Sunday, February 19, 2012

ऋतुराज वसन्त

(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता)

निर्मल नभ, मन्द पवन,
पुष्प-गन्ध की व्यापकता,
खग-कलरव, उन्मन भव,
मत्त मदन की मादकता।

अलि गण गुंजन, मुकुलित चुम्बन,
अमराई में मंजरि जाल,
रक्तिम टेसू, अग्नि अन्देशू,
विरह वह्नि की भीषण ज्वाल।

सरसों का पीताम्बर,
अभ्रहीन नीलाम्बर,
उन्मन उन्मन सबका मन,
शीतल निर्झर, कोकिल का स्वर,
ऋतु वसन्त का अनमोल रतन।

(रचना तिथिः रविवार 15-02-1981)

6 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय said...

अद्भुत, बसन्त सी रोचक..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुंदर रचना ...आभार

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार के चर्चा मंच पर भी लगा रहा हूँ!सूचनार्थ!
--
महाशिवरात्रि की मंगलकामनाएँ स्वीकार करें।

रचना दीक्षित said...

वसंत की अद्भुत छटा बिखेरती सुंदर प्रस्तुति.

महाशिवरात्रि की मंगलकामनाएँ.

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

सुन्दर रचना...
महाशिवात्री की बधाईयाँ...

Patali-The-Village said...

बहुत सुंदर रचना|

 
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