Thursday, April 28, 2011

एक ब्लोगर होने के नाते क्या आपने कभी सोचा है कि पाठक क्या चाहता है?

जिस प्रकार से टीवी चैनल्स वाले सीरियल्स बनाते समय इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखते हैं कि उनके दर्शक क्या देखना चाहते हैं, उसी प्रकार से एक ब्लोगर को भी इस बात का ध्यान रखना, कि उसके पाठक क्या पढ़ना चाहते हैं, निहायत ही जरूरी है। वास्तव में आपकी लिखी सामग्री (content) ही पाठकों को खींच कर आपके ब्लॉग में लाती है। अंग्रेजी में तो कहा जाता हैः

'Content is king.'
अर्थात्, यदि हिन्दी में कहें तो, "सामग्री ही साम्राज्ञी है।"

किन्तु हममें से अधिकांश हिन्दी ब्लोगर वह लिखते हैं जो उन्हें पसंद है, किन्तु यह जरूरी नहीं है कि एक व्यक्ति की पसंद सभी लोगों को भी पसंद आए। कई बार तो हम यह सोच कर भी लिख देते हैं कि कुछ न कुछ तो लिखना है। अब आप ही बताइए कि इस प्रकार के उद्देश्यहीन लेखन को क्या पाठक पसंद कर सकता है? फिर ऐसे लेखन का क्या फायदा जिसे कि कोई पढ़े ही नहीं। यह तो वही बात हुई कि जंगल में मोर नाचा किसी ना देखा।

तो आइए जानने की कोशिश करें कि पाठक क्या चाहता है?

वास्तव में पाठक सन्तुष्टि चाहता है। वह चाहता है कि उसे घिसी पिटी चीज पढ़ने को न मिले। उसने जो कुछ भी पढ़ा है उससे उसे कुछ नई जानकारी मिली है, उसके ज्ञान में कुछ वृद्धि हुई है। यदि पाठक ऐसे लेख को पढ़ता है जिसे पढ़कर उसे कुछ भी प्राप्त नहीं होता तो उसे क्षोभ होता है और जिस ब्लॉग में उसे ऐसी सामग्री पढ़ने को मिली है उस ब्लॉग से वह कन्नी काट लेता है। इसके विपरीत यदि उसे किसी ब्लॉग की सामग्री को पढ़कर कुछ नयापन मिले, उसे सन्तुष्टि हो तो वह उस ब्लॉग का चाहने वाला बन जाता है। याद रखिए कि पाठक को उसके पसंद की सामग्री मिलेगी तो वह उसे अवश्य ही पढ़ेगा।

एक बात यह भी है कि पाठक हमेशा नई-नई जानकारी चाहता है और ऐसे में एक बहुत बड़ा प्रश्न उठता है कि आखिर रोज रोज आखिर नई जानकारी लायें कहाँ से?

यह यक्षप्रश्न है कि आखिर रोज हम अपनी सामग्री में कहाँ से नयापन लायें? सच्चाई भी यही है कि हम हमेशा नई जानकारी नहीं प्राप्त कर सकते। पर हाँ किसी पुरानी जानकारी को ऐसी शैली में प्रस्तुत कर सकते हैं कि उसमें नयापन झलकने लगे। प्रायः सभी सफल लेखक यही करते हैं और इस प्रकार के प्रस्तुतीकरण को पाठक भी पसंद करते हैं।

कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि हम पाठकों को ऐसी सामग्री देना चाहते हैं जिनके विषय में हम जानते हैं कि यह उनके लिये हितकारी है किन्तु उनकी रुचि के अनुरूप नहीं है। ऐसी स्थिति में आप अपने लेख को इस चतुराई से (tactfully) लिखें कि पाठक को वह सुरुचिपूर्ण लगे। मतलब यह कि कड़वी दवा के ऊपर शक्कर की परत।

किन्तु इस बात का भी विशेष ध्यान रखना है अच्छी बातों की अपेक्षा बुरी बातें लोगों को अधिक आकर्षित करती हैं और इसी कारण से अश्लीलता और फूहड़ता अधिकांश पाठकों को आसानी के साथ आकर्षित कर लेती हैं। लोगों की इसी मनोवृति का फायदा उठाते हुए आज के अधिकांश टीवी चैनल्स अपने दर्शकों को, "जोई रोगी भावै सोई बैद बतावै" के तर्ज पर, धड़ल्ले के साथ अश्लीलता और फूहड़ता परस रहे हैं। उन्हें इस बात से कुछ भी सरोकार नहीं है कि ऐसा करने से समाज और देश का कितना अहित हो रहा है, उन्हें तो सिर्फ अपने टीआरपी बढ़ा कर अधिक से अधिक विज्ञापन बटोरने का ही ध्यान रहता है। पर हमें ऐसा कतइ नहीं करना है। हमें तो ऐसे पोस्ट लिखना है जो लोगों में जागरूकता पैदा करे और समाज तथा देश का हित करे।

Wednesday, April 27, 2011

तुम दूर भी हो, तुम पास भी हो - गीत

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

तुम दूर भी हो, तुम पास भी हो;
मुझे निराश सदा तुम करती,
फिर भी तुम मेरी आश ही हो,
तुम दूर भी हो, तुम पास भी हो।

उत्कण्ठा में आकुल मैं तो,
चिरप्रतीक्षा के क्षण गिनता हूँ;
किन्तु नहीं आते हो जब तुम,
सपनों में तुमसे मिलता हूँ;
तुम तो मेरा जीवन हो,
तुम ही मेरी श्वाँस भी हो,
तुम दूर भी हो, तुम पास भी हो।

मिलने की घड़ियाँ कब आवेंगी?
दिन-रात यही सोचा करता हूँ;
पर न मिलन जब होता है तो,
ठंडी ठंडी आहें भरता हूँ;
तुमने मुझको बांधा है, तुम मेरी उलझन हो,
फिर भी तुम मेरी पाश ही हो,
तुम दूर भी हो, तुम पास भी हो।

तुमसे मेरे जीवन में स्पन्दन है,
नस नस में तुम छाये रहते हो;
पल भर भी भूल न पाता तुमको,
जाने किस जादू में भरमाये रहते हो;
तुम ही मेरे जीवन के रक्षक-
तुम ही मेरी नाश भी हो,
तुम दूर भी हो, तुम पास भी हो।

देख न पाता हूँ जब तुमको,
ऐंठन मन में होती है;
तुम्हें सामने जब पाता हूँ,
जगी वेदना सोती है;
तुम ही मेरी दुनिया हो,
मेरे जीवन का विश्वास भी हो,
तुम दूर भी हो, तुम पास भी हो।

आओ दो से एक बनें हम,
हिलमिल दोनों खो जायें;
मैं मैं न रहूँ, और तुम न रहो तुम,
सरिता-सागर हो जायें;
धड़कन तेरे दिल की बन जाउँ,
तुम तो मेरी श्वाँस ही हो,
तुम दूर भी हो, तुम पास भी हो।

(रचना तिथिः शनिवार 31-01-1981)

Tuesday, April 26, 2011

जब हिन्दी के ब्लोगर झूमेंगे

सपने देखने का अधिकार तो सभी को है और इस अधिकार का प्रयोग करते हुए मैं भी सपने देखता हूँ, सपने में देखता हूँ अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं के ब्लोगर के जैसे हिन्दी के ब्लोगर भी खुशहाल हैं, मस्ती में झूम रहे हैं। अन्य ब्लोगरों को अपने ब्लोग से कमाई का लालच हो, न हो, मुझे तो है। इसलिए अपने सपने में ब्लोगरों की अपने ब्लोग से कमाई होते हुए भी देखता हूँ। कामना करने लगता हूँ कि एडसेंस तथा अन्य विज्ञापनों से हिन्दी ब्लोग्स के द्वारा भी कमाई हो।

किन्तु यह भी जानता हूँ कि सपने देखना आसान है और उन सपनों को साकार कर लेना बहुत ही मुश्किल! किसी ने सच ही कहा है -

Dreams are not the ones which come when you sleep, but they are the ones which will not let you sleep.

अर्थात् सपने वो नहीं होते जिन्हें आप सोते हुए देखते हैं, बल्कि सपने वो होते हैं जो आपकी नींद गायब कर देते हैं।

ब्लोगरों को झूमते हुए देखने का यह सपना मुझसे बरबस कहलवाता है -

इन 'हिन्दी ब्लोग के पोस्टों' से, जब रात का आँचल ढलकेगा
जब 'गूगल' का दिल पिघलेगा, जब 'डॉलर' का सागर छलकेगा
जब हिन्दी के ब्लोगर झूमेंगे, और एडसेंस रकम बरसायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

जिस सुबह की खातिर जुग-जुग से, ब्लोगर मरते-जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में, वे जहर के प्याले पीते हैं
इन मेहनतकश चिट्ठाकारों पर, इक दिन तो करम फर्मायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

माना कि अभी इन हिन्दी के, 'पोस्टों' की कीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर, चिट्ठाकारों की कीमत कुछ भी नहीं
चिट्ठाकारों के मेहनत को इक दिन जब, सिक्कों में ही तोली जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

जब हिन्दीगण 'चैटिंग' छोड़ेंगे, 'एडल्ट साइट्स' से नाता तोड़ेंगे
जब ज्ञान-पिपासा जागेगी, जब ब्लोग्स से नाता जोड़ेंगे
हिन्दी पाठकों की संख्या, बढ़ती और बढ़ती जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर, ये फोकट के लाचारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर, अंग्रेजी की इजारादारी के
जब हिन्दी की अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

(महान शायर साहिर लुधियानवी से क्षमायाचना सहित।)

साहिर लुधियानवी

उपरोक्त पैरोडी का मूल है साहिर लुधियानवी की ये रचनाएँ -

वो सुबह हमीं से आयेगी

जब धरती करवट बदलेगी, जब क़ैद से क़ैदी छूटेंगे
जब पाप घरौंदे फूटेंगे, जब ज़ुल्म के बन्धन टूटेंगे
उस सुबह को हम ही लायेंगे, वो सुबह हमीं से आयेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी

मनहूस समाजों ढांचों में, जब जुर्म न पाले जायेंगे
जब हाथ न काटे जायेंगे, जब सर न उछाले जायेंगे
जेलों के बिना जब दुनिया की, सरकार चलाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी

संसार के सारे मेहनतकश, खेतो से, मिलों से निकलेंगे
बेघर, बेदर, बेबस इन्सां, तारीक बिलों से निकलेंगे
दुनिया अम्न और खुशहाली के, फूलों से सजाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी

और

वो सुबह कभी तो आयेगी

इन काली सदियों के सर से, जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा, जब धरती नज़्में गायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

जिस सुबह की खातिर जुग-जुग से, हम सब मर-मर कर जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में, हम जहर के प्याले पीते हैं
इन भूखी प्यासी रूहों पर, इक दिन तो करम फर्मायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

माना कि अभी तेरे मेरे, अरमानों की कीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर, इन्सानों की कीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब झूठे, सिक्कों में न तोली जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

दौलत के लिये जब औरत की, इस्मत को न बेचा जायेगा
चाहत को न कुचला जायेगा, ग़ैरत को न बेचा जायेगा
अपनी काली करतूतों पर, जब ये दुनिया शर्मायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर, ये भूख के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर, दौलत की इजारादारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

मजबूर बुढ़ापा जब सूनी, राहों की धूल न फांकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी, गलियों में भीख न मांगेगा
ह़क मांगने वालों को जिस दिन, सूली न दिखाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

फ़ाको की चिताओं पर जिस दिन, इन्सां न जलाये जायेंगे
सीनों के दहकते दोज़ख में, अर्मां न जलाये जायेंगे
ये नरक से भी गन्दी दुनिया, जब स्वर्ग बनाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

Monday, April 25, 2011

एक मजेदार प्रश्न! क्या जवाब है आपके पास इस सवाल का?

