Monday, October 31, 2011

अमीर भारत की जनता को गरीब बनाने वाले काले अंग्रेज


यह तो हम सभी जानते हैं कि सोने की खदानें भारत में न तो आज हैं और न कभी पहले ही थी। फिर भी इतना सोना था भारत में कि उसे "सोने की चिड़िया" कहा जाता था। फिर प्रश्न यह उठता है कि आरम्भ ले लेकर अठारहवीं शताब्दी तक भारत विश्व का सबसे धनाढ्य देश कैसे बना रहा? जब भारत में सोने की खानें ही नहीं थीं तो फिर इतना सारा सोना वहाँ आया कहाँ से? जाहिर है कि उन देशों से आया होगा जहाँ सोने की खदानें हैं। पर इतिहास गवाह है कि कई हजार साल के अपने इतिहास में भारत ने कभी भी किसी अन्य देश पर आक्रमण नहीं किया, किसी को भी लूटा नहीं। जब लूटा नहीं तो फिर भी दूसरे देशों से सोना कैसे आ गया? कोई किसी को सेंत-मेत में सोना तो देने से रहा। भारत ने लूटा नहीं और दूसरे देशों ने सेंत-मेंत में दिया नहीं फिर भी भारत में दूसरे देशों से न केवल सोना बल्कि चाँदी, हीरे, लाल जैसे अन्य रत्न आते रहे। लूट-खसोट से नहीं बल्कि व्यापार से। भारत कोई असभ्य देश नहीं था जो दूसरों को लूटता, लूटने का काम तो सिर्फ असभ्य ही करते हैं। भारत अत्यन्त प्राचीनकाल से ही सभ्य देश रहा है। प्राचीनकाल से ही भारत का व्यापार अत्यन्त समृद्ध रहा है। भारत के उत्पादनों की संसार भर के देशों में माँग थी और भारत का निर्यात विश्व के कुल निर्यात का एक तिहाई था। भारत के समृद्ध व्यापार ने भारत को एक ऐसा गड्ढा बना कर रख दिया था जिसमें दुनिया भर से धन-दौलत आ-आ कर भरने के तो सत्रह सौ साठ रास्ते थे पर उसमें उसे निकल जाने के लिए कोई भी रास्ता नहीं था। यही कारण है कि भारत विश्व का सर्वाधिक धनाढ्य देश बन गया था। भारत के अनेक मन्दिरों तथा राजा-महाराजओं के धनागार में वह धन इकट्ठा होते रहता था।

अत्यन्त प्राचीनकाल से ही भारत का व्यापारिक सम्बन्ध भारत से बाहर के देशों से स्थापित हो चुका था। भारत में बने कपड़ों की प्रायः सभी देशों में माँग बनी ही रहती थी, भारत के मसालों के लिए तो अन्य देश के लोग मसालों के वजन के बराबर सोना तक देने के लिए तैयार रहते थे। यह व्यापारिक सम्बन्ध मुग़ल अमलदारी में फिर से नये सिरे से फिर स्थापित हुआ। मुग़ल-साम्राज्य की समाप्ति तक अफ़गानिस्तान दिल्ली के बादशाह के अधीन था तथा अफ़गानिस्तान के जरिये बुखारा, समरकंद, बलख, खुरासान, खाजिम और ईरान से हजारों यात्री तथा व्यापारी भारत में आते रहते थे। बादशाह जहांगीर के राज्यकाल में तिजारती माल से लदे चौदह हजार ऊँट प्रतिवर्ष बोलान दर्रे से भारत आते थे। इसी प्रकार पश्चिम में भड़ोंच, सूरत, चाल, राजापुर, गोआ और करबार तथा पूर्व में मछलीपट्टनम तथा अन्य बन्दरगाहों से सहस्रों जहाज प्रतिवर्ष अरब, ईरान, टर्की, मिस्र, अफ्रीका, लंका, सुमात्रा, जावा, स्याम और चीन आते-जाते थे।

भारत की अकूत धन-सम्पदा को प्राप्त करने के लालच में यवन, शक, हूण, तुर्क, मुगल आदि जैसी असभ्य और बर्बर जातियों ने बार-बार आक्रमण करते रहे। अनेकों बार लूटे जाने के बावजूद भी भारत की धन-सम्पदा अकूत ही बनी रही। अंग्रेजों के आने तक भारत संसार का सबसे धनी देश बना ही रहा। शाहजहां की धन-दौलत का अनुमान तक कोई भी इतिहासज्ञ नहीं लगा सका है। उसका स्वर्ण-रत्न-भण्डार संसार भर में अद्वितीय था। गोलकुण्डा से ही उसे तीस करोड़ की सम्पदा प्राप्त हुई थी, आज के तीस करोड़ नहीं बल्कि आज से लगभग चार सौ साल पहले के तीस करोड़ रुपये। शाहजहां ने मक्का में काबा मस्जिद में एक ठोस सोने की एक मोमबत्ती, जिसमें सबसे बहुमूल्य हीरा जड़ा था जिसकी कीमत एक करोड़ रुपये थी, भेंट की थी। कहा जाता है कि शाहजहां के पास इतना धन था कि फ्रांस और पर्शिया के दोनों महाराज्यों के कोष मिलाकर भी उसकी बराबरी नहीं कर सकते थे। तख्त-ए-ताउस सोने के ठोस पायों पर बना हुआ था जिसमें मोतियों और जवाहरात के दो मोर बने थे। उसमें पचास हजार मिसकाल हीरे, मोती और दो लाख पच्चीस मिसकाल शुद्ध सोना लगा था, जिसकी कीमत सत्रहवीं शताब्दी में तिरपन करोड़ रुपये आँकी गई थी। इससे पूर्व इसके पिता जहांगीर के खजाने में एक सौ छियानवे मन सोना तथा डेढ़ हजार मन चाँदी, पचास हजार अस्सी पौंड बिना तराशे जवाहरात, एक सौ पौंड लालमणि, एक सौ पौंड पन्ना और छः सौ पौंड मोती थे। शाही फौज अफसरों की दो हजार तलवारों की मूठें रत्नजटित थीं। दीवाने-खास की एक सौ तीन कुर्सियाँ चाँदी की तथा पाँच सोने की थीं। तख्त-ए-ताउस के अलावा तीन ठोस चाँदी के तख्त और थे, जो प्रतिष्ठित राजवर्गी जनों के लिए थे। इनके अतिरिक्त सात रत्नजटित सोने के छोटे तख्त और थे। बादशाह के हमाम में जो टब सात फुट लम्बा और पाँच फुट चौड़ा था, उसकी कीमत दस करोड़ रुपये थी। शाही महल में पच्चीस टन सोने की तश्तरियाँ और बर्तन थे। वर्नियर कहता है कि बेगमें और शाहजादियाँ तो हर वक्त जवाहरात से लदी रहती थीं। जवाहरात किश्तियों में भरकर लाए जाते थे। नारियल के बराबर बड़े-बड़े लाल छेद करके वे गले में डाले रहती थीं। वे गले में रत्न, हीरे व मोतियों के हार, सिर में लाल व नीलम जड़ित मोतियों का गुच्छा, बाँहों में रत्नजटित बाजूबंद और दूसरे गहने नित्य पहने रहती थीं।

भारत की इस अथाह धनराशि के विषय में एशियाई देश तो जानते ही थे, यूरोपीय देशों में भी इसकी चर्चा होती थी। किन्तु फ्रांस, ब्रिटेन जैसे देशों के पास भारत पहुँचने का कोई आसान जरिया नहीं था। फिर पन्द्रहवीं शताब्दी में पुर्तगाली वास्को डा गामा ने भारत पहुँचने का समुद्री रास्ता खोज लिया। भारत की अकूत धन-सम्पदा को देखकर उसकी आँखें चौंधिया गईं। उसने जब वापस जाकर यहाँ के वैभव के बारे में यूरोप को बताया तो यूरोपीय लोगों का मुँह में पानी आने लग गया। उन्हें पता चल गया था कि भारत के एक समुद्री तट से दूसरे समुद्री तट में जाकर व्यापार करने वाले जहाजों में अपार धन होता है। बस फिर क्या था, हिन्द महासागर यूरोपीय समुद्री डाकुओं से पट गया। पुर्तगाल और स्पेन के समुद्री डाकू दो सौ साल तक भारतीय जहाजों को लूटते रहे। यहाँ तक कि पुर्तगालियों ने मंगलौर, कंचिन, लंका, दिव, गोआ और बम्बई के टापू को अपने अधिकार में ही ले लिया।

वैसे तो उन दिनों अधिकांश यूरोपीय देश लुटेरे ही थे किन्तु उनमें सबसे पहला नंबर इंग्लैंड का था क्योंकि इंगलैंड अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ तक घोर दरिद्रता, निरक्षरता और अन्धविश्वासों का दास बना हुआ था। कृषि वहाँ होती नहीं थी, व्यापार, उद्योग-धंधे वहाँ थे नहीं। इंगलैंड के पीछे न तो किसी जातीय सभ्यता का इतिहास था और न ही किसी प्राचीन संस्कृति की छाप। पर सत्रहवीं शताब्दी के पहले इंग्लैंड के लुटेरे भारत तक पहुँच ही नहीं पाए क्योंकि उनके पास भारत आने के रास्ते का नक्शा नहीं था। रानी एलिजाबेथ के शासनकाल में सर फ्रांसिस ड्रेक नामक एक डाकू, जो कि ‘समुद्री कुत्ते’ के नाम से विख्यात था, एक पुर्तगालियों के जहाज को लूट लिया तो उसमें उसे लूट के माल के साथ भारत आने का समुद्री नक्शा भी मिल गया। भारत के धन-वैभव के विषय में उन्होंने सुन ही रखा था इसलिए इस नक्शे के मिल जाने पर ही ईंस्ट इंडिया कंपनी की नींव का पहला पत्थर डाला गया।

भारतीय जलमार्ग के नक्शे के मिल जाने के लगभग तीस साल बाद सन् 1608 में अंग्रेजों का ‘हेक्टर’ नामक एक जहाज सूरत के बन्दरगाह में आकर लगा। जहाज का कप्तान का नाम हाकिन्स था जो कि पहला अंग्रेज था जिसने भारत की भूमि पर कदम रखा था। उन दिनों भारत में बादशाह जहांगीर तख्तनशीन थे। हाकिन्स ने आगरा जाकर इंग्लिस्तान के बादशाह जेम्स प्रथम का पत्र और सौगात बादशाह को भेंट की। आगरा की विशाल अट्टालिकाएँ, नगर का वैभव और बादशाह जहांगीर के ऐश्वर्य को देखकर उसकी आँखें चुँधिया गईं। ऐसी शान का शहर उसने अपने जीवन में कभी देखा ही नहीं था, देखना तो दूर उसने ऐसे वैभवशाली नगर की कभी कल्पना भी नहीं की थी। चिकनी-चुपड़ी बातें करके उसने बादशाह को खुश कर लिया और अंग्रेजों को सूरत में कोठी बनाने तथा व्यापार करने का फर्मान भी जारी करवा लिया। इतना ही नहीं इस बात की भी इजाजत ले ली कि मुगल दरबार में अंग्रेज एलची रहा करे। थोड़े ही समय पश्चात् सर टॉमस रो इंग्लिस्तान के बादशाह का एलची बनकर मुगल-दरबार आया और उसने अंग्रेज व्यापारियों के लिए और भी सुविधाएँ प्राप्त कर लीं। अंग्रेजों को कालीकट और मछलीपट्टनम में भी कोठियाँ बनाने की इजाजत मिल गई। अपनी बातों के जाल में उसने बादशाह को ऐसा उलझाया कि बादशाह ने यह फर्मान भी जारी कर दिया कि अपनी कोठी के अन्दर रहने वाले कम्पनी के किसी मुलाजिम के कसूर करने पर अंग्रेज स्वयं उसे दण्ड दे सकते हैं। यह एक विचित्र बात थी क्योंकि अंग्रेजों ने अपने साथ अपने देश से किसी नौकर को नहीं लाया था बल्कि उन्होंने भारतीयों को ही अपना नौकर बना कर रख लिया था। इस प्रकार से इस फर्मान के तहत अंग्रेजों को अपने भारतीय नौकरों का न्याय करने और उन्हें सजा देना का अधिकार मिल गया। ऐसा फर्मान जारी करना बादशाह की सबसे बड़ी भूल थी। फर्मान जारी करते वक्त उस बादशाह ने सपने में भी नहीं सोचा रहा होगा कि एक दिन ये अंग्रेज बादशाह के उत्तराधिकारी तक को दण्ड दने लगेंगे और यदि उनका विरोध किया जाएगा तो वे प्रजा का संहार कर डालेंगे तथा बादशाह के उत्तराधिकारी को बागी कहकर आजीवन कैद कर लेंगे।

