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Monday, January 31, 2011

वैदिक साहित्य के विषय में कुछ जानकारी

वेद शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के "विद्" शब्द से हुई है जिसका अर्थ है "ज्ञान"। अर्थात् जिसके द्वारा ज्ञान की प्राप्ति उसे ही वेद कहते हैं। पारम्परिक रूप से वे को शाश्वत सत्य ज्ञान के पवित्र एवं गूढ़ सूत्रों, जिन्हें कि ऋषियों ने गहन चिन्तन के परिणामस्वरूप प्राप्त किया था, का विशाल भण्डार माना जाता है। हजारों वर्षों से पीढ़ी दर पीढ़ी, शिष्यों के द्वारा वेद में निहित ज्ञान को गुरु के मुख से सुनकर ही प्राप्त करने की परम्परा रही है इसलिए वेद को "श्रुति" (सुना गया) के नाम से भी जाना जाता है।

वेदों की संख्या चार हैं - ऋग् वेद, यजुर्वेद, साम वेद और अथर्व वेद। परम्परागत रूप से वेद दो भागों - मंत्र और ब्राह्मण - में विभाजित किए जाते रहे हैं। संहिता अपने वेदों के नाम से ही जाने जाते हैं वेदों के मंत्रों के संकलन को संहिता के नाम से जाना जाता है जैसे कि ऋग् वेद के मंत्रों के संकलन को "ऋग् वेद संहिता" कहा जाता है। ब्राह्मण वेदों पर आधारित व्याख्यात्मक ग्रंथ हैं और उनके अपने अलग अलग नाम हैं। अनेक ब्राह्मण ग्रंथों के अन्तिम भाग में गूढ़ सामग्री पाई जाती है जिन्हें "अरण्यक" कहा जाता है। "अरण्यक" में निहित गूढ़ सामग्री "उपनिषद्" के नाम से जाने जाते हैं। अनेक शताब्दियों से उपनिषद् हिन्दू आध्यात्मिक परम्परा के मुख्य आधार रहे हैं और इन्हें सर्वोच्च सम्मान मिलता रहा है।

ऋग् वेद, साम वेद और अथर्व वेद में स्पष्ट रूप से उनके दो भाग मिलते हैं जिनमें एक में मंत्रों का और दूसरे में ब्राह्मणों का संकलन है। इसके विपरीत यजुर्वेद दो प्रकार के हैं जिन्हें शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद के नाम से जाना जाता है, शुक्ल यजुर्वेद में तो मंत्रों और ब्राह्मणों का संकलन दो अलग अलग भागों में है किन्तु कृष्ण यजुर्वेद में मंत्र और ब्राह्मण एक साथ मिले हुए हैं। कृष्ण यजुर्वेद के "तैत्तरीय संहिता" और "तैत्तरीय ब्राह्मण" दोनों में ही मंत्र और ब्राह्मण एक साथ मिले हुए हैं। वेद में निहित ज्ञान को प्रायोगिक रूप से सार्थक बनाने के लिए अन्य सहायक ग्रंथ भी हैं जो सूत्र के नाम से जाने जाते हैं यथा श्रौतसूत्र, कल्पसूत्र, शुल्बसूत्र इत्यादि। इसके अतिरिक्त वेद के ज्ञान का अध्ययन करके विभिन्न महान ऋषि-मुनियों ने भी अलग अलग संहिताओं की रचना की है यथा चरक संहिता, अगस्त्य संहिता आदि।


हमारे प्रायः समस्त वैदिक साहित्य का विभिन्न भाषाओं में, विशेषकर अंग्रेजी भाषा में, अनुवाद बहुत पहले, अठारहवीं शताब्दी के अन्त या उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ही हो चुका था और उनपर शोध आज तक सतत् जारी हैं। विदेशी विद्वान आज भी वैदिक साहित्य में ज्ञान के शोध में रत हैं किन्तु विडम्बना यह है कि हमारे देश में ही हमारे वैदिक साहित्य का विशेष महत्व नहीं है क्योंकि हमारे देश में संस्कृत और हिन्दी जैसी हमारी अपनी भाषा की अपेक्षा अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा को अधिक महत्व दिया जाता है। हमारे कथन का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि विदेशी भाषाओं का महत्व कुछ भी नहीं है, हमारे विचार से तो सभी भाषाएँ महान हैं और सभी भाषाओं का अपना-अपना महत्व है, हमें सभी भाषाओं को अवश्य ही सीखना चाहिए किन्तु स्वाभिमानी होने के नाते अपनी भाषा को अपेक्षाकृत अधिक श्रेष्ठ मानना ही उचित है।

Sunday, January 30, 2011

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 15 (Hindi Proverbs)

प्रस्तुत हैं हिन्दी की कुछ लोकोक्तियाँ तथा मुहावरे और उनके अर्थ। उनके अर्थ मैंने अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार बनाए हैं और उनमें त्रुटि की सम्भावना है अतः यदि आपको त्रुटियाँ नजर आएँ तो कृपया टिप्पणी करके सही अर्थ बताने का कष्ट करें।


छलनी कहे सूई से तेरे पेट में छेद

अर्थः अपने अवगुणों को न देखकर दूसरों की आलोचना करना।

छाज (सूप) बोले तो बोले, छलनी भी बोले जिसमें हजार छेद

अर्थः ज्ञानी के समक्ष अज्ञानी का बोलना।

छीके कोई,नाक कटावे कोई

अर्थः किसी के दोष का फल किसी दूसरे के द्वारा भोगना।

छुरी खरबूजे पर गिरे या खरबूजा छुरी पर

अर्थः हर तरफ से हानि हानि होना।

छोटा मुँह बड़ी बात

अर्थः अपनी योग्यता से बढ़कर बात करना।

छोटे मियाँ तो छोटे मियाँ,बड़े मियाँ सुभानअल्लाह

अर्थः छोटे के अवगणों से बड़े के अवगुण अधिक होना।

जंगल में मोर नाचा किसने देखा

अर्थः कद्र न करने वालों के समक्ष योग्यता प्रदर्शन।

जड़ काटते जाएं, पानी देते जाएं

अर्थः भीतर से शत्रु ऊपर से मित्र।

जने-जने की लकड़ी, एक जने का बोझ

अर्थः अकेला व्यक्ति काम पूरा नहीं कर सकता किन्तु सब मिल काम करें तो काम पूरा हो जाता है।

जब चने थे दॉंत न थे, जब दाँत भये तब चने नहीं

अर्थः कभी वस्तु है तो उसका भोग करने वाला नहीं और कभी भोग करने वाला है तो वस्तु नहीं।

जब तक जीना तब तक सीना

अर्थः आदमी को मृत्युपर्यन्त काम करना ही पड़ता है।

जब तक साँस तब तक आस

अर्थः अंत समय तक आशा बनी रहती है।

जबरदस्ती का ठेंगा सिर पर

अर्थः जबरदस्त आदमी दबाव डाल कर काम लेता है ।

जबरा मारे रोने न दे

अर्थः जबरदस्त आदमी का अत्याचार चुपचाप सहन करना पड़ता है।

जबान को लगाम चाहिए

अर्थः सोच-समझकर बोलना चाहिए।

ज़बान ही हाथी चढ़ाए, ज़बान ही सिर कटाए

अर्थः मीठी बोली से आदर और कड़वी बोली से निरादर होता है।

जर का जोर पूरा है, और सब अधूरा है

अर्थः धन में सबसे अधिक शक्ति है।

जर है तो नर नहीं तो खंडहर

अर्थः पैसे से ही आदमी का सम्मान है।

जल में रहकर मगर से बैर

अर्थः जहाँ रहना हो वहाँ के शक्तिशाली व्यक्ति से बैर ठीक नहीं होता ।

जस दूल्हा तस बाराती

अर्थः स्वभाव के अनुसार ही मित्रता होती है।

Saturday, January 29, 2011

संस्कृत सुभाषित - हिन्दी अर्थ - 2

सुभाषित शब्द "सु" और "भाषित" के मेल से बना है जिसका अर्थ है "सुन्दर भाषा में कहा गया"। संस्कृत के सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं।

यहाँ पर हम प्रस्तुत कर रहे है कुछ सुभाषित!

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैवकुटम्बकम्॥११॥


"ये मेरा है", "वह उसका है" जैसे विचार केवल संकुचित मस्तिष्क वाले लोग ही सोचते हैं। विस्तृत मस्तिष्क वाले लोगों के विचार से तो वसुधा एक कुटुम्ब है।

क्षणशः कणशश्चैव विद्यां अर्थं च साधयेत्।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥१२॥


प्रत्येक क्षण का उपयोग सीखने के लिए और प्रत्येक छोटे से छोटे सिक्के का उपयोग उसे बचाकर रखने के लिए करना चाहिए, क्षण को नष्ट करके विद्याप्राप्ति नहीं की जा सकती और सिक्कों को नष्ट करके धन नहीं प्राप्त किया जा सकता।

अश्वस्य भूषणं वेगो मत्तं स्याद गजभूषणम्।
चातुर्यं भूषणं नार्या उद्योगो नरभूषणम्॥१३॥


तेज चाल घोड़े का आभूषण है, मत्त चाल हाथी का आभूषण है, चातुर्य नारी का आभूषण है और उद्योग में लगे रहना नर का आभूषण है।

क्षुध् र्तृट् आशाः कुटुम्बन्य मयि जीवति न अन्यगाः।
तासां आशा महासाध्वी कदाचित् मां न मुञ्चति॥१४॥


भूख, प्यास और आशा मनुष्य की पत्नियाँ हैं जो जीवनपर्यन्त मनुष्य का साथ निभाती हैं। इन तीनों में आशा महासाध्वी है क्योंकि वह क्षणभर भी मनुष्य का साथ नहीं छोड़ती, जबकि भूख और प्यास कुछ कुछ समय के लिए मनुष्य का साथ छोड़ देते हैं।

कुलस्यार्थे त्यजेदेकम् ग्राम्स्यार्थे कुलंज्येत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥१५॥


कुटुम्ब के लिए स्वयं के स्वार्थ का त्याग करना चाहिए, गाँव के लिए कुटुम्ब का त्याग करना चाहिए, देश के लिए गाँव का त्याग करना चाहिए और आत्मा के लिए समस्त वस्तुओं का त्याग करना चाहिए।

नाक्षरं मंत्रहीतं नमूलंनौधिम्।
अयोग्य पुरुषं नास्ति योजकस्तत्रदुर्लभः॥१६॥


ऐसा कोई भी अक्षर नहीं है जिसका मंत्र के लिए प्रयोग न किया जा सके, ऐसी कोई भी वनस्पति नहीं है जिसका औषधि के लिए प्रयोग न किया जा सके और ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जिसका सदुपयोग के लिए प्रयोग किया जा सके, किन्तु ऐसे व्यक्ति अत्यन्त दुर्लभ हैं जो उनका सदुपयोग करना जानते हों।

धारणाद्धर्ममित्याहुः धर्मो धारयत प्रजाः।
यस्याद्धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः॥१७॥


"धर्म" शब्द की उत्पत्ति "धारण" शब्द से हुई है (अर्थात् जिसे धारण किया जा सके वही धर्म है), यह धर्म ही है जिसने समाज को धारण किया हुआ है। अतः यदि किसी वस्तु में धारण करने की क्षमता है तो निस्सन्देह वह धर्म है।

आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्।
धर्मो हि तेषां अधिकोविशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः॥१८॥


आहार, निद्रा, भय और मैथुन मनुष्य और पशु दोनों ही के स्वाभाविक आवश्यकताएँ हैं (अर्थात् यदि केवल इन चारों को ध्यान में रखें तो मनुष्य और पशु समान हैं), केवल धर्म ही मनुष्य को पशु से श्रेष्ठ बनाता है। अतः धर्म से हीन मनुष्य पशु के समान ही होता है।

सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत्।
यद्भूतहितमत्यन्तं एतत् सत्यं मतं मम्॥१९॥


यद्यपि सत्य वचन बोलना श्रेयस्कर है तथापि उस सत्य को ही बोलना चाहिए जिससे सर्वजन का कल्याण हो। मेरे (अर्थात् श्लोककर्ता नारद के) विचार से तो जो बात सभी का कल्याण करती है वही सत्य है।

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात ब्रूयान्नब्रूयात् सत्यंप्रियम्।
प्रियं च नानृतम् ब्रुयादेषः धर्मः सनातनः॥२०॥


सत्य कहो किन्तु सभी को प्रिय लगने वाला सत्य ही कहो, उस सत्य को मत कहो जो सर्वजन के लिए हानिप्रद है, (इसी प्रकार से) उस झूठ को भी मत कहो जो सर्वजन को प्रिय हो, यही सनातन धर्म है।

Friday, January 28, 2011

हमें भारतीयों के महान कार्यों पर गर्व नहीं होता, सिर्फ आश्चर्य होता है

जब कभी भी मित्रों तथा परिचितों को मैं बताता हूँ कि प्राचीन भारत विज्ञान के क्षेत्र में अत्यन्त उन्नत था तो पहले तो उन्हें विश्वास ही नहीं होता। किन्तु विभिन्न तर्कों तथा प्रमाणों के द्वारा जब मैं अपनी बात को सिद्ध कर देता हूँ तो उन्हें हमारे पूर्वजों के विज्ञान के विषय में विशेषज्ञ होने पर गर्व नहीं होता, सिर्फ आश्चर्य होता है।

ऐसी बहुत सारी घटनाओं का वर्णन श्री सुरेश सोनी जी अपने विभिन्न लेखों में करते है जिनमें से कुछ सन्दर्भ नीचे दिए जा रहे हैं

(1)
डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम अपनी पुस्तक ‘इण्डिया-2020 में : ए विजन फॉर न्यू मिलेनियम’ में बताते हैं कि मेरे घर की दीवार पर एक कैलैण्डर टँगा है, इस बहुरंगी कैलैण्डर में सैटेलाइट के द्वारा यूरोप, अफ्रीका आदिमहाद्वीपों के लिए गये चित्र छपे हैं। ये कैलैण्डर जर्मनी में छपा था। जब भी कोई व्यक्ति मेरे घर में आता था तो दीवार पर लगे कैलैण्डर को देखता था, तो कहता था कि वाह! बहुत सुन्दर कैलैण्डर है! तब मैं कहता था कि यह जर्मनी में छपा है। यह सुनते ही उसके मन में आनन्द के भाव जग जाते थे। वह बड़े ही उत्साह से कहता था कि सही बात है, जर्मनी की बात ही कुछ और है, उसकी टेक्नालॉजी बहुत आगे है। उसी समय जब मैं उसे यह कहता कि कैलैण्डर छपा तो जरुर जर्मनी में है किन्तु जो चित्र छपे हैं उसे भारतीय सैटेलाइट नें खींचे हैं, तो दुर्भाग्य से कोई भी ऐसा आदमी नही मिला जिसके चेहरे पर वही पहले जैसे आनन्द के भावआये हों। आनन्द के स्थान पर आश्चर्य के भाव आते थे, वह बोलता था कि अच्छा! ऐसा कैसे हो सकता है? और जब मै उसका हाथ पकड़कर कैलैण्डर के पास ले जाता था और जिस कम्पनी ने उस कैलैण्डर को छापा था, उसने नीचे अपना कृतज्ञता ज्ञापन छापा था ”जो चित्र हमने छापा है वो भारतीय सैटेलाइट नें खींचे हैं, उनके सौजन्य से हमें प्राप्त हुए हैं।” जब व्यक्ति उस पंक्ति को पढ़ता था तो बोलता था कि अच्छा! शायद, हो सकता है।
(2)
दूसरी घटना भी इन्ही से सम्बन्धित है जब वे सिर्फ वैज्ञानिक थे।। दुनिया के कुछ वैज्ञानिक रात्रिभोज पर आये हुए थे, उसमें भारत और दुनिया के कुछ वैज्ञानिक और भारतीय नौकरशाह थे। उस भोज में विज्ञान की बात चली तो राकेट के बारे में चर्चा चल पड़ी। डॉ. कलाम नें उस चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि कुछ समय पूर्व मैं इंलैण्ड गया था वहाँ एक बुलिच नामक स्थान है, वहाँ रोटुण्डा नामक म्युजियम है। जिसमे पुराने समय के युध्दों में जिन हथियारों का प्रयोग किया गया था, उसकी प्रदर्शनी भी लगाई गयी थी। वहाँ पर आधुनिक युग में छोड़े गये राकेट का खोल था। और आधुनिक युग के इस राकेट का प्रथम प्रयोग श्रीरंगपट्टनममें टीपू सुल्तान पर जब अंग्रेजों ने आक्रमण किया था, उस युध्द में भारतीय सेना नें किया था। इस प्रकार आधुनिक युग में प्रथमराकेट का प्रक्षेपण भारत नें किया था। डॉ. कलाम लिखते हैं किः