कल्पना कीजिए कि आँधी, तूफान और बारिश वाली एक रात में आप अपने टू सीटर कार में जा रहे हैं। रास्ते में एक बस स्टॉप मिलता है जहाँ पर तीन लोग बस के लिए इन्तजार कर रहे हैं जिनमें -

1.  एक अति बीमार वृद्ध महिला है जिसे तत्काल अस्पताल पहुँचाने की आवश्यकता है अन्यथा वह मर सकती है।

2.  आपका एक बहुत पुराना मित्र है जिसने एक बार आपकी जान बचाई थी।

3. एक ऐसा व्यक्ति (यदि आप पुरुष हैं तो वह महिला और यदि आप महिला हैं तो वह पुरुष) है जिस पर आप मर मिटे हैं और उसे आप दिलोजान से प्यार करते हैं।

(चूँकि आपकी कार टू सीटर है, आप उनमें से किसी एक को ही अपने साथ ले जा सकते हैं।)

इस अवस्था मे आप -

आप किसी की जान बचा सकते हैं!

या किसी का एहसान चुका सकते हैं!

या अपने प्राणाधिक प्यारे व्यक्ति का साथ पा सकते हैं!

ऐसी अवस्था में आप क्या करेंगे?

उपरोक्त प्रश्न का उत्तर अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग दे सकते हैं और उनके उत्तर से उनके व्यक्तित्व, सोच-विचार के सम्बन्ध में अनुमान लगाया जा सकता है।

तो ईमानदारी के साथ बताइए कि ऐसी अवस्था में आप क्या करेंगे?

सोचिए और जवाब दीजिए!

अपना जवाब दे लेने के बाद नीचे स्क्रोल करके उस जवाब पर भी एक नजर डाल लीजिए जो हमें सर्वथा उपयुक्त लगता है, लेकिन उस जवाब को तभी देखिए जब आप अपना जवाब दे लें। बहुत ही प्रसन्नता की बात होगी यदि आपका जवाब नीचे दिए गए हमारे हिसाब से सबसे उपयुक्त जवाब से मेल खा जाए!


हमारे हिसाब से सबसे उपयुक्त जवाब -

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मैं अपनी कार अपने पुराने मित्र के हवाले करके वृद्धा को अस्पताल ले जाने के लिए कहूँगा और स्वयं वहाँ पर अपने प्रिय के साथ बैठकर बस का इन्तजार करूँगा!

Sunday, April 24, 2011

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 26 (Hindi Proverbs)

प्रस्तुत हैं हिन्दी की कुछ लोकोक्तियाँ तथा मुहावरे और उनके अर्थ। उनके अर्थ मैंने अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार बनाए हैं और उनमें त्रुटि की सम्भावना है अतः यदि आपको त्रुटियाँ नजर आएँ तो कृपया टिप्पणी करके सही अर्थ बताने का कष्ट करें।

मछली के बच्चे को तैरना कौन सिखाता है

अर्थः गुण जन्मजात आते हैं।

मजनू को लैला का कुत्ता भी प्यारा

अर्थः प्रेयसी की हर चीज प्रेमी को प्यारी लगती है।

मतलबी यार किसके, दम लगाया खिसके

अर्थः स्वार्थी व्यक्ति को अपना स्वार्थ साधने से काम रहता है।

मन के लड्ड़ओं से भूख नहीं मिटती

अर्थः इच्छा करने मात्र से ही इच्छापूर्ति नहीं होती।

मन चंगा तो कठौती में गंगा

अर्थः मन की शुद्धता ही वास्तंविक शुद्धता है।

मरज़ बढ़ता गया ज्यों- ज्यों इलाज करता गया

अर्थः सुधार के बजाय बिगाड़ होना।

मरता क्या न करता

अर्थः मजबूरी में आदमी सब कुछ करना पड़ता है।

मरी बछिया बाभन के सिर

अर्थः व्यर्थ दान।

मलयागिरि की भीलनी चंदन देत जलाय

अर्थः बहुत अधिक नजदीकी होने पर कद्र घट जाती है।

माँ का पेट कुम्हार का आवा

अर्थः संताने सभी एक-सी नहीं होती।

माँगे हरड़, दे बेहड़ा

अर्थः कुछ का कुछ करना।

मान न मान मैं तेरा मेहमान

अर्थः ज़बरदस्ती का मेहमान।

मानो तो देवता नहीं तो पत्थर

अर्थः माने तो आदर, नहीं तो उपेक्षा।

माया से माया मिले कर-कर लंबे हाथ

अर्थः धन ही धन को खींचता है।

माया बादल की छाया

अर्थः धन-दौलत का कोई भरोसा नहीं ।

मार के आगे भूत भागे

अर्थः मार से सब डरते हैं।

मियाँ की जूती मियाँ का सिर

अर्थः दुश्मन को दुश्मन के हथियार से मारना।

मिस्सों से पेट भरता है किस्सों से नहीं

अर्थः बातों से पेट नहीं भरता।

मीठा-मीठा गप, कड़वा-कड़वा थू-थू

अर्थः मतलबी होना।

Saturday, April 23, 2011

अपने लिखे को लोगों को है पढ़वाना! वरना कैसे पचेगा खाना?

ब्लोगर का काम है पोस्ट लिखना! वह तो हर हाल में पोस्ट लिखेगा ही। नहीं लिखेगा तो ब्लोगर कैसे कहलाएगा? और फिर लिखना कौन सी बड़ी बात है? लिखने में आखिर मेहनत ही कौन सी लगती है? हमने भी लिखा और बहुत लिखा। पर पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों ने हमारे लिखे को हमेशा "खेद सहित वापस" कर दिया, हमारा कोई लेख कभी प्रकाशित ही नहीं हुआ। आखिर इन संपादकों को अच्छे लेखन की समझ ही कहाँ है? वो तो भला हो ब्लोगिंग का! लिखो और झट से प्रकाशित कर दो! हींग लगे न फिटकरी रंग आए चोखा!

अब जब हमने अपना ब्लोग बना लिया और हमारे लिखे लेख प्रकाशित होने लग गए तो हमें एक नई चिंता ने घेरना शुरू कर दिया, वह चिन्ता थी अपने लिखे को लोगों को पढ़वाने की। क्या मतलब हुआ लिखने का यदि किसी ने पढ़ा ही नहीं? असली मेहनत तो अपने लिखे को दूसरों को पढ़वाने में लगती है। बड़ी माथा-पच्ची करनी पड़ती है। पाठक जुटाना कोई हँसी खेल नहीं है। ढूँढ-ढूँढ कर सैकड़ों ई-मेल पते इकट्ठे करने होते हैं। लिखने के बाद सभी को ई-मेल से सूचित करना पड़ता है कि मेरा ब्लोग अपडेट हो गया है।

अब आप पूछेंगे कि जब एग्रीगेटर्स आपके लेख को लोगों तक पहुँचा ही देते हैं तो फिर मेल करने की जरूरत क्या है? तो जवाब है - भाई कोई जरूरी तो नहीं है कि सभी लोग एग्रीगेटर्स को देख रहें हों और मानलो देख भी रहें हों तो आपके लेख को मिस भी तो कर सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि लोगों को मेल करो, इंस्टेंट मैसेजिंग करो।

अब अगर आप कहेंगे कि यदि लेख अच्छा होगा तो लोग पढ़ेंगे ही, जहाँ गुड़ होगा वहाँ मक्खियाँ अपने आप आ जाएँगी, चाशनी टपकाओगे तो चीटियाँ तो आयेंगी ही। इसके जवाब में मैं बताना चाहूँगा कि आप पाठकों की नब्ज नहीं पहचानते। आप नहीं जानते कि ये पाठक बड़े विचित्र जीव होते हैं, कुछ भी ऊल-जलूल चीजों को तो पढ़ लेते हैं पर अच्छे लेखों की तरफ झाँक कर देखते भी नहीं। पर पाठकों को अच्छे लेख पढ़वाना हमारा नैतिक कर्तव्य है इसलिए मेल करके उनका ध्यान खींचो, उन्हें सद्‍बुद्धि दो और सही रास्ते पर लाओ।

खैर, मुझे तो अपनी उम्र का भी लाभ मिलता है और कुछ पाठक वैसे ही मिल जाते हैं क्योंकि लोग सोचते हैं - वयोवृद्ध ब्लोगर ने लिखा है अवश्य पढ़ना चाहिये (अब मैं तो स्वयं को वयोवृद्ध ही कहूँगा ना भले ही यह अलग बात है कि लोग कहते होंगे कि आज साले बुड़्ढे ने भी लिखा है चलो एक नजर डाल ही लें)। फिर भी मैंने हजारों ई-मेल पते संग्रह कर रखे हैं और उनके द्वारा सभी को अपने लेख के बारे में सूचित करता हूँ। यदि आपको भी कभी मेरा मेल मिल जाए तो आपसे गुजारिश हैं कि न तो उसे मिटाइयेगा और न ही उसका बुरा मानियेगा।

Friday, April 22, 2011

हे पृथ्वी! हे जननी! तुम सदैव मेरे लिये प्रेरणामयी रही हो!

पृथ्वी दिवस पर विशेष

दिवस मनाने की आजकल परम्परा चल पड़ी है। शायद इस परम्परा का कारण यह है कि जिन्हें हम हृदय में बसाये रखा करते थे उन्हें अब हमने भुला दिया है तथा यह सोचकर कि वर्ष में कम से कम एक दिन उन्हें याद कर लें उनके नाम पर दिवस मनाना शुरू कर दिया है जैसे कि मातृ दिवस, पितृ दिवस आदि। किसी को कभी याद न करने से यही अच्छा है कि उसे कम से कम साल में एक दिन तो याद कर लिया जाए, लोकोक्ति भी है - "नहीं मामा से काना मामा अच्छा"!