शुरू-शुरू में उनका व्यापार भारत में नहीं चला क्योंकि वे प्रायः काँच के सस्ते सामान के थैले लादे शहर-शहर गली- गली में घूम-घूम कर उन सामानों को बेचते फिरते थे। औरंगजेब के समय तक भारत के अन्दर अंग्रेज व्यापारियों की स्थिति लगभग वैसी ही थी, जैसे आज घूम-घूम कर हींग बेचने वाले काबुलियों की होती है। हाँ यह जरूर था कि बंदर की भाँति लाल-लाल चेहरेवाले फिरंगी के मुँह से उनकी अटपटी भाषा सुनने को बालक और स्त्रियाँ आतुर रहते, उनके आने पर उनके काँच के सस्ते सामान को हँसी उड़ाते और उन्हें तंग करते थे।

किन्तु बाद में वे अपने देश से सोना-चाँदी, जो कि प्रायः समुद्री डाकुओं की लूट का माल होता था, बेचना शुरू किया और उनका यह धंधा जोर-शोर के साथ चल निकला और वे मुनाफा कमने लगे। भारत से वापस इंग्लैंड जाते समय वे भारत से कच्चे रेशम, रेशम के बने कपड़े, उम्दा किस्म का शोरा सस्ते में खरीद कर ले जाते थे जिनकी वहाँ पर खूब माँग थी।

सूरत में उनकी कोठी पहले से ही थी। बाद में उन्होंने पटना और मछलीपट्टनम, जो कि उन दिनों गोलकुण्डा राज्य के अन्तर्गत बन्दरगाह था, में भी कोठियाँ बनवा डालीं। व्यापार के बढ़ने के साथ ही साथ बालासोर, कटक, हरिहरपुर आदि में भी अंग्रेजों की कोठियाँ बन गईं। विजयनगर के महाराज से जमीन माँग कर अंग्रेजों ने मद्रास में सेंट जार्ज का किला भी बनवा लिया। इस प्रकार से मुगल-राज्य से बाहर अंग्रेजों का एक स्वतन्त्र केन्द्र स्थापित हो गया।

यद्यपि ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में सिर्फ व्यापार करने की इजाजत मिली थी, वह कम्पनी ब्रिटिश सरकार की प्रतिनिधि नहीं थी, किन्तु अब इस कंपनी ने अपने निजी धन-जन से भारत के भागों को हथियाना शुरू कर दिया। और मजे की बात तो यह है कि उनका निजी धन-जन भी भारत की ही थी याने कि भारत से कमाई गई रकम से भारत के लोगों को ही सैनिक बना कर भारतीय लोगों पर ही आक्रमण करना। इस प्रकार से उस काल में भारत की बीस करोड़ जनता पर ब्रिटेन के मात्र सवा करोड़ निवासियों का वर्चस्व होने की शुरुवात हो गई।

सन् 1661 में इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय ने ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में अपना सिक्का चलाने, रक्षा के लिए फौज रखने, किले बनाने और आवश्यकता पड़ने पर लड़ाई लड़ने के भी अधिकार प्रदान कर दिए। यह दूसरी विचित्र बात थी क्योंकि जिस भारत पर इंग्लैंड के राजा का किसी भी प्रकार का अधिकार नहीं था, उसी भारत पर व्यापार करने वाली अंग्रेजी कंपनी को इंग्लैंड के राजा ने राजनैतिक अधिकार दे दिया और यहाँ के सत्ताधारियों के कान में जूँ भी नहीं रेंगी। यही वह अधिकार था जिसने बाद में भारत में अंग्रेजों की सत्ता स्थापित की।

औरंगजेब की अनुदार नीति ने चारों ओर छोटी-छोटी परस्पर प्रतिस्पर्धा करने वाली रियासतें भारत में पैदा कर दी, जिससे केन्द्रीय शक्ति निर्बल हो गई और हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य खण्डित हो गया। औरंगजेब की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद ही मद्रास और बंगाल में ईस्ट इंडिया कम्पनी के षड्यन्त्र चलने लगे, जिनके फलस्वरूप औरंगजेब की मृत्यु के पचास वर्ष बाद प्लासी का युद्ध हुआ। उस समय अंग्रेजों का हित इस बात में था कि औरंगजेब की अनुदार नीति के कारण जो अव्यवस्था और अनैक्य भारत के हिन्दू-मुसलमानों में स्थापित हो चुका था, वह कायम ही रखा जाए और उन्होंने यही अपनी नीति बना ली।

इतने सब के बावजूद भी उस समय तक सभ्यता, शक्ति और व्यवस्था में भारतीय अंग्रेजों से श्रेष्ठ थे। परन्तु उनमें एक बात की कमी थी। वह कमी थी उनके भीतर राष्ट्रीयता या देश-भक्ति की भावना का न होना। यद्यपि भारत की शक्ति बहुत अधिक थी, किन्तु वह बिखरी हुई थी, छोटे-छोटे राजा-रजवाड़ों में बँटी हुई थी। अंग्रेजों और दूसरी यूरोपियन जातियों ने यह बात जान ली और उन्होंने इससे लाभ उठाकर एक शक्ति को दूसरी शक्ति से लड़ाने का धन्धा आरम्भ कर दिया। दिखाने के लिए उन्होंने अपना रूप निष्पक्ष का रखा, परन्तु भीतर ही भीतर भाँति-भाँति की साजिशों और चालों को चलकर उन्होंने बिखरी हुई भारतीय शक्तियों में ऐसा संग्राम खड़ा कर दिया कि वे शक्तियाँ स्वयं ही एक-दूसरे से टकराकर चकनाचूर होने लगीं। परिणाम यह हुआ कि संसार का सर्वाधिक धनाढ्य देश भारत अंग्रेजों के अधिकार में आ गया और उन्होंने उस सर्वाधिक सम्पन्न देश को लूट-लूट कर दुनिया का सबसे बड़ा कंगाल देश बना डाला।

किन्तु भारत के पास आज भी ऐसी प्राकृति सम्पदाएँ हैं जो अन्य देशों के पास नहीं है। मीठे फलों, पत्तीदार सब्जियों तथा अन्य बहुत सारी वस्तुओं के लिए यूरोपीय देश आज भी भारत पर आश्रित हैं। भारतीयों की श्रम-शक्ति और बुद्धि-चातुर्य अद्भुत है। इन्हीं कारणों से स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद से भारत ने फिर से तेजी सम्पन्नता प्राप्त करना शुरू कर दिया। आज भी भारत बहुत अमीर है पर वहाँ की जनता गरीब है। अमीर भारत की जनता को गरीब बनाने का श्रेय सिर्फ उन काले अंग्रेजों को जाता है जिनके हाथ में स्वतन्त्रता के बाद सत्ता की बागडोर चली गई और जिन्होंने तरह-तरह के घोटाले कर-कर फिर से भारत को लूटना शुरू कर दिया। सन उन्नीस सौ अड़तालीस में घोटाले की जो शुरुवात हुई वह दिन दूनी और रात चौगुनी बढ़ती गई तथा आज तक जारी है। इन काले अंग्रेजों ने ही अमीर भारत की जनता को गरीब बना डाला और स्वयं को अमीर।

Sunday, October 30, 2011

मानव शरीर से सम्बन्धित कुछ रोचक जानकारी

  • एक वयस्क व्यक्ति के शरीर में 206 हड्डियाँ होती हैं जबकि बच्चे के शरीर में 300 हड्डियाँ होती हैं (क्योंकि उनमें से कुछ गल जाती हैं और कुछ आपस में मिल जाती हैं)। 
  • मनुष्य के शरीर में सबसे छोटी हड्डी स्टेप्स या स्टिरुप (stapes or stirrup) होती है जो कि कान के बीच में होती है तथा जिसकी लंबाई लगभग 11 इंच (.28 से.मी.) होती है।
  • मनुष्य के शरीर में मोटोर न्यूरोन्स (motor neurons) सबसे लंबी सेल होती है जो कि रीढ़ की हड्डी से शुरू होकर पैर के टखने तक जाती है और जिसकी लंबाई 4.5 फुट (1.37 मीटर) तक हो सकती है।
  • मनुष्य की जाँघों की हड्डियाँ कंक्रीट से भी अधिक मजबूत होती हैं।
  • मनुष्य की आँखों का आकार जन्म से लेकर मृत्यु तक एक ही रहता है जबकि नाक और कान के आकार हमेशा बढ़ते रहते हैं।
  • आदमी एक साल में औसतन 62,05,000 बार पलकें झपकाता है।
  • खाए गए भोजन को पचने में लगभग 12 घण्टे लगते हैं।
  • मनुष्य के जबड़ों की पेशियाँ दाढ़ों में 200 पौंड (90.8 कि.ग्रा.) के बराबर शक्ति उत्पन्न करती हैं।
  • अभी तक प्राप्त आँकड़ों के अनुसार सबसे भारी मानव मस्तिष्क का वजन 5 पौंड 1.1 औंस. (2.3 कि.ग्रा..) पाया गया है।
  • एक सामान्य मनुष्य अपने पूरे जीवनकाल में भूमध्य रेखा के पाँच बार चक्कर लगाने जितना चलता है।
  • मनुष्य की मृत्यु हो जाने के बाद भी बाल और नाखून बढ़ते ही रहते हैं।
  • मनुष्य की चमड़ी के भीतर लगभग45 मील (72 कि.मी.) लंबी तंत्रिकाएँ (नसें) होती हैं।
  • मनुष्य के शरीर के भीतर रक्त प्रतिदिन 60,000 मील (96,540 कि.मी.) दूरी की यात्रा करता है।

Saturday, October 29, 2011

"घास खोद रहा हूँ - इसी को अंग्रेजी में रिसर्च कहते हैं" - श्रीलाल शुक्ल

व्यंग और कटाक्ष के माध्यम से कटुसत्य उघाड़ कर रख देना हर किसी के बस की बात नहीं है। श्रीलाल शुक्ल इसी विधा के धनी थे। लोकहित और प्रजातन्त्र के नाम पर आज जो राजनीतिक संस्कृति फल-फूल रही है, उसे एक छोटे से कस्बे शिवपालगंज की पंचायत, वहाँ के कॉलेज प्रबन्धन समिति और कोऑपरटिव्ह सोसाइटी के सूत्रधार वैद्यजी का रूप देकर अत्यन्त सरलता के साथ प्रस्तुत कर देने जैसा कार्य शुक्ल जी के विलक्षण व्यंग लेखन का अद्वितीय उदाहरण है। उनका लेखन भारतीय ग्राम्य तथा नगरीय जीवन के नैतिक पतन, स्वार्थपरता और मूल्यहीनता को परत-दर-परत उघाड़ कर रख देता है।

इस देश के नियम और कानून को दर्शाते हुए वे लिखते हैं -

"स्टेशन-वैगन से एक अफसरनुमा चपरासी और एक चपरासीनुमा अफसर उतरे। खाकी कपड़े पहने हुये दो सिपाही भी उतरे। उनके उतरते ही पिंडारियों-जैसी लूट खसोट शुरू हो गयी। किसी ने ड्राइवर का ड्राइविंग लाइसेंस छीना, किसी ने रजिस्ट्रेशन-कार्ड; कोई बैक व्ह्यू मिरर खटखटाने लगा, कोई ट्रक का हार्न बजाने लगा। कोई ब्रेक देखने लगा। उन्होंने फुटबोर्ड हिलाकर देखा, बत्तियाँ जलायीं, पीछे बजनेवाली घंटी टुनटुनायी। उन्होंने जो कुछ भी देखा, वह खराब निकला; जिस चीज को भी छुआ, उसी में गड़बड़ी आ गयी। इस तरह उन चार आदमियों ने चार मिनट में लगभग चालीस दोष निकाले और फिर एक पेड़ के नीचे खड़े होकर इस प्रश्न पर बहस करनी शुरू कर दी कि दुश्मन के साथ कैसा सुलूक किया जाये।"

