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Sunday, November 27, 2011

कुछ ऐसे भी होते हैं

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

कुछ ऐसे भी होते हैं जो,
गुणहीन हुआ करते हैं;
पर तिकड़मबाजी के कारण
गुणवान दिखा करते हैं।

असलियत छिपाने को अपनी,
ये व्यूह रचा करते हैं;
पद लोलुपता में माहिर ये,
कुर्सी पर पग धरते हैं।

टांग अड़ाते कदम कदम पर,
काम-धाम में अलसाये,
बस यही चाहते हैं झटपट,
माला कोई पहनाये।

तड़क-भड़क में डूबे रहते,
गला फाड़ कर चिल्लाते हैं;
कीड़े जैसे काव्य कुतरते,
गिद्ध बने मँडराते हैं।

ऐसों में कोई कवि हो तो,
कविता चोरी करता है;
अपनी रचना कह कर उसको,
झूम झूम कर पढ़ता है।

जब जब ऐसी कविता सुनते,
याद उसी की आती है;
चोरी की कविता का संग्रह,
जिसकी अनुपम थाती है।

और अगर ऐसा पद लोलुप,
निर्लज्ज कहीं होता है;
तो अच्छे अच्छों को अपने,
तिकड़म जल से धोता है।

सभी जगह मिलते हैं ऐसे,
गुणहीनों की बस्ती है;
मँहगा है गुण पाना जग में,
तिकड़मबाजी सस्ती है।

नाम डूबता ऐसों से ही,
राष्ट्रों का, संस्थाओं का;
जो योग्य हुआ करते हैं उन-
पुरुषों का महिलाओं का।

(रचना तिथिः शनिवार 31-01-1987)

Saturday, November 26, 2011

पोस्ट प्रकाशित हुई नहीं कि टिप्पणी आ गई

बात अप्रैल 2008 की है। हिन्दी ब्लोगिंग में कदम रखे अधिक समय नहीं हुआ था मुझे, या यों कहें कि अधिकतर लोग मुझे जानते ही नहीं थे। अस्तु, एक दिन मैंने एक पोस्ट लिखी और ज्योंही "प्रकाशित करें" वाला बटन दबाया त्योंही मेरे गूगल टॉक ने सन्देश दिया कि कोई मेल आया है। मैंने मेल खोला तो देखा कि अभी-अभी मैंने जो पोस्ट प्रकाशित किया है उसमें कोई टिप्पणी आई है। याने कि पोस्ट प्रकाशित हुई नहीं कि टिप्पणी आ गई! बहुत बड़ी उपलब्धि थी वो मेरे लिए।

पर उस टिप्पणी ने क्या-क्या गुल खिलाया और मैं कैसे परेशान हुआ यह मैं ही जानता था। अपने उस अनुभव को शेयर करने के लिए मैंने तत्काल फिर एक पोस्ट लिखा जिसे कि पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ क्योंकि उस रोचक पोस्ट को बहुतों ने पढ़ा ही नहीं होगा या जिन्होंने पढ़ा होगा वे भूल चुके होंगे।

तो वह पोस्ट था -
प्रकाशित होना पोस्ट का और आना टिप्पणी का

अब देखिये ना, मैंने ब्लोगर में एक नया पोस्ट कर के प्रकाशित किया नहीं कि फटाक से मेरे गूगल टॉक ने संदेश दिया कि एक नई टिप्पणी आई है। मन प्रसन्नता से झूम उठा, अरे भाई हूँ तो मैं भी साधारण ब्लोगिया ही, टिप्पणी के बारे में जान कर भला कैसे खुश नहीं होउंगा? और इस बार तो बात ही विशेष थी। विशेषता यह थी कि पोस्ट प्रकाशित हुआ नहीं कि टिप्पणी आ गई। जैसे कोई इंतिजार करते हुये बैठा था कि कब ये पोस्ट प्रकाशित हो और कब मैं टिप्पणी करूँ। जब स्कूल में पढ़ता था तो हिन्दी के सर ने अतिशयोक्ति अलंकार का उदाहरण बताया था - 'हनूमान के पूँछ में लगी पाई आग। लंका सिगरी जल गई गये निशाचर भाग॥' उदाहरण से अच्छी प्रकार से समझ में आ गया था कि अतिशयोक्ति अलंकार क्या होता है। पर पोस्ट प्रकाशित होते ही टिप्पणी आने पर जरा सा भी नहीं लगा कि यह अतिशयोक्ति हो सकती है। और लगे भी क्यों भाई, भले ही अच्छा न लिख पाउँ पर समझता अवश्य हूँ कि मैं भी एक लिख्खाड़ हूँ। अब पोस्ट प्रकाशित होते ही टिप्पणी आ जाने पर यही तो सोचूँगा न कि अब तो मैं बहुत अच्छा लिख्खाड़ हो गया हूँ, भला यह क्यों सोचने लगा कि यह अतिशयोक्ति टाइप की कुछ चीज हो सकती है?

यह भी विचार नहीं आया कि मेरे पोस्ट में तो प्रायः टिप्पणी आती ही नहीं। और आये भी क्यों? मैं खुद तो टिप्पणी करने के मामले में संसार का सबसे आलसी प्राणी हूँ, कभी किसी के ब्लोग में जा कर टिप्पणी नहीं करता। तो भला क्या किसी को क्या पागल कुत्ते ने काटा है कि मेरे ब्लोग में आ कर टिप्पणी करेगा? यह बात अलग है कि दूसरों के ब्लोग में टिप्पणियों को देख कर कुढ़ता अवश्य हूँ। सोचता हूँ कि इतने साधारण लेख पर इतनी सारी टिप्पणियाँ और मेरे सौ टका विशेष लेख पर एक भी नहीं। खैर, यह सोच कर स्वयं को तसल्ली दे लेता हूँ कि अभी लोगों की बुद्धि इतनी विकसित नहीं हुई है कि मेरी बात को समझ पायें। जब सही तरीके से समझेंगे ही नहीं तो भला टिप्पणी क्या करेंगे।

ऐसा भी नहीं है कि मेरे ब्लोग में कभी टिप्पणी आती ही न हो। आती है भइ कभी-कभार चार छः महीने में। अब संसार सहृदय व्यक्तियों से बिल्कुल खाली तो नहीं हो गया है। किसी सहृदय व्यक्ति को तरस आ जाता है कि बेचारा चार छः महीनों से बिना टिप्पणियों के ही लिखा चला आ रहा है, चलो आज इसके ब्लोग पर भी टिप्पणी कर दें।

हाँ तो मैं कह रहा था कि पोस्ट प्रकाशित हुआ नहीं कि टिप्पणी आ गई।


Warning! See Please Here

अरे! यह भी कोई टिप्पणी हुई? ये तो कोई चेतावनी है। टिप्पणीकर्ता 'यहाँ देखो' कह कर शायद यह बता रहा है कि मैंने किसी और स्थान से लेख चोरी कर के अपने ब्लोग में पोस्ट कर दिया है। सरासर चोरी का इल्जाम लग रहा है यह तो। प्रसन्नता काफूर हो गई।

मैंने भी सोचा कि चलो देखें तो सही कि ये कहाँ जाने को कह रहा है, आखिर मैंने चोरी किस जगह से की है। क्लिक कर दिया भैया। अब क्लिक कर देने पर जो शामत आई है उसके बारे में मत ही पूछो तो अच्छा है। न जाने कौन कौन से साइट्स खुलने लगे। चेतावनी पर चेतावनी - आपके कम्प्यूटर में ये वायरस आ गया है, वो वायरस आ गया है, हमसे मुफ्त स्कैन करवायें। मुफ्त स्कैन करवाने पर वायरसों की एक लम्बी फेहरिस्त आ गई जिसे दूर करने के लिये उनके एन्टीवायरस को खरीदने की सलाह दी गई थी। मैने तो केवल एक बार क्लिकिआया था बन्धु, यकीन मानिये कि एक बार क्लिक करने के बाद हिम्मत ही नहीं हुई दुबारा क्लिक करने की। पर न जाने कैसे बिना क्लिक किये ही वो साइट अपने-आप खुल जाती थी कुछ कुछ देर में और मेरे कम्प्यूटर का मुफ्त स्कैन होने लगता था। लगता था कि कोई भूत घुस आया है मेरे कम्प्यूटर में। अब बन्धु मेरे, बड़ी मुश्किल से उस भूत को भगा पाया मैं।

