Monday, February 28, 2011

वसन्त की बहार

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

ऋतुराज है -
वासन्ती साज है,
वसन्त पर हमें नाज है,
प्रकृति के मंच पर -
नया संगीत नया साज है।

मौर लगे आम्र वृक्ष -
भीनी मादक महक से -
मुग्ध करते मन को,
शीतल-मन्द-सुगन्धित बयार के हल्के झोंके
पुलकित और उमंगित करते तन को।

सरसों के पीले खेत,
अलसी के अलसाये नीले फूल,
टेसू के लाल लाल चमकते झुण्ड,
सेमल के पत्रविहीन वृक्ष पर आकर्षक पुष्प,
प्रकृति के ये सब नये परिधान -
सौन्दर्य गागर छलकाते हैं,
'सेनापति' और 'पद्माकर' की स्मृति जगाते हैं।

महुए के नशीले फूल,
मधुमास की उठती हल्की धूल,
कोपलों से भरे सरिता के दुकूल,
मदहोशी, ऋतु के अनुकूल,
वसन्त की यह साज-सज्जा,
गूंजते भ्रमर और पुष्प के प्रेम में -
न संकोच, न अनावश्यक लज्जा।

कोयल की मधुर तान में -
छिड़ता ऋतुराज का संगीत,
मदन वसन्त का और -
वसन्त मदन का मीत
वसन्त पंचमी से होलिका दहन तक,
करते सब श्रृंगार में ही बातचीत।

(रचना तिथिः शनिवार 30-01-1982)

Sunday, February 27, 2011

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 20 (Hindi Proverbs)

प्रस्तुत हैं हिन्दी की कुछ लोकोक्तियाँ तथा मुहावरे और उनके अर्थ। उनके अर्थ मैंने अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार बनाए हैं और उनमें त्रुटि की सम्भावना है अतः यदि आपको त्रुटियाँ नजर आएँ तो कृपया टिप्पणी करके सही अर्थ बताने का कष्ट करें।


थका ऊँट सराय ताकता

अर्थः परिश्रम के पश्चात् विश्राम आवश्यक होता है।

थूक से सत्तू नहीं सनते

अर्थः कम सामग्री से काम पूरा नहीं हो पाता।

थोथा चना बाजे घना

अर्थः मूर्ख अपनी बातों से अपनी मूर्खता को प्रकट कर ही देता है।

दमड़ी की बुढिया ढाई टका सिर मुँड़ाई

अर्थः मामूली वस्तु के रख रखाव के लिए अधिक खर्च करना।

दबाने पर चींटी भी चोट करती है

अर्थः दुःख पहुँचाने पर निर्बल भी वार करता है।

दमड़ी की हाँड़ी गई, कुत्ते की जात पहचानी गई

अर्थः असलियत जानने के लिए थोड़ी सी हानि सह लेना।

दर्जी की सुई, कभी धागे में कभी टाट में

अर्थः परिस्थिति के अनुसार कार्य।

दलाल का दिवाला क्या, मस्जिद में ताला क्या

अर्थः निर्धन को लुटने का डर नहीं होता।

दाग लगाए लँगोटिया यार

अर्थः अपनों से धोखा खाना।

दाता दे भंडारी का पेट फटे

अर्थः दान कोई करे कुढ़न दूसरे को हो।

दादा कहने से बनिया गुड़ देता है

अर्थः मीठे बोल बोलने से काम बन जाता है।

दान के बछिया के दाँत नहीं देखे जाते

अर्थः मुफ्त में मिली वस्तु के गुण-अवगुण नहीं परखे जाते।

दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम

अर्थः हक की वस्तु अवश्य ही मिलती है।

दाम सँवारे सारे काम

अर्थः पैसा सब काम करता है।

दाल में काला होना

अर्थः गड़बड़ होना।

दाल-भात में मसूरचंद

अर्थः जबरदस्ती दखल देनेवाला।

दाल में नमक, सच में झूठ

अर्थः थोड़ा सा झूठ बोलना गलत नहीं होता।

दिनन के फेर से सुमेरू होत माटी को

अर्थः बुरे समय में सोना भी मिट्टी हो जाता है।

दिल्ली अभी दूर है

अर्थः सफलता दूर है।

Saturday, February 26, 2011

संस्कृत सुभाषित - हिन्दी अर्थ - 10

सुभाषित शब्द "सु" और "भाषित" के मेल से बना है जिसका अर्थ है "सुन्दर भाषा में कहा गया"। संस्कृत के सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं।

परोऽपि हितवान् बन्धुः बन्धुरप्यहितः परः।
अहितो देहजो व्याधिः हितमारण्यमौषधम्॥९१॥
(हितोपदेश)

व्याधियाँ (बीमारियाँ) हमारे शरीर के भीतर रहते हुए भी हमारा बुरा करती हैं और औषधियाँ (जड़ी-बूटियाँ) हमसे दूर पेड़-पौधों में में रहकर भी हमारा भला करती हैं (अर्थात् व्याधियाँ हमारे दुश्मन हैं और औषधियाँ मित्र)। इसी प्रकार से जिनसे हमारा रक्त का सम्बन्ध अर्थात् किसी प्रकार की रिश्तेदार न हो किन्तु वह हमारा हित करे तो वे अपने होते हैं और यदि रिश्तेदार होकर भी कोई हमारा अहित करे तो वह पराया होता है।

अहो दुर्जनसंसर्गात् मानहानिः पदे पदे।
पावको लौहसंगेन मुद्गरैरभिताड्यते॥९२॥


दुष्ट के संग रहने पर कदम कदम पर अपमान होता है। पावक (अग्नि) जब लोहे के साथ होता है तो उसे घन से पीटा जाता है।

चिता चिन्तासम ह्युक्ता बिन्दुमात्र विशेषतः।
सजीवं दहते चिन्ता निर्जीवं दहते चिता॥९३॥


चिता और चिंता में मात्र एक बिन्दु (अनुस्वार) का ही फर्क है किन्तु दोनों ही एक समान है, जो जीते जी जलाता है वह चिंता है और जो मरने के बाद (निर्जीव) को जलाता है वह चिता है।

अङ्गणवेदी वसुधा कुल्या जलधिः स्थली च पातालम्।
वल्मीकश्च सुमेरुः कृतप्रतिज्ञस्य धीरस्य॥९४॥


अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहने वाले धीर व्यक्ति के लिए यह वसुधा (पृथ्वी) एक बगिया के समान होता है (जब चाहे घूम कर जी बहला लो), समुद्र एक नहर के समान होता है (जब चाहे तैर कर पार कर लो), पाताल लोक एक मनोरंजन स्थल (पिकनिक स्पॉट) के समान होता है (जब जाहे जाकर पिकनिक मना लो) और सुमेरु पर्वत एक चींटी के घर के समान होता है (जब चाहे चोटी पर चढ़ जाओ)। (अतः मनुष्य को दृढ़प्रतिज्ञ एवं धीर-गम्भीर होना चाहिए।)

येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भूविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥९५॥


विद्या, तप (कठिन परिश्रम कर पाने की योग्यता), दानशीलता, शील, गुण तथा धर्म से विहीन व्यक्ति मृत्युलोक (पृथ्वी) पर भार के समान है, वह मनुष्य के रूप में पशु ही है।

माता मित्रं पिता चेति स्वभावात् त्रितयं हितम्।
कार्यकारणतश्चान्ये भवन्ति हितबुद्धयः॥९६॥


माता, पिता और मित्र तीनों ही स्वभावतः ही हमारे हित के लिए सोचते हैं, वे हमारे हित करने के बदले में किसी प्रकार की अपेक्षा नहीं रखते। इन तीनों के सिवाय अन्य लोग यदि हमारे हित की सोचते हैं तो वे उसके बदले में हमसे कुछ न कुछ अपेक्षा भी रखते हैं।

वदनं प्रसादसदनं सदयं हृदयं सुधामुचो वाचः।
करणं परोपकरणं येषां केषां न ते वन्द्याः॥९७॥


सदैव प्रसन्न-वदन (हँसमुख), हृदय में दया की भावना रखने वाले, अमृत के समान मीठे वचन बोलने वाले तथा परोपकार में लिप्त रहने वाले व्यक्ति भला किसके लिए वन्दनीय नहीं होगा?

गर्वाय परपीड़ाय दुर्जस्य धनं बलम्।
सज्जनस्य दानाय रक्षणाय च ते सदा॥९८॥


दुर्जन (दुष्ट) का धन और बल गर्व (घमण्ड) तथा दूसरों को पीड़ा पहुँचाना होता है और दान एवं (निर्बलों की) रक्षा करना सज्जन का।

यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः।
चित्ते वाचि क्रियायां च साधुनामेकरूपता॥९९॥


जो चित्त (मन) में हो वही वाणी से प्रकट होना चाहिए और जो वाणी से प्रकट हो उसके अनुरूप ही कार्य करना चाहिए। जिनके चित्त, वाणी और कर्म में एकरूपता होती है वही साधुजन होते हैं।

छायामन्यस्य कुर्वन्ति स्वयं तिष्टन्ति चातपे।
फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुष इव॥१००॥


वृक्ष स्वयं सूर्य के प्रखर ताप को सहन करके दूसरों को छाया प्रदान करते हैं तथा उनके फल भी दूसरों के उपयोग के लिए होते हैं, वृक्ष के समान सत्पुरुष भला कौन है?

Friday, February 25, 2011

प्राचीन भारत में परमाणु विस्फोट

आदिकाल से प्रकृति सदैव सृजन का कार्य करती रही है और मानव विनाश का। मानव के द्वारा किए गए गए विनाश की भयावहता की कोई सीमा नहीं है। मनुष्य मनुष्य का विनाश करता है, भाई भाई का ही वध करता है। महाभारत का युद्ध आखिर भाइयों के बीच ही तो युद्ध था जिसमें उन्होंने एक दूसरे का अत्यन्त भयावह विनाश किया। वह विनाश कितना भयावह था इसका अनुमान महाभारत के निम्न स्पष्ट वर्णन से लगाया जा सकता हैः
अत्यन्त शक्तिशाली विमान से ब्रह्माण्ड की शक्ति से युक्त शस्त्र प्रक्षेपित किया गया।

धुएँ के साथ अत्यन्त चमकदार ज्वाला, जिसकी चमक दस हजार सूर्यों के चमक के बराबर थी, का अत्यन्त भव्य स्तम्भ उठा।

वह वज्र के समान अज्ञात अस्त्र साक्षात् मृत्यु का भीमकाय दूत था जिसने वृष्ण और अंधक के समस्त वंश को भस्म करके राख बना दिया।

उनके शव इस प्रकार से जल गए थे कि पहचानने योग्य नहीं थे। उनके बाल और नाखून अलग होकर गिर गए थे।

बिना किसी प्रत्यक्ष कारण के बर्त टूट गए थे और पक्षी सफेद पड़ चुके थे।

कुछ ही घण्टों में समस्त खाद्यपदार्थ संक्रमित होकर विषैले हो गए ....

उस अग्नि से बचने के लिए योद्धाओं ने स्वयं को अपने अस्त्र-शस्त्रों सहित जलधाराओं में डुबा लिया।
अब यदि उपरोक्त वर्णन दृश्य रूप देकर उसकी तुलना यदि हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु विष्फोट के दृश्य से किया जाए तो स्पष्ट रूप से दोनों में पूर्ण साम्य दृष्टिगत होता है।

तो क्या महाभारत के युद्ध में परमाणु प्रक्षेपास्त्र का प्रयोग हुआ था? यदि हम अपने समस्त पूर्वाग्रहों को त्यागकर अपनी बुद्धि प्रयोग करें तो हम निर्णायक रूप से कह सकते हैं कि महाभारत के युद्ध में परमाणु प्रक्षेपास्त्र का प्रयोग अवश्य ही हुआ था।


रामायण में भी ऐसे आग्नेय अस्त्रों का विवरण मिलता है जो निमिष मात्र में सम्पूर्ण पृथ्वी का विनाश कर सकते थे और उनके द्वारा विनाश के दृष्य का वर्णन पूरी तरह से आज के परमाणु विनाश के दृष्य से साम्य रखता है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ब्रह्मास्त्र, आग्नेयास्त्र जैसे अस्त्र अवश्य ही परमाणु शक्ति से सम्पन्न थे। किन्तु हम स्वयं ही अपने प्राचीन ग्रंथों में वर्णित विवरणों को मिथक मानते हैं और उनके आख्यान तथा उपाख्यानों को कपोल कल्पना। हमारा ऐसा मानना केवल हमें मिली दूषित शिक्षा का परिणाम है जो कि, अपने धर्मग्रंथों के प्रति आस्था रखने वाले पूर्वाग्रह से युक्त, पाश्चात्य विद्वानों की देन है। पता नहीं हम कभी इस दूषित शिक्षा से मुक्त होकर अपनी शिक्षानीति के अनुरूप शिक्षा प्राप्त कर भी पाएँगे या नहीं।

प्राचीन भारत में परमाणु विस्फोट के अन्य और भी अनेक साक्ष्य मिलते हैं। राजस्थान में जोधपुर से पश्चिम दिशा में लगभग दस मील की दूरी पर तीन वर्गमील का एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ पर रेडियोएक्टिव्ह राख की मोटी सतह पाई जाती है। वैज्ञानिकों ने उसके पास एक प्राचीन नगर को खोद निकाला है जिसके समस्त भवन और लगभग पाँच लाख निवासी आज से लगभग 8,000 से 12,000 साल पूर्व किसी परमाणु विस्फोट के कारण नष्ट हो गए थे। एक शोधकर्ता के आकलन के अनुसार प्राचीनकाल में उस नगर पर गिराया गया परमाणु बम जापान में सन् 1945 में गिराए गए परमाणु बम की क्षमता के बराबर का था।

मुंबई से उत्तर दिशा में लगभग 400 कि.मी. दूरी पर स्थित लगभग 2,154 मीटर की परिधि वाला एक अद्भुत विशाल गढ़ा (crater), जिसकी आयु 50,000 से कम आँकी गई है, भी यही इंगित करती है कि प्राचीन काल में भारत में परमाणु युद्ध हुआ था। शोध से ज्ञात हुआ है कि यह गढ़ा (crater) पृथ्वी पर किसी 600.000 वायुमंडल के दबाव वाले किसी विशाल के प्रहार के कारण बना है किन्तु  इस गढ़े (crater) तथा इसके आसपास के क्षेत्र में उल्कापात से सम्बन्धित कुछ भी सामग्री नहीं पाई जाती। फिर यह विलक्षण गढ़ा (crater) आखिर बना कैसे? सम्पूर्ण विश्व में यह अपने प्रकार का एक अकेला गढ़ा (crater) है।



हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई में भी ऐसे स्थान मिले हैं जहाँ पर मानवों की अस्थियों के इस प्रकार के ढाँचे पाए गए हैं मानो वे भय और दहशत के कारण हाथ उठाकर दौड़ते हुए मरे हों। वहाँ के एक स्थान पर एक सोवियत विद्वान ने मनुष्य की अस्थि का एक ऐसा ढाँचा प्राप्त किया है जो कि सामान्य से पचास गुना अधिक रेडियोएक्टिव्ह है। ऐसा प्रतीत होता है कि सिंधु घाटी सभ्यता का विनाश भी किसी परमाणु विस्फोट के कारण ही हुआ था।

Thursday, February 24, 2011

पर पत्नी को नाराज भी तो नहीं कर सकते....