जैसे ही मैने यह बात कही एक भारतीय नौकरशाह बोला मि. कलाम! आप गलत कहते हैं, वास्तव में तो फ्रेंच लोगों ने वह टेक्नोलॉजी टीपू सुल्तान को दी थी। डॉ. कलाम नें कहा ऐसा नही है, आप गलत कहते हैं! मैं आपको प्रमाण दूँगा। और सौभाग्य से वह प्रमाण किसी भारतीय का नही था, नही तो कहते कि तुम लोगों ने अपने मन से बना लिया है। एक ब्रिटिश वैज्ञानिक सर बर्नाड लावेल ने एक पुस्तक लिखी थी ”द ओरिजन एण्ड इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स ऑफ स्पेस एक्सप्लोरेशन” उस पुस्तक में वह लिखते हैं कि ‘उस युध्द में जब भारतीय सेना नें राकेट का उपयोगकिया तो एक ब्रिटिश वैज्ञानिक विलियम कांग्रेह्वा ने राकेट का खोल लेकर अध्ययन किया और उसका नकल करके एक राकेट बनाया। उसने उस राकेट को 1805 में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम पिट के सामनें प्रस्तुत किया और उन्होने इसे सेनामें प्रयुक्त करनें की अनुमति दी।’ जब नैपोलियन के खिलाफ ब्रिटेन का युध्द हुआ तब ब्रिटिश सेना नें राकेट का प्रयोग किया।अगर फ्रेंचो के पास वह टेक्नोलॉजी होती तो वे भी सामने से राकेट छोड़ते, लेकिन उन्होने नही छोड़ा। जब यह पंक्तियाँ डॉ. कलामनें उस नौकरशाह को पढ़ाई तो उसको पढ़कर  भारतीय नौकरशाह बोला, बड़ा दिलचस्प मामला है। डॉ. कलाम नें कहा यह पढ़कर उसे गौरव का बोध नही हुआ बल्कि उसको दिलचस्पी का मामला लगा|
(3)
संस्कृत भारती नामक संगठन देश में संस्कृत के प्रचार-प्रसार और उसे जन भाषा बनाने की दृष्टि से विगत कुछ वर्षों से कार्य कर रहा है। इस संगठन ने संस्कृत मात्र धर्म-दर्शन ही नहीं अपितु विज्ञान तथा तकनीक की भी भाषा है, इसे लोगों को बताने की दृष्टि से गणित, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, नक्षत्र विज्ञान आदि के जो संदर्भ प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में उपलब्ध हैं, उनका आधुनिक वैज्ञानिक खोजों से कैसा साम्य है, यह बताने वाले पांच भित्तिचित्र तैयार किये हैं। उसे प्रचारित-प्रसारित किया जाए, इस दृष्टि से भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के प्रमुख अधिकारियों के साथ वार्तालाप हेतु फरवरी २००१ में संस्कृत भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री च.मू.कृष्णशास्त्री अपने साथ पांचों भित्तिचित्र लेकर गये। वार्तालाप के समय वे भित्तिचित्र अधिकारियों के देखने के लिए उनके सामने रखे गये।

उनमें गणित से संबंधित भित्तिचित्र के प्रारंभ में ही उन अधिकारियों ने देखा कि शताब्दियों पूर्व आर्यभट्ट ने (पाई) का मान ३.१४१६ निकाला था तो आश्चर्य के साथ उन्होंने उद्गार व्यक्त किये, ‘अच्छा (पाई) का मान हमारे पूर्वजों ने इतने वर्ष पूर्व निकाल लिया था।' यह घटना इंगित करती है कि भारत वर्ष में विज्ञान के विकास की दिशा निर्धारित करने वाले व्यक्ति भारत वर्ष में विज्ञान की परंपरा की सामान्य जानकारी से भी अनभिज्ञ हैं।
(4)
पुरी के पूर्व शंकराचार्य भारती कृष्ण तीर्थ जी ने अपनी साधना द्वारा शुल्ब सूत्रों और वेद की पृष्ठभूमि से गणित के कुछ अद्भुत सूत्रों और उपसूत्रों का आविष्कार किया। इन १६ मुख्य सूत्रों और १३ उपसूत्रों के द्वारा सभी प्रकार की गणितीय गणनाएं, समस्याएं अत्यंत सरलता और शीघ्रता से हल की जा सकती हैं। इन सूत्रों के आधार पर उन्होंने एक पुस्तक लिखी ‘वैदिक मैथेमेटिक्स।‘ पुस्तक के महत्व को ध्यान में रखते हुए मुम्बई में टाटा द्वारा मूलभूत शोध हेतु स्थापित संस्थान (टाटा इंस्टीट्यूट फार फन्डामेंटल रिसर्च) में कुछ लोग गये और वहां के प्रमुख से आग्रह किया कि गणित के क्षेत्र में यह एक मौलिक योगदान है, इसका परीक्षण किया जाये तथा इसे पुस्तकालय में रखा जाये। तब इस संस्थान ने इसे यह कहकर स्वीकृति नहीं दी कि हमारा इस पर विश्वास नहीं है। जिस पुस्तक को नकार दिया गया वह देश में विचार का विषय आगे चलकर तब बनी जब एक विदेशी गणितज्ञ निकोलस ने इंग्लैंड से मुम्बई आकर कुछ गणितज्ञों के सामने इन अद्भुत सूत्रों के प्रयोग बताकर कहा कि यह तो ‘मैजिक‘ है। इसका प्रचार-प्रसार टाइम्स आफ इंडिया ने किया। यह घटना बताती है कि एक विदेशी इसका महत्व न बतलाता तो उसे मानने की हमारी मानसिकता नहीं थी।
(5)
भूतपूर्व मानव संसाधन विकास तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डा.मुरली मनोहर जोशी १९६२ में उत्तर प्रदेश की पाठ्यक्रम समिति के सदस्य बने। अपने अध्ययन के दौरान उनके ध्यान में आया कि गणित का विद्यार्थी जिस पायथागोरस थ्योरम के कारण भयभीत रहता है उस प्रमेय को पायथागोरस के पूर्व भारत वर्ष में बोधायन ने हल किया था। पायथागोरस की पद्धति जहां दीर्घ, क्लिष्ट व उबाऊ थी वहीं बोधायन की पद्धति अत्यंत संक्षिप्त व सरल थी। अत: उन्होंने पाठ्यक्रम समिति के सदस्यों को यह तथ्य बताया और आग्रह किया कि हमारे यहां इसे बोधायन प्रमेय कहा जाए तो इससे जहां एक ओर विद्यार्थियों को एक सरल पद्धति मिलेगी, वहीं दूसरी ओर हमारे देश का यह अवदान है, यह जानकर उनका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा। लेकिन पाठ्यक्रम समिति के सदस्य तैयार नहीं हुए। लोगों को सहमत करने का वे प्रयत्न करते रहे। इसी कड़ी में एक और तथ्य उनके ध्यान में आया। एडवर्ड टेलर, जो विश्व के एक प्रमुख भौतिक शास्त्री रहे तथा हाइड्रोजन बम, परमाणु बम बनाने में जिनका योगदान रहा और जो नोबल पुरस्कार से सम्मानित हुए, ने एक पुस्तक लिखी है ‘सिम्पलिसिटी एंड साइंस‘। इस पुस्तक में उन्होंने कहा कि विज्ञान की पढ़ाई, दुरूह, जटिल व उबाऊ नहीं होनी चाहिए अपितु सरल, सुगम व आनंद देने वाली होनी चाहिए। इस दृष्टि से गणितीय समस्याएं कितनी सरलता से हल हो सकती हैं, उसके उदाहरण के रूप में उन्होंने बोधायन प्रमेय का उदाहरण दिया था। डा.जोशी ने जब एडवर्ड टेलर के प्रमाण को पाठ्यक्रम समिति को बताया, तब उन्होंने कहा अच्छा आपका इतना आग्रह है तो हम इसे ‘पायथागोरस बोधायन प्रमेय‘ कर देते हैं।

उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि हम भारतीयों का अपनी संस्कृति, सभ्यता, भाषा से विश्वास उठ चुका है, हमारा स्वाभिमान नष्ट हो चुका है। और यह हुआ है स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भी हमारे देश में विदेशियों के विचारों पर आधारित शिक्षानीति के जारी रहने के कारण। अंग्रेज तो चाहते ही थे कि हमारा स्वाभिमान पूरी तरह से नष्ट हो जाए ताकि हम हमेशा-हमेशा के लिए उनकी गुलामी के जंजीरों में जकड़े रहें। पर यह बात समझ से बाहर है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद हमारे देश के कर्णाधारों ने उनकी षड़यन्त्रयुक्त शिक्षा नीति को क्यों जारी रहने दिया? क्या हमारे देश में ऐसे विद्वान नहीं हैं जो पूर्ण रूप से भारतीयता पर आधारित शिक्षानीति का निर्माण कर सकें?

अभी भी यदि हम सँभल जाएँ तो एक बार फिर से भारत को जगद्गुरु का श्रेय दिलवा सकते हैं।

Thursday, January 27, 2011

भारतीय ज्ञान के प्रतीक - यज्ञवेदी

आज जिसे हम हवनकुण्ड या यज्ञकुण्ड कहते हैं वह वास्तव में यज्ञवेदी हैं। "तंत्रार्णव" में बताया गया है कि यज्ञ की वेदी समस्त ब्रह्माण्ड का एक छोटा रूप ही है। इस सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी ने सृष्टियज्ञ करके ही किया था। वेदों में अश्वमेध यज्ञ, राजसूय यज्ञ जैसे अनेक यज्ञों के विषय में वर्णन है। इन सभी यज्ञों के लिए भिन्न-भिन्न आकृतियों वाली वेदियाँ हुआ करती थीं। तैत्तिरीय ब्राह्मण कहता है कि जो स्वर्ग प्राप्ति की कामना से यज्ञानुष्ठान करता है उसे श्येन (बाज) पक्षी की आकृति जैसी वेदी बनवानी चाहिए क्योंकि श्येन की उड़ान समस्त पक्षियों में श्रेष्ठ है; ऐसी वेदी बनवाने वाला स्वयं श्येन का रूप लेकर उड़ते हुए स्वर्गलोक पहुँच जाता है।

यज्ञ की वेदियों की आकृति कितनी जटिल होती थीं इसका अनुमान नीचे के चित्रों को को देखकर लगाया जा सकता हैः

 

(चित्र http://www.ece.lsu.edu/kak/axistemple.pdf के सौजन्य से साभार)

यज्ञ की वेदियों में त्रिभुज, चतुर्भुज जिसमें वर्ग तथा आयत दोनों ही होते थे, षट्भुज, अष्टभुज, वृत आदि रेखागणितीय आकार सम्मिलित रहते थे तथा उन रेखागणितीय आकृतियों के क्षेत्रफल भी पूर्वनिर्धारित तथा निश्चित अनुपात में हुआ करते थे। आकृतियों के आकार-प्रकार, क्षेत्रफल आदि की गणना के लिए सूत्र बनाए गए थे जिन्हें शुल्बसूत्रों के नाम से जाना जाता है। बोधायन एवं आपस्‍तम्‍ब के शुल्बसूत्र प्रमुख माने जाते हैं। आपको शायद ज्ञात होगा, और यदि आप नहीं जानते हैं तो जानकर आपको आश्चर्य होगा, कि त्रिभुज की भुजाओं के वर्ग से सम्बन्धित जिस प्रमेय का प्रतिपादन करने के लिए ग्रीक लोग पैथागोरस को श्रेय देते हैं, उसके विषय में हमारे आचार्यों को पैथागोरस के काल से हजारों वर्ष पहले ही न केवल ज्ञान था बल्कि वे उस प्रमेय का यज्ञवेदी बनाने के लिए व्यवहारिक रूप से प्रयोग भी किया करते थे। बोधायन अपने शुल्बसूत्र में कहते हैं

समचतुरसस्याक्ष्णया रज्जुः पार्श्वमानी तिर्यङ्मानी च यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति।

इसका अर्थ है, किसी आयात का कर्ण क्षेत्रफल में उतना ही होता है, जितना कि उसकी लम्बाई और चौड़ाई के वर्गों का योग होता है, दूसरे शब्दों में कहा जाए तो किसी वर्ग के कर्ण का क्षेत्रफल स्वयं उस वर्ग के क्षेत्रफल से दोगुना होता है। हमारे पूर्वजों के इस ज्ञान को ग्रीक दार्शनिक तथा गणितज्ञ पैथागोरस अपने शब्दों में इस प्रकार कहते हैं कि किसी समकोण त्रिभुज के कर्ण का वर्ग उस त्रिभुज की अन्य दो भुजाओं के वर्गों के योग के बराबर होता है।

इन शुल्बसूत्रों में विशेषरूप से निर्धारित रेखागणितीय आकृतियों के निर्माण के विषय में बहुत से विवरण हैं तथा यह भी बताया गया है कि एक रेखागणितीय आकृति के क्षेत्रफल के बराबर या किसी निश्चित अनुपात के क्षेत्रफल वाले दूसरी रेखागणितीय आकृति कैसे बनाया जा सकता है जैसे कि एक आयत के क्षेत्रफल के बराबर क्षेत्रफल वाले त्रिभुज, चतुर्भुज आदि बनाना।

यज्ञवेदियों के निर्माण के लिए विशेषज्ञ आचार्यों द्वारा इन्हीं सूत्रों का प्रयोग किया जाता था। दूरी की इकाई अंगुल होती थी जो कि जो कि आज के एक इंच के लगभग तीन चौथाई के बराबर होती थी। अंगुल को यव तथा तिल में पुनः विभाजित किया गया था, 8 यव या 34 तिल के बराबर एक अंगुल हुआ करता था। रेखागणितीय आकृतियों की भुजाओं, कर्णों आदि को नापने के लिए डोरी का प्रयोग किया जाता था जिसे कि रज्जु कहा जाता था।

बोधायन ने न केवल पैथागोरस प्रमेय (Pythagorean Ttheorem), जिसे कि अब (Boudhayan Ttheorem) के नाम से जाना जाता है, का ज्ञान दिया बल्कि अंक 2 के वर्गमूल ज्ञात करने सूत्र भी निम्न रूप में हमें दियाः



ऐसा प्रतीत होता है कि शुल्बसूत्रों का प्रयोग उस काल में भवन, अट्टालिकाएँ आदि के निर्माण के लिए भी अवश्य ही हुआ करता रहा होगा। वाल्मीकि रामायण में अयोध्या, मिथिला, लंका के साथ ही साथ अनेक अन्य नगरों का वर्णन मिलता है जिनमें अनेक सुन्दर विशाल अट्टालिकाएँ, भवन, बावड़ियाँ, वाटिकाएँ तथा उपवन, बावड़ियाँ आदि बने होने का विवरण मिलता है जिनके निर्माण के लिए ज्यामितीय ज्ञान का होना अत्यावश्यक है। अतः यही कहा जा सकता है कि प्राचीन भारत में शुल्बसूत्रों का प्रयोग वास्तु से सम्बन्धित निर्माणकार्य में भी हुआ करता था। हमारा तो यह भी विश्वास है कि वर्तमान ताज महल के निर्माण में भी शुल्बसूत्रों का ही प्रयोग हुआ है।

भारत भूमि आरम्भ से ही ज्ञान का भण्डार रहा है और इसीलिए हमारा देश जगद्गुरु के रूप में जाना जाता था। पाश्चात्य विद्वानों ने हमारे वैदिक साहित्य का अपनी भाषाओं में अनुवाद अठारहवीं शताब्दी के अंत या उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में कर डाला था जिन पर शोध आज तक जारी है। प्राचीनकाल के आचार्यों के इन जटिल सूत्रों के विषय में जानकर विश्व के समस्त विद्वजन आज भी हतप्रभ हैं।

Wednesday, January 26, 2011

गणतन्त्र दिवस पर किसलिए खुश हैं आप?

आज आप परस्पर गणतन्त्र दिवस की शुभकामनाओं का आदान प्रदान कर रहे हैं क्योंकि बड़े खुश हैं आप!

पर किसलिए खुश हैं आप?

श्रीनगर के लाल चौक में तिरंगा नहीं फहराया जा सकता इसलिए?

विदेशी बैंकों में काला धन जमा करने वालों की लिस्ट मिल गई है पर उनका सार्वजनिक नहीं किया जाएगा इसलिए?

आतंक का राक्षस न जाने कब, किसे और कहाँ निगल ले इसलिए?

अफजल को फाँसी की सजा मिलने के बाद भी फाँसी नहीं लगी इसलिए?

कसाब कारागार में फाइव स्टार होटल वाली सुविधा पा रहा है इसलिए?

चार-छः महीनों के भीतर पेट्रोल के दाम तीन बार बढ़ाए गए इसलिए?

आपका बच्चा भोजन में दाल खाने को तरस रहा है और आपका नेता रु.1.50 में कटोरी भर के दाल खा रहा है इसलिए?

दाल, सब्जी आदि जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ गए हैं इसलिए?

मँहगाई आसमान छू रही है इसलिए?

प्याज, जो कि दैनिक जीवन का अंग सा बन गया था, अब सपना बन गया है इसलिए?

अपने बच्चों के गणवेश, पुस्तकें आदि स्कूल से ही या स्कूल द्वारा निर्धारित किसी निश्चित दुकान से चार पाँच गुना दाम देकर खरीदना पड़ रहा है इसलिए?

किसलिए खुश हैं आप?

सिर्फ इसलिए खुश हैं न कि भारत में गणतन्त्र है और आज गणतन्त्र दिवस मनाया जा रहा है!