बड़ी कोशिश करके भूत को भगाने के बाद थोड़ा धीरज बंधा और थोड़ी शान्ति मिली। अब मन में विचार आया कि वो टिप्पणी तो अभी भी मेरे ब्लोग में है। यदि मेरे पाठकों ने उस पर क्लिक कर दिया तो? जरूर वह भूत उन्हें भी तंगायेगा। यह टिप्पणी तो बीच रास्ते में केले का छिलका बन कर पड़ा हुआ है, कोई फिसल कर गिर न जाये। इस टिप्पणी को मिटाना ही पड़ेगा।

अब भइ, इससे पहले कभी कोई टिप्पणी मिटाई नहीं थी। अब कभी-कभार आये हुए टिप्पणी को मैं मिटाने क्यों लगा - क्या मैं इतना बेवकूफ़ हूँ कि अपने ब्लोग से टिप्पणी को मिटा दूँ। हाँ तो टिप्पणी मिटाने का मुझे कुछ अनुभव ही नहीं था। मैंने ब्लोगर के एक-एक हिस्से को छान मारा पर टिप्पणी मिटाने के उपाय के बारे में कहीं कुछ न मिला। निदान मैं ब्लोगर के फोरम में गया और ढ़ूँढ़-ढ़ाँढ़ कर टिप्पणी मिटाने का उपाय प्राप्त कर ही लिया और टिप्पणी को मिटा दिया

तो साहब किया टिप्पणीकर्ता सॉफ्टवेयर ने और भरना मुझे पड़ा।

Friday, November 25, 2011

क्या भ्रष्टाचार और मँहगाई अब लोगों को हिंसक बना डालेगा?

समस्त जीवों के प्रति दया, क्रोध निग्रह, अकारण हिंसा का विरोध, अभ्यागत का आदर यही सब तो प्राचीनकाल से भारत के आदर्श रहे हैं। हमारे प्राचीन दर्शन, सभ्यता तथा संस्कृति पर बार-बार आघात होने के बावजूद भी हमारे संस्कार में आज भी वे प्राचीन आदर्श रचे-बसे हैं। यही कारण है कि एक आम भारतीय कभी हिंसक नहीं रहा। पर ऐसा प्रतीत होता है कि आज देश भर में व्याप्त भ्रष्टाचार और मँहगाई कहीं भारतीयों को हिंसक तो नहीं बना डालेगा?

एक युवक के द्वारा केन्द्रीय मन्त्री को थप्पड़ मारना आखिर क्या इंगित करता है?

इस सन्दर्भ में आनलाईन दैनिक भास्कर में प्रकाशित इस निन्दनीय कार्य के समाचार में कुछ टिप्पणियाँ इस प्रकार की भी हैं -
क्या ये टिप्पणियाँ लोगों के भीतर के आक्रोश को प्रकट नहीं कर रही हैं? लगातार बढ़ते हुए भ्रष्टाचार, मँहगाई और घपलों ने लोगों के भीतर इतना अधिक आक्रोश भर दिया है कि अब वह भारी विस्फोट के साथ फट पड़ने के लिए आकुल हो रहा है।

क्या ये भ्रष्टाचार, मँहगाई और घपले भारतीयों को हिंसक बना कर छोड़ेंगे?

Thursday, November 24, 2011

हम अपने प्रतिनिधि चुन कर इसलिए भेजते हैं ताकि वे नदी, पहाड़, जंगल आदि को भी बेच दें

ईश्वर ने प्राणिमात्र को नदी, पहाड़, जंगल आदि नैसर्गिक सम्पदा प्रदान की है और सहस्त्रों वर्ष से सांसारिक प्राणी उनका उपयोग करते चले आ रहे हैं। किन्तु विगत कुछ वर्षों से ईश्वर प्रदत्त इन नैसर्गिक सम्पदाओं को हमारे द्वारा सरकार में भेजे गए लोगों के द्वारा बेचा जा रहा है।

सन् 1998 में अविभाजित मध्यप्रदेश के उपक्रम एमपी औद्योगिक विकास निगम ने, जो कि अब छत्तीसगढ़ का छत्तीसगढ़ स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कार्पोरेशन है, के द्वारा शिवनाथ नदी के एक भाग को एक निजी औद्योगि ग्रुप को दे दिया था। जाहिर है कि फोकट में नहीं दिया होगा याने कि शिवनाथ नदी बेच दी गई। इस प्रकार से नदी का सौदा हो जाने के कारण उस क्षेत्र के ग्रामीण नदी के पानी का उपयोग सिंचाई के लिए नहीं कर सकते, वहाँ के मछुआरे नदी में अपना जाल नहीं डाल सकते। गाँव के पास से गुजरने वाली नदी रुख मोड़ दिया गया है। गाँव के पास इतनी बड़ी नदी होने के बावजूद भी ग्रामीण प्यासे मर रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि इस सौदे से छत्तीसगढ़ राज्य को किसी प्रकार का फायदा हो रहा हो, इस सौदे से राज्य को घाटा ही हो रहा है किन्तु आज तक उस सौदे को रद्द नहीं किया गया। क्यों रद्द नहीं किया गया यह एक विचारणीय बात है।

इसी प्रकार से तमनार में रोबो डैम के पानी को जिन्दल स्टील प्लांट की ओर मोड़ दिया गया है।

जंगलों में खनन के लिए लीज पर जमीन दे दी जाती है, खनन के लिए जंगल को नष्ट कर दिया जाता है। जंगल के खत्म होने से भले ही अनेक वनवासियों को कितना ही तकलीफ हो, ठेकेदारों को फायदा होना ही चाहिए।

नदी, जंगल इत्यादि नैसर्गिक सम्पदा को बेच देने के और भी कई उदाहरण आसानी के साथ मिल सकते हैं। और नैसर्गिक सम्पदा का सौदा करने का काम उन्हीं लोगों के निर्देशों पर होता है जिन्हें हम अपना वोट देकर अपना प्रतिनिधि बनाते हैं। मतलब यह कि हम अपने प्रतिनिधि चुन कर इसलिए भेजते हैं ताकि वे नदी, पहाड़, जंगल आदि को भी बेच दें।

क्या इस देश को कभी सच्चे और ईमानदार लोगों का प्रतिनिधित्व मिल सकेगा?

Wednesday, November 23, 2011

आज अगर तुलसी आयें तो

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

आज अगर तुलसी आयें तो,
सन्देश नहीं दे पायेंगे;
लुप्त देख सद्ग्रंथों को,
आश्चर्यचकित रह जायेंगे।

विनय पत्रिका के बदले में,
घोर अवज्ञा वे पायेंगे;
'मानस' के देश निकाले पर,
भौचक्के से रह जायेंगे।

रामचन्द्र पर रावण का ही,
सब ओर विजय वे पायेंगे;
ऐसे में तुलसी भी कैसे,
शक्ति, शील, सौन्दर्य जगायेंगे!

अंग्रेजी द्वारा हिन्दी की,
घोर उपेक्षा ही पायेंगे;
तब तो तुलसी भी सोचेंगे,
कल हिन्दी को बिसरायेंगे।

लोप भारती का लख तुलसी,
अकुलायेंगे, पछतायेंगे;
जैसे आयेंगे भारत में,
वैसे ही वापस जायेंगे।

(रचना तिथिः 04-08-1985)

Tuesday, November 22, 2011

मजाकिया गूगल

गूगल, जो कि इन्टरनेट में उपलब्ध जानकारी को खोज-खोज कर हमें आसानी के साथ दिखाता है, को एक प्रमुख सर्च इंजिन के रूप में जाना जाता है। किन्तु इन्टरनेट की सबसे बड़ी विज्ञापन कम्पनी गूगल महज एक सर्च इन्जिन ही नहीं बल्कि और भी बहुत कुछ है। यह हमारी समस्याओं के साथ ही साथ हमारे साथ हँसी-किल्लोल भी करता है, कैलेण्डर के रूप में हमारे जन्मदिन तथा विभिन्न महत्वपूर्ण घटनाओं को स्मरण रखता है और साथ ही हमारे हित के लिए और भी बहुत सारे काम करता है।

हमारे मनोरंजन के लिए गूगल विदूषक का भी काम करता है क्योंकि उसे पता है कि बगैर हास-परिहास के जिन्दगी नीरस है। यदि ऐसा न होता तो संस्कृत के प्राचीन नाट्यों में विदूषक पात्र की आवश्यकता ही क्यों पड़ती? अस्तु हम गूगल के हास-परिहास के किंचित उदाहरण यहाँ पर प्रस्तुत कर रहे हैं।

अंग्रेजी के ‘Tilt’ शब्द का अर्थ होता है झुकाना। अब आप गूगल सर्च में Tilt शब्द को टाइप करके खोजें तो गूगल परिणामों को झुका हुआ याने कि तिरछा दिखा कर यह भी बता देता है कि झुकाना क्या होता है। इसी प्रकार से अंग्रेजी के Askew शब्द, जिसका अर्थ टेढ़ा या तिरछा होता है, को खोजने से भी परिणाम तिरछे आते हैं।


अब आप गूगल में Do a barrel roll, याने कि बेलन की तरह घुमा कर दिखाओ, टाइप करके खोज कर देखिए। परिणाम आते ही पहले एक गोल चक्कर लगाएँगे।


तो है ना गूगल मजाकिया भी!