यदि आपने कल का हमारा पोस्ट पढ़ा है तो आज के पोस्ट का शीर्षक पढ़ कर अवश्य ही आप सोच रहे होंगे कि हमारी श्रीमती जी ने जरूर हमारी खिंचाई की है और अब हमने उन्हें खुश करने के लिए यह पोस्ट लिखा है। हम जानते हैं कि आप कभी गलत नहीं सोच सकते इसलिए बताए देते हैं कि कल इधर पोस्ट प्रकाशित हुआ और उधर पड़ोस से वे वापस आईं। पूरा पोस्ट पढ़ लिया। अब वे इतनी कमअक्ल तो वे हैं नहीं कि सब कुछ पढ़ लेने के बाद भी न समझें कि उनपर भरपूर आक्षेप हुआ है। आखिर पुराने जमाने की ग्रेजुएट हैं भइया।

अब इससे पहले कि वे रौद्ररूप धारण करके कहना आरम्भ करें कि “हे आर्यपुत्र! इस ब्लोगिंग ने आपकी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया है। आप विक्षिप्त होते जा रहे हैं....." आदि आदि, हमने भी उनके क्रोध को शान्त करने का तरीका सोच लिया। आखिर पत्नी को नाराज भी तो नहीं किया जा सकता न! यदि नाराज होकर वे हमें छोड़कर तत्काल मायके चले जाएँ तो हो गई ना हमारी छुट्टी। जब साक्षात् भगवान विष्णु के अवतार श्री रामचन्द्रजी पत्नी वियोग से दुःखी रहे तो हमारे जैसे लोगों की क्या औकात है कि पत्नी के बिना चैन से रह पायें?

किन्तु कई बार ऐसा भी होता है कि पत्नी अपने पति पर कभी डायरेक्ट आक्षेप नहीं करती। जैसे कि पत्नी यदि हँसे वहाँ तक तो ठीक है पर यदि मुख पर आँचल दे के हँसे तब तो फिर ऊपर वाला ही मालिक है। समझ लीजिये कि आपकी पूरी किरकिरी हो चुकी है या फिर होने वाली है। अब देखिये न, माता पार्वती जी भी तो अपने स्वामी भगवान शंकर के सम्मुख मुख में आँचल दे कर हँस रही हैं:

"भभूत लगावत शंकर को अहि-लोचन मध्य परौ झरि कै।
अहि की फुँफकार लगी शशि को तब अमृत बूँद गिरौ चिरि कै।
तेहि ठौर रहे मृगराज तुचाधर तब गर्जत भे वे चले उठि कै।
सुरभी सुत वाहन भाग चले तब गौरि हँसीं मुख आँचल दै॥"


अर्थात् पार्वती जी के द्वारा भगवान शंकर के ललाट में भभूत लगाते समय जरा सा भभूत झर कर (शिव जी के वक्ष से लिपटे हुये सर्प की आँखों में) पड़ा। (आँखों में भभूत पड़ जाने के कारण निकली हुई) सर्प की फुँफकार (भगवान शंकर के माथे में शोभित) चन्द्रमा को लगी और (फुँफकार लगने से चन्द्रमा के काँप जाने से उसके भीतर स्थित) अमृत बूँद छलक कर गिरा। वहाँ पर (शिव जी के आसन के रूप में) मृगचर्म था जो कि (गिरे हुये अमृत के प्रभाव से जीवित होकर) उठ कर गर्जना करते हुये चला। (सिंह की गर्जना सुन कर) गाय का पुत्र बैल जो कि शंकर जी का वाहन है भागा तब गौरी जी अपने मुख पर आँचल दे कर हँसीं। (मानो कह रही हों देखो मेरे वाहन से डर कर आपका वाहन कैसे भाग रहा है! - पार्वती जी का एक रूप दुर्गा होने से सिंह उनका वाहन हुआ।)

तो साहब, हँसी-ठिठोली, हास-परिहास। घात-प्रतिघात, ब्याज-स्तुति, ब्याज-निंदा तो चलते ही रहते हैं। ये सब न हों तो जीवन में रस ही क्या रह जाता है?

एक बात तो माननी ही पड़ेगी, पत्नी चाहे पति को गुलाम बनाये या चाहे पति की गुलामी करे, होती वह सच्चा साथी है। जीवन के सारे सुख-दुःख में साथ निभाने वाली। वैसे भी जग विदित है कि संसार में निस्वार्थ भाव से सिर्फ दो लोग ही साथ निभाते हैं और वे हैं (1) माँ और (2) पत्नी। माँ का साथ तो पत्नी के साथ की अपेक्षा स्वाभाविक रूप से कम कम ही मिल पाता है अतः जीवन के अन्तिम क्षणों तक साथ केवल पत्नी ही निभाती है। तो बन्धु, पत्नी पुराण की नसीहत को याद रखकर यदि आप पत्नी से मधुर सम्बन्ध बनाये रखेंगे तो मैं गारंटी के साथ कह सकता हूँ कि हमेशा सुखी ही रहेंगे।

'अवधिया' या संसार में, मतलब के सब यार।
पत्नी ही बस साथ दे, बाकी रिश्ते बेकार॥

(नोटः मूलतः हम कवि नहीं हैं इसलिए उपरोक्त दोहे में मात्रा की गलती हमारे लिए क्षम्य है, हम जानते हैं कि दोहे के प्रथम और तृतीय चरणों में तेरह-तेरह और द्वितीय तथा चतुर्थ चरणों में ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होनी चाहिए किन्तु हमारे इस दोहे के प्रथम और तृतीय चरणों में चौदह-बारह और द्वितीय तथा चतुर्थ चरणों में ग्यारह-बारह मात्राएँ हैं।)

Wednesday, February 23, 2011

जरूरी तो नहीं कि प्रत्येक पति जोरू का गुलाम हो

अब पत्नी चाहे अवधिया जी की हो, चाहे पात्रो जी की हो, चाहे गुप्ता जी की हो या चाहे किसी अन्य व्यक्ति की हो, सभी में एक समानता तो जरूर पाई जाती है। वे सभी चाहती हैं कि अपने पति को अपनी मुट्ठी में ही रखें। और 99.99% पत्नियाँ अपने इस उद्देश्य में सफल रहती हैं। आप पूछेंगे कि 0.01% क्यों सफल नहीं हो पातीं? तो भैया अब यदि हम पत्नी पुराण लिखने बैठे हैं तो तो क्या 100% पतियों को जोरू का गुलाम बना दें? अरे नहीं भइ, ये पतियों के प्रति एकदम अन्याय हो जायेगा। हम समझते हैं कि कम से कम 0.01% पतियों को भी इस बात का श्रेय दिया जाये कि वे इस तथ्य को अच्छी प्रकार से समझते हैं कि उनकी पत्नियाँ उन्हें अपनी मुट्ठी में रखना चाहती हैं और वे बचने के लिये स्वयं पर इतनी चिकनाई लगा कर रखते हैं कि मुट्ठी में आते ही वे फिसल के बाहर निकल आयें।

हम जानते हैं कि दूसरा प्रश्न आपके दिमाग में कुलबुला रहा है और आप पूछेंगे कि लेखक की पत्नी किस श्रेणी में आती हैं, 99.99% वाली श्रेणी में या 0.01% वाली में? तो जवाब सुन कर खुश हो जाइये कि वे भी उसी श्रेणी में आती हैं जिस श्रेणी में आपकी श्रीमती जी आती हैं। अब आप इससे अधिक खुलासा करने के लिये मत आग्रह कीजियेगा क्योंकि यदि आप आग्रह करेंगे भी तो हम इससे अधिक खुलासा नहीं करने वाले।

मूलतः पत्नियाँ दो प्रकार की होती हैं पहला पति को गुलाम बना कर रखने वाली और दूसरा पति की गुलामी करने वाली। पहला प्रकार बहुतायत से पाया जाता है और दूसरा प्रकार लुप्तप्राय हो रहा है। हमें तो लगता है कि कुछ ही अरसे में दूसरा प्रकार पूरी तरह से लुप्त हो जायेगा। दूसरे प्रकार के लुप्त होने में ज्यादा योगदान आजकल के सिस्टम का ही है। पहले जाति के आधार पर बने मुहल्लों में रहने का सिस्टम था पर अब आधुनिक कालोनियों में रहने का सिस्टम हो गया है जहाँ पर अधिकांशप्राय अपने ही विभाग के सहकर्मी लोग रहा करते हैं। अब देखिये ना जब हम अपने पुराने मुहल्ले में रहते थे तो मंहगाई भत्ते का एरियर्स, बोनस आदि की राशि को बड़े मजे के साथ खुद डकार जाया करते थे, पत्नी को हवा तक नहीं लगती थी। पर जबसे हमने अपने विभाग वाली कालोनी में आकर रहना शुरू किया है ऐसा बिल्कुल नहीं कर पाते। हमारे पड़ोसी सहकर्मी की श्रीमती जी पहले ही आकर हमारी पत्नी को बता जाती हैं कि उन्हें उनके पति ने बताया है कि एक दो दिन में ही मंहगाई भत्ते के एरियर्स का पेमेन्ट होने वाला है। और हमारे आफिस से आते ही पत्नी का पहला प्रश्न होता है, "मंहगाई भत्ते का एरियर्स मिल गया क्या?" तो इस आधुनिक सिस्टम ने हमारी पत्नी को पहले प्रकार से निकाल कर दूसरे प्रकार में ला दिया है।

कालोनी में आने के शुरुवाती दौर में हम प्रत्येक इतवार को अपने माता-पिता (जो आज भी पुराने मुहल्ले में रहते हैं) से मिलने चले जाया करते थे। पर आजकल हमें हर इतवार को पत्नी के साथ उनके मायके अर्थात् अपनी ससुराल में जाना पड़ता है क्योंकि कालोनी के अधिकांश निवासियों के द्वारा इसी प्रथा को निभाया जाता है। जब कालोनी के सभी परिवारों में यही रिवाज है तो क्या हमारी पत्नी इस रिवाज से दूर रह कर कालोनी में अपमानित होना पसंद करेंगीं?

पत्नियों के इन दो मूल प्रकारों से हट कर एक और प्रकार की पत्नी भी कभी हुआ करती थीं जो अपने पति को कह देती थीं:

"लाज न आवत आपको, दौरे आयहु साथ।
धिक् धिक् ऐसे प्रेम को, कहा कहौं मैं नाथ॥
अस्थिचर्ममय देह यह, ता पर ऐसी प्रीति।
तिसु आधो रघुबीरपद, तो न होति भवभीति॥"

पर साहब, पत्नी का वह प्रकार एक अपवाद था।

लिखना तो अभी और भी बहुत कुछ चाहता था पर फिलहाल यहीं समाप्त करना पड़ रहा है क्योंकि पत्नी का पड़ोस से वापस आने का समय हो गया है। चलिये बाकी बातें किसी और दिन लिख देंगे यदि पत्नी ने इजाजत दी तो।

Tuesday, February 22, 2011

संविधान की बन्दिनी


(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

अशोक वाटिका में बन्दिनी सीता-
सहमी थी राक्षसियों से घिरी हुई,
आज हिन्दी बन्दिनी है संविधान में,
अन्य भाषाओं की हुंकार से डरी हुई।

हिन्दी जब संविधान की बन्दिनी नहीं थी-
तब अरबी-फारसी ने उसे खूब नोचा
फिर गौरांगिनी अंग्रेजी ने-
उसे जी भर कर दबोचा।
आज भी अंग्रेजी हिन्दी को निगल रही है
इसी बहाने भारतीयों की मूर्खता उगल रही है।

उन दिनों-
नागरी प्रचारिणी जैसी हिन्दी संस्थाओं ने
हिन्दी के उद्धार का बीड़ा उठाया था-
सतत् अथक परिश्रम के श्रम कण से
राष्ट्रभाषा हिन्दी को आगे बढ़ाया था।

पर आज, शासन की कैद में पा कर हिन्दी को
हिन्दी संस्थाएँ भी मौन हैं,
समझ में नहीं आता कि
राष्ट्रभाषा को उसका उचित स्थान
दिलाने वाला कौन है!