पर कैसा गणतन्त्र है ये?

जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन वाला गणतन्त्र या नेता, अधिकारी और व्यापारी द्वारा, अधिकारी और व्यापारी के लिए, अधिकारी और व्यापारी का शासन वाला गणतन्त्र?

जरा सोचिए इन प्रश्नों के उत्तर और दीजिए जवाब।

किसलिए खुश हैं आप?

Tuesday, January 25, 2011

संस्कृत सुभाषित - हिन्दी अर्थ - 1


सुभाषित शब्द "सु" और "भाषित" के मेल से बना है जिसका अर्थ है "सुन्दर भाषा में कहा गया"। संस्कृत के सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं।

यहाँ पर हम प्रस्तुत कर रहे है कुछ सुभाषित!

अग्निः शेषं ऋणः शेषं शत्रुः शेषं तथैव च।
पुनः पुनः प्रवर्धेत तस्मात् शेषं न कारयेत्॥१॥


आग, कर्ज और शत्रु यदि किंचित मात्र भी शेष रह जाते हैं तो फिर से बढ़ जाते हैं, इसलिए उन्हें पूरी तरह से खत्म कर देना चाहिए।

पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलं अन्नं सुभाषितम्।
मूढ़ैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा प्रदीयते॥२॥


पृथ्वी में तीन रत्न हैं - जल, अन्न और सुभाषित, किन्तु मूर्ख जन पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न समझते हैं।

नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
विक्रमार्जितसत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥३॥


वन में न तो सिंह का राज्यभिषेक होता है न ही उसे राजा घोषित करने के लिए कोई संस्कार (उत्सव)। सिंह स्वयं के सत्त्व (गुण) और विक्रम के द्वारा जंगल का राजा बन जाता है।

वनानि दहतो वन्हेः सखा भवति मारुतः।
स एव दीपनाशाय कृशे कस्यास्ति सौहृदम॥४॥


वन में आग लगने पर जो हवा का झौंका उसको बढ़ाने के लिए उसका सहायक बन जाता है वही हवा का झौंका छोटे से दीपक की ज्वाला को बुझा देता है, अर्थात सबल के सभी साथी होते हैं।

विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय।
खलस्य साधोः विपरीतमेतद् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥५॥


विद्या, धन और शक्ति जहाँ एक खल (दुर्जन) को विवादी, अहंकारी और अत्याचारी बनाते हैं वहीं वे एक साधु (सज्जन) को ज्ञानी, दानी और रक्षक बनाते हैं।

दु्र्बलस्य बलं राजा बालानां रोदनं बलम्।
बलं मूर्खस्य मौनित्वं चोराणाम् अनृतम् बलम्॥६॥


दुर्बल का बल राजा होता है, बालक (शिशु) का बल उसका रोना होता है, मूर्ख का बल मौन (कुछ बोलकर अपनी मूर्खता प्रकट करने के स्थान पर चुप रह कर अपनी मूर्खता छिपाना) होता है और चोर का बल असत्य भाषण (झूठ बोलना) होता है।

अश्वं नैव गजं नैव व्याघ्रं नैव च नैव च।
अजापुत्रं बलिं दद्यात देवो दर्बलघतकः॥७॥


देवी-देवताओं को घोड़े की नहीं, हाथी की नहीं, व्याघ्र (सिंह) की नहीं, मात्र बकरे की बलि दी जाती है, कमजोर की रक्षा भगवान भी नहीं करते।

अष्टादशपुराणानां सारं व्यासेन कीर्तितम्।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥८॥


व्यास की कीर्तिस्वरूप अठारह पुराणों का सार है परोपकार ही पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना ही पाप। (कहा भी गया है "परहित सरिस धरम नहि भाई, परपीड़ा सम नहि अधिकाई।)

हिमालयं समारभ्य यावत् इंदु सरोवरम्।
तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥९॥


ईश्वर के द्वारा निर्मित हिमालय से इंदु सरोवर (हिन्द महासागर) तक के क्षेत्र को हिन्दुस्तान के नाम से जाना जाता है।

एतद्देशप्रसूतस्य सकशादग्रजन्मनः।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः॥१०॥


समस्त पृथ्वी के वासियों को इस देश (भारतवर्ष) में जन्मे पूर्वपुरुषों (ऋषि मुनियों) से सच्चरित्रता के साथ जीवनयापन की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।

Monday, January 24, 2011

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 14 (Hindi Proverbs)

प्रस्तुत हैं हिन्दी की कुछ लोकोक्तियाँ तथा मुहावरे और उनके अर्थ। उनके अर्थ मैंने अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार बनाए हैं और उनमें त्रुटि की सम्भावना है अतः यदि आपको त्रुटियाँ नजर आएँ तो कृपया टिप्पणी करके सही अर्थ बताने का कष्ट करें।

चींटी की मौत आती है तो उसके पर निकलने लगते हैं

अर्थः घमंड करने से नाश होता है।

चील के घोसले में मांस कहाँ

अर्थः दरिद्र व्यक्ति क्या बचत कर सकता है?

चुड़ैल पर दिल आ जाए तो वह भी परी है

अर्थः पसंद आ जाए तो बुरी वस्तु भी अच्छी ही लगती है।

चुल्लू़ भर पानी में डूब मरना

अर्थः शर्म से डूब जाना।

चुल्लू-चुल्लू साधेगा, दुआरे हाथी बाँधेगा

अर्थः थोड़ा-थोड़ा जमा करके अमीर बना जा सकता है।

चूल्हे की न चक्की की

अर्थः किसी काम न होना।

चूहे का बच्चा बिल ही खोदता है

अर्थः स्वभाव नहीं बदलता।

चूहे के चाम से कहीं नगाड़े मढ़े जाते हैं

अर्थः अपर्याप्त।

चूहों की मौंत बिल्ली का खेल

अर्थः दूसरे को कष्ट देकर मजा लेना।

चोट्टी कुतिया जलेबियों की रखवाली

अर्थः चोर को रक्षा करने के कार्य पर लगाना।

चोर के पैर नहीं होते

अर्थः दोषी व्यक्ति स्वयं फँसता है।

चोर-चोर मौसेरे भाई

अर्थः एक जैसे बदमाशों का मेल हो ही जाता है।

चोर-चोरी से जाए, हेरा-फेरी से न जाए

अर्थः दुष्ट आदमी से पूरी तरह से दुष्टता नहीं छूटती।

चोर लाठी दो जने और हम बाप पूत अकेले

अर्थः शक्तिशाली आदमी से दो व्यक्ति भी हार जाते हैं।

चोर को कहे चारी कर और साह से कहे जागते रहो

अर्थः दो पक्षों को लड़ाने वाला।

चोरी और सीनाजोरी

अर्थः गलत काम करके भी अकड़ दिखाना।

चोरी का धन मोरी में

अर्थः हराम की कमाई बेकार जाती है।

चौबे गए छब्बे बनने, दूबे ही रह गए

अर्थः अधिक लालच करके अपना सब कुछ गवाँ देना।

छछूँदर के सिर में चमेली का तेल

Sunday, January 23, 2011

2011 - एक अनूठा वर्ष

इतना तो आपने पत्र-पत्रिकाओं आदि मे पढ़ ही लिया होगा कि वर्ष 2011 में 1 अंक से सम्बन्धित अनेक दिनांक होंगे जैसे कि 1.1.11, 11.1.11, 11.1.11, 11.11.11 आदि। पर इसके अलावा भी 2011 की और भी कई विशिष्टताएँ हैं।

2011 एक रूढ़ अर्थात् अभाज्य संख्या है। रूढ़ या अभाज्य संख्या उस संख्या को कहा जाता है जिसमें स्वयं उस संख्या और 1 के सिवाय किसी अन्य संख्या का पूरा-पूरा भाग जा ही नहीं सकता जबकि इसके विपरीत यदि किसी संख्या में अन्य दूसरी संख्या का पूरा-पूरा भाग चला जाए तो उसे यौगिक संख्या कहते हैं। याने कि 2011 में स्वयं 2011 और 1 के सिवाय किसी अन्य का पूरा-पूरा भाग जा ही नहीं सकता।

2011 ग्यारह क्रमानुगत आने वाले रूढ़ संख्याओं का योग हैः

2011=157+163+167+173+179+181+191+193+197+199+211

साथ ही 2011 अन्य तीन क्रमानुगत आने वाले रूढ़ संख्याओं का योग भी हैः

2011=661+673+677

एक खुशखबरी यह भी है कि वर्ष 2011 विवाह के इच्छुक युवक-युवतियों के लिए शादी विवाह के कुल 222 मुहूत लेकर आया है, वर्ष 2011 के प्रायः हर तीसरे दिन शादी का शुभ मुहूर्त है। (अधिक विवरण के लिए यह लिंक देखें।)

वर्ष 2011 बीते दिनों को वापस लाने वाला वर्ष भी है, इसके एक एक-एक दिन वर्ष 2005 कें एक-एक दिन से बिल्कुल मिलते हैं। यदि विश्वास न हो रहा हो तो वर्ष 2005 और वर्ष 2011 के कैलेण्डरों का मिलान करके देख लें। यहाँ पर यह बताना भी उपयुक्त होगा कि इस शताब्दी के वर्ष 2013 और 2019, 2015 और 2020 तथा 2016 तथा 2022 में भी इसी प्रकार की समानता दिखाई देगी।

इस शताब्दी में दो और ऐसे रूढ़ संख्या वाले वर्ष आएँगे जो कि अन्य क्रमानुगत रूढ़ संख्याओं के योग वाले होंगे, पहला सन्.2027 और दूसरा सन् 2081।

2027 = 29+31+37+41+43+47+53+59+61+67+71+73+ 79+83+89+97+101+103+107+109+113+127+131+137+139

2027 की एक और विशेषता यह होगी कि इसके अंकों का योग याने कि (2+0+2+7=) 11 भी एक रूढ़ संख्या होगी।

2081 =401+409+419+421+431

तो फिलहाल वर्ष 2011 के मजे लें। हमारी शुभकामनाएँ हैं कि यह वर्ष आपके लिए मंगलमय हो!

Saturday, January 22, 2011

प्रसिद्ध व्यक्ति तथा उनके उपनाम


उपनामव्यक्ति
भारत का शेक्सपीयरकालिदास
भारत का मैकियावेलीचाणक्य
भारत का नेपोलियनसमुद्रगुप्त
मैसूर का शेरटीपू सुल्तान
तराना-ए-हिन्दमिर्जा गालिब
तोता-ए-हिन्दअमीर खुसरो
भारतीय पुनर्जागरणराजा राममोहन राय
गुरुदेवरवीन्द्र नाथ टैगोर
गुरुजीएम।एस गोलवलकर
लाल-बाल-पाललाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चन्द्र पाल
पंजाब केसरीलाला लाजपत राय
लोकमान्यबाल गंगाधर तिलक
नेताजीसुभाष चन्द्र बोस
केसर-ए-आजमभगत सिंह
युग पुरुषमहात्मा गांधी
राष्ट्रपितामहात्मा गांधी
बापूमहात्मा गांधी
चाचाजवाहर लाल नेहरू
लौह पुरुषसरदार वल्लभ भाई पटेल
भारत का बिस्मार्कसरदार वल्लभ भाई पटेल
सरदारवल्लभ भाई पटेल
देशरत्नडॉ। राजेन्द्र प्रसाद
महामनामदन मोहन मालवीय
देशबन्धुचितरंजन दास
शान्ति पुरुषलाल बहादुर शास्त्री
शास्त्रीजीलाल बहादुर शास्त्री
हॉकी के जादूगरध्यानचंद
उड़नपरीपी।टी। उषा
भारतीय फिल्मों के पितामहदादा साहब फाल्के
स्वर कोकिलालता मंगेषकर
एंग्री यंगमैनअमिताभ बच्चन

Friday, January 21, 2011

ऋग्वेद में प्रकाश की गति का सूत्र (Formula for Speed of Light in Rig Veda)

वेदों में देवताओं की स्तुति हेतु अनेक ऋचाएँ पढ़ने के लिए मिलती हैं। ऋग् वेद में सूर्य की स्तुति के लिए एक ऋचा हैः

तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कुदसि सूर्य। विश्वमाभासि रोचनम्

इस ऋचा को पढ़कर सायनाचार्य (c.1300's) ने टिप्पणी के रूप में सूर्य की एक और स्तुति लिखी, जो इस प्रकार हैः

तथा च स्मर्यते योजनानां सहस्त्रं द्वे द्वे शते द्वे च योजने एकेन निमिषार्धेन क्रममाण नमोऽस्तुते॥

(सन्दर्भ http://fundamentals.quizblog.in/2010/08/thata-cha-smaryate-yojamam-sahastre-dwe.html)

यहाँ पर "द्वे द्वे शते  द्वे" का अर्थ है "2202" और "एकेन निमिषार्धेन" का अर्थ "आधा निमिष" है। अर्थात सूर्य की स्तुति करते हुए यह कहा गया है कि सूर्य से चलने वाला प्रकाश आधा निमिष में 2202 योजन की यात्रा करता है।

आइए योजन और निमिष को आज प्रचलित इकाइयों में परिवर्तित करके देखें कि क्या परिणाम आता हैः

अब तक किए गए अध्ययन के अनुसार एक योजन 9 मील के तथा एक निमिष 16/75 याने कि 0.213333333333333 सेकंड के बराबर होता है।

2202 योजन = 19818 मील = 31893.979392 कि.मी.

आधा निमष = 0.106666666666666 सेकंड

अर्थात् सूर्य का प्रकाश 0.106666666666666 सेकंड में 19818 मील (31893.979392 कि.मी.) की यात्रा करता है।

याने कि प्रकाश की गति 185793.750000001 मील (299006.056800002) कि.मी. प्रति सेकंड है।

वर्तमान में प्रचलित प्रकाश की गति लगभग 186000 मील (3 x 10^8 मीटर) है जो कि सायनाचार्य के द्वारा बताई गई प्रकाश की गति से लगभग मेल खाती है।

आखिर सायनाचार्य ने ऋग वेद के उस ऋचा को पढ़कर टिप्पणी में प्रकाश की गति दर्शाने वाली सूर्य की स्तुति कैसे लिखी? कहीं ऋग वेद की वह ऋचा कोई कोड तो नहीं है जिसे सायनाचार्य ने डीकोड किया?

Thursday, January 20, 2011

अगस्त्य संहिता में इलेक्ट्रोप्लेटिंग की विधि (Electroplating process in Agastya Samhita)

हमारी सबसे बड़ी विडम्बना है कि हम अपने प्राचीन ग्रन्थों में निहित सामग्री को कपोल कल्पना समझते हैं, संस्कृत साहित्य को केवल मन्त्रोच्चार की सामग्री समझते हैं, ब्रह्म संहिता, वाल्मीकि रामायण आदि में वर्णित स्थानों के नाम को कल्पित नाम समझते हैं जबकि हमारे प्राचीन ग्रन्थ ज्ञान के अथाह सागर हैं।

"Technology of the Gods: The Incredible Sciences of the Ancients" (Google Books) का लेखक उद्धृत करता हैः
"In the temple of Trivendrum, Travancore, the Reverned S. Mateer of the London Protestant Mission saw 'a great lamp which was lit over one hundred and twenty years ago', in a deep well in side the temple. ....... On the background of the Agastya Samhita text's giving precise directions for constructing electrical batteries, this speculation is not extravagant."
अर्थात्
"लंदन प्रोटेस्टैन्ट मिशन के Reverned S. Mateer ने त्रिवेन्द्रम, ट्रैवंकोर के मन्दिर में 'एक महान दीप (a great lamp) देखा जो कि पिछले एक सौ बीस वर्षों से जलता ही चला आ रहा था'। .....अगस्त्य संहिता में निहित विद्युत बैटरी बनाने के स्पष्ट दिशा निर्देश की पृष्ठभूमि में उनके अवलोकन को अतिशयोक्ति या असत्य नहीं कहा जा सकता।"
(चूँकि उपरोक्त पुस्तक कॉपीराइटेड है, हमने उसमें से एक दो पंक्तियों को ही उद्धृत किया है और उसके लिए आभार भी व्यक्त करते हैं।)

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आज की अनेक आधुनिक तकनीकों का वर्णन हमारे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। शुक्र नीति के अनुसार आज के इलेक्ट्रोप्लेटिंग के लिए "कृत्रिमस्वर्णरजतलेपः" शब्द का प्रयोग करते हुए इसे "सत्कृति" नाम नाम दिया गया है - "कृत्रिमस्वर्णरजतलेप: सत्कृतिरुच्यते"।

अगस्त्य संहिता में विद्युत बैटरी का सूत्र (Formula for Electric battery in Agastya Samhita) के विषय में हम पहले ही बता चुके हैं और अब यह बताना चाहते हैं कि अगस्त्य संहिता में विद्युत्‌ का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग के लिए करने की विधि दर्शाते हुए निम्न सूत्र मिलता हैः

यवक्षारमयोधानौ सुशक्तजलसन्निधो॥
आच्छादयति तत्ताम्रं स्वर्णेन रजतेन वा।
सुवर्णलिप्तं तत्ताम्रं शातकुंभमिति स्मृतम्‌॥


अर्थात्‌- लोहे के पात्र में रखे गए सुशक्त जल (तेजाब का घोल) का सानिध्य पाते ही यवक्षार (सोने या चांदी का नाइट्रेट) ताम्र को स्वर्ण या रजत से आच्छादित कर देता है। स्वर्ण से लिप्त उस ताम्र को शातकुंभ स्वर्ण कहा जाता है।

मुझे संस्कृत का विशेष ज्ञान नहीं है अतः मेरे द्वारा किया गया अर्थ दोषयुक्त हो सकता है, संस्कृत के पण्डित और भी अच्छा हिन्दी अनुवाद कर पाएँगे।

(सन्दर्भः http://www.organiser.org/dynamic/modules.php?name=Content&pa=showpage&pid=184&page=22)

हमें तो यह भी प्रतीत होता है कि संस्कृत साहित्य में प्रयुक्त लघु और गुरु मात्राएँ भी आज के बायनरी के अंक अर्थात् 0 और 1 हैं और अनुष्टक श्लोक उनके 8 bits याने कि 1 bite हैं। बहुत सी वैज्ञानिक जानकारी, जैसा कि आज भी होता है, संकेत (codes) में लिखा गया है। आज आवश्यकता है तो अपने प्राचीन ग्रन्थों का गूढ़ अध्ययन करके शोध करने की।

Wednesday, January 19, 2011

इतना लुट जाने पर भी हम चेते नहीं? अब भी हम क्यों लुटे चले जा रहे हैं?

