 1910 में चाँवल के औसत दामः

कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में - रु.4.890 = (लगभग) 4 रुपये 14 आना 1 पैसा प्रति मन = (लगभग) 2 आना 0 पैसा प्रति सेर = (आज के हिसाब से लगभग) रु.0.13 प्रति कि.ग्रा.

बम्बई (वर्तमान मुम्बई) में - रु.4.396 = (लगभग) 4 रुपये 06 आना 1 पैसा प्रति मन = (लगभग) 1 आना 3 पैसा प्रति सेर = (आज के हिसाब से लगभग) रु.0.11 प्रति कि.ग्रा.

दिल्ली में - रु.5.714 = (लगभग) 5 रुपये 11 आना 2 पैसा प्रति मन = (लगभग) 2 आना 1 पैसा प्रति सेर = (आज के हिसाब से लगभग) रु.0.14 प्रति कि.ग्रा.

इलाहाबाद (तत्कालीन यूनाइटेड प्राव्हिंसेस का प्रमुख शहर) में - रु.4.405 = (लगभग) 4 रुपये 6 आना 2 पैसा प्रति मन = (लगभग) 1 आना 3 पैसा प्रति सेर = (आज के हिसाब से लगभग) रु.0.11 प्रति कि.ग्रा.

पटना (तत्कालीन बिहार तथा उड़ीसा प्रान्त का प्रमुख शहर) में - रु.3.150 = (लगभग) 3 रुपये 2 आना 2 पैसा प्रति मन = (लगभग) 1 आना 1 पैसा प्रति सेर = (आज के हिसाब से लगभग) रु.0.08 प्रति कि.ग्रा.

नागपुर (तत्कालीन सेंट्रल प्राव्हिंसेस की राजधानी) - में रु.3.559 = (लगभग) 3 रुपये 9 आना 0 पैसा प्रति मन = (लगभग) 1 आना 2 पैसा प्रति सेर = (आज के हिसाब से लगभग) रु.0.09 प्रति कि.ग्रा.

रायपुर (तत्कालीन सेंट्रल प्राव्हिंसेस का प्रमुख शहर) में - रु.3.370 = (लगभग) 3 रुपये 6 आना 0 पैसा प्रति मन = (लगभग) 1 आना 2 पैसा प्रति सेर = (आज के हिसाब से लगभग) रु.0.09 प्रति कि.ग्रा.

जबलपुर (तत्कालीन सेंट्रल प्राव्हिंसेस का प्रमुख शहर) - में रु.3.524 = (लगभग) 3 रुपये 8 आना 2 पैसा प्रति मन = (लगभग) 1 आना 2 पैसा प्रति सेर = (आज के हिसाब से लगभग) रु.0.09 प्रति कि.ग्रा.

मद्रास (तत्कालीन मद्रास प्रान्त की राजधानी) में - रु.5.391 = (लगभग) 5 रुपये 6 आना 1 पैसा प्रति मन = (लगभग) 2 आना 1 पैसा प्रति सेर = (आज के हिसाब से लगभग) रु.0.08 प्रति कि.ग्रा

सन् 1910 में गेहूँ के औसत दामः

कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में - रु.3.953 = (लगभग) 3 रुपये 15 आना 1 पैसा प्रति मन = (लगभग) 1 आना 2 पैसा प्रति सेर = (आज के हिसाब से लगभग) रु.0.09 प्रति कि.ग्रा.

बम्बई (वर्तमान मुम्बई) में - रु.5.882 = (लगभग) 5 रुपये 14 आना 0 पैसा प्रति मन = (लगभग) 2 आना 1 पैसा प्रति सेर = (आज के हिसाब से लगभग) रु.0.14 प्रति कि.ग्रा.

दिल्ली में - रु.3.413 = (लगभग) 3 रुपये 06 आना 2 पैसा प्रति मन = (लगभग) 1 आना 1 पैसा प्रति सेर = (आज के हिसाब से लगभग) रु.0.08 प्रति कि.ग्रा.

इलाहाबाद (तत्कालीन यूनाइटेड प्राव्हिंसेस का प्रमुख शहर) में - रु.3.941 = (लगभग) 3 रुपये 15 आना 0 पैसा प्रति मन = (लगभग) 1 आना 2 पैसा प्रति सेर = (आज के हिसाब से लगभग) रु.0.09 प्रति कि.ग्रा.