शुक्ल जी के कटाक्ष हर किसी को तिलमिला कर रख देते हैं। उनकी कृति "राग दरबारी" से लिए गए उनके कटाक्ष के कुछ नमूने यहाँ पर प्रस्तुत हैं -
  • आज रेलवे ने उसे धोखा दिया था। स्थानीय पैसेंजर ट्रेन को रोज की तरह दो घंटा लेट समझकर वह घर से चला था, पर वह सिर्फ डेढ़ घंटा लेट होकर चल दी थी। शिकायती किताब के कथा साहित्य में अपना योगदान देकर और रेलवे अधिकारियों की निगाह में हास्यास्पद बनकर वह स्टेशन से बाहर निकल आया था। रास्ते में चलते हुये उसने ट्रक देखा और उसकी बाछें- वे जिस्म में जहां कहीं भी होती हों- खिल गयीं।
  • प्राय: सभी में जनता का एक मनपसन्द पेय मिलता था जिसे वहां गर्द, चीकट, चाय, की कई बार इस्तेमाल की हुई पत्ती और खौलते पानी आदि के सहारे बनाया जाता था। उनमें मिठाइयां भी थीं जो दिन-रात आंधी-पानी और मक्खी-मच्छरों के हमलों का बहादुरी से मुकाबला करती थीं। वे हमारे देशी कारीगरों के हस्तकौशल और वैज्ञानिक दक्षता का सबूत देती थीं। वे बताती थीं कि हमें एक अच्छा रेजर-ब्लेड बनाने का नुस्ख़ा भले ही न मालूम हो, पर कूड़े को स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों में बदल देने की तरकीब दुनिया में अकेले हमीं को आती है।
  • रिश्वत, चोरी, डकैती- अब तो सब एक हो गया है.....पूरा साम्यवाद है!
  • विद्यालय के एक-एक टुकड़े का अलग-अलग इतिहास था। सामुदायिक मिलन -केन्द्र गाँव-सभा के नाम पर लिये गये सरकारी पैसे से बनवाया गया था। पर उसमें प्रिंसिपल का दफ्तर था और कक्षा ग्यारह और बारह की पढ़ाई होती थी। अस्तबल -जैसी इमारतें श्रमदान से बनी थीं। टिन -शेड किसी फ़ौजी छावनी के भग्नावशेषों को रातोंरात हटाकर खड़ा किया गया था। जुता हुआ ऊसर कृषि-विज्ञान की पढ़ाई के काम आता था। उसमें जगह-जगह उगी हुई ज्वार प्रिंसिपल की भैंस के काम आती थी। देश में इंजीनियरों और डॉक्टरों की कमी है। कारण यह है कि इस देश के निवासी परम्परा से कवि हैं। चीज़ को समझने के पहले वे उस पर मुग्ध होकर कविता कहते हैं। भाखड़ा-नंगल बाँध को देखकर वे कहते हैं, "अहा! अपना चमत्कार दिखाने के लिए, देखो, प्रभु ने फिर से भारत-भूमि को ही चुना।" ऑपरेशन -टेबल पर पड़ी हुई युवती को देखकर वे मतिराम-बिहारी की कविताएँ दुहराने लग सकते हैं।
  • उन्हें देखकर इस फिलासफी का पता चलता था कि अपनी सीमा के आस-पास जहाँ भी ख़ाली ज़मीन मिले, वहीं आँख बचाकर दो-चार हाथ ज़मीन घेर लेनी चाहिए।
  • अंग्रेजों के ज़माने में वे अंग्रेजों के लिए श्रद्धा दिखाते थे। देसी हुकूमत के दिनों में वे देसी हाकिमों के लिए श्रद्धा दिखाने लगे। वे देश के पुराने सेवक थे। पिछले महायुद्ध के दिनों में, जब देश को ज़ापान से ख़तरा पैदा हो गया था, उन्होने सुदूर-पूर्व में लड़ने के लिए बहुत से सिपाही भरती कराये। अब ज़रूरत पड़ने पर रातोंरात वे अपने राजनीतिक गुट में सैंकड़ों सदस्य भरती करा देते थे। पहले भी वे जनता की सेवा जज की इजलास में जूरी और असेसर बनकर, दीवानी के मुकदमों में जायदादों के सिपुर्ददार होकर और गाँव के ज़मींदारों में लम्बरदार के रूप में करते थे। अब वे कोऑपरेटिव यूनियन के मैनेजिंग डाइरेक्टर और कॉलिज के मैनेजर थे। वास्तव में वे इन पदों पर काम नहीं करना चाहते थे क्योंकि उन्हें पदों का लालच न था। पर उस क्षेत्र में ज़िम्मेदारी के इन कामों को निभानें वाला कोई आदमी ही न था और वहाँ जितने नवयुवक थे, वे पूरे देश के नवयुवकों की तरह निकम्मे थे; इसीलिए उन्हें बुढ़ापे में इन पदों को सँभालना पड़ा था।
  • पुनर्जन्म के सिद्धांत की ईजाद दीवानी की अदालतों में हुई है, ताकि वादी और प्रतिवादी इस अफ़सोस को लेकर मर सकते हैं कि मुक़दमे का फ़ैसला सुनने के लिए अभी अगला जन्म तो पड़ा ही है।
  • तब वकीलों ने लंगड़ को समझाया। बोले कि नक़ल बाबू भी घर-गिरिस्तीदार आदमी है। लड़कियाँ ब्याहनी हैं। इसलिए रेट बढ़ा दिया है। मान जाओ और पाँच रूपये दे दो। पर वह भी ऐंठ गया। बोला कि अब यही होता है। तनख्वाह तो दारू-कलिया पर खर्च करते हैं और लड़कियाँ ब्याहने के लिए घूस लेते हैं। नक़ल बाबू बिगड़ गया। गुर्राकर बोला कि जाओ, हम इसी बात पर घूस नहीं लेंगे। जो कुछ करना होगा क़ायदे से करेंगे। वकीलों ने बहुत समझाया कि ‘ऐसी बात न करो, लंगड़ भगत आदमी है, उसकी बात का बुरा न मानो,’ पर उसका गुस्सा एक बार चढ़ा तो फिर नहीं उतरा।
श्रीलाल शुक्ल जी की व्यंग रचना "राग दरबारी", जिसका अंग्रेजी तथा पन्द्रह भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है, ऐसे कटाक्षों से भरी पड़ी है। यद्यपि शुक्ल जी का नश्वर शरीर अब इस संसार में नहीं है किन्तु उनकी रचनाओं ने उन्हें अमर बना दिया है।

Friday, October 28, 2011

यम द्वितीया याने कि भाई दूज

पौराणिक मान्यता के अनुसार यम तथा यमुना, जो कि सूर्य एवं संज्ञा की सन्तानें थीं, में परस्पर बहुत अधिक स्नेह था। अलग-अलग दायित्व मिल जाने उन्हें एक-दूसरे से दूर होना पड़ा। यमुना ने अपने भाई यम को अपने घर आने के लिए अनेक बार निमन्त्रित किया किन्तु कार्याधिक्य तथा व्यस्तता के कारण वे यमुना के घर नहीं जा पाते थे। एक बार कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमराज को कुछ अवकाश मिला तो वे अपनी बहन यमुना के घर पहुँच गए। अपने घर अपने भाई यम को आए देखकर यमुना अत्यन्त प्रसन्न हुईं और उनका बहुत आदर-सत्कार किया, विविध प्रकार के व्यञ्जन बना कर उन्हें खिलाया और उनके भाल पर तिलक लगाया। बदले में यम ने भी यमुना को अनेक प्रकार के उपहार दिए।

बहन के घर से विदा लेते समय यम ने यमुना से वर माँगने का आग्रह किया। इस पर यमुना ने उनसे प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन अपने घर आने का तथा उन समस्त भाइयों का, जो कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन अपनी बहन के घर भोजन कर उन्हें भेंट दें, कल्याण करने का वचन ले लिया।

यही कारण है कि यम द्वितीया याने कि भाई दूज के दिन भाई अपने बहन के घर जाकर भोजन करते हैं तथा उन्हें भेंट देते हैं। जिनकी बहनें नहीं होतीं, उन्हें भाई दूज के दिन गाय के कोठे में बैठकर भोजन करना पड़ता है।

Wednesday, October 26, 2011

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ!

माँ लक्ष्मी की कृपा से आपका जीवन सदैव धन-धान्य, सुख-सम्पत्ति से परिपूर्ण रहे।

हिन्दी वेबसाइट की ओर से दीपावली की शुभकामनाएँ
(चित्र देशीकमेंट.कॉम से साभार)

Tuesday, October 25, 2011

नरक चौदस - नरकासुर के नाश का दिन

दीपावली के पाँच दिनों के पर्व का दूसरा दिन, अर्थात् लक्ष्मीपूजा के एक दिन पहले वाला दिन, नरक चौदस कहलाता है। नरक चौदस के दिन प्रातःकाल में सूर्योदय से पूर्व उबटन लगाकर नीम, चिचड़ी जैसे कड़ुवे पत्ते डाले गए जल से स्नान का अत्यधिक महत्व है। इस दिन सूर्यास्त के पश्चात् लोग अपने घरों के दरवाजों पर चौदह दिये जलाकर दक्षिण दिशा में उनका मुख करके रखते हैं तथा पूजा-पाठ करते हैं।

नरक चौदस के साथ अनेक पौराणिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं जिनमें से एक नरकासुर वध की कथा भी है। कहा जाता है कि नरक चौदस के दिन ही भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। प्राग्ज्योतिषपुर में राज्य करने वाला नरकासुर एक अत्यन्त ही क्रूर असुर था। उसने इन्द्र, वरुण, अग्नि, वायु आदि सभी देवताओं को परास्त किया था तथा सोलह हजार देवकन्याओं का हरण कर रखा था। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर से वध करके उसका संहार किया और उन सोलह हजार कन्याओं को मुक्ति दिलाई। उन समस्त कन्याओं ने अपने मुक्तिदाता श्री कृष्ण को पति रूप में स्वीकार किया। नरकासुर का वध करने के कारण ही श्री कृष्ण को 'नरकारि' के नाम से भी जाना जाता है, 'नरकारि' शब्द नरक तथा अरि के मेल से बना हुआ है, नरक अर्थात नरकासुर और अरि का अर्थ है शत्रु। नरकासुर का मित्र मुर नामक असुर का भी श्री कृष्ण ने वध किया था इसलिए उनका नाम 'मुरारि' भी है।

नरकासुर का अत्याचार रूपी तिमिर का नाश होने की स्मृति में ही आज भी नरक चौदस के दिन अन्धकार पर प्रकाश की विजय के रूप में दिए जलाए जाते हैं।

हिन्दी वेबसाइट की ओर से दीपावली की शुभकामनाएँ
(चित्र देशीकमेंट.कॉम से साभार)

Monday, October 24, 2011

धन तेरस के पूर्वाभिमुख तेरह दीप

धन त्रयोदशी अर्थात् धन तेरस के पूर्वाभिमुख तेरह दीप वर्ष पर्यन्त आपके भण्डार को धन-धान्य, स्वर्ण-रजत आदि से परिपूर्ण रखे!

Happy Dhanteras
(चित्र देशीकमेंट.कॉम से साभार)

Sunday, October 23, 2011

रैली हो या रथयात्रा, किसका भला होता है इससे?


