Wednesday, August 31, 2011

छत्तीसगढ़ में तीजा - सुयोग्य वर की प्राप्ति तथा अखण्ड सौभाग्य की कामना का त्यौहार

महिलाओं के लिए उत्तर भारत में जो महत्व करवा चौथ का है वही महत्व छत्तीसगढ़ की महिलाओं के लिए तीजा का है। भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की तृतीया का दिन छत्तीसगढ़ में "तीजा" के नाम से जाना जाता है। इस दिन छत्तीसगढ़ की समस्त महिलाएँ, चाहे वे कुमारी हों या विवाहित, निर्जला व्रत रख कर रात्रि जागरण और गौरी-शंकर की पूजा करती हैं। इस व्रत-पूजन का उद्देश्य होता है - विवाहित महिलाओं का अपने लिए अखण्ड सौभाग्य की कामना करना और कुमारियों के लिए अपने हेतु सुयोग्य वर की प्राप्ति। मान्यता है कि आज के दिन ही शिव-पार्वती का विवाह हुआ था। छत्तीसगढ़ में तीजा व्रत की अत्यधिक मान्यता है। इस व्रत को मायके में ही आकर रखा जाता है। यदि किसी कारणवश मायके आना नहीं हो पाता तो भी व्रत तोड़ने के लिये मायके से जल और फलाहार का आना आवश्यक होता है क्योंकि इस व्रत को मायके के ही जल पीकर तोड़ा जाता है।

महिलाएँ रात भर जागरण करके भजन-पूजन करती हैं और भोर होने के बाद अपना व्रत तोड़ती हैं।

Tuesday, August 30, 2011

घन घमंड नभ गरजत घोरा

भादों का महीना है किन्तु पिछले तीन-चार दिनों से सावन-सी झड़ी लगी हुई है। इन तीन-चार दिनों में तीन-चार बार भगवान भास्कर ने उज्जवल-श्यामल मेघों के आवरण से झाँक तो अवश्य लिया है किन्तु आज प्रातःकाल से सायंकाल तक एक भी बार दर्शन नहीं दिया है। चहुँ ओर काले काले घन छाए हुए हैं। क्या सुबह, क्या दोपहर, हर वक्त शाम जैसा ही प्रतीत हो रहा है। कल मध्यरात्रि से आज अपराह्न तक मेघ गरज-गरज कर अनवरत रूप से बरस रहे हैं, कभी मूसलाधार वर्षा की मोटी-मोटी बूँदें बरसती हैं तो कभी कपास के रेशों जैसी फुहार पड़ती है। वर्षा की मोटी-मोटी बूँदों के धरा पर टपकने की लयबद्ध ध्वनि, सीमेंट और कंक्रीट के जंगल जैसे शहर में आज भी अपने अस्तित्व को बनाए रखे हुए कुछ पुराने घरों के खपरैलों से गिरते पानी की आवाज तथा सीमेंट के लैंटर वाले छतों से पानी निकासी वाले पाइपों से गिरने वाली मोटी धार के भूमि से टकराने का नाद व्यक्ति को एक मनमोहक संगीत के सागर में डुबा देता है और उसका मन-मयूर नाचने लगता है। शायद किसी संगीत ने 'सेनापति' को "अंबर अडंबर सौ उमड़ि घुमड़ि छिन छिछके छछारे छिति अधिक उछारे हैं" पंक्ति की रचने के लिए विवश किया रहा होगा। बादलों के बीच बिजली की तड़प से क्षण भर के लिये सम्पूर्ण धरा चौंधिया जाती है और उसके कुछ क्षणों बाद गगनभेदी गर्जन से काँप उठती है। दामिनी की इस दमक, मेघों की गर्जना और अनवरत मूसलाधार वर्षा को देखकर विरहिन नायिका बरबस गुनगुना उठती है "बादल तो आए लहरा के छाये, ओ आने वाले पर तुम तो न आए" (फिल्म दिल्लगी के लिए गीतकार योगेश द्वारा लिखे गए गीत की पंक्ति)। राम जैसे अवतारी पुरुष भी पावस से अप्रभावित नहीं रह पाते और कह उठते हैं "घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥"

चलते-चलते

'सेनापति' का पावस ऋतु वर्णन:

दामिनी दमक, सुरचाप की चमक, स्याम
घटा की घमक अति घोर घनघोर तै।
कोकिला, कलापी कल कूजत हैं जित-तित
सीतल है हीतल, समीर झकझोर तै॥
सेनापति आवन कह्यों हैं मनभावन, सु
लाग्यो तरसावन विरह-जुर जोर तै।
आयो सखि सावन, मदन सरसावन
लग्यो है बरसावन सलिल चहुँ ओर तै॥

Sunday, August 28, 2011

जनता संसद को बनाती है या संसद जनता को?

किसी वस्तु को बनाने वाले का स्थान उस बनी हुई वस्तु से कहीं बहुत अधिक ऊँचा होता है किन्तु हमारे देश में विडम्बना यह है कि प्रतिनिधियों का चुनाव करके संसद का निर्माण करने वाली जनता का स्थान संसद से नीचे हो जाता है, संसद सर्वोच्च हो जाता है। जनता यदि अपना प्रतिनिधि न चुने, चुनाव का बहिष्कार कर दे, तो संसद का निर्माण हो ही नहीं सकता। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पूर्व अंग्रेजी राज अर्थात अंग्रेजों के राजसिंहासन का प्रतिनिधि सर्वोच्च होता था, भारत की जनता को उसके विरुद्ध जुबान खोलने का किंचित मात्र भी अधिकार नहीं था। राजा या अंग्रेजी राज के विरुद्ध किसी भी प्रकार का कार्य राजद्रोह होता था। अंग्रेजों की निगाहों में भारत की जनता का कुछ भी मूल्य नहीं था क्योंकि भारत अंग्रेजों का गुलाम था।

स्वतन्त्रता मिल जाने के बाद भारत में लोकतन्त्र अर्थात् जनता के राज की स्थापना हुई। जनता का राज हो जाने का अर्थ हुआ कि जनता ने ही राजा का रूप धारण किया। इस हिसाब से जनता का स्थान सर्वोच्च हुआ। किन्तु हमारे संविधान के अनुसार हमारे देश में संसद, जो कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का समूह है, का स्थान सर्वोच्च होता है। यह तो ठीक उसी प्रकार की बात लगती है कि यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति पर विश्वास करके उसके नाम मुख्तारनामा (power of attorney) दे दे वह दूसरा व्यक्ति प्रथम व्यक्ति की समस्त सम्पत्ति का स्वामी बन जाए। क्या ऐसा होना सही लगता है? क्या राय है आपकी?

