(शरद जोशी का व्यंग - तीस साल का इतिहास से उद्धृत)
- आत्मनिर्भरता पर जोर देते रहे, विदेशों से मदद माँगते रहे।
- 'यूथ' को बढ़ावा दिया, बुड्ढ़ों को टिकिट दिया।
- जो जीता वह मुख्यमन्त्री बना, जो हारा सो गवर्नर हो गया। जो केन्द्र में बेकार था उसे राज्य में भेजा, जो राज्य में बेकार था उसे केन्द्र में ले आए। जो दोनों जगह बेकार था उसे एंबेसेडर बना दिया। वह देश का प्रतिनिधित्व करने लगा।
- एकता पर जोर दिया, आपस में लड़ते रहे।
- जातिवाद का विरोध किया, मगर अपनेवालों का हमेशा ख्याल रखा।
- आश्वासन दिए, पर निभाए नहीं।
- जिन्हें निभाया वे आश्वस्त नहीं हुए।
- मेहनत पर जोर दिया, अभिनन्दन करवाते रहे।
- जनता की सुनते रहे, अफसर की मानते रहे।
- शान्ति की अपील की, भाषण देते रहे।
- खुद कुछ किया नहीं, दूसरे का होने नहीं दिया।
10:40 AM
जी.के. अवधिया








9 टिप्पणियाँ:
बहुत ही सशक्त।
आज 03-09 - 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....
...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
सभी कुछ उल्टा-पुल्टा.
बड़े ही गहरे प्रश्न उठा गये।
शरद जोशी का व्यंग - तीस साल का इतिहास से उद्धृत)
पहले तो आभार... पढवाने के लिए...
दूसरे क्यों ऐसा लगता है कि शरद जी का व्यंग जब तक भारत देश में लोकतंत्र है ... हमेशा समसामयिक रहेगा .
शरद जोशी जी का सार्थक व्यंग .. ३० साल के बाद आज ६४ साल बाद भी सटीक है ..
बेकार ,बदकार और मक्कार तीनों में जुड़ा है शब्द कार शायद इसीलिए फेल हो जाती है सत्ता में आती है जो भी सरकार |
बहुत खूबसूरत व्यंग |
itne saal pahle yah vyangya likha gaya thaa...aaj bhii utnaa hii fit baithtaa hai...iskaa arth yahi hai ki...desh kii sthiti kamobesh wahii hai...bigad bhale thodii zyada gayo ho...sudhrii to nahin hii hai.
---- साल पहले , जिया बेकरार था
उन्हें इनसे प्यार था, आज भी है
और कल भी रहेगा.
(खाली स्थान भरो)
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