पटना (तत्कालीन बिहार तथा उड़ीसा प्रान्त का प्रमुख शहर) में - रु.3.249 = (लगभग) 3 रुपये 4 आना 0 पैसा प्रति मन = (लगभग) 1 आना 1 पैसा प्रति सेर = (आज के हिसाब से लगभग) रु.0.08 प्रति कि.ग्रा.

नागपुर (तत्कालीन सेंट्रल प्राव्हिंसेस की राजधानी) में - रु.3.347 = (लगभग) 3 रुपये 5 आना 2 पैसा प्रति मन = (लगभग) 1 आना 1 पैसा प्रति सेर = (आज के हिसाब से लगभग) रु.0.08 प्रति कि.ग्रा.

रायपुर (तत्कालीन सेंट्रल प्राव्हिंसेस का प्रमुख शहर) - में रु.3.387 = (लगभग) 3 रुपये 6 आना 1 पैसा प्रति मन = (लगभग) 1 आना 1 पैसा प्रति सेर = (आज के हिसाब से लगभग) रु.0.08 प्रति कि.ग्रा.

जबलपुर (तत्कालीन सेंट्रल प्राव्हिंसेस का प्रमुख शहर) - में रु.3.460 = (लगभग) 3 रुपये 7 आना 1 पैसा प्रति मन = (लगभग) 1 आना 2 पैसा प्रति सेर = (आज के हिसाब से लगभग) रु.0.09 प्रति कि.ग्रा.

मद्रास (तत्कालीन मद्रास प्रान्त की राजधानी) में - आँकड़ा उपलब्ध नहीं

(मूल आँकड़े डिजिटल साउथ एशिया लाइब्रेरी से साभार)

उपरोक्त आँकड़ों से स्पष्ट है कि आज से सौ साल पहले और आज के चाँवल और गेहूँ के दामों में लगभग साढ़े तीन सौ गुना अन्तर है।

Saturday, December 11, 2010

लिखाई ऐसी जैसे कि चींटे को स्याही में डुबाकर कागज पर रेंगा दिया हो

क्या आप कभी टायपिस्ट रहे हैं और अलग अलग लोगों की हैंडराइटिंग में लिखे गये पत्रों से आपका पाला पड़ा है?

अरे मैं भी कैसी मूर्खता की बातें कर रहा हूँ, आज के जमाने में टाइपराइटर और टायपिस्ट? अब तो कम्प्यूटर का जमाना है। क्या करें भाई उम्र अधिक हो जाने के कारण से भूलने की बीमारी हो गई है। हाँ तो मैं बात कर रहा था लिखाई याने कि हैंडराइटिंग की। मेरा पाला बहुत लोगों के हस्तलेख से पड़ा है, टायपिस्ट जो था मैं। सन् 1973 में नौकरी लगी थी मेरी भारतीय स्टेट बैंक में। नरसिंहपुर शाखा में जॉयन करने का आदेश आया था। कॉलेज में पढ़ रहा था मैं उन दिनों, एम.एससी. (फिजिक्स) फायनल में। पिताजी उसी महीने रिटायर हुए थे। प्रायवेट संस्था में शिक्षक थे अतः पेन्शन मिलने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था। चार भाइयों और एक बहन में सबसे बड़ा मैं ही था। ठान लिया कि पढ़ाई छोड़ कर नौकरी करने की। नौकरी भी तो अच्छी मिली थी, विश्व के सबसे बड़े बैंक, भारतीय स्टेट बैंक में, मोटी तनख्वाह वाली। पिताजी परेशान। दो परेशानियाँ थी उन्हें। एक तो वे चाहते थे कि मैं अपनी शिक्षा पूरी करूँ और दूसरी यह कि यदि मैं नौकरी में जाना ही चाहता हूँ तो किसी को अपने साथ लेकर जाऊं, मैं कभी रायपुर से कहीं बाहर जो नहीं गया था। खैर साहब, पिताजी के लाख कहने के बावजूद मैं अकेले ही नरसिंहपुर गया।