संविधान तथा राजनीति की समझ मुझमें बहुत अधिक नहीं है अतः हो सकता है कि मैं गलत होऊँ। ऐसी स्थिति में यदि आप मेरी गलती बताने का कष्ट करें तो मुझ पर बड़ा आभार होगा।

Friday, August 26, 2011

सांसद सांसद मौसेरे भाई

अन्ना हजारे की एक हुँकार पर आबालवृद्ध जनों का एकसूत्र में बँध जाना सिद्ध करता है कि देश की समस्त जनता देश से भ्रष्टाचार का सफाया चाहती है। अन्ना के भ्रष्टाचार के विरुद्ध अनशन के परिणामस्वरूप जनता की एकसूत्रता से घबराकर देश की अड़ियल सरकार को झुकने के लिए विवश होकर टीम अन्ना के साथ बातचीत करनी तो पड़ी किन्तु तीन मुद्दों पर मामला फिर लटक गया और इस बाबत सभी दलों से राय लेने के लिए प्रधान मन्त्री को सर्वदलीय बैठक बुलानी पड़ी। देश के लोगों की उम्मीद बँधी कि सर्वदलीय बैठक के बाद मामला सुलझेगा किन्तु बैठक के बाद सरकार अपने द्वारा पहले मान ली गई बातों से भी पलट गई और जनता की आशाओं पर तुषारापात हो गया। अब स्वाभाविक रूप से सवाल यह उठता है कि आखिर उस बैठक में क्या हुआ जिससे सरकार अपनी बातों से पलट गई? वास्तव में इस बैठक ने सरकार के इस अनुमान को सच साबित कर दिया कि कोई भी सांसद नहीं चाहता कि संसद की सर्वोच्चता समाप्त हो। सभी जानते हैं कि संसद की इस सर्वोच्चता के कारण ही जीप घोटाला से लेकर, जो कि स्वतन्त्र भारत के प्रथम ज्ञात घोटाला है, 2G स्पैक्ट्रम घोटाला जैसे बड़े-बड़े घोटाले करने वालों में से आजतक किसी एक भी सजा नहीं मिली, उल्टे अधिकांश घोटाले करने वालों को और भी ऊँचे पदों पर बिठा दिया गया।

सर्वोच्च बने रहने वाला यह संसद आखिर है कौन? यह है जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों अर्थात् सांसदों का जमावड़ा, जो कि सर्वोच्च होने के कारण मनमाने रूप से कुछ भी फैसला कर सकता है, घोटाले करने वालों को और भी ऊँचे पदों पर बिठा सकता है, सांसदों को मात्र कुछ साल के कार्य करने के बदले जीवनपर्यन्त पेन्शन दिला सकता है, उनके वेतन तथा भत्तों में कभी भी 200% तक वृद्धि करवा सकता है, कहने का मतलब यह कि कुछ भी मनमानी कर सकता है। संसद की इस मनमानी पर देश की जनता कुछ भी नहीं कर सकती। जो संसद करे वह जनता को, उस जनता को जिसने प्रतिनिधियों को चुनकर संसद को बनाया है, मानना ही पड़ता है। संसद के बनने तक जनता सर्वोच्च रहती है, जनता के प्रतिनिधि बनने वाले उम्मीदवार जनता के समक्ष आकर वोट की भीख तक माँगते हैं। यदि जनता उन्हें वोट देकर अपना प्रतिनिधि न बनाए तो कभी भी संसद का निर्माण न हो सके। किन्तु एक बार संसद बन जाने के बाद जनता की सर्वोपरिता समाप्त हो जाता है और संसद सर्वोच्च हो जाता है और जनता को उसके नियन्त्रण में आ जाना पड़ता है। जनतारूपी शिव भस्मासुर रूपी संसद को किसी को भी, यहाँ तक कि स्वयं शिव को भी, भस्म कर देने का वरदान दे देते हैं। ऐसे में भला कौन सांसद चाहेगा कि संसद की सर्वोच्चता समाप्त हो जाए? संसद की सर्वोच्चता खत्म हो जाने पर तो देश की जनता ही सर्वोपरि हो जाएगी, जनता का अधिकार एक सांसद के अधिकार से अधिक हो जाएगा। और यही तो सांसद नहीं चाहते। वे संसद को ही सर्वोच्च देखना चाहते हैं। वे भ्रष्टाचार को रोकना नहीं चाहते उल्टे उसे पनपते तथा फलते-फूलते देखना चाहते हैं। सांसदों के इस निश्चय से देश की अड़ियल सरकार, जो अन्ना के आन्दोलन से विवश होकर झुकी थी, को सर्वदलीय बैठक के बाद, सभी सांसदों का साथ मिल जाने से, एक नई ताकत मिल गई और वह अपने वादों से पलट गई तथा फिर से अपने अड़ियल रुख पर आ गई।

मूलतः विज्ञान का विद्यार्थी होने तथा राजनीति में कभी भी बहुत अधिक रुचि न होने के कारण मुझे राजनीति, संविधान आदि के विषय में बहुत अधिक जानकारी नहीं है। किन्तु मुझे लगता है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् अंग्रेजों के बनाए गए संविधान को जैसे का तैसा या थोड़ा बहुत फेरबदल करके अपना लेना ही संसद की सर्वोच्चता का कारण हो सकता है। अंग्रेजों के लिए राजा ही सर्वोच्च था, स्वतन्त्र भारत में राजा का स्थान संसद ने ले लिया इसलिए वह सर्वोच्च हो गया। भारत में अत्यन्त प्राचीन काल में राजन्त्र था किन्तु उन दिनों की राजनीति भी प्रजा को ही सर्वोपरि मानने की थी। यही कारण है कि राम प्रजा की भावनाओं का ध्यान रखते हुए तथा प्रजा को सर्वोपरि मानते हुए अपनी धर्मपत्नी सीता तक का भी त्याग कर दिया। महान राजनीतिज्ञ चाणक्य ने प्रजा और राज्य को ही सर्वोपरि बताया है। चाणक्य सूत्र में वे लिखते हैं - 'प्रकृतिकोपः सर्वकोपेभ्यो गरीयान्' अर्थात् राज्य के विरुद्ध प्रजा का कोप समस्त प्रकार के कोपों से भारी होता है। याने कि प्रजा अर्थात् जनता ही सर्वोपरि है। यहाँ पर यह उल्लेख करना अनुचित नहीं होगा कि नन्द वंश के अत्याचारी राजाओं का नाश करके चन्द्रगुप्त मौर्य को उनके राजसिंहासन पर आरूढ़ित कर उन्हें भारत का सम्राट बनाने वाले महान राजनीतिज्ञ चाणक्य नगर के बाहर पर्णकुटी में निवास करते थे। उन्हें साधारण सी कुटिया में रहते देखकर चीनी यात्री फाह्यान ने उनसे पूछा था, "इतने विशाल साम्राज्य के प्रधान मन्त्री होने पर भी आप इस छोटी सी कुटिया में क्यों निवास करते हैं?" उनके इस प्रश्न के उत्तर में चाणक्य ने कहा था, "जिस देश का प्रधान मन्त्री छोटी सी कुटिया में निवास करता है उस देश की प्रजा भव्य भवनों में निवास करती है और जिस देश का प्रधान मन्त्री राज-प्रासादों में निवास करता है वहाँ के प्रजाजन झोपड़ियों में निवास करते हैं।"

अस्तु, वर्तमान संविधान को बनाते समय यदि भारत की संस्कृति तथा 'जनता को ही सर्वोपरि मानने वाली' नीति को ध्यान में रखा गया होता तो संसद को कदापि सर्वोच्च स्थान नहीं दिया गया होता।