दिवस मनाने के इसी परम्परा के अन्तर्गत आज पृथ्वी दिवस मनाया जा रहा है। भले ही हम वर्षपर्यन्त खनिज प्राप्त करने के लिए भूमि और पर्वतों को खोदने का कार्य करते रहें, वनों को काटते रहें, सरिताओं के स्वच्छ जल में कल-कारखानों यहाँ तक कि मद्यनिष्कर्षशाला याने कि दारू भट्टी तक से भी निकली हुई गंदगी को मिलाते रहें और अपने इन कार्यों से पृथ्वी के सौन्दर्य को नष्ट करते रहें किन्तु वर्ष में एक दिन उसी पृथ्वी के सौन्दर्य को बढ़ाने और पर्यावरण की रक्षा करने की बात करना भी तो हमारा नैतिक कर्तव्य है! तो क्यों न पृथ्वी दिवस मनाया लिया जाए! भले ही हम प्रकृति, जिसका पृथ्वी भी एक महत्वपूर्ण अंग है, से सदैव प्राप्ति की आशा करते रहें, वर्ष में कम से कम एक दिन उसके सन्तुलन के विषय में कुछ सोचना भी तो हमारा कर्तव्य है।

पृथ्वी अर्थात् -

पृथवी, पृथिवी, भूमि, भूमी, अचला, अनन्ता, रसा, विश्वम्भरा, स्थिरा, धरा, धरित्री, धरणी, धरणि,  वसुमती, वसुधा, वुसंधरा, अवनि, अवनी, मही, विपुला, रत्नगर्भा, जगती, सागराम्बरा, उर्वी, गोत्रा, क्ष्मा क्षमा, मेदिनी, गह्वरी, धात्री, गौरिला, कुम्भिनी, भूतधात्री, क्षोणी, क्षोणि, काश्यपी, क्षिति, सर्वेसृहा!

क्या कभी आपने विचार भी किया है कि उषाकाल में आकाश की लालिमा, रक्तवर्ण सूर्य का उदय, लता-विटपों की हरीतिमा, सरिता का कलकल नाद के साथ प्रवाहित होना, गगनचुम्बी पर्वतमालाओं का सौन्दर्य जैसी प्राकृतिक दृश्य एवं प्राकृतिक क्रिया-कलाप ने ही तो मनुष्य के भीतर जीवनपर्यन्त भावनाएँ तथा संवेदनाएँ उत्पन्न करके उसे महान कलाकार, महान कवि, महान विचारक बनाया है।

भूमि, सर, सरोवर, नद्, पर्वत आदि से प्राप्त भावनाओं और संवेदनाओं ने ही तो वनवास के समय राम के मुँह से अनायास ही कहलवाया था -

"हे जननी! तुम सदैव मेरे लिये प्रेरणामयी रही हो। तुम्हारी धूलि मुझे चन्दन की भाँति शान्ति देती है, तुम्हारा जल मेरे लिये अमृतमयी और जीवनदायी है।"


यह पृथ्वी और प्रकृति ही तो है जो -

"सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है,
अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है!
अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है,
पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥"

मैथिलीशरण गुप्त (पंचवटी)

चलिए, एक दिन के लिए ही सही किन्तु पूरे लगन और समर्पण भाव से यदि हम एक अरब पन्द्रह करोड़ भारतवासी पृथ्वी तथा प्रकृति के विषय में सिर्फ कुछ सोचने के बजाय कुछ सार्थक कार्य करने की ठान लें तो आज भी हमारे देश का पर्यावरण देश को प्रचुर मात्रा में शुद्ध जल, शुद्ध वायु, हरे-भरे वन आदि प्राकृतिक सम्पदा प्रदान करने में पूर्णतः समर्थ हो सकता है और हमारा में पुनः दूध-दही की नदियाँ बह सकती हैं, हमारा देश फिर से विश्व भर में "सोने की चिड़िया" के नाम से विख्यात हो सकता है!

Thursday, April 21, 2011

गायें आखिर पृथ्वी के चुम्बकीय उत्तर-दक्षिण दिशा में खड़े होने का ही प्रयास क्यों करती हैं?

गूगल अर्थ सेटेलाइट इमेजेस की सहायता से किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि मवेशियों के झुंड प्रायः पृथ्वी के चुम्बकीय उत्तर-दक्षिण दिशा में खड़े होने का प्रयास करते हैं। विश्व के 308 स्थानों में 8,510 मवेशियों पर किए गए अध्ययन के निष्कर्ष के अनुसार यही पता चला है कि प्रायः मवेशी पृथ्वी के चुम्बकीय उत्तर-दक्षिण का ही सामना करते हैं। हाँ यह बात अवश्य है कि हवा के तेज झौंके और सूर्य की प्रखर किरणें मवेशियों के इस स्वभाव पर प्रभाव डालते हैं।


चेज रिपब्लिक में किए गए एक अन्य शोध के अनुसार 2,974 पर किए गए अध्ययन से पता चला है कि, सिर्फ मवेशी ही नहीं, हिरण भी पृथ्वी के चुम्बकीय उत्तर-दक्षिण दिशा का सामना करना पसंद करते हैं।

(स्रोत - Cows Have Strange Sixth Sense)

उल्लेखनीय है भारत में प्राचीन काल से ही दक्षिण दिशा की ओर सिर तथा उत्तर दिशा की ओर पैर कर के सोने की परम्परा रही है क्योंकि हमारे यहाँ यह माना जाता है कि इस प्रकार से सोने या लेटने से मनुष्य की जीवनी शक्ति में वृद्धि होती है और यही कारण है कि हिन्दुओं में मृत्यु-शय्या पर पड़े व्यक्ति को जमीन पर उतार कर उत्तर दिशा की ओर सिर तथा दक्षिण दिशा की ओर पैर करके लिटाने का रिवाज है जिससे कि मरने वाले व्यक्ति की जीवनी शक्ति का ह्रास हो और उसके प्राण आसानी के साथ निकल सके।

Wednesday, April 20, 2011

क्या जानवर किसी की मौत के विषय में भविष्यवाणी कर सकते हैं?

न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन के जुलाई 2007 अंक में एक नर बिल्ली के विषय में बहुत ही रोचक स्टोरी प्रकाशित हुई थी जिसके अनुसार नर्सिंग होम के एक कर्मचारी द्वारा पाला गया ऑस्कर नामक बिल्ला उस नर्सिंग होम में मरने वाले रोगियों की मृत्यु की भविष्यवाणी उनकी मौत से कई घंटे पहले कर दिया करता था। उस बिल्ले ने नर्सिंग होम में मरने वाले 25 रोगियों की मृत्यु की सफल भविष्य किया था, मरने वाले रोगियों की मृत्यु के कई घंटे पहले ही वह उन रोगियों के पास जाकर उनके बिस्तर पर उनके साथ बैठ जाया करता था। नर्सिंग होम के कर्मचारियों को जब इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने रोगियों के परिजनों को इस बात की चेतावनी देना भी शुरू कर दिया था। रोगियों के अधिकतर सम्बन्धी या तो इस चेतावनी को अंधविश्वास समझकर उसे गम्भीरता से नहीं लेते थे या फिर भय की आशंका से बिल्ले को रोगी के बिस्तर से भगा देते थे। मरने वाले रोगी के बिस्तर से भगा दिए जाने पर वह बिल्ला परेशान-सा हो जाता था तथा घबराहट के साथ म्याऊँ शब्द करते रोगी के कमरे के दरवाजे पर चक्कर लगाते रहता था।

ऑस्कर दिन भर पूरे नर्सिंग होम में चक्कर लगाते रहता था तथा मृत्यु के निकट पहुँच जाने वाले रोगियों के कमरे में जानबूझ कर घुसकर उनके बिस्तरों पर उनके साथ बैठ जाया करता था। प्रायः रोगी के मृत्युपर्यन्त वह उसके साथ ही बिस्तर पर बैठा रहा करता था और रोगी की मृत्यु हो जाने के बार उसके बिस्तर को छोड़ कर चला जाया करता था।

ऑस्कर को रोगी की मृत्यु की पूर्वसूचना कैसे मिल जाती थी? क्या उसके पास किसी प्रकार की अतीन्द्रिय क्षमता थी? क्या मरने वालों के शरीर से किसी विशेष प्रकार की गंध आने लगती है जिसे हम सूँघ नहीं सकते किन्तु ऑस्कर सूँघ लिया करता था?

Tuesday, April 19, 2011

ये जीवन है इस जीवन का यही है, यही है, यही है रंग रूप!


  • जीवन एक चुनौती है, स्वीकार करो!
  • जीवन एक संघर्ष है, संघर्ष करो!
  • जीवन एक कर्तव्य है, पूरा करो!
  • जीवन एक प्रतिज्ञा है, पूरी करो!
  • जीवन एक एक आत्मा (spirit) है, अनुभव करो!
  • जीवन एक उपहार है, स्वीकार करो!
  • जीवन एक खेल है, खेल भावना के साथ खेलो!
  • जीवन एक अवसर है, मत चूको!
  • जीवन एक यात्रा है, पूरी करो!
  • जीवन एक अभियान है, साहस करो!
  • जीवन एक पीड़ा है, सह कर दिखाओ!
  • जीवन एक रहस्य है, रहस्योद्घाटन करो!
  • जीवन एक गीत है, गा कर दिखाओ!
  • जीवन प्रेम है, प्यार करो!
  • जीवन एक सौन्दर्य है, पूजा करो!
  • जीवन एक पहेली है, बूझ कर दिखाओ!
  • जीवन एक लक्ष्य है, पा कर दिखाओ!

Monday, April 18, 2011

जीना अगर नहीं है तो मर जाना चाहिए

जिन्दगी!

कहा जाता है कि जिन्दगी ऊपर वाले की दी हुई सबसे बड़ी नेमत है! ईश्वर का दिया हुआ सबसे बड़ा दान है!

पर अनेक बार मन में सवाल कौंधता है कि आखिर क्या है यह जिन्दगी? क्या उद्देश्य है इस जीवन का? कैसे समझा जाए इसे? राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त भी ने भी तो कहा है -

यह जन्म हुआ किस अर्थ कहो?
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो!

कभी कभी लगता है कि जिन्दगी को समझना बहुत मुश्किल है। बड़े-बड़े मनीषियों, दर्शनशास्त्रियों, विद्वानों, लेखकों, कवियों, दिग्गजों नें इस जिन्दगी की व्याख्या की है और हर एक की व्याख्या अलग-अलग है। जितनी नजरिया, जिन्दगी के उतने ही रूप! ये जिन्दगी जिन्दगी ही है या ईश्वर, परमात्मा, प्रभु, हरि का रूप? -

हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहिं सुनहिं बहु बिधि सब सन्ता॥

राजा हरिश्चन्द्र के लिए सत्य ही जिन्दगी है तभी तो उन्होंने अपना सर्वस्व सत्य के लिए त्याग दिया। ययाति के लिए यौन-सुख ही जिन्दगी है तभी तो उन्होंने अपने कनिष्ठ पुत्र पुरु की युवावस्था को माँगकर अपने लिए प्रयोग किया। राम के लिए पितृभक्ति ही जिन्दगी है तभी तो उन्होंने राज-पाट त्यागकर चौदह वर्ष वन में व्यतीत किए। रावण के लिए अभिमान ही जिन्दगी है तभी तो प्रकाण्ड पण्डित और वेदवेत्ता होते हुए भी उन्होंने सीता का अपहरण किया। कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि कर्म ही जिन्दगी है। एकलव्य के लिए गुरुभक्ति जिन्दगी है। कर्ण के लिए दान ही जिन्दगी है, दान के समक्ष उनके लिए उनके अमोघ कवच और कुण्डल का भी कुछ भी महत्व नहीं है। मोक्षाभिलाषी योगियों के लिए मोक्ष ही जिन्दगी है।

हूणों, तुर्कों, मुगलों, अंग्रेजों के लिए लूटमार ही जिन्दगी थी जिन्होंने भारतभूमि को पददलित किया। मंगलसिंह, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, सुभाषचन्द्र बोस जैसे क्रान्तिकारियों के लिए देश की स्वतन्त्रता के क्रान्ति करना ही जिन्दगी थी।

आज के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो सत्ता, धन और सुख प्राप्ति ही जिन्दगी है इसीलिए तो नेता भ्रष्टतम कार्य करने से नहीं चूकते, अधिकारियों ने घूँस लेना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ रखा है, व्यापारी खुलेआम कालाबाजारी करते हैं, शिक्षा-चिकित्सा जैसे सेवा कार्य व्यापार बन कर रह गए हैं।

अब कैसे कहा जाय कि जिन्दगी क्या है?