Monday, November 21, 2011

हमारा इतिहास क्या हमारा ही इतिहास है?

आपको लगता है कि नहीं पता नहीं, पर मुझे तो यही लगता है कि आज जो हमारा इतिहास पढ़ाया जाता है वह वास्तव में हमारा इतिहास है ही नहीं। वह तो उन क्रूर, कुटिल, अत्याचारी और हत्यारे लोगों का इतिहास है जिन्होंने अत्याचार और मक्कारी के बल पर भारत पर जबरन कब्जा कर लिया था। और दुख की बात तो यह है कि, आज पढ़ाए जाने वाले इतिहास में उन्हीं लोगों को ही महान बताया जाता है।

मुगल काल का इतिहास मुगलों के द्वारा और अंग्रेजों के समय का इतिहास अंग्रेजों के द्वारा लिखा गया है। अब जाहिर है कि मुगल मुगलों की और अंग्रेज ईसाइयों की श्रेष्ठता ही बयान करने की कोशिश करेगा और उसी हिसाब से वास्तविक घटनाओं को तोड़-मरोड़ कर ही इतिहास लिखेगा। मुगलों और अंग्रेजों, दोनो ही के इतिहासकारों को अच्छी तरह से मालूम था कि अत्यन्त प्राचीन काल से समस्त विश्व को ज्ञान, विज्ञान और गणित की शिक्षा प्रदान करने वाले भारत का अपना एक अनूठा इतिहास रहा है। किन्तु यदि वे भारत के उस सच्चे इतिहास को लिखते तो स्वयं को श्रेष्ठ कैसे सिद्ध कर पाते? स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए उन्होंने भारत के प्राचीन राजवंशों तथा उनकी वंशावलियों को अविश्वसनीय बता दिया, अनेक भारतीय साम्राज्यों के लिखित इतिहास को गायब कर दिया और हमारे प्राचीन ग्रन्थों मे उल्लेखित इतिहास को कल्पित कथाओं का रूप दे दिया।

दुर्भाग्य की बात तो यह है कि स्वतन्त्र होने के बाद भारत की सत्ता जिन लोगों के हाथ में आई वे शक्ल-सूरत से भारतीय दिखने वाले लोग भी मन से अंग्रेज ही थे, अंग्रेजियत उनके नस-नस में खून बनकर दौड़ रही थी। भारतीय दृष्टिकोण से भारत का सही इतिहास लिखा जाना भला उन्हें कैसे गवारा होता? पुराने इतिहास को तो उन्होंने सुधारा ही नहीं, उल्टे स्वतन्त्रता प्राप्ति के के पूर्व तथा पश्चात् के इतिहास को भी तोड़-मरोड़ कर कुछ तथाकथित विशिष्ट व्यक्तियों का इतिहास बना कर रख दिया। सारी उपलब्धियों का श्रेय उन तथाकथित विशिष्ट व्यक्तियों को दे दिया गया।

यदि आज भी हम अपने वास्तविक इतिहास को जान लें, अपनी प्राचीन संस्कृति और सभ्यता को महत्व दें, और निहित स्वार्थ को छोड़ कर विशुद्ध राष्ट्रीय भावना के साथ अपना काम करें तो संसार की कोई भी ताकत भारत को विश्व में प्रथम स्थान पाने से रोक नहीं सकती।

Sunday, November 20, 2011

कितना जोरदार है हमारे देश का कानून!

आखिर पूर्व केंद्रीय दूरसंचार मंत्री सुखराम के मामले में अदालत ने अपना फैसला सुना ही दिया! यह बात है कि इस फैसले को सुनाने में मात्र 15 वर्षों का समय लगा। अब सुखराम ऊपर के अदालत में जाएँगे और वहाँ पर भी दोषी ठहराए जाने पर उससे भी ऊपर की अदालत का दरवाजा खटखटाएँगे। इस प्रकार से अन्तिम फैसला आते तक पूरा जीवन बीत जाएगा। याने कि जो भी अपराध करना है, कर लो, सजा जब मिलेगी तब मिलेगी, और मिलेगी भी कि नहीं यह भी कहा नहीं जा सकता। है न जोरदार न्याय व्यवस्था! बस आपकी गाँठ में रुपये होने चाहिए फिर कानून की चक्करदार धाराओं का सहारा लेकर खींचते रहो प्रकरण को न्यायालय में।

एक तरफ तो पैसे वाले लोग हैं जिन्हें अपराध करने के बावजूद भी जेल का मुँह नहीं देखना पड़ता और दूसरी तरफ ऐसे गरीब भी हैं जो छोटे-मोटे अपराध या फिर निरपराध ही जेल में सड़ रहे हैं। उनका अपराध केवल इतना होता है कि उनके पास अपनी जमानत करवाने की व्यवस्था नहीं होती। गरीब मजदूर कभी मजबूरी में मार-पीट जैसा छोटा-मोटा अपराध कर डालता है तो पुलिस उसे उठा ले जाती है। जमानत की व्यवस्था न हो पाने के कारण उसे जेल में ठूँस दिया जाता है। यदि वह सालों जमानत की व्यवस्था नहीं कर पाता तो सालों तक उसे जेल में सड़ना पड़ता है, जबकि उसके अपराध के लिए एकाध सप्ताह या एकाध माह की सजा का ही प्रावधान होता है।

बड़े अपराधी कभी जेल का मुँह ही ना देखें और छोटे अपराधी या निरपराध सालों जेल में सड़ें। वाह क्या कानून है हमारे देश का!

उन्नीसवीं शताब्दी में, भारतीयों को उम्र भर तक कोर्ट कचहरी के चंगुल में फँसाए रखकर चूस डालने के उद्देश्य से, अंग्रेजों के द्वारा बनाए गए कानून को थोड़ा-बहुत फेर-बदल करके या ज्यों का त्यों आज तक अपनाए रखने पर ऐसा नहीं होगा तो और क्या होगा?

Saturday, November 19, 2011

ch से 'च' या 'क'?

"क्यों साहब! ये 'चैमेस्ट्री' डिपार्टमेंट कहाँ है?"

"क्या बोल रहे हो? 'चैमेस्ट्री' नहीं 'कैमेस्ट्री' होता है। यही है कैमिस्ट्री डिपार्टमेंट। बोलो क्या काम है?"

" तो साहब 'कोपड़ा साहब' कहाँ मिलेंगे?"

Friday, November 18, 2011

अन्य देशों में रामायण

रामायण मूलतः भारतीय ग्रंथ है किन्तु इसकी लोकप्रियता विश्व भर में व्याप्त है। यही कारण है कि अन्य देशों में अलग-नाम से राम कथा पाये जाते हैं जिनमें से कुछ हैं -

  • मलयेशिया का रामायण - हिकायत सेरी राम
  • बर्मा का रामायण - रामवत्थु
  • थाईलैंड का रामायण - रामकियेन
  • इंडोनेशिया का रामायण - रामायण का कावीन
  • कंपूचिया का रामायण - रामकेर्ति
  • लाओस का रामायण - राम जातक
  • फिलिपींस का रामायण - महालादिया लावन
इसके अलावा तिब्बत, चीन, खोतानी, मंगोलिया, जापान, श्रीलंका तथा नेपाल में भी रामकथा पर आधारित ग्रन्थ हैं।

Thursday, November 17, 2011

प्राचीन भारत में नगरीय सभ्यता

मोहन जोदड़ो की खुदाई में मिले विशाल नगर के अवशेष ने यह तो सिद्ध कर दिया है कि आज से लगभग पाँच हजार साल पहले भारत में नगर हुआ करते थे जो आज के आधुनिक नगरों जैसे ही होते थे। सन् 2001 में खम्बात की खाड़ी में समुद्र के भीतर 120 फुट नीचे एक नगर का अवशेष मिला जो कि, कार्बन डेटिंग के अनुसार, 9500 वर्ष पुराना है। (लिंक) इससे सिद्ध होता है कि भारत में हड़प्पा सभ्यता के लगभग 4500 वर्ष पहले भी नगर थे।

