जनप्रतिनिधियों की बैठकें होती हैं जहाँ पर काजू आदि सूखे मेवे के प्लेट एक हाथ से दूसरे हाथ में सरकते हैं। ऐसे बैठकों में मेवा-मिष्ठान्न, बैठक यदि दिन भर चले तो, लंच में मांसाहारी तथा शाकाहारी दोनों ही प्रकार के मँहगे डिशेस आदि परोसा जाना सामान्य बात है। क्यों न खाएँ ये लोग तर माल? आखिर जनता के प्रतिनिधि जो हैं वे! उस जनता के जिसके अधिकांश लोग भ्रष्टाचार और मँहगाई की मार की वजह से बड़ी मुश्किल से दो जून का खाना जुटा पाते हैं, सब्जी मिल पाई तो ठीक वरना दाल-रोटी ही सही, कभी-कभी तो केवल एक टाइम का ही खाना मिल पाता है और कभी वह भी मयस्सर नहीं हो पाता तो फाका भी करना पड़ता है। मुर्ग मुसल्लम, मटन बिरयानी, पनीर मसाला गरीब जनता के लिए जरूरी थोड़े ही है, प्याज और हरी मिर्च के साथ भी तो खाना खाया जा सकता है ना।
जनता के द्वारा चुने गए ये लोग जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। काश! कभी वे उनके जैसा ही खाना खाकर भी कभी उनका प्रतिनिधित्व करते। दिखा देते कि हम भी देश की गरीब जनता के जैसा ही खाना खाकर सन्तुष्ट रह सकते हैं, हमेशा-हमेशा के लिए नहीं तो कम से कम एक माह के लिए ही सही गरीबी का जीवन जी कर दिखा सकते।
अन्ना हजारे चाहते हैं कि देश की गरीब जनता को भी भरपेट खाना मिले जिसके लिए वे अनशन कर रहे हैं, पिछले दस दिनों से उनके लिए भूखे रह रहे हैं। पर जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को जनता के खाने की फिक्र नहीं है। उन्हें फिक्र है तो केवल अपने खाने की। तर माल खाने की, घोटालों की रकम खाने की। जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधि चाहे जिस भी राजनैतिक पार्टी के हों, उद्देश्य उनका केवल एक ही है - खाना और केवल खाना। गरीब जनता का मांस नोच-नोच कर भी खा लेने में इन्हें किसी प्रकार का गुरेज नहीं होगा। पर मुश्किल तो यह है कि गरीब जनता के तन में मांस है ही कहाँ? उनका शरीर तो हड्डियों का ढाँचा मात्र ही है। उन्हें खाने को कुछ मिले तब तो मांस चढ़ेगा ना तन पर।
अन्ना हजारे माँग कर रहे हैं देश के जनता का हित करने वाले जन लोकपाल की। करोड़ों लोगों को उनकी इस माँग में गरीब जनता का हित दिखाई दे रहा है किन्तु इन जनता के प्रतिनिधियों को यह बात नजर नहीं आ रही है। क्यों नहीं दिखाई दे रहा है? क्योंकि खाना बंद हो जाने का भय उन्हें देखने नहीं दे रहा है। यदि जनलोकपाल बिल पारित हो जाएगा तो संसद, याने कि जनता के प्रतिनिधियों का जमावड़ा, पर अंकुश लग जाएगा। जीप घोटाला से लेकर 2G स्पैक्ट्रम घोटाला जैसे घोटाले नहीं हो पाएँगे। और घोटाले नहीं होंगे तो वे खाएँगे क्या? भला कौन चाहेगा अपने आप पर अंकुश लगाना? निरंकुश रहना चाहते हैं वे।
आज अन्ना की एक आवाज पर देश की जनता एक सूत्र में बँध जाती है। दम है तो इन तथाकथित जनप्रतिनिधियों में से कोई भी एक देश की जनता को एक सूत्र में बाँध कर दिखाए! पर वे जानते हैं कि उनमें से किसी में भी इतना दम नहीं है। इसलिए वे भ्रष्टाचार हटाने की आवाज बुलन्द करने वाले का दमन कर देना चाहते हैं। बाबा रामदेव के अनशन को तो कुचल दिया उन्होंने और अब अन्ना हजारे के अनशन को किसी न किसी तरह से कुचल देना चाहते हैं। दिन-प्रतिदिन अन्ना समर्थकों की संख्या में लगातार वृद्धि होते जाना इस बात का द्योतक है कि जनता समझ चुकी है इस बात को।
राज्य-भक्त
9 hours ago
11:32 AM
जी.के. अवधिया








5 टिप्पणियाँ:
आपने ये आज की सच्ची हकीकत लिखी है आज तक जो हुआ अब आगे नहीं होगा अब जनता जाग चुकी है ....
जागरण की नादों के बाद स्वप्न अपना धैर्य खो देते हैं।
जागरण की नादों के बाद स्वप्न अपना धैर्य खो देते हैं।
अब सूखा खाया तो क्या खाया. माल तो तर ही होना चाहिये. :)
अन्ना हजारे ने कहा कि देश में जनतंत्र की हत्या की जा रही है और भ्रष्ट सरकार की बलि ली जाएगी। यानि खून के बदले खून?
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