Thursday, August 25, 2011

भले ही अन्ना भूख से मर जाय हम तर माल ही खाएँगे

जनप्रतिनिधियों की बैठकें होती हैं जहाँ पर काजू आदि सूखे मेवे के प्लेट एक हाथ से दूसरे हाथ में सरकते हैं। ऐसे बैठकों में मेवा-मिष्ठान्न, बैठक यदि दिन भर चले तो, लंच में मांसाहारी तथा शाकाहारी दोनों ही प्रकार के मँहगे डिशेस आदि परोसा जाना सामान्य बात है। क्यों न खाएँ ये लोग तर माल? आखिर जनता के प्रतिनिधि जो हैं वे! उस जनता के जिसके अधिकांश लोग भ्रष्टाचार और मँहगाई की मार की वजह से बड़ी मुश्किल से दो जून का खाना जुटा पाते हैं, सब्जी मिल पाई तो ठीक वरना दाल-रोटी ही सही, कभी-कभी तो केवल एक टाइम का ही खाना मिल पाता है और कभी वह भी मयस्सर नहीं हो पाता तो फाका भी करना पड़ता है। मुर्ग मुसल्लम, मटन बिरयानी, पनीर मसाला गरीब जनता के लिए जरूरी थोड़े ही है, प्याज और हरी मिर्च के साथ भी तो खाना खाया जा सकता है ना।

जनता के द्वारा चुने गए ये लोग जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। काश! कभी वे उनके जैसा ही खाना खाकर भी कभी उनका प्रतिनिधित्व करते। दिखा देते कि हम भी देश की गरीब जनता के जैसा ही खाना खाकर सन्तुष्ट रह सकते हैं, हमेशा-हमेशा के लिए नहीं तो कम से कम एक माह के लिए ही सही गरीबी का जीवन जी कर दिखा सकते।

अन्ना हजारे चाहते हैं कि देश की गरीब जनता को भी भरपेट खाना मिले जिसके लिए वे अनशन कर रहे हैं, पिछले दस दिनों से उनके लिए भूखे रह रहे हैं। पर जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को जनता के खाने की फिक्र नहीं है। उन्हें फिक्र है तो केवल अपने खाने की। तर माल खाने की, घोटालों की रकम खाने की। जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधि चाहे जिस भी राजनैतिक पार्टी के हों, उद्देश्य उनका केवल एक ही है - खाना और केवल खाना। गरीब जनता का मांस नोच-नोच कर भी खा लेने में इन्हें किसी प्रकार का गुरेज नहीं होगा। पर मुश्किल तो यह है कि गरीब जनता के तन में मांस है ही कहाँ? उनका शरीर तो हड्डियों का ढाँचा मात्र ही है। उन्हें खाने को कुछ मिले तब तो मांस चढ़ेगा ना तन पर।

अन्ना हजारे माँग कर रहे हैं देश के जनता का हित करने वाले जन लोकपाल की। करोड़ों लोगों को उनकी इस माँग में गरीब जनता का हित दिखाई दे रहा है किन्तु इन जनता के प्रतिनिधियों को यह बात नजर नहीं आ रही है। क्यों नहीं दिखाई दे रहा है? क्योंकि खाना बंद हो जाने का भय उन्हें देखने नहीं दे रहा है। यदि जनलोकपाल बिल पारित हो जाएगा तो संसद, याने कि जनता के प्रतिनिधियों का जमावड़ा, पर अंकुश लग जाएगा। जीप घोटाला से लेकर 2G स्पैक्ट्रम घोटाला जैसे घोटाले नहीं हो पाएँगे। और घोटाले नहीं होंगे तो वे खाएँगे क्या? भला कौन चाहेगा अपने आप पर अंकुश लगाना? निरंकुश रहना चाहते हैं वे।

आज अन्ना की एक आवाज पर देश की जनता एक सूत्र में बँध जाती है। दम है तो इन तथाकथित जनप्रतिनिधियों में से कोई भी एक देश की जनता को एक सूत्र में बाँध कर दिखाए! पर वे जानते हैं कि उनमें से किसी में भी इतना दम नहीं है। इसलिए वे भ्रष्टाचार हटाने की आवाज बुलन्द करने वाले का दमन कर देना चाहते हैं। बाबा रामदेव के अनशन को तो कुचल दिया उन्होंने और अब अन्ना हजारे के अनशन को किसी न किसी तरह से कुचल देना चाहते हैं। दिन-प्रतिदिन अन्ना समर्थकों की संख्या में लगातार वृद्धि होते जाना इस बात का द्योतक है कि जनता समझ चुकी है इस बात को।

Tuesday, August 23, 2011

है कोई माई का लाल

है कोई माई का लाल जिसने -
  • बगैर डोनेशन दिये किसी नामी स्कूल में अपने बच्चों का एडमिशन करवा लिया हो?
  • बगैर किसी दलाल की सहायता के अपनी गाड़ी के कागजात या लाइसेंस बनवा लिया हो?
  • सरकारी अस्पताल से सभी प्रकार की दवाइयाँ मुफ्त पा लिया हो?
  • बगैर रिश्वत के कलेक्टरेट कार्यालय में अपना काम करवा लिया हो?
  • बगैर रिश्वत के जन्म अथवा मृत्यु प्रमाण पत्र निकलवा लिया हो?
  • बगैर रिश्वत के राशन कार्ड बनवा लिया हो?
  • बगैर रिश्वत के जमीन आदि की रजिस्ट्री करवा लिया हो?
  • बगैर किसी रिश्वत के मकान का नक्शा पास करवा लिया हो?
  • बगैर रिश्वत के एफ.आई.आर. दर्ज करवा लिया हो?
  • बगैर रिश्वत के कोर्ट में अगली पेशी के लिए तारीख पा लिया हो?
  • बिना कुछ रुपये दिए सफाई कर्मी से अपने घर के सामने झाड़ू लगवा लिया हो?
  • छोटी कीमत वाले स्टैम्प पेपर खरीदने के लिए मूल्य से अधिक कीमत न दिया हो?
यदि कोई माई का लाल वास्तव में है तो उनके विषय में जानकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता होगी!