ये तो हुए पुरातात्विक साक्ष्य! पर प्राचीन भारत में विशाल नगरों के साक्ष्य विभिन्न प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में भी मिलते हैं। वाल्मीकि रचित रामायण में अयोध्या नगरी, मिथिला नगरी, लंकापुरी, विशाला नगरी आदि के विस्तृत विवरण हैं।रामायण में लिखा है कि उन भव्य नगरों में सुन्दर मन्दिर,  विशाल अट्टालिकायें, सुन्दर-सुन्दर वाटिकाएँ, बड़ी बड़ी दुकानें इत्यादि हुआ करती थीं। अमूल्य आभूषणों को धारण किये हुये स्त्री-पुरुष आदि नगर की सम्पन्नता का परिचय देते थे। चौड़ी-चौड़ी और साफ सुथरी सड़कों को देख कर ज्ञात होता था कि नगर के रख-रखाव और व्यवस्था बहुत ही सुन्दर और प्रशंसनीय होती थी।

उपरोक्त वर्णन से ज्ञात होता है कि उस काल में आज की ही तरह से नगरों का निर्माण तथा उनका रख-रखाव हुआ करता था। नगरों की साफ-सफाई तथा रख-रखाव के लिए अवश्य ही आज के जैसे ही स्वायत्तशासी संस्थाएँ भी रहा करती होंगी।

भारत में अत्यन्त प्राचीन काल में भी विशाल नगरों का होना भारत के गौरव का द्योतक है तथा भारत का यह गौरव विश्व भर में भारत को एक विशिष्ट स्थान प्रदान करता है। भारत को विश्व भर में विशिष्ट स्थान प्राप्त होना यूरोपियनों, विशेषकर अंग्रेजों, को बिल्कुल पसन्द नहीं आया क्योंकि वे स्वयं को भारतीयों से श्रेष्ठ समझते थे। इसलिए अंग्रेजों ने भारत में अपना उपनिवेश बनाने के बाद सबसे पहला काम तो यह सिद्ध करने का किया कि प्राचीन भारत में सही ढंग से इतिहास लिखने की प्रथा ही नहीं थी और जो भी प्राचीन भारतीय ग्रंथ हैं उनमें इतिहास है ही नहीं, जो कुछ भी है वह गल्प मात्र है। सन् 1909 में प्रकाशित इम्पीरियल गजेटियर कहता है "ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में हिन्दुओं ने कभी भी सही इतिहास लिखने का प्रयास ही नहीं किया। उन्होंने केवल सामान्य साहित्य ही छोड़ा है जिसमें कहीं-कहीं पर ऐतिहासिक वर्णन भी है, किन्तु, जैसा कि स्पष्ट दिखाई देता है, केवल आकस्मिक वर्णन को इतिहास नहीं समझा जा सकता।" (देखें इम्पीरियल गजेटियर का निम्न स्नैपशॉट)
उसी गजेटियर में एक अन्य स्थान पर लिखा है "यह पहले ही कहा जा चुका है कि हिन्दुओं ने अपने वसीयत के रूप में हमें कोई भी ऐसी ऐतिहासिक वस्तु नहीं दी है जिसे कि सच्चा इतिहास माना जा सके......" (देखें स्नैपशॉट)

कहने का तात्पर्य यह है कि अंग्रेजों ने अपनी श्रेष्ठता बताने के लिए हमारे ग्रन्थों को झुठलाया, एक स्थान पर तो गजेटियर यह भी कहता है कि 'यद्यपि हिन्दू रामायण को महाभारत से प्राचीन मानते हैं किन्तु उसमें निहित सामग्री को पढ़ने से यूरोपियन विद्वानों को यही प्रतीत होता है कि रामायण की रचना महाभारत के बाद हुई है और यूरोपियन विद्वान महाभारत काल को रामायण काल से पहले का काल मानते हैं'।

हमारे ग्रन्थों के अर्थ तो उन्हों तोड़ा-मरोड़ा ही, साथ ही उन्होंने भारत पर आर्यों का आक्रमण जैसे कपोल-कल्पना को भी जन्म दे दिया ताकि भारत की श्रेष्ठता कभी सिद्ध ही न हो सके।

आज जो भारत का इतिहास पढ़ाया जाता है उसे कोई भी जरा सी भी बुद्धि रखने वाला व्यक्ति भारत का इतिहास मान ही नहीं सकता। वह तो भारत के दुश्मनों के द्वारा लिखा गया उनका स्वयं का इतिहास है जिसमें उन्होंने, चाहे वे मुगल रहे हों या फिर अंग्रेज, स्वयं को भारतीयों से श्रेष्ठ दर्शाया है। और सबसे बड़े दुःख की बात तो यह है कि उसी झूठे इतिहास को आज भी हमारे देश में पढ़ाया जाता है।

कोई भी गुलाम देश जब आजाद होता है तो सबसे पहले वह गुलाम बनाने वालों की भाषा, संस्कृति, उनके द्वारा रचे गए इतिहास इत्यादि को त्याग कर अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने द्वारा रचे गए सच्चे इतिहास को अपनाता है, अपनी संस्कृति के आधार पर संविधान, शिक्षा-नीति इत्यादि का निर्माण करता है। किन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् तत्कालीन तथाकथित राष्ट्रनिर्माताओं ने हमारे देश में ऐसा कुछ भी नहीं किया। अपने देश की मूल भाषा संस्कृत को रसातल में ढकेल कर अंग्रेजी को महत्वपूर्ण बना दिया। अब जब हम अपनी मूलभाषा को ही नहीं जानेंगे तो भला अपनी संस्कृति को कैसे समझ पाएँगे? अपना सच्चा इतिहास कहाँ से रच पाएँगे?

Wednesday, November 16, 2011

देखा? ... कैसे उल्लू बनाया!

पेट्रोल के दाम दो रुपये कम हो गए। जनता खुश हो गई! अभी 4 नवंबर को जो पेट्रोल का दाम बढ़ा था उससे जबरन आक्रोशित हो रही थी स्साली जनता, अब उसका वो आक्रोश भी खतम हो गया। दरअसल दाम तो उस समय बढ़ाना ही नहीं था, पर क्या करें? कई राज्यों में चुनाव जो होने हैं। तो जनता को बताना तो पड़ेगा ना कि हम जनता के साथ है! इसलिए पहले दाम बढ़ा कर घटाने का स्टंट करना ही पड़ा। अब तो हर राज्य में जनता बस हमें ही वोट देगी। हमारे स्टंट को वो भला कैसे समझ पाएगी? बेवकूफ जो है। उसे क्या पता कि  4 नवंबर से 14 नवंबर तक बढ़े दाम में खरबों लिटर पेट्रोल भी बिका, तेल कंपनियों को अच्छा खासा मुनाफा भी मिल गया!

तो जोरदार उल्लू बनाया ना जनता को! भाई यही तो दिमाग का खेल है!

Tuesday, November 15, 2011

क्या जवाब है आपके पास इन सवालों का?

अक्सर मेरे मन में कई प्रकार के सवाल घुमड़ते हैं, और मैं उहापोह की स्थित में आ जाता हूँ कि आखिर इनके सही जवाब क्या होने चाहिए? उन्हीं प्रश्नों को आपके समक्ष रख रहा हूँ, यह सोचकर कि शायद कुछ जवाब मिले। वैसे जवाब देने की कोई बाध्यता नहीं है, यह तो सिर्फ मेरा अनुरोध है। तो वे प्रश्न हैं -

  • क्या बेहतर है - असफल होना या असफल होने के डर से कार्य ही नहीं करना?
  • प्रायः लोग अपनी मातृभाषा पर गर्व जरूर करते हैं किन्तु अनेक अवसरों पर अंग्रेजी में बोलना क्यों पसन्द करते हैं?
  • हम कई बार क्यों वह काम करते हैं जिन्हें हम पसन्द नहीं करते और जिन्हें हमे पसन्द करते हैं उन्हें करते ही नहीं?
  • यह जानते हुए भी कि हम किसी खुद के सिवाय किसी दूसरे को बदल नहीं सकते, हम क्यों स्वयं को नहीं बदलते और दूसरों को बदलने का प्रयास करते हैं?
  • क्या बेहतर है - काम को सही ढंग से करना या सही काम को करना?
  • किसी निर्दोष को बचाने के लिए झूठ बोलना क्या उचित है?
  • दूसरों को सताने को गलत समझने वाले लोग ही प्रायः अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए दूसरों को क्यों सताते हैं?
  • क्या आपने अपने जीवन में एक भी ऐसा कार्य किया है जिससे किसी दूसरे को हार्दिक सुख मिला हो?
  • कभी आपने सोचा है कि आपके जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है?
  • बड़ों को सम्मान देने तथा माता पिता के पैर छूने का रिवाज समाप्त-सा होते चला जा रहा है?
  • किसी कार्य को कर लेने का समय यदि अभी नहीं होता तो कब होता है?
  • हम कमाते हैं अपने तथा परिवार के सुख के लिए, किन्तु कमाने के लिए इतना कार्यभार क्यों स्वीकार कर लेते हैं कि कार्य की अधिकता तथा जिम्मेदारी वहन को देखते हुए परिवार के सुख में सम्मिलित ही न हो सकें?
  • सभी धर्म मानव कल्याण के लिए हैं, फिर भी धर्मों के कारण से ही विश्व में बड़े-बड़े युद्ध क्यों होते आए हैं?