अजीब बात तो यह है कि हम जिन्दगी भले ही जाने-समझें नहीं किन्तु जिन्दगी है कि हमें अच्छी प्रकार से नचाती है, कभी सुख का बोध कराती है तो कभी दुःख का, कभी आशा के दीप जला देती है तो कभी निराशा के अन्धकार में धकेल देती है। हमें कठपुतली बनाकर डोर अपनी उँगलियों में बाँध लेती है और खूब नचाती है हमें, हम उसकी उँगलियों के इशारे पर नाचते हैं किन्तु समझते यही हैं कि जो कुछ भी हम कर रहे हैं वह स्वयं ही कर रहे हैं, हमें जरा भी भास नहीं होता कि हम किसी दूसरे के इशारे पर नाच रहे हैं।

विचित्र है यह जिन्दगी, हमेशा भरमाती रहती है हमें। हम बरसों के लिए सामान जुटा कर रख लेते हैं और यह पल भर में हमें चलता कर देती है, तभी तो किसी शायर ने कहा है -

ख़बर पल की नहीं,सामां उम्र भर का।

शायरों और गीतकारों ने भी जिन्दगी को अपने-अपने तौर पर शेरों और गीतों में ढाला है। जफ़र जिन्दगी को मात्र चार दिन का मान कर कहते हैं -

उम्रे दराज़ माँग के लाए थे चार दिन
दो आरजू में कट गए दो इन्तजार में।

गुलजार जी को लगता है कि जिन्दगी सभी जगह है पर उनके घर में नहीं है, तभी तो कहते हैं -

जिन्दगी, मेरे घर आना जिन्दगी...

योगेश को जिन्दगी कभी हँसाने वाली तो कभी रुलाने वाली पहेली लगती है और वे कहते हैं -

जिन्दगी, कैसी है पहेली हाए
कभी तो हँसाए, कभी ये रुलाए...

जिन्दगी को अलग-अलग फिल्मी गीतकार अलग अलग रूप में देखते हैं, कोई कहता है -

जिन्दगी क्या है, गम का दरिया है
ना जीना यहाँ बस में, न मरना यहाँ बस में, अजब दुनया है

तो कोई कहता है -

जिन्दगी का सफर, है ये कैसा सफर
कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं

किसी को लगता है हार कर मुस्कुराना ही जिन्दगी है -

कोई जीत कर खुश हुआ तो क्या हुआ,
सब कुछ हार कर मुस्कुराना जिन्दगी हैं!

कोई जिन्दगी से बहुत खुश है तो कोई जिन्दगी से बहुत निराश।

कोमा में रहने वाले व्यक्ति की जिन्दगी जिन्दगी न होते हुए भी जिन्दगी ही है। असाध्य रोग के कारण असहनीय पीड़ा सहन करने वाला व्यक्ति मृत्यु की कामना करता है पर जिन्दगी को जीने के लिए विवश है। अनेक बार जिन्दगी मौत से भी बदतर होती है पर किसी को भी स्वयं अथवा किसी अन्य को मार डालने का अधिकार नहीं  है, भले ही दया करके मार डालने (murcy killing) का ही मामला क्यों न हो। यदि किसी हम जीवन नहीं दे सकते तो उसे मौत देने का अधिकार हमें हमें कैसे मिल सकता है। अच्छी हो या बुरी, जिन्दगी को जीना एक विवशता है।

पर क्यो विवश रहे कोई? जीने की इच्छा न होते हुए भी क्यों जिए कोई?

बैठे रहोगे दश्त में कब तक हसन रजा
जीना अगर नहीं है तो मर जाना चाहिए!

Sunday, April 17, 2011

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 25 (Hindi Proverbs)


बाँझ का जाने प्रसव की पीड़ा

अर्थः पीड़ा को सहकर ही समझा जा सकता है।

बाड़ ही जब खेत को खाए तो रखवाली कौन करे

अर्थः रक्षक का भक्षक हो जाना।

बाप भला न भइया, सब से भला रूपइया

अर्थः धन ही सबसे बड़ा होता है।

बाप न मारे मेढकी, बेटा तीरंदाज़

अर्थः छोटे का बड़े से बढ़ जाना।

बाप से बैर, पूत से सगाई

अर्थः पिता से दुश्मनी और पुत्र से लगाव।

बारह गाँव का चौधरी अस्सी गाँव का राव, अपने काम न आवे तो ऐसी-तैसी में जाव

अर्थः बड़ा होकर यदि किसी के काम न आए, तो बड़प्पन व्यर्थ है।

बारह बरस पीछे घूरे के भी दिन फिरते हैं

अर्थः एक न एक दिन अच्छे दिन आ ही जाते हैं।

बासी कढ़ी में उबाल नहीं आता

अर्थः काम करने के लिए शक्ति का होना आवश्यक होता है।

बासी बचे न कुत्ता खाय

अर्थः जरूरत के अनुसार ही सामान बनाना।

बिंध गया सो मोती, रह गया सो सीप

अर्थः जो वस्तु काम आ जाए वही अच्छी।

बिच्छू का मंतर न जाने, साँप के बिल में हाथ डाले

अर्थः मूर्खतापूर्ण कार्य करना।

बिना रोए तो माँ भी दूध नहीं पिलाती

अर्थः बिना यत्न किए कुछ भी नहीं मिलता।

बिल्ली और दूध की रखवाली?

अर्थः भक्षक रक्षक नहीं हो सकता।

बिल्ली के सपने में चूहा

अर्थः जरूरतमंद को सपने में भी जरूरत की ही वस्तु दिखाई देती है।

बिल्ली गई चूहों की बन आयी

अर्थः डर खत्म होते ही मौज मनाना।

बीमार की रात पहाड़ बराबर

अर्थः खराब समय मुश्किल से कटता है।

बुड्ढी घोड़ी लाल लगाम

अर्थः वय के हिसाब से ही काम करना चाहिए।

बुढ़ापे में मिट्टी खराब

अर्थः बुढ़ापे में इज्जत में बट्टा लगना।

बुढि़या मरी तो आगरा तो देखा

अर्थः प्रत्येक घटना के दो पहलू होते हैं - अच्छा और बुरा।




हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 26 (Hindi Proverbs)

बूँद-बूँद से घड़ा भरता है

अर्थः थोड़ा-थोड़ा जमा करने से धन का संचय होता है।

बूढे तोते भी कही पढ़ते हैं

अर्थः बुढ़ापे में कुछ सीखना मुश्किल होता है।

बिल्ली के भागों छींका टूटा

अर्थः सौभाग्य।

बोए पेड़ बबूल के आम कहाँ से होय

अर्थः जैसा कर्म करोगे वैसा ही फल मिलेगा।

भरी गगरिया चुपके जाय

अर्थः ज्ञानी आदमी गंभीर होता है।

भरे पेट शक्कगर खारी

अर्थः समय के अनुसार महत्व बदलता है।

भले का भला

अर्थः भलाई का बदला भलाई में मिलता है।

भलो भयो मेरी मटकी फूटी मैं दही बेचने से छूटी

अर्थः काम न करने का बहाना मिल जाना।

भलो भयो मेरी माला टूटी राम जपन की किल्लत छूटी

अर्थः काम न करने का बहाना मिल जाना।

भागते भूत की लँगोटी ही सही

अर्थः कुछ न मिलने से कुछ मिलना अच्छा है।

भीख माँगे और आँख दिखाए

अर्थः दयनीय होकर भी अकड़ दिखाना।

भूख लगी तो घर की सूझी

अर्थः जरूरत पड़ने पर अपनों की याद आती है।

भूखे भजन न होय गोपाला

अर्थः भूख लगी हो तो भोजन के अतिरिक्त कोई अन्य कार्य नहीं सूझता।

भूल गए राग रंग भूल गई छकड़ी, तीन चीज़ याद रहीं नून तेल लकड़ी

अर्थः गृहस्थीं के जंजाल में फँसना।

भैंस के आगे बीन बजे, भैंस खड़ी पगुराय

अर्थः मूर्ख के आगे ज्ञान की बात करना बेकार है।

भौंकते कुत्ते को रोटी का टुकड़ा

अर्थः जो तंग करे उसको कुछ दे-दिला के चुप करा दो।

Saturday, April 16, 2011

पुण्य करने के लिये पाप भी करना पड़ता है

"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!"

"नमस्काऽऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!"

"सुनाइये क्या चल रहा है?"

"चलना क्या है? अभी अभी एक पोस्ट लिखकर डाला है अपने ब्लॉग में और अब हम अन्य मित्रों के पोस्टों को देख रहे हैं।"

"अच्छा यह बताइये लिख्खाड़ानन्द जी, आप इतने सारे पोस्ट लिख कैसे लेते हैं? भइ हम तो बड़ी मुश्किल से सिर्फ टिप्पणी ही लिख पाते हैं, कई बार तो कुछ सूझता ही नहीं तो सिर्फ nice , बहुत अच्छा, सुन्दर, बढ़िया लिखा है जैसा ही कुछ भी लिख देते हैं। पोस्ट लिखना तो सूझ ही नहीं पाता हमें।"

"अरे टिप्पण्यानन्द जी! पोस्ट लिखना कौन सा कठिन काम है, कोई भी लिख सकता है।"

"कैसे?"

"बताता हूँ पर पहले आप यह बताइये कि दया करना पुण्य और क्रोध करना पाप होता है कि नहीं?"

"जी हाँ, ऐसा ही है, बिल्कुल सही कह रहे हैं आप!"

"अब मान लीजिये कि आप कहीं जा रहे हैं और रास्ते में देखते हैं कि एक आदमी किसी मासूम बच्चे को पीट रहा है और बहुत से लोग चुपचाप देख रहे हैं। आपके पूछने पर लोग बताते हैं कि बच्चे को मारने वाला वह आदमी बच्चे से भीख मँगवाता है। आज बच्चे ने भीख में कुछ भी नहीँ लाया इसीलिये वह बच्चे को मार रहा है। ऐसे में आप क्या करेंगे? आप तो हट्टे-कट्टे आदमी हैं, क्या आप उस आदमी को छोड़ देंगे?"

"अजी, मैं तो फाड्डालूँगा स्साले को। मार मार कर कचूमर निकाल दूँगा। इतना मारूँगा स्साले को कि फिर कभी बच्चे को पीटना ही भूल जायेगा।"

"क्यों मारेंगे उसे आप? क्योंकि उस मासूम बच्चे पर दया आई आपको इसीलिये ना?"

"जी हाँ!"

"तो बच्चे पर दया करके आपने पुण्य किया कि नहीं?"

"बिल्कुल किया जी!"

"अच्छा अब बताइये उस आदमी को मारने के लिये क्रोध भी किया था ना आपने? बिना क्रोध किये तो किसी को मारा नहीं जा सकता!"