Monday, August 22, 2011

नवभ्रष्ट लोचन भ्रष्ट मुख कर भ्रष्ट पद भ्रष्टारुणम्

15 अगस्त 1947 के दिन, जब राष्ट्र ने गुलामी की जंजीरों को तोड़कर स्वतन्त्रता का हार पहना था, शायद ही देश के किसी व्यक्ति ने कल्पना की रही होगी कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब भ्रष्टाचार का भस्मासुर इस देश को भस्म कर देने के लिए आमादा हो जाएगा। उस समय तो उनकी कल्पना में भविष्य का भारत एक खुशहाल भारत ही रहा होगा, न कि भ्रष्टाचार और मँहगाई से त्रस्त भारत। उस समय उन्होंने सोचा तक न रहा होगा कि जिस प्रकार से उनके जमाने में अंग्रेजों की गुलामी के विरुद्ध प्रदर्शन के लिए लोगों के हुजूम उमड़ पड़ते थे वैसे ही एक दिन ऐसा भी आएगा कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रदर्शन के लिए न केवल दिल्ली के रामलीला मैदान में 1.25 लाख लोग इकट्ठे हो जाएँगे बल्कि देश के हर हिस्से में लोगों का सैलाब उमड़ पड़ेगा।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् राष्ट्र की बागडोर यदि सच्चे, कर्मठ और ईमानदार जननायकों के हाथ में गई होती तो निश्चित रूप से इस देश में रामराज्य की कल्पना साकार हो गई होती किन्तु दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पाया और इस देश को भ्रष्टाचार का एक ऐसा घाव लगा जो कि आज नासूर बन चुका है। आइये देखें कि 1947 के बाद कौन-कौन से प्रमुख घोटाले हुए जिसके कारण आज यह स्थिति बनी हैः

1948

जीप घोटाला

काश्मीर ऑपरेशन के लिए भारतीय सेना को जीपों की आवश्यकता होने पर व्ही.के. कृष्णा मेनन, जो कि उस समय लंदन में भारत के हाई कमिश्नर पद पर थे, ने समस्त नियमों को ताक पर रखकर एक विदेशी कंपनी को क्रय आदेश दिया था। कहा जाता है कि फर्म को 2,000 जीपों के लिए क्रय आदेश दिया गया था जिसके लिए अधिकतम राशि का अग्रिम भुगतान भी कर दिया गया किन्तु कम्पनी ने मात्र 155 जीपें ही प्रदाय की थी। विपक्ष के द्वारा प्रकरण के न्यायिक जाँच के अनुरोध को रद्द करके अनन्तसायनम अयंगर के नेतृत्व में एक जाँच कमेटी बिठा दी गई। बाद में  30 सितम्बर 1955 सरकार ने जाँच प्रकरण को समाप्त कर दिया। यूनियन मिनिस्टर जी.बी. पन्त ने घोषित किया, "सरकार इस मामले को समाप्त करने का निश्चय कर चुकी है। यदि विपक्षी सन्तुष्ट नहीं हैं तो इसे चुनाव का विवाद बना सकते हैं।" 3 फरवरी1956 के बाद शीघ्र ही कृष्णा मेनन को नेहरू केबिनेट में बगैर किसी पोर्टफोलियो का मन्त्री नियुक्त कर दिया गया।

1950

भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित सिविल सर्व्हेंट ए.डी. गोरवाला को शासन संचालन में सुधार के लिए अपनी सिफारिशें
 देने के लिए कहा गया। 1951 में उनके द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में अन्य अनेक अवलोकनों के साथ निम्न दो अवलोकन भी थे -

"नेहरू के मन्त्रिमण्डल में कुछ मन्त्री भ्रष्ट थे और इस बात की जानकारी प्रायः सभी को थी।"

"एक अत्यन्त जिम्मेदार सिविल सर्व्हेंट के आफिसियल रिपोर्ट में उल्लेख है कि सरकार अपने मन्त्रियों को बचाने के लिए गलत रास्ते अपनाती है"
(Report on Public Administration, Planning Commission, Government of India 1951 से उद्धृत)

1958

एल.आई.सी. स्कैन्डल

इन्दिरा गांधी के पति फीरोज गांधी ने इस घोटाले को खोला था और वित्त मन्त्री टी.टी. कृष्ण्माचारी, वित्त सचिव एच.एम. पटेल, जीवन बीमा निगम के चेयरमैन एल.एस. वैद्यनाथन आदि के नाम इस घोटाले के साथ जोड़े थे।

उल्लेखनीय है कि मुद्गल प्रकरण (1951), मूंदड़ा डील्स (1963), मालवीय-सिराजुद्दीन घोटाला (1963) और प्रताप सिंह कैरोन प्रकरण (1963) के लिए कांग्रेस के मन्त्रियों तथा मुख्य मन्त्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए थे किन्तु किसी भी मन्त्री, मुख्य मन्त्री तथा प्रधान मन्त्री ने इस्तीफा नहीं दिया।

भारत सरकार ने भ्रष्टाचार मामलों की जाँच के लिए 1962 में शान्तनम कमेटी का गठन किया था जिसके द्वारा 1964 में प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार, "लोगों में व्यापक रूप से यह धारणा पाई जाती है कि मन्त्रियों में सत्यनिष्ठा की कमी कोई असामान्य बात नहीं है और पिछले सोलह सालों में कुछ मन्त्रियों ने गैरकानूनी तौर पर बहुत सारा धन कमाने, अपने पुत्रों तथा रिश्तेदारों को भाईभतीजावाद द्वारा अच्छा जॉब दिलवाने और सार्वजनिक जीवन की निर्मलता से पूर्णतः असम्बद्ध तरीकों से अन्य प्रकार के फायदे उठाने का कार्य किया है।" (There is widespread impression that failure of integrity is not uncommon among ministers and that some ministers, who have held office during the last sixteen years have enriched themselves illegitimately, obtained good jobs for their sons and relations through nepotism and have reaped other advantages inconsistent with any notion of purity in public life.)

1965

यह ज्ञात होने पर कि उड़ीसा के मुख्य मन्त्री बीजू पटनायक (नवीन पटनायक के पिता) ने कलिंग ट्यूब्स नामक अपनी स्वयं की कम्पनी को सरकारी ठेका देकर फायदा पहुँचाया है, उन्हें इस्तीफा देने पर विवश किया गया था।

1970

नागरवाला काण्ड

भारतीय स्टेट बैंक की संसद मार्ग शाखा के चीफ कैशियर व्ही.पी. मेहता ने केवल टेलीफोन द्वारा प्राप्तआदेश पर, बगैर किसी बैंकिंग इंस्ट्रुमेंट  (विथड्राल फॉर्म, चेक, ड्राफ्ट आदि) के, नागरवाला नामक व्यक्ति को रु.60 लाख का भुगतान कर दिया। बताया जाता है कि मेहता को यह विश्वास था कि फोन पर इन्दिरा गांधी ने आदेश दिया था। नागरवाला कांड की जाँच करने वाले अधिकारी की सड़क दुर्घटना में तथा नागरवाला की जेल में मृत्यु हो जाने के कारण यह प्रकरण हमेशा के लिए रहस्यमय बन कर रह गया।

1974

मारुति घोटाला

1974 में मारुति घोटाले के प्रकरण में इन्दिरा गांधी का नाम उभरा था। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने पैसेन्जर कार के निर्माण हेतु पक्षपातपूर्वक गलत तरीके से अपने पुत्र को लाइसेंस उपलब्ध करवाया था।

1976

तेल घोटाला

हांग कांग की कुओ ऑयल कम्पनी (Kuo Oil Co) के साथ वर्तमान कीमत पर ही भविष्य में भी तेल उपलब्ध कराने के लिए 200 मिलियन डालर का कान्ट्रैक्ट किया गया था जिसमें देश को रु.13 करोड़ का चूना लगा। ऐसा माना जाता है कि उन रुपयों को इन्दिरा गांधी और संजय गांधी के खातों में जमा किया गया था।