Monday, November 14, 2011

देश विभाजन हेतु मतदान - एक दुर्लभ चित्र


(चित्र http://2.bp.blogspot.com/_zfDuy4-yDB8/S-A4oq-lFlI/AAAAAAAAFI4/NVIg_dMXRL8/s1600/Nehru+Votes+for+partition+1947.jpg से साभार)
 देश के विभाजन के पक्ष में हाथ खड़े करके मत देते हुए श्री नेहरू

मन चाहे रोये, चेहरे पर चाहे उदासी झलके, पर देश के विभाजन के पक्ष में मतदान तो जरूरी है।

Sunday, November 13, 2011

जानने योग्य कुछ रोचक बातें

  • जावा और सुमात्रा में करीब 3,500 प्रकार के रंग-बिरंगे पक्षी पाए जाते हैं।
  • जापान में करीब 3,000 प्रकार के फूल पाए जाते हैं हैं।
  • ‘टर्न’ नाम की चिड़िया हर साल लगभग 20,000 मील का सफर तय करती है।
  • नारियल का पेड़ याने कि ‘पाम ट्री’ 6 मीटर से लेकर 30 मीटर तक ऊँचे होते हैं।
  • बैंक ऑफ अमरीका पहले बैंक ऑफ इटली के नाम से जाना जाता था।
  • सूर्य में पाई जाने वाली गैसों का 94 प्रतिशत केवल हाइड्रोजन गैस होती है।
  • विशुद्ध सोने के आभूषण बनाए ही नहीं जा सकते।

Saturday, November 12, 2011

मोबाइल फोन से सम्बन्धित कुछ रोचक जानकारी

  • विश्व के 4 अरब से अधिक मोबाइल फोन में से लगभग 1 अरब स्मार्ट फोन हैं।
  • लगभग 3 अरब मोबाइल फोन SMS के लिए सक्षम हैं और, शायद आपको विश्वास न हो, लगभग 1 अरब से कुछ कम मोबाइल फोन में SMS की सुविधा ही नहीं है।
  • कुल फेसबुक प्रयोगकर्ताओं का एक तिहाई हिस्सा लगभग बीस करोड़ मोबाइल फोन के द्वारा फेसबुक में आते हैं।
  • मोबाइल इन्टरनेट प्रयोग का  91% प्रतिशत सिर्फ सोशल नेटवर्क्स के लिए ही पयोग किया जाता है जबकि डेस्कटॉप इन्टरनेट प्रयोग का 79% हिस्सा ही सोशन नेटवर्क्स के लिए प्रयुक्त होता है।
  • संसार की कुल जनसंख्या के 70% प्रतिशत लोग मोबाइल का प्रयोग करते हैं।
  • सन् 2014 में मोबाइल इन्टरनेट प्रयोग डेस्कटॉप इन्टरनेट प्रयोग से आगे हो जाएगा।

Friday, November 11, 2011

भ्रष्टाचार और भाषणबाजी

यू.पी.ए. अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने भाषण में कहा है कि ‘महज भाषणबाजी’ करने या ‘दूसरों पर उंगली उठाने’ से भ्रष्टाचार का उन्मूलन नहीं हो सकता। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हर किसी को अपने अंदर झाँकने की जरूरत है...।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या सोनिया जी ने कभी खुद अपनी पार्टी कांग्रेस के भीतर झाँक कर देखा है क्या? यदि देखा है तो उन्हें यह नहीं दिखा क्या कि पिछले चालीस साल से लोकपाल विधेयक को रोके रखे रहने के लिए किन लोगों नें भाषणबाजी किया है? क्या उन्हें जीप घोटाला (1948), एल.आई.सी. स्कैण्डल (1958), नागरवाला काण्ड (1970), मारुति घोटाला (1974), तेल घोटाला (1976), बोफोर्स घोटाला (1987), हर्षद मेहता काण्ड (1991), 2 G स्पैक्ट्रम घोटाला (2002) ...... जैसे घोटाले नजर नहीं आए क्या? यह नहीं दिखा क्या कि इन घोटालों के घोटालेबाजों को सजा मिली कि नहीं?

1951 में प्रतिष्ठित सिविल सर्व्हेंट ए.डी. गोरवाला के द्वारा प्रस्तुत Report on Public Administration, Planning Commission, Government of India 1951 में लिखे निम्न अवलोकन नजर नहीं आए क्या?

"नेहरू के मन्त्रिमण्डल में कुछ मन्त्री भ्रष्ट थे और इस बात की जानकारी प्रायः सभी को थी।" (Quite a few of Nehru's ministers were corrupt and this was common knowledge.)

"एक अत्यन्त जिम्मेदार सिविल सर्व्हेंट के आफिसियल रिपोर्ट में उल्लेख है कि सरकार अपने मन्त्रियों को बचाने के लिए गलत रास्ते अपनाती है।" (Even a highly responsible civil servant in an official report as early as 1951 maintained that the Government went out of its way to shield its ministers.)

काश सोनिया जी के कथन के अनुसार कांग्रेस अपने भीतर झाँक कर देखती!

Thursday, November 10, 2011

शरद् ऋतु का अनुपम शारदीय आनन्द


मेघरहित नील-धवल स्फटिक-सा निर्मल अम्बर, श्वेत-धवल कास सुमन का वस्त्र धारण किए पंक-रहित धरा, भाँति-भाँति के पुष्पो से पल्लवित मधुकर-गुंजित उपवन एवं वाटिकाएँ, शान्त वेग से प्रवाहित कल कल नाद करती सरिताएँ, कमल तथा कुमुद से शोभित तड़ाग, चहुँ ओर शीतल-मंद-बयार का प्रवाह, अमृत की वर्षा करती चन्द्र-किरण शरद् ऋतु के आगमन का द्योतक हैं।

हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन तथा कार्तिक माह को शरद् ऋतु की संज्ञा दी गई है। शरद् ऋतु आते तक वृष्टि का अन्त हो चुका होता है। मौसम मनोरम हो जाता है। दिवस सामान्य होते हैं तो रात्रि में शीतलता व्याप्त रहती है। यद्यपि शरद् की शुरवात आश्विन माह के आरम्भ से हो जाती है किन्तु शरद् के सौन्दर्य का आभास शरद् पूर्णिमा अर्थात् क्वार माह की पूर्णिमा से ही शुरू होता है।

शरद ऋतु ने वाल्मीकि, कालिदास तथा तुलसीदास जैसे महान काव्यकारों के रस-लोलुप मन को मुग्ध-मोहित किया है। वाल्मीकि रामायण के किष्किन्धा काण्ड में महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं -

रात्रि: शशांकोदित सौम्य वस्त्रा, तारागणोन्मीलित चारू नेत्रा।
ज्योत्स्नांशुक प्रावरणा विभाति, नारीव शुक्लांशुक संवृतांगी।।


चन्द्र की सौम्य एवं धवल ज्योत्सना से सुशोभित रात्रि किसी श्रवेत वस्त्र धारण किए हुए सुन्दरी के समान प्रतीत हो रही है। उदित चन्द्र इसका मुख तथा तारागण इसके उन्मीलित नेत्र हैं।

ऋतु संहार में कवि कालिदास कहते हैं -

काशांसुका विचक्रपद्म मनोज्ञ वस्त्र, सोन्मादहंसरव नूपुर नादरम्या।
आपक्वशालि रूचिरानतगात्रयष्टि : प्राप्ताशरन्नवधूरिव रूप रम्या।।


कास के श्वेत पुष्पों के वस्त्र से धारण किए हुए नव-वधू के समना शोभायमना शरद-नायिका का मुख कमल-पुष्पों से निर्मित है। उन्मादित राजहंस की मधुर ध्वनि ही, इसकी नूपुर-ध्वनि है। पके हुए बालियों से नत धान के पौधों के जैसे तरंगायित इसकी देह-यष्टि किसका मन नहीं मोहती?