अब आप सोच रहे होंगे कि बात तो हैंडराइटिंग की हो रही थी और ये साहब तो पता नहीं कहाँ कहाँ की हाँकने लग गये, ठीक वैसे ही जैसे कि व्यस्त चौराहे में मदारी डमरू बजाकर साँप नेवले की लड़ाई वाला खेल दिखाने की बात कह कर मजमा इकट्ठा कर लेता है और आखिर तक साँप नेवले की लड़ाई नहीं दिखाता बल्कि ताबीज बेच कर चला जाता है। धीरज रखिये भाई, आ रहा हूँ हैंडराइटिंग की बात पर, आखिर पहले कुछ न कुछ भूमिका तो बांधनी ही पड़ती है। तो उन दिनों एक महाराष्ट्रियन सज्जन स्थानान्तरित होकर हमारी शाखा में आये हमारे शाखा प्रबन्धक बनकर। एकाध साल बाद रिटायर होने वाले थे। उनकी एक विशेषता यह भी थी कि 'परंतु' को "पणतु" ही कहा करते थे, कभी भी मैंने उनके मुख से परंतु शब्द नहीं सुना। तो मैं उन्हीं सज्जन की हैंडराइटिंग की बात कर रहा था। उन दिनों भारतीय स्टेट बैंक की भाषा अंग्रेजी हुआ करती थी, हिन्दी का चलन तो बहुत बाद में हुआ। जब पहली बार उन्होंने मेसेन्जर के हाथ मेरे पास टाइप करने के लिये एक पत्र भेजा तो उसका एक अक्षर भी मेरे पल्ले नहीं पड़ा। बिल्कुल ऐसा लगता था कि किसी चींटे को स्याही में डुबा कर कागज पर रेंगा दिया हो। उसमें क्या लिखा है समझने तथा सही टाइप करने के लिये मुझे शाखा प्रबन्धक महोदय के केबिन में 20-25 बार जाना पड़ा था। पर वे जरा भी नाराज नहीं हुये मेरे बार बार आकर पूछने पर। बहुत ही सज्जन व्यक्ति थे वे! उनके लिखे आठ दस पत्र टाइप कर लेने के बाद मैं उनके लिखने का "मोड" समझने लग गया और फिर मेरी परेशानी खत्म हो गई। खैर उनकी हैंडराइटिंग जैसी भी थी पर अंग्रेजी का उन्हें बहुत अच्छा ज्ञान था। उनके लिखे एक पत्र में एक बार mutatis-mutandis शब्द आया। मेरे लिये वह शब्द एकदम नया था। मैंने फौरन आक्सफोर्ड इंग्लिश टू इंग्लिश डिक्शनरी निकाली और उस शब्द का मायने खोजने लगा, पर मुझे नहीं मिला। तो मैंने शाखा प्रबन्धक के केबिन जाकर उसका अर्थ पूछा। मेरा प्रश्न सुनकर वे 'हो हो ऽ ऽ ऽ' करके हँसे और बोले अरे अवधिया डिक्शनरी में देख लो ना। मैं बोला कि मैं डिक्शनरी में देख कर ही आया हूँ, मुझे नहीं मिला। तो वे बोले कि डिक्शनरी के पीछे अन्य भाषाओं से अपनाये गये शब्दों वाला अपेन्डिक्स देखो। वहाँ मुझे उस शब्द का अर्थ मिल गया।

उनके अंग्रेजी ज्ञान से बहुत प्रभावित था मैं और समझता था कि वे अंग्रेजी में एम.ए. अवश्य होंगे। बहुत दिनों बाद मुझे पता चला कि वे इम्पीरियल बैंक के समय के थे और उनकी शैक्षणिक योग्यता थी -

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दसवीं फेल।

Friday, December 10, 2010

हेमन्त ऋतु से बढ़कर साइकियाट्रिस्ट भला कौन होगा?