"हाँ जी, बहुत गुस्सा आया मुझे।"

"तो क्रोध करके आपने पाप किया कि नहीं?"

"अजी आप फँसाने वाली बात कर रहे हैं।"

"आप तो बस इतना बताइये कि क्रोध करके आपने पाप किया कि नहीं?"

"हाँ जी किया?"

"तो मुझे बताइये कि वास्तव में आपने क्या किया? दया किया कि क्रोध? पुण्य किया कि पाप?"

"अब मैं क्या बताऊँ जी! मेरा तो दिमाग ही घूम गया।"

"देखिये टिप्पण्यानन्द जी! वास्तव में आपने बच्चे पर दया किया किन्तु सिर्फ दया करके आप उस बच्चे को बचा नहीं सकते थे। उसे बचाने के लिये आपको बच्चे को उस दुष्ट आदमी से छुटकारा नहीं दिला सकते थे, बच्चे को उस जालिम से बचाने के लिये उसको मारना भी जरूरी था जो कि बिना क्रोध किये हो ही नहीं सकता। है कि नहीं?"

"जी, बिल्कुल!"

"तो इसका मतलब यह हुआ कि दया करने के लिये क्रोध का सहारा लेना जरूरी है। पुण्य करने के लिये पाप भी करना पड़ता है। पाप और पुण्य का एक दूसरे के बिना काम ही नहीं चल सकता। याने कि पाप और पुण्य एक दूसरे के पूरक हैं।"

"आप की बात सुनने के बाद मुझे भी ऐसा ही लगने लगा है कि पाप और पुण्य एक दूसरे के पूरक हैं।"

"अब हम दोनों के बीच अभी जो बातें हुई हैं उसी को यदि मैं 'पुण्य करने के लिये पाप भी करना पड़ता है' शीर्षक देकर अपने ब्लोग में डाल दूँ तो बन गई ना एक पोस्ट?"

"बिल्कुल बन गई जी!"

"तो जब मैं कहता हूँ कि 'पोस्ट लिखना कौन सा कठिन काम है, कोई भी लिख सकता है' तो क्या गलत कहता हूँ?"

"बिल्कुल सही कहते हैं जी आप!"

"चाय पियेंगे आप? मँगवाऊँ?"

"नहीं लिख्खाड़ानन्द जी, फिर कभी पी लूँगा, आज जरा जल्दी में हूँ। चलता हूँ, नमस्कार!"

"नमस्कार!"

Friday, April 15, 2011

भारतीय सार्वजनिक सेवा प्रसारण का सबसे बड़ा नेटवर्क - दूरदर्शन

दूरदर्शन (Doordarshan) भारतीय सार्वजनिक सेवा प्रसारण का सबसे बड़ा नेटवर्क है जिसे भारत सरकार की निगम प्रसार भारती संचालित करती है। स्टूडिओ एवं ट्रांसमीटरों के के आधारभूत संरचना के हिसाब से यह विश्व की सबसे बड़ी प्रसारण संस्था है। दूरदर्शन का पहला प्रसारण 15 सितंबर, 1959 को हुआ था। आरम्भिक दिनों में दूरदर्शन से प्रतिदिन आधे घण्टे का प्रसारण हुआ करता था जो कि शैक्षिक और विकास कार्यक्रमों के रूप में हुआ करता था।

भारत में नियमित टेलिविजन सेवा का आरम्भ दिल्ली में सन् 1965 से हुई। टेलिविजन की नियमित सेवा सन् 1972 में मुम्बई और सन् 1975 में कोलकाता तथा चेन्नई में शुरू कर दी गई। उन दिनों टेलिविजन सेवा आकाशवाणी के एक भाग के रूप में हुआ करता था। सन् 1975 तक भारत के केवल सात नगरों में ही टेलिविजन सेवा उपलब्ध थी और दूरदर्शन ही भारत का एक मात्र टेलिविजन चैनल था।

सन् 1976 में दूरदर्शन को आकाशवाणी से अलग कर दिया गया और यह भारत सरकार के एक स्वतन्त्र विभाग में परिणित हो गया। सन् 1982 के एशियाई खेलों के दौरान दिल्ली से रंगीन प्रसारण की शुरुवात हुई और इसके साथ ही देश में नेशनल टेलिकास्ट का आरम्भ भी हुआ। 1982 में ही भारत के बाजारों का रंगीन टेलिविजन से परिचय हुआ। दूरदर्शन के द्वारा एशियाई खेलों के रंगीन लाइव्ह प्रसारण ने भारतीय जनता का मन मोह लिया। इसके बाद देश भर में टेलिविजन प्रसारण नेटवर्क बनाने का आरम्भ भी हो गया, सन् 1984 में तो देश में लगभग हर दिन एक ट्रांसमीटर लगाया जाने लगा।

सन् 1984 में दूरदर्शन पर पहला सोप ऑपेरा "हम लोग" का प्रसारण हुआ जिसके 156 एपीसोड लगातार 17 महीने तक प्रसारित किये गये जिसका आनन्द देश के 5 करोड़ दर्शकों ने उठाया था। उसके बाद तो दूरदर्शन ने एक के बाद एक कई सफल टीवी सीरियल्स के प्रसारण किए जिनमें बुनियाद, ये जो है जिन्दगी, नुक्कड़, रामायण, महाभारत आदि प्रमुख हैं।

आज भारत की 90 प्रतिशत से भी अधिक जनसंख्या तक दूरदर्शन अपने 1400 स्थानीय ट्रांसमीटरों के माध्यम से अपने कार्यक्रम पहुँचाती है।

Thursday, April 14, 2011

नोबल प्राइज़ के समय लिखा गया रवीन्द्रनाथ टैगोर का जीवन परिचय

रवीन्द्रनाथ टैगोर को जब नोबल पुरस्कार से नवाजा गया था, तो उस समय अंग्रेजी में उनकी संक्षिप्त जीवनी लिखी गई थी जिसे कि Les Prix Nobel पुस्तक श्रंखला में प्रथम बार प्रकाशित किया गया था। अंग्रेजी में लिखा गया रवीन्द्रनाथ टैगोर का वह जीवन परिचय नोबलप्राइज.ऑर्ग में उपलब्ध है (लिंक है - Rabindranath Tagore) । प्रस्तुत है उसी अंग्रेजी लेख का हिन्दी भावानुवाद -




रवीन्द्रनाथ टैगोर (1861-1941) देबेन्द्रनाथ टैगोर के कनिष्ठ पुत्र थे, देबेन्द्रनाथ ब्रह्मसमाज, जो कि उन्नीसवीं सदी के बंगाल का एक नया धार्मिक पंथ था तथा उपनिषद में वर्णित परम वेदान्त के आधार पर हिन्दू धर्म के पुनरुद्धार के उद्देश्य से बना था, के प्रमुख थे। रवीन्द्रनाथ टैगोर की शिक्षा-दीक्षा घर में ही हुई थी, यद्यपि सत्रह वर्ष की आयु में उन्हें औपचारिक शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजा गया, किन्तु उन्होंने वहाँ पर वे अपनी शिक्षा पूर्ण न कर सके। परिपक्व अवस्था प्राप्त होने पर उन्हें अपने बहु-आयामी साहित्यिक गतिविधियों के अलावा अपने पारिवारिक भू-संपदा की व्यवस्था भी करनी पड़ी जिसके कारण वे सामान्य लोगों के सम्पर्क में आए और सामाजिक सुधारों के प्रति उनकी रुचि विकसित हुई। साथ ही उन्होंने शान्तिनिकेतन में एक प्रयोगात्मक स्कूल का संचालन भी आरम्भ कर दिया जिसमें वे उपनिषदों में निहित आदर्शों की शिक्षा देने का प्रयास करते थे। समय समय पर उन्होंने गैर भावुक तथा दूरदर्शी तरीकों से भारतीय राष्ट्रवादी आन्दोलनों में भी भाग लिया ‌तथा आधुनिक भारत के राजनीतिक पिता गांधी उनके समर्पित मित्र थे। टैगोर को 1915 में सत्तारूढ़ ब्रिटिश सरकार ने नाइट की उपाधि प्रदान की, लेकिन कुछ ही वर्षों के भीतर उसे उन्होंनें भारत में ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ एक विरोध के रूप में वापस कर दिया।

जल्दी ही वे अपनी मातृभूमि बंगाल में सफल लेखक के रूप में ख्याति मिल गई। उनकी कुछ कविताओं के अनुवाद के कारण उन्होंने पश्चिम में भी अपनी पहचान बना ली। वास्तव में उनकी ख्याति ऊँचाइयों को छूने लगी और उन्हें व्याख्यान तथा मित्रता के उद्देश्य से महद्वीपों की यात्राएँ करवाने लगी। संसार के लिए वे भारत की आध्यात्मिक विरासत की आवाज बन गए, और भारत के लिए, वशेषतः बंगाल के लिए, वे एक जीती-जागती महान संस्था बन गए। यद्यपि उन्होंने साहित्य की सभी विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई किन्तु मूलतः वे एक कवि थे।

उनके पचास बेजोड़ कविता संग्रहों में से कुछ हैं - मानसी (1890) [एक आदर्श], सोनार तारी (1894) [सुनहरी नाव], गीतांजलि (1910) [गीत प्रस्तुति], गीतिमाल्य (1914) [गानों का पुष्पहार], और बालक (1916) [क्रेन की उड़ान]। उनकी कविताओं के अंग्रेजी प्रस्तुतीकरण, जिसमें Gardener (1913), Fruit-Gathering (1916), और The Fugitive (1921) शामिल हैं, आम तौर पर मूल बंगाली प्रस्तुति के अनुरूप नहीं हैं किन्तु उनमें से अधिकतर प्रशंसित हैं।

टैगोर के प्रमुख नाटक हैं राजा (1910) [अंधेरी कोठरी का राजा], डाकघर (1912) [पोस्ट ऑफिस], अचलायतन (1912) [अचल], मुक्तधारा (1922) [झरना], और रक्तरवि (1926)। उन्होंने अनेक लघुकथाओं तथा उपन्यासों की भी रचना की है जिनमें से कुछ हैं - गोरा (1910), घरे-बारे (1916), और योगायोग (1929)। इसके अतिरिक्त उन्होंने संगीत नाटक, नृत्य नाटक, सभी प्रकार के निबंध, यात्रा डायरी, और दो आत्मकथाएँ भी लिखी हैं। टैगोर ने हमें अनेक चित्रकारी तथा पेंटिंग्स और गीत, जिनके लिए उन्होंने स्वयं सगीत रचना भी की थी, प्रदान किए हैं।

मूल अंग्रेजी लेख -

Biography

Rabindranath Tagore (1861-1941) was the youngest son of Debendranath Tagore, a leader of the Brahmo Samaj, which was a new religious sect in nineteenth-century Bengal and which attempted a revival of the ultimate monistic basis of Hinduism as laid down in the Upanishads. He was educated at home; and although at seventeen he was sent to England for formal schooling, he did not finish his studies there. In his mature years, in addition to his many-sided literary activities, he managed the family estates, a project which brought him into close touch with common humanity and increased his interest in social reforms. He also started an experimental school at Shantiniketan where he tried his Upanishadic ideals of education. From time to time he participated in the Indian nationalist movement, though in his own non-sentimental and visionary way; and Gandhi, the political father of modern India, was his devoted friend. Tagore was knighted by the ruling British Government in 1915, but within a few years he resigned the honour as a protest against British policies in India.
Tagore had early success as a writer in his native Bengal. With his translations of some of his poems he became rapidly known in the West. In fact his fame attained a luminous height, taking him across continents on lecture tours and tours of friendship. For the world he became the voice of India's spiritual heritage; and for India, especially for Bengal, he became a great living institution.
Although Tagore wrote successfully in all literary genres, he was first of all a poet. Among his fifty and odd volumes of poetry are Manasi (1890) [The Ideal One], Sonar Tari (1894) [The Golden Boat], Gitanjali (1910) [Song Offerings], Gitimalya (1914) [Wreath of Songs], and Balaka (1916) [The Flight of Cranes]. The English renderings of his poetry, which include The Gardener (1913), Fruit-Gathering (1916), and The Fugitive (1921), do not generally correspond to particular volumes in the original Bengali; and in spite of its title, Gitanjali: Song Offerings (1912), the most acclaimed of them, contains poems from other works besides its namesake. Tagore's major plays are Raja (1910) [The King of the Dark Chamber], Dakghar (1912) [The Post Office], Achalayatan (1912) [The Immovable], Muktadhara (1922) [The Waterfall], and Raktakaravi (1926) [Red Oleanders]. He is the author of several volumes of short stories and a number of novels, among them Gora (1910), Ghare-Baire (1916) [The Home and the World], and Yogayog (1929) [Crosscurrents]. Besides these, he wrote musical dramas, dance dramas, essays of all types, travel diaries, and two autobiographies, one in his middle years and the other shortly before his death in 1941. Tagore also left numerous drawings and paintings, and songs for which he wrote the music himself.