अपने राजनैतिक लाभ के लिए हजारों-लाखों जनता को परेशान करना कहाँ तक उचित है? कोई नेता रैली निकालता है तो कोई रथयात्रा, पर उद्देश्य क्या होता है उनका? किसका भला होता है इससे? मुख्य सड़कें रोक दी जाती हैं और अन्य सड़कों में जाम लग जाता है। जनता ही तो परेशान होती है। पर आखिर जनता कर भी क्या सकती है सिवा परेशान होने के? परेशान होना शायद उसकी नियति है। जिस किसी के हाथ में जनता सत्ता सौंपती है वही उसे परेशान करने लगता है। बड़े नगर वैसे ही अपने ट्रैफिक से त्रस्त रहते हैं, उस पर गाँव-गाँव से गाड़ियों में भरकर लाखों लोगों को ले आया जाता है। जनता की परेशानी तो बढ़ेगी ही इससे। पर नेताओं को जनता की परेशानी से क्या लेना-देना? उन्हें तो बस अपने राजनैतिक लाभ को ही देखना है। शायद यही असली लोकतन्त्र है।

Saturday, October 22, 2011

रामलाल - एक भुला दिए गए फिल्म संगीत निर्देशक

मैं सुबह की चाय पी रहा था और मेरे कानों में गूँज रहे थे पड़ोस से आती हुई गीत के बोल 'तेरे खयालों में हम तेरी ही ख्वाबों में हम....'। सुनकर मन झूम उठा और मैं सन् 2011 से सन् 1964 में पहुँच गया जब फिल्म व्ही. शांताराम जी की 'फिल्म गीत गाया पत्थरों ने', जिस फिल्म का यह गाना है, रिलीज हुई थी। फिल्म के गाने खूब लोकप्रिय हुए थे। फिल्म के संगीत निर्देशक थे रामलाल।

उन दिनों फिल्म संगीत निर्देशक के रूप में रामलाल चौधरी, नौशाद, सचिनदेव बर्मन, शंकर जयकिशन, मदन मोहन, रवि, ओ.पी. नैयर आदि जैसे, जाना-माना नाम नहीं था। बहुत कम लोग उन्हें उसके पहले शायद जानते रहे हों, विशेषकर शांताराम जी की ही फिल्म 'सेहरा' के गीत 'पंख होते तो उड़ आती रे...' और 'तकदीर का फसाना....' के लिए। हालाकि उन्होंने उसके पहले हुस्नबानो फिल्म में भी संगीत दिया था पर उससे उनकी पहचान नहीं बन पाई थी।

रामलाल चौधरी फिल्म संगीत जगत की एक भूली हुई प्रतिभा हैं जिन्होंने सन् 1944 में फिल्मी संसार में पदार्पण किया था। उन दिनों वे संगीतकार राम गांगुली के सहायक हुआ करते थे। 'जिंदा हूँ इस तरह के गमे जिंदगी नहीं....' और 'देख चाँद की ओर मुसाफिर....' गानों में उनका बाँसुरी वादन तथा शहनाई वादन इतना अधिक पसंद किया गया कि वे एक प्रकार से बाँसुरी वादक तथा शहनाई वादक के रूप में ही जाने जाने लगे। सी. रामचंद जी ने फिल्म  'नवरंग' के गीत 'तू छुपी है कहाँ, मैं तड़पता यहाँ....' में उनके शहनाई वादन का बहुत सुन्दर प्रयोग किया है।

स्वतन्त्र संगीतकार के रूप में रामलाल चौधरी के पी.एल संतोषी ने सन् 1950 में फिल्म 'तांगावाला', जिसमें राज कपूर और और वैजयन्ती माला प्रमुख कलाकार थे, के लिए पहली बार मौका दिया था। उस फिल्म के लिए रामलाल ने 6 गानों की धुनें बना भी ली थीं किन्तु दुर्भाग्य से किसी कारणवश उस फिल्म का निर्माण ही रुक गया और वह फिल्म कभी बन ही नहीं सकी। दुर्भाग्य ने उनका साथ बाद में भी नहीं छोड़ा और सेहरा तथा गीत गाया पत्थरों ने फिल्मों में अत्यन्त लोकप्रिय संगीत देने के बावजूद भी उन्हें आगे फिल्में नहीं मिलीं। आज रामलाल एक भुला दिए गए संगीतकार बन कर रह गए हैं।

Thursday, October 20, 2011

भारत में अंग्रेजी शिक्षा

जब भारत को एक ब्रिटिश उपनिवेश बना लिया गया तो सुचारु रूप से शासन तथा व्यवस्था चलाने के लिए अंग्रेजों को बड़ी संख्या में अधिकारियों तथा कर्मचारियों, विशेषकर क्लर्कों, की आवश्यकता महसूस हुई। अधिकारी नियुक्त करने के लिए तो वे ब्रिटेन से अंग्रेजों को, अच्छी कमाई का प्रलोभन देकर, भारत ले आते थे किन्तु वहाँ से क्लर्कों को भी लाना उनके लिए बहुत कठिन और खर्चीला कार्य था। अतः उन्होंने भारतीय लोगों को क्लर्क के रूप में नियुक्त करने का निश्चय किया। चूँकि उनके समस्त कार्य अंग्रेजी में ही होते थे, भारतीय क्लर्कों को अंग्रेजी को ज्ञान होना अत्यावश्यक था। इस बात को ध्यान में रखते हुए ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने सन् 1813 में भारतीयों को अंग्रेजी सिखाने के लिए कुछ धन का प्रावधान रखा ताकि उन्हें भारत से ही क्लर्क तथा अनुवादक प्राप्त हो सकें। 1833 के चार्टर एक्ट के पश्चात् भारत में अंग्रेजी अधिकारिक रूप से कार्यालयीन भाषा बन गई। सन् 1844 में लॉर्ड हॉर्डिंग्ज ने घोषणा की कि अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीयों को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी जाएगी। इस घोषणा के पीछे क्लर्क और अनुवादक प्राप्त करने के साथ ही निम्न उद्देश्य भी थे जैसे किः
  • वे समझते थे कि अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीय ब्रिटिश उपनिवेश के प्रति अधिक निष्ठावान रहेंगे।
  • इस घोषणा से भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करने वाली मिशनरियों को फायदा मिलेगा क्योंकि उन्हें लगता था कि अंग्रेजी पढ़ा-लिखा व्यक्ति, चाहे वह प्रभावशाली भारतीय परिवार का ही क्यों न हो, आसानी के साथ अपना धर्म त्यागकर ईसाई धर्म अपना लेगा।
यहाँ पर यह बताना अनुपयुक्त नहीं होगा कि उन दिनों भारत की अपनी एक अलग शिक्षा-व्यवस्था हुआ करती थी। अध्यापन का कार्यभार ब्राह्मणों पर होता था और वे अपने घरों में विद्यार्थियों को शिक्षा दिया करते थे। शिक्षा के लिए किसी प्रकार की फीस नहीं होती थी, जहाँ धनी वर्ग के लोग अपनी सन्तानों की शिक्षा के एवज में ब्राह्मणों को पर्याप्त से भी अधिक धन-धान्य तथा जमीन-जायजाद तक दान में दे देते थे वहीं निर्धनों की सन्तान मुफ्त में शिक्षा पाते थे। गाँवों की ग्राम पंचायतों के नियन्त्रण में भी पाठशालाओं का संचालन हुआ करता था। उच्च संस्कृत-साहित्य की शिक्षा हेतु नगरों में विद्यापीठ हुआ करते थे। उर्दू-फारसी की शिक्षा के लिए बहुत सारे मक़तब और मदरसे भी कायम थे।

अंग्रेजों ने भारत में अपना उपनिवेश स्थापित तो कर लिया था पर उसे कायम रखने में भारत की यह शिक्षा व्यवस्था बहुत बड़ी बाधा थी। कुछ उदारवादी भारतीयों ने, यह सोचकर कि अंग्रेजी शिक्षा से पाश्चात्य संस्कृति, दर्शन तथा साहित्य का ज्ञान होगा, अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण करना आरम्भ कर दिया किन्तु उनकी संख्या नगण्य थी। किन्तु अंग्रेज तो चाहते थे कि अधिक से अधिक संख्या में भारतीय अंग्रेजी के भक्त बन जाएँ इसलिए उन्होंने मक्कारी से काम लिया और सरकारी नौकरी का प्रलोभन देना शुरू किया। मध्यम वर्गीय भारतीयों के लिए, जिनकी स्थिति उन दिनों बहुत अच्छी नहीं थी, यह एक बहुत बड़ा प्रलोभन था क्योंकि सरकारी नौकरी में वेतन तो अच्छा था ही और 'ऊपर की कमाई' भी होती थी। 'ऊपर की कमाई' को भारत में एक प्रकार से अंग्रेजों की ही देन ही कहा जा सकता है क्योंकि अंग्रेजों ने ऐसे-ऐसे सरकारी नियम-कानून बना रखे थे जिससे कि भारतीयों को येन-केन-प्रकारेन लूटा जा सके। अब यदि अंग्रेज अधिकारियों को भारतीयों को लूटने का भरपूर अवसर प्राप्त था तो भला सरकारी नौकरी करने वाले स्थानीय लोगों को भला लूट का थोड़ा-बहुत हिस्सा 'ऊपर की कमाई' के रूप में कैसे न मिलता। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो भारतीयों को अंग्रेजों के साथ अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीय सरकारी नौकर भी लूटने लगे। भारतीय शिक्षा जहाँ लोगों मे संतोष, त्याग और परमार्थ की भावना उत्पन्न करती थी वहीं अंग्रेजी शिक्षा उनमें लोभ और स्वार्थ की भावना ही पैदा करती थी, अंग्रेजी शिक्षा-व्यवस्था का आधार लूट-खसोट जो था। अंग्रेजों की लूट का आलम यह था कि तंग आकर किसानों ने किसानी छोड़ दी, पुराने खानदान गारत कर दिए गए, ग्राम पंचायतों को नष्ट कर डाला गया और उनके द्वारा संचालित पाठशालाओं को तोड़ डाला गया, न्याय प्रक्रिया को ऐसा जटिल बना दिया गया कि केवल आर्थिक रूप से सम्पन्न लोग ही न्यायालय से कुछ उम्मीद रख पाते थे, गरीब जनता के लिए न तो कानून था और न ही इन्साफ। पुलिस के चक्कर में जो फँस जाता था उसका तो बेड़ा ही गर्क हो जाता था। भारत के अत्यन्त कुशल कारीगरों को अयोग्य और असहाय बना दिया गया ताकि हस्तनिर्मित वस्तुओं के स्थान पर अंग्रेजों के यंत्र निर्मित वस्तुएँ बेची जा सकें।

अस्तु, अंग्रेजी पढ़े लोगों की कमाई और रुतबा देखकर भारतीयों का अंग्रेजी के प्रति रुझान बढ़ता ही चला गया। अंग्रेज समझ रहे थे कि अंग्रेजी शिक्षा का असर भारतीयों पर वैसा ही पड़ रहा है जैसा वे चाहते थे। यह उनकी एक बहुत बड़ी सफलता थी। अपनी इस सफलता से उत्साहित होकर उन्होंने समस्त भारतीयों को तन से भारतीय किन्तु मन से अंग्रेज बनाने की वृहत् योजना बना डाली जिसके तहत सन् 1835 में "मैकॉले के मिनट" का सूत्रपात किया गया। "मैकॉले का मिनट" अंग्रेजों की एक बहुत बड़ी मक्कारी थी किन्तु भारतीय उस मक्कारी को समझ नहीं पाए क्योंकि उसे भारत में शिक्षा के विकास तथा लोककल्याण का मुखौटा पहना दिया गया था। भारतीयों को इसके विषय में लच्छेदार भाषा में बताया गया कि इसका उद्देश्य "साहित्य का पुरुद्धार करना तथा साहित्य को बढ़ावा देना, भारत के शिक्षित निवासियों को प्रोत्साहन देना तथा विज्ञान का परिचय तथा बढ़ावा देना" है। ("For the revival and promotion of literature and the encouragement of the learned natives of India, and for the introduction and promotion of a knowledge of the sciences among the inhabitants of the British territories.")

उपरोक्त मिनट के पीछे छुपी हुई मक्कारी धूर्त मैकॉले के उस स्पष्टीकरण में स्पष्ट नजर आती है जिसमें उसने कहा था, "हमें एक ऐसा वर्ग बनाने की पुरजोर कोशिश करनी ही होगी जो हमारे और उन करोड़ों के बीच में, जिन पर हमें शासन करना है, दुभाषिए का काम करें; जिनके खून तो हिन्दुस्तानी हों, पर रुचि, खयाल और बोली अंग्रेजी हो।" ("We must do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern, a class of persons Indian in blood and color, but English in taste, in opinions, words and intellect.")