1980

THAL Vaishet project घोटाला

पेट्रोलियम सेक्रेटरी एच.एन. बहुगुणा, एन.एन. कापड़िया, पेट्रोलियम मन्त्री पी.सी. सेठी और के.पी. उन्नीकृष्णन पर आरोप लगाए गए कि उन्होंने इटली के Snamprogetti की subsidiary कम्पनी को THAL Vaishet project का कान्ट्रैक्ट, नियमों को ताक में रखकर, दे दिया।

1981

महाराष्ट्र सीमेंट घोटाला

महाराष्ट्र के मुख्य मन्त्री ए.आर. अन्तुले ने सार्वजनिक खपत के सीमेंट को पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाकर गलत तरीके से प्रायवेट बिल्डर्स को दे दिया।

1986

जर्मन सबमैरिन घोटाला

कहा जाता है कि जर्मन फर्म HDW से दो सबमैरिन की खरीदी के इन्दिरा सरकार ने रिश्वत लेकर किया था।

1987

बोफोर्स घोटाला

रु.64 करोड़ लेकर 155mm howitzer सौदा स्वीडिश कम्पनी बोफोर्स को दिया गया। इस घोटाले से राजीव गांधी का नाम जुड़ा हुआ है।

1991

जैन हवाला प्रकरण

रु.64 करोड़ के जैन हवाला प्रकरण में लालकृष्ण अडवानी, विद्याचरण शुक्ल, सी.के. जैफर शरीफ, आरिफ मोहम्मद खान, मदन लाल खुराना, कल्पनाथ राय, एन.डी. तिवारी जैसे नामी नेताओं के साथ अन्य अनेक लोगों पर आरोप लगाए गए थे।

हर्षद मेहता काण्ड

कानून की कमजोरियों का फायदा उठाकर रु.10,000 करोड़ के घोटाले का मामला सामने आने पर उसके लिए हर्षद मेहता, भारतीय स्टेट बैंक सहित कुछ अन्य प्रमुख बैंको पर आरोप लगाए गए थे।

चारा घोटाला

बताया जाता है कि बिहार के मुख्य मन्त्री लालू प्रसाद यादव, अन्य राजनीतिज्ञ तथा नौकरशाही ने मिल कर रु.950 करोड़ का चूना लगाया था।

1996

गलत तरीके से ऋण वितरणः

कहा जाता है कि इण्डियन बैंक के पूर्व चेयरमेन तथा मैनेजिंग डायरेक्टर एम. गोपालकृष्णन ने अन्य लोगों से मिलकर गलत तरीके से रु.1,500 करोड़ का ऋण वितरित कर दिया था।

टेलीकॉम घोटाला

सुखराम पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने कई टेलीकॉम कम्पनियों से पक्षपात करने के लिए रिश्वतें ली थीं। सुखराम के घर से 1 मिलियन डालर की रकम छोटे नोटों की शक्लों में पाई गई थीं।

1999

यू.टी.आई. का म्युचुअल फंड घोटाला

2002

केतन पारेख शेयर घोटाला, सत्यम घोटाला, आदर्श घोटाला, कॉमन वेल्थ घोटाला,2 G स्पैक्ट्रम घोटाला, हथियार, गोली, जैकेट खरीदी घोटाला

इसके बाद के घोटालों से तो आप सारे लोग परिचित ही हैं।

शासकों तथा अधिकारियों का कर्तव्य है देश में भ्रष्टाचार को रोकना, किन्तु उपरोक्त घोटालों को देखकर स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि हमारे देश में भ्रष्टाचार को रोकने वाले लोग ही भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। इन भ्रष्टाचारी शासकों तथा अधिकारियों का वर्णन करने के लिए सिर्फ यही कहा जा सकता है कि

नवभ्रष्ट लोचन भ्रष्ट मुख कर भ्रष्ट पद भ्रष्टारुणम्

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात भ्रष्टाचार विकरालतर से विकरालतम रूप धारण करता चला गया। सैकड़ों लाख करोड़ रुपये, जिन्हें जनता की हित तथा देश के विकास के लिए जनता ने सरकार को टैक्स के रूप में दिए थे, देश से निकल कर काले धन के रूप में विदेशों में चले गए। भ्रष्टाचारी अमीर होते चले गए और जनता मँहगाई की चक्की में पिसती चली गई।

आज जरूरत है भ्रष्टाचार का नामोनिशान मिटा देने की। काले धन के रूप में विदेश में जमा रकम को वापस देश में लाने की और जिनके के कारण जनता की गाढ़ी कमाई का रुपया विदेश चला गया उन लोगों को उनकी करतूतों की सजा देने की। और यह तो स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है कि इन कार्यों को सम्पन्न करने के लिए देश की जनता अब कटिबद्ध हो चुकी है।

Saturday, August 20, 2011

आज लोग भ्रष्टाचार से उतने ही त्रस्त है जितने कभी अंग्रेजों की गुलामी तथा लूट से थे

आज भारत की जनता देश में व्याप्त भ्रष्टाचार से उतनी ही त्रस्त है जितनी अंग्रेजों के जमाने में उनकी गुलामी तथा लूट से थी। उन दिनों देश का प्रत्येक व्यकि चाहता था कि गुलामी और लूट से हमें मुक्ति मिले और आज देश का प्रत्येक व्यक्ति भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहता है। देश के हर व्यक्ति को लग रहा है कि भ्रष्टाचार को संरक्षण देकर, भारत की जनता की मेहनत से की गई गाढ़ी कमाई को लूटकर अपने विदेशी बैंकों के खातों को सदैव अक्षुण्ण धन से भरपूर रखने वाले, भस्मासुरों का दल हमें भी भस्म करके रख देगा। यही कारण है कि देश के कोटि-कोटि लोग, जो भ्रष्टाचार के शिकंजे में फँसा हुए हैं, भ्रष्टाचार से मुक्ति की कामना कर रहे हैं।

किन्तु हर व्यक्ति के एक जैसा चाहने से तो मुक्ति नहीं मिल सकती, मुक्ति मिलती है एक सी कामना करने वालों के एक जुट होकर संघर्ष करने से! इतिहास गवाह है कि जब अंग्रेजों की गुलामी तथा लूट से मुक्ति की कामना करने वाले सभी लोग एकजुट हो गए तो अंग्रेजों को भारत छोड़ कर जाना ही पड़ा था। लोगों की उस एकजुटता ने अंग्रेंजो जैसे मक्कार किन्तु सशक्त शासकों के पैरों तले की जमीन को खिसका कर रख दिया था। आज इतिहास फिर से एक बार स्वयं को दुहरा रहा है। भ्रष्टाचार से मुक्ति की कामना करने वाले सारे लोग एकजुट हो गए हैं। और, उनकी इस एकजुटता से, भ्रष्टाचार खत्म करने का झूठा वादा करने वाली किन्तु वास्तव में भ्रष्टाचार को संरक्षण देने वाली सरकार सकते में आ गई है। सत्ता के नशे में चूर, हिरण्यकश्यपु, रावण तथा कंस के समान अहंकारी, राजनेताओं के दर्प से दमकते हुए चेहरे बुझे हुए नजर आ रहे हैं, उनकी जुबान से बोली तक नहीं निकल पा रही है।

