Wednesday, April 25, 2012

किसी को नहीं पता कि घोटालों का रुपया आखिर कहाँ जाता है

घोटाले होते हैं, और उसके बाद उसकी जाँच होती है जो कि पच्चीसों साल तक चलती है। पच्चीस साल के बाद जाँच का यह यह निष्कर्ष आता है कि फलाँ दोषी नहीं पाया गया, यह बात अलग है कि उसने किसी दोषी को बचाने का प्रयास अवश्य किया किन्तु वह स्वयं निर्दोष है। जाँच करने वाले को बस इस बात की फिक्र होती है कि कौन दोषी है और कौन नहीं किन्तु इस बात की फिक्र नहीं होती कि घोटाले में गोलमाल हुए सैकड़ों करोड़ रुपयों का क्या हुआ? किसी को पता नहीं चलता कि उन रुपयों को जमीन खा गई या आसमान निगल गया। किसी को यह भी नहीं लगता कि उन रुपयों का पता करके उसे वापस देश के खजाने में लाना चाहिए और लोकहित में उसका उपयोग होना चाहिए।

यह जान कर कि फलाँ दोषी नहीं है लोग संतुष्ट हो जाते हैं और घोटाला प्रकरण बंद कर दिया जाता है। जै हो हमारे देश की भोली-भाली जनता का। जनता को कभी नहीं लगता कि घोटाले में गायब हुए सैकड़ों करोड़ रुपये जनता की ही खून-पसीने की कमाई थी और उसका उपयोग जनता के हित के लिए ही होना था।

4 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय said...

देश का पैसा देश में ही लगता होगा..

नवज्योत कुमार said...

घोटालों का रुपया जाता है स्वीस बैंक में काले धन के रूप में!

Shah Nawaz said...

ब्लॉग बुलेटिन में एक बार फिर से हाज़िर हुआ हूँ, एक नए बुलेटिन "जिंदगी की जद्दोजहद और ब्लॉग बुलेटिन" लेकर, जिसमें आपकी पोस्ट की भी चर्चा है.

aaryan sekh said...

Bahut hi achchha hai magar ab hum nhi sahenge.

bhrastachariyon bharat chhodo. warna anjaam bura hoga.

 
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