रामचरित मानस में तुलसीदास जी राम के मुख से कहलवाते हैं -

बरषा बिगत सरद ऋतु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई॥
फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई॥


हे लक्ष्मण! वर्षा व्यती हो चुकी और शरद ऋतु का आगमन हो चुका है। सम्पूर्ण धरणी कास के फूलों से आच्छादित है।मानो (कास के सफेद बालों के रूप में) वर्षा ऋतु ने अपनी वृद्धावस्था को प्रकट कर दिया हो।

तुलसीदास जी तो शरद का प्रभाव पक्षियों पर भी बताते हुए कहते हैं  -

जानि सरद ऋतु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए॥


जिस प्रकार से समय पाकर सुकृत (सुन्दर कार्य) अपने आप आ जाते हैं उसी प्रकार से शरद् ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ गए हैं।

शरद् ऋतु को भारतीय संस्कृति में धार्मिक रूप से भी अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है। आश्विन माह में माता दुर्गा ने महिषासुर का, भगवान श्री राम ने रावण तथा कुम्भकर्ण का, भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर का और कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया था। यही कारण है कि आश्विन एवं कार्तिक दोनों ही माह पवित्र महीने माने गए हैं। इन दोनों माह में हिन्दू त्यौहारों की भरमार होती है यथा नवरात्रि, दशहरा दीपावली, देव प्रबोधनी एकादशी आदि।

Wednesday, November 9, 2011

समझ में नहीं आता कि भारत की जनता अब अपने आप को समझदार क्यों समझने लगी है?

अभी-अभी आनलाइन दैनिक भास्कर में एक समाचार समाचार पढ़ा - "वाह रे ''सरकार'', सोनिया के विदेश दौरों की ही जानकारी नहीं!" अब बताइये भला, सरकार के लिए सोनिया गांधी के विदेश यात्राओं की जानकारी रखना जरूरी है क्या? सरकार तो सरकार ठहरी, पूरे देश की मालिक! यह तो उसकी मर्जी है कि किसके विदेश यात्रा का हिसाब रखे और किसके न रखे! जनता की बुद्धि पर तरस आता है जो यह सोचती है कि विदेश यात्रा में आखिर खर्च तो होता है और खर्च का हिसाब रखा जाना चाहिए क्योंकि पैसा तो जनता का है! जनता को जानना चाहिए कि एक बार उसने टैक्स के रूप में सरकार को पैसे दे दिए तो वह पैसा सरकार का हो गया। सरकार को दे देने के बाद उस पैसे पर जनता का हक रहा ही कहाँ? टैक्स पटा देने के बाद उसकी औकात रह जाती है क्या हिसाब पूछने की? चाहे वह पैसा यू.पी.ए. अध्यक्ष के विदेश यात्राओं में खर्च हो या फिर घोटालों के के द्वारा काले धन में परिणित होकर विदेशी बैंकों में जमा हो जाए, जनता को क्या करना है उससे? समझ में नहीं आता कि भारत की जनता अब अपने आप को समझदार क्यों समझने लगी है?

Tuesday, November 8, 2011

चावल - संसार के सर्वाधिक लोगों का प्रिय अनाज

कम से कम भारत में शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिनसे चावल या उससे बने खाद्य सामग्री का प्रयोग न किया हो। चावल जहाँ बंगाल, बिहार, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, आन्ध्र प्रदेश आदि अनेक राज्यों का प्रमुख भोजन है वहीं पंजाब, हरयाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे राज्यों, जहाँ का प्रमुख भोजन गेहूँ है, में भी चावल के बिना भोजन को अपूर्ण ही माना जाता है। यद्यपि आज बंगाल और बिहार राज्य भी चावल उगाने लगे हैं किन्तु कुछ दशक पूर्व तक इन दोनों राज्यों में छत्तीसगढ़ के द्वारा ही चावल की आपूर्ति हुआ करती थी क्योंकि छत्तीसगढ़ का मुख्य फसल चावल है और इसीलिए उसे "धान का कटोरा" के नाम से भी जाना जाता है। बहरहाल, चावल किसी राज्य का मुख्य भोजन हो या न हो, थोड़ी मात्रा में चावल खाना सभी राज्यों में पसन्द किया जाता है। यही कारण है कि समस्त भारत में चावल से बने खाद्य पदार्थ जैसे कि सादा राइस, मसाला राइस, राइस पुलाव, राइस बिरयानी इत्यादि आसानी के साथ उपलब्ध हो जाते हैं।
भारत में अत्यन्त प्राचीनकाल से ही चावल को महत्व दिया जाता रहा है। 'धान्य' के रूप में इसे साक्षात् लक्ष्मी ही कहा गया है। चावल के बगैर कोई भी पूजा सम्पन्न नहीं होती। दही और चावल का टीका लगाया जाता है। सुदामा ने कृष्ण को तंदुल अर्थात चावल ही भेंट किए थे। चावल को संस्कृत में 'अक्षत' के नाम से जाना जाता है।

एशिया के अनेकों देश ऐसे हैं जहाँ पर लोग औसतन दिन में दो से तीन बार तक चावल खाते हैं। म्यांमार में हर व्यक्ति प्रति वर्ष औसतन 195 किलो चावल खाता है जबकि कम्बोडिया और लाओस में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष औसतन 160 किलो चावल खाता है। एशिया की अपेक्षा अमेरिका और यूरोप के लोग चावल कम खाते हैं, अमेरिका में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष औसतन 7 किलो और यूरोप में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष औसतन 3 किलो चावल खाता है।

मानव ने सबसे पहले चावल की ही खेती की थी। हड़प्पा सभ्यता में, जो कि आज से लगभग पाँच हजार साल पुरानी है, चावल की खेती के प्रमाण मिले हैं।

किसी भी देश में उगने वाले चावल के अधिकतर भाग का उपभोग उसी देश में हो जाया करता है। यही कारण है कि विश्व के देशों में उगाए जाने वाले चावल का मात्र पाँच प्रतिशत ही निर्यात होता है। चावल का निर्यात करने में पहला नंबर है थाईलैंड का जो लगभग पचास लाख टन चावल का निर्यात करता है, दूसरे और तीसरे नंबर के चावल निर्यातक हैं अमेरिका और वियतनाम जहाँ से क्रमशः तीस लाख टन और बीस लाख टन चावल निर्यात होते हैं।

कहा जाता है कि संसार भर में धान की 1,40,000 से भी अधिक किस्में उगाई जाती हैं किन्तु शोधकर्ताओं के लिए बनाए गए अन्तर्राष्ट्रीय जीन बैंके में धान की लगभग 90000 किस्में ही जमा की जा सकी हैं। भारत में चावल की कुछ लोकप्रिय किस्में हैं - बासमती, गोविंद भोग, तुलसी भोग, तुलसी अमृत, बादशाह भोग, विष्णु भोग, जवाफूल, एच.एम.टी. इत्यादि।

धान की खेती करना अत्यन्त श्रमसाध्य कार्य है। पारम्परिक तरीके से धान बोने हेतु एक एकड़ खेत को तैयार करने के लिए किसान को कीचड़ से सनी मिट्टी पर हल तथा बैलों के साथ लगभग बत्तीस कि.मी. चलना पड़ता है। धान के पौधे रोपने के लिए कमर से नीचे झुक कर एक-एक पौधे को जमीन में लगानी होती है जो कि एक कमर तोड़ देने वाला कार्य है।  धान के फसल के लिए पानी की बहुत अधिक आवश्यकता होती है क्योंकि धान की खेती पानी से लबालब भरे खेत में ही की जाती है।

धान का प्रत्येक हिस्सा उपयोगी होता है। धान की फसल काट लेने के बाद बचा हुआ पैरा मवेशियों को खिलाने के काम में आता है। धान के पैरे से रस्सी भी बनाई जाती है। धान के भूसे को उपलों के साथ मिला कर ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। धान से लाई और चिवड़ा बनाया जाता है। चावल को सड़ा कर शराब तथा बियर बनाई जाती है। चावल के दानों को रंग कर रंगोली बनाई जाती है। चावल की पालिश के समय निकले छिलकों से तेल निकाला जाता है जिसे खाद्य तेल के रूप में तथा साबुन, सौन्दर्य सामग्री इत्यादि बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है।

Monday, November 7, 2011

कौन अच्छा और कौन बुरा?