हम अन्य भाषा भाषियों पर दोष मढ़ते हैं
पर हम हिन्दी के हिमायती कान्वेण्ट प्रेमी
हिन्दी का गहन अध्ययन कब करते हैं!
'हिन्दी का व्याकरण नहीं है' सुनकर भी,
हिन्दी भाषियों की शर्म नहीं जागती-
और हमारे अंग्रेजी प्रेम की श्रद्दा नहीं भागती।

संविधान की बन्दिनी हिन्दी देवकी का
हिन्दी उद्धारक कृष्ण कब अवतरेगा,
और हिन्दी में गम्भीर विचारों से
राष्ट्र का कोना-कोना कब भरेगा?
हिन्दी विरोधियों का वर्तमान राष्ट्र विरोध,
किस शुभ घड़ी में मरेगा?

हमारे शासकीय कार्यालयों में ही,
जब हिन्दी का प्रयोग नहीं होता है,
तब हम यही जानते हैं कि राष्ट्र में,
हिन्दी प्रचार का राजकीय प्रयोग
खर्राटे ले कर कुम्भकर्णी नींद सोता है।

कौन जाने कब वह मुहूर्त आवेगा
जब कट्टरता से हिन्दी में शासन चलेगा,
या फिर हमारे हृदयों में
निकम्मे संविधान का सम्मान जलेगा।
निकम्मे संविधान का सम्मान जलेगा।

(रचना तिथिः शनिवार 16-09-1986)

Monday, February 21, 2011

राष्ट्रभाषा के उद्‍गार

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

मैं राष्ट्रभाषा हूँ -
इसी देश की राष्ट्रभाषा, भारत की राष्ट्रभाषा

संविधान-जनित, सीमित संविधान में,
अड़तिस वर्षों से रौंदी एक निराशा
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।
तुलसी, सूर, कबीर, जायसी,
मीरा के भजनों की भाषा,
भारत की संस्कृति का स्पन्दन,
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

स्वाधीन देश की मैं परिभाषा-
पर पूछ रही हूँ जन जन से-
वर्तमान में किस हिन्दुस्तानी
की हूँ मैं अभिलाषा?
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

चले गये गौरांग देश से,
पर गौरांगी छोड़ गये
अंग्रेजी गौरांगी के चक्कर में,
भारत का मन मोड़ गये
मैं अंग्रेजी के शिविर की बन्दिनी
अपने ही घर में एक दुराशा
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

मान लिया अंग्रेजी के शब्द अनेकों,
राष्ट्रव्यापी बन रुके हुये हैं,
पर क्या शब्दों से भाषा निर्मित होती है?
तब क्यों अंग्रेजी के प्रति हम झुके हये हैं?
ले लो अंग्रेजी के शब्दों को-
और मिला दो मुझमें,
पर वाक्य-विन्यास रखो हिन्दी का,
तो, वो राष्ट्र! आयेगा गौरव तुझमें।

'वी हायस्ट नेशनल फ्लैग एण्ड सिंग
नेशनल सांग के बदले
अगर बोलो और लिखो कि
हम नेशनल फ्लैग फहराते-
और नेशनल एन्थीम गाते हैं-
तो भी मै ही होउँगी-
नये रूप में भारत की राष्ट्रभाषा
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

मैं हूँ राष्ट्रभाषा
मैं इसी देश की राष्ट्रभाषा।

(रचना तिथिः गुरुवार 15-08-1985)

Sunday, February 20, 2011

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 19 (Hindi Proverbs)

प्रस्तुत हैं हिन्दी की कुछ लोकोक्तियाँ तथा मुहावरे और उनके अर्थ। उनके अर्थ मैंने अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार बनाए हैं और उनमें त्रुटि की सम्भावना है अतः यदि आपको त्रुटियाँ नजर आएँ तो कृपया टिप्पणी करके सही अर्थ बताने का कष्ट करें।


तबेले की बला बंदर के सिर

अर्थः अपना अपराध दूसरे के सिर मढ़ना।

तन को कपड़ा न पेट को रोटी

अर्थः अत्यन्त दरिद्र।

तलवार का खेत हरा नहीं होता

अर्थः अत्याचार का फल अच्छा नहीं होता।

ताली दोनों हाथों से बजती है

अर्थः केवल एक पक्ष होने से लड़ाई नहीं हो सकती।

तिरिया बिन तो नर है ऐसा, राह बटाऊ होवे जैसा

अर्थः स्त्री के बिना पुरूष अधूरा होता है।

तीन बुलाए तेरह आए, दे दाल में पानी

अर्थः समय आ पड़े तो साधन निकाल लेना पड़ता है।

तीन में न तेरह में

अर्थः निष्पक्ष होना।

तेरी करनी तेरे आगे, मेरी करनी मेरे आगे

अर्थः सबको अपने-अपने कर्म का फल भुगतना ही पड़ता है।

तुम्हारे मुँह में घी शक्कर

अर्थः शुभ सन्देश।

तुरत दान महाकल्याण,

अर्थः काम को तत्काल निबटाना।

तू डाल-डाल मैं पात-पात

अर्थः चालाक के साथ चालाकी चलना।

तेल तिलों से ही निकलता है

अर्थः सामर्थ्यवान व्यक्ति से ही प्राप्ति होती है।

तेल देखो तेल की धार देखो

अर्थः धैर्य से काम लेना।

तेल न मिठाई, चूल्हे धरी कड़ाही

अर्थः दिखावा करना।

तेली का तेल जले, मशालची की छाती फटे

अर्थः दान कोई करे कुढ़न दूसरे को हो।

तेली के बैल को घर ही पचास कोस

अर्थः घर में रहने पर भी अक्ल का अंधा कष्ट ही भोगता है।

तेली खसम किया, फिर भी रूखा खाया

अर्थः सामर्थ्यतवान की शरण में रहकर भी दु:ख उठाना।

Saturday, February 19, 2011

"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" हिन्दी ईपुस्तिका - नया डाउनलोड लिंक

मुझे ज्ञात हुआ है कि मेरे बहुत से पाठक "संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" हिन्दी ईपुस्तिका को पिछले डाउनलोड लिंक से डाउनलोड नहीं कर पा रहे हैं अतः मैं उसे डाउनलोड करने के लिए एक नया लिंक नीचे दे रहा हूँ ताकि आप इसे आसानी के साथ डाउनलोड कर सकें, लिंक हैः

"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" हिन्दी ईपुस्तक


आपको हुई असुविधा के लिए खेद है। आशा है कि इस नए लिंक से डाउनलोड करने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होगी। यदि किसी प्रकार की कठिनाई उपस्थित होती है तो कृपया मुझसे मेरे ईमेल  पर संपर्क करें।

डाउनलोड करने के बाद पहले फोल्डर को अनजिप करें और उसके बाद फोल्डर के भीतर के फाइलों को भी अनजिप करें ताकि वे फाइल एक्रोबेट रीडर द्वारा पढ़े जा सकें। ध्यान रहे कि इन हिन्दी ईपुस्तिओं को पढ़ने के लिए एक्रोबेट रीडर का होना आवश्यक है। जिनके कम्प्यूटर में एक्रोबेट रीडर नहीं है वे लोग इसे एडोब के साइट से मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं।

संस्कृत सुभाषित - हिन्दी अर्थ - 9

सुभाषित शब्द "सु" और "भाषित" के मेल से बना है जिसका अर्थ है "सुन्दर भाषा में कहा गया"। संस्कृत के सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं।

व्यसने मित्रपरीक्षा शूरपरीक्षा रणाङ्गणे भवति।
विनये भृत्यपरीक्षा दानपरीक्षाच दुर्भिक्षे॥८१॥


खराब समय आने पर मित्र की परीक्षा होती है, युद्धस्थल में शूरवीर की परीक्षा होती है, नौकर की परीक्षा विनय से होती है और दान की परीक्षा अकाल पड़ने पर होती है।

राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञः पापं पुरोहितः।
भर्ता च स्त्रीकृतं पापं शिष्य पापं गुरस्था॥८२॥


राष्ट्र के अहित का जिम्मेदार राजा का पाप होता है, राजा के पाप का जिम्मेदार उसका पुरोहित (मन्त्रीगण) होता है, स्त्री के गलत कार्य का जिम्मेदार उसका पति होता है और शिष्य के पाप का जिम्मेदार गुरु होता है।

पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम्।
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद् धनम्॥८३॥


ज्ञान यदि पुस्तक में ही रहे (अर्थात् उसे पढ़ा न जाए) और स्वयं का धन यदि किसी अन्य के हाथों में हो तो आवश्यकता पड़ने पर उस ज्ञान और धन का उपयोग नहीं नहीं किया जा सकता।

अधमाः धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः।
उत्तमाः मामिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्॥८४॥


निम्न वर्ग का व्यक्ति केवल धन की इच्छा रखता है, मध्यम वर्ग का व्यक्ति धन और मान दोनों की ही इच्छा रखता है और उत्तम वर्ग का व्यक्ति केवल मान-सम्मान की इच्छा रखता है। मान-सम्मान का धन से अधिक महत्व होता है।

अतितृष्णा न कर्तव्या तृष्णां नैव परित्यजेत्।
शनैः शनैश्च भोक्व्यं स्वयं वित्तमुपार्जितम्॥८५॥


बहुत अधिक इच्छाएँ करना सही नहीं है और इच्छाओं का त्याग कर देना भी सही नहीं है। अपने उपार्जित (कमाए हुए) धन के अनुरूप ही इच्छा करना चाहिए वह भी एक बार में नहीं बल्कि धीरे धीरे।

यहाँ पर उल्लेखनीय है कि आज का बाजारवाद हमें उपरोक्त सीख से उल्टा करने की ही प्रेरणा देता है, बाजारवादद के कारण ही एक बार में ही अनेक और अपने द्वारा कमाए गए धन से अधिक इच्छा करके अपने सामर्थ्य से अधिक का सामान, वह भी विलासिता लेने को हम उचित समझने लगे हैं, भले ही उसके लिए हमें कर्ज में डूब जाना पड़े।

वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तेषु भोजनम्।
वृथा दानं धनाढ्येषु वृथा दीपो दिवाऽपि च॥८६॥


समुद्र में हुई वर्षा का कोई मतलब नहीं होता, भरपेट खाकर तृप्त हुए व्यक्ति को भोजन कराने का कोई मतलब नहीं होता, धनाढ्य व्यक्ति को दान देने का कोई मतलब नहीं होता और सूर्य के प्रकाश में दिया जलाने का कोई मतलब नहीं होता।

पबन्ति नद्यः स्वयं एव न अम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः।
न अदन्ति सस्य खलु वारिवाहा परोपकाराय सतां विभतयः॥८७॥


नदी स्वयं के जल को नहीं पीती, वृक्ष स्वयं के फल को नहीं खाते और बादल अपने द्वारा पानी बरसा कर पैदा किए गए अन्न को नहीं खाते। सज्जन हमेशा परोपकार ही करते हैं।

इसी को रहीम कवि ने इस प्रकार से कहा हैः

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥

महाजनस्य संसर्गः कस्य नोन्नतिकारकः।
पद्मपत्रस्थितं तोयं धत्ते मुक्ताफलश्रियम्॥८८॥


महान व्यक्तियों की संगति किसे उन्नति प्रदान नहीं करती? (अर्थात् महान व्यक्तियों की संगति से उन्नति ही होती है।) कमल के फूल पर पानी की बूंद मोती के समान दिखने लगता है (अर्थात् कमल की संगत से पानी मोती बन जाता है।)

स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा।
सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम्॥८९॥


उपदेश देकर किसी के स्वभाव को बदला नहीं जा सकता, पानी को कितना भी गरम करो, कुछ समय बाद वह फिर से ठंडा हो ही जाता है।

दानेन तुल्यो विधिरास्ति नान्यो लोभोच नान्योस्ति रिपुः पृथिव्यां।
विभूषणं शीलसमं च नान्यत् सन्तोषतुल्यं धमस्ति नान्य्॥९०॥


दान के समान अन्य कोई अच्छा कर्म नहीं है, लोभ के समान इस पृथ्वी पर कोई अन्य शत्रु नहीं है, शील के समान कोई गहना नहीं है और सन्तोष के समान कोई धन नहीं है।

Friday, February 18, 2011

संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण हिन्दी ईपुस्तक मुफ्त डाउनलोड करें ("Sankshipt Valimiki Ramayan" Hindi Ebook - Free download)

रामायण की लोकप्रियता समस्त संसार में सदा से ही रही है और राम संसार भर के बहुत सारे लोगों के आदर्श रहे हैं। आदिकवि वाल्मीकि रचित रामायण एक अत्यन्त महत्वपूर्ण महाकाव्य है। इस महाकाव्य को सभी व्यक्ति हिन्दी में पढ़ सकें इस बात को ध्यान में रखकर हमने इसका संक्षिप्तीकरण करके इसे ईपुस्तक ("Sankshipt Valimiki Ramayan" Hindi Ebook) का रूप दिया है जो कि रामायण के सात काण्डों के अनुसार सात भागों में है। आप इन ईपुस्तकों को बिल्कुल मुफ्त डाउनलोड कर सकते हैं, डाउनलोड के लिंक्स नीचे दिए जा रहे हैं:

संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण - बालकाण्ड
संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण - अयोध्याकाण्ड
संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण - अरण्यकाण्ड
संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण - किष्किन्धाकाण्ड
संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण - सुन्दरकाण्ड
संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण - युद्धकाण्ड
संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण - उत्तरकाण्ड

रामायण के विषय में प्रसिद्ध है कि रामायण महाकाव्य आयु तथा सौभाग्य को बढ़ाता है और पापों का नाश करता है। इसका नियमित पाठ करने से मनुष्य की सभी कामनाएँ पूरी होती हैं और अन्त में परमधाम की प्राप्ति होती है। सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में एक भार स्वर्ण का दान करने से जो फल मिलता है, वही फल प्रतिदिन रामायण का पाठ करने या सुनने से होता है। यह रामायण काव्य गायत्री का स्वरूप है। यह चरित्र धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों को देने वाला है। इस प्रकार इस पुरान महाकाव्य का आप श्रद्धा और विश्‍वास के साथ नियमपूर्वक पाठ करें। आपका कल्याण होगा।

आशा है कि आपको हमारा यह प्रयास अवश्य ही पसंद आया होगा।

"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" हिन्दी ईपुस्तक ("Sankshipt Valimiki Ramayan" Hindi Ebook - Free download) डाउनलोड करने के लिए अग्रिम धन्यवाद!