तो यह था रवीन्द्रनाथ टैगोर का वह परिचय जिसे कि उन्हें नोबल पुरस्कार प्रदान करते समय लिखा गया था। किन्तु इसके अलावा भी उनके विषय में अनेक उल्लेखनीय बाते हैं जैसे कि -
  • उन्होंने एक हजार से भी अधिक कविताओं तथा दो हजार से भी अधिक गीतों की रचना की है!
  • वे एक संगीतकार, अभिनेता, गायक और जादूगर भी थे!
  • उनके लिखे गीत दो देशों के राष्ट्रगान हैं - एक भारत का और दूसरा बँगलादेश का!
  • आज भी बंगाल में उनके गीत-संगीत के बगैर कोई समारोह शुरू नहीं होता!
....आदि-आदि-इत्यादि।

वास्तव में कहा जाए तो रवीन्द्रनाथ टैगोर उन साहित्य-स्रष्टाओं में से एक हैं जिन्हें भाषा स्थान, काल की सीमाओं में बाँधा ही नहीं जा सकता। उनकी कीर्ति अक्षय है।

Wednesday, April 13, 2011

क्या धर्म में आध्यात्मिकता का स्थान भौतिकता ने ले लिया है?

कल समस्त भारत में हर्षोल्लास का माहौल था, हर्ष और उल्लास था भगवान श्री रामचन्द्र जी के जन्म दिवस अर्थात् रामनवमी मनाने का! स्थान-स्थान पर भंडारे का आयोजन था, जगह-जगह हलुआ आदि मिष्ठान्न बाँटे जा रहे थे। मेरा बेटा भी पूर्ण अपनी निष्ठा से लोगों में हलुआ बाँटने में तल्लीन था। राम के प्रति उसकी इस निष्ठा को देखकर मैं सोचने लगा कि आज के युवाओं में अभी तक अपने धर्म और आदर्श के प्रति आस्था मरी नहीं है।

किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि यह आस्था केवल हर्षोल्लास मनाने तक ही सीमित है। हर्षोल्लास एक भौतिक सुख है और चूँकि यह किसी धार्मिक त्यौहार को मनाने से प्राप्त होता है इसलिए हम धर्म को मान रहे हैं। हम धर्म को मान रहे हैं भौतिकता प्राप्त करने के लिए, न कि अध्यात्म के लिए। धर्म में आध्यात्मिकता का स्थान भौतिकता ने ले लिया है। आज का युवा राम और कृष्ण के आदर्शों को न जानता है और न ही जानना चाहता है, यदि जान भी जाए तो उन आदर्शों का अनुगमन तो कदापि नहीं करना चाहता। राम ने अपने पिता की आज्ञा का अनुसरण करके चौदह वर्ष वन में रहकर बिताए, एक राजकुमार होने पर भी तपस्वियों-सा जीवन व्यतीत किया। किन्तु आज एक पिता अपने पुत्र को आज्ञा देने की स्थिति में ही नहीं है, यदि आज्ञा दे भी दे तो पुत्र उसे मानने से ही इन्कार कर देगा और उल्टे पिता को ही सीख देने लगेगा कि आप कुछ समझते तो हैं नहीं! पुत्र पिता से अधिक समझदार हो गया है। ऐसी बात नहीं है कि पहले पुत्र पिता से अधिक समझदार नहीं हुआ करते थे, अवश्य ही हुआ करते थे क्योंकि यह प्रकृति का नियम है कि बाद में आने वाली पीढ़ी अपनी पहली पीढ़ी से अधिक बुद्धिमान होती है। राम भी अपने पिता दशरथ से अधिक बुद्धिमान थे। किन्तु उन्होंने पिता की आज्ञा का अनुसरण किया और आज पिता की आज्ञा की अवहेलना होती है।

क्या कारण है आखिर इस प्रकार के अन्तर आने का?

इसका कारण सिर्फ हमारी शिक्षा है। पहले माता-पिता, गुरु आदि के प्रति सम्मान और निष्ठा की शिक्षा दी जाती थी किन्तु आज ऐसी शिक्षा का लोप हो चुका है। शिक्षा से संस्कार बनते हैं और संस्कार से विचार। यही कारण है कि आज हमें जिस प्रकार की शिक्षा मिलती है उसी के अनुरूप हमारे विचार बन गए हैं। आज की शिक्षा हमे अपने माता-पिता, गुरुजनों आदि के प्रति निष्ठा और सम्मान का भाव रखना नहीं सिखाती इसलिए आज हम उनकी अवहेलना करने लग गए हैं। हम अपने देश की महान शिक्षा को, जिसने भारत को विश्वगुरु कहलाने का श्रेय प्रदान किया था, भूल चुके हैं और पाश्चात्य शिक्षा के पीछे अंधे होकर भागे जा रहे हैं। हमारी प्राचीन शिक्षा अध्यात्म का पाठ सिखाती थी किन्तु आधुनिक शिक्षा केवल भौतिकता का पाठ सिखाती है। यही कारण है कि येन-केन-प्रकारेण हम सिर्फ भौतिक सुख ही प्राप्त करने में लिप्त हो चुके हैं। हमारा सिद्धान्त ही बन गया है -

घटं भिन्द्यात् पटं छिन्द्यात् कुर्याद्रासभरोहण।
येन केन प्रकारेण प्रसिद्धः पुरुषो भवेत्॥


(घड़े तोड़कर, कपड़े फाड़कर या गधे पर सवार होकर, चाहे जो भी करना पड़े, येन-केन-प्रकारेण प्रसिद्धि प्राप्त करना चाहिए।)

भौतिक सुख प्राप्त करने के लिए धन का होना आवश्यक है, धन के बिना आप भौतिक सुख प्राप्त नहीं कर सकते, बंगला, कार, बाइक, टीव्ही, फ्रीज जैसी वस्तुएँ, जो कि भौतिक सुख प्राप्त करने के साधन हैं, धन के बिना प्राप्त नहीं हो सकतीं। अतः धन प्राप्त करना ही हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य हो गया है भले ही इसके लिए हमें कुछ भी न क्यों करना पड़े। धन् प्राप्त करने के इसी उद्देश्य ने आज देश को भ्रष्टाचार के गर्त में धकेल कर रख दिया है।

Tuesday, April 12, 2011

श्री रामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये

लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्री रामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥

Monday, April 11, 2011

भारत में क्रिकेट

क्रिकेट, भारत का राष्ट्रीय खेल न होने के बावूद भी, आज देश में सर्वाधिक लोकप्रिय खेल है। भारत में क्रिकेट के इतिहास पर यदि नजर डालें तो पता चलता है कि भारत में क्रिकेट के अस्तित्व का आधार वहाँ पर ब्रिटिश राज का पनपना और उसका विकास होना ही रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार भारत में सन् 1721 में ईस्ट इण्डिया कंपनी के अंग्रेज नौकाचालकों द्वारा बड़ोदा के निकट कॉम्बे में पहली बार क्रिकेट खेलने का निश्चित सन्दर्भ मिलता है। यद्यपि कलकत्ता क्रिकेट एवं फुटबाल क्लब सन् 1792 में अस्तित्व में आया किन्तु सम्भवतः इस क्ब की स्थापना उससे पहले ही हो चुकी थी। अंग्रेजों के द्वारा टीपू सुल्तान की घेराबन्दी करके पराजित करने के पश्चात् सन् 1799 में दक्षिण भारत के श्रीरंगापटनम्  एक और क्लब स्थापित किया। सन् 1864 में मद्रास और कलकत्ता के मध्य हुए मैच को भारत में प्रथम श्रेणी के क्रिकेट का आरम्भ माना जा सकता है। 19 वीं सदी में मुंबई में हुए त्रिकोणीय और चतुष्कोणीय मैचों की भारत में क्रिकेट को स्थिरता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका रही।

भारतीयों में बंबई के अल्पसंख्यक पारसियों ने सर्वप्रथम उच्च स्तरीय क्रिकेट खेल का प्रदर्शन किया। सन् 1892 में एक क्रकेट मैच पारसियों तथा यूरोपियन्स के मध्य खेला गया, सन्  1907 और  1912 में क्रमशः हिन्दू और मुस्लिम टीम्स भी इस प्रतियोगिता में शामिल हो गए। पलवनकर बन्धु, शिवराम, गनपत और विट्ठल क्रिकेट के स्टार माने जाने लगे। उल्लेखनीय है कि पलवनकर बन्धु उस जाति से सम्बन्धित थे जिसे उस जमाने में अछूत समझा जाता था, किन्तु क्रिकेट के खेल में उन्हें बराबरी का दर्जा प्रदान किया गया।

सन् 1929 में 'बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल फॉर क्रिकेट इन इण्डिया' (Board of Control for Cricket in India) की स्थापना हुई जिसके तत्वावधान में पहली बार टेस्ट मैच का आयोजन हुआ। सन् 1935 में रनजी ट्रॉफी (Ranji Trophy) का आरम्भ हुआ जो कि आज तक जारी है।

भारतीय क्रिकेट टीम सन् 1983 में पहली बार विश्व चैम्पियन बनी, सन् 2003 में पुनः वर्ल्ड कप के फायनल मैच में पहुँची किन्तु भाग्य ने साथ नहीं दिया और फायनल मैच गई किन्तु आज सन् 2011 में उसे पुनः विश्व चैम्पियन बनने का अवसर प्राप्त हुआ।

Sunday, April 10, 2011

हिन्दी कहावतें तथा लोकोक्तियाँ - 24 (Hindi Proverbs)