मक्कार मैकॉले भारतीयों के मनो-मस्तिष्क में अंग्रेजी भाषा को कूट-कूट कर भर देना चाहता था ताकि भारतीयों के दिलो-दिमाग से अंग्रेज और अग्रेजी विरोधी भावना ही खत्म हो जाए, और, हमारे दुर्भाग्य से, वह अपने इस उद्देश्य में न केवल सफल हुआ बल्कि बुरी तरह से सफल हुआ। हम शिक्षा में रमकर अपनी संस्कृति, सभ्यता, साहित्य, रीति-रिवाज आदि सब को भूलते चले गए।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भी दुर्भाग्य ने हमारा साथ नहीं छोड़ा क्योंकि सत्ता की बागडोर अंग्रेजों द्वारा बनाए गए भारतीय अंग्रजों के हाथ में आ गया और उन्होंने भारत में विदेशियों के बनाए शिक्षा-नीति और व्यवस्था को जारी रहने दिया जिसका परिणाम आज यह देखने को मिलता है कि हमारे अपने बच्चे ही हमसे पूछते हैं कि 'चौंसठ याने सिक्सटी' फोर ही होता है ना? हिन्दी गिनती, हिन्दी माह, हिन्दी वर्णमाला क्या होते हैं, उन्हें मालूम ही नहीं है।

Tuesday, October 18, 2011

साँप जो घोसला बनाता है

किंग कोबरा ही एक मात्र साँप है जो कि घोसला बनाता है और उसकी रक्षा भी करता है। किन्तु नर किंग कोबरा घोसले नहीं बनाते, घोसला सिर्फ मादा किंग कोबरा बनाती है अपने अण्डों के लिए।


किंग कोबरा विषैले साँपों में सबसे लम्बे साँप होते हैं, प्रायः इनकी लम्बाई 18 फुट (5.5 मीटर) तक पाई जाती है। सामना करने की स्थिति में किंग कोबरा अपने शरीर के एक तिहाई भाग को जमीन से ऊपर उठा सकता है और वैसी ही स्थिति में आक्रमण करने के लिए आगे सरक भी सकता है। क्रोधित किंग कोबरा की फुँफकार बड़ी भयावनी होती है। किंग कोबरा का विष इतना अधिक खतरनाक होता है कि उसकी मात्र 7 मि.ली. मात्रा 20 आदमी या 1 हाथी तक की मृत्यु का कारण बन सकती है। वैसे किंग कोबरा साँप आदमियों से भरसक बचने के प्रयास में रहते हैं किन्तु विषम परिस्थितियों में फँस जाने पर प्रचण्ड रूप से आक्रामक हो जाते हैं।

किंग कोबरा साँप प्रायः भारत के अधिक वर्षा वाले जंगली तथा मैदानी क्षेत्र, दक्षिणी चीन तथा एशियाई के सुदूर दक्षिणी क्षेत्रों में पाए जाते हैं तथा अलग-अलग क्षेत्रों में इनका रंग भी अनेक प्रकार के होते हैं। वृक्षों पर, जमीन पर और पानी में ये सुविधापूर्वक रह सकते हैं। किंग कोबरा का मुख्य आहार अन्य जहरीले तथा गैर-जहरीले साँप ही होते हैं, वैसे ये छिपकिल्लियों, अण्डों तथा कुछ अन्य छोटे जन्तुओं को भी खा जाते हैं।

Monday, October 17, 2011

विज्ञान और तकनीकी से सम्बन्धित कुछ रोचक जानकारी

  • सबसे पहले बनी अलार्म घड़ी में केवल सुबह 4 बजे ही अलार्म बज सकता था।
  • एक रोल्स रॉयस कार के बनने में छः महीने लगते हैं जबकि एक टोयोटा कार के बनने में मात्र 13 घंटे।
  • टेलिविजन के सबसे पहले प्रयोग करने वाले चार देश हैं इंग्लैंड, अमेरिका रूस और ब्राजील।
  • जेट विमानों में केस्टर ऑयल का प्रयोग ल्यूब्रिकेंट की तरह किया जाता है।
  • घड़ियों में ल्यूब्रिकेंट की तरह प्रयोग किए जाने वाले तेल की कीमत लगभग $3,000 प्रति गैलन होती है।
  • पहला लाइफ बोट सन्  1845 में पेटेंट कराया गया।
  • थॉमस एल्वा एडीसन नें अपने जीवनकाल में अपने लगभग 1,300 आविष्कारों को पेटेंट करवाया।
  • एप्पल II के लिए उपलब्ध पहला हॉर्ड ड्राइव्ह मात्र 5 मेगाबाइट का था।
  • इलेक्ट्रिक चेयर का आविष्कार एक डेंटिस्ट ने किया था।
  • जम्बो जेट विमान को टेक आफ करने के लिए 4,000 गैलन ईंधन की आवश्यकता होती है।
  • निटेंडो मूलतः एक ताशपत्ती बनाने वाली कम्पनी थी।

Sunday, October 16, 2011

केवल एक व्यक्ति को जागरूक करके आप बहुत बड़ी देशसेवा कर सकते हैं

आज हममें से प्रत्येक व्यक्ति मँहगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त है। हम सभी इन दोनों महादानव के शिकंजे में दिन-ब-दिन फँसते चले जा रहे हैं और हमारा जीवन दिनोंदिन दुःखमय होता चला जा रहा है। अंग्रेजों की गुलामी के समय हम दुःखी तो थे ही पर गुलामी से मुक्ति मिल जाने के बाद भी हम दुःखी ही हैं। गुलामी के समय में हमें गोरे अंग्रेज लूटते थे और अब काले अंग्रेज लूट रहे हैं। हम दुःखमय जीवन सिर्फ इसलिए जी रहे हैं क्योंकि हम में से अधिकतर लोग जागरूक नहीं हैं। यदि हम जागरूक रहते तो आज यह दिन देखना नहीं पड़ता। सन 1948 में जब काले अंग्रेजों की लूट जीप घोटाले के रूप में उजागर हुआ था, यदि उसी समय जागरूक जनता ने उन काले अंग्रेजों को उखाड़ फेंका होता तो आज स्वतन्त्र भारत का इतिहास ही कुछ और होता। किन्तु हमारे दुर्भाग्य से वैसा नहीं हुआ और घोटालेबाजों को इससे शह मिलने के कारण एक के बाद एक कई घोटाले होते चले गए। जनता अपनी खून-पसीना बहा कर कमाई गई गाढ़ी कमाई का एक हिस्सा टैक्स के रूप में सरकार को देती रही किन्तु जनता की वह कमाई काले अंग्रेजों का काला धन बनकर विदेशी बैंकों में जमा होते चली गई। जनता ने अपनी खुशहाली के लिए सरकार को टैक्स दिया था पर वह खुशहाल होने के स्थान पर दिनोंदिन खस्ताहाल होते चली गई।

देश की जनता चुपचाप जुल्मो-सितम सहते चली गई और अब तक सह रही है। इस प्रकार से अत्याचार सहने के पीछे केवल यह विचार था, और है, कि 'आखिर हम कर ही क्या सकते हैं'? अत्याचार सहने को हमने अपना नियति मान लिया। ऐसा सिर्फ इसलिए है क्योंकि हममें से अधिकतर लोग जागरूक नहीं हैं।

यदि आप उन चन्द लोगों में से एक हैं जो कि जागरूक हैं तो आप अन्य लोगों को जागरूक होने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। आप उनके मस्तिष्क में यह बात बिठा सकते हैं कि सत्ता की शक्ति का दुरुपयोग करके हमें लूटने वाले काले अंग्रेजों को हम ही सत्ता के सिंहासन में बिठाते हैं अपना वोट देकर। यदि हम उन्हें चुनाव न जिताएँ तो उन्हें कभी भी सत्ता-शक्ति प्राप्त न हो सके। हम तो हनुमान हैं, जिनके पास असीम शक्ति है, किन्तु हम अपने बल को भूले हुए हैं। आप उन्हें समझा सकते हैं कि हमारा वोट कम्बल, कपड़े, दारू आदि के बदले बिकने वाली वस्तु नहीं है। सही व्यक्ति को वोट देने से हम खुशहाल हो सकते हैं और गलत को वोट देने से खस्ताहाल। लोगों को उनके वोट का महत्व समझाइये। विश्वास मानिये कि यदि आप केवल एक व्यक्ति को भी जागरूक करते हैं तो वह भी देश की एक बहुत बड़ी सेवा होगी क्योंकि आपके द्वारा जागरूक किया गया व्यक्ति किसी अन्य एक व्यक्ति को जागरूक करेगा, श्रृंखला बढ़ती चली जाएगी और देश के अधिकतर लोग जागरूक हो जाएँगे।

Saturday, October 15, 2011

गुस्सा किसे नहीं आता?



1955 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आवाड़ी (मद्रास) अधिवेशन में किसी को तकिया फेंक कर मारने की मुद्रा में पूर्व प्रधानमन्त्री स्व. जवाहर लाल नेहरू।

Friday, October 14, 2011

अमीर और गरीब के लिए अलग-अलग कानून - क्या यही सरकार की सोच है?

कानून मन्त्री न्यायपालिका से पूछ रहे हैं, "यदि आप शीर्ष व्यापारियों को जेल में ठूँसेंगे, तो पूँजी नियोजन कैसे होगा?"

सरकार की किस प्रकार की सोच को जाहिर करता है यह प्रश्न? क्या सरकार चाहती है कि अमीर अगर अपराध भी करे तो उसे सजा न हो? क्या सरकार ने किसी भूखे गरीब द्वारा रोटी चुराने जैसे अपराध पर कभी कोई प्रश्न पूछा है? जब सरकार को पूँजी नियोजन की इतनी फिक्र है कि उसके लिए अपराधी को सजा भी न मिले तो उसे किसी गरीब के द्वारा मजबूर होकर अपराध करने की सजा न मिलने की फिक्र क्यों नहीं है? क्या सरकार चाहती है कि अपराध के लिए जो कानून किसी गरीब पर लागू होता है वही कानून किसी अमीर पर लागू न हो? क्या सरकार अमीर और गरीब के लिए अलग-अलग कानून बनाना चाहती है? क्या ऐसा होने पर भ्रष्टाचार और भी नहीं बढ़ेगा?

यद्यपि सरकार कहती है कि हम भ्रष्टाचार को खत्म करने की पुरजोर कोशिश में लगे हैं पर उसके किसी भी क्रिया-कलाप से जरा भी नहीं लगता कि वह ऐसा कोई कोशिश कर रही है, उल्टे विदेशों में काला धन जमा करने वालों का नाम, सर्वोच्च न्यायालय के बार-बार फटकार के बाद भी, जाहिर न करना, बाबा रामदेव के आन्दोलन को कुचल देना, जनलोकपाल बिल को लटकाए रखना, भ्रष्ट लोगों को बचाने का भरपूर प्रयास करना जैसे कार्यों से तो यही लगता है कि सरकार भ्रष्टाचार बढ़ावा ही देना चाहती है।

कानून मन्त्री के इस प्रश्न को सर्वोच्च न्यायालय ने 'आश्चर्यजनक और बेचैन करने वाला' बताया है। विधि मन्त्री के इस प्रश्न ने कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव की स्थिति बना दिया है। क्या इस प्रकार के टकराव से देश का अहित नहीं होगा?

कभी इस देश में राम ने न्याय की रक्षा के लिए लक्ष्मण तक का भी त्याग कर दिया था और आज भ्रष्ट लोगों के हित के लिए कानून का ही गला घोटने की कोशिश की जा रही है। धन्य है हमारी सरकार!

