अक्सर मेरे मन में कई प्रकार के सवाल घुमड़ते हैं, और मैं उहापोह की स्थित में आ जाता हूँ कि आखिर इनके सही जवाब क्या होने चाहिए? उन्हीं प्रश्नों को आपके समक्ष रख रहा हूँ, यह सोचकर कि शायद कुछ जवाब मिले। वैसे जवाब देने की कोई बाध्यता नहीं है, यह तो सिर्फ मेरा अनुरोध है। तो वे प्रश्न हैं -
- क्या बेहतर है - असफल होना या असफल होने के डर से कार्य ही नहीं करना?
- प्रायः लोग अपनी मातृभाषा पर गर्व जरूर करते हैं किन्तु अनेक अवसरों पर अंग्रेजी में बोलना क्यों पसन्द करते हैं?
- हम कई बार क्यों वह काम करते हैं जिन्हें हम पसन्द नहीं करते और जिन्हें हमे पसन्द करते हैं उन्हें करते ही नहीं?
- यह जानते हुए भी कि हम किसी खुद के सिवाय किसी दूसरे को बदल नहीं सकते, हम क्यों स्वयं को नहीं बदलते और दूसरों को बदलने का प्रयास करते हैं?
- क्या बेहतर है - काम को सही ढंग से करना या सही काम को करना?
- किसी निर्दोष को बचाने के लिए झूठ बोलना क्या उचित है?
- दूसरों को सताने को गलत समझने वाले लोग ही प्रायः अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए दूसरों को क्यों सताते हैं?
- क्या आपने अपने जीवन में एक भी ऐसा कार्य किया है जिससे किसी दूसरे को हार्दिक सुख मिला हो?
- कभी आपने सोचा है कि आपके जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है?
- बड़ों को सम्मान देने तथा माता पिता के पैर छूने का रिवाज समाप्त-सा होते चला जा रहा है?
- किसी कार्य को कर लेने का समय यदि अभी नहीं होता तो कब होता है?
- हम कमाते हैं अपने तथा परिवार के सुख के लिए, किन्तु कमाने के लिए इतना कार्यभार क्यों स्वीकार कर लेते हैं कि कार्य की अधिकता तथा जिम्मेदारी वहन को देखते हुए परिवार के सुख में सम्मिलित ही न हो सकें?
- सभी धर्म मानव कल्याण के लिए हैं, फिर भी धर्मों के कारण से ही विश्व में बड़े-बड़े युद्ध क्यों होते आए हैं?
11:18 AM
जी.के. अवधिया








3 टिप्पणियाँ:
बड़े ही मूल प्रश्न हैं।
आपकी पोस्ट की खबर हमने ली है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - कितनी जरूरी उधार की खुशी - ब्लॉग बुलेटिन
हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और !
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