Saturday, September 17, 2011

हम राजभाषा मास के स्थान पर राष्ट्रभाषा मास क्यों नहीं मनाते?

हिन्दी वेबसाइट के पोस्ट सामान्य ज्ञान प्रश्नावली – 202 (General Knowledge Quiz in Hindi) में राजभाषा से सम्बधित एक प्रश्न के सन्दर्भ में निम्न दो टिप्पणियाँ मिली हैं -

भारतीय संविधानने हिंदी भाषा को राष्ट्र भाषा की सज्ञा दी गयी है
आपका सुझाव गलत है कृपया सही सुझाव दीजिये
 संविधान के अनु.३४३ के अनुसार  देवनागरी लिपि में लिखी जानेवाली हिंदी भाषा संघ की राजभाषा है. जब सवाल उठता है की क्या हिंदी एक राष्ट्र भाषा भी है  तो हमें संविधान की अष्टम सूची का सन्दर्भ देना पडता है. अष्टम सूची की सभी भाषायों  को राष्ट्र भाषा का दर्जा प्राप्त है. चूँकि अष्टम सूची में हिंदी भी शामिल है इसलिए हिंदी भी एक राष्ट्र भाषा है. इसप्रकार हिंदी को  संघ की  राजभाषा और राष्ट्र भाषा का दर्जा प्राप्त  है.
अब प्रश्न यह उठता है कि जब राष्ट्रध्वज एक है, राष्ट्रगान एक है, राष्ट्रीय पशु एक है .... तो राष्ट्रभाषा का एक से अधिक होना क्या उचित है? क्या अनेक भाषाओं को राष्ट्रभाषा का दर्जा देना  तुष्टिकरण की नीति नहीं है? क्या यह हिन्दी के साथा अन्याय नहीं है। राजभाषा अधिनियम के स्थान पर राष्ट्रभाषा अधिनियम क्यों नहीं बनाया गया? राजभाषा मास क्यों मनाया जाता है, राष्ट्भाषा मास क्यों नहीं?

मूलतः मैं विशुद्ध विज्ञान (गणित, भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र) का विद्यार्थी रहा हूँ इसलिए संविधान आदि के विषय में मेरा ज्ञान अपेक्षाकृत अल्प है।

अतः इस विषय में आपके विचार जानकर मुझे अत्यन्त प्रसन्नता होगी।

4 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय said...

राज और राष्ट्र के बीच न जाने भावनाओं की कितनी खाईयाँ हैं।

जी.के. अवधिया said...

इस पोस्ट में हिन्दी वेबसाइट के सन्दर्भित पोस्ट में एक और टिप्पणी आई है जो कि आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है -

Deepak Kumar says:
17/09/2011 at 2:25 pm (Edit)

सविंधान के ३४३(२) के अनुसार संविधान के लागू होने के १५ वर्ष बाद अंग्रेजी को हटाकर हिंदी को संघ की भाषा के रूप में लागू किया जाना निश्चित था. जैसे ही यह १५ वर्ष की अवधि समाप्त होने के करीब आ रही थी दक्षिण भारत में हिंदी के विरोध में आन्धोलन शुरू हो गया था , मद्रास में इस आन्धोलन ने तो प्रचंड रूप धारण कर लिया था. इस अशांति को रोकने के लिए सरकार को राजभाषा अधिनियम १९६३ बनाना पड़ा था और दक्षिण भारतीयों को यह आश्वासन देना पड़ा था की १५ वर्ष के बाद भी अंग्रेजी का प्रयोग यथावत चलता रहेगा. राज भाषा अधिनियम बना ही इस लिए की हिंदी को लागू नहीं किया जाए और अंग्रेजी का प्रयोग अनिश्चित काल तक चलता रहे. इस अधिनियम से दुखी होकर राष्ट्र कवि माखनलाल चतुर्वेदी ने अपना पद्मभूषण सरकार को लौटा दिया था. आज आलम यह है की राजभाषा अधिनियम की धारा ३(५) के बदौलत हिंदी घर की ग्र्हुस्वमिनी होने के बावुजूद अपने ही देश में एक नौकरानी का दर्जा प्राप्त किये हुए है. राजभाषा अधिनियम की धारा ३(५) की वजह से ही आज भी हिंदी को हमारे ही देश में लागू नहीं किया जा सकता और शायद इसी राजभाषा अधिनियम की धारा ३(५) की वजह से हिंदी भारत में लागू नहीं हो पायेगी कम से कम दक्षिण भारत में तो कभी भी नहीं. यह भूरे भारतीय अँगरेज़ हिंदी को लागू ही होने नहीं देंगे. दक्षिण भारत के केंद्रीय सरकार के मंत्रालयों में इनके ड्रामे देखकर दिल दुखी हो जाता है. इन मंत्रालयों में पर्लेमेंट कमिटी भी टूर कर खूब दावत उड़ातीं हैं और गिफ्ट लेकर जाती है. राजभाषा सप्ताह, राजभाषा पखवाडा, राजभाषा दिवस यह भूरे भारतीयों के हिंदी के नाम पर मौज करने के तरीके हैं.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

वोट जो न करायें, कम है.

चंदन कुमार मिश्र said...

http://rajbhasha.nic.in/6184hinls.pdf सबूत के लिए देखा जा सकता है जिसमें स्पष्ट है हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं है।

 
Design by Free WordPress Themes | Bloggerized by Lasantha - Premium Blogger Themes | fantastic sams coupons