भ्रष्टाचारी राजनेताओं को यह भय सताने लग गया है कि यदि जनता इसी प्रकार से एकजुट रही तो उन्हें भविष्य में फिर कभी सत्ता-सुख भोगने का अवसर ही नहीं मिल पाएगा। जनता की यह एकजुटता उन्हें बहुत ही खतरनाक नजर आ रही है। जनता पर अपनी मनमानी चलाने के लिए जनता में फूट का होना अति आवश्यक है। यही कारण था कि अंग्रेजों ने भारत की जनता को हिन्दू, मुसलमान तथा विभिन्न जातियों एवं उपजातियों के रूप में तोड़कर न केवल अलग-अलग कर रखा था बल्कि उन्हें आपस में लड़वाते भी रहते थे। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात के तथाकथित राजनेताओं ने भी वही किया जो अंग्रेज किया करते थे। उन्होंने भारत की जनता को दलित, सामान्य, जाति, जन-जाति, पिछड़ा वर्ग जैसे विभिन्न वर्गों में बाँट कर तथा व्होट की राजनीति चलाकर सिर्फ, और सिर्फ, अपने स्वार्थों की सिद्धि ही किया है। स्वतन्त्रता-पूर्व अंग्रेज हमें लूटते रहे और स्वतन्त्रता-पश्चात देश के तथाकथित राष्ट्रनिर्माता हमें लूटते रहे। अपनी लूट की इस प्रक्रिया को सतत् रूप से चलाने के लिए सदैव उन्होंने केवल इसी बात पर ध्यान दिया कि कहीं देश की जनता जागरूक न हो जाए, कहीं वे एकजुट न हो जाएँ। अपनी लूट को जारी रखने के लिए वे साम-दाम-दण्ड-भेद यहाँ तक कि अनैतिकता तथा क्रूरता तक का प्रयोग करते रहे। अपने देश के प्राचीन सिद्धान्तों, नीतियों, शास्त्रों, शिक्षा आदि को हेय बनाने वाले, भारतीयों के दिलो-दिमाग में अंग्रेजियत तथा पश्चिमी संस्कार भर देने वाले, अंग्रेजों के बनाये विधानों, नीतियों तथा शिक्षा पद्धति को, जो सिर्फ, और सिर्फ, भ्रष्टाचार, बेईमानी, प्रपंच आदि को ही बढ़ावा देते है, जारी रखा गया ताकि उनकी लूट-खसोट जारी रहे, अमीर भारत में केवल भ्रष्टाचारी ही अमीर बने रहें और शेष जनता गरीब हो जाए। चुनाव प्रक्रिया को ऐसा बना दिया गया कि, उम्मीदवारों की भीड़ में, सौ में से केवल तीस से चालीस लोगों का व्होट पाने वाला व्यक्ति चुनकर आ जाए, वह व्यक्ति चुनकर आ जाए जिसे कि सौ में से साठ से सत्तर लोगों ने नकार दिया है। ऐसी व्यवस्था कर दी गई कि यदि हमें स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता तो किसी और को भी न मिले। केवल भ्रष्ट लोगों की टोली ही चुनकर आ पाएँ और देश की जनता को लूट-लूट कर आपस में बंदर-बाँट करते रहें। देश का सैकड़ों लाख करोड़ रुपया विदेशी बैंकों के खातों में समा जाए।

आज देश की समस्त जनता एकजुट दिखाई दे रही है पर प्रश्न यह उठता है कि यह एकजुटता कब तक बनी रहेगी? जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है। पाँच साल के शासन काल में चार साल तक उसे कितना लूटा गया है यह वह भूल जाती है और याद रह जाता है तो शासन काल के अन्तिम समय में किए गए विकास के कुछ कार्य। वह भी इसलिए याद रह जाता है क्योंकि प्रचार माध्यमों तथा विज्ञापनों के द्वारा उसे जबरदस्ती याद रखवाया जाता है ताकि अगले चुनाव में जनता फिर से उन्हीं भ्रष्टाचार के भस्मासुरों के दल को सत्ता के सिंहासन में वापस ले आए। आज जरूरत है जनता को अपनी स्मरण शक्ति बढ़ाने की ताकि लोगों की एकजुटता हमेशा-हमेशा के लिए कायम रहे।

Monday, August 15, 2011

भ्रष्टाचार करके दौलत कमाते रहो, भ्रष्टाचार को ही गाली सुनाते रहो

क्या  अगस्त  को हमें वास्तव में स्वतन्त्रता मिली थी?

क्या आज हम वाकइ स्वतन्त्र हैं?

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अंग्रेजों की हालत इतनी बदतर हो चुकी थी कि उन्हें अपने कई उपनिवेशों, जिनमें से भारत भी एक था, को छोड़ देने की मानसिकता बनानी पड़ गई। भारत से चले जाना उनकी मजबूरी बन गई थी, वैसे भी उन्होंने अपने लम्बे शासनकाल में भारत को पूरी तरह से चूस डाला था और यहाँ बने रहने से उन्हें आगे कुछ भी नहीं मिलने वाला था, उल्टे क्रान्तिकारियों से उन्हें अधिक से अधिक नुकसान होने की ज्यादा सम्भावना थी। देखा जाए तो अंग्रेजों के भारत छोड़ने का श्रेय न तो किसी नेता को दिया जा सकता और न ही किसी राजनैतिक दल को, वे सिर्फ अपनी मजबूरी के कारण यहाँ से गए थे। जाते-जाते भी अंग्रेजों की कुटिल बुद्धि ने भारत को और भी गारत करने सोच लिया था इसीलिए एक लम्बे अरसे से षड़यन्त्र पूर्वक इस देश में में नफरत फैलाना शुरू कर दिया था। धर्मेन्द्र गौड़ की पुस्तक "मैं अंग्रेजों का जासूस था" उनके द्वारा भारत छोड़ने के नफरत फैलाने का साक्ष्य है। भारत को विभाजन की आग में झोंकने की कुटिल योजना पहले से ही उन्होंने बना रखी थी।

अस्तु, अंग्रेज चले गए किन्तु गुलामी हमारे देश से नहीं गई। अंग्रेजों के जाने के बाद भ्रष्टाचारियों की गुलामी करने लगे। पहले अंग्रेज हमें लूटते थे और उनके जाने के बाद अंग्रेजों की लीक पर चलने वाले हमारे देश के भ्रष्टाचारी हमें लूटने लगे। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भी विभिन्न घोटालों के रूप में हमें लूटने का सिलसिला जारी रहा। फूड घोटाला (तत्कालीन खाद्य मंत्रालय), जीप घोटाला (तत्कालीन रक्षा मंत्रालय), बीमा घोटाला (तत्कालीन वित्त मंत्रालय), नागरवाला काण्ड, तमिलनाडु और पांडिचेरी के फर्मों को नाजायज तरीके से लाइसेंस जारी करने का मामला जिसकी वजह से ललित नारायण मिश्र को बम से उड़ा दिया गया ताकि पोल न खुल पाए, बोफोर्स घोटाला........... कहाँ तक गिनाया जाए, बहुत लम्बी सूची है। केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार, और सरकार चाहे किसी भी राजनैतिक दल का हो, भ्रष्टाचार सभी जगह व्याप्त है। यदि भ्रष्टाचार न करें तो पार्टी फंड में रुपये कहाँ से भेजें? आला कमान का जेब कैसे भरें? और इतना रुपया गवाँ कर चुनाव जीते हैं तो क्या सिर्फ जनता की सेवा करने के लिए? क्या हमें खुद को नहीं कमाना है? इतना कमाना है कि आने वाली सात पीढ़ियों को कमाने की जरूरत न पड़े।

