Thursday, April 19, 2012

मलूकदास के दोहे

दया धरम हिरदे बसै, बोलै अमरित बैन।
तेई ऊँचे जानिये, जिनके नीचे नैन॥

आदर मान, महत्व, सत, बालापन को नेहु।
यह चारों तबहीं गए जबहिं कहा कछु देहु॥

मान सहित विष खाय के संभु भए जगदीस ।
बिना मान अमृत पिए राहु कटायो सीस॥

अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।
दास 'मलूका कह गए, सबके दाता राम॥

2 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय said...

सबके दाता राम..

Rahul Singh said...

दास मलूका की अंतिम बात बड़े पते की है.

 
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