पाँच पंच मिल कीजे काजा, हारे-जीते कुछ नहीं लाजा

अर्थः मिलकर काम करने पर हार-जीत की जिम्मेदारी एक पर नहीं आती।

पाँचों उँगलियाँ घी में

अर्थः चौतरफा लाभ।

पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होतीं

अर्थः सब आदमी एक जैसे नहीं होते।

पागलों के क्या् सींग होते हैं

अर्थः पागल भी साधारण मनुष्य होता है।

पानी केरा बुलबुला अस मानुस के जात

अर्थः जीवन नश्वर है।

पानी पीकर जात पूछते हो

अर्थः काम करने के बाद उसके अच्छे-बुरे पहलुओं पर विचार करना।

पाप का घड़ा डूब कर रहता है

अर्थः पाप जब बढ़ जाता है तब विनाश होता है।

पिया गए परदेश, अब डर काहे का

अर्थः जब कोई निगरानी करने वाला न हो , तो मौज उड़ाना।

पीर बावर्ची भिस्ती खर

अर्थः किसी एक के द्वारा ही सभी तरह के काम करना।

पूत के पाँव पालने में पहचाने जाते हैं

अर्थः वर्तमान लक्षणों से भविष्य का अनुमान लग जाता है।

पूत सपूत तो का धन संचय, पूत कपूत तो का धन संचय

अर्थः सपूत स्वयं कमा लेगा, कपूत संचित धन को उड़ा देगा।

पूरब जाओ या पच्छिम, वही करम के लच्छन

अर्थः स्थान बदलने से भाग्य और स्व‍भाव नहीं बदलता।

पेड़ फल से जाना जाता है

अर्थः कर्म का महत्व उसके परिणाम से होता है।

प्यासा कुएँ के पास जाता है

अर्थः बिना परिश्रम सफलता नहीं मिलती।

फिसल पड़े तो हर गंगे

अर्थः बहाना करके अपना दोष छिपाना।

बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद

अर्थः ज्ञान न होना।

बकरे की जान गई खाने वाले को मज़ा नह आया

अर्थः भारी काम करने पर भी सराहना न मिलना।

बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है

अर्थः शक्तिशाली व्यक्ति निर्बल को दबा लेता है।

बड़े बरतन का खुरचन भी बहुत है

अर्थः जहाँ बहुत होता है वहाँ घटते-घटते भी काफी रह जाता है।

बड़े बोल का सिर नीचा

अर्थः घमंड करने वाले को नीचा देख्‍ाना पड़ता है।

बनिक पुत्र जाने कहा गढ़ लेवे की बात

अर्थः छोटा आदमी बड़ा काम नहीं कर सकता।

बनी के सब यार हैं

अर्थः अच्छे दिनों में सभी दोस्त बनते हैं।

बरतन से बरतन खटकता ही है

अर्थः जहाँ चार लोग होते हैं वहाँ कभी अनबन हो सकती है।

बहती गंगा में हाथ धोना

अर्थः मौके का लाभ उठाना।

Saturday, April 9, 2011

अपना अपना भाग्य!

एक ओर तो एक भला आदमी जीवन भर ईमानदारीपूर्वक काम करता है पर अपने लिए एक छोटा सा मकान भी नहीं बनवा सकता, केवल अपने परिवार के भरण-पोषण के लायक ही धन कमा पाता है, वह भी बहुत मुश्किल से, जीवन भर कष्ट ही झेलते रहता है और दूसरी तरफ एक भ्रष्ट आदमी अत्यन्त ही अल्पावधि में जमीन-जायदाद, स्वर्णाभूषणादि सभी कुछ बना लेता है, खान-पान में किसी प्रकार की कमी नहीं रहती, सदा सुख भोगते रहता है ..... अपना अपना भाग्य!

देश की स्वतन्त्रता के लिए प्राणों की आहुति दे देने वाले क्रान्तिकारियों को भुला दिया जाता है, उनके परिजनों की आर्थिक स्थिति बेहाल रहती है और अहिंसक आन्दोलनों में भाग लेकर अल्पकाल के लिए जेल में रहकर आने वालों को स्वतनत्रता सेनानी के सम्मान से नवाजा जाता है, उनके परिजनों को सरकार की ओर से अनेक प्रकार की सुविधा प्रदान की जाती है ..... अपना अपना भाग्य!

निर्वाचित नेताओं को डेढ़ रुपये में दाल मिलता है और गरीब जनता के लिए उसी दाल की कीमत इतनी अधिक है कि वह दाल के बगैर ही भोजन करने को विवश हो जाता है ..... अपना अपना भाग्य!

सामान्य वर्ग का एक होनहार युवक अधिक योग्यता रखने के बाद भी बेरोजगार रहता है और कम योग्यता होने के बावजूद सिर्फ आरक्षण की योग्यता रखने वाला युवक अच्छी नौकरी पा जाता है ..... अपना अपना भाग्य!

धनवान दिनों दिन और भी धनवान होते जाते हैं और गरीब दिनों दिन और भी गरीब होते जाते हैं ..... अपना अपना भाग्य!

एक ही समय में दो शिशुओं का जन्म होता है, एक अत्यन्त धनाढ्य परिवार में पैदा होता है तो दूसरा किसी कंगाल के घर ..... अपना अपना भाग्य!

चलते-चलते

कौन कहता है भारत में मँहगाई है?

संसद केंटीन के रेट्स देखिए और खुद बताइए कि क्या भारत में मँहगाई है!

चाय ..... रु.1

सूप ..... रु.5.50

दाल ..... रु.1.50

शाकाहारी थाली (दाल, सब्जी, 4 रोटी, चाँवल/पुलाव, दही और सलाद) ..... रु.12.50

मांसाहारी थाली ..... रु.22

दही चाँवल ..... रु.11

वेज पुलाव ..... रु.8

चिकन बिरयानी ..... रु.34

फिश करी और चाँवल ..... रु.13

राजमा चाँवल ..... रु.7

टोमेटो राइस ..... रु.7

फिश फ्राइ ..... रु.17

चिकन करी ..... रु.20.50

चिकन मसाला ..... रु.24.50

बटर चिकन ..... रु.27

प्रति चपाती ..... रु.1

प्रति प्लेट चाँवल ..... रु.2

दोसा ..... रु.Rs.4

प्रति कटोरी खीर ..... रु.5.50

फ्रुट केक ..... रु.9.50

फ्रुट सलाद ..... रु.7

उपरोक्त दर पर हमारे द्वारा निर्वाचित नेता खाना खा सकते हैं, हम नहीं ..... अपना अपना भाग्य!

Friday, April 8, 2011

ये हाल है हिन्दी का!

आज यदि हम अपने बच्चे यदि कहते हैं यह चौंतीस रुपये का है तो वह झट से पूछता है "चौंतीस याने कि थर्टी फोर" होता है ना? "दाहिना" या "दायाँ" और "बायाँ" क्या होता है उसे पता ही नहीं है वह तो "राइट" और "लेफ्ट" ही जानता है, गनीमत है कि "सीधा हाथ" और "उल्टा हाथ" कहने पर वह समझ लेता है। "राम" वह "रामा" कहता है। "माँ", "पिताजी" जैसे शब्दों का तो लोप ही हो चुका है, उनके स्थान पर "मम्मी", "ममी", "पापा", "डैडी", "डैड" जैसे शब्दों का ही प्रचलन जहाँ-तहाँ दिखाई देता है

तो ये हाल है हिन्दी का!

ऐसे में यदि हम अपने बच्चों से हाथ की अंगुलियों के नाम पूछें तो क्या वह बता पायेगा?

यदि हम उन्हें बताएँ भी कि -

  • जिसे हम साधारणतः अँगूठा कहते हैं उसका वास्तविक नाम अंगुष्ठ है।
  • अँगूठे के बाद वाली अंगुली का नाम तर्जनी है।
  • हाथ केबीच वाली अंगुली का नाम मध्यमा है।
  • बीच वाली अंगुली तथा सबसे छोटी वाली अंगुली के बीच वाली उंगली का नाम अनामिका है।
  • हाथ की सबसे छोटी अंगुली का नाम कनिष्ठा है।
तो दूसरे ही दिन वह उसे भूल जाता है।

बच्चों की बात छोड़िए, आज हमारे समाचार पत्रों, ब्लोगों, छपी हुई किताबों तक में भी चन्द्रबिन्दु नजर नहीं आता, उसके स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग होता है।

Thursday, April 7, 2011

शाकुन्त लावण्य

स्वच्छ नीले आकाश में उड़ती हुई चिड़ियाएँ हर किसी के मन को मोह लेती हैं। शाम के समय उद्यानों में पक्षियों का कलरव में शोर का अंश होते हुए भी एक अलग प्रकार की मधुरता होती है। रंग-बिरंगी चिड़ियाओं का अपना अलग ही मनमोहक सौन्दर्य होता है। पक्षियों के इस लावण्य को ही "शाकुन्त लावण्य" कहा जाता है। आजकर हिन्दी में चिड़िया के पर्याय में प्रायः पक्षी शब्द का प्रयोग होता है, खग शब्द का भी प्रयोग कर लिया जाता है किन्तु पक्षी के लिए हिन्दी में और भी बहुत से पर्यायवाची शब्द हैं, जो हैं - विहंग, विहग, विहंगम्, शकुन, शकुन्ति, शकुनि, शाकुन्त, द्विज, अण्डज आदि।

मेनका जब विश्वामित्र से उत्पन्न अपनी कन्या को वन में एक वृक्ष के नीचे छोड़ कर चली गई थी तो शाकुन्तों (पक्षियों) ने ही उसकी रक्षा की थी। कण्व ऋषि उस कन्या को अपने आश्रम में उठा ले आए थे और चूँकि शाकुन्तों (पक्षियों) ने ही उसकी रक्षा की थी, उसका नाम शकुन्तला रख दिया था। उसी शकुन्तला ने राजा दुष्यन्त से गन्धर्व विवाह किया था तथा उनके पुत्र भरत के महाप्रतापी होने के कारण ही हमारे देश का नाम भारतवर्ष हुआ।

उपरोक्त पर्यायों में एक पर्याय द्विज भी है। इस पोस्ट में यह उल्लेख करना कि द्विज शब्द 'द्वि' और 'ज' से बना है, अनुचित नहीं होगा। "द्वि" का अर्थ होता है 'दो' और "ज" (जायते) का अर्थ होता है 'जन्म होना' या 'जन्म लेना' अर्थात् जिसका दो बार जन्म हो उसे द्विज कहते हैं। द्विज शब्द का प्रयोग पक्षी के अलावा ब्राह्मण तथा दाँत  के लिये भी होता है क्योंकि पक्षी एक बार अंडे के रूप में जन्म लेता है और दूसरी बार पक्षी के रूप में, इसी प्रकार ब्राह्मण एक बार माता के गर्भ से शिशु के रूप में जन्म लेता है और दूसरी बार उपनयन संस्कार होने पर ब्राह्मण के रूप में और दूध के दाँत एक बार उगकर बाद में गिर जाते हैं तथा बाद में पुनः नए दाँत उगते हैं।

Wednesday, April 6, 2011

अद्भुत् है हिन्दी का शब्द भण्डार!