Thursday, October 13, 2011

मुश्किलें होती हैं आसान बड़ी मुश्किल से

महानायक अमिताभ बच्चन के लिए आज भला कौन सा काम ऐसा होगा जो मुश्किल होगा? हो सकता है कि उनके लिए भी कुछ काम मुश्किल वाले हों किन्तु आम लोग तो यही सोचते हैं कि शोहरत और दौलत वाले लोगों के लिए कोई भी काम मुश्किल नहीं होता। अस्तु, आज अमिताभ जी के लिए भले ही कोई काम मुश्किल न हो पर एक समय ऐसा भी था जबकि उनके सामने मुश्किलें ही मुश्किलें थीं। हम सभी जानते हैं कि मुश्किलों को आसान करना सबसे बड़ा मुश्किल काम है पर अमिताभ बच्चन ने दृढ़ संकल्प और पुरुषार्थ का साथ कभी नहीं छोड़ा और मुश्किलें आसान होती चली गईं।

मेरे हिन्दी वेबसाइट के कुछ पाठक कभी-कभी अपनी पसंद की पोस्ट लिखने की फरमाइश भी कर देते हैं। कल ही मेरे एक स्नेही पाठक ने मुझसे चैट में आकर अमिताभ बच्चन पर पोस्ट लिखने के लिए कहा तो मैनें जवाब दिया था कि उनके विषय में तो पहले ही इतना लिखा जा चुका है कि अब मैं क्या लिखूँ? फिर भी कोशिश करूँगा। और उस चैट के परिणाम के रूप में यह पोस्ट आपके सामने है।

सन् 1969 में जब अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म ‘सात हिन्दुस्तानी’ प्रदर्शित हुई थी तो उस समय मेरी उम्र 19 साल की थी और उस जमाने के अन्य तरुणों के समान ही मुझमें भी सिनेमा के प्रति रुझान उन्माद की सीमा तक थी। दोस्तों के साथ हर प्रदर्शित होने वाली फिल्म को देखना उन दिनों एक शान सा लगता था इसलिए यह सुन लेने के बाद भी कि ‘सात हिन्दुस्तानी’ एक फ्लॉप फिल्म है, मैने दोस्तों के साथ रायपुर के श्याम टॉकीज में वह फिल्म देखी। यद्यपि फिल्म मुझे बहुत पसंद आई थी, दोस्तों ने उस फिल्म को नापसंद ही किया क्योंकि, उन दिनों सिनेमा का जादू अपनी चरम पर होने के बावजूद भी, अधिकतर रोमांस और मारधाड़ वाली फिल्में ही पसंद की जाती थीं। ‘सात हिन्दुस्तानी’ ख्वाज़ा अहमद अब्बास की फिल्म थी जिन्होंने कमर्शियल सिनेमा कभी बनाया ही नहीं। सो पत्र-पत्रिकाओं आदि में तो फिल्म की बहुत तारीफ हुई और अमिताभ के अभिनय को भी खूब सराहा गया पर फिल्म को जैसी चलनी थी, चली नहीं या सही माने में कहा जाए तो फिल्म बुरी तरह से पिट गई। अमिताभ बच्चन की आवाज से प्रभावित होकर मृणाल सेन ने उन्हें 1969 में ही प्रदर्शित अपनी फिल्म ‘भुवन सोम’ में‘नरेटर’ (पार्श्व उद्घोषक) का कार्य दिया याने किफिल्म में उनकी आवाज अवश्य थी पर उन्हें परदे पर कहीं दिखाया नहीं गया था। मुझे आज भी याद है कि ‘सात हिन्दुस्तानी’ फिल्म तो थोड़ी बहुत चली भी थी पर ‘भुवन सोम’ बिल्कुल ही नहीं चली थी।

इस प्रकार फिल्म पाने के लिए अमिताभ बच्चन का संघर्ष जारी हो गया। फिल्मी पत्र-पत्रिकाओं में कभी-कभी अमिताभ बच्चन के बारे में भी जानकारी छपती रहती थी। अपनी भी हालत उन दिनों ऐसी थी कि पत्र-पत्रिकाएँ खरीदने के लिए तो दूर, कोर्स की पुस्तकें तक खरीदने के लिए पैसे नहीं होते थे अपने पास, इसलिए पठन के अपने शौक को पूरा करने के लिए प्रत्येक दिन का तीन से चार घण्टे "किशोर पुस्तकालय", जो कि पुस्तकालय के साथ वाचनालय भी था, में बीतते थे। सो पढ़ने को मिलता था कि अमिताभ को फिल्में नहीं मिल रहीं थी, हाँ मॉडलिंग के ऑफर जरूर मिल रहे थे पर मॉडलिंग वे करना नहीं चाहते थे। जलाल आगा की विज्ञापन कम्पनी में, जो विविध भारती के लिए विज्ञापन बनाती थी, वे अपनी आवाज अवश्य दे देते थे ताकि जीवन-यापन के लिए सौ-पचास रुपये मिलते रहें, आखिर सात हिन्दुस्तानी फिल्म के मेहनताने के रूप में मिले पाँच हजार रुपये कब तक चलते?

फिर सुनील दत्त की फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ (1971) में उन्हें काम मिला। उस फिल्म में उन्होंने एक गूँगे का का किरदार अदा किया। विचित्र सा लगता है कि फिल्म भुवन सोम में अमिताभ की आवाज थी तो वे स्वयं नहीं थे और रेशमा और शेरा में अमिताभ थे तो उनकी आवाज नहीं थी। 1971 में ही प्रदर्शित उनकी अन्य फिल्में थीं संजोग, परवाना और आनंद। संजोग चली ही नहीं, परवाना कुछ चली किन्तु उसमें अमिताभ का रोल एंटी हीरो का था, इसलिए फिल्म के चलने का श्रेय हीरो नवीन निश्चल को अधिक मिला, आनन्द खूब चली किन्तु फिल्म का हीरो उन दिनों के सुपर स्टार राजेश खन्ना के होने से अमिताभ बच्चन को फिल्म का फायदा कम ही मिला पर इतना जरूर हुआ कि अमिताभ बच्चन दर्शकों के बीच और भी अधिक स्थापित हो गए।

ऋषि दा ने अपनी फिल्म गुड्डी में भी अतिथि कलाकार बनाया पर इससे अमिताभ को कुछ विशेष फायदा नहीं मिला। फिर उन्हें रवि नगाइच के फिल्म प्यार की कहानी (1971) में मुख्य भूमिका मिली। नायिका तनूजा और सह कलाकार अनिल धवन के होने के बावजूद भी फिल्म चल नहीं पाई और अमिताभ के संघर्ष के दिन जारी ही रहे। उन दिनों अमिताभ बच्चन को जैसा भी रोल मिलता था स्वीकार कर लेते थे।

सन् 1972 में आज के महानायक की फिल्में थीं – बंशी बिरजू, बांबे टू गोवा, एक नजर, जबान, बावर्ची (पार्श्व उद्घोषक) और रास्ते का पत्थर। बी.आर. इशारा की फिल्म एक नजर में उनके साथ हीरोइन जया भादुड़ी थीं। फिल्म के संगीत को बहुत सराहना मिली पर फिल्म फ्लॉप हो गई। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि फिल्म एक नजर के गाने आज भी संगीतप्रेमियों के जुबान पर आते रहते हैं खासकर ‘प्यार को चाहिये क्या एक नजर…….’, ‘पत्ता पत्ता बूटा बूटा…….’, ‘पहले सौ बार इधर और उधर देखा है…….’ आदि। इसी फिल्म से अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी एक दूसरे को चाहने लगे। ये जया भादुड़ी ही थीं जिन्होंने संघर्ष के दिनों में अमिताभ को संभाले रखा।

सन् 1973 में अमिताभ जी की फिल्में बंधे हाथ, गहरी चाल और सौदागर विशेष नहीं चलीं। पर प्रकाश मेहरा की फिल्म जंजीर की अपूर्व सफलता और उनके एंग्री यंगमैन के रोल ने उन्हें विकास के रास्ते पर ला खड़ा किया। फिल्म जंजीर के बाद अमिताभ बच्चन सफलता की राह पर ऐसे बढ़े कि फिर उन्होंने मुड़कर पीछे कभी नहीं देखा।

तो मित्रों जीवन के संघर्ष को अमिताभ जी के जैसे ही दृढ़ संकल्प शक्ति और पुरुषार्थ से ही जीता जा सकता है क्योंकि मुश्किलें होती हैं आसान बड़ी मुश्किल से।

Wednesday, October 12, 2011

फोटो खींचना मना है

(चित्र सर्चकश्मीर.आर्ग से साभार)

दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर प्रसिद्ध महिला फोटोग्राफर “डालडा 13” (व्यारावाला) द्वारा लिया गया पूर्व प्रधानमन्त्री स्व. श्री जवाहर लाल नेहरू का चित्र।

Tuesday, October 11, 2011

शरद रैन उजियारी - सुधा वृष्टि सुखकारी

रात्रि में शीतलता का सुखद अनुभव तथा दिवस में भगवान भास्कर के किरणों की प्रखरता में ह्रास इस बात का द्योतक है कि पावस के पंक से मुक्ति प्राप्त हुए पर्याप्त समय व्यतीत हो चुका है। सरिता एवं सरोवरों का यौवन, उनके जल के सूखने से, क्षीण होते जा रहा है। असंख्य उड्गनों से युक्त घनविहीन निर्मल नभ सुशोभित होने लगा है। वाटिकाएँ अनेक प्रकार के पुष्पों से सुसज्जित होने लगी हैं तथा मधुकरों के गुंजन से गुंजायमान होने लगी हैं। यद्यपि शीत ऋतु की शुरुवात अभी नहीं हुई है किन्तु प्रातः काल की बेला में पुष्प-पल्लवों एवं तृणपत्रों पर तुषार के कण मोती के सदृश दृष्टिगत होने लगे हैं। तृणों की हरीतिमा पर, पारिजात के पल्लवों पर, कदली के पत्रों पर, चहुँ ओर मोती ही मोती बिखरने लगे हैं। कितने प्यारे लगते हैं पत्तों और बूटों पर बिखरे शबनम के ये कतरे! इन्हें देखकर प्रतीत होने लगता है कि धरा मुक्तामय बन चुकी है!  ओस की इन्हीं बूँदों के सौन्दर्य से प्रभावित होकर राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है -

है बिखेर देती वसुन्धरा मोती सबके सोने पर
रवि बटोर लेता है उनको सदा सवेरा होने पर
और विरामदायिनी अपनी सन्ध्या को दे जाता है
शून्य-श्याम-तनु जिससे उसका नया रूप छलकाता है!

नवरात्रि पर्व समाप्त हो चुका है। असत्य पर सत्य के विजय के रूप में अहंकारी रावण का पुतला दहन हो चुका है। और हिन्दू पंचांग के हिसाब से आश्विन माह की पूर्णिमा अर्थात् शरद् पूर्णिमा का आगमन हुआ है। शरद् पूर्णिमा को हिन्दू मान्यताओं में विशिष्ट स्थान प्राप्त है क्योंकि इस विशिष्ट पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्रमा का संयोग, समस्त नक्षत्रों में प्रथम नक्षत्र, अश्वनी नक्षत्र से होता है। अश्वनी नक्षत्र के स्वामी आरोग्यदाता अश्वनीकुमार हैं। शरद् पूर्णिमा को भारत में एक त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। महिलाएँ इस दिन कौमुदी व्रत, जिसे कि कोजागर व्रत के नाम से भी जाना जाता है, धारण करती हैं।

शरद पूर्णिमा
(चित्र देशीकमेंट.कॉम से साभार)


शरद पूर्णिमा को गुरु-शिष्य परम्परा का भी एक विशिष्ट दिन माना जाता है तथा इस रोज शिष्य अपने गुरु से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि राधा ने कृष्ण को शरद पूर्णिमा से ही नृत्य की शिक्षा देना प्रारम्भ किया था, तभी तो "चन्द्रप्रभा" लिखते हैं -

जमुना पुलिन निकट वंशीवट
शरद रैन उजियारी हरि को नचन सिखावैं राधा प्यारी।

शरद पूर्णिमा की रात को रास की रात भी कहा जाता है क्योंकि श्री कृष्ण ने शरद पूर्णिमा की रात्रि को रासलीला रचाया था।

पौराणिक मान्ताओं के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात्रि को चन्द्रमा अपनी समस्त सोलह कलाओं से युक्त होता है और इस रात्रि में चन्द्र की शुभ्र ज्योत्सना शीतलता के साथ सुधा की वृष्टि करती है, इसीलिए शायद चन्द्रमा का एक नाम 'सुधाकर' भी है। चन्द्रमा के अन्य नाम हैं - चन्द्र, शशि, शशी, शशांक, सुधांशु, शुभ्रांशु, हिमांशु, निशापति, कलानिधि, इन्दु और सोम। हिन्दू मन्दिरों में शरद पूर्णिमा की अर्धरात्रि को देवी-देवताओं के पूजन के पश्चात् पायस (खीर) का प्रसाद वितरण किया जाता है। शरद पूर्णिमा की सन्ध्या में लोग अपने अपने घरों में खीर बनाकर उसे ऐसे स्थान में रखते हैं जहाँ पर उस पर चन्द्रमा की किरणें पड़ती रहें ताकि वह खीर अमृतमय हो जाए। अर्धरात्रि में उस अमृतमय खीर का सेवन किया जाता है।

आप सभी को शरद् पूर्णिमा की शुभकामनाएँ देते हुए मैं कामना करता हूँ कि इस शरद ऋतु के साथ ही साथ यह पूरा वर्ष आपके लिए मंगलमय हो!