कल प्रधानमन्त्री लालकिले की प्राचीर से भ्रष्टाचार के प्रति अपनी चिन्ता व्यक्त कर रहे थे, भ्रष्टाचार को गाली दे रहे थे जबकि उनके ही मन्त्रीगण विभिन्न प्रकार के भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबे हुए हैं -

भ्रष्टाचार करके दौलत कमाते रहो, भ्रष्टाचार को ही गाली सुनाते रहो

लगता है कि सदैव गुलामी करते रहना और शोषित होते रहना ही इस देश की जनता कि नियति है क्योंकि यदि कोई भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध आवाज उठाता है तो उसे कुचल दिया जाता है, उसकी आवाज को दबा दी जाती है, यहाँ तक कि उसके पिछले पूरे जीवन की छान-बीन करके, गड़े मुर्दे उखाड़कर, येन-केन-प्रकारेण उसकी कुछ न कुछ कमजोरी निकाल कर स्वयं उसे भ्रष्टाचार में लिप्त सिद्ध कर दिया जाता है। आखिर सत्ता की शक्ति जो उनके हाथ में होती है! "समरथ को नहि दोस गुसाईँ"!

Wednesday, August 10, 2011

काश! भारतीयों की विलक्षण बुद्धि के अनुरूप शिक्षा नीति एवं व्यवस्था भी होती

अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा कह रहे हैं कि 'अमेरिकियों पढ़ो, नहीं तो भारत से पिछड़ जाओगे'

उनका यह कथन निश्चित रूप से सिद्ध करता है कि भारतीय, जिन्होंने किसी काल में नालन्दा, तक्षशिला आदि जैसे विश्वविद्यालयों की थी और जो विश्व गुरु कहलाते थे, आज भी विलक्षण बुद्धि के स्वामी हैं। आज भारतीय शिक्षा नीति और व्यवस्था पूरी तरह से पाश्चात्य देशों की शिक्षा नीति और व्यवस्था पर आधारित है, आधारित क्या बल्कि उनकी नकल ही है, तो भी भारतीय प्रतिभाएँ इस प्रकार से उभर कर आ जाती हैं कि अमेरिका के राष्ट्रपति को अपने देश के पिछड़ जाने का भय सताने लगे तो जरा सोचिए कि यदि भारत में अपने देश की सभ्यता और संस्कृति पर आधारित पूर्णतः मौलिक शिक्षा नीति और व्यवस्था होती, जो आत्म निर्भरता और चरित्र निर्माण के साथ ही जीवन के परम सत्य का साक्षात्कार कराने वाली आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती, तो क्या हाल होता!

अत्यन्त प्राचीनकाल से ही भारतवर्ष में ज्ञान और विद्या के क्षेत्र में संसार का अग्रणी रहा है। वैदिक काल से भी पूर्व से ही हमारे देश में ज्ञान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजा जाता रहा है। पुरातन काल से ही भारतीय संस्कृति की गुरु-शिष्य परम्परा समस्त विश्व में विख्यात रही है तथा भारत में अत्यन्त विकसित शिक्षा के अनेक केन्द्र रहे हैं। भारतीय गुरु जहाँ आयुर्वेद, कृषि, वास्तुशास्त्र जैसे विषयों का ज्ञान दान करके न केवल भारतीयों को आत्म निर्भर बनाते थे बल्कि वे दर्शन शास्त्र, न्याय शास्त्र, नीति शास्त्र, तर्क शास्त्र जैसे विषयों में शिष्यों को पारंगत करके चरित्रवान शासकों तथा उनके मन्त्रियों के शासन का निर्माण भी करते थे। जहाँ व्याकरण, साहित्य इत्यादि की शिक्षा प्रदान करके भाषा तथा साहित्य को विकसित करना उन गुरुओं का कार्य था वहीं गणित, खगोल शास्त्र, वैशेषिक शास्त्र का ज्ञान प्रदान कर के विचारक, गणितज्ञ, खगोलज्ञ तथा वैज्ञानिकों का प्रादुर्भाव करना भी उन्हीं का उत्तरदायित्व होता था। इसके अतिरिक्त आत्मानुशासन, नैतिकता, अध्यात्म, धर्म, योग, साधना आदि की शिक्षा देकर वे अपने शिष्यों को आध्यात्मिक बल तथा मनोबल भी बढ़ाये रखते थे।

भारत में मुसलमानों के आधिपत्य हो जाने पर मुस्लिम शासकों ने अनेक मक़तबों तथा मदरसों का निर्माण तो अवश्य ही किया किन्तु उन्होंने हिन्दू शिक्षा व्यवस्था में कभी भी हस्तक्षेप नहीं किया जिससे भारतीय शिक्षा का प्राचीन रूप अठारहवी शताब्दी तक कमोबेस अपने मूल रूप में ही चलती रही। सत्रहवी शताब्दी तक भारत शिक्षा के प्रचार में यूरोप के सभी देशों से आगे था और हमारे देश में पढ़े-लिखे लोगों का प्रतिशत अन्य देशों की अपेक्षा बहुत अधिक था। उस समय तक सहस्त्रों की संख्या में ब्राह्मण अध्यापक अपने-अपने घरों में लाखों शिष्यों को मुफ्त शिक्षा प्रदान किया करते थे। डा-वेल नामक एक प्रसिद्ध मिशनरी, जो मद्रास में पादरी रह चुके थे, ने तो यहाँ की शिक्षा-व्यवस्था से प्रभावित होकर इंग्लिस्तान में भी भारतीय प्रणाली के अनुसार शिक्षा देना आरम्भ कर दिया था।

लॉर्ड मैकॉले को भारत की यह शिक्षा-प्रणाली चुभने लग गई। उसने सन् 1833 में चार्टर पर पार्लियामेंट में भाषण देते हुए कहा था, “मैं चाहता हूँ कि भारत में यूरोप के समस्त रीति-रिवाजों को जारी किया जाए, जिससे हम अपनी कला और आचारशास्त्र, साहित्य और कानून का अमर साम्राज्य भारत में कायम करें। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हम भारतवासियों की एक ऐसी श्रेणी उत्पन्न करें जो हमारे और उन करोड़ों के बीच में, जिन पर हमें शासन करना है, दुभाषिए का काम दें; जिनके खून तो हिन्दुस्तानी हों, पर रुचि अंग्रेजी हो। संक्षेप में अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीय तन से भारतीय, पर मन से अंग्रेज हो जाएँ, जिससे अंग्रेजों का विरोध करने की उनकी भावना ही नष्ट हो जाए।”