वैसे तो प्रत्येक भाषा में एक शब्द के लिए अनेक पर्याय मिलते हैं किन्तु हिन्दी में शब्दों के पर्यायों की संख्या अद्भुत् है। हिन्दी के कई शब्द तो ऐसे हैं जिनके पन्द्रह-बीस पर्याय तक मिलते हैं। उदाहरण के लिए पानी शब्द को ही लें तो पानी के वर्तमान में प्रचिलित पर्यायवाची शब्द हमें मिलते हैं - जल, नीर सलिल, वारि। इन प्रचलित शब्दों के अलावा कम प्रयोग होने वाले पानी के पर्यायवाची शब्द हैं - आपस्, वार्, वारि, अम्भः, अम्बु, शम्बर, मेघपुष्प, घनरस। नीर शब्द का प्रयोग हिन्दी काव्य में अनेक सुन्दर प्रयोग मिलते हैं जैसे कि -
  • नयन नीर पुलकित अति गाता!
  • कबिरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर!
  • प्रियतम तो परदेस बसे हैं, नयन नीर बरसाये रे!
  • मालव धरती गहन गंभीर, पग पग रोटी डग डग नीर!
हिन्दी काव्य में कमल शब्द के पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग भी बहुतायत से पाया जाता है। कमल के प्रचलित पर्यायवाची शब्द हैं - पद्म, नलिन, अरविन्द, राजीव, सरोरुह! कमल के कम प्रयोग होने वाले पर्यायवाची शब्द हैं - महोत्पल, सहस्रपत्र, शतपत्र, कुशेशय, पंकेरुह, तामरस, सारस, सरसीरुह, विसप्रसून, राजीव, पुष्कर, अम्भोरुह आदि।

देवनागरी की एक विचित्रता यह भी है कि एक ही शब्द के अनेक अनेक मिलते हैं जैसे कि "हरि" शब्द के अर्थ हैं - विष्णु, सूर्य, चन्द्र, इन्द्र, शुक्र, यम, यमराज, उपेन्द्र (वामन), पवन, वायु, किरण, सिंह, घोड़ा, तोता, सर्प, सांप, वानर और मेढक।

हरि शब्द के प्रयोग किए गए यमक अलंकार से युक्त इस दोहे का उदाहरण देखिए -

हरि हरसे हरि देखकर, हरि बैठे हरि पास।
या हरि हरि से जा मिले, वा हरि भये उदास॥

(अज्ञात)

इस दोहे का अर्थ है -

मेढक (हरि) को देखकर सर्प (हरि) हर्षित हो गया (क्योंकि उसे अपना भोजन दिख गया था)। वह मेढक (हरि) समुद्र (हरि) के पास बैठा था। (सर्प को अपने पास आते देखकर) मेढक (हरि) समुद्र (हरि) में कूद गया। (मेढक के समुद्र में कूद जाने से या भोजन न मिल पाने के कारण) सर्प (हरि) उदास हो गया।

तो है न हमारी हिन्दी गर्व करने योग्य भाषा! हमारी हिन्दी तो ऐसी समृद्ध भाषा है हमारी मातृभाषा हिन्दी! इस पर हम जितना गर्व करें कम है!!

चलते-चलते

डॉ. सरोजिनी प्रीतम की हँसिकाओं में यमक और श्लेष अलंकार के प्रयोगः

यमक अलंकार -

तुम्हारी नौकरी के लिए कह रखा था,
सालों से, सालों से।

श्लेष अलंकार -

क्रुद्ध बॉस से
बोली घिघिया कर
माफ कर दीजिये सर
सुबह लेट आई थी
कम्पन्सेट कर जाऊँगी
बुरा न माने गर
शाम को 'लेट' जाऊँगी।

Tuesday, April 5, 2011

जय दुर्गे मैया


(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)


जय अम्बे मैया,
जय दुर्गे मैया,
जय काली,
जय खप्पर वाली।

वरदान यही दे दो माता,
शक्ति-भक्ति से भर जावें;
जीवन में कुछ कर पावें,
तुझको ही शीश झुकावें।

तू ही नाव खेवइया,
जै अम्बे मैया।

सिंह वाहिनी माता,
दुष्ट संहारिणि माता;
जो तेरे गुण गाता,
पल में भव तर जाता।

तू ही लाज रखैया,
जय अम्बे मैया।

महिषासुर मर्दिनि,
सुख-सम्पति वर्द्धिनि;
जगदम्बा तू न्यारी,
तेरी महिमा भारी।

तू ही कष्ट हरैया,
जय अम्बे मैया।

(रचना तिथिः रविवार 12-10-1980)

Monday, April 4, 2011

स्वागत् हिन्दू नववर्ष!

गत हिन्दू वर्ष की अन्तिम अमावस्या की अंधेरी रात व्यतीत हो चुकी है। विक्रम विक्रम संवत् 2068 तथा शक संवत् 1933 के प्रथम दिवस अर्थात् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के ऊषाकाल में भगवान भास्कर की प्रथम किरण ने भारतभूमि का स्पर्श कर लिया है। इसके साथ ही हिन्दू नववर्ष का आगमन हो चुका है। हिन्दू नववर्ष के स्वागत में पलाश के द्रुम चटक रक्तवर्ण पुष्पों से सुसज्जित हो गए हैं, आम्रमंजरियाँ आमफलों में परिवर्तित हो चुकी है, वृक्षों के कठोर सूखे पर्णों ने अपना स्थान त्याग दिया है और नवजात शिशु के गात की भाँति कोमल नव-पल्लवों ने उनका स्थान ले लिया है, पंकिल सलिल से सराबोर सरोवरों में पंकज खिल उठे हैं जिन पर गीत गाते हुए भ्रमर मँडराने लगे हैं, नववर्ष का नवप्रभात खगों के कलरव से कलरवयुक्त होने लगा है, धरा ने हरीतिमा का परिधान धारण कर सौन्दर्यमयी श्रृंगार कर लिया है, अम्बर धवल प्रकाश से सुशोभित होने लगा है, प्रकृति शक्तिरूपा होने लगी है, मन्दिरों के ऊपर के पावन पताके शीतल-मन्द-समीर के प्रवाह में मन्द-मन्द फहराने लगे हैं, उनके भीतर मधुर घण्टों की ध्वनि गूँज रही है तथा बाहर भक्तजनों की भीड़ बढ़ने लगी है!

वसन्त नवरात्रि का प्रारम्भ हो चुका है, शक्तिरूपी देवियों के मन्दिरों में असंख्य घृत एवं तैल ज्योति प्रज्वलित हो चुके हैं! शाक्त भक्त प्रार्थना करने लगे हैं

शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे।
सर्वस्यार्त हरे देवि नारायणि नमो नमः॥

आज सृष्टि अपना एक अरब पंचानबे करोड़ अंठावन लाख पच्यासी हजार एक सौ बारहवाँ जन्म-दिवस मना रही है! इस मधुमास के आज ही के दिन भगवान श्री राम ने सिंहासनारूढ़ होकर राम-राज्य की स्थापना की थी।

इस हिन्दू नववर्ष का हम सभी के लिए मंगलमय और कल्याणकारी होने का संकेत इस बात से मिल ही चुका है कि इसने अपने आगमन से पूर्व ही हमें विश्वविजेता बनने का उपहार दे दिया है!

Sunday, April 3, 2011

नाग के फनों से ढँके शिवलिंग की आकृति वाला फूल - शिव कमल

प्रकृति ने मनुष्य को अनेक विचित्र देन दिए हैं जिनमें से एक है नाग के फनों से ढँके शिवलिंग की आकृति वाला फूल - शिव कमल! शिव कमल का पेड़ तटीय क्षेत्रों में पाया जाने वाला एक एक वृक्ष होता है जिसमें नाग के फनों से ढँके शिवलिंग की आकृति वाले फूल खिलते हैं। शिव कमल का वनस्पतीय नाम Couroupita guianensis है तथा इस सामान्यतः Ayahuma और Cannonball Tree के नाम से जाना जाता है।

 शिव कमल या शिवलिंग फूल को तमिल में नागलिंगम, बंगाली में नागकेशर, कन्नड़ में नागलिंग पुष्प और तेलुगु में नागमल्ली तथा मल्लिकार्जुन पुष्प के नाम से जाना जाता है। हिन्दूओं के बीच इस फूल को अत्यन्त पावन माना हैं और प्रायः शिव मन्दिरों में इसके वृक्षों को लगाया जाता है।

Saturday, April 2, 2011

एक बेर जीता है और एक बेर जीतने की तमन्ना है!

कभी स्कूल के दिनों में "किस्सा हातिमताई" पढ़ा था, किस्सा तो अब याद नहीं है पर इतना याद है कि उसमें एक किस्से का शीर्षक  "एक बेर देखा है और एक बेर देखने की तमन्ना है" जैसा कुछ था। हातिमताई लिखा जाने से आज तक जमाना बहुत बदल चुका है और आजकल उस जमाने के शीर्षकों जैसा शीर्षक लिखने का जरा भी चलन नहीं है। पर पुराने समय का आदमी याने कि सठियाया हुआ बुड्ढा होने के कारण मुझे वह शीर्षक आज भी अच्छा लगता है। उस किस्से में किसी ने एक अनिंद्य सुंदरी को देखा था और उसी सुंदरी को फिर से एक बार देखने की उसकी तमन्ना थी। हमने भी एक बार सन् 1983 में क्रिकेट वर्ल्डकप में जीत, जो यदि अनिंद्य सुंदरी नहीं है तो उससे कम भी नहीं है, देखी थी और आज फिर से क्रिकेट वर्ल्डकप में जीतने की तमन्ना है। आज प्रत्येक भारतीय सिर्फ यही बात बात सोच रहा है कि "एक बेर जीता है और एक बेर जीतने की तमन्ना है!"

आइये, हम सभी मिलकर ईश्वर से कामना करें कि हम सबकी यह तमन्ना पूरी हो!

Friday, April 1, 2011

क्यों मनाते हैं हम भारतीय अप्रैल फूल दिवस?

यदि हम किसी प्रकार का उत्सव मनाते हैं तो उसके पीछे कुछ न कुछ कारण अवश्य ही होता है, उत्सव मनाने के कारण या कारणों के पीछे कुछ न कुछ कहानी या कहानियाँ अवश्य ही जुड़ी होती हैं।

तो प्रश्न यह उठता है कि हम (यहाँ पर हम से मेरा मतलब हम भारतीयों से है) अप्रैल फूल दिवस क्यों मनाते हैं?

आखिर क्या कारण है हमारे द्वारा अप्रैल फूल दिवस मनाने का?

उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर में सिर्फ यही कहा जा सकता है कि हमारे द्वारा अप्रैल फूल दिवस मनाने का सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण है और वह यह कि हम अंग्रेजों के गुलाम रह चुके हैं इसलिए अंग्रेज जो भी उत्सव मनाते हैं उन उत्सवों को मनाने में हमें गर्व का अनुभव होता है। अंग्रेजों ने अपनी शिक्षा नीति के माध्यम से अपनी सभ्यता और संस्कृति को हमारे भीतर पूरी तरह से भर दिया है। अंग्रेजियत हमारे नस-नस में खून बन कर दौड़ रही है। हमें नहीं पता कि संस्कृत भाषा और हमारी संस्कृति किस चिड़िया का नाम है, हिन्दी भाषा हमारे लिए गौण हो चुका है। हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं तो सिर्फ अंग्रेजी भाषा और अग्रेंजी सभ्यता एवं संस्कृति!

 
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