Thursday, February 17, 2011

ऋतुराज वसन्त


(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

निर्मल नभ, मन्द पवन,
पुष्प-गन्ध की व्यापकता,
खग-कलरव, उन्मन भव,
मत्त मदन की मादकता।

अलि गण गुंजन, मुकुलित चुम्बन,
अमराई में मंजरि जाल,
रक्तिम टेसू, अग्नि अन्देशू,
विरह वह्नि की भीषण ज्वाल।

सरसों का पीताम्बर,
अभ्रहीन नीलाम्बर,
उन्मन उन्मन सबका मन,
शीतल निर्झर, कोकिल का स्वर,
ऋतु वसन्त का अनमोल रतन।

(रचना तिथिः रविवार 15-02-1981)

Wednesday, February 16, 2011

हम चाहते तो हैं कि भ्रष्टाचार हट जाए तो फिर भ्रष्टाचार आखिर हटता क्यों नहीं?

हममें से कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जो न चाहे कि भ्रष्टाचार हट जाए। हम सभी यही कामना करते हैं कि हमारे देश मे भ्रष्टाचार का पूर्ण रूप से नाश हो जाए।

तो प्रश्न यह उठता है कि आखिर भ्रष्टाचार हटता क्यों नहीं?

और इस प्रश्न का सीधा सा जवाब यही है कि हम केवल चाहते है कि भ्रष्टाचार हट जाए किन्तु भ्रष्टाचार को हटाने के लिए हम स्वयं कुछ भी प्रयास नहीं करते। हम सोचते हैं कि कोई दैवी चमत्कार हो जाए, किसी महान व्यक्ति का अभ्युदय हो जाए जो भ्रष्टाचार को हटा दे, हम जानते हैं कि हमारे नेता भ्रष्ट हैं किन्तु हम उन्हीं से उम्मीद रखते हैं कि वे भ्रष्टाचार को हटा दे।

पर क्या केवल सोच ही लेने से कोई कार्य सिद्ध हो जाता है? कार्य को सिद्ध करने के लिए परिश्रम करना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है; कहा भी गया हैः

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्यणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मगाः॥

(जिस प्रकार से सोये हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं चले जाते, सिंह को क्षुधा-शान्ति के लिए शिकार करना ही पड़ता है, उसी प्रकार से किसी कार्य की मात्र इच्छा कर लेने से वह कार्य सिद्ध नहीं हो जाता, कार्य उद्यम करने से ही सिद्ध होता है।)

भ्रष्टाचार हटाने के लिए हम स्वयं तो कोशिश करते ही नहीं पर यदि कोई अन्य इसके लिए प्रयास कर रहा हो तो हम उसका साथ तक देने की जहमत नहीं उठाते। हम यही सोचते हैं कि "कौन फालतू की बला मोल ले?" "कौन खुद को मुसीबत में डाले?" "हमें इससे क्या करना है?" "हमने क्या भ्रष्टाचार मिटाने का ठेका ले रखा है?" और भी कई ऐसी बातें सोच लेते हैं हम और भ्रष्टाचार मिटाने वाले को किंचितमात्र सहयोग तक नहीं देते। परिणाम यह होता है कि भ्रष्टाचार मिटाने में प्रयासरत वह अन्य व्यक्ति अन्त-पन्त पूर्णतः निराश होकर प्रयास करना बन्द कर देता है।

अनेक बार तो हम अपने स्वार्थ और सुविधा के लिए स्वयं ही भ्रष्टाचार करने लगते हैं जैसे कि यदि हम रेल से यात्रा कर रहे हैं और हमारे लिए बर्थ का रिजर्वेशन नहीं हो पाया है तो टीटी को हम स्वयं ही अधिक रुपये देकर बर्थ पाने की कोशिश करने लगते हैं। क्या हमारा यह कार्य भ्रष्टता की सीमा में नहीं आता? हमारे मकान का नक्शा जल्दी स्वीकृत कराने के लिए स्वयं जाकर घूस देने का प्रस्ताव करते हैं, यह जानते हुए भी कि घूस लेना जितना बड़ा भ्रष्टाचार है, घूस देना भी उतना ही बड़ा भ्रष्टाचार है।

सच बात तो यह है कि हमें ऐसी शिक्षा ही नहीं मिली है जो हमें गलत कार्य करने से रोके। पाश्चात्य नीतियों पर आधारित हमारे देश की शिक्षा ने हमें घोर स्वार्थी और सुविधाभोगी बना कर रख दिया है। ऐसे में हमारे देश से भ्रष्टाचार कैसे मिट सकेगा?

Tuesday, February 15, 2011

भारतीय कहानियाँ

मनोरंजन मनुष्य की एक स्वाभाविक आवश्यकता है। दिनभर काम करने के कारण शरीर में जो थकान उत्पन्न होती है उसे दूर करने के लिए जितनी भरपूर नींद जरूरी है उतना ही जरूरी मनोरंजन भी है। आज हमारे पास सिनेमा, टीवी, सीडी और डीवीडी जैसे मनोरंजन के अनेक साधन उपलब्ध हैं किन्तु एक जमाना वह भी था जब ये सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं। उस जमाने में लोगों के मनोरंजन का एक मात्र साधन था आपस में मिलजुल कर बैठना तथा किस्से कहानी कहकर, फाग आदि लोकगीत और संगीत गा-बजाकर, रामलीला, कृष्णलीला या नाटक देखकर मन बहलाना।

वर्तमान दिनों में उपलब्ध आधुनिक सुविधाएँ यद्यपि हमारा मनोरंजन तो करती हैं किन्तु इन्होंने हमें स्वयं तक सीमित तथा आत्म-केन्द्रित बनाकर रख दिया है। आज किसी को किसी की कुछ परवाह ही नहीं है, यदि कोई मिल गया तो हँस-बोल लिए और यदि न मिला तो कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारा आपसी मेल-जोल समाप्त होता जा रहा है जिसके परिणामस्वरूप हमारा सामाजिक रूप से परस्पर हेल-मेल और प्रेम-स्नेह समाप्तप्राय होते जा रहा है।

अस्तु, हम पुराने जमाने की बात कर रहे थे। उस जमाने में भी गीत संगीत और नाटक आदि के अवसर सीमित होते थे क्योंकि फाग केवल होली के समय गाया जाता था और रामलीला, कृष्णलीला आदि की निश्चित दिनों की अवधि हुआ करती थी, ऐसे में किस्सा कहानी कहना और सुनना ही लोगों के मनोरंजन का मुख्य साधन हुआ करता था। एक आदमी किस्सा सुनाने वाला होता था और बाकी सुनने वाले। किस्सा सुनाने वालों की अपनी-अपनी विशिष्ट शैली हुआ करती थी जो लोगों को बाँध कर रख दिया करती थी। मुझे आज भी याद है कि मेरे बचपन के दिनों में सारे बच्चे एक खोंचे वाले को चारों ओर से घेर कर घंटों इसीलिए बैठे रहते थे कि वह सुखसागर, आल्हा-ऊदल आदि की कहानियाँ बड़े ही रोचक ढंग से सुनाया करता था। प्रतिदिन रात को जब तक मेरी दादी मुझे कहानियाँ न सुनातीं, मैं सोता ही नहीं था। उनके मुख से सुनी हुईं अनेक पौराणिक कहानियाँ आज भी मुझे याद हैं।

भारत में किस्से-कहानियों का प्रचलन अत्यन्त प्राचीनकाल से चला आ रहा है और भारत में कथा-साहित्य का स्थान हमेशा से ही उच्च रहा है। ऋग्वेद, विभिन्न ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषद, महाभारत, रामायण आदि वैदिक ग्रन्थों में वर्णित अनेक आख्यान वैदिक काल में कहानियों की लोकप्रियता के प्रतीक हैं। कहानियों की लोकप्रियता के कारण ही सिंहासनद्वात्रिंशतिका (सिंहासन बत्तीसी), वेतालपंचविंशतिका (बैताल पच्चीसी), हितोपदेश, पञ्चतन्त्र, आदि ग्रंथों की रचना हुईं। भारत की इन्हीं कहानियों से प्रभावित होकर अरबी-फारसी में हातिमताई, अलिफ-लैला (अरेबियन नाइट्स) आदि कहानियाँ लिखी गईं। हातिमताई, अलिफ-लैला जैसी अरबी कहानियों में तो एक कहानी के भीतर दूसरी, दूसरी के भीतर तीसरी जैसी कई कहानियों की श्रृंखला ही बनी हुई है।

सामान्यतः आख्यान अर्थात् कहानी का उद्गम भारत को ही माना जाता है और भारत की कहानियों से ही प्रभावित होकर ग्रीस, रोम, अरब, फ़ारस, अफ्रीका आदि देशों में भी कहानी रचने का प्रचलन हुआ। ऐसी बात नहीं है कि विदेशी कहानियों से भारत प्रभावित ही नहीं हुआ, भारत में भी अनेक विदेशी कहानियों ने आकर अपने आपको भारतीय रूप ढाला है। कालान्तर में, भारत में अंग्रेजों के शासन हो जाने के कारण, भारत की कहानियाँ अंग्रेजी के शॉर्ट स्टोरीज़ से बहुत अधिक प्रभावित हुईं।

Monday, February 14, 2011

प्राचीन भारत में गणित (Mathematics in ancient India)

प्राचीन आचार्यों ने धार्मिक अनुष्ठानों को के आयोजन के लिए विशिष्ट तिथियाँ नियत किया था जिनकी गणना के लिए ज्योतिष अर्थात् खगोल शास्त्र (Astronomy) का सम्पूर्ण ज्ञान आवश्यक था और खगोलीय गणनाएँ गणित के ज्ञान के बिना असम्भव थीं। इसी प्रकार से विभिन्न यज्ञों के लिए वेदियों का त्रिभुज, चतुर्भुज, षट्भुज, अष्टभुज, वृताकार आदि विभिन्न आकार में बनाने का विधान था जिसके लिए अंकगणित (arithmetic), बीजगणित (algebra), ज्यामिति (geometry),  त्रिकोणमिति (trignometry) आदि का ज्ञान होना अत्यावश्यक था। यही कारण है कि भारत में गणित का प्रचलन वैदिक काल से ही चला आ रहा है। वेदों के उपग्रन्थ शुल्बसूत्र में गणित के अनेक सूत्र पाए जाते हैं। प्राचीन भारत में अंकगणित (arithmetic), बीजगणित (algebra), ज्यामिति (geometry),  त्रिकोणमिति (trignometry) आदि गणित के अनेक विभागों में बहुत अधिक विकास हुआ था। आज जिसे स्कूलों में "पाइथागोरस साध्य" (Pythagoras' Theorem) के नाम से पढ़ाया जाता है उसके विषय में पाइथागोरस से हजारों साल पूर्व हमारे देश के आचार्यों को जानकारी थी और उसके प्रयोग का विवरण बोधायन के शुल्बसूत्र में मिलता है।

सिंधु घाटी की सभ्यता (ई.पू. 2500 ई.पू. 1700 तक) के अवशेष भी भारत में गणित के ज्ञान होने को ही इंगित करते हैं। खुदाई में मिले मकानों का निर्माण पूर्णतः गणितीय विधियों के आधार पर ही हुआ था। हड़प्पा के निवासियों ने नापतौल (weights and measures) की एक विशिष्ट पद्धति का विकास कर लिया था और अंकों के दशमलव पद्धति से पूर्णतः परिचित थे। लंबाई को नापने के लिए उन्होंने विभिन्न प्रकार की इकाइयों की खोज कर ली थीं। उस जमाने का एक इंडस इंच आज के1.32 इंच (3.35 से.मी.) के बराबर हुआ करता था और उसका दसगुना अर्थात् 13.2 इंच के बराबर उनका एक फुट होता था। खुदाई में मिले एक कांसे की पट्टी (bronze rod) पर 0.367 इंच की दूरियों पर निशान बने मिले हैं जिससे यह जानकारी मिलती है कि 36.7 इंच की सौ इकाइयों वाली लंबाई नापने की उनके पास एक और पद्धति थी। उस स्केल पर बने निशानों की बराबर दूरी की विशुद्धता ने आज के विद्वानों को आश्चर्य में डाल रखा है।

प्राचीन वैदिक धर्म के क्षय होने के बाद से ईसा पश्चात् 500 तक का समय भारतीय गणित का अन्धकारमय समय माना जाता है। इस अन्धकारपूर्ण समय के व्यतीत हो जाने के आर्यभट्ट प्रथम ने भारत के प्राचीन गणित को पुनः एक नई दिशा देने का कार्य किया। आर्यभट्ट ने खगोल विद्या के एक नये युग का आरम्भ करते हुए सूर्य तथा चन्द्र ग्रहणों को समझने के लिए नए सिद्धान्त दिए तथा खगोलीय गणना को त्रिकोणमिति द्वारा करने कि विधि का विकास किया। आर्यभट्ट ने ही कुसुमपुर में गणित के केन्द्र की स्थापना की जहाँ पर गणित तथा खगोल शास्त्र के विभिन्न विषयों पर शोधकार्य हुआ करता था। उस काल में भारत में उज्जैन भी गणित का एक बहुत बड़ा केन्द्र था। वाराहमिहिर जैसे गणित के प्रकाण्ड पण्डित उज्जैन केन्द्र से ही सम्बन्धित थे। ईसा पश्चात् सातवीं शताब्दी में ब्रह्मगुप्त उज्जैन केन्द्र के एक और आधारस्तम्भ बने जिन्होनें अंकप्रणाली में बहुत से महत्वपूर्ण विकास के कार्य किया।