कहते हैं कि साइकियाट्रिस्ट्स किसी आदमी को हिप्नोटाइज करके उसे उसके उम्र के पीछे ले जाते हैं। ऐसा करने के लिए साइकियाट्रिस्ट को अपनी शक्ति का प्रयोग करके उस व्यक्ति को हिप्नोटिक ट्रांस में लाना पड़ता है। किन्तु हेमन्त ऋतु तो किसी भी व्यक्ति को प्राकृतिक रूप से ही उसके उम्र के पीछे धकेल देने का सामर्थ्य रखती है। प्रतिवर्ष इस ऋतु की ठिठुरा देने वाली ठण्ड, ठण्डे मौसम के बीच "विन्टर मानसून" की फुहारें और अगहन या पौष माह में सावन जैसी झड़ी, झड़ी खत्म होने पर उठने वाली भोर का घनघोर कुहासा, साँस छोड़ने तथा मुँह खोलने पर भाप का निकलना आदि बरबस ही मुझे मेरे उम्र से पीछे ठकेलते हुए मेरे बचपन तक ले जाती है। आँखों के सामने बचपन में सूखे हुए चरौटे के पौधों को उखाड़ कर उसका “भुर्री जलाने” याने कि अलाव जलाने और “भुर्री तापने” के दृश्य एक दिवास्वप्न की भाँति तैरने लगते हैं। याद आने लगता है भुर्री तापते हुए चोरी-छिपे कद्दू की सूखी हुई बेल के टुकड़े को सिगरेट बनाकर धूम्रपान करके मुँह और नाक से धुआँ निकालने का आनन्द लेना, ठण्ड में ठिठुरते हुए साइकल पर घूमने जाना, एकाध मील दूर निकलते ही खेतों का सिलसिला शुरू हो जाना, खेतों में तिवरा और अलसी और मेढ़ों में अरहर के पौधों का लहलहाना, खेतों से चोरी छिपे तिवरा उखाड़ कर खाना या वापस आकर तिवरा को जलते “भुर्री” में डाल कर “होर्रा” बनाकर खाना!

कितनी ठण्ड पड़ती थी उन दिनों रायपुर में हर साल! अब तो रायपुर आदमियों और इमारतों का जंगल बन कर रह गया है और यहाँ ठण्ड पड़ती ही नहीं, यदि थोड़ी सी ठण्ड पड़ती भी है तो सिर्फ शीत लहर चलने पर ही पड़ती है।

एक ओर तो हेमन्त ऋतु मुझे हर्षाती है तो दूसरी ओर यह सोचकर दुःख भी होता है कि आज मेरे ही बच्चों को छः ऋतुओं के नाम तक नहीं मालूम हैं। मेरे बार-बार यह बताने के बाद भी कि वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर नामक छः ऋतुएँ और पूर्व, ईशान, उत्तर, वायव्य, पश्चिम, नैऋत्य, दक्षिण तथा आग्नेय नामक आठ दिशाएँ होती हैं, वे इन ऋतुओं और दिशाओं के नाम को याद नहीं रख पाते।

अस्तु, यदि वसन्त ऋतु की अपनी अलग मादकता है तो हेमन्त ऋतु का अपना अलग सुख है। यह हेमन्त ऋतु श्री रामचन्द्र जी की भी प्रिय ऋतु रही है! तभी तो आदिकवि श्री वाल्मीकि रामायण में लिखते हैं:
सरिता के तट पर पहुँचने पर लक्ष्मण को ध्यान आया कि हेमन्त ऋतु रामचन्द्र जी की सबसे प्रिय ऋतु रही है। वे तट पर घड़े को रख कर बोले, “भैया! यह वही हेमन्त काल है जो आपको सर्वाधिक प्रिय रही है। आप इस ऋतु को वर्ष का आभूषण कहा करते थे। अब शीत अपने चरमावस्था में पहुँच चुकी है। सूर्य की किरणों का स्पर्श प्रिय लगने लगा है। पृथ्वी अन्नपूर्णा बन गई है। गोरस की नदियाँ बहने लगी हैं। राजा-महाराजा अपनी-अपनी चतुरंगिणी सेनाएँ लेकर शत्रुओं को पराजित करने के लिये निकल पड़े हैं। सूर्य के दक्षिणायन हो जाने के कारण उत्तर दिशा की शोभा समाप्त हो गई है। अग्नि की उष्मा प्रिय लगने लगा है। रात्रियाँ हिम जैसी शीतल हो गई हैं। जौ और गेहूँ से भरे खेतों में ओस के बिन्दु मोतियों की भाँति चमक रहे हैं। ओस के जल से भीगी हुई रेत पैरों को घायल कर रही है। …

Thursday, December 9, 2010

क्या सन्देश दे रहे हैं आज के टीव्ही कार्यक्रम हमें?

सामान्यतः मैं टीव्ही के कार्यक्रम नहीं देखा करता और यदि कभी अपनी पसन्द का कोई कार्यक्रम देखना भी चाहूँ तो देख नहीं सकता क्योंकि घर के किशोर या युवा बच्चों को उसी समय बिग बॉस देखना जरूरी होता है। बिग बॉस के एक दो एपीसोड मैंने देखे तो स्वाभाविक रूप से मेरे भीतर एक प्रश्न उभरा कि क्या सन्देश दे रही हैं आज के टीव्ही कार्यक्रम हमें?

