किसी वस्तु को बनाने वाले का स्थान उस बनी हुई वस्तु से कहीं बहुत अधिक ऊँचा होता है किन्तु हमारे देश में विडम्बना यह है कि प्रतिनिधियों का चुनाव करके संसद का निर्माण करने वाली जनता का स्थान संसद से नीचे हो जाता है, संसद सर्वोच्च हो जाता है। जनता यदि अपना प्रतिनिधि न चुने, चुनाव का बहिष्कार कर दे, तो संसद का निर्माण हो ही नहीं सकता। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पूर्व अंग्रेजी राज अर्थात अंग्रेजों के राजसिंहासन का प्रतिनिधि सर्वोच्च होता था, भारत की जनता को उसके विरुद्ध जुबान खोलने का किंचित मात्र भी अधिकार नहीं था। राजा या अंग्रेजी राज के विरुद्ध किसी भी प्रकार का कार्य राजद्रोह होता था। अंग्रेजों की निगाहों में भारत की जनता का कुछ भी मूल्य नहीं था क्योंकि भारत अंग्रेजों का गुलाम था।
स्वतन्त्रता मिल जाने के बाद भारत में लोकतन्त्र अर्थात् जनता के राज की स्थापना हुई। जनता का राज हो जाने का अर्थ हुआ कि जनता ने ही राजा का रूप धारण किया। इस हिसाब से जनता का स्थान सर्वोच्च हुआ। किन्तु हमारे संविधान के अनुसार हमारे देश में संसद, जो कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का समूह है, का स्थान सर्वोच्च होता है। यह तो ठीक उसी प्रकार की बात लगती है कि यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति पर विश्वास करके उसके नाम मुख्तारनामा (power of attorney) दे दे वह दूसरा व्यक्ति प्रथम व्यक्ति की समस्त सम्पत्ति का स्वामी बन जाए। क्या ऐसा होना सही लगता है? क्या राय है आपकी?
संविधान तथा राजनीति की समझ मुझमें बहुत अधिक नहीं है अतः हो सकता है कि मैं गलत होऊँ। ऐसी स्थिति में यदि आप मेरी गलती बताने का कष्ट करें तो मुझ पर बड़ा आभार होगा।
आत्माराम
44 minutes ago
4:47 PM
जी.के. अवधिया








3 टिप्पणियाँ:
अब कहलाते तो अपने आप को यह सब जनसेवक हैं लेकिन यह मालिक हैं. और जन सेवा का मतलब है ’जनता द्वारा सेवा".
गरूर में तो इंसान भगवान को भूल जाता है। यहां तो मगरूर भी है।
शक्तिप्रवाह सार्थक हो।
Post a Comment