आर्यभट्ट प्रथम के समय से लगभग ईसा पश्चात् 150 तक के समय में  विभिन्न गणितज्ञों ने संख्या के सिद्धान्त (theory of numbers), अंकगणित कार्यप्रणाली  (arithmetical operations) ज्यामिति  (geometry), भिन्न कार्यप्रणाली (operations with fractions), सामान्य समीकरण (simple equations), क्यूबिक समीकरण (cubic equations), क्वार्टिक समीकरण (quartic equations), क्रमचय और संचय (permutations and combinations) जैसे गणित के विभिन्न विषयों में उल्लेखनीय कार्य किया। इसी दौरान भारतीय गणितज्ञों ने अनन्त के सिद्धान्त (theory of the infinite), जिसमें विभिन्न श्रेणी सापेक्षिक स्तर के अनन्त (different levels of infinity) शामिल थे, का आश्चर्यजनक रूप से विकास कर लिया, यहाँ तक कि 2 के आधार वाला लघुगुणक logarithms to base 2 तक को भी समझ लिया।

प्राचीन भारतीय ग्रंथों का शोधपूर्ण अध्ययन से प्राचीन भारतीय गणित तथा विज्ञान के विषय में और भी बहुत सारी महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की भरपूर सम्भावनाएँ हैं किन्तु ये समस्त ग्रंथ संस्कृत भाषा में है और हमारे साथ विडम्बना यह है कि भारतीय होने के बावजूद भी हम संस्कृत नहीं जानते। हमारे प्राचीन विद्वानों द्वारा खोजे तथा अन्वेषित किए गए खोजों तथा आविष्कारों को उनसे कई हजारों साल बाद पुनः खोज और अन्वेषित करके पाश्चात्य विद्वानों ने उन खोजों और आविष्कारों का श्रेय प्राप्त कर लिया है और हमारे प्राचीन ऋषि-मुनि, जिन्होंने विश्व को अनेक महत्व वैज्ञानिक देन दिया है, उन श्रेय से वंचित रह गए हैं। भारत ने विश्व को क्या-क्या महत्वपूर्ण देन दिए हैं इस बात की जानकारी भी हम भारतीयों को विदेशी विद्वानों से ही मिलती है क्योंकि हम स्वयं को किसी प्रकार का अनुसन्धान करने में असफल पाते हैं। मैक्समूलर और कनिंघम जैसे अने पाश्चात्य विद्वान अपने शोधकार्यों के लिए अत्यन्त रुचि और लगन के साथ संस्कृत सीख सकते हैं किन्तु हम भारतीय नहीं।

विश्व के प्रायः समस्त विद्वान इस बात से सहमत हैं कि बौधायन, मानव, आपस्तम्ब, कात्यायन, पाणिनि, आर्यभट, वराहमिहिर, भास्कर १, ब्रह्मगुप्त, पृथूदक, हलायुध, आर्यभट २ आदि भारत प्राचीन विद्वानों के महत्वपूर्ण देन को संसार कभी भी नहीं भुला सकता।

Sunday, February 13, 2011

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 19 (Hindi Proverbs)

प्रस्तुत हैं हिन्दी की कुछ लोकोक्तियाँ तथा मुहावरे और उनके अर्थ। उनके अर्थ मैंने अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार बनाए हैं और उनमें त्रुटि की सम्भावना है अतः यदि आपको त्रुटियाँ नजर आएँ तो कृपया टिप्पणी करके सही अर्थ बताने का कष्ट करें।


तबेले की बला बंदर के सिर

अर्थः अपना अपराध दूसरे के सिर मढ़ना।

तन को कपड़ा न पेट को रोटी

अर्थः अत्यन्त दरिद्र।

तलवार का खेत हरा नहीं होता

अर्थः अत्याचार का फल अच्छा नहीं होता।

ताली दोनों हाथों से बजती है

अर्थः केवल एक पक्ष होने से लड़ाई नहीं हो सकती।

तिरिया बिन तो नर है ऐसा, राह बटाऊ होवे जैसा

अर्थः स्त्री के बिना पुरूष अधूरा होता है।

तीन बुलाए तेरह आए, दे दाल में पानी

अर्थः समय आ पड़े तो साधन निकाल लेना पड़ता है।

तीन में न तेरह में

अर्थः निष्पक्ष होना।

तेरी करनी तेरे आगे, मेरी करनी मेरे आगे

अर्थः सबको अपने-अपने कर्म का फल भुगतना ही पड़ता है।

तुम्हारे मुँह में घी शक्कर

अर्थः शुभ सन्देश।

तुरत दान महाकल्याण,

अर्थः काम को तत्काल निबटाना।

तू डाल-डाल मैं पात-पात

अर्थः चालाक के साथ चालाकी चलना।

तेल तिलों से ही निकलता है

अर्थः सामर्थ्यवान व्यक्ति से ही प्राप्ति होती है।

तेल देखो तेल की धार देखो

अर्थः धैर्य से काम लेना।

तेल न मिठाई, चूल्हे धरी कड़ाही

अर्थः दिखावा करना।

तेली का तेल जले, मशालची की छाती फटे

अर्थः दान कोई करे कुढ़न दूसरे को हो।

तेली के बैल को घर ही पचास कोस

अर्थः घर में रहने पर भी अक्ल का अंधा कष्ट ही भोगता है।

तेली खसम किया, फिर भी रूखा खाया

अर्थः सामर्थ्यतवान की शरण में रहकर भी दु:ख उठाना।

Saturday, February 12, 2011

संस्कृत सुभाषित - हिन्दी अर्थ - 8

सुभाषित शब्द "सु" और "भाषित" के मेल से बना है जिसका अर्थ है "सुन्दर भाषा में कहा गया"। संस्कृत के सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं।

गुणवन्तः क्लिश्यन्ते प्रायेण भवन्ति निर्गुणाः सुखिनः।
बन्धनमायान्ति शुकाः यथेष्टसंचारिणः काकाः॥७१॥


गुणवान को क्लेश भोगना पड़ता है और निर्गुण सुखी रहता है जैसे कि तोता अपनी सुन्दरता के गुण के कारण पिंजरे में डाल दिया जाता है किन्तु कौवा आकाश में स्वच्छन्द विचरण करता है।

नास्ति विद्यासमं चक्षुः नास्ति सत्यसमं तपः।
नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्॥७२॥


विद्या के समान कोई चक्षु (आँख) नहीं है, सत्य के समान कोई तप नहीं है, राग (वासना, कामना) के समान कोई दुःख नहीं है और त्याग के समान कोई सुख नहीं है।

त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं पुत्राश्च दाराश्च सुहृज्जनाश्च।
तमर्शवन्तं पुराश्रयन्ति अर्थो हि लोके मनुषस्य बन्धुः॥७३॥


मनुष्य के धनहीन हो जाने पर पत्नी, पुत्र, मित्र, निकट सम्बन्धी आदि सभी उसका त्याग कर देते हैं और उसके धनवान बन जाने पर वे सभी पुनः उसके आश्रय में आ जाते हैं। इस लोक में धन ही मनुष्य का बन्धु है।

कुसुमं वर्णसंपन्नं गन्धहीनं न शोभते।
न शोभते क्रियाहीनं मधुरं वचनं तथा॥७४॥


जिस प्रकार से गन्धहीन होने पर सुन्दर रंगों से सम्पन्न पुष्प शोभा नहीं देता, उसी प्रकार से अकर्मण्य होने पर मधुरभाषी व्यक्ति भी शोभा नहीं देता।

उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।
सोत्साहस्य च लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्॥७५॥


जिस व्यक्ति के भीतर उत्साह होता है वह बहुत बलवान होता है। उत्साह से बढ़कर कोई अन्य बल नहीं है, उत्साह ही परम् बल है। उत्साही व्यक्ति के लिए इस संसार में कुछ भी वस्तु दुर्लभ नहीं है।

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्।
लोचनाभ्यांविहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति॥७६॥


जिस प्रकार से अन्धे व्यक्ति के लिए दर्पण कुछ नहीं कर सकता उसी प्रकार से विवेकहीन व्यक्ति के लिए शास्त्र भी कुछ नहीं कर सकते।

विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम्।
अमित्रादपि सद्वृत्तं अमेध्यादपि कांचनम्॥७७॥


विष से भी मिले तो अमृत को स्वीकार करना चाहिए, छोटे बच्चे से भी मिले तो सुभाषित (अच्छी सीख) को स्वीकार करना चाहिए, शत्रु से भी मिले तो अच्छे गुण को स्वीकार करना चाहिए और गंदगी से भी मिले तो सोने को स्वीकार करना चाहिए।

मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना कुण्डे कुण्डे नवं पयः।
जातौ जातौ नवाचारा नवा वाणी मुखे मुखे॥७८॥


भिन्न-भिन्न मस्तिष्क में भिन्न-भिन्न मति (विचार) होती है, भिन्न-भिन्न सरोवर में भिन्न-भिन्न प्रकार का पानी होता है, भिन्न-भिन्न जाति के लोगों के भिन्न-भिन्न जीवनशैलियाँ (परम्परा, रीति-रिवाज) होती हैं और भिन्न-भिन्न मुखों से भिन्न-भिन्न वाणी निकलती है।

नरस्याभरणं रूपं रूपस्याभारणं गुनः।
गुणस्याभरणं ज्ञानं ज्ञानस्याभरणं क्षमा॥७९॥


मनुष्य का अलंकार (गहना) रूप होता है, रूप का अलंकार (गहना) गुण होता है, गुण का अलंकार (गहना) ज्ञान होता है और ज्ञान का अलंकार (गहना) क्षमा होता है।

अपूर्व कोपि कोशोयं विद्यते तव भारति।
व्ययतो वृद्धमायाति क्षयमायाति संचयात्॥८०॥


हे माता सरस्वती! आपका कोश (विद्या) बहुत ही अपूर्व है जिसे खर्च करने पर बढ़ते जाता है और संचय करने पर घटने लगता है।

इसी बात को इस प्रकार से भी कहा गया हैः

सरस्वती के भण्डार की बड़ी अपूरब बात।
ज्यौं खरचे त्यौं त्यौं बढ़े बिन खरचे घट जात॥

Friday, February 11, 2011

संस्कृत को कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग के लिए सर्वाधिक सुविधाजनक भाषा बनाने वाले प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य - पाणिनि (Panini)

पाणिनि के विषय में कुछ लिखने के पहले यह बताना अधिक उचित होगा कि जुलाई 1987 में फोर्ब्स पत्रिका (Forbes magazine) ने एक समाचार प्रकाशित किया था जिसके अनुसार “कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग के लिए संस्कृत सर्वाधिक सुविधाजनक भाषा है”।

प्रश्न यह उठता है कि आखिर संस्कृत क्यों कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर के लिए सबसे अधिक उपयुक्त भाषा है?

और उत्तर है कि कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग और संस्कृत व्याकरण में चमत्कारिक रूप से समानता पाई जाती है। इस चमत्कार के पीछे “अष्टाध्ययी” ग्रंथ की महत्वपूर्ण भूमिका है जिसकी रचना संस्कृत के महान व्याकरणाचार्य पाणिनि ने की थी। इस चमत्कार का एक परिणाम यह भी है कि नासा के शोधकर्ता भी संस्कृत को सम्भावित कम्प्यूटर भाषा के रूप में देखने लगे हैं (लिंक) ।

संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित पाणिनि के विषय में हम इतना ही जानते हैं कि उनका जन्म सिन्धु नदी के तट पर स्थित शालातुला नामक स्थान में हुआ था जो कि वर्तमान पाकिस्तान के एटॉक के पास का कस्बा है। उनके जन्म के काल के विषय में हमें निश्चित जानकारी नहीं मिलती क्योंकि विभिन्न इतिहासकार उन्हें ई.पू. चौथी से सातवीं शताब्दी तक का बताते हैं। पाणिनि ने भाषा के उच्चारण तथा आकृतियों के लिए अत्यन्त ही सूक्ष्म किन्तु वैज्ञानिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया और उनके यही सिद्धान्त आज संस्कृत भाषा को कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग के लिए सर्वाधिक उपयुक्त भाषा होने का श्रेय प्रदान कर रहे हैं। पाणिनि के अष्टाध्ययी के 4000 सूत्रों ने संस्कृत भाषा को अन्य समस्त भाषाओं से अधिक समृद्ध बना दिया है जिससे कि संस्कृत का वैज्ञानिक महत्व बढ़ गया है। संस्कृत के इसी वैज्ञानिक महत्व ने कई हजार वर्ष पूर्व भारत में गणित का विकास किया।

विडम्बना यह है कि, आज जबकि पूरे विश्व के कम्प्यूटर वैज्ञानिक संस्कृत में विशाल वैज्ञानिक सम्भावनाएँ देख रहे हैं, हमारे अपने ही देश में संस्कृत एक गौण भाषा बनकर रह गई है और उसके पुनरुत्थान के विषय में न तो सरकार सोचती है और न ही सामान्य जन।

Thursday, February 10, 2011

भारत के विषय में रोचक तथ्य (Interesting facts about India)

भारत ने अपने एक लाख वर्ष के इतिहास में कभी किसी अन्य देश पर आक्रमण नहीं किया।

पुरातात्विक अनुसन्धानों के अनुसार आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व, जब विश्व की अनेक संस्कृतियाँ कन्दराओं और घने जंगलों में निवास करती थीं, सम्पूर्ण भारत, विशेषतः सिन्धु घाटी, में एक अत्यन्त विकसित सभ्यता का आविर्भाव हो चुका था। वाल्मीकि रामायण में पाए जाने वाले अयोध्या, विशाखा, मिथिला, मलदा, करूप आदि विशाल अट्टालिकाओं, सुरम्य वाटिकाओं, साफ सुथरे चौड़े मार्गों वाले नगरों के वर्णन सिद्ध करते हैं कि भारत में इससे भी पूर्व नगरीय सभ्यता का विकास हो चुका था।