क्या बिग बॉस के घर में कुछ ऐसा हो रहा है जिससे हमारी युवा पीढ़ी को कुछ अच्छा ज्ञान मिल सके या हमारे समाज का और हमारे देश का उत्थान हो सके?

आखिर रियलिटी शो के नाम से प्रसारित होने वाले आज के टीव्ही कार्यक्रमों में क्या कुछ भी ऐसा है जो हमारे आगे बढ़ने में किसी भी प्रकार से सहायक हो सके?

आखिर क्यों ये कार्यक्रम आज की युवा पीढ़ी के लिए आदर्श बने हुए हैं?

इस बात को तो प्रायः सभी मानते हैं कि सिनेमा और टीव्ही देश के जन-सामान्य, विशेषतः कच्ची उम्र के बच्चों पर सर्वाधिक प्रभाव डालते हैं।

आज टीव्ही पर जिन कार्यक्रमों का प्रसारण हो रहा है, वे विष परोस रहे हैं या अमृत?

क्या उनका प्रभाव हमारे समाज पर नहीं पड़ेगा?

Tuesday, December 7, 2010

गुरु – कबीर की दृष्टि में

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागू पाँय।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो बताय॥

सब धरती कागद करूँ, लेखनि सब बनराय।
सात समुन्द की मसि करूँ, गुरु गुन लिखा ना जाय॥

कबिरा ते नर अंध हैं, गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहि ठौर॥

यह तन विष की बेल री, गरु अमृत की खान।
सीस दिये जो गुरु मिलै, तो भी सस्ता जान॥

गुरु कुम्हार सिख कुम्भ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़त खोट।
भीतर से अवलम्ब है, ऊपर मारत चोट॥

जा के गुरु है आंधरा, चेला निपट निरंध।
अंधे अंधा ठेलिया, दोना­ कूप परंत॥

कबीर जोगी जगत गुरु, तजै जगत की आस।
जो जग की आसा करै, तो जगत गुरू वह दास॥

Sunday, December 5, 2010

भारत में सर्वाधिक लम्बा, ऊँचा और बड़ा (Longest, Highest and Largest in India)

  • सबसे लम्बा राष्ट्रीय राजमार्ग - राजमार्ग नं. 7 (वाराणसी से कन्याकुमारी)
  • सबसे लम्बी सड़क - ग्रांडट्रंक रोड
  • सबसे लम्बा सड़क का पुल - महात्मा गांधी सेतु (पटना)
  • सबसे लम्बी सुरंग - जवाहर सुरंग (जम्मू काश्मीर)
  • सबसे लम्बी नदी - गंगा
  • सबसे लम्बा रेलमार्ग - जम्मू से कन्याकुमारी
  • सबसे लम्बा प्लेटफॉर्म - खड़गपुर (पश्चिम बंगाल)
  • सबसे लम्बी तटरेखा वाला राज्य - गुजरात
  • सबसे लम्बा बाँध - हीराकुण्ड बाँध (उड़ीसा)
  • सबसे ऊँची चोटी - गॉडविन ऑस्टिन (K-2)
  • सबसे ऊँचा जलप्रपात - गरसोप्पा या जोग
  • सबसे ऊँचा बाँध - भाखड़ा नांगल बाँध
  • सबसे ऊँचा पत्तन - लेह (लद्दाख)
  • सबसे ऊँची मीनार - कुतुबमीनार
  • सबसे ऊँचा दरवाजा - बुलन्द दरवाजा
  • सबसे ऊँची मूर्ति - गोमतेश्वर
  • सबसे ऊँची झील - देवताल झील
  • सबसे ऊँची मार्ग - लेह-मनाली मार्ग
  • सबसे ऊँचा पशु - जिराफ
  • सबसे बड़ी झील (मीठे पानी की) - वूलर झील (काश्मीर)
  • सबसे बड़ी झील (खारे पानी की) - चिल्का झील (उड़ीसा)
  • सबसे बड़ा गुफा मन्दिर - कैलाश मन्दिर (एलोरा)
  • सबसे बड़ा रेगिस्तान - थार (राजस्थान)
  • सबसे बड़ा डेल्टा - सुन्दरवन
  • सबसे बड़ा प्राकृतिक बन्दरगाह - मुम्बई
  • सबसे बड़ा लीवर पुल - हावड़ा ब्रिज (कोलकाता)
  • सबसे बड़ा गुरुद्वारा - स्वर्ण मन्दिर (अमृतसर)
  • सबसे बड़ा तारामण्डल (प्लेनेटोरियम) - बिड़ला तारामण्डल (प्लेनेटोरियम)
  • सबसे बड़ी मस्जिद - जामा मस्जिद (दिल्ली)
  • सबसे बड़ा पशुओं का मेला - सोनपुर (बिहार)
  • सबसे बड़ा चिड़ियाघर - जूलॉजिकल गॉर्डन्स (कोलकाता)
  • सबसे बड़ा अजायबघर - कोलकाता अजायबघर

Saturday, December 4, 2010

क्या हम अपने अतीत से शिक्षा लेते हैं?