Monday, October 10, 2011

जाने वो कौन सा देश जहाँ तुम चले गए

आज ऐसा कोई भी संगीत का शौकीन नहीं होगा जो गजल को न समझ सके पर मात्र 35-40 साल पहले, कम से कम भारत के, आम आदमी का गजल से कुछ भी वास्ता नहीं हुआ करता था। गजल को नवाबों का शौक और रक्कासाओं के कोठों की चीज माना जाता था। सन् 1976 में बने जगजीत सिंह के पहले एलबम ‘द अनफ़ॉरगेटेबल्स’ ने पहली बार आम जन में गजल के प्रति उन्माद पैदा कर दिया ओर जगजीत सिंह करोड़ों लोगों के प्रिय गजल गायक के रूप में जाने जाने लगे। यह जगजीत सिंह ही थे जिन्होंने भारत में गजल को लोकप्रिय बनाया। आज वही जगजीत सिंह हमारे बीच से चले गए।

 
यद्यपि जगजीत सिंह के नश्वर शरीर के दर्शन अब हमें कभी नहीं होंगे किन्तु उनके द्वारा गाये गए गजल हमेशा हमारे कानों में माधुर्य घोलते रहेंगे।

क्या हम जगजीत सिंह के गाए "आदमी आदमी को क्या देगा जो भी देगा वही खुदा देगा", "आपको देखकर देखता रह गया", "आए हैं समझाने लोग", "बाद मुद्दत उन्हें देखकर यूँ लगा", "बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं", "झुकी झुकी सी नजर बेकरार है के नहीं", "झूम के जब रिंदों ने पिला दी", "वो कागजी कश्ती वो बारिश का पानी", "कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा", "तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो", "यूँ जिन्दगी की राह में मजबूर हो गए", "होठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो" जैसे इन मधुर एवं लोकप्रिय गजलों को कभी भूल सकेंगे?

Sunday, October 9, 2011

और मैं आधुनिक बन गया!

समय निरन्तर निर्बाध गति से आगे ही आगे चलता रहता है, न तो कभी मुड़ कर पीछे देखता है और न ही किसी के लिए क्षण मात्र ही रुकता है। समय की गति के साथ परिवर्तन भी लगातार होते रहते हैं। रीति-रिवाज, आचार-विचार, जीवन शैली सभी कुछ बदल जाते हैं। इन परिवर्तनों ने मुझे अपने घर के रसोईघर में पाटे पर बैठकर, परसी गई थाली का आचमन कर के भगवान का भोग लगाकर, भोजन करने वाले व्यक्ति से जूते-चप्पल पहने हुए, बगैर ईश्वर को याद किए, डायनिंग चेयर पर बैठकर डायनिंग टेबल पर छुरी-चम्मच से खाना खाने वाला इंसान कब और कैसे बना दिया, मैं समझ ही नहीं पाया। मैं जान ही नहीं पाया कि कैसे मैं ग्रामोफोन के जमाने से डी.वी.डी. के जमाने तक कैसे पहुँच गया?

मुझे इस बात का दुःख नहीं है कि मैं पिछले 50-60 साठ सालों में भारतीय संस्कृति, भारतीय दर्शन, पूर्वजों द्वारा प्रदत्त आस्था, गुरुजनों के प्रति श्रद्धा, अपने रीति-रिवाज, अपनी सामाजिक मान्यताएँ आदि को भूलते चला आया हूँ बल्कि मुझे इस बात की खुशी है कि मैं अब पुराने दकियानूसी बातों को छोड़कर आधुनिक इन्सान बन गया हूँ।

Friday, October 7, 2011

भारतीय फिल्मों में गीतों का चलन

बिरला ही कोई व्यक्ति होगा जो फिल्मी गीतों का दीवाना न हो। भारतीय फिल्मों के गीत न केवल भारत में अपितु संसार भर के देशों में भी लोकप्रिय होते रहे हैं। एक जमाना था जब रूस में तो राज कपूर की फिल्मों के गीतों की तूती बोलती थी, रशियन लोग हिन्दी गाने गुनगुना कर खुश होते थे। फिल्मी गीतों पर आधारित रेडियो प्रोग्राम बिनाका गीतमाला ने कई दशकों तक रेडियो श्रोताओं को सम्मोहित कर के रखा था। रेडियो सीलोन, विविध भारती, आल इण्डिया रेडियो आदि का अस्तित्व ही फिल्मी गीतों से था।

भारत में सिनेमा के आने के पहले नाटक और नौटंकियों का चलन था। उस जमाने में बहुत सी नौटंकी कम्पनियाँ हुआ करती थीं जो कि पूरे भारत में अपना ताम-झाम लेकर घूम-घूम कर नाटक-नौटंकी दिखाया करती थीं, भारत में जगह-जगह लगने वाले मेलों में तो इन नौटंकी कम्पनियों की धूम हुआ करती थी। फिल्म "तीसरी कसम" की नायिका तो ऐसी ही एक नौटंकी कम्पनी की हीरोइन ही थी तथा फिल्म "गीत गाता चल" में भी नौटंकी कम्पनियों का बहुत अच्छा सन्दर्भ है। इन नाटकों तथा नौटंकियों में संवाद के साथ गीत गाने का भी चलन था, वास्तव में लोग नाच-गाना देखने के लिए ही नौटंकियों में जाया करते थे। बाद में सिनेमा का चलन हो जाने पर शनैः-शनैः नौटंकी कम्पनियाँ समाप्त हो गईं तथा सिनेमा को ही नाटक-नौटंकियों का एक नया रूप माना जाने लगा। यही कारण है कि फिल्मों में गानों का रिवाज चल निकला।

सिनेमा के प्रारम्भिक दिनों में फिल्म में काम सिर्फ उन्हीं कलाकारों को काम मिलता था जिन्हें गायन तथा संगीत का बी ज्ञान हो क्योंकि उन्हें अपना गाना खुद ही गाना पड़ता था। फिर सन् 1935 में न्यू थियेटर ने अपनी फिल्म "धूप छाँव" में प्लेबैक गायन का सिस्टम शुरू किया और इस नये सिस्टम ने भारतीय फिल्म संगीत के स्वरूप को ही पूरी तरह से बदल डाला। प्रभात पिक्चर्स ने केशवराव भोले को, जिन्हें कि पश्चिमी ऑर्केस्ट्रा का पर्याप्त अनुभव था, गानों में पियानो, हवायन गिटार और वायलिन जैसे पाश्चात्य वाद्ययंत्रों के प्रयोग के लिए नियुक्त किया जिसके परिणामस्वरूप शान्ता आप्टे, जिसके ऊपर फिल्म "दुनिया ना माने" (1937) में एक पूर्ण अंग्रेजी गाना फिल्माया गया, प्रभात पिक्चर्स की अग्रणी कलाकार बन गईं। सन् 1939 में व्ही. शान्तारम ने फिल्म "आदमी" में एक बहुभाषी गाना रखा। प्लेबैक सिस्टम का प्रयोग शुरू हो जाने पर ऐसे गायकों को भी फिल्मों में गाने का मौका मिलने लगा जिन्हें अभिनय में रुचि नहीं थी। पारुल घोष, अमीरबाई कर्नाटकी, जोहराबाई अम्बालावाली, राजकुमारी, अरुण कुमार आदि शरू-शुरू के प्लेबैक सिंगर थे।

के.एल. सहगल, पंकज मलिक, के.सी. डे आदि के समय में गाने सिर्फ शास्त्रीय संगीत के आधार पर बनाये जाते थे और उनमें बहुत कम वाद्य यन्त्रों का प्रयोग किया जाता था किन्तु प्लेबैक सिस्टम आने के बाद गानों में लोक-संगीत तथा पाश्चात्य संगीत का भी पुट आने लगा। भारत के अनेक क्षेत्रों में अनेक प्रकार के लोक-संगीत होने का बहुत बड़ा फायदा फिल्म संगीत को मिलने लगा। फिल्मी गीतों की धुनों में बंगाली, पंजाबी आदि लोक-संगीतों का प्रयोग करके गानों को मधुरतर से मधुरतम रूप दिया जाने लगा और लोग उन धुनों पर थिरकने लगे। लोगों में उन दिनों फिल्मी गानों के प्रति उन्माद का कैसा आलम था इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सन् 1925 में बनी फिल्म इन्द्रसभा में 71 गाने थे।

कालान्तर में नौशाद, सी. रामचंद्र, चित्रगुप्त, हेमंत कुमार, रोशन, एस.डी. बर्मन, खय्याम, जयदेव, सलिल चौधरी, मदन मोहन, शंकर जयकिशन, ओ.पी. नैयर, कल्याणजी आनंदजी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन जैसे तीव्र कल्पनाशील संगीतकारों और मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, किशोर कुमार, महेन्द्र कपूर, लता मंगेशकर, सुमन कल्याणपुर, आशा भोंसले जैसे प्रतिभावान गायक गायिकाओं के संगम से फिल्म संगीत दिन-प्रतिदिन निखरता ही चला गया।

सन् 1950 से 1975-80 तक भारतीय फिल्म संगीत का स्वर्णकाल रहा। फिर उसके बाद मैलोडियस संगीत ह्रास के दिन आने लगे, फिल्मी गानों में मैलोडी के स्थान पर हारमोनी बढ़ने लग गई और फिल्म संगीत का एक नया रूप आया जिसका चलन अभी भी है।

Thursday, October 6, 2011

सत्ता‍-मद जनित अहंकार ही विनाश का कारण बनता है

हम हर साल दशहरा के दिन रावण का दहन करते हैं। मृत्यु केवल एक बार होती है इसलिए अग्नि संस्कार भी एक ही बार होता है। फिर रावण का दहन हर साल क्यों? क्योंकि उसे उसके सत्ता-मद जनित अहंकार ने, जो कि उसके विनाश का कारण बना, अधर्म का प्रतीक बना दिया। अधर्म कभी समाप्त होता नहीं है, जितने बार उसे खत्म करो उतने बार वह फिर से पैदा हो जाता है। साल-दर-साल हम रावण को मारते हैं और साल-दर-साल वह फिर से पैदा हो जाता है, हमें उसे फिर से मारना पड़ता है।

क्या नहीं था रावण के पास? अद्भुत रूप, आश्चर्यजनक तेज तथा असीम ऐश्वर्य का स्वामी था वह! विश्रवा जैसे ज्ञानी का पुत्र और पुलस्त्य जैसे महान ऋषि का पौत्र होने के नाते प्रकाण्ड पण्डित था वह। समस्त राजोचित लक्षणों से युक्त होने के कारण राक्षसराज रावण इन्द्र सहित सम्पूर्ण देवलोक का संरक्षक हो सकता था। किन्तु उसके अहंकार ने उसे अधर्म का प्रतीक बना दिया। अधर्म का ऐसा प्रतीक कि युगो-युगों तक प्रतिवर्ष उसका दहन किया जाने लगा।

युग चाहे कोई भी हो, त्रेता हो या कलि, सत्ता का मद हर युग में होता है और सत्ता के मद से जनित अहंकार ही शासक को रावण बना देता है। त्रेता में तो केवल एक रावण था किन्तु आज अनेक रावण हैं जिन्होंने सत्ता का दुरुपयोग करके विदेशी बैंकों में काला धन छुपा रखा है। जो कोई भी उनके भ्रष्टाचार का पोल खोलने की कोशिश करते हैं वे उनका सिर कुचल देना चाहते हैं, जैसे रावण अपने विरोधियों का सिर कुचल दिया करता था। कहीं ऐसा न हो कि हम आज तक त्रेता के रावण को जलाते आए हैं पर भविष्य में लोग हर साल आज के रावणों को हर साल जलाने लगें।

Wednesday, October 5, 2011

हम नहीं कहते बल्कि ये चित्र बताते हैं कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत में क्या हुआ है





उपरोक्त दोनों चित्र अमर शहीद ऊधम सिंह, जिन्होंने जलियाँवाला बाग में जन संहार करने वाले जनरल ओ’डायर को इंग्लैंड में जाकर मारा था, के पौत्र जीत सिंह के हैं।

ऊधम सिंह के अन्तिम शब्द थे -

“मैं परवाह नहीं करता, मर जाना कोई बुरी बात नहीं है। क्या फायदा है यदि मौत का इंतजार करते हुए हम बूढ़े हो जाएँ? ऐसा करना कोई अच्छी बात नहीं है। यदि हम मरना चाहते हैं तो युवावस्था में मरें। यही अच्छा है और यही मैं कर रहा हूँ।

“मैं अपने देश के लिए मर रहा हूँ।”

(‘I don’t care, I don’t mind dying. What Is the use of waiting till you get old? This Is no good. You want to die when you are young. That is good, that Is what I am doing’.