हजार साल से भी अधिक वर्षों से विदेशी लूटते चले आ रहे हैं। तुर्कों ने लूटा, मुगलों ने लूटा पुर्तगालियों ने लूटा, अंग्रेजों ने लूटा और अब बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ लूट रही हैं। देश की सम्पदा अनवरत रूप से विदेशों में जाती रही थी और जाती चली जा रही है। विश्व का सर्वाधिक धनाड्य देश सबसे बड़ा कंगाल देश बनकर रह गया।

प्लासी के युद्ध से वाटरलू के युद्ध तक अर्थात् सन् 1757 से 1815 तक, लगभग एक हजार मिलियन पाउण्ड याने कि पन्द्रह अरब रुपया शुद्ध लूट का भारत से इंग्लैंड पहुँच चुका था। इसका सीधा-सीधा अर्थ यह हुआ कि अट्ठावन साल तक ईस्ट इंडिया कंपनी के नौकर प्रति वर्ष लगभग पचीस करोड़ रुपये भारतवासियों से लूटकर अपने देश ले जाते रहे। समस्त संसार के इतिहास में ऐसी भयंकर लूट की मिसाल अन्य कहीं नहीं मिलती।

इंग्लैंड के लंकाशायर और मनचेस्टर में भाफ के इंजिनों से चलने वाले अनेक कारखाने खोलने के लिए धन कहाँ से आया? भारत को लूट कर ही ना?

आज जब हम बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बने चाय, कॉफी, साबुन, पेस्ट जैसे रोजमर्रा के सामान खरीदते हैं तो हमारा धन कहाँ जाता है? विदेशों में ही ना!

तो क्यों नहीं अपने देश में बनी वस्तुएँ इस्तेमाल करते? ऐसा करके आप देश के धन को देश में ही बनाए रख सकते हैं। आइए संकल्प लें कि हम स्वदेशी वस्तुएँ ही खरीदेंगे।

ये है सूची स्वदेशी और विदेशी वस्तुओं कीः

टूथपेस्ट, दंतमंजन, टूथब्रशः

स्वदेशीविदेशी
एंकर, स्वदेशी, बबूल, प्रॉमिस, विको, अमर, औरा, डाबर, चॉइस, टु जेल, मिसवाक, अजय, हर्बोडंट, अजंता, गरवारे, ब्रश, क्लासिक, ईगल, दंतपोला, बंदर छाप दंतमंजन, बैद्यनाथ, इमामी, युवराज, पतंजलि, विटको पावडर, इकारमेंट, डॉ. स्ट्रांग, मोनेट, रॉयल तथा लघु-कुटीर उद्योग के अन्य स्थानीय उत्पादन।कोलगेट, सिबाका, क्लोजअप, पेप्सोडेंट, सिग्नल, मेक्लींस, प्रुइंट, एमवे, क्वांटम, एक्वा फ्रेश, नीम, ओरल-बी, फोरहेंस।

शेविंग क्रीम तथा ब्लेडः

स्वदेशीविदेशी
गोदरेज, इफ्को, अफगान, इमामी, एक्रीम, सुपर, स्वदेशी, सुपरमेक्स, अशोक, पनामा, वी-जोन, टोपाज़, प्रीमियम, पार्क एवेन्यू, लेजर, विद्युत, जे.के., मेट्रो डीलक्स, भारत, सिल्वर, इशवायर लेसर तथा लघु-कुटीर उद्योग के अन्य स्थानीय उत्पादन।पॉमालिव, ओल्ड स्पाइस, नीविया, पोंड्स, प्लेटिनम, जीलेट, विलमेन, सेवन ओ क्लॉक, विल्टेल, इरास्मिक, स्विस, लक्मे, डेनिम, विल्किन्सन, लेदर, मेन्थॉल।

नहाने का साबुनः

स्वदेशीविदेशी
निरमा, संतूर, स्वस्तिक, मैसूर सैंडल, विप्रो, शिकाकाई, फ्रेश, अफगान, कुटीर होमाकोल, प्रीमियम, मीरा, मेडिमिक्स, विमल, गंगा, पतंजलि, सिंथॉल, वनश्री, सर्वोदय, कस्तूरी, फरग्लो, हिमालय, विजिल, निमा, सहारा तथा लघु-कुटीर उद्योग के अन्य स्थानीय उत्पादन।लक्स, लिरिल, लाइफबॉय, पियर्स रेक्सोना, हमाम, जय, मोती, कैमे, डव, पोण्डस, पामालिव, जॉन्सन, क्लियरेसिल, डेटॉल, लेसान्सी, जास्मिन, गोस्डमिस्ट, लक्मे, एमवे, क्वांटम, मार्गो, ब्रीज, ओ.के.।

धोने के साबुनः

स्वदेशीविदेशी
निरमा, विमल, हिपोलीन, डेट, स्वस्तिक, ससा, प्लस, आधुनिक, एक्टो, टी-सीरीज, होमाकोला, पीताम्बरी, बी.बी., फेना उजाला, टाटा शुद्ध, ईजी, घड़ी, जेन्टील, 555, गोदरेज, रिविल, सहारा, केर, दीप, चमको, टाटा शुद्ध, निमा तथा लघु-कुटीर उद्योग के अन्य स्थानीय उत्पादन।सनलाइट, व्हील, 501, ओके, एरियल, चेक, डबल, ट्रिलो, रिन, विमबार, की, रिबेल, एमवे क्वांटम, सरफ एक्सेल, हरपीक, रॉबिन ब्लू, रिविल, वूलवॉश, हेंको, स्कायलांक, टिनापल, हार्पिक, हिन्दुस्तान लीवर लिमि. के अन्य उत्पादन।

सौन्दर्य प्रसाधन एवं औषधिः

स्वदेशीविदेशी
सिंथॉल, इफ्को, जीटेल्क, संतूर, लुपिन, इमामी, अफगान, नोवाकेर, नोवासिल, बोरोप्लस, तुलसी, टिप्स एण्ड टोज, श्रृंगार, विको टर्मरिक, अर्निका, हेयर एण्ड केयर, हिमानी, पैराशूट, केडीला, सिप्ला, डेन्ड्रफ सोल्युशन, सिल्केशा, हिमताज, फ्रेम, डाबर, धूतपापेश्वर, कोप्रान, फ्रेंको, इप्का, खंडेलवाल, बोरोलीन, केराफेड, महर्षि आयुर्वेद, लुपिन, रोच टोरंट फार्मा, हिमालया, शान्तिरत्न, केशामृत, बलसारा, कोकोराज, जे.के. डाबर, सांडू, वैद्यनाथ, हिमालय, भास्कर, तन्वी, पतंजलि, प्रीमियम, मूव्ह, क्रैक, बजाज सेवाश्रम, नीम, इफ्को, महाभुंग, मार, राजतेल, प्रकाश, डक, मोरोलेकन्सा, जयश्री क्रीम, पार्क एवेन्यू, मृगाहल, किसन, मकाय, जय जवान, नाइल, हिमानी गोल्ड, हैवन्स गोल्ड, हैवन्स ग्लोरी तथा लघु-कुटीर उद्योग के अन्य स्थानीय उत्पादन।जॉन्सन, पोण्ड्स, ओल्ड स्पाइस, क्लियरेसिल, ब्रिलक्रीम, फेयर एण्ड लव्हली, वेल्वेट, मेडीकेयर, लैवेण्डर, नायसिल, शावर तो शावर, क्यूटीकुरा, लिरिल, लक्मे, डेनिम, आर्गेनिक्स, पेंटीन, रुट्स, हेड एण्ड शोल्डर, क्वांटम, निहार, क्लीनिक, एमवे, ओले, रेवलोन, कोको केयर, ग्लैक्सो, बैसील, नवराटिस, क्लियरटोन, नीविया, चाम्स, एन्नेफ्रेंच, चार्ली।

चाय-कॉफीः

स्वदेशीविदेशी
टाटा टी, गिरनार, हँसमुख, आसाम टी, सोसायटी, सपट, डंकन, ब्रह्मपुत्र, एम.आर., सनटिप्स, इन्डिया, अशोक, तेज, टाटा कैफे, एम.आर. कॉफी, न्यूट्रामूल, प्लेन्टेन कैफे, टाटा टेटली, पतंजलि, गायका दूध, इण्डियन कॉफी, रॉयल बेंगाल तथा लघु-कुटीर उद्योग के अन्य स्थानीय उत्पादन।ब्रुकबांड, ताजमहल, रेड लेबल, डायमेड, लिप्टन, ग्रीन लेबल, टाइगर, नेस्केफे, नेस्ले, डेल्का, ब्रू, सनराइज, थ्री फ्लॉवर्स, यलो लेबल, चियर्स, गॉडफ्रेशिलिप्स, पोल्सन, गुडरिक, माल्टोवा।

बिस्किट, चाकलेट, ब्रेड दूधः

स्वदेशीविदेशी
अमूल, सिमको, स्मिथ न्यूट्रीन, शांग्रीला, चेम्पियन, एम्प्रो, पार्ले, साठे, बेकमेन, प्रिया गोल्ड, मोनेको, क्रेकजैक, गिट्स, शालीमार, पैरी, रावलगाँव, नीलगिरि, क्लासिक, न्यूट्रामूल, मोन्जीनीज, आरे, कैम्पको, सम्राट, रॉयल, विज्या, इंडाना, सफल, एशियन, विब्ज ब्रेड, वेस्का, सागर, आल्मोंड, क्रमिका, स्पन तथा लघु-कुटीर उद्योग के अन्य स्थानीय उत्पादन।ब्रिटानिया, टाइगर, मैरी, नेस्ले, केडबरी, बॉर्नव्हिटा, हॉर्लिक्स, बूस्ट, मिल्कमेड, किसान, मैगी, फैरेक्स, माल्टोवा, अनिक स्प्रे, कॉम्प्लान, किटकैट, चार्ज, एक्लेयर, मोडर्न ब्रेड, ब्रिटानिया ब्रेड, विवा, माइलो, फाइव्ह स्टार, लिप्टन, ग्लुकोज, ब्राउन एण्ड पोल्सन, हॉल्स, चिकलेट, चोको, चियर, ओल्ड जमाइका चोको, विक्स रोएक्स, मिल्कबार, नेसफेरी।

खाद्य तेल एवं खाद्य पदार्थः

स्वदेशीविदेशी
धारा, सफोला, पतंजलि, रामदेव, लिज्जत, टाटा, मारुति, पोस्टमेन, रॉकेट, गिन्नी, स्वीकार, कारनेला, रथ, मोहन, उमंग, विजया, सपन, पैराशूट, अशोक, कोहिनूर, मधुर, इंजन, गगन, अमृत, वनस्पति, एमडीएच, एवरेस्ट, बेडेकर, कुबल, सहकार, गणेश, शक्तिभोग, परम, अंकुर, सूर्या, ताजा, तारा, सागर, रुचि, हनुमान, कोकोकेर, क्षुपक, शालिमार तथा लघु-कुटीर उद्योग के अन्य स्थानीय उत्पादन।डालडा, क्रिस्टल, लिप्टन, अन्नपूर्णा, मैगी, किसान, तरला, ब्रुक, पिल्सबरी, कैप्टन कूक, मॉडर्न, कारगिल, नेस्ले, सनड्रॉप, फ्लोराविटल, एवरी डे, अनिक।

अचार, मुरब्बा, चटनी, कोल्ड ड्रिंक्सः

स्वदेशीविदेशी
रसना, फेनिया, पतंजलि, एनर्जी, सोसयो, केम्पाकोला, गुरूजी, ओन्जुस, जाम्पिन, नीरो, प्रिंगो, फ्रूटी, आस्वाद, डाबर, माला, रोजर्स, बिस्लेरी, वेकफील्ड, नोगा, हमदर्द, मैप्रो, रेनबो, कल्वर्ट, सीटम्ब्लिका, रूह अफजा, जय, गजानन, हल्दीराम, गोकुल, बीकानेर, प्रिया, अशोक, मदर्स रेसेपी, उमा तथा लघु-कुटीर उद्योग के अन्य स्थानीय उत्पादन।लहेर, पेप्सी, सेवन अप, मिरिंडा, टीम, कोका कोला, मेक्डॉवेल, मेगोला, गोल्डस्पॉट, लिम्का, सिट्रा, थम्स अप, स्प्राइट, ड्यूक्स, फेन्टा, केडबरी, केनडा ड्राय, क्रश, स्लाइस, ड्यूक्स, मेगी, किसान, ब्राउन एण्ड पोल्सन, ब्रुकब्रांड, नेस्ले।

आइसक्रीमः

स्वदेशीविदेशी
अमूल, वडीलाल, गोकुल, दिनशॉ, जॉय, श्रीराम, पेस्टनजी, नेचर वर्ल्ड, हिमालय, निरुला, आरे, पेरीना, मदर डेयरी, अशोका, विंडी, हैव मोर, वेरका तथा लघु-कुटीर उद्योग के अन्य स्थानीय उत्पादन।कैडबरी, डोलोप, नाइस, ब्रुकबांड, क्वालिटी वॉल्स, बास्किन एण्ड रोबिन्स, यांकी डूडल्स, कोरनेट्टो, डिनशो, कोलप्स, रेनाल्ड, दिनेश।

पैकबंद स्नेक्सः

स्वदेशीविदेशी
बालाजी, गोपाल, बिकानो, हल्दीराम, एवन, होम मेड एण्ड स्नेक्स तथा लघु-कुटीर उद्योग के अन्य स्थानीय उत्पादन।अंकलचिप्स, पेप्सी, फनमिर्च।

पीने का पानीः

स्वदेशीविदेशी
रेल, गरम करलुं पानी, घरे फिल्टर, यश, गंगा, हिमालया, केच, नीर, बिस्लेरी तथा लघु-कुटीर उद्योग के अन्य स्थानीय उत्पादन।एक्वाफिना, बैले, किनले, प्योर लाइफ, एवियन पेरियर।

लेखन सामग्रीः

स्वदेशीविदेशी
कैम्लिन, विल्सन, कैमल, रोटोमेक्स, जीफ्लो, रेव्हलॉन, स्टिक, चन्द्र, मोर्टेक्स, सेलो, बिट्टू, प्लेटो, कोलो, भारत, त्रिवेणी, फ्लारा, अप्सरा, नटराज, लायन, हिन्दुस्तान, ओमेगा, लोटस, आर्मी, डेल्टा, लेक्सर तथा लघु-कुटीर उद्योग के अन्य स्थानीय उत्पादन।पॉर्कर, पायलट, विंडसर न्यूटन, फैबरइ कैसेल, लक्जर, बिक, मांट, ब्लैक, कोरस, यस, रोटरिंग, रेनॉल्ड, एडजेल, यूनिबोल, फ्लेर, मित्सबिसी, राइडर, स्विसयेर।


विद्युत उपकरण, गृह उपयोगी वस्तुएँ घड़ी आदिः

स्वदेशीविदेशी
बी.पी.एल, विडियोकान, ओनिडा, सलोरा, ई टी एण्ड टी, टी सीरीज, नेल्को, वेस्टन, अपट्रॉन, केल्ट्रान, कॉस्मिक, टीवीएस, गोदरेज, क्राउन, बजाज, उषा, पोलर, लाइड्स, ब्ल्यू स्टार, व्होल्टास, कुल होम, खेतान, एवरेडी, जीप, नोविनो, निर्लेप, इलाइट, अंजलि, सुमीत, जयको, टाइटन, अजंता, एचएमटी, मैक्सिमा, आल्विन, बंगाल, मैसूर, हॉकिन्स, प्रेस्टीज, राजेश, सीजा, ट्रिवेल, मैसूर, हिन्दुस्तान, सीमा, सूर्या, एंकर, प्रकाश, ओर्पेट, कॉस्मिक, ओरियंट, टुल्लू, क्रॉम्टन, शक्ति, सिल्वर, अनुपम, डीलक्स, कोहिनूर, यूनिवर्सल तथा लघु-कुटीर उद्योग के अन्य स्थानीय उत्पादन।जीईसी, फिलिप्स, व्हर्लपूल, तोशिबा, सोनी, टी.डी.के., नेशनल पैनासोनिक, जीवनसाथी, आनन्द, शॉर्प, कीजिइन, आल्विन, सैमसंग, डेव, अकाई, सैनसुइ, एलजी, हिताची, थॉम्प्सन, परवेयर, कैरियर, कोंका, केनवुड, आइवा, जापान, लाइफ, क्रॉम्प्टन ग्रीव्ह्ज, टाइमेक्स, ओमेगा, राडो, रोबीस।