सन् 712 में मोहम्मद-बिन-कासिम बिलोचिस्तान की विस्तृत मरुभूमि को पार करके सिन्ध तक चला आया। केवल बीस वर्ष आयु वाले उस लुटेरे के मात्र छः हजार घुड़सवारों के समक्ष सिन्ध के राजा दाहिर के दस हजार अश्वारोही और बीस हजार पैदल सैनिकों की सेना टिक न सकी और राजा दाहिर मारा गया। उस दुर्दान्त लुटेरे ने न केवल भारत-भूमि को पदाक्रान्त किया बल्कि वह भारत से सत्रह हजार मन सोना, छः हजार ठोस सोने की मूर्तियाँ, जिनमें से एक मूर्ति तीस मन की थी, और असंख्य हीरे-मोती-माणिक्य लूट कर ले गया।

सन् 1000 से 1027 के बीच गज़नी के महमूद ने 17 बार आक्रमण किया और भारत भूमि को रौंदता रहा। सन् 1000 में प्रथम बार पंजाब में राजा जयपाल पर आक्रमण करने के बाद निरन्तर उसका साहस बढ़ते रहा तथा सन् 1025 में गुजरात के सोमनाथ मंदिर की अकूत धन-सम्पदा को वह लूट ले गया।

चौदहवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में तैमूर ने भारत पर आक्रमण किया। तैमूर केवल पन्द्रह दिन भारत में रहा और लूट-खसोट और कत्ले-आम करके लौट गया।

इसके कोई सवा सौ वर्ष बाद बाबर ने आक्रमण किया। यद्यपि मुगलों द्वारा भारत को ही अपना घर बना लेने के कारण भारत की सम्पत्ति उनके काल में भारत में ही रही, किन्तु लूटा तो उन्होंने भी हमें।

भारत की अकूत धन-सम्पदा ने सदैव ही लुटेरों को आकर्षित किया किन्तु अनेक बार लुटने के बावजूद भी भारत माता की अकूत धन-सम्पदा में किंचित मात्र भी कमी नहीं आई। सोने की चिड़िया कहलाती थी वह! दूध-दही की नदियाँ बहती थीं उसकी भूमि में! रत्नगर्भा वसुन्धरा थी उसके पास! शाहजहाँ और औरंगजेब का जमाना आने तक भारत भूमि न जाने कितनी बार लुट चुकी थी पर उसकी अपार सम्पदा वैसी की वैसी ही बनी हुई थी। इस बात का प्रमाण यह है कि दुनिया का कोई भी इतिहासज्ञ शाहजहाँ की धन-दौलत का अनुमान नहीं लगा सका है। उसका स्वर्ण-रत्न-भण्डार संसार भर में अद्वितीय था। तीस करोड़ की सम्पदा तो उसे अकेले गोलकुण्डा से ही प्राप्त हुई थी। उसके धनागार में दो गुप्त हौज थे। एक में सोने और दूसरे में चाँदी का माल रखा जाता था। इन हौजों की लम्बाई सत्तर फुट और गहराई तीस फुट थी। उसने ठोस सोने की एक मोमबत्ती, जिसमें गोलकुण्डा का सबसे बहुमूल्य हीरा जड़ा था और जिसका मूल्य एक करोड़ रुपया था, मक्का में काबा की मस्जिद में भेंट की थी। लोग कहते थे कि उसके पास इतना धन था कि फ्रांस और पर्शिया के दोनों महाराज्यों के कोष मिलाकर भी उसकी बराबरी नहीं कर सकते थे। सोने के ठोस पायों पर बने हुए तख्त-ए-ताउस में दो मोर मोतियों और जवाहरात के बने थे। इसमें पचास हजार मिसकाल हीरे, मोती और दो लाख पच्चीस मिसकाल शुद्ध सोना लगा था, जिसकी कीमत सत्रहवीं शताब्दी में तिरपन करोड़ रुपये आँकी गई थी। इससे पूर्व इसके पिता जहांगीर के खजाने में एक सौ छियानवे मन सोना तथा डेढ़ हजार मन चाँदी, पचास हजार अस्सी पौंड बिना तराशे जवाहरात, एक सौ पौंड लालमणि, एक सौ पौंड पन्ना और छः सौ पौंड मोती थे। शाही फौज अफसरों की दो हजार तलवारों की मूठें रत्नजटित थीं। दीवाने-खास की एक सौ तीन कुर्सियाँ चाँदी की तथा पाँच सोने की थीं। तख्त-ए-ताउस के अलावा तीन ठोस चाँदी के तख्त और थे, जो प्रतिष्ठित राजवर्गी जनों के लिए थे। इनके अतिरिक्त सात रत्नजटित सोने के छोटे तख्त और थे। बादशाह के हमाम में जो टब सात फुट लम्बा और पाँच फुट चौड़ा था, उसकी कीमत दस करोड़ रुपये थी। शाही महल में पच्चीस टन सोने की तश्तरियाँ और बर्तन थे। वर्नियर कहता है कि बेगमें और शाहजादियाँ तो हर वक्त जवाहरात से लदी रहती थीं। जवाहरात किश्तियों में भरकर लाए जाते थे। नारियल के बराबर बड़े-बड़े लाल छेद करके वे गले में डाले रहती थीं। वे गले में रत्न, हीरे व मोतियों के हार, सिर में लाल व नीलम जड़ित मोतियों का गुच्छा, बाँहों में रत्नजटित बाजूबंद और दूसरे गहने नित्य पहने रहती थीं।