बौद्धिक खेल शतरंज का आविष्कार भारत में हुआ, शतरंज को प्राचीन भारत में चतुरंग के नाम से जाना जाता था।

बीजगणित (Algebra), त्रिकोणमिति (Trigonometry), चलन कलन (Calculus) आदि गणित के विभागों का उद्गम भारत में हुआ।

स्थान मूल्य प्रणाली (Place Value System) और दशमलव प्रणाली (Decimal System) का विकास भारत में ई.पू. 100 में हुआ।

विश्व का प्रथम गणतन्त्र वैशाली भारत में था।

संसार का पहला विश्वविद्यालय भारत के तक्षशिला में ई.पू. 700 में स्थापित हुआ जहाँ पर विश्व भर के 10,500 से भी अधिक विद्यार्थी 60 से भी अधिक विषयों का अध्ययन करते थे। चौथी शताब्दी में स्थापित नालंदा विश्वविद्यालय शिक्षा के क्षेत्र में भारत का महानतम उपलब्धि रही।

चिकित्सा के क्षेत्र में चिकित्सा की प्राचीनतम पद्धति आयुर्वद भारत की ही देन है। शल्य चिकित्सा का आरम्भ भारत से ही हुआ।

पृथ्वी के द्वारा सूर्य का एक चक्कर लगाने में लगने वाले समय की गणना हजारों साल पहले भास्कराचार्य ने कर लिया था। उनके अनुसार यह अवधि 365.258756484 दिन हैं।

बोधायन ने हजारों साल पहले "पाई" का मान ज्ञात कर लिया था।

सन् 1896 तक पूरे विश्व में भारत ही हीरे का अकेला स्रोत था।

17वीं शताब्दी तक भारत विश्व का सर्वाधिक धनाड्य देश रहा।

Wednesday, February 9, 2011

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ – 19 (Hindi Proverbs)

तबेले की बला बंदर के सिर

अर्थः अपना अपराध दूसरे के सिर मढ़ना।

तन को कपड़ा न पेट को रोटी

अर्थः अत्यन्त दरिद्र।

तलवार का खेत हरा नहीं होता

अर्थः अत्याचार का फल अच्छा नहीं होता।

ताली दोनों हाथों से बजती है

अर्थः केवल एक पक्ष होने से लड़ाई नहीं हो सकती।

तिरिया बिन तो नर है ऐसा, राह बटाऊ होवे जैसा

अर्थः स्त्री के बिना पुरूष अधूरा होता है।

तीन बुलाए तेरह आए, दे दाल में पानी

अर्थः समय आ पड़े तो साधन निकाल लेना पड़ता है।

तीन में न तेरह में

अर्थः निष्पक्ष होना।

तेरी करनी तेरे आगे, मेरी करनी मेरे आगे

अर्थः सबको अपने-अपने कर्म का फल भुगतना ही पड़ता है।

तुम्हारे मुँह में घी शक्कर

अर्थः शुभ सन्देश।

तुरत दान महाकल्याण,

अर्थः काम को तत्काल निबटाना।

तू डाल-डाल मैं पात-पात

अर्थः चालाक के साथ चालाकी चलना।

तेल तिलों से ही निकलता है

अर्थः सामर्थ्यवान व्यक्ति से ही प्राप्ति होती है।

तेल देखो तेल की धार देखो

अर्थः धैर्य से काम लेना।

तेल न मिठाई, चूल्हे धरी कड़ाही

अर्थः दिखावा करना।

तेली का तेल जले, मशालची की छाती फटे

अर्थः दान कोई करे कुढ़न दूसरे को हो।

तेली के बैल को घर ही पचास कोस

अर्थः घर में रहने पर भी अक्ल का अंधा कष्ट ही भोगता है।

तेली खसम किया, फिर भी रूखा खाया

अर्थः सामर्थ्यतवान की शरण में रहकर भी दु:ख उठाना।

Tuesday, February 8, 2011

क्यों हृदय हर्षोल्लास से भर उठता है वसन्त पंचमी के दिन

पता नहीं क्यों वसन्त पंचमी का दिन मेरे हृदय में वसन्त ऋतु के स्वागत् के लिए ललक उत्पन्न करती है। लगने लगता है कि अकस्मात ही हवा में सुगन्ध भर गया है। मुझे आज भी याद है कि स्कूल के दिनों में मैं वसन्त पंचमी के दिन ब्राह्म मुहूर्त में ही निद्रा त्यागकर उठ जाया करता था। सुबह साढ़े सात बजे के पहले स्कूल जो पहुँचना होता था। स्कूल पहुँचने के पहले नहा-धोकर तैयार भी तो होना पड़ता था न! स्कूल में माता सरस्वती की पूजा होती थी, सरस्वती वन्दना गाया जाता था -

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्दैवै:सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेष जाड्यापहा॥

(कुन्द, चन्द्र, तुषार के हार के समान गौरवपूर्ण शुभ्र वस्त्र धारण करने वाली, वीणा के सुन्दर दण्ड से सुशोभित हाथों वाली, श्वेत कमल पर विराजित, ब्रहा, विष्णु महेश आदि सभी देवों के द्वारा सर्वदा स्तुत्य, समस्त अज्ञान और जड़ता की विनाशनी देवी सरस्वती मेरी रक्षा करे।)

सरस्वती पूजा के बाद स्कूल से छुट्टी दे दी जाती थी। छुट्टी पाते ही मैं तेजी के साथ घर की ओर चल पड़ता था क्योंकि मुहल्ले में भी तो होली जलने के स्थान पर अरंड पूजा देखना जरूरी होता था। अरंड का एक पेड़ काटकर लाया जाता था और उसे मुहल्ले में होली जलने वाले स्थान पर गाड़ दिया जाता था तथा उसकी पूजा की जाती थी। नारियल फोड़कर प्रसाद बाँटा जाता था। और उसके बाद मुहल्ले के सारे रसिकजन इकट्ठे हो जाया करते थे। चौक में दरियाँ बिछा दी जाती थीं और नगाड़े, ताशे, झाँझ, मंजीरे के साथ फाग गायन शुरु हो जाता था। वक्रतुण्ड महाकाय भगवान गणेश की वन्दना से फाग आरम्भ होता था -

माँगत हौं बर दुइ कर जोरे
देहु सिद्धि कछु बुधि अधिकाय।
गणपति को मनाय प्रथम चरण गणपति को मनाय॥

गणपति को मनाने के बाद छत्तीसगढ़ के त्रिवेणी में स्थित राजीव लोचन को फाग गाकर प्रसन्न किया जाता था -

भजु राजिम लोचन नाथ हमारे पतित उधारन तुम आए।
लोक लोक के भूपति आए
तोरे चरण में सर नाए।
भजु राजिम लोचन नाथ हमारे पतित उधारन तुम आए॥

इसके बाद पूरे दिन फाग गाकर राम, कृष्ण, माता शारदा आदि विभिन्न देवी देवताओं को प्रसन्न किया जाता था।

आज बचपन की वो बातें नहीं रही हैं किन्तु वसन्त आज भी मेरे भीतर उन्माद उत्पन्न करता है और नवपल्लवित पौधों पर लदे हुए सुन्दर पुष्पों तथा आम के बौर की महक हृदय को आन्दोलित करने लगती है।

Monday, February 7, 2011

भारत में जासूसी लेखन (Detective Writing in India)

जिस प्रकार से पाश्चात्य देशों में जासूसी लेखन (Detective Writing) को अत्यधिक रुचि लेकर पढ़ा जाता रहा है उसी प्रकार से भारतीय साहित्य में भी जासूसी लेखन (Detective Writing) की लोकप्रियता रही है। शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसने सर आर्थर कानन डायल (Arthur Conan Doyle) के मशहूर पात्र "शरलॉक होम्स" के बारे में न सुना हो। आगाथा क्रिस्टी (Agatha Christie) के जासूसी उपन्यास आज भी अत्यन्त लोकप्रिय हैं। जासूसी उपन्यास के इन लेखकों की लोकप्रियता जाहिर करती है कि पाश्चात्य देशों में जासूसी लेखन (Detective Writing) को साहित्य में स्थान मिला है किन्तु भारत में जासूसी लेखन (Detective Writing) का स्थान हमेशा ही गौण रहा है। इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है बाबू देवकीनन्दन खत्री के उपन्यास "चन्द्रकान्ता" और चन्द्रकान्ता सन्तति", जिन्हें पढ़ने के लिए लाखों की संख्या में लोगों ने हिन्दी सीखा, को हिन्दी साहित्य में आज भी गौण स्थान ही प्राप्त है।

माना जाता है कि जासूसी लेखन (Detective Writing) का आरम्भ सन् 1841 में एडगर एलन पो की कहानी  (short story) "द मर्डर्स इन द रुये मोर्ग (The Murders in the Rue Morgue) से हुई। भारत में जासूसी लेखन (Detective Writing) का आरम्भ, यद्यपि वह लेखन अपरिष्कृत रूप में था, उन्नीसवीं शताब्दी में हुई। सन् 1888 में बाबू देवकीनन्दन खत्री ने "चन्द्रकान्ता" नामक उपन्यास लिखा जिसे कि जासूसी लेखन (Detective Writing) के अन्तर्गत माना जा सकता है और जहाँ तक यही भारत में जासूसी लेखन (Detective Writing) की शुरुवात थी। उन्हीं दिनों "शरलॉक होम्स" और "चन्द्रकान्ता सन्तति" से प्रभावित अनेक रचनाओं का प्रकाशन हिन्दी, मराठी, बंगाली, तेलुगु, तमिल आदि भाषाओं में हुआ जो कि बहुत ही लोकप्रिय हुए।

बीसवीं शताब्दी पचास और साठ के दशक में इब्ने सफी के उपन्यासों ने जासूसी लेखन (Detective Writing) के राजा रजवाड़े से सम्बन्धित रूप को बदलकर एक आधुनिक रूप दिया। इब्ने सफी मूलतः उर्दू में लिखा करते थे जिनका "जासूसी दुनिया" नामक मासिक पत्रिका में उर्दू और हिन्दी दोनों ही भाषाओं में प्रकाशन हुआ करता था। उन दिनों सफी जी जासूसी उपन्यासों के सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक थे और उनकी लोकप्रियता भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों में बहुत अधिक थी। ओमप्रकाश शर्मा और वेदप्रकाश काम्बोज भी उन दिनों के लोकप्रिय जासूसी लेखक थे।

कालान्तर में जेम्स हेडली च़ेज के डिटेक्टिव्ह नावेल्स की लोकप्रियता बढ़ती गई। बहुत से लेखकों ने उनके उपन्यासों का हिन्दी अनुवाद किया किन्तु सुरेन्द्र मोहन पाठक जी सफलतम अनुवादक रहे। बाद में पाठक जी ने स्वयं जासूसी लेखन (Detective Writing) का कार्य आरम्भ कर दिया और हिन्दी के सफलतम जासूसी लेखक की श्रेणी उनका स्थान बन गया। आज भी पाठक जी के उपन्यास बहुत अधिक लोकप्रिय हैं।

Sunday, February 6, 2011

संस्कृत सुभाषित - हिन्दी अर्थ - 7


सुभाषित शब्द "सु" और "भाषित" के मेल से बना है जिसका अर्थ है "सुन्दर भाषा में कहा गया"। संस्कृत के सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं।

अन्नदानं परं दानं विद्यादानमतः परम्।
अन्नेन क्षणिका तृप्तिः यावज्जीवं च विद्यया॥६१॥

अन्न का दान परम दान है और विद्या का दान भी परम दान दान है किन्तु दान में अन्न प्राप्त करने वाली कुछ क्षणों के लिए ही तृप्ति प्राप्त होती है जबकि दान में विद्या प्राप्त करने वाला (अपनी विद्या से आजीविका कमा कर) जीवनपर्यन्त तृप्ति प्राप्त करता है।

इस पर अंग्रेजी में भी एक कहावत इस प्रकार से हैः

“Give a man a fish; you have fed him for today. Teach a man to fish; and you have fed him for a lifetime”

मूर्खस्य पंच चिह्नानि गर्वो दुर्वचनं तथा।
क्रोधस्य दृढ़वादश्च परवाक्येषवनादरः॥६२॥

मूर्खों के पाँच लक्षण होते हैं - गर्व (अहंकार), दुर्वचन (कटु वाणी बोलना), क्रोध, कुतर्क और दूसरों के कथन का अनादर।

नमन्ति फलिनो वृक्षाः नमन्ति गुणिनो जनाः।
शुष्ककाष्ठश्च मूर्खश्च न नमन्ति कदाचन॥६३॥

जिस प्रकार से फलों से लदी हुई वृक्ष की डाल झुक जाती है उसी प्रकार से गुणीजन सदैव विनम्र होते हैं किन्तु मूर्ख उस सूखी लकड़ी के समान होता है जो कभी नहीं झुकता।

वृश्चिकस्य विषं पृच्छे मक्षिकायाः मुखे विषम्।
तक्षकस्य विषं दन्ते सर्वांगे दुर्जनस्य तत्॥६४॥

बिच्छू का विष पीछे (उसके डंक में) होता है, मक्षिका (मक्खी) का विष उसके मुँह में होता है, तक्षक (साँप) का विष उसके दाँत में होता है किन्तु दुर्जन मनुष्य के सारे अंग विषैले होते हैं।

विकृतिं नैव गच्छन्ति संगदोषेण साधवः।
आवेष्टितं महासर्पैश्चनदनं न विषायते॥६५॥

जिस प्रकार से चन्द के वृक्ष से विषधर के लिपटे रहने पर भी वह विषैला नहीं होता उसी प्रकार से संगदोष (कुसंगति) होने पर भी साधुजनों के गुणों में विकृति नहीं आती।

घटं भिन्द्यात् पटं छिनद्यात् कुर्याद्रासभरोहण।
येन केन प्रकारेण प्रसिद्धः पुरुषो भवेत्॥६६॥

