Saturday, February 26, 2011

संस्कृत सुभाषित - हिन्दी अर्थ - 10

सुभाषित शब्द "सु" और "भाषित" के मेल से बना है जिसका अर्थ है "सुन्दर भाषा में कहा गया"। संस्कृत के सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं।

परोऽपि हितवान् बन्धुः बन्धुरप्यहितः परः।
अहितो देहजो व्याधिः हितमारण्यमौषधम्॥९१॥
(हितोपदेश)

व्याधियाँ (बीमारियाँ) हमारे शरीर के भीतर रहते हुए भी हमारा बुरा करती हैं और औषधियाँ (जड़ी-बूटियाँ) हमसे दूर पेड़-पौधों में में रहकर भी हमारा भला करती हैं (अर्थात् व्याधियाँ हमारे दुश्मन हैं और औषधियाँ मित्र)। इसी प्रकार से जिनसे हमारा रक्त का सम्बन्ध अर्थात् किसी प्रकार की रिश्तेदार न हो किन्तु वह हमारा हित करे तो वे अपने होते हैं और यदि रिश्तेदार होकर भी कोई हमारा अहित करे तो वह पराया होता है।

अहो दुर्जनसंसर्गात् मानहानिः पदे पदे।
पावको लौहसंगेन मुद्गरैरभिताड्यते॥९२॥


दुष्ट के संग रहने पर कदम कदम पर अपमान होता है। पावक (अग्नि) जब लोहे के साथ होता है तो उसे घन से पीटा जाता है।

चिता चिन्तासम ह्युक्ता बिन्दुमात्र विशेषतः।
सजीवं दहते चिन्ता निर्जीवं दहते चिता॥९३॥


चिता और चिंता में मात्र एक बिन्दु (अनुस्वार) का ही फर्क है किन्तु दोनों ही एक समान है, जो जीते जी जलाता है वह चिंता है और जो मरने के बाद (निर्जीव) को जलाता है वह चिता है।

अङ्गणवेदी वसुधा कुल्या जलधिः स्थली च पातालम्।
वल्मीकश्च सुमेरुः कृतप्रतिज्ञस्य धीरस्य॥९४॥


अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहने वाले धीर व्यक्ति के लिए यह वसुधा (पृथ्वी) एक बगिया के समान होता है (जब चाहे घूम कर जी बहला लो), समुद्र एक नहर के समान होता है (जब चाहे तैर कर पार कर लो), पाताल लोक एक मनोरंजन स्थल (पिकनिक स्पॉट) के समान होता है (जब जाहे जाकर पिकनिक मना लो) और सुमेरु पर्वत एक चींटी के घर के समान होता है (जब चाहे चोटी पर चढ़ जाओ)। (अतः मनुष्य को दृढ़प्रतिज्ञ एवं धीर-गम्भीर होना चाहिए।)

येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भूविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥९५॥


विद्या, तप (कठिन परिश्रम कर पाने की योग्यता), दानशीलता, शील, गुण तथा धर्म से विहीन व्यक्ति मृत्युलोक (पृथ्वी) पर भार के समान है, वह मनुष्य के रूप में पशु ही है।

माता मित्रं पिता चेति स्वभावात् त्रितयं हितम्।
कार्यकारणतश्चान्ये भवन्ति हितबुद्धयः॥९६॥


माता, पिता और मित्र तीनों ही स्वभावतः ही हमारे हित के लिए सोचते हैं, वे हमारे हित करने के बदले में किसी प्रकार की अपेक्षा नहीं रखते। इन तीनों के सिवाय अन्य लोग यदि हमारे हित की सोचते हैं तो वे उसके बदले में हमसे कुछ न कुछ अपेक्षा भी रखते हैं।

वदनं प्रसादसदनं सदयं हृदयं सुधामुचो वाचः।
करणं परोपकरणं येषां केषां न ते वन्द्याः॥९७॥


सदैव प्रसन्न-वदन (हँसमुख), हृदय में दया की भावना रखने वाले, अमृत के समान मीठे वचन बोलने वाले तथा परोपकार में लिप्त रहने वाले व्यक्ति भला किसके लिए वन्दनीय नहीं होगा?

गर्वाय परपीड़ाय दुर्जस्य धनं बलम्।
सज्जनस्य दानाय रक्षणाय च ते सदा॥९८॥


दुर्जन (दुष्ट) का धन और बल गर्व (घमण्ड) तथा दूसरों को पीड़ा पहुँचाना होता है और दान एवं (निर्बलों की) रक्षा करना सज्जन का।

यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः।
चित्ते वाचि क्रियायां च साधुनामेकरूपता॥९९॥


जो चित्त (मन) में हो वही वाणी से प्रकट होना चाहिए और जो वाणी से प्रकट हो उसके अनुरूप ही कार्य करना चाहिए। जिनके चित्त, वाणी और कर्म में एकरूपता होती है वही साधुजन होते हैं।

छायामन्यस्य कुर्वन्ति स्वयं तिष्टन्ति चातपे।
फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुष इव॥१००॥


वृक्ष स्वयं सूर्य के प्रखर ताप को सहन करके दूसरों को छाया प्रदान करते हैं तथा उनके फल भी दूसरों के उपयोग के लिए होते हैं, वृक्ष के समान सत्पुरुष भला कौन है?