तीन व्यक्तियों के चरित्र निम्न प्रकार से हैं -

पहला व्यक्ति - राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूर्ण करने के लिए कुटिल राजनीतिज्ञों तथा ज्योतिषयों के परामर्श लेता है। उसकी दो प्रेमिकाएँ हैं। चेन स्मोकर है तथा दिन में 8-10 मार्टिनी पीता है।

दूसरा व्यक्ति - दो बार आफिस से निकाला जा चुका है, दोपहर तक सोता है, कॉलेज में अफीम का नशा करता था, प्रतिदिन शाम होने के बाद शराब का सेवन करता है।

तीसरा व्यक्ति - युद्धप्रिय वीर है, शुद्ध शाकाहारी है, धूम्रपान नहीं करता, विशेष अवसरों पर बियर पीने के अलावा शराब का सेवन नहीं करता, किसी महिला से किसी प्रकार का गलत सम्बन्ध नहीं है।

उपरोक्त तीन चरित्रों में से किसे अच्छा माना जाएगा और किसे बुरा?

अब मैं आपको बता दूँ कि फ्रैंकलिन डी. रूजावेल्ट का चरित्र उपरोक्त पहले व्यक्ति जैसा था, विन्सटन चर्चिल का उपरोक्त दूसरे व्यक्ति जैसा और एडोल्फ हिटलर का उपरोक्त तीसरे व्यक्ति जैसा।

अब बताइये कि फ्रैंकलिन डी. रूजावेल्ट, विन्सटन चर्चिल और एडोल्फ हिटलर में किसे अच्छा माना जाता है और किसे बुरा?

Sunday, November 6, 2011

देव प्रबोधनी एकादशी अर्थात् देव उत्थान एकादशी अर्थात देव उठनी एकादशी

कार्तिक मान के शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन, जिसे कि देव प्रबोधनी एकादशी, देव उत्थान एकादशी तथा देव उठनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, क्षीरसागर में शेषशय्या पर शयन करते हुए भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागृत होने का दिन है। इसी दिन से शादी-विवाह आदि जैसे समस्त मांगलिक कार्यों का, जो कि देव के शयन काल के दौरान नहीं मनाए जा सकते, पुनः आरम्भ हो जाता है। पद्मपुराण के अनुसार इस दिन भगवान शालिग्राम तथा माता तुलसी का विवाह हुआ था।

(चित्र iskconsurat.com से साभार)

आप सभी को देव प्रबोधनी एकादशी की शुभकामनाएँ!

भगवान शालिग्राम और माता तुलसी आपकी मनोकामनाएँ पूर्ण करें!

Saturday, November 5, 2011

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के विषय में कुछ जानकारी

जिन लोगों ने देश की स्वतन्त्रता के लिए अपना सर्वस्व यहाँ तक कि प्राण तक न्यौछावर कर दिया, हम लोगों में अधिकतर लोग उनके विषय में, दुर्भाग्य से, बहुत कम जानते हैं। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस भी उन महान सच्चे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों में से एक हैं जिनके बलिदान का इस देश में सही आकलन नहीं हुआ। देखा जाए तो अपनी महान हस्तियों के विषय में न जानने या बहुत कम जानने के पीछे दोष हमारा नहीं बल्कि हमारी शिक्षा का है जिसने हमारे भीतर ऐसा संस्कार ही उत्पन्न नहीं होने दिया कि हम उनके विषय में जानने का कभी प्रयास करें। होश सम्भालने बाद से ही जो हमें "महात्मा गांधी की जय", "चाचा नेहरू जिन्दाबाद" जैसे नारे लगवाए गए हैं उनसे हमारे भीतर गहरे तक पैठ गया है कि देश को स्वतन्त्रता सिर्फ गांधी जी और नेहरू जी के कारण ही मिली। हमारे भीतर की इस भावना ने अन्य सच्चे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों को उनकी अपेक्षा गौण बना कर रख दिया। हमारे समय में तो स्कूल की पाठ्य-पुस्तकों में यदा-कदा "खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी...", "अमर शहीद भगत सिंह" जैसे पाठ होते भी थे किन्तु आज वह भी लुप्त हो गया है। ऐसी शिक्षा से कैसे जगेगी भावना अपने महान हस्तियों के बारे में जानने की? अस्तु।
  • नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था।
  • उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माता का नाम प्रभावती था।
  • सुभाष चन्द्र बोस अपनी माता-पिता की 14 सन्तानों में से नौवीं सन्तान थे।
  • जानकीदास बोस को ब्रिटिश सरकार ने रायबहादुर का खिताब दिया था और वे चाहते थे कि उनका पुत्र आई.सी.एस. (आज का आई.ए.एस.) अधिकारी बने, इसलिए पिता का मन रखने के लिए सुभाष चन्द्र बोस सन् 1920 में आई.सी.एस. अधिकारी बने।
  • महज एक साल बाद ही अर्थात् सन् 1921 में वे अंग्रेजों की नौकरी छोड़कर राजनीति में उतर आए।
  • सन् 1938 में सुभाष चन्द्र बोस बोस कांग्रेस के अध्यक्ष हुए। अध्यक्ष पद के लिए गांधी जी ने उन्हें चुना था और कांग्रेस का यह रवैया था कि जिसे गांधी जी चुन लेते थे वह अध्यक्ष बन ही जाता था क्योंकि हमने सुना है कि जो भी अध्यक्ष बनता था वह वास्तव में 'डमी' होता था, असली अध्यक्ष तो स्वयं गांधी जी होते थे और चुने गए अध्यक्ष को उनके ही निर्देशानुसार कार्य करना पड़ता था।
  • द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों की कठिनायों को मद्देनजर रखते हुए सुभाष चन्द्र बोस चाहते थे कि स्वतन्त्रता संग्राम को अधिक तीव्र गति से चलाया जाए किन्तु गांधी जी को उनके इस विचार से सहमत नहीं थे। परिणामस्वरूप बोस और गांधी के बीच मतभेद पैदा हो गया और गांधी जी ने उन्हें कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटाने के लिए कमर कस लिया।
  • गांधी जी के विरोध के बावजूद भी कांग्रेस के सन् 1939 के चुनाव में सुभाष चन्द्र बोस फिर से चुन कर आ गए। चुनाव में गांधी जी समर्थित पट्टाभि सीतारमैया को 1377 मत मिले जबकि सुभाष चन्द्र बोस को 1580। गांधी जी ने इसे पट्टाभि सीतारमैया की हार न मान कर अपनी हार माना।
  • गांधी जी तथा उनके सहयोगियों के व्यवहार से दुःखी होकर अन्ततः सुभाष चन्द्र बोस ने 29 अप्रैल, 1939 को कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया।
  • तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने सुभाषचन्द्र बोस को ग्यारह बार गिरफ्तार किया और अन्त में सन् 1933 में उन्हें देश निकाला दे दिया।
  • 1934 में पिताजी की मृत्यु पर तथा 1936 में काँग्रेस के (लखनऊ) अधिवेशन में भाग लेने के लिए सुभाष चन्द्र बोस दो बार भारत आए, मगर दोनों ही बार ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर वापस देश से बाहर भेज दिया।
  • यूरोप में रहते हुए सुभाषचन्द्र बोस ने सन् 1933 से ’38 तक ऑस्ट्रिया, बुल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया, फ्राँस, जर्मनी, हंगरी, आयरलैण्ड, इटली, पोलैण्ड, रूमानिया, स्वीजरलैण्ड, तुर्की और युगोस्लाविया की यात्राएँ कर के यूरोप की राजनीतिक हलचल का गहन अध्ययन किया और उसके बाद भारत को स्वतन्त्र कराने के उद्देश्य से आजाद हिन्द फौज का गठन किया।
  • नेताजी का नारा था "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूँगा"।
  • 18 अगस्त 1945 को हवाई जहाज से मांचुरिया की ओर जाते हुए व लापता हो गए तथा उसके बाद वे कभी किसी को दिखाई नहीं दिये।
  • नेताजी की मृत्यु (?) आज तक इतिहास का एक रहस्य बना हुआ है?