‘I am dying for my country’.)

Tuesday, October 4, 2011

स्वयं को महात्मा न मानना - अन्ना का महात्मापन

समाचार की सुर्खियों में है कि रालेगण सिद्धि, अन्ना के गाँव, के लोगों ने अन्ना को अब महात्मा मानने का निश्चय किया है। किसी प्रकार का निश्चय करने का कुछ न कुछ कारण अवश्य ही होता है। रालेगण के लोगों के निश्चय का कारण है कि उन्हें अन्ना के भीतर एक महान आत्मा नजर आ रहा है और हमें भी लगता है कि उन्हें बिल्कुल सही नजर आ रहा है। देश भर के लोग, विशेषकर युवावर्ग, ने अन्ना की आवाज में आवाज मिला कर सिद्ध कर दिया है कि वे कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि महात्मा हैं। अन्ना के कार्यों में जनता का हित छुपा होता है, स्वयं का स्वार्थ नहीं। और ऐसे कार्य करने वाले ही तो महात्मा होते हैं। फिर अन्ना को महात्मा मानने या कहने में ऐतराज ही क्या हो सकता है?

यह बात अलग है कि अन्ना स्वयं को इस लायक नहीं समझते कि उन्हें महात्मा कहा जाए। किन्तु लायक होते हुए भी स्वयं को लायक न दर्शाना तो बड़प्पन, विनय और शील की निशानी है और यह बात जग जाहिर है कि महात्मा में शील, विनय और बड़प्पन कूट-कूट कर भरा होता है! यही कारण है कि महात्मा खुद को कभी भी महात्मा नहीं दर्शाते, उल्टे स्वयं को दीन दर्शाते हैं। रामचरित में तुलसीदास जी रचित निम्न दोहा भी तो इसी बात को दर्शाता हैः

मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी॥

आज के युग में, जबकि अनेक स्वयंभू लोग ऐसे भी हैं जो खुद को महात्मा मानते और समझते हैं तथा प्रयास करके लोगों से इस बात को मनवा भी लेते हैं, अन्ना का स्वयं को लायक न समझना क्या उनका महात्मापन नहीं है?

आज रालेगण सिद्धि के लोग अन्ना को महात्मा मान रहे हैं और भविष्य बताएगा कि एक दिन पूरे देश के लोग उन्हें महात्मा मानेंगे।

Sunday, October 2, 2011

जन्मदिन एक भुला दिए गए प्रधानमन्त्री का

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कितना भी अच्छा कार्य क्यों न करें, भुला दिए जाते हैं। ऐसे ही लोगों की श्रेणी में भारत के पूर्व प्रधान मन्त्री श्री लालबहादुर शास्त्री जी का भी स्थान आता है। अपने शासनकाल में देश के हित के लिए उन्होंने जिन नीतियों का प्रयोग किया उन्हीं के परिणाम स्वरूप हमने पाकिस्तान को परास्त किया था। वह एक ऐसा युद्ध था जिसमें हमने पाकिस्तान के मनोबल को पूर्णतः विदीर्ण कर दिया था। देश की इतनी बड़ी उपलब्धि लालबहादुर शास्त्री जी के कुशल व सफल नेतृत्व का ही परिणाम था। किन्तु उन्हें भुला दिया गया। जब इस देश में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, अमर शहीद भगत सिंह आदि जैसे अनेक महान क्रान्तिकारियों को गौण बनाया जा सकता है तो फिर लालबहादुर शास्त्री भला कैसे इसके अपवाद हो सकते हैं?

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पूर्व तो इस देश को विदेशी लुटेरे लूटते रहे किन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय, या कहा जाए कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के पूर्व से ही, इस देश के लुटेरों ने इस देश को लूटने की योजना बना ली। इस योजना की सफलता के लिए एक नई परम्परा बनाने की जरूरत थी जिसके अनुसार अच्छाई के मुखौटे लगाए हुए लोगों को याद रखा जाना और वास्तव में अच्छे लोगों को भुला दिया जाना जरूरी था। यह परम्परा बनी और सफल भी रही। देश के हित को ताक पर रख कर स्वयं के हित को देखने वालों को देशभक्त का मुखौटा पहना दिया गया और वे लोग ही देश के सच्चे हितचिन्तक माने गए, साथ ही देश के वास्तविक सेवा करने वाले लोगों को गौण बना दिया गया। याद न रखे जाने योग्य लोग महत्वपूर्ण बन गए और याद रखे जाने योग्य लोग भुला दिए गए। तरह-तरह से घोटाले कर के देश को लूटना जारी रहा, और आज भी जारी है। कुटिल और स्वार्थी लोगों की मक्कारी की तुलना में सीधे और सरल लोगों की निर्मल बुद्धि प्रायः कमजोर ही सिद्ध होती है।

सन्दर्भ चाहे जन्मदिन का ही क्यों न हो, किन्तु जब कभी भी लालबहादुर शास्त्री जी की बात होती है तो उनके रहस्यमय हालात में हुई मृत्यु को अनदेखा नहीं किया जा सकता। सुख-शान्ति पूर्वक जीना और दूसरों को जीने देना सदैव से ही इस देश की संस्कृति रही है। इस देश ने अपने हजारों साल के इतिहास में कभी भी किसी अन्य देश पर आक्रमण नहीं किया क्योंकि भारत सदा से ही दयावान देश रहा है। फिर भारत के अदम्य साहस के समक्ष पाकिस्तान की त्राहि-त्राहि करते देख भारत को दया कैसे नहीं आती? पाकिस्तान पर दया करके लालबहादुर शास्त्री युद्धविराम के विषय में विचार करने के लिए रूस के ताशकंद में गए किन्तु वापस आया उनका पार्थिव शरीर। उनकी रहस्यमय मृत्यु के पीछे पाकिस्तान जैसे किसी पराये का हाथ न होकर अपने ही देश के किसी अपने का हाथ था। इस विषय में मीडिया चुप रही और आज भी चुप है, किन्तु शास्त्री जी की मृत्यु के पीछे इन्दिरा को मुख्य षड़यंत्रकारियों में से एक माना गया। कहा जाता था कि लालबहादुर शास्त्री के जीते जी इन्दिरा गांधी कभी भी हुकूमत में नहीं आ सकती थीं।

यद्यपि तत्कालीन शासन ने लालबहादुर शास्त्री जी की मृत्यु को हृदयाघात का जामा पहना कर लीपा-पोती कर दी थी किन्तु ललिता शास्त्री, शास्त्री जी की पत्नी, ने चीख-चीख कर कहा था कि उनके पति की हत्या विष देकर की गई है। बताया जाता है कि मृत्यु के पश्चात शास्त्री जी का शव नीला पड़ गया था और शास्त्री जी के एक बटलर को गिरफ्तार भी किया गया था जिसे कि बाद में निर्दोष करार देकर छोड़ दिया गया था।

मुझे खेद है कि शास्त्री जी के जन्मदिन जैसे खुशी का पोस्ट टाइप करते-करते न जाने कैसे मेरी उँगलियाँ उनकी मृत्यु जैसी दुःखदायी विषय को टाइप करने लगीं।

बहरहाल, लालबहादुरशास्त्री जी को शत्-शत् नमन!

Saturday, October 1, 2011

हिन्दी की प्यारी बहन उर्दू

जब भारत की अनेक भाषाओं की बात चले तो उर्दू को भुला देना बहुत मुश्किल होता है। देखा जाए तो हिन्दी और उर्दू ऐसी दो ऐसी बहनें हैं जो एक-दूसरे के बिना रह ही नहीं सकतीं। रोजमर्रा की बोलचाल वाली हमारी हिन्दी में सैकड़ों ऐसे शब्दों का प्रयोग होता है जो कि उर्दू के हैं और हिन्दी ने उसे अपना लिया है - जैसे कि हम "विशेष रूप से" कहने के स्थान पर प्रायः "खास तौर पर" का इस्तेमाल (अब यहीं देखिए कि मैंने "प्रयोग" जैसे हिन्दी शब्द के स्थान पर "इस्तेमाल" जैसा उर्दू शब्द टाइप कर डाला) करते हैं। हमें कभी भी नहीं लगता कि "खास" (विशेष), "तौर" (रूप या प्रकार), "शख्स" (व्यक्ति) "सुबह" (प्रातः), "आरजू" (अभिलाषा), "रिश्ता" (सम्बन्ध) इत्यादि शब्द हिन्दी के न होकर उर्दू के हैं, उल्टे हमें ये सारे शब्द हिन्दी के ही लगते हैं। इसी प्रकार से उर्दू के विद्वान भी सैकड़ों हिन्दी शब्दों को अपनी उर्दू रचना में शामिल कर लेते हैं। बिना एक दूसरे के शब्दों को अपनाए हिन्दी और उर्दू में से किसी भी एक का काम चल ही नहीं सकता। हिन्दी के सुविख्यात साहित्यकार प्रेमचंद जी की रचनाओं में न केवल उर्दू शब्दों के भरमार मिलते हैं बल्कि उन्होंने अपनी कृतियों को उर्दू लिपि में ही लिखा था।

यह भी सही है कि आम लोगों के बीच हिन्दी के चलन में आने बहुत पहले ही से उर्दू का चलन था। यही कारण है कि हिन्दी के आरम्भिक दिनों की रचनाओं में उर्दू शब्दों की बहुतायत पाई जाती है। देवकीनन्दन खत्री जी, जिन्होंने अपने जमाने में हिन्दी को सबसे अधिक पाठक दिए, जानते थे कि उन दिनों उर्दू का चलन हिन्दी की अपेक्षा बहुत ज्यादा है इसीलिए उन्होंने अपने उपन्यास "चन्द्रकान्ता" के आरम्भ में ढेर सारे उर्दू शब्दों का प्रयोग किया और "चन्द्रकान्ता सन्तति" के अन्त तक पहुँचते-पहुँचते शनैः-शनैः उनका प्रयोग कम करते हुए हिन्दी के अधिक से अधिक शब्दों का प्रयोग किया है।

उर्दू वास्तव में तुर्की का एक शब्द है जिसका अर्थ होता है "पराया" या "खानाबदोश"। हिन्दी की तरह ही उर्दू का जन्म भारत में हुआ है और यह भाषा कैसे बनी यह जानना भी बहुत रोचक है। मुगल शासनकाल में उनकी सैनिक छावनी में फारसी, अरबी, हिन्दी तथा हिन्दी की विभिन्न उपभाषाओं के जानने वाले सैनिक एक साथ रहा करते थे जिन्होंने आपस की बोलचाल के लिए एक नई भाषा विकसित कर ली जो कि उर्दू कहलाई। यही कारण है कि उर्दू को लोग अक्सर खेमे की या छावनी की भाषा कहा करते थे। अमीर खुसरो, मीर तक़ी मीर, मिर्जा ग़ालिब, फैज़ अहमद फैज़ जैसे विद्वानों को यह भाषा भा गई और उन्होंने इसका साहित्यिक रूप विकसित करना शुरू कर के इस एक प्रकार से कविता की भाषा बना दिया। ब्रिटिश शासन के आने पर इसने राज्य भाषा का दर्जा भी पा लिया। भारत-पाक विभाजन के समय भारत छोड़कर पाकिस्तान जाने वालों के साथ यह भाषा पाकिस्तान चली गई और वहाँ की मुख्य भाषा बन गई।

उर्दू भाषा की एक अलग प्रकार की अपनी मिठास है जो कि मुंशी प्रेमचंद, ख़्वाज़ा अहमद अब्बास, सआदत हसन मंटो, कृष्ण चन्दर, इस्मत चुग़ताई, बलवन्त सिंह जैसे अनेकों रचनाकारों को लुभाती रही। भारत में सवाक् सिनेमा के आने पर हिन्दुस्तानी भाषा अर्थात् उर्दू मिश्रित हिन्दी के रूप में यह फिल्मों में छा गई और आम जनता इससे अच्छी तरह से वाक़िफ़ होने लगी। आज भी भारत में उर्दू के कद्रदानों की संख्या बहुत अधिक है क्योंकि उर्दू खालिस तौर पर एक हिन्दुस्तानी ज़ुबान है।

 
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