कॉल दरों के बारे में संचार मंत्री कपिल सिब्बल कह रहे हैं 'यह तो बाजार तय करेगा।' याने कि राजा घोटाला करे तो प्रजा भुगते और राजा का घोटाला खुल जाए तो भी प्रजा भुगते। जब घोटाला हुआ तो प्रजा की गाढ़ी कमाई के हजारों करोड़ रुपये भ्रष्टाचारियों की जेब में चले गए और अब घोटाला खुल गया है तथा 122 कम्पनियों का आबन्टन रद्द हो गया है तो फिर से ऊँचे दरों पर नीलामी होगी जिसके परिणामस्वरूप कॉल दरों में वृद्ध होगी तथा इस बढ़े हुए दाम को प्रजा ही वहन करेगी।
घोटाले में प्रजा की जो गाढ़ी कमाई लुट चुकी है उसे तो उसने भुगत ही लिया है। इसके बाद बढ़ी हुई कॉल दरों को प्रजा को ही भुगतना पड़ेगा। जिन 122 कम्पनियों का आबन्टन रद्द हो गया है उनमें कार्यरत 25000 कर्मचारी भी इस देश की प्रजा हैं और उन्होंने आज से ही इस चिन्ता को भुगतना शुरू कर दिया है कि चार माह बाद उनकी नौकरी का क्या होगा? प्रजा चाहे लुटे, चाहे मँहगाई से मरे, चाहे नौकरी छूट जाने के बाद उसके बाल-बच्चे भूखे मरें, भ्रष्टाचारियों को कुछ भी फर्क नहीं पड़ने वाला है क्योंकि घोटाले में प्रजा का जो धन लुट चुका है उसके वापस मिल जाने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता, वह धन उन्हीं के पास रहेगा। हो सकता है कि उनमें से कुछ लोग जेल चले जाएँ पर उससे भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है क्योंकि जेल में भी वे फाइव स्टार होटल की सुविधा उपलब्ध करवा ही लेंगे, कारागार उनके लिए आरामगाह बन जाएगा। ऐसे में जेल भुगत भी लिया तो क्या? उनकी कई पीढ़ियों के लिए धन तो उनके खजाने में आ ही गया। आखिर आज के जमाने के राजा हैं वो। और प्रजा ने उन्हें राजा बनाया है तो क्या प्रजा को अपनी इस मूर्खता को भुगतना नहीं पड़ेगा।
स्पष्ट है राजा होता ही है ऐश करने के लिए और प्रजा होती ही है भुगतने के लिए!
किन्तु, कम से कम हमारे देश में, हमेशा से ऐसा नहीं था। हमारे देश में जितनी भी नीतियाँ बनी थीं वे राजा को प्रजा का रक्षक तथा सेवक मानकर ही बनी थीं। राजा हमेशा प्रजा के हित की बात सोचता था और प्रजा की सन्तुष्टि के लिए बड़े से बड़ा त्याग भी कर देता था, अयोध्या के राजा राम ने तो प्रजा की सन्तुष्टि के लिए अपनी धर्मपत्नी तक का त्याग कर दिया था। कहने का तात्पर्य यह है कि राजा अपनी मनमानी तो कर ही नहीं सकता था क्योंकि उसके ऊपर उसके मन्त्रियों का अंकुश होता था।
फिर हमारे देश के दुर्भाग्य का उदय हुआ और विदेशी हम पर शासन करने लगे। उन्होंने अपने हिसाब से नियम-कायदे बनाये और पराधीन होने के नाते हमें उन नियम-कायदों को स्वीकार करना पड़ा। मुगलों ने हम पर अरबी-फारसी लादा और हमारे देश की भाषा संस्कृत का ह्रास होने लगा। अधिकतर लोग भले ही फारसी न सीख पाएँ हों किन्तु संस्कृत को जरुर भूलने लगे। फिर भी मुगलों के काल में हमारे संस्कार और संस्कृति ज्यों की त्यों बनी रही। मुगलों ने चाहे जो कुछ भी किया हो, पर हमारे संस्कार, हमारी संस्कृति, हमारी भाषा को विशेष नुकसान नहीं होने दिया। उल्टे, इस निश्चय के बाद कि अब उन्हें यहीं का हो के रहना है, उन्होंने हमारे संस्कार और संस्कृति को कुछ हद तक अपनाया भी।
