आम्र-मंजरियों एवं महुआ के मदिर पुष्पों की भीनी व मादक सुगन्ध से सुवासित वातावरण! खेतों मे सरसों के फूलों का पीताम्बर! अलसी के अलसाये फूल! पत्रविहीन पलाश एवं सेमल के वृक्षों पर दहकते अंगारों सदृश रक्तिम सुमन! शीतल-मन्द-सुगन्धित बयार! वसन्त की मादकता एवं फागुन की फगुनाहट हर किसी के मन को मुग्ध तथा तन पुलकित कर देता है!
ऐसे में भ्रमरों का गुंजन और कोयल की तान सुनकर भला किसके मुख से गीत के बोल नहीं निकलेंगे? वैसे भी फागुन का यह महीना हर किसी को उन्मत्त बना देता है। मुख से अनायास ही फागगीत मुखरित होने लगता है। वही फागगीत जिसमें 'चन्द्रसखी' ने ब्रज की होरी जीवन्त रूप दिया है -
आज बिरज में होरी रे रसिया
आज बिरज में होरी
घर घर से आई ब्रज बनिता
कोई श्यामल कोई गोरी
रे रसिया आज बिरज में…
इत तें आए कुँअर कन्हाई
उत तें आईं राधा गोरी
रे रसिया आज बिरज में…
कोई लावे चोवा कोई लावे चंदन
कोई मले मुख रोरी
रे रसिया आज बिरज में...
उडत गुलाल लाल भये बादर
मारत भर-भर झोरी
रे रसिया आज बिरज में...
चन्द्रसखी भज बाल कृष्ण छवि
चिर जीवो यह जोड़ी
रे रसिया आज बिरज में...
फागुन का यह महीना बैजनाथ को लिखने पर विवश कर देता है -
मिला बन में मुरलियावाला सखी
मिला बन में मुरलिया वाला सखी।
कोई कहे देखो मोहन हैं आए,
कोई कहे नन्दलाला सखी।
मिला बन में मुरलिया वाला सखी।
धर पिचकारी खड़े ग्वाल सब
कोई धरे है गुलाला सखी।
मिला बन में मुरलिया वाला सखी।
सारी साड़ी मेरो भिगोए,
देखो नन्द का लाला सखी।
मिला बन में मुरलिया वाला सखी।
'बैजनाथ' कहे श्याम सलोना,
लेकिन मन का काला सखी।
मिला बन में मुरलिया वाला सखी।
और 'पल्टू हीरामन' लिखते हैं -
होरी खेलैं घनश्यामा
बिरिज में होरी खेलैं घनश्यामा।
श्याम के संग में सकल पदारथ,
राधा के संग सुख-सामां।
बिरिज में होरी खेलैं घनश्यामा।
श्याम के संग में गोकुल के ग्वाला,
राधा के संग बृजवामा।
बिरिज में होरी खेलैं घनश्यामा।
'पल्टू हीरामन' रंग उड़े रे,
लाल भए गोकुल ग्रामा।
बिरिज में होरी खेलैं घनश्यामा।
धन्य है यह गोप-गोपियों, ग्वालों और श्री कृष्ण का अद्भुत, अलौकिक और आत्मिक प्रेम!
गोदान – 84
16 hours ago
10:09 AM
जी.के. अवधिया








4 टिप्पणियाँ:
होली पर ये गीत बड़े अच्छे लगे.
अहा गीत गुनगुना कर आनन्द आ गया..
बढि़या तिरंगी होली.
बहुत बढिया.......होली है....
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