Thursday, April 12, 2012

वृद्ध लोगों को वर्तमान में जीने के बजाय अतीत में जीने की आदत सी हो जाती है।

है तो यह वैशाख का महीना किन्तु दोपहर में घर से बाहर निकलने पर लगता है कि यह वैशाख नहीं बल्कि ज्येष्ठ माह है जिसमें ग्रीष्म अपनी चरमावस्था में होती है और गर्मी की भीषणता असहनीय हो जाती है। दोपहर की धूप में कुछ दूर जाने पर प्रतीत होता है कि भगवान भास्कर अपनी प्रखर किरणों से सम्पूर्ण धरा को भस्मीभूत कर देने के लिए आतुर हैं।

ऐसे में लगता है कि पूरी दुपहरिया कूलर वाले ठण्डे कमरे में काटने में ही सुख है। आज की तकनीकी ने तो एसी, कूलर जैसी सुविधाएँ उपलब्ध करा दी है किन्तु मुझे वह जमाना भी याद आता है जब इस प्रकार की सुविधाएँ थी ही नहीं जिसके कारण हम अपने घर के पटाव वाले कमरे में हाथ पंखा डुलाते हुए ग्रीष्मकाल में ठण्डक पाने के सुख का अनुभव किया करते थे। इतनी सम्पन्नता तो थी नहीं कि कमरे के दरवाजे-खिड़कियों में खस की टट्टी लगवाकर और उसमें छिड़काव करके कमरे को वातानुकूलित-सा बना सकें। सो खस से बने हाथ पंखें को पानी से गीला कर ठण्डक का आनन्द लेते थे। आज मुझे लगता है कि कूलर वाले कमरे की ठण्डक की अपेक्षा उस खस के हाथ पंखे की ठण्डक में कहीं अधिक आनन्द था।

वैसे आप यह भी समझ सकते हैं कि वृद्ध लोगों को वर्तमान में जीने के बजाय अतीत में जीने की आदत सी हो जाती है।

2 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय said...

यदि वर्तमान निस्तेज हो तो अतीत ही याद आयेगा।

Shiv Kumar said...

यह तो परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि वृद्ध वर्त्तमान में में जिए या सिर्फ अतीत की यादों के सहारे ......

 
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