मुगलों के पतन के बाद इस देश में अंग्रेजों का अधिकार हो गया। ये अंग्रेज मुगलों की तुलना में बहुत ही अधिक और मक्कार थे। मुगलों ने इस देश को अपना ही देश समझा पर अंग्रेजों ने हमारे देश को कभी भी अपना देश नहीं समझा, उन्होंने इसे सिर्फ और सिर्फ अपना एक उपनिवेश ही समझा, मात्र लूट का एक स्थान समझा। वे जानते थे कि किसी भी देश को गुलाम बना लेना जितना कठिन कार्य है उससे कहीं अधिक कठिन कार्य है उसे दीर्घकाल तक गुलाम बनाये रखना। वे अच्छी तरह से समझते थे कि किसी को भी लम्बे समय तक गुलाम बनाये रखने के लिए उसके स्वाभिमान को कुचल डालना सबसे जरूरी है अन्यथा जब कभी भी गुलाम देश के लोगों का स्वाभिमान जाग उठेगा, वे अपनी गुलामी को जरूर खत्म कर डालेंगे। इसी कारण से उन्होंने हमारे भीतर हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता, हमारे साहित्य, हमारे प्राचीन गौरव के प्रति अरुचि एवं घृणा का भाव योजनाबद्ध तरीके से भरना शुरू कर दिया ताकि हमारा स्वाभिमान जागृत ना होने पाए। हममें हीन भावना भरने के लिए उन्होंने हमारे प्राचीन इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा, हमारे प्राचीन वैभव को नष्ट किया, हमारे प्राचीन ग्रंथों को फूँक डाला, हम पर जबरदस्ती अपनी अंग्रेजी भाषा को लादा। और इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि वे अपनी इस कुटिल योजना में अपनी आशा से भी अधिक सफल हुए। हमारे देश के लोग अंग्रेजी भाषा को अपनी भाषा से अधिक अच्छा समझने लगे, अपनी रीति-रिवाज से अंग्रेजों की रीति-रिवाज को अच्छा समझने लगे, अंग्रेजी साहित्य को अपने स्वयं के साहित्य से अच्छा समझने लगे।
कारण चाहे जो भी रहे हों, अन्ततः अंग्रजों को इस देश को छोड़ना पड़ा। अंग्रजों ने तो इस देश को जरूर छोड़ दिया पर अंग्रेजी भाषा, अंग्रेजी शिक्षा-नीति, अंग्रेजी नियम-कायदों, अंग्रेजी रीति-रिवाजों आदि ने इस देश को नहीं छोड़ा। सामान्यतः जब कभी भी कोई गुलाम देश आजादी पाता है तो सबसे पहले वह अपने सच्चे इतिहास को फिर से लिखने का तथा अपने देश की भाषा, संस्कृति, सभ्यता, मान्यताएँ, प्राचीन गौरव आदि को आधार मानकर अपने संविधान का निर्माण का कार्य करता है। किन्तु भारत के दुर्भाग्य से स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् ये कार्य हुए ही नहीं। अंग्रेजों के बाद इस देश की सत्ता की बागडोर जिन लोगों के के हाथों में आई उन्होंने हमें लम्बे समय तक गुलाम बनाये रखने वालों के द्वारा लिखित और प्रचारित इतिहास को बदलने के स्थान पर अपना लिया। हम पर शासन करने वाले अंग्रेजों के द्वारा, अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर, सैंकड़ों वर्षों पूर्व बनाए गए संविधान को भी हमने ज्यों का त्यों या फिर थोड़ा फेर-बदल कर अपने देश का संविधान बना लिया। मैकॉले की उस शिक्षा-नीति, जो कभी भी ब्रिटेन में लागू नहीं हुई, को भी अपना लिया। अंग्रेजों के स्थान पर वे राजा बनकर इस देश की प्रजा को लूटने लगे। सन् 1948 में, जीप घोटाले के रूप में, लगाया गया घोटाला रूपी पौधे ने आज एक विशाल वृक्ष का रूप धारण कर लिया है।
और उपरोक्त समस्त बातों का ही परिणाम यह सिद्धान्त बन गया है कि "राजा होता ही है ऐश करने के लिए और प्रजा होती ही है भुगतने के लिए"।
सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी (GK Q & A)
3 hours ago
4:42 PM
जी.के. अवधिया








5 टिप्पणियाँ:
देश के लोगों में नैतिकता कितनी है, राष्ट्र भक्ति कितनी है, सह नागरिकों के प्रति कितनी सहानुभूति है, क़ानून का कितना सम्मान है...
अंग्रेजों की पोषित मानसिकता उनसे भी अधिक भयावह है..
अर्थशास्त्र की कठिन पहेली.
ग़रीब का गाय
कोई भी बांध ले
बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!
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