रेडीमेड कपड़ेः

स्वदेशीविदेशी
मफतलाल, अरविन्द, वीआईपी, लक्ष, रूपा, ट्रेंड, कैम्ब्रिज, चरागदीन, डबल बुल, जोडियाक, डेनिम, डॉन, प्रोलीन, टीटी, अमूल, वीआईपी, रेमण्ड, पार्क एवन्यू, अल्टिमो, न्यूपोर्ट, किलर, एक्सकेलिबर, फ्लाइंग मशीन, ड्यूक्स, कोलकाता, लुधियाना तथा लघु-कुटीर उद्योग के अन्य स्थानीय उत्पादन।ली, एरो, पीटर इंग्लैंड, फिलिप्स, बर्लिंगटन, लकोस्ट, सेफिस्को, कलरप्लस, व्हेन, हुसेन, लुइ, लेविस, पेपे बीन्स, रैंगलर, बेनेटोन, रेड एण्ड टेलर, एलेनसोली, बॉयफोर्ड।

दवाइयाँ:

स्वदेशीविदेशी
पतंजलि, टोरेन्ट, केडिला, जायडस, साराभाई केमिकल्स, एलम्बिक, रेनबेक्सी।ग्लेक्सो, इन्टरवेट, फाइजर, यूनीकेम, स्मिथलाइन, सेन्डोज, रैलीज, मेरिन्ड।

जूते और पॉलिशः

स्वदेशीविदेशी
लखानी, लिबर्टी, स्टैन्डर्ड, एक्शन, पैरॉगान, फ्लेश, वेलकम, रेक्सोना, रिलैक्सो, लोटस, रेड टॉप, वायकिंग, बिल्ली, कार्नोबा तथा लघु-कुटीर उद्योग के अन्य स्थानीय उत्पादन।बाटा, प्यूमा, पावर, चेरी ब्लॉसम, आदिदास, रोबोक, नाइक, लीकुप, गैसोलीन, वुडलैंड।

कम्प्यूटरः

स्वदेशीविदेशी
एचसीएल, चिराग, अमर पीसी, विप्रो।एचपी, कॉम्पैक, डेल, माइक्रोसॉफ्ट।

दोपहिया एवं चारपहिया वाहनः

स्वदेशीविदेशी
टाटा, महिन्द्रा, हिन्दुस्तान मोटर्स, बजाज, टीवीएस, कायनेटिकमारुति सुजुकी, हुंडइ, फोर्ड, निशान, होंडा, टोयोटा, यामाहा।

Tuesday, January 18, 2011

क्या सन् 1630 में ताज महल के निर्माण आरम्भ होना सम्भव था?


इलियट व डौसन का इतिहास, भाग  7, पृष्ठ 19-25, के अनुसार शाहजहां का शाही इतिहासकार मुल्ला हमीद लाहौरी सन् 1630 का, अर्थात् ताज महल के निर्माण आरम्भ होने वाले वर्ष का विवरण इस प्रकार से देता हैः
"वर्तमान वर्ष में भी सीमान्त प्रदेशों में अभाव रहा खास तौर पर दक्षिण और गुजरात में तो पूर्ण अभाव रहा। दोनों ही प्रदेशों के निवासी नितान्त भुखमरी के शिकार बने। रोटी के टुकड़े के लिए लोग खुद को बेचने के लिए भी तैयार थे किन्तु खरीदने वाला कोई नहीं था। समृद्ध लोग भी भोजन के लिए मारे-मारे फिरते थे। जो हाथ सदा देते रहे थे वे ही आज भोजन की भीख पाने के लिए उठने लगे थे। जिन्होंने कभी घर से बाहर पग भी नहीं रखा था वे आहार के लिए दर-दर भटकने लगे थे। लंबे समय तक कुत्ते का मांस बकरे के मांस के रूप में बेचा जाने लगा था और हड्डियों को पीसकर आटे में मिला कर बेचा जाने लगा था। जब इसकी जानकारी हुई तो बेचने वालों को न्याय के हवाले किया जाने लगा, अन्त में अभाव इस सीमा तक पहुँच गया कि मनुष्य एक-दूसरे का मांस खाने को लालयित रहे लगे और पुत्र के प्यार से अधिक उसका मांस प्रिय हो गया। मरनेवालों की संख्या इतनी अधिक हो गई कि उनके कारण सड़कों पर चलना कठिन हो गया था, और जो चलने-फिरने लायक थे वे भोजन की खोज में दूसरे प्रदेशों और नगरों में भटकते फिरते थे। वह भूमि जो अपने उपजाऊपने के लिए विख्यात थी वहाँ कहीं उपज का चिह्न तक नहीं था...। बादशाह ने अपने अधिकारियों को आज्ञा देकर बुरहानपुर, अहमदाबाद और सूरत के प्रदेशों में निःशुल्क भोजनालयों की व्यवस्था करवाई।"
सीधी सी बात है कि जब बकरे के मांस के नाम पर कुत्ते का मांस औ र आटे के स्थान पर पिसी हड्डियाँ बेची जा रही हों तथा मनुष्य मनुष्य का मांस भक्षण कर रहा हो तो ऐसी स्थिति में बीमारियों का भी भयंकर प्रकोप भी हुआ ही होगा और अनगिनत लोग भूख से मरने के साथ ही साथ बीमारियों से भी मरे होंगे।

उपरोक्त विवरण "वर्तमान वर्ष में भी..." से शुरू होता है इसका स्पष्ट अर्थ है कि शाहजहाँ के शासनकाल में जब-तब अकाल पड़ते ही रहते थे। ऐसे भीषण दुर्भिक्ष की स्थिति में ताज महल का निर्माण करने के लिए मजदूर कहाँ से आ गए? क्या सन् 1630 में ताज महल के निर्माण आरम्भ होना सम्भव था?

Monday, January 17, 2011

अगस्त्य संहिता में विद्युत बैटरी का सूत्र (Formula for Electric battery in Agastya Samhita)

अगस्त्य संहिता में एक सूत्र हैः

संस्थाप्य मृण्मये पात्रे ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌।
छादयेच्छिखिग्रीवेन चार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥
दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:।
संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्‌॥


अर्थात् एक मिट्टी का बर्तन लें, उसमें अच्छी प्रकार से साफ किया गया ताम्रपत्र और शिखिग्रीवा (मोर के गर्दन जैसा पदार्थ अर्थात् कॉपरसल्फेट) डालें। फिर उस बर्तन को लकड़ी के गीले बुरादे से भर दें। उसके बाद लकड़ी के गीले बुरादे के ऊपर पारा से आच्छादित दस्त लोष्ट (mercury-amalgamated zinc sheet) रखे। इस प्रकार दोनों के संयोग से अर्थात् तारों के द्वारा जोड़ने पर मित्रावरुणशक्ति की उत्पत्ति होगी।

यहाँ पर उल्लेखनीय है कि यह प्रयोग करके भी देखा गया है जिसके परिणामस्वरूप 1.138 वोल्ट तथा 23 mA धारा वाली विद्युत उत्पन्न हुई। स्वदेशी विज्ञान संशोधन संस्था (नागपुर) के द्वारा उसके चौथे वार्षिक सभा में ७ अगस्त, १९९० को इस प्रयोग का प्रदर्शन भी विद्वानों तथा सर्वसाधारण के समक्ष किया गया।

अगस्त्य संहिता में आगे लिखा हैः

अनेन जलभंगोस्ति प्राणो दानेषु वायुषु।
एवं शतानां कुंभानांसंयोगकार्यकृत्स्मृत:॥


अर्थात सौ कुम्भों (अर्थात् उपरोक्त प्रकार से बने तथा श्रृंखला में जोड़े ग! सौ सेलों) की शक्ति का पानी में प्रयोग करने पर पानी अपना रूप बदल कर प्राण वायु (ऑक्सीजन) और उदान वायु (हाइड्रोजन) में परिवर्तित हो जाएगा।

फिर लिखा गया हैः

वायुबन्धकवस्त्रेण निबद्धो यानमस्तके उदान स्वलघुत्वे बिभर्त्याकाशयानकम्‌।

अर्थात् उदान वायु (हाइड्रोजन) को बन्धक वस्त्र (air tight cloth) द्वारा निबद्ध किया जाए तो वह विमान विद्या (aerodynamics) के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है।

स्पष्ट है कि यह आज के विद्युत बैटरी का सूत्र (Formula for Electric battery) ही है। साथ ही यह प्राचीन भारत में विमान विद्या होने की भी पुष्टि करता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि हमारे प्राचीन ग्रन्थों में बहुत सारे वैज्ञानिक प्रयोगों के वर्णन हैं, आवश्यकता है तो उन पर शोध करने की। किन्तु विडम्बना यह है कि हमारी शिक्षा ने हमारे प्राचीन ग्रन्थों पर हमारे विश्वास को ही समाप्त कर दिया है।

Sunday, January 16, 2011

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 13 (Hindi Proverbs)

प्रस्तुत हैं हिन्दी की कुछ लोकोक्तियाँ तथा मुहावरे और उनके अर्थ। उनके अर्थ मैंने अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार बनाए हैं और उनमें त्रुटि की सम्भावना है अतः यदि आपको त्रुटियाँ नजर आएँ तो कृपया टिप्पणी करके सही अर्थ बताने का कष्ट करें।

चक्की में कौर डालोगे तो चून पाओगे

अर्थः कुछ पाने के लिए कुछ लगाना ही पड़ता है।

चट मँगनी पट ब्याह

अर्थः त्वरित गति से कार्य होना।

चढ़ जा बेटा सूली पर, भगवान भला करेंगे

अर्थः बिना सोचे विचारे खतरा मोल लेना।

चने के साथ कहीं घुन न पिस जाए

अर्थः दोषी के साथ कहीं निर्दोष न मारा जाए।

चमगादड़ों के घर मेहमान आए, हम भी लटके तुम भी लटको

अर्थः गरीब आदमी क्या आवभगत करेगा।

चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए

अर्थः महा कंजूस।

चमार चमड़े का यार

अर्थः स्वार्थी व्यक्ति।

चरसी यार किसके दम लगाया खिसके

अर्थः स्वार्थी व्यक्ति स्वार्थ सिद्ध होते ही मुँह फेर लेता है।

चलती का नाम गाड़ी

अर्थः कार्य चलते रहना चाहिए।

चाँद को भी ग्रहण लगता है

अर्थः भले आदमी की भी बदनामी हो जाती है।

चाकरी में न करी क्या?

अर्थः नौकरी में मालिक की आज्ञा अवहेलना नहीं की जा सकती।

चार दिन की चाँदनी फिर अँधियारी रात

अर्थः सुख थोड़े ही दिन का होता है।

चिकना मुँह पेट खाली

अर्थः देखने में अच्छा-भला भीतर से दु:खी।

चिकने घड़े पर पानी नहीं ठहरता

अर्थः लिर्लज्ज़ आदमी पर किसी बात का असर नहीं पड़ता।

चिकने मुँह को सब चूमते हैं

अर्थः समृद्ध व्यक्ति के सभी यार होते हैं।

चिडिया की जान गई, खाने वाले को मजा न आया

अर्थः भारी काम करने पर भी सराहना न मिलना।

चित भी मेरी पट भी मेरी अंटी मेरे बाबा का

अर्थः हर हालत में अपना ही लाभ देखना।

चिराग तले अँधेरा

अर्थः पास की चीज़ दिखाई न पड़ना।

चिराग में बत्ती और आँख में पट्टी

अर्थः शाम होते ही सोने लगना।

Saturday, January 15, 2011

भलाई इसी में है कि हम अपने ज्ञान के लिए विदेशियों पर ही आश्रित रहें

जब मैक्समूलर या कनिंघम जैसे विदेशी विद्वान कहते या लिखते हैं:
"आर्य इण्डो-यूरोपियन बोली बोलने वाले, घुड़सवारी करने वाले तथा यूरेशिया के सूखे घास के मैदान में रहने वाले खानाबदोश थे जिन्होंने ई.पू. 1700 में भारत की सिन्धु घाटी की नगरीय सभ्यता पर आक्रमण कर के उसका विनाश कर डाला और इन्हीं आर्य के वंशजों ने उनके आक्रमण से लगभग 1200 वर्ष बाद आर्य या वैदिक सभ्यता की नींव रखी और वेदों की रचना की।" 
 तो हम उनके कथन को ब्रह्मवाक्य समझ लेते हैं, हमें लगता है कि उनके कथन पत्थर की लकीर हैं। हम उनके कहे हुए को ऐसा सत्य मान लेते हैं मानो उन पाश्चात्य विद्वानों ने आर्यों को भारत में आते और सिंधु घाटी की नगरीय सभ्यता पर आक्रमण करके नष्ट करते हुए स्वयं अपनी आँखों से देखा था। हमें पता है कि खानाबदोश जाति असभ्य नहीं तो अर्धसभ्य ही होती है पूर्णतः सभ्य नहीं, फिर भी हम प्रश्न नहीं करते कि उस असभ्य जाति ने सिंधु घाटी सभ्यता के अत्यन्त सभ्य जाति का खात्मा कैसे कर डाला? उसके बाद वे  1200 वर्षों तक कहाँ गायब हो गए? उन  1200 वर्षों में ऐसा क्या हुआ कि इण्डो-यूरोपियन बोली बोलने वाले पूर्णतः शुद्ध तथा वैज्ञानिक भाषा संस्कृत बोलने तथा वेदों की रचना करने में समर्थ हो गए? हम थोड़ी देर के लिए भी नहीं सोचते कि इस बात के सैकड़ों पुरातात्विक प्रमाण हैं कि सिन्धु घाटी के के लोग बहुत अधिक सभ्य और समृद्ध थे जबकि इन तथाकथित घुड़सवार खानाबदोश आर्य जाति के विषय में कहीं कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

दूसरी ओर जब अयोध्या, मिथिला या विशाला नगरी के विषय में जब वाल्मीकि लिखते हैं:
"वहाँ की बड़ी बड़ी दुकानें, अमूल्य आभूषणों को धारण किये हुये स्त्री-पुरुष आदि नगर की सम्पन्नता का परिचय दे रहे थे। चौड़ी-चौड़ी और साफ सुथरी सड़कों को देख कर ज्ञात होता था कि नगर के रख-रखाव और व्यवस्था बहुत ही सुन्दर और प्रशंसनीय थी।" 
 तो हम उनके कथन को कवि की कल्पना मान लेते हैं। हमें अयोध्या, मिथिला या विशाला नगरी के अस्तित्व के विषय में विश्वास नहीं हो पाता। हम जरा भी नहीं सोचते कि यह इतिहास का एक अंश है। हमें नहीं लगता कि वाल्मीकि ने चौड़ी-चौड़ी, साफ-सुथरी सड़कें, बड़ी-बड़ी दूकानें, बहुमूल्य आभूषण धारण करने वाले स्त्री-पुरुषों को स्वयं देखा था। वाल्मीकि रामायण काल की जिस सभ्यता का वर्णन करते हैं उसे देखे बिना उसकी कल्पना नहीं की जा सकती।

कहा गया है "घर के जोगी जोगड़ा, आन गाँव के सिद्ध"। वाल्मीकि, वेदव्यास, कालिदास आदि हमारे लिए घर के जोगी हैं इसलिए हमारी नजरों में वे मात्र जोगड़ा हैं जबकि मैक्समूलर, कनिंघम आदि आन गाँव से आए जोगी हैं इसलिए वे सिद्ध हैं। आखिर जोगड़ा जोगड़ा होता है और सिद्ध सिद्ध! जोगड़ा सत्य का बखान करे तो भी वह कपोल-कल्पना है और सिद्ध की कल्पना भी सत्य!