और उसने एक ऐसी शिक्षा-प्रणाली बनाकर, जो कि भारतीयों को अपनी संस्कृति और सभ्यता से दूर ले जाए और उनमें राष्ट्रीय भावना पैदा ही ना होने दे, अंग्रेजी शासन को भेज दिया। अंग्रेजी शासन ने उस शिक्षा-प्रणाली को सहर्ष स्वीकार कर लिया और भारत में मैकॉले की वह शिक्षा-प्रणाली सन् 1835 से लागू हो गई। यह वह शिक्षा-प्रणाली थी जो कि भारतीयों में आत्मानुशासन, नैतिकता, अध्यात्मिकता, आत्म-सम्मान की भावना, राष्ट्रीयता इत्यादि का नाश करके स्वार्थपरता और पद-लोलुपता सिखाती थी।

भारत के स्वतन्त्र होने के बाद हमारे तथाकथित राष्ट्रनिर्माताओं ने मैकॉले की उसी शिक्षा प्रणाली को न केवल अपनाया बल्कि उसमें ऐसे परिवर्तन भी कर दिए कि भारत की जनता उन तथाकथित राष्ट्रनिर्माताओं को और भी महान समझने लगे, उनके द्वारा किए गए देशवासियों के शोषण को जरा भी न समझ पाए, भ्रष्टाचार के द्वारा उनकी कमाई को जनता अनदेखी करती रहे। और सौ बात की एक बात कि वे अनन्तकाल तक अपने पदों पर विराजमान होकर जनता के द्वारा पूजे जाते रहें।

Monday, August 8, 2011

मेरी पसंद के कुछ दोहे

रहिमन चुप व्है बैठिये, देख दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर॥

रहिमन निज मन की ब्यथा, मन ही राखो गोय।
सुन इठलइहैं लोग सब, बाँट न लइहैं कोय॥

रहिमन देख बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहाँ करै तलवारि॥

.निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुहाय॥

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा ना कोय॥

बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरहुं को शीतल करै, आपहु शीतल होय॥

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब्ब।
पल में परलय होयगा, बहुरि करेगा कब्ब॥

छमा बड़न को चाहिये, छोटन को उत्पात।
कहि रहीम हरि का गयो, जो भृगु मारेव लात॥

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥

दुख में सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करै, तो दुख काहे होय॥

एकहि साधै सब सधै, सब साधै सब जाय।
रहिमन मूलहि सींचिबो, फूलहि फलहि अघाय॥

बड़े काम ओछे करे, तौ न बड़ाई होय।
ज्यों­ रहीम हनुमंत को, गिरिधर कहै ना कोय।

रहिमन वे नर मर गये, जिन कछु मांगन जाहि।
उन ते पहिले वे मुये, जिन मुख निकसति नाहि॥

खीरा सिर ते काटिये, मलिये लोन लगाय।
रहिमन कड़ुये मुखन को, चहियत यही सजाय॥

रहिमन विपदा ही भली, जो थोरे दिन होय।
हित-अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥

मन मोती और दूध रस, इनकी सहज सुभाय।
फटे ते फिर ना मिले, कोटिन करो उपाय॥

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।
पारब्रम्ह को पाइये, मन ही की परतीत॥

खैर खून खाँसी खुसी बैर प्रीत मदपान।
रहिमन दाबे ना दबे जानत सकल जहान॥

आवत ही हरसे नहीं नैनन नहीं सनेह।
तुलसी तहाँ ना जाइए कंचन बरसे मेह॥

Thursday, August 4, 2011

सावन का पावन प्रणय-मास!

मूसलाधार वर्षा की टिपर-टिपिर...

तेज गति से चलती हुई पुरवाई की साँय-साँय...

बादलों की गड़गड़ाहट...

दादुरों की टर्राहट...

इन समस्त ध्वनियों का आपस में गड्डमड्ड हो जाने की प्रक्रिया एक विचित्र किन्तु मनभावन हारमोनी उत्पन्न कर देती हैं जिसके संगीत में डूबकर मन विभोर हो जाता है।

रात के सन्नाटे में मूसलाधार वर्षा के मध्य दामिनी की दमक और मेघों की कड़क एक ऐसी विचित्र अनुभूति का अनुभव होने लगता है जिसे कि शब्दों में बयान करना बहुत ही मुश्किल कार्य लगने लगता है। ऐसे में यदि दूर किसी रेडियों से  "मनमोर हुआ मतवाऽऽला ये किसने जादू डाला रे..." जैसे फिल्मी गीत के बोल सुनाई दे जाय तो कहना ही क्या है!

भगवान भास्कर द्वारा श्यामल-उज्ज्वल मेघों के लिहाफ को नख से शिख तक ओढ़ लेना, भरी दुपहरी का घटाटोप अंधेरे के आभास के कारण तिमिरमय रात्रि जैसा प्रतीत होना, इस तिमिर के बीच चपला की चमक से सम्पूर्ण धरा का चौंधिया जाना और उसके बाद मेघों के गगनभेदी गर्जन से उसका काँप जाना ही तो पावस का अपूर्व सौन्दर्य है!

पावस में कभी मूसलाधार तो कभी हल्की फुहार से नदी-नाले अपनी उफान पर आ जाते हैं। ऐसा प्रतीत होने लगता है कि उफनती हुई सरिताएँ सम्पूर्ण धरा को अपने भीतर समेट लेना चाह रही हैं। उनकी वेगवती प्रचण्ड धाराएँ चट्टानों से टकरा कर उन्हें चूर-चूर कर डालने के लिए आतुर हैं। वेगवती धाराओं का विशाल शिलाओं पर प्रहार से उत्पन्न धवल फेन की शुभ्रता नयनाभिराम प्रतीत होने लगती हैं।

पावस की ऋतु वह ऋतु है जो -

बाल हृदय को उल्लासित कर देता है...

युवा प्रेमी-युगलों के हृदय में मधुर मिलन के लिये तड़प उत्पन्न कर देता है...

विरहातुरों को संतप्त कर देता है...

वृद्ध हृदय को अतीत का स्मरण कराता है।

पावस में कवि-हृदय नव सृजन के लिए बरबस व्याकुल हो उठता है। जहाँ गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर बरबस ही गुनगुना उठते हैं "वृष्टि पड़े टापुर-टुपुर ..." वहीं रामेश्ववर शुक्ल 'अंचल' कह "पावस गान" में कह उठते हैं 'सावन का पावन प्रणय-मास!' हम मनुष्यों की तो बिसात ही क्या, देवाधिदेव श्री राम के मुख से बरबस निकल पड़ता है -

घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥

पोस्ट के अन्त यह भी बता देना चाहता हूँ कि लिखने को तो इतना सब कुछ लिख गया हूँ पर इन सारी अनुभूतियों पर भारी पड़ रहा है यह विचार कि -

सामने हैं सावन के सारे त्यौहार
जिस पर है भयंकर मँहगाई की मार
कहीं से लेना पड़ेगा उधार
नहीं तो काम चलाना हो जाएगा दुश्वार
लटक रही है ऐसी तलवार
जिसने कर दिया है "सौन्दर्य अनुभूति" को तड़ीपार
अब ऐसे में भला क्या पोस्ट लिखें यार?

 
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