Friday, November 4, 2011

काहे को सोच करै मन मूरख

जब दाँत न थे तब दूध दियो, अब दाँत भये कहा अन्न न दैहै?
जीव बसे जल में थल में, तिनकी सुधि लेइ सो तेरहु लैहै॥
जान को देत अजान को देत, जहान को देत, सो तोहु को दैहै।
काहे को सोच करै मन मूरख, सोच करै कछु हाथ न ऐहै॥


उपरोक्त छंद बीरबल द्वारा रचित है जो कि अकबर के नवरत्नों में से एक थे।

Thursday, November 3, 2011

'तुमको पिया दिल दिया बड़े नाज से....' गाने के संगीत निर्देशक - जी.एस. कोहली

एक उच्च कोटि के फिल्म संगीत निर्देशक में जो प्रतिभाएँ होनी चाहिए, उन सभी प्रतिभाओं के होने के बावजूद भी संगीतकार जी.एस. कोहली को बतौर स्वतन्त्र संगीत निर्देशक के कुछ गिनी-चुनी कम बजट वाली तथा स्टंट फिल्में ही मिल पाईं। वैसे तो उन्होंने सन् 1960 में प्रदर्शित अपनी पहली ही फिल्म 'लम्बे हाथ' के गीत "प्यार की राह दिखा दुनिया को रोके जो नफरत की आँधी...." से अपनी पहचान बना ली थी, पर सर्वाधिक लोकप्रियता उन्हें सन् 1963 में प्रदर्शित फिल्म 'शिकारी' के गीत "तुमको पिया दिल दिया बड़े नाज से...." से ही मिली।

एक लम्बे समय तक संगीत निर्देशक ओ.पी. नैय्यर के सहायक रहे जी.एस. कोहली के संगीत में नैय्यर साहब के स्वर तथा रीदम शैली का प्रभाव स्पष्ट रूप से झलकता है। कोहली जी के संगीत में गायक कलाकारों के कण्ठस्वर के साथ बाँसुरी, सितार, सेक्सोफोन, गिटार, ग्रुप वायलिन आदि वाद्ययन्त्रों का संयोजन धुन को अत्यन्त कर्णप्रिय बना देता था, और उस पर ढोलक की विशिष्ट थाप तो धुन क मादकता से भर देता था। जरा याद करें 'अगर मैं पूछूँ जवाब दोगे ये दिल क्यों मेरा तड़प रहा है....', 'माँगी हैं दुआएँ हमने सनम इस दिल को धड़कना आ जाए...' जैसी गानों को! याद करके ही फड़क उठेंगे आप।

नैय्यर जी की तरह कोहली जी ने लता जी से कभी भी परहेज नहीं किया इसलिए कोहली जी के संगीत संयोजन में गाये लता जी के गानों को सुन कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि यदि नैय्यर जी और लता जी का भी साथ बना होता तो वह 'सोने पर सुहागा; ही होता!

Tuesday, November 1, 2011

यदि सरदार पटेल ने दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति न दिखाई होती तो हैदराबाद भी भारत के लिए कश्मीर के जैसा ही हमेशा के लिए सरदर्द बन गया होता

जब पन्द्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस को भारत परतन्त्रता की बेड़ियों से आजाद हुआ तो उस समय लगभग 562 देशी रियासतें थीं जिन पर ब्रिटिश सरकार का हुकूमत नहीं था। उनमें से जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर को छोडक़र अधिकतर रियासतों ने स्वेज्छा से भारत में अपने विलय की स्वीकृति दे दी। जूनागढ़ का नवाब जूनागढ़ का विलय पाकिस्तान में चाहता था। नवाब के इस निर्णय के कारण जूनागढ़ में जन विद्रोह हो गया जिसके परिणामस्वरूप नवाब को पाकिस्तान भाग जाना पड़ा और जूनागढ़ पर भारत का अधिकार हो गया। हैदराबाद का निजाम हैदराबाद स्टेट को एक स्वतन्त्र देश का रूप देना चाहता था इसलिए उसने भारत में हैदराबाद के विलय कि स्वीकृति नहीं दी। यद्यपि भारत को 15 अगस्त 1947 के दिन स्वतन्त्रता मिल चुकी थी किन्तु 18 सितम्बर 1948 तक, याने कि पूरे 1 वर्ष, 1 माह और 4 दिन तक हैदराबाद भारत से अलग ही रहा। इस पर तत्कालीन गृह मन्त्री सरदार पटेल ने हैदराबाद के नवाब की हेकड़ी दूर करने के लिए 13 सितम्बर 1948 को सैन्य कार्यवाही आरम्भ कर दिया (यद्यपि वह सैन्य कार्यवाही ही था किन्तु उसे पुलिस कार्यवाही बतलाया गया था जिसका नाम 'ऑपरेशन पोलो' रखा गया था)। भारत की सेना के समक्ष निजाम की सेना टिक नहीं सकी और उन्होंने 18 सितम्बर 1948 को समर्पण कर दिया। हैदराबाद के निजाम को विवश होकर भारतीय संघ में शामिल होना पड़ा।

सरदार पटेल शुरू से ही हैदराबाद पर सैनिक कार्यवाही करना चाहते थे किन्तु तत्कालीन प्रधान मन्त्री जवाहर लाल नेहरू सैनिक कार्यवाही के पक्ष में नहीं थे। उनका विचार था कि सैन्य कार्यवाही के द्वारा हैदराबाद मसले को सुलझाने में पूरा खतरा तथा अन्तर्राष्ट्रीय जटिलताएँ उत्पन्न होने की सम्भावना थी। वे चाहते थे कि हैदराबाद में की जानेवाली सैनिक कार्रवाई को स्थगित कर दिया जाए। तत्कालीन गवर्नर जनरल माउंटबेटन भी नेहरू के ही पक्ष में थे। नेहरू की इस असहमति के कारण ही हैदराबाद के ऊपर सैन्य कार्यवाही करने में सरदार पटेल को इतना विलम्ब हुआ। प्रख्यात कांग्रेसी नेता प्रो.एन.जी. रंगा की भी राय थी कि विलंब से की गई कार्रवाई के लिए नेहरू और माउंटबेटन जिम्मेदार हैं। रंगा लिखते हैं कि 'जवाहरलाल नेहरू की सलाहें मान ली होतीं तो हैदराबाद मामला उलझ जाता'।

अब आप ही सोचिए कि यदि सरदार पटेल ने उस समय अपनी दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए सैन्य कार्यवाही नहीं किया होता तो क्या आज हैदराबाद भी कश्मीर की तरह से भारत के लिए हमेशा का सरदर्द नहीं बन गया होता?

यहाँ पर उल्लेखनीय है कि एक बार सरदार पटेल ने स्वयं श्री एच.वी.कामत को बताया था कि ''यदि जवाहरलाल नेहरू और गोपालस्वामी आयंगर कश्मीर मुद्दे पर हस्तक्षेप न करते और उसे गृह मंत्रालय से अलग न करते तो मैं हैदराबाद की तरह ही इस मुद्दे को भी आसानी से देश-हित में सुलझा लेता।"

इन बातों को आप जानते हैं, फिर भी दोहरा रहा हूँ

  • शल्यचिकित्सा के जनक सुश्रुत हैं।
  • 'सिद्धान्त शिरोमणि' के रचयिता हैं सुविख्यात भारतीय गणितज्ञा एवं ज्योतिषाचार्य भास्कराचार्य!
  • पृथ्वी के द्वारा सूर्य की परिक्रमा करने में लगने वाले समय की शुद्ध गणना आज से हजारों साल पहले कर ली थी। उनके अनुसार उसका मान 365.258756484 दिन था।
  • तथाकथित पाइथागोरस के प्रमेय को हजारों साल पहले बोधायन ने खोज लिया था। बोधायन को 'पाई' के मान की भी जानकारी थी।
  • नौकायन की कला का जन्म ६००० वर्ष पूर्व सिन्धु नदी में हुआ था।
  • तक्षशिला विश्वविद्यालय विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय है।
  • श्रीधराचार्य ने ग्यारहवीं शताब्दी में द्विघातीय समीकरणों का प्रतिपादन किया।
  • अठारहवीं सदी तक भारत संसार का सबसे सम्पन्न देश था।
  • भारत की सम्पदा से आकर्षित होकर क्रिस्टोफर कोलम्बस भारत को खोजने निकला था पर भारत को खोजने के लिए निकले कोलंबस ने अमेरिका को खोज डाला।
  • सैकड़ों वर्षों से चली आ रही गलतफ़हमी को दूर करते हुए अमेरिकी संस्था IEEE ने यह सिद्ध कर दिया है कि बेतार के संचार का आविष्कार मारकोनी ने नहीं बल्कि प्रोफ़ेसर जगदीश चन्द्र बोस ने किया था।

 
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