10 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय said...

इति सुभाषितम् शतकम्।

जी.के. अवधिया said...

@ प्रवीण पाण्डेय

प्रवीण जी, मैं संस्कृत अच्छी प्रकार से नहीं जानता किन्तु मुझे लगता है कि "इति सुभाषितम् शतकम्" के स्थान पर "इति सुभाषिताणां शतकम्" होना चाहिए क्योंकि "सुभषातिम्" एकवचन तथा कर्म कारक है और "सुभाषिताणां" बहुवचन सम्बन्ध कारक।

मैं सही हूँ या गलत यह तो आनन्द जी ही बता पाएँ।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बहुत अच्छा तोहफा..

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर

आनन्‍द पाण्‍डेय said...

आदरणीय बन्‍धुओं

सर्वप्रथम तो आप सभी के प्रयास की सराहना करता हूँ । खासकर अवधिया जी को जिन्होने संस्‍कृत भाषा व भारतीयता के प्रति अपना इतना प्रेम प्रदर्शित किया है । आपके ब्‍लाग के एक दो लेख पढे, पढकर आनन्‍द आ गया । आप की सोंच बहुत ही शोधपरक और सूक्ष्‍म है , आप जैसे लोगों की ही आज भारत को अत्‍यधिक आवश्‍यकता है ।
इसके अनन्‍तर धन्‍यवाद करूँगा इन महानुभावों को जिन्‍होने आपकी इस चर्चा में हिस्‍सा लिया । श्री प्रवीण जी को , जिन्‍होने किसी न किसी बहाने से संस्‍कृत की चर्चा का अवसर दिया ।

यहाँ उपर्युक्त के विषय में सूचित करना चाहता हूँ कि सुभाषित इत्‍युक्‍ते "सुन्‍दर वचन" । भाषित का सामान्‍य हिन्‍दी अर्थ है "कहा हुआ" । सुभाषितम् रूप कर्ता तथा कर्म दोनों है । सुभाषितम् शब्‍द नपुंसकलिंग में परिगणित है अत: इसके रूप सुभाषितम् सुभाषिते सुभाषितानि
- प्रथमा (कर्ता)
सुभाषितम् सुभाषिते सुभाषितानि- द्वितीया (कर्म)

इस तरह से सुभाषितं शतकम् भी गलत नहीं कहा जा सकता किन्‍तु शुद्ध वाक्‍य सुभाषितशतकम् होगा, सुभाषित-शतकम् भी लिख सकते हैं । किन्‍तु जब समास चिन्‍ह नहीं लगाएँगे तो सुभाषितं शतकम् हो जाएगा ।

यहाँ यह भी स्‍पष्‍ट करना चाहूँगा कि सुभाषितानां शतकम् भी पूर्ण शुद्ध है । यह षष्‍ठी बहुवचन का प्रयोग है जिसका अर्थ है सुभाषितों का शतक अर्थात् 100 सुभाषित के मन्‍त्रों का एक वर्ग । अत: आप दोनो ही महानुभाव सही हैं ।

सधन्‍यवाद

भवदीय: - आनन्‍द:

आनन्‍द पाण्‍डेय said...

आप की चर्चा में देर से पहुँचने का कारण अपनी कुछ व्‍यक्तिगत व्‍यस्‍तताएँ हैं । इस तरह के प्रश्‍नों का या संस्‍कृत से सम्‍बन्धित किसी भी तरह के समाधान की शीघ्र प्राप्ति के लिये http://groups.google.com/group/sanskritjagat/subscribe?hl=en
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धन्‍यवाद

निर्मला कपिला said...

काश कि मुझे भी संस्कृ्त पढनी लिखनी आती। सुन्दर पोस्ट। धन्यवाद।

Rahul Singh said...

इस पांडित्‍य चर्चा में मुझे इति शब्‍द खटक रहा है, क्‍या यह सिलसिला पूरा हो गया.

arganikbhagyoday said...

रोचक !

paramshri said...

नमस्कार,
संस्कृत सुभाषितों को एक स्थान पर देकर आपने बहुत उपकार का कार्य किया है। मैं बहुत दिनों से इनकी खोज में था। देर से जुडा हूँ। अभी पूरा ब्लाग पढना शेष है। शुभकामनाओं सहित।
प्रभाकर मिश्र

 
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