घड़े तोड़कर, कपड़े फाड़कर या गधे पर सवार होकर, चाहे जो भी करना पड़े, येन-केन-प्रकारेण प्रसिद्धि प्राप्त करना चाहिए। (ऐसा कुछ लोगों का सिद्धान्त होता है।)

तृणानि नोन्मूलयति प्रभन्जनो मृदूनि नीचैः प्रणतानि सर्वतः।
स्वभाव एवोन्नतचेतसामयं महान्महत्स्वेव करोति विक्रम॥६७॥

जिस प्रकार से प्रचण्ड आंधी बड़े बड़े वृक्षों को जड़ से उखाड़ देता है किन्तु छोटे से तृण को नहीं उखाड़ता उसी प्रकार से पराक्रमीजन अपने बराबरी के लोगों पर ही पराक्रम प्रदर्शित करते हैं और निर्बलों पर दया करते हैं।

प्रदोषे दीपकश्चन्द्रः प्रभाते दीपको रविः।
त्रैलोक्ये दीपको धर्मः सुपुत्र कुलदीपकः॥६८॥

शाम का दीपक चन्द्रमा होता है, सुबह का दीपक सूर्य होता है, तीनों लोकों का दीपक धर्म होता है और कुल का दीपक सुपुत्र होता है।

अनारम्भो हि कार्याणां प्रथमं बुद्धिलक्षणम्।
प्रारब्धस्यान्तगमनं द्वितीयं बुद्धिलक्षणम्॥६९॥

(आलसी लोगों की) बुद्धि के दो लक्षण होते हैं - प्रथम कार्य को आरम्भ ही नहीं करना और द्वितीय भाग्य के भरोसे बैठे रहना।

परोपदेशवेलायां शिष्टाः सर्वे भवन्ति वै।
विसमरन्तीह शिष्टत्वं स्वकार्ये समुस्थिते॥७०॥

दूसरों के कष्ट में पड़ने पर हम उन्हें जो उपदेश देते हैं, स्वयं कष्ट में पड़ने पर उन्हीं उपदेशों को भूल जाते हैं।

Saturday, February 5, 2011

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 18 (Hindi Proverbs)

प्रस्तुत हैं हिन्दी की कुछ लोकोक्तियाँ तथा मुहावरे और उनके अर्थ। उनके अर्थ मैंने अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार बनाए हैं और उनमें त्रुटि की सम्भावना है अतः यदि आपको त्रुटियाँ नजर आएँ तो कृपया टिप्पणी करके सही अर्थ बताने का कष्ट करें।

झूठ के पाँव नहीं होते

अर्थः झूठा आदमी अपनी बात पर खरा नहीं उतरता।

झोपड़ी में रहें, महलों के ख्वाब देखें

अर्थः अपनी सामर्थ्य से बढ़कर चाहना।

टके का सब खेल है

अर्थः धन सब कुछ करता है।

ठंडा करके खाओ

अर्थः धीरज से काम करो।

ठंडा लोहा गरम लोहे को काट देता है

अर्थः शान्त व्याक्ति क्रोधी को झुका देता है।

ठोक बजा ले चीज, ठोक बजा दे दाम

अर्थः अच्छी वस्तु का अच्छा दाम।

ठोकर लगे तब आँख खुले

अर्थः अक्ल अनुभव से आती है।

डण्डा सब का पीर

अर्थः सख्ती करने से लोग काबू में आते हैं।

डायन को दामाद प्यारा

अर्थः खराब लोगों को भी अपने प्यारे होते हैं।

डूबते को तिनके का सहारा

अर्थः विपत्ति में थोड़ी सी सहायता भी काफी होती है।

ढाक के तीन पात

अर्थः अपनी बात पर अड़े रहना।

ढोल के भीतर पोल

अर्थः झूठा दिखावा करने वाला।

तख्त या तख्ता

अर्थः या तो उद्देश्य की प्राप्ति हो या स्वयं मिट जाएँ।

Friday, February 4, 2011

संस्कृत सुभाषित - हिन्दी अर्थ - 6

सुभाषित शब्द "सु" और "भाषित" के मेल से बना है जिसका अर्थ है "सुन्दर भाषा में कहा गया"। संस्कृत के सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं।

वरं एको गुणी पुत्रो न च मूर्खशतान्यपि।
एकश्चंद्रस्तमो हन्ति न च तारागणोऽपि च॥५१॥


सौ मूर्ख पुत्र होने की अपेक्षा एक गुणवान पुत्र होना श्रेष्ठ है, अन्धकार का नाश केवल एक चन्द्रमा ही कर देता है पर तारों के समूह नहीं कर सकते।

विदेशेषु धनं विद्या व्यसनेष धनं मतिः।
परलोके धनं धर्मः शीलं सर्वत्र वै धनम्॥५२॥


परदेस में रहने के लिए विद्या ही धन है, व्यसनी व्यक्ति के लिए चातुर्य ही धन है, परलोक की कामना करने वाले के लिए धर्म ही धन हैं किन्तु शील (सदाचार) सर्वत्र (समस्त स्थानों के लिए) ही धन है।

अल्पानामपि वस्तूनां संहति कार्यसाधिका।
तृणैर्गुत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः॥५३॥


इस सुभाषित में यह सन्देश दिया गया है कि छोटी-छोटी बातों के समायोजन से बड़ा कार्य सिद्ध हो जाता है जैसे कि तृणों को जोड़कर बनाई गई डोर हाथी को बाँध देता है।

अतिपरिचयादवज्ञा संततगमनात् अनादरो भवति।
मलये भिल्ला पुरन्ध्री चन्दनतरुकाष्ठमं इन्धनं कुरुते॥५४॥


अतिपरिचय (बहुत अधिक नजदीकी) अवज्ञा और किसी के घर बार बार जाना अनादर का कारण बन जाता है जैसे कि मलय पर्वत की भिल्लनी चंदन के लकड़ी को ईंधन के रूप में जला देती है।

इसी बात को कवि वृन्द ने इस प्रकार से कहा हैः

अति परिचै ते होत है, अरुचि अनादर भाय।
मलयागिरि की भीलनी चन्दन देति जराय॥


सर्पः क्रूरः खलः क्रूरः सर्पात् क्रूरतरः खलः।
सर्पः शाम्यति मन्त्रैश्च दुर्जनः केन शाम्यति॥५५॥


साँप भी क्रूर होता है और दुष्ट भी क्रूर होता है किन्तु दुष्ट साँप से अधिक क्रूर होता है क्योंकि साँप के विष का तो मन्त्र से शमन हो सकता है किन्तु दुष्ट के विष का शमन किसी प्रकार से नहीं हो सकता।

लालयेत् पंच वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्।
प्राप्ते षोडशे वर्षे पुत्रे मित्रवदाचरेत्॥५६॥


पाँच वर्ष की अवस्था तक पुत्र का लाड़ करना चाहिए, दस वर्ष की अवस्था तक (उसी की भलाई के लिए) उसे ताड़ना देना चाहिए और उसके सोलह वर्ष की अवस्था प्राप्त कर लेने पर उससे मित्रवत व्यहार करना चाहिए।

सम्पूर्ण कुंभो न करोति शब्दं अर्धोघटो घोषमुपैति नूनम्।
विद्वान कुलीनो न करोति गर्वं गुणैर्विहीना बहु जल्पयंति॥५७॥


जिस प्रकार से आधा भरा हुआ घड़ा अधिक आवाज करता है पर पूरा भरा हुआ घड़ा जरा भी आवाज नहीं करता उसी प्रकार से विद्वान अपनी विद्वता पर घमण्ड नहीं करते जबकि गुणविहीन लोग स्वयं को गुणी सिद्ध करने में लगे रहते हैं।

मूर्खा यत्र न पूज्यते धान्यं यत्र सुसंचितम्।
दम्पत्यो कलहो नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागता॥५८॥


जहाँ पर मूर्खो की पूजा नहीं होती (अर्थात् उनकी सलाह नहीं मानी जाती), धान्य को भलीभाँति संचित करके रखा जाता है और पति पत्नी के मध्य कलह नहीं होता वहाँ लक्ष्मी स्वयं आ जाती हैं।

मृगाः मृगैः संगमुपव्रजन्ति गावश्च गोभिस्तुरंगास्तुरंगैः।
मूर्खाश्च मूर्खैः सुधयः सुधीभिः समानशीलव्यसनेष सख्यम्॥५९॥


हिरण हिरण का अनुरण करता है, गाय गाय का अनुरण करती है, घोड़ा घोड़े का अनुरण करता है, मूर्ख का अनुरण करता है और बुद्धिमान का अनुरण करता है। मित्रता समान गुण वालों में ही होती है।

शतेषु जायते शूरः सहस्त्रेषु च पण्डितः।
वक्ता दशसहस्त्रेष दाता भवति वान वा॥६०॥


सौ लोगों में एक शूर पैदा होता है, हजार लोगों में एक पण्डित पैदा होता है, दस हजार लोगों में एक वक्ता पैदा होता है और दाता कोई बिरला ही पैदा होता है।

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 17 (Hindi Proverbs)


जर जाए, घी न जाए

अर्थः महाकृपण।

जरती मक्खी नहीं निगली जाती

अर्थः जानते बूझते गलत काम नहीं किया जा सकता।

जीभ भी जली और स्वाद भी न आया

अर्थः कष्ट सहकर भी उद्देश्य पूर्ति न होना।

जूठा खाए मीठे के लालच

अर्थः लाभ के लालच में नीच काम करना।

जैसा करोगे वैसा भरोगे

अर्थः जैसा काम करोगे वैसा ही फल मिलेगा।

जैसा बोवोगे वैसा काटोगे

अर्थः जैसा काम करोगे वैसा ही फल मिलेगा।

जैसा मुँह वैसा थप्पड़

अर्थः जो जिसके योग्य हो उसको वही मिलता है।

जैसा राजा वैसी प्रजा

अर्थः राजा नेक तो प्रजा भी नेक, राजा बद तो प्रजा भी बद।

जैसी करनी वैसी भरनी

अर्थः जैसा काम करोगे वैसा ही फल मिलेगा।

जैसे तेरी बाँसुरी, वैसे मेरे गीत

अर्थः गुण के अनुसार ही प्राप्ति होती है।

जैसे कंता घर रहे वैसे रहे परदेश

अर्थः निकम्मा आदमी घर में रहे या बाहर कोई अंतर नहीं।

जैसे नागनाथ वैसे साँपनाथ

अर्थः दुष्ट लोग एक जैसे ही होते हैं।

जो गरजते हैं वो बरसते नहीं

अर्थः डींग हाँकनेवाले काम के नहीं होते हैं।

जोगी का बेटा खेलेगा तो साँप से

अर्थः बाप का प्रभाव बेटे पर पड़ता है।

जो गुड़ खाए सो कान छिदाए

अर्थः लाभ पाने वाले को कष्ट सहना ही पड़ता है।

जो तोको काँटा बुवे ताहि बोइ तू फूल

अर्थः बुराई का बदला भी भलाई से दो।

जो बोले सों घी को जाए

अर्थः बड़बोलेपन से हानी ही होती है।

जो हाँडी में होगा वह थाली में आएगा

अर्थः जो मन है वह प्रकट होगा ही।

ज्यों-ज्यों भीजे कामरी त्यों-त्यों भारी होय

अर्थः (1) पद के अनुसार जिम्मेदारियाँ भी बढ़ती जाती हैं। (2) उधारी को छूटते ही रहना चाहिए अन्यथा ब्याज बढ़ते ही जाता है।

Thursday, February 3, 2011

संस्कृत सुभाषित - हिन्दी अर्थ - 5

सुभाषित शब्द "सु" और "भाषित" के मेल से बना है जिसका अर्थ है "सुन्दर भाषा में कहा गया"। संस्कृत के सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं।

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्यणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मगाः॥३१॥


जिस प्रकार से सोये हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं चले जाते, सिंह को क्षुधा-शान्ति के लिए शिकार करना ही पड़ता है, उसी प्रकार से किसी कार्य की मात्र इच्छा कर लेने से वह कार्य सिद्ध नहीं हो जाता, कार्य उद्यम करने से ही सिद्ध होता है।

स्थानभ्रष्टाः न शोभन्ते दन्ताः केशाः नखा नराः।
इति विज्ञाय मतिमान् स्वस्थानं न परित्यजेत्॥३२॥


यदि मनुष्य के दांत, केश, नख इत्यादि अपना स्थान त्याग कर दूसरे स्थान पर चले जाएँ तो वे कदापि शोभा नहीं नहीं देंगे (अर्थात् मनुष्य की काया विकृति प्रतीत होने लगेगी)। इसी प्रकार से विज्ञजन के मतानुसार किसी व्यक्ति को स्वस्थान (अपना गुण, सत्कार्य इत्यादि) का त्याग नहीं करना चाहिए।

अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम्।
अधनस्य कुतो मित्रं अमित्रस्य कुतो सुखम्॥३३॥


आलसी को विद्या कहाँ? (आलसी व्यक्ति विद्या प्राप्ति नहीं कर सकता।) विद्याहीन को धन कहाँ? (विद्याहीन व्यक्ति धन नहीं कमा सकता।) धनहीन को मित्र कहाँ? (धन के बिना मित्र की प्राप्ति नहीं हो सकती।) मित्रहीन को सुख कहाँ? (मित्र के बिना सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती।)

उदये सविता रक्तो रक्तशचास्तमये तथा।
सम्पत्तौ च विपत्तौ च महामेकरूपता॥३४॥

(महाभारत)

जिस प्रकार से सूर्य सुबह उगते तथा शाम को अस्त होते समय दोनों ही समय में लाल रंग का होता है (अर्थात् दोनों ही संधिकालों में एक समान रहता है), उसी प्रकार महान लोग अपने अच्छे और बुरे दोनों ही समय में एक जैसे एक समान (धीर बने) रहते हैं।