कालान्तर में भारत की इस अकूत धन-सम्पदा को पुर्तगालियों, फ्रांसिसियों और अंग्रेजों ने भी लूटा। सही मायनों में तो भारत माता को इन फिरंगियों ने ही लूटा और इस अकूत धन-सम्पदा की स्वामिनी को दरिद्रता की श्रेणी में लाकर रख दिया।

आखिर हमारी किस कमजोरी ने हमें हजार से भी अधिक वर्षों तक परतन्त्रता की बेड़ियाँ पहनाए रखी थीं?

हमारी कमजोरी थी हममें राष्ट्रीय भावना की कमी! कभी हम वैष्णव, शाक्त, तान्त्रिक, वाममार्गी, कापालिक, शैव और पाशुपत धर्म जैसे सैकड़ों मत-मतान्तर वाले बनकर बड़ी कट्टरता से परस्पर संघर्ष करते रहे तो कभी जाति भेद के आधार पर आपस में लड़ते रहे। सम्राट हर्षवर्धन के बाद अर्थात् ईसा की सातवीं शताब्दी के मध्य से लोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक लगभग नौ सौ वर्ष के समय में कोई सशक्त राजनीतिक शक्ति ऐसी न उत्पन्न हो पाई, जो समस्त भारत को एक सूत्र में बाँध सके। इन नौ सौ सालों में भारत छोटी-बड़ी, एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने वाली रियासतों के युद्ध का अखाड़ा बना रहा।

आज भी क्या हममें राष्ट्रीयता की भावना का उदय हो पाया है? क्या आज भी हम बोली-भाषा-प्रान्तीयता आदि के आधार पर आपस में लड़ नहीं रहे हैं? क्या आज भी हमारी गाढ़ी कमाई को विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ लूटकर विदेशों में पहुँचा रहे है? क्या हमारे ही देश के स्वार्थी तत्व हमारी सम्पदा को स्विस बैंकों में जमा नहीं कर रहे हैं?

क्या हमने कभी अपने अतीत से शिक्षा प्राप्त करने का प्रयत्न किया है?