हमारे देश की शिक्षा नीति हमारे भीतर विदेशी ज्ञान विज्ञान के प्रति आसक्ति और हमारे पूर्वजों के ज्ञान, हमारी स्वयं की भाषा, ग्रंथ, सभ्यता, संस्कृति के प्रति विरक्ति देती है। बहुत बड़ी विडम्बना है यह हमारे लिए।

हम अपने ग्रंथों को तो पढ़ना ही नहीं चाहते। और चाहें भी तो पढ़ें कैसे? उसके लिए तो संस्कृत का ज्ञान होना आवश्यक है। अब ग्रंथों को पढ़ने के लिए भला संस्कृत कौन सीखे? यदि संस्कृत सीखकर ग्रंथों को पढ़ भी लें तो भी क्या होगा? आप यदि उसमें निहित ज्ञान को किसी को देना चाहेंगे तो वह लेने से ही इंकार कर देगा। इसलिए भलाई इसी में है कि हम अपने ज्ञान के लिए विदेशियों पर ही आश्रित रहें।

Friday, January 14, 2011

महाभारत युद्ध के पश्चात् इन्द्रप्रस्थ के राजाओं की वंशावली

महाभारत युद्ध के पश्चात् राजा युधिष्ठिर की 30 पीढ़ियों ने 1770 वर्ष 11 माह 10 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा हैः

क्र.शासक का नामवर्षमाहदिन
1राजा युधिष्ठिर (Raja Yudhisthir)36825
2राजा परीक्षित (Raja Parikshit)6000
3राजा जनमेजय (Raja Janmejay)84723
4अश्वमेध (Ashwamedh )82822
5द्वैतीयरम (Dwateeyram )8828
6क्षत्रमाल (Kshatramal)811127
7चित्ररथ (Chitrarath)75318
8दुष्टशैल्य (Dushtashailya)751024
9राजा उग्रसेन (Raja Ugrasain)78721
10राजा शूरसेन (Raja Shoorsain)78721
11भुवनपति (Bhuwanpati)6955
12रणजीत (Ranjeet)65104
13श्रक्षक (Shrakshak)6474
14सुखदेव (Sukhdev)62024
15नरहरिदेव (Narharidev)51102
16शुचिरथ (Suchirath)42112
17शूरसेन द्वितीय (Shoorsain II)58108
18पर्वतसेन (Parvatsain )55810
19मेधावी (Medhawi)521010
20सोनचीर (Soncheer)50821
21भीमदेव (Bheemdev)47920
22नरहिरदेव द्वितीय (Nraharidev II)451123
23पूरनमाल (Pooranmal)4487
24कर्दवी (Kardavi)44108
25अलामामिक (Alamamik)50118
26उदयपाल (Udaipal)3890
27दुवानमल (Duwanmal)401026
28दामात (Damaat)3200
29भीमपाल (Bheempal)5858
30क्षेमक (Kshemak)481121

क्षेमक के प्रधानमन्त्री विश्व ने क्षेमक का वध करके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 14 पीढ़ियों ने 500 वर्ष 3 माह 17 दिन तक राज्य किया जिसका विरवरण नीचे दिया जा रहा है:

क्र.शासक का नामवर्षमाहदिन
1विश्व (Vishwa)17329
2पुरसेनी (Purseni)42821
3वीरसेनी (Veerseni)52107
4अंगशायी (Anangshayi)47823
5हरिजित (Harijit)35917
6परमसेनी (Paramseni)44223
7सुखपाताल (Sukhpatal)30221
8काद्रुत (Kadrut)42924
9सज्ज (Sajj)32214
10आम्रचूड़ (Amarchud)27316
11अमिपाल (Amipal)221125
12दशरथ (Dashrath)25412
13वीरसाल (Veersaal)31811
14वीरसालसेन (Veersaalsen)47014

वीरसालसेन के प्रधानमन्त्री वीरमाह ने वीरसालसेन का वध करके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 16 पीढ़ियों ने 445 वर्ष 5 माह 3 दिन तक राज्य किया जिसका विरवरण नीचे दिया जा रहा है:

क्र.शासक का नामवर्षमाहदिन
1राजा वीरमाह (Raja Veermaha)35108
2अजितसिंह (Ajitsingh)27719
3सर्वदत्त (Sarvadatta)28310
4भुवनपति (Bhuwanpati)15410
5वीरसेन (Veersen)21213
6महिपाल (Mahipal)4087
7शत्रुशाल (Shatrushaal)2643
8संघराज (Sanghraj)17210
9तेजपाल (Tejpal)281110
10मानिकचंद (Manikchand)37721
11कामसेनी (Kamseni)42510
12शत्रुमर्दन (Shatrumardan)81113
13जीवनलोक (Jeevanlok)28917
14हरिराव (Harirao)261029
15वीरसेन द्वितीय (Veersen II)35220
16आदित्यकेतु (Adityaketu)231113

प्रयाग के राजा धनधर ने आदित्यकेतु का वध करके उसके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 9 पीढ़ी ने 374 वर्ष 11 माह 26 दिन तक राज्य किया जिसका विरवरण नीचे दिया जा रहा है:


क्र.शासक का नामवर्षमाहदिन
1राजा धनधर (Raja Dhandhar)231113
2महर्षि (Maharshi)41229
3संरछि (Sanrachhi)501019
4महायुध (Mahayudha)3038
5दुर्नाथ (Durnath)28525
6जीवनराज (Jeevanraj)4525
7रुद्रसेन (Rudrasen)47428
8आरिलक (Aarilak)52108
9राजपाल (Rajpal)3600

सामन्त महानपाल ने राजपाल का वध करके 14 वर्ष तक राज्य किया। अवन्तिका (वर्तमान उज्जैन) के विक्रमादित्य ने महानपाल का वध करके 93 वर्ष तक राज्य किया। विक्रमादित्य का वध समुद्रपाल ने किया और उसकी 16 पीढ़ियों ने 372 वर्ष 4 माह 27 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है:

क्र.शासक का नामवर्षमाहदिन
1समुद्रपाल (Samudrapal)54220
2चन्द्रपाल (Chandrapal)3654
3सहपाल (Sahaypal)11411
4देवपाल (Devpal)27128
5नरसिंहपाल (Narsighpal)18020
6सामपाल (Sampal)27117
7रघुपाल (Raghupal)22325
8गोविन्दपाल (Govindpal)27117
9अमृतपाल (Amratpal)361013
10बालिपाल (Balipal)12527
11महिपाल (Mahipal)1384
12हरिपाल (Haripal)1484
13सीसपाल (Seespal)111013
14मदनपाल (Madanpal)171019
15कर्मपाल (Karmpal)1622
16विक्रमपाल (Vikrampal)241113

टीपः कुछ ग्रंथों में सीसपाल के स्थान पर भीमपाल का उल्लेख मिलता है, सम्भव है कि उसके दो नाम रहे हों।

विक्रमपाल ने पश्चिम में स्थित राजा मालकचन्द बोहरा के राज्य पर आक्रमण कर दिया जिसमे मालकचन्द बोहरा की विजय हुई और विक्रमपाल मारा गया। मालकचन्द बोहरा की 10 पीढ़ियों ने 191 वर्ष 1 माह 16 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है:

क्र.शासक का नामवर्षमाहदिन
1मालकचन्द (Malukhchand)54210
2विक्रमचन्द (Vikramchand)12712
3मानकचन्द (Manakchand)1005
4रामचन्द (Ramchand)13118
5हरिचंद (Harichand)14924
6कल्याणचन्द (Kalyanchand)1054
7भीमचन्द (Bhimchand)1629
8लोवचन्द (Lovchand)26322
9गोविन्दचन्द (Govindchand)31712
10रानी पद्मावती (Rani Padmavati)100

रानी पद्मावती गोविन्दचन्द की पत्नी थीं। कोई सन्तान न होने के कारण पद्मावती ने हरिप्रेम वैरागी को सिंहासनारूढ़ किया जिसकी पीढ़ियों ने 50 वर्ष 0 माह 12 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है:

क्र.शासक का नामवर्षमाहदिन
1हरिप्रेम (Hariprem)7516
2गोविन्दप्रेम (Govindprem)20 28
3गोपालप्रेम (Gopalprem)15728
4महाबाहु (Mahabahu)6829

महाबाहु ने सन्यास ले लिए। इस पर बंगाल के अधिसेन ने उसके राज्य पर आक्रमण कर अधिकार जमा लिया। अधिसेन की 12 पीढ़ियों ने 152 वर्ष 11 माह 2 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है:

क्र.शासक का नामवर्षमाहदिन
1अधिसेन (Adhisen)18521
2विल्वसेन (Vilavalsen)1242
3केशवसेन (Keshavsen)15712
4माधवसेन (Madhavsen)1242
5मयूरसेन (Mayursen)201127
6भीमसेन (Bhimsen)5109
7कल्याणसेन (Kalyansen)4821
8हरिसेन (Harisen)12025
9क्षेमसेन (Kshemsen)81115
10नारायणसेन (Narayansen)2229
11लक्ष्मीसेन (Lakshmisen)26100
12दामोदरसेन (Damodarsen)11519

दामोदरसेन ने उमराव दीपसिंह को प्रताड़ित किया तो दीपसिंह ने सेना की सहायता से दामोदरसेन का वध करके राज्य पर अधिकार कर लिया तथा उसकी 6 पीढ़ियों ने 107 वर्ष 6 माह 22 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है:

क्र.शासक का नामवर्षमाहदिन
1दीपसिंह (Deepsingh)17126
2राजसिंह (Rajsingh)1450
3रणसिंह (Ransingh)9811
4नरसिंह (Narsingh)45015
5हरिसिंह (Harisingh)13229
6जीवनसिंह (Jeevansingh)801

पृथ्वीराज चौहान ने जीवनसिंह पर आक्रमण करके तथा उसका वध करके राज्य पर अधिकार प्राप्त कर लिया। पृथ्वीराज चौहान की 5 पीढ़ियों ने 86 वर्ष 0 माह 20 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है:

क्र.शासक का नामवर्षमाहदिन
1पृथ्वीराज (Prathviraj)12219
2अभयपाल (Abhayapal)14517
3दुर्जनपाल (Durjanpal)11414
4उदयपाल (Udayapal)1173
5यशपाल (Yashpal)36427

विक्रम संवत 1249 (1193 AD) में मोहम्मद गोरी ने यशपाल पर आक्रमण कर उसे प्रयाग के कारागार में डाल दिया और उसके राज्य को अधिकार में ले लिया।

उपरोक्त जानकारी http://www.hindunet.org/ से साभार ली गई है जहाँ पर इस जानकारी का स्रोत स्वामी दयानन्द सरस्वती के सत्यार्थ प्रकाश ग्रंथ, चित्तौड़गढ़ राजस्थान से प्रकाशित पत्रिका हरिशचन्द्रिका और मोहनचन्द्रिका के विक्रम संवत1939 के अंक और कुछ अन्य संस्कृत ग्रंथों को बताया गया है।

Thursday, January 13, 2011

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 12 (Hindi Proverbs)

प्रस्तुत हैं हिन्दी की कुछ लोकोक्तियाँ तथा मुहावरे और उनके अर्थ। उनके अर्थ मैंने अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार बनाए हैं और उनमें त्रुटि की सम्भावना है अतः यदि आपको त्रुटियाँ नजर आएँ तो कृपया टिप्पणी करके सही अर्थ बताने का कष्ट करें।

गूदड़ में लाल नहीं छिपता

अर्थः गुण स्वयं ही झलकता है।

गेहूँ के साथ घुन भी पिसता है

अर्थः दोषी के साथ निदोर्ष भी मारा जाता है।

गोद में बैठकर आँख में उँगली करना/ गोदी में बैठकर दाढ़ी नोचना

अर्थः भलाई के बदले बुराई करना।

गोद में लड़का, शहर में ढिंढोरा

अर्थः पास की वस्तु नजर न आना।

घड़ी भर में घर जले, अढ़ाई घड़ी भद्रा

अर्थः समय पहचान कर ही कार्य करना चाहिए।

घड़ी में तोला, घड़ी में माशा

अर्थः चंचल विचारों वाला।

घर आए कुत्ते को भी नहीं निकालते

अर्थः घर में आने वाले को मान देना चाहिए।

घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध

अर्थः अपने ही घर में अपनी कीमत नहीं होती।

घर का भेदी लंका ढाए

अर्थः आपसी फूट का परिणाम बुरा होता है।

घर की मुर्गी दाल बराबर

अर्थः अपनी चीज़ या अपने आदमी की कदर नहीं।

घर खीर तो बाहर खीर

अर्थः समृद्धि सम्मान प्रदान करती है।

घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने

अर्थः कुछ न होने पर भी होने का दिखावा करना।

घायल की गति घायल जाने

अर्थः कष्ट भोगने वाला ही वही दूसरों के कष्ट को समझ सकता है।

घी गिरी खिचड़ी में

अर्थः लापरवाही के बावजूद भी वस्तु का सदुपयोग होना।

घी सँवारे काम बड़ी बहू का नाम

अर्थः साधन पर्याप्त हों तो काम करने वाले को यश भी मिलता है।

घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खाएगा क्या?

अर्थः व्यापार में रियायत नहीं की जाती।

घोड़े की दुम बढ़ेगी तो अपने ही मक्खियाँ उड़ाएगा

अर्थः उन्नति करके आदमी अपना ही भला करता है।

घोड़े को लात, आदमी को बात

अर्थः सामने वाले का स्वभाव पहचान कर उचित व्यहार करना।

Wednesday, January 12, 2011

ताजमहल किंवदन्ती पर एक पुरातात्विक दृष्टि

प्रोफेसर मार्विन एच. मिल्स (Professor Marvin H. Mills) के लेख "AN ARCHITECT LOOKS AT THE TAJ MAHAL LEGEND" (ताजमहल किंवदन्ती पर एक पुरातात्विक दृष्टि) के संक्षिप्तीकरण के साथ हिन्दी भावानुवाद

लेखकः प्रोफेसर मार्विन एच. मिल्स (Professor Marvin H. Mills), प्रैट इंस्टीट्यूट, न्यूयार्क (Pratt Institute, New York)


(मूल अंग्रेजी लेख यहाँ पढ़ें।)

अपनी पुस्तक TAJ MAHAL-THE ILLUMINED TOMB (ताजमहल - एक दिव्य मकबरा) में वेन एडीसन बेग्ले और जियाउद्दीन अहमद देसाई (Wayne Edison Begley and Ziyaud-Din Ahmad Desai) ने समकालीन स्रोतों से प्राप्त और कई चित्रों, ऐतिहासिक विवरणों, शाही पत्रों आदि से संवर्धित की गई सराहनीय जानकारी दिया है। विद्वानों तथा ताजमहल के उद्गम, विकास तथा उसके आसपास के हालात के विषय में उत्सुकता रखने वाले जनसाधारण के लिए यह उनकी बहुमूल्य सेवा है।

किन्तु उनका यह सकारात्मक योगदान विश्लेषण और व्याख्या की एक ऐसी रूपरेखा के अन्तर्गत है जो ज्ञानोदय के सम्भाव्य स्रोत को विकृत करता है और ऐसी गलत सूचना एवं कपोल कल्पना को प्रोत्साहित करता है जो इस विषय में सैकड़ों वर्षों में प्राप्त पाण्डित्यपूर्ण जानकारी को हानि पहुँचाता है, अतः उनके द्वारा प्रदत्त सूचना ताजमहल के मूल स्रोत की सत्यता को दुरूह बनाती है। कालांकित शिलालेखों को विशुद्ध मानना और शाही इतिहास लेखन को वास्तविक इतिहासकारों का कथन समझना उनके द्वारा की गई दो प्रक्रियात्मक त्रुटियाँ हैं।

एक वास्तुविद के रूप में मेरा लेखकों से मुख्य तर्क है कि उन्होंने अत्यन्त संक्षिप्त समय-सीमा को सहजता से स्वीकार लिया है, वे मानते हैं कि मुमताज़ के पहले उर्स (वर्षगाँठ) तक ताजमहल का ढाँचा अस्तित्व में आ चुका था और उसके मुख्य भवन का निर्माण हो चुका था। निर्माण प्रक्रिया, जिसमें कि पर्याप्त समय लगता है, को कुछ ही महीनों में समेट दिया गया है। वे उपलब्ध तथ्यों पर निर्भर होने को न्यायसंगत समझते हैं, किन्तु निर्माण की वस्तुनिष्ठ आवश्यकताओं पर गौर करने में असफल रह जाते हैं। वे कहते हैं कि ताज के निर्माण से सम्बन्धित सभी पहलुओं पर लाखों शाही अभिलेख तथा दस्तावेज प्रतिवर्ष अवश्य बने होंगे, जिनके प्राप्त न हो पाने पर उन्हें अफसोस है। वे यह नहीं मानते कि उन अभिलेखों, दस्तावेजों आदि की अनुपल्बधता इसलिए है क्योंकि उन्हें बनाया ही नहीं गया था। न ही वे यह विचार करते हैं कि ताजमहल को किसी और ने कभी और बनवाया था तथा शाहजहां ने इस विषय में कपट किया था। बावजूद इन बातों के वे तो यही दर्शाते हैं कि शाहजहां शाही अभिलेखों पर सावधानीपूर्क निगरानी रखता था।

"ऐतिहासिक सच्चाई को तोड़ने-मरोड़ने के लिए शायद शाहजहां खुद ही जिम्मेदार था। सच्चाई शाहजहां को अयोग्य करार दे सकती थी और यह बात शाहजहां को सहन नहीं थी। इसी कारण से इतिहास में ऐसा कोई भी बयान नजर नहीं आता जो बादशाह या उसकी नीतियों की आलोचना करे, यहाँ तक कि उसकी सेना की हार को भी युक्तिसंगत बना दिया गया ताकि बादशाह पर किसी प्रकार का दोषारोपण न हो सके। ... बादशाह की असंयत प्रशंसा की ऐसी पराकाष्ठा की गई है कि प्रतीत होने लगता है वह सामान्य मनुष्य होने की अपेक्षा देवता था।" (p. xxvi)

शाही इतिहासकारों द्वारा सावधानीपूर्वक इतिहास के संपादन और दस्तावेजों के महान कमी के बाद भी सौभाग्य से हमें बादशाह के द्वारा उसके आसपास के क्षेत्र में स्थित अम्बेर के शासक राजा जय सिंह, जिससे कि बादशाह ने ताज की सम्पत्ति का अधिग्रहण किया था, को जारी किए गए चार फर्मान मिल जाते हैं। इन फर्मानों, शाही इतिहासकारों और एक यूरोपीय यात्री के सैर पर आने के आधार पर हमें ज्ञात होता है किः (i) 17 जून 1631 को मुमताज़ की मृत्यु हुई और उसे बुरहानपुर में अस्थाई रूप से दफनाया गया; (ii) उसके शव को खोदकर निकाला गया तथा 11 दिसम्बर 1631 को आगरा ले जाया गया; (iii) 8 जनवरी 1632 को उसे ताज के मैदान में कहीं पर पुनः दफनाया गया; और (iv) यूरोपीय यात्री पीटर मुंडी (Peter Mundy) के द्वारा 11 जून 1632 को शाहजहां के अपने काफिले के साथ आगरा वापसी को देखा गया।

पहला फरमान 20 सितंबर 1632 को जारी किया गया जिसमें बादशाह ने राजा जयसिंह पर दबाव डाला था कि वह कब्रगाह अर्थात् ताज के मुख्य भवन की आन्तरिक दीवारों के पलस्तर के लिए संगमरमर का लदान जल्दी करे। स्वाभाविक है कि वहाँ पर एक भवन पहले से ही था जिसे कि परिष्कृत किया जाना था। आखिर इसमें कितना समय लगना था?