शान्तितुल्यं तपो नास्ति तोषान्न परमं सुखम्।
नास्ति तृष्णापरो व्याधिर्न च धर्मो दयापरः॥३५॥


शान्ति जैसा कोई तप (यहाँ तप का अर्थ उपलब्धि समझना चाहिए) नहीं है, सन्तोष जैसा कोई सुख नहीं है (कहा भी गया है "संतोषी सदा सुखी), कामना जैसी कोई ब्याधि नहीं है और दया जैसा कोई धर्म नहीं है।

सर्वोपनिषदो गावः दोग्धाः गोपालनन्दनः।
पार्थो वत्सः सुधीः भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्॥३६॥


समस्त उपनिषद गाय हैं, श्री कृष्ण उन गायों के रखवाले हैं, पार्थ (अर्जुन) बछड़ा है जो उनके दूध का पान करता है और गीतामृत ही उनका दूध है। (अर्थात् समस्त उपनिषदों का सार गीता ही है।)

हंसो शुक्लः बको शुक्लः को भेदो बकहंसयो।
नीरक्षीरविवेके तु हंसो हंसः बको बकः॥३७॥


हंस भी सफेद रंग का होता है और बगुला भी सफेद रंग का ही होता है फिर दोनों में क्या भेद (अन्तर) है? जिसमें दूध और पानी अलग कर देने का विवेक होता है वही हंस होता है और विवेकहीन बगुला बगुला ही होता है।

काको कृष्णः पिको कृष्णः को भेदो पिककाकयो।
वसन्तकाले संप्राप्ते काको काकः पिको पिकः॥३८॥


कोयल भी काले रंग की होती है और कौवा भी काले रंग का ही होता है फिर दोनों में क्या भेद (अन्तर) है? वसन्त ऋतु के आगमन होते ही पता चल जाता है कि कोयल कोयल होती है और कौवा कौवा होता है।

दुर्जनः प्रियवादीति नैतद् विश्वासकारणम्।
मधु तिष्ठति जिह्वाग्रे हृदये तु हलाहलम्॥३९॥


दुर्जन व्यक्ति यदि प्रिय (मधुर लगने वाली) वाणी भी बोले तो भी उसका विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि उसे जबान पर (प्रिय वाणी रूपी) मधु होने पर भी हृदय में हलाहल (विष) ही भरा होता है।

सर्पदुर्जनयोर्मध्ये वरं सर्पो न दुर्जनः।
सर्पो दशती कालेन दुर्जनस्तु पदे पदे॥४०॥


(यदि साँप और दुष्ट की तुलना करें तो) साँप दुष्ट से अच्छा है क्योंकि साँप कभी-कभार ही डँसता है पर दुष्ट पग-पग पर (प्रत्येक समय) डँसता है।

Wednesday, February 2, 2011

संस्कृत सुभाषित - हिन्दी अर्थ - 4

न चौर्यहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।
व्यये कृते वर्धत व नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम॥४१॥


न तो इसे चोर चुरा सकता है, न ही राजा इसे ले सकता है, न ही भाई इसका बँटवारा कर सकता है और न ही इसका कंधे पर बोझ होता है; इसे खर्च करने पर सदा इसकी वृद्धि होती है, ऐसा विद्याधन सभी धनों में प्रधान है।

हर्तृ र्न गोचरं याति दत्ता भवति विस्तृता।
कल्पान्तेऽपि न या नश्येत् किमन्यद्विद्यया विना॥४२॥


जो चोरों दिखाई नहीं पड़ता, किसी को देने से जिसका विस्तार होता है, प्रलय काल में भी जिसका विनाश नहीं होता, विद्या के अतिरिक्त ऐसा अन्य कौन सा द्रव्य है?

विद्या नाम नरस्य कीर्तिर्तुला भाग्यक्षये चाश्रयो।
धेनुः कामदुधा रतिश्च विरहे नेत्रं तृतीयं च सा॥४३॥
सत्कारायतनं कुलस्य महिमा रत्नैर्विना भूषणम्।
तस्मादन्यमुपेक्ष्य सर्वविषयं विद्याधिकारं कुरु॥४४॥


विद्या मनुष्य की अनुपम कीर्ति है, भाग्य का नाश होने पर वह आश्रय देती है, विद्या कामधेनु है, विरह में रति समान है, विद्या ही तीसरा नेत्र है, सत्कार का मंदिर है, कुल की महिमा है, बिना रत्न का आभूषण है; इस लिए अन्य सब विषयों को छोडकर विद्या का अधिकारी बन!

विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्॥४५॥


विद्या विनय देती है; विनय से पात्रता प्राप्त होती है, पात्रता से धन प्राप्त होता है, धन से धर्म की प्राप्ति होती है, और धर्म से सुख प्राप्त होता है।

विद्याविनयोपेतो हरति न चेतांसि कस्य मनुजस्य।
कांचनमणिसंयोगो नो जनयति कस्य लोचनानन्दम्॥४६॥


विद्यावान और विनयी पुरुष किस मनुष्य के चित्त को नहीं हरते? सुवर्ण और मणि का संयोग किसकी आँखों को सुख नहि देता? (अर्थात् विद्या और विनय का संयोग सोने और मणि के संयोग के समान है।)

विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम्।
कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम्॥४७॥


कुरुप का रुप विद्या है, तपस्वी का रुप क्षमा है, कोकिला का रुप स्वर है, और स्त्री का रुप पातिव्रत्य है ।

कुत्र विधेयो यत्नः विद्याभ्यासे सदौषधे दाने।
अवधीरणा क्व कार्या खलपरयोषित्परधनेषु॥४८॥


यत्न किस के लिए करना चाहिए? विद्याभ्यास, सदौषध और परोपकार के लिए। अनादर किसका करना ? दुर्जन, परायी स्त्री और परधन का।

रूपयौवनसंपन्ना विशाल कुलसम्भवाः।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः॥४९॥


रुपसम्पन्न, यौवनसम्पन्न और विशाल कुल में उत्पन्न व्यक्ति भी विद्याहीन होने पर, सुगंधरहित केसुड़े के फूल की भाँति, शोभा नहीं देता।

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा॥५०॥


अपने बालक को न पढ़ाने वाले माता व पिता अपने ही बालक के शत्रु हैं, क्योंकि हंसो के बीच बगुले की भाँति, विद्याहीन मनुष्य विद्वानों की सभा में शोभा नहीं देता।

Tuesday, February 1, 2011

संस्कृत सुभाषित - हिन्दी अर्थ - 3

सुभाषित शब्द "सु" और "भाषित" के मेल से बना है जिसका अर्थ है "सुन्दर भाषा में कहा गया"। संस्कृत के सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं।

यहाँ पर हम प्रस्तुत कर रहे है कुछ सुभाषित!

अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥२१॥

(वाल्मीकि रामायण)

हे लक्ष्मण! सोने की लंका भी मुझे नहीं रुचती। मुझे तो माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी अधिक प्रिय है।

मरणानतानि वैराणि निवृत्तं नः प्रयोजनम्।
क्रियतामस्य संसकारो ममापेष्य यथा तव॥२२॥

(वाल्मीकि रामायण)

किसी की मृत्यु हो जाने के बाद उससे बैर समाप्त हो जाता है, मुझे अब इस (रावण) से कुछ भी प्रयोजन नहीं है। अतः तुम अब इसका विधिवत अन्तिम संस्कार करो।

काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥२३॥


बुद्धिमान व्यक्ति काव्य, शास्त्र आदि का पठन करके अपना मनोविनोद करते हुए समय को व्यतीत करता है और मूर्ख सोकर या कलह करके समय बिताता है।

तैलाद् रक्षेत् जलाद् रक्षेत् रक्षेत् शिथिल बंधनात्।
मूर्ख हस्ते न दातव्यं एवं वदति पुस्तकम्॥२४॥


एक पुस्तक कहता है कि मेरी तेल से रक्षा करो (तेल पुस्तक में दाग छोड़ देता है), मेरी जल से रक्षा करो (पानी पुस्तक को नष्ट कर देता है), मेरी शिथिल बंधन से रक्षा करो (ठीक से बंधे न होने पर पुस्तक के पृष्ठ बिखर जाते हैं) और मुझे कभी किसी मूर्ख के हाथों में मत सौंपो।

श्रोतं श्रुतनैव न तु कुण्डलेन दानेन पार्णिन तु कंकणेन।
विभाति कायः करुणापराणाम् परोपकारैर्न तु चंदनेन॥२५॥


कान की शोभा कुण्डल से नहीं बल्कि ज्ञानवर्धक वचन सुनने से है, हाथ की शोभा कंकण से नहीं बल्कि दान देने से है और काया (शरीर) चन्दन के लेप से दिव्य नहीं होता बल्कि परोपकार करने से दिव्य होता है।

भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाणभारती।
तस्यां हि काव्यं मधुरं तस्मादपि सुभाषितम्॥२६॥


भाषाओं में सर्वाधिक मधुर भाषा गीर्वाणभारती अर्थात देवभाषा (संस्कृत) है, संस्कृत साहित्य में सर्वाधिक मधुर काव्य हैं और काव्यों में सर्वाधिक मधुर सुभाषित हैं।

उदारस्य तृणं वित्तं शूरस्त मरणं तृणम्।
विरक्तस्य तृणं भार्या निस्पृहस्य तृणं जगत्॥२७॥


उदार मनुष्य के लिए धन तृण के समान है, शूरवीर के लिए मृत्यु तृण के समान है, विरक्त के लिए भार्या तृण के समान है और निस्पृह (कामनाओं से रहित) मनुष्य के लिए यह जगत् तृण के समान है।

विद्वत्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन्।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते॥२८॥


राजत्व प्राप्ति और विद्वत्व प्राप्ति की किंचित मात्र भी तुलना नहीं हो सकती क्योंकि राजा की पूजा केवल उसके अपने देश में ही होती है जबकि विद्वान की पूजा सर्वत्र (पूरे विश्व में) होती है।

दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं चापि न कारयेत्।
उष्णो दहति चांगारः शीतः कृष्णायते करम्॥२९॥


दुर्जन, जो कि कोयले के समान होते हैं, से प्रीति कभी नहीं करना चाहिए क्योंकि कोयला यदि गरम हो तो जला देता है और शीतल होने पर भी अंग को काला कर देता है।

चिन्तनीया हि विपदां आदावेव प्रतिक्रिया।
न कूपखननं युक्तं प्रदीप्त वान्हिना गृहे॥३०॥


जिस प्रकार से घर में आग लग जाने पर कुँआ खोदना आरम्भ करना युक्तिपूर्ण (सही) कार्य नहीं है उसी प्रकार से विपत्ति के आ जाने पर चिन्तित होना भी उपयुक्त कार्य नहीं है। (किसी भी प्रकार की विपत्ति से निबटने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।)

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 16 (Hindi Proverbs)


जहँ जहँ पैर पड़े संतन के, तहँ तहँ बंटाधार

अर्थः अभागा व्यक्ति जहाँ भी जाता है बुरा होता है।

जहाँ गुड़ होगा, वहीं मक्खियाँ होंगी

अर्थः धन प्राप्त होने पर खुशामदी अपने आप मिल जाते हैं।

जहाँ चार बर्तन होंगे, वहाँ खटकेंगे भी

अर्थः सभी का मत एक जैसा नहीं हो सकता।

जहाँ चाह है वहाँ राह है

अर्थः काम के प्रति लगन हो तो काम करने का रास्ता निकल ही आता है।

जहाँ देखे तवा परात, वहाँ गुजारे सारी रात

अर्थः जहाँ कुछ प्राप्ति की आशा दिखे वहीं जम जाना।

जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि

अर्थः कवि की कल्पना की पहुँच सर्वत्र होती है।

जहाँ फूल वहाँ काँटा

अर्थः अच्छाई के साथ बुराई भी होती ही है।

जहाँ मुर्गा नहीं होता, क्या वहाँ सवेरा नहीं होता

अर्थः किसी के बिना किसी का काम रूकता नहीं है।

जाके पैर न फटी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई

अर्थः दु:ख को भुक्तभोगी ही जानता है।

जागेगा सो पावेगा,सोवेगा सो खोएगा

अर्थः हमेशा सतर्क रहना चाहिए।

जादू वह जो सिर पर चढ़कर बोले

अर्थः अत्यन्त प्रभावशाली होना।

जान मारे बनिया पहचान मारे चोर

अर्थः बनिया और चोर जान पहचान वालों को ठगते हैं।

जाए लाख, रहे साख

अर्थः धन भले ही चला जाए, इज्जत बचनी चाहिए।

जितना गुड़ डालोगे, उतना ही मीठा होगा

अर्थः जितना अधिक लगाओगे उतना ही अच्छा पाओगे।

जितनी चादर हो, उतने ही पैर पसारो

अर्थः आमदनी के हिसाब से खर्च करो।

जितने मुँह उतनी बातें

अर्थः अस्पष्ट होना।

जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैंठ

अर्थः परिश्रम करने वाले को ही लाभ होता है।

जिस थाली में खाना, उसी में छेद करना

अर्थः जो उपकार करे, उसका ही अहित करना।

जिसका काम उसी को साजै

अर्थः जो काम जिसका है वहीं उसे ठीक तरह से कर सकता है।

जिसका खाइए उसका गाइए

अर्थः जिससे लाभ हो उसी का पक्ष लो।

जिसका जूता उसी का सिर

अर्थः दुश्मन को दुश्मन के ही हथियार से मारना।

जिसकी लाठी उसकी भैंस

अर्थः शक्तिशाली ही समर्थ होता है।

जिसके ह‍ाथ डोई, उसका सब कोई

अर्थः धनी आदमी के सभी मित्र होते हैं।

जिसको पिया चाहे, वहीं सुहागिन

अर्थः समर्थ व्यक्ति जिसका चाहे कल्याण कर सकता है।

 
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