(इस पोस्ट में आँकड़े तथा विचार आचार्य चतुरसेन की कृतियों से लिए गए हैं।)

Friday, December 3, 2010

जबलपुर ब्लॉगर मीट के बारे में सिर्फ यही कहना है

जबलपुर ब्लॉगर मीट के बारे में सिर्फ यही कहना है कि इस मीट ने मुझे समीर जी के साथ ही गिरीश बिल्लौरे, महेंद्र मिश्र, बबाल जी, विजय तिवारी जी, तथा अन्य अनेक जाने-माने ब्लोगरों का सानिध्य देकर न केवल हार्दिक प्रसन्नता दिलाई बल्कि मुझे सम्मान भी दिलाया जिसके लिए मैं जबलपुर ब्लॉगर एसोशिएशन को तहे दिल से धन्यवाद देता हूँ।

इस विषय में बहुत कुछ लिखा जा चुका है इसलिए मैं और अधिक नहीं लिखूँगा सिवाय इतना लिखने के कि ललित शर्मा जी के फोन आने पर आनन-फानन में मेरा जबलपुर जाने का कार्यक्रम बन गया जो कि मेरे लिए हमेशा अविस्मरणीय रहेगा।

Thursday, December 2, 2010

कितनी तेजी से बदला है जमाना

अधिक नहीं, मात्र चालीसेक साल पहले हमारे समाज में स्टील के बर्तनों में खाना खाने को अकरणीय माना जाता था। जहाँ सम्पन्न परिवारों में सोने-चाँदी के बर्तनों का चलन था वहीं सर्वसाधारण लोग फूलकाँस के बर्तनों का प्रयोग किया करते थे। स्टील और अल्यूमीनियम के बर्तनों को हिकारत की नजर से देखा जाता था। आज फूलकाँस के बर्तन गाँवों में तो शायद कहीं दिखाई दे जाएँ किन्तु नगरों में तो ये विलुप्तप्राय हो चुके हैं। शहरों में ये बर्तन यदि कहीं दिखाई देते भी हैं तो विवाहादि समारोहों में जहाँ पर परम्परा के अनुसार कन्या को पाँच बर्तन दहेज के रूप में दिए जाते हैं।

सिर्फ पारम्परिक बर्तन ही नहीं बल्कि खाना पकाने की पारम्परिक विधि भी आज समाप्त हो चुकी है। आज मिट्टी के चूल्हे पर मिट्टी के बर्तन में खाना पकाने की बात कोई सोच भी नहीं सकता। मिट्टी के चूल्हे पर मिट्टी की हांडी में चाँवल, मिट्टी के ही बर्तन में, जिसे छत्तीसगढ़ में कुरेड़िया कहा जाता है, सब्जी और पीतल की बटलोई में दाल पका कर मेरी माँ मुझे परसा करती थी उस खाने के लिए आज भी मेरा मन तरसता है।

Wednesday, December 1, 2010

गद्य की विधाएँ - उपन्यास

उपन्यास हिन्दी गद्य की विधाओं में से एक प्रमुख विधा है। उपन्यास का अर्थ है प्रस्तुत करना। उपन्यास लेखक अपने उपन्यास के पात्रों के चरित्र-चित्रण के बहाने तत्कालीन सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, सास्कृतिक तथा आर्थिक वातावरण का प्रस्तुतीकरण करता है।

हिन्दी उपन्यासों का प्रारम्भ भारतेन्दु युग से हुआ। भारतेन्दु युग के प्रमुख उपन्यास हैं बाबू देवकीनन्दन खत्री रचित "चन्द्रकान्ता" और "चन्द्रकान्ता सन्तति", बालकृष्ण भट्ट रचित "नूतन ब्रह्मचारी" हरिऔध रचित "अधखिला फूल" और "ठेठ हिन्दी का ठाठ", अम्बिकादत्त व्यास रचित "आदर्श-वृत्तान्त" आदि।

बाद में उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का उदय हुआ जिन्होंने विषय, भाषा, शैली आदि की दृष्टि से उपन्यास विधा में उल्लेखनीय परिवर्तन किया। प्रेमचंद के प्रमुख उपन्यास हैं - गोदान, गबन, कर्मभूमि, रंगभूमि आदि। प्रेमचन्द के काल में जयशंकर 'प्रसाद', आचार्य चतुरसेन, भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर, विश्वम्भर नाथ कौशिक, वृन्दावन लाल वर्मा आदि लेखकों ने उपन्यास विधा के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। "कंकाल", "वैशाली की नगरवधू", "सोमनाथ", "चित्रलेखा", "तितली", "मृगनयनी" आदि उस युग के श्रेष्ठतम उपन्यास हैं।

हिन्दी के अन्य उपन्यासकारों में यशपाल, फणीश्वर नाथ 'रेणु', रांगेय राघव, धर्मवीर भारती, विष्णु प्रभाकर, हिमांशु जोशी, भीष्म साहनी, राजेन्द्र यादव, शिवानी आदि नाम उल्लेखनीय हैं।

 
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