प्रत्येक सफल भवन निर्माण को एक "सूक्ष्म मार्ग" से गुजरना पड़ता है। निर्माण की प्रक्रिया आरम्भ करने के पहले के सामान्य सोपान होते हैं जिनके लिए न्यूनतम समय की आवश्यकता होती है। चूँकि मुमताज़ (जो कि पिछले तेरह बच्चों को जन्म देते समय हर बार बच गई थी) की मृत्यु अपेक्षाकृत युवावस्था में हो गई थी हम मान सकते हैं कि शाहजहां उसके आकस्मिक निधन के लिए तैयार नहीं था। इस आघात के दौरान उसे मुमताज़ को समर्पित करने के लिए उसे एक विश्व स्तर कब्रगाह बनाने का निश्चय करना पड़ा होगा, एक वास्तुकार (जिसके होने या न होने पर अभी भी सन्देह है) चयनित करना पड़ा होगा, वास्तुकार के साथ मिलकर भवन के बनावट का निश्चय करना पड़ा होगा, नक्शानवीसों को तैयार करना पड़ा होगा, भवन की यांत्रिक संरचना के लिए इंजीनियर खोजना पड़ा होगा, नक्शों की जाँच करनी पड़ी होगी, हजारों मजदूरों और ठेकेदारों को खोजने की व्यवस्था करनी पड़ी होगी, एक जटिल कार्यक्रम बनाना पड़ा होगा। यह रहस्यमय है कि इतने विस्तृत प्रक्रिया से सम्बन्धित कोई भी दस्तावेज बच ही नहीं पाया, सिवा चार फर्मानों के।

हम नहीं मान सकते कि ताज परिसर को इमारतों तथा भूनिर्माणों के बाद अतिरिक्त रूप से बनवाया गया था, क्योंकि परिसर एक आवश्यकता थी। उसे एकीकृत रूप से ही डिजाइन किया गया था। यह बात बेग्ले और देसाई के ग्रिड प्रणाली के इस विश्लेषण से, कि क्षैतिज तथा ऊर्ध्व रूप से त्रिआयामी बनाने हेतु पूरे काम्प्लेक्स को एक डिजाइनर के द्वारा नियोजित किया गया था, स्पष्ट है। यदि किसी को यह पता न हो कि ताज मात्र एक औपचारिक कब्रगाह है तो वह यही विश्वास करेगा कि ताज को एक ऐसे महल के रूप में डिजाइन किया गया था जिसमें आनन्ददायक हवा आने और रमणीय जलमार्गों तथा मनमोहक वाटिका का प्रावधान हो। हो सकता है कि ताज राजा जय सिंह का ही महल हो, जिसे कभी भी नष्ट नहीं किया गया, और शाही आदेश से उसमे मुगल कब्र बना दिया गया। क्या यह नहीं हो सकता?

यह मानते हुए कि शाहजहाँ अपनी दिवंगत प्रियतमा का ध्यान रखते हुए परियोजना के आरम्भ के लिए तत्पर कार्यवाही करने के लिए उत्तेजित था, आसानी के साथ अनुमान लगाया जा सकता है कि उसके अवधारणा से लेकर अवधारणा को कार्यरूप में परिणिति तक कम से कम एक साल के समय की जरूरत तो थी ही। क्योंकि मुमताज़ की मृत्यु जून 1631 में हुई थी, कार्य का आरम्भ जून 1632 में होना था। किन्तु बताया जाता है कि निर्माण कार्य जनवरी 1632 में आरम्भ हो गया था।

खुदाई एक अत्यन्त दुर्जेय अथवा साहस तोड़ने वाला कार्य सिद्ध हुआ होगा। पहले राजा जय सिंह के महल को तोड़कर गिराना आवश्यक था। मिर्जा गज़िनी (Mirza Qazini) और अब्द-अल-हमीद लाहोरी (Abd al-Hamid Lahori) के इतिहास से हमें पता है कि उस सम्पत्ति के अन्तर्गत वहाँ पर एक महल का अस्तित्व था। लाहोरी लिखते हैं:

"वृहत नगर के दक्षिण दिशा में प्रतिष्ठायुक्त तथा सुखदाई मैदानी क्षेत्र था जिस पर राजा मान सिंह की हवेली थी तथा उस हवेली पर अब उनके पोते जय सिंह का अधिकार है। उसी स्थान का चयन जन्नतनशीन [मुमताज] की अन्त्येष्टि के लिए किया गया था।" (पृष्ठ 43)

मुख्य तथा सहायक भवनों की खुदाई के दौरान खुदाई का यमुना नदी से उत्तर दिशा की ओर दूरी के नाप-जोख के विषय में भी ध्यान रखा गया होगा ताकि खुदाई यमुना में बाढ़ आने पर बह ना जाएँ। अगले चरण रहे होंगे - बड़े पैमाने पर नींव बांधना, आधार रखना, ताज और उसके पूरब तथा पश्चिम के भवनों के लिए चबूतरे, दीवारें, मंच इत्यादि बनाना साथ ही कुएँ वाली इमारत, चारों किनारों की मीनारों, तहखानों के कमरों के लिए नींव बनाना। यदि यह मानें कि ताज परिसर में स्थित सारी इमारतें एक साथ एक ही समय में बनीं, तो सारे परिसर में खुदाई से निकली मिट्टी पत्थरों और भवन निर्माण सामग्री बिखरा पड़ा रहा होगा। इस आकलन के अनुसार भवन निर्माण आरम्भ होने के लिए कम से कम एक और वर्ष की आवश्यकता थी अर्थात इमारतें बनना जनवरी 1634 में शुरू होना था।

और यहीं पर समस्या उत्पन्न हो जाती है। मुमताज़ की मृत्यु के सालगिरह पर शाहजहां प्रतिवर्ष ताज में उर्स का आयोजन करता था। पहले उर्स का आयोजन 22 जून 1632 को हुआ। यद्यपि निर्माण कार्य कथित रूप से सिर्फ छः माह पहले ही आरम्भ हुआ था, 374 गज लंबा, 140 गज चौड़ा और 14 गज ऊँचा लाल पत्थर के चबूतरा बन कर तैयार हो चुका था! यहाँ तक कि इस बात पर बेग्ले और देसाई भी किंचित विस्मित हैं।

गिराए गई हवेली का मलबा, निर्माण सामग्री, संगमरमर की शिलाएँ, ईंटों के ढेर, हजारों मजदूरों के अस्थाई निवास व्यवस्था, सामान ढोने वाले असंख्य जानवर कहाँ थे?

किन्तु जून 1632 तक भौतिक रूप से यह किसी भी प्रकार से सम्भव ही नहीं था कि खुदाई, आधार, नींव बनाने के कार्य पूर्ण हो जाएँ, समस्त भवन निर्माण सामग्री हटा कर मलबा तक साफ कर दिया जाए और उर्स के भव्य आयोजन की तैयारी भी हो जाए। भवन निर्माण प्रक्रिया के परिसाक्ष्य के लिए बेग्ले और देसाई की दृष्टि में यूरोपियन यात्री का शाहजहां के दरबार में होना कम उपयोगी है। किन्तु ताज के स्रोत के लिए उनकी दृष्टि में पीटर मुंडी, जो कि ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनियों का एक एजेंट था, का अत्यन्त महत्व है क्योंकि वह पहले उर्स में उपस्थित था और एक साल बाद दूसरे उर्स में भी उपस्थित हो गया था।

यह पीटर मुंडी ही था जिसने 26 मई 1633 को दूसरे उर्स के दौरान कहा था कि उसने मुमताज़ के कब्र के चारों ओर स्वर्णजटित रेलिंग के अधिष्ठापन को देखा था। लेकिन ऐसा कोई तरीका नहीं था कि जनवरी 1632 से मई 1633 के बीच इतनी तेजी के साथ निर्माण कार्य हो जाए कि सम्पूर्ण निर्माण होकर रेलिं लगाया जा सके। रेलिंग हवा में तो खड़ी नहीं हो सकती थी। इसका अर्थ है कि ताज की इमारत पहले से ही वहाँ थी। और निश्चय ही वह भवन अत्यन्त मूल्यवान थी क्योंकि ताज परिसर का मूल्य पचास लाख रुपए बताया गया था जबकि सोने की रेलिंग की कीमत छः लाख रुपए थी। 6 फरवरी 1643 को शाहजहां के द्वारा सोने की रेलिंग को हटा दिया गया और उसके स्थान पर संगमरमर की जाली लगा दिया गया जो कि आज भी देखी जा सकती है।

जहाँ तक शाहजहां के द्वारा ताज के अंदरूनी अलंकरण का सवाल है, उसे कौन से परिवर्तन करने पड़े होंगे? परिवर्तन के लिए कुछ आवश्यक कार्यों में से एक कार्य भवन के अभिलेखों, शिलालेखों को बदलना अवश्य ही रहा होगा। भवन के सजावट में सांकेतिक रूप से स्थित जो हिन्दुत्व के सन्दर्भ रहे होंगे उन्हें भी उसे हटाना पड़ा होगा।

पुस्तक में दर्शाए गए उदाहरणों दर्शाते हैं कि प्रायः अभिलेख आयताकार फ्रेम में हैं जिन्हें कि, भवन के उन हिस्सों को जिनमें वे लगे हुए हैं बगैर किसी प्रकार के नुकसान पहुँचाए, आसानी के साथ निकाला परिवर्ति किया तथा पुनः लगाया जा सकता है। मेरे विवेक के अनुसार सफेद संगमरमर की पृष्ठभूमि के बीच मटमैले संगमरमर के घेरे में काली लिखावट भवन के सौन्दर्य के लिए अनुपयुक्त हैं। परिवर्तित अभिलेखों को जोड़कर यह सिद्ध करने का प्रयास किया होगा कि पवित्र कब्रगाह के रूप में वह इमारत, हिन्दू भवन होने के स्थान पर, उसका अपना निर्माण है। आने वाला समय निस्सन्देह सिद्ध कर देगा कि ताज एक हिन्दू भवन है।

कब्र पर दिखाई देने वाले 1638-39 दिनांकित नवीन शिलालेखों के आधार पर लेखकगण छः वर्षों के निर्माण की अवधि का अनुमान अनुमान लगाते हैं। मेरे विवेक के अनुसार छः वर्ष का समय अपर्याप्त है। ताज परिसर के उचित निर्माण अवधि के विषय में टैवेर्नियर (Tavernier) के द्वारा अनुमानित बाइस वर्ष के समय को सही माना जा सकता है। यद्यपि वह आगरा में 1640 में आया था और उसने ताज के कुछ मरम्मत कार्य को देखा था। स्थानीय लोगों ने सुन रखा हुआ होगा कि वास्तव में शताब्दियों पहले उस भवन का निर्माण बाइस वर्षों में हुआ था और उसे भी यह बात स्थानीय लोगों से मालूम हुई होगी।

औरंगजेब के द्वारा अपने पिता शाहजहां को 9 दिसम्बर 1652 को लिखे गए पत्र में ताज के मरम्मत के विषय को भी लेखकों ने स्वीकारा है। औरंगजेब ने लिखा था कि पिछली बारिश के दौरान इमारत के उत्तरी भवन और सहायक कक्षों में छेद हो गए हैं तथा चार धनुषाकार दरवाजे, चार छोटे गुम्बद और उत्तरी दिशा की चार ड्यौढ़ियाँ बरबाद हो गई हैं। लेखक यह प्रश्न नहीं उठातेः निर्माण के मात्र तेरह वर्षों बाद ही क्या ताज क्षीण हो सकता है? क्या यह विश्वास करना सुसंगत नहीं होगा कि 1652 तक ताज ने सैकड़ों वर्षों की उम्र पूरी कर ली थी इसीलिए उसमें सामान्य टूट-फूट के लक्षण दिखाई पड़ने लगे थे।

शाही इतिहासकार बादशाह को वास्तु सम्बन्धी परियोजनाओं में निजी रूप से भाग लेने वाला बताने में और उसके उत्कृष्ट चरित्र की महिमा का गान करने में किंचित मात्र भी कमी नहीं की है। लेकिन यूरोपीय यात्रियों का कहना है कि बादशाह औरतों के प्रति वासना को छोड़कर लंबे समय तक कुछ अन्य कार्य कर पाने के लिए असमर्थ था। न ही उसे कोमल हृदय, करुणामय या महान प्रेमी समझा जाना चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों ही "प्रेमी" क्रूर, स्वयं-केन्द्रित और अनैतिक थे।

जहाँ बेग्ले और देसाई ताजमहल के प्रेम के प्रति समर्पित भवन मानने में भ्रमित हैं वहीं वे भवन के मुगल मूल होने के प्रति भी दृढ़ नहीं हैं। वे प्रमुख समस्याओं को अनदेखा करते हुए पारम्परिक दृष्टिकोण का ही समर्थन करते हैं:


1. जरा ताज मुख्य भवन के दोनों ओर की एक समान दो इमारतों की विशेषता पर गौर करें। यदि उन्हें दो अलग अलग कार्यों - एक मस्जिद हेतु और दूसरा अतिथिगृह हेतु - बनाए गए थे तो उन कार्यों के अनुरूप उनकी डिजाइन भी भिन्न भिन्न होनी थी।

2. मुगल आक्रमण के समय विकसित तोपखानों का चलन होने के बावजूद भी परिसर की परिधि दीवारों में मध्यकाल के पूर्व वाले तोपखाने क्यों है?  [एक महल के लिए सुरक्षा व्यवस्था तो समझ में आने वाली बात है किन्तु एक कब्रगाह की सुरक्षा की क्या आवश्यकता है?]


3. उत्तर दिशा की ओर यमुना किनारे वाले चबूतरे के नीचे कोई बीस कमरे क्यों बनाए गए हैं? एक कब्रगाह में इन कमरों की क्या जरूरत है? हाँ एक महल में अवश्य ही इन कमरों का सदुपयोग हो सकता है। लेखकों ने तो इन कमरों के अस्तित्व का ही कहीं पर भी जिक्र नहीं किया है।

4. इन आपस में सटे हुए बीस कमरों के विपरीत गलियारे वाले दक्षिण दिशा के सील किए गए कमरों में क्या है? क्या बीस सटे कमरे विपरीत लंबे गलियारे के दक्षिण की ओर बंद हुआ कमरे में है? उनके दरवाजों को किसने चिनाई करके बंद कर दिया है? उनके भीतर की वस्तुओं तथा सजावट का अध्ययन करने के लिए विद्वानों को क्यों अनुमति नहीं है?

5. "मस्जिद" का रुख मक्का की ओर होने के बजाय पश्चिम दिशा की ओर क्यों है?

6. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India) ने कार्बन-14 या thermo-luminiscnece के माध्यम से ताज के काल निर्धारण को क्यों अवरुद्ध कर रखा है? ताज किस शताब्दी में बना है जैसे किसी भी विवाद को आसानी के साथ हल किया जा सकता है। [ताज के एक दरवाजे से गुप्त रूप से ले जाए गए लकड़ी के एक टुकड़े का रेडियोकार्बन (radiocarbon) विधि से कालनिर्धारण करने पर उसके 13वीं सदी के होने की सम्भावना पाई गई है। किन्तु और अधिक डेटा की आवश्यकता है।]

यदि शाहजहां ने मुजताज़ के प्रति अपने प्रेम के लिए ताज को नहीं बनवाया था तो वह उसे प्राप्त क्यों करना चाहता था? जाहिर है कि मुमताज़ के लिए उसका प्यार एक आसानी के साथ किया गया छल था। वास्तव में वह पहले से बने भवन को स्वयं के लिए प्राप्त करना चाहता था। उस भवन के बदले में अन्य सम्पत्ति देने के शाहजहां के प्रस्ताव को राजा जय सिंह मना नहीं कर सका और इस प्रकार शाहजहां ने उसे हड़प लिया। सोने के मूल्यवान रेलिंग के साथ ही साथ उस भवन के अन्य मूल्यवान वस्तुओं को भी शाहजहां ने प्राप्त कर लिया। परिसर को एक मुस्लिम कब्रगाह बनाकर उसने बीमा कर लिया कि हिन्दू अब उस भवन को कभी भी वापस नहीं चाहेंगे। मुख्य भवन के पश्चिम दिशा के निवासगृह को शाहजहां ने साधारण अंदरूनी संशोधन करके और मेहराब बनाकर मस्जिद में परिवर्तित कर दिया। यह सिद्ध करने के लिए कि ताज आरम्भ से ही इस्लामिक इमारत है, उसने अनेक प्रवेशस्थलों तथा दरवाजों के चारों ओर इस्लामी शिलालेख जड़ दिया। निस्सन्देह, विद्वानों को आरम्भ से ही या तो चुप करा दिया गया है या धोखा दिया गया है।

फिर भी, हम बेग्ले और देसाई को इतने अधिक इतने अधिक मात्रा में उपयोगी डेटा एकत्रित करने तथा समकालीन लेखन तथा शिलालेखों के अनुवाद करने के लिए धन्यवाद देंगे। वे ताज के विषय में एक संदिग्ध किंवदन्ती को स्वीकार करने के बजाय निरपेक्ष तथ्य देने में अवश्य ही असफल हैं। उनकी व्याख्याएँ और विश्लेषण पूर्वाग्रह के साँचे में ढले हैं। किन्तु उनके कार्य का लाभ ताजमहल के प्रति उत्सुकता रखने वाले विद्वानों तथा जनसाधारण अवश्य ही उठा सकते हैं और यह जानने में सफल हो सकते हैं कि ताजमहल को किसने और कब बनवाया था, यदि वे पुस्तक को खुले दिमाग से पढ़ें।

Tuesday, January 11, 2011

तब हम कितने असभ्य थे। अब हम कितने सभ्य हैं!

तब
अब
सुबह मुर्गे की बाँग सुनकर उठते थे।Nokia , LG या Samsung जैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बनाए गए मोबाइल का अलार्म सुनकर उठते हैं।
माता-पिता के चरणस्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करते थे।किसी की आशीर्वाद का भला कुछ अर्थ है?
नित्यकर्म से निवृत होकर शुद्ध काली मिट्टी से हाथ धोते थे।नित्यकर्म से निवृत होकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बनाए गए Dettol handwash से हाथ धोते हैं।
नीम या बबूल के दातून से दाँत साफ करते थे।बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बनाए गए Pepsodent , colgate या close -up दाँत साफ करते हैं।
बेसन, हल्दी, चन्दन आदि से बने उबटन लगाकर स्नान करते थे।बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बनाए गए Lux, Liril, Lifebuoy,Pears,
Dov साबुन लगाकर स्नान करते हैं।
मिश्री मिश्रित एकाध गिलास शुद्ध दूध पीते थे।red label, brooke bond, Taj mahal, Nestle जैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा पैक की गई चाय या कॉफी पीते हैं साथ में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बनाए गए ब्रेड/बिस्किट भी खाते हैं।
देसी काँच से बने आईने में देखकर बाल सँवारते थै।बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बनाए गए Saint Gobain के काँच से बने आईने में देखकर बाल सँवारते हैं।
नारी मक्खन, देसी घी आदि चेहरे पर लगाकर सौन्दर्य निखारती थीं।नारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बनाए गए Ponds, Vaseline की कोल्ड क्रीम, बालोपे L'Oreal , Lux , Axe ki शोवर जेल, Ponds, Axe की पावडर आदि लगाकर सौन्दर्य निखारती हैं।
घर में बने पोहा, पराठे आदि का नाश्ता करते थे।विदेशी फॉस्ट फूड का नाश्ता करते हैं।
कपड़ों पर जूही, चमेली, गुलाब आदि फूलों के इत्र लगाते थे।कपड़ों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बनाए गए Rexona, Axe परफूम का स्प्रे मारा जाता है।
कोसा, रेशम, मलमल आदि के बने वस्त्र पहनते थे।बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बनाए गए Arrow के शर्ट Blackberry की पेंट पहनते हैं।
अपने देश में बने साधारण जूते, चप्पल यहाँ तक कि खड़ाऊ भी पहनते थे।NIke, Woodland, fila, addidas, Red tape, Puma,
Reebok, Bata जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बनाए गए किसी ब्रांड के बूट पहनते हैं।
घर में बने रोटी, चाँवल, दाल, सब्जी खाकर तथा लस्सी पीकर क्षुधा शान्त करते थे।Pizza hut या Dominoz से मँगवाए गए पिज्जा, बर्गर आदि खाकर तथा coke या pepsi पीकर क्षुधा शान्त करते हैं।
तब हम कितने असभ्य थे।अब हम कितने सभ्य हैं!

Monday, January 10, 2011

शाहजहां ने सन् 1628 में फारसी राजदूत का स्वागत उस भवन में कैसे किया जिसका अस्तित्व ही नहीं था?


उपरोक्त चित्र दिल्ली के लालकिले में लगे शिलापट्ट का है जिसके अनुसार आधुनिक पुरातत्ववेत्ता इस बात का ढिंढोरा पीटते हैं कि दिल्ली के लाल किले को शाहजहां (जिसने 1628 से 1658 ई. तक शासन किया था) ने सन् 1639 से 1648 के दौरान बनवाया था।

उपरोक्त चित्र बोडलियन पुस्तकालय, ऑक्सफोर्ड (Bodleian Library, Oxford) में सुरक्षित समकालीन पेंटिंग का है जिसके अनुसार शाहजहां ने सन् 1628 में लाल किले के दीवान-ए-आम में फ़ारसी राजदूत का स्वागत् किया था। यह चित्र इल्युस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इण्डिया के 14 मार्च 1971 के अंक (पृष्ठ 32) में भी प्रकाशित हुआ था।

शाहजहां ने सन् 1628 में फारसी राजदूत का स्वागत उस भवन में कैसे किया आधुनिक पुरातत्वविदों के अनुसार जिसका अस्तित्व ही नहीं था? आधुनिक पुरातत्वविदों के अनुसार तो लाल किले का निर्माण सन् 1639 से 1648 के दौरान हुआ है।

(चित्रों को बड़ा करके देखने के लिए उन पर क्लिक करें, चित्र http://www.stephen-knapp.com से साभार)

Sunday, January 9, 2011

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 11 (Hindi Proverbs)

प्रस्तुत हैं हिन्दी की कुछ लोकोक्तियाँ तथा मुहावरे और उनके अर्थ। उनके अर्थ मैंने अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार बनाए हैं और उनमें त्रुटि की सम्भावना है अतः यदि आपको त्रुटियाँ नजर आएँ तो कृपया टिप्पणी करके सही अर्थ बताने का कष्ट करें।

खूँटे के बल बछड़ा कूदे

अर्थः दूसरे की शह पाकर ही अकड़ दिखाना।

खेत खाए गदहा, मार खाए जुलहा

अर्थः किसी के दोष की सजा किसी अन्य को मिलना।

खेती अपन सेती

अर्थः दूसरों के भरोसे खेती नहीं की जा सकती।

खेल -खिलाड़ी का,पैसा मदारी का

अर्थः मेहनत किसी की लाभ किसी और का।

खोदा पहाड़ निकली चुहिया

अर्थः परिश्रम कुछ भी फल न मिलना।

गंगा गए तो गंगादास, यमुना गए यमुनादास

अर्थः एक मत पर स्थिर न रहना।

गंजेडी यार किसके दम लगाया खिसके

अर्थः स्वार्थी आदमी स्वार्थ सिद्ध होते ही मुँह फेर लेता है।

गधा धोने से बछड़ा नहीं हो जाता

अर्थः स्वभाव नहीं बदलता।

गधा भी कहीं घोड़ा बन सकता है

अर्थः बुरा आदमी कभी भला नहीं बन सकता।

गई माँगने पूत, खो आई भरतार

अर्थः थोड़े लाभ के चक्कर में भारी नुकसान कर लेना।

गर्व का सिर नीचा

अर्थः घमंडी आदमी का घमंड चूर हो ही जाता है।

गरीब की लुगाई सब की भौजाई

अर्थः गरीब आदमी से सब लाभ उठाना चाहते हैं।

गरीबी तेरे तीन नाम - झूठा, पाजी, बेईमान

अर्थः गरीब का सवर्त्र अपमान होता रहता है।

गरीबों ने रोज़े रखे तो दिन ही बड़े हो गए

अर्थः गरीब की किस्म़त ही बुरी होती है।

गवाह चुस्त, मुद्दई सुस्त

अर्थः जिसका काम है वह तो आलस से करे, दूसरे फुर्ती दिखाएं।

गाँठ का पूरा, आँख का अंधा

अर्थः मालदार असामी।

गीदड़ की मौत आती है तो वह गाँव की ओर भागता है

अर्थः विपत्ति में बुद्धि काम नहीं करती।

गुड़ खाए, गुलगुलों से परहेज

अर्थः झूठ और ढोंग रचना।

गुड़ दिए मरे तो जहर क्यों दें

अर्थः काम प्रेम से निकल सके तो सख्ती न करें।

गुड़ न दें, पर गुड़ सी बात तो करें

अर्थः कुछ न दें पर मीठे बोल तो बोलें।

गुरु-गुड़ ही रहे, चेले शक्कर हो गए

अर्थः छोटों का बड़ों से आगे बढ़ जाना।

Saturday, January 8, 2011

हर किसी को दूसरे की थाली में ज्यादा घी नजर आता है

आप हों या मैं, प्रायः हम सब को लगता है कि सामने वाला बहुत मजे में है और मैं हूँ कि परेशानी पीछा ही नहीं छोड़ती। पुरानी कहावत भी है "हर किसी को दूसरे की थाली में ज्यादा घी नजर आता है"।

क्यों लगता है ऐसा?

दफ्तर का बाबू सोचता है कि मैं तो मर-मर कर काम कर रहा हूँ पर इतनी कम तनख्वाह मिलती है कि घर चलाना मुश्किल है। और साहब को देखो कुछ ज्यादा काम करना ना धरना पर मोटी तनख्वाह ऐंठ लेते हैं।

घरवाली सोचती है कि मैंने कितना मेहनत कर के खाना बनाया और पतिदेव हैं कि सराहना करना तो दूर उल्टे हमेशा नुक्स निकालते रहते हैं मेरे बनाए खाने में।

नौकरी करने वाला सोचता है कि व्यापारी सुखी है, रोज ही पैसे आते हैं उसके पास, यहाँ तो महीने में एक बार वेतन मिलता है जो चार दिन में ही खर्च हो जाता है, उसके बाद फिर वही उधारी। दूसरी तरफ व्यापारी सोचता है कि दिन भर हाय-हाय करो पर बिक्री बढ़ती ही नहीं, नौकरी करने वाला कितना खुश है कि काम कुछ करे कि मत करे, महीना खत्म हुआ और तनख्वाह हाथ में हाजिर!

हर किसी को लगता है कि मैं परेशान हूँ और "वो" मजे में है।

क्यों लगता है ऐसा?

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसलिए उसके परिवार, समाज, कार्यालय आदि में अन्य लोगों से सम्बन्ध बनते तथा बिगड़ते ही रहते हैं। सम्बन्धों का मधुर या कटु होना मनुष्य के व्यवहार पर निर्भर होता है। व्यवहार एकतरफा नहीं बल्कि दोतरफा होता है। जब दो व्यक्ति के बीच सम्बन्ध बनता है तो उस सम्बन्ध पर दोनों ही व्यक्तियों का व्यवहार का प्रभाव पड़ता है।

मनुष्यों के आपसी व्यवहार की चार स्थितियाँ होती है -

मैं मजे में तू मजे में (I’m OK, You’re OK)
मैं मजे में तू परेशान (I’m OK, You’re not OK)
मैं परेशान तू मजे में (I’m not OK, You’re OK)
मैं परेशान तू परेशान (I’m not OK, You’re not OK)


उपरोक्त परिस्थितियाँ किन्हीं भी दो लोगों के बीच हो सकती हैं, चाहे वे बाप-बेटे हों, भाई-भाई हों, पति-पत्नी हों, अधिकारी-कर्मचारी हों, दुकानदार-ग्राहक हों, यानी कि उनके बीच चाहे जैसा भी आपसी सम्बन्ध हों।

यदि दो व्यक्तियों के बीच सम्बन्ध है और वे दोनों ही एक दूसरे से सन्तुष्ट हैं तो यह सबसे अच्छी बात है। यही ऊपर बताई गई स्थितियों में पहली स्थिति है। किन्तु यह एक आदर्श स्थिति है जो किसी भी व्यक्ति के जीवन में शायद ही कभी आ पाती है। ज्यादातर होता यह है कि हम अपनी बला दूसरे सिर पर लाद कर खुश होते हैं और दूसरा परेशान रहता है या फिर इसके उल्टे दूसरा व्यक्ति अपने झंझटों को हम पर डाल कर हमें परेशान कर देता है और खुद निश्चिंत हो जाता है। याने कि उपरोक्त बताई गई स्थितियों में दूसरी और तीसरी स्थितियाँ ही हमारे जीवन में अक्सर आते रहती हैं। पर कभी कभी ऐसा भी होता है कि लाख कोशिश करने के बावजूद हम और सामने वाला दोनों ही संतुष्ट नहीं हो पाते याने कि दोनों के दोनों परेशान। यह चौथी स्थिति है जो कि सबसे खतरनाक है।

मनुष्य के व्यवहार से सम्बन्धित इस विषय पर थॉमस एन्थॉनी हैरिस द्वारा लिखित अंग्रेजी पुस्तक I’m OK, You’re OK बहुत ही लोकप्रिय है। यह पुस्तक व्यवहार विश्लेषण (Transactional Analysis) पर आधारित है। श्री हैरिस की पुस्तक इस बात का विश्लेषण करती है कि उपरोक्त व्यवहारिक स्थितियाँ क्यों बनती हैं। उनका सिद्धांत बताता है कि मनुष्य निम्न तीन प्रकार से सोच-विचार किया करता है:

बचकाने ढंग से (Child): इस प्रकार के सोच-विचार पर मनुष्य की आन्तरिक भावनाएँ तथा कल्पनाएँ हावी रहती है (dominated by feelings)। आकाश में उड़ने की सोचना इसका एक उदाहरण है।

पालक के ढंग से (Parent): यह वो सोच-विचार होता है जिसे कि मनुष्य ने बचपने में अपने पालकों से, रीति-रिवाजों से, धर्म-सम्बन्धी प्रवचनों आदि से, सीखा होता है (unfiltered; taken as truths)। ‘बड़ों का आदर करना चाहिए’, ‘झूठ बोलना पाप है’, ‘दायें बायें देखकर सड़क पार करना’ आदि वाक्य बच्चों को कहना इस प्रकार के सोच के उदाहरण है।

वयस्क ढंग से (Adult): बुद्धिमत्तापूर्ण तथा तर्कसंगत सोच वयस्क ढंग का सोच होता है (reasoning, logical)। सोच-विचार करने का यही सबसे सही तरीका है।

हमारे सोच-विचार करने के ढंग के कारण ही हमारे व्यवहार बनते है। जब दो व्यक्ति वयस्क ढंग से सोच-विचार करके व्यवहार करते है तो ही दोनों की संतुष्टि प्रदान करने वाला व्यवहार होता है जो कि “मैं मजे में तू मजे में (I’m OK, You’re OK)” वाली स्थिति होती है। जब दो व्यक्तियों में से एक वयस्क ढंग से सोच-विचार करके तथा दूसरा बचकाने अथवा पालक ढंग से सोच-विचार करके व्यवहार करते है तो “मैं मजे में तू परेशान (I’m OK, You’re not OK)” या “मैं परेशान तू मजे में (I’m not OK, You’re OK)” वाली स्थिति बनती है। किन्तु जब दो व्यक्ति बचकाने या पालक ढंग से सोच-विचार करके व्यवहार करते है तो “मैं परेशान तू परेशान (I’m not OK, You’re not OK)” वाली स्थिति बनती है।

किन्तु स्मरण रहे कि यद्यपि वयस्क ढंग से सोच-विचार करना अत्यन्त महत्वपूर्ण है किन्तु बचकाने ढंग से और पालक ढंग से सोच-विचार करने का भी अपना महत्व है। न्यूटन ने यदि बचकाने ढंग से न सोचा होता तो हमें गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त कभी भी न मिला होता। पालक ढंग से सोचना यदि समाप्त हो जाए तो समाज में भयंकर मनमानी होने लगे।

उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर व्यवहार करने से ही सभी की संतुष्टि हो सकती है।