Monday, March 26, 2012

राम की चिरैया राम का खेत खावो री चिरैया भर-भर पेट

राम की चिरैया राम का खेत
खावो री चिरैया भर-भर पेट

राम यदि अपनी चिड़ियों को अपने खेत की फसल चुगने देता है तो इसमें दोष ही क्या है? आखिर चिड़ियों और खेत दोनों का मालिक राम ही तो है! राम याने कि परमात्मा का अवतार और परमात्मा याने कि सुपर पॉवर!

रावण, कंस, दुर्योधन भी स्वयं को सुपर पॉवर समझा करते थे। आज संसद सुपर पॉवर बन गया है। सांसद इस सुपर पॉवर अर्थात् संसद की चिड़ियाएँ हैं और देश की जनता इसका खेत। तो सांसद यदि जनता को लूटें तो किसी भी प्रकार का दोष हो ही नहीं सकता। राम के खेत को चुगना तो राम की चिड़ियों का अधिकार है। राम के जमाने में और आज के संसद के जमाने में फर्क सिर्फ इतना है कि राम की चिड़ियाएँ सिर्फ पेट भरते तक खेत को चुगती थीं और संसद की चिड़ियाएँ पेट भर जाने के बाद बैंक का बैलेंस बढ़ाने के लिए भी चुगती ही रहती हैं। इस फर्क का कारण भी है, वह यह कि राम अपनी चिड़ियों को खुद चुनता था और संसद की चिड़ियों को संसद नहीं बल्कि उसका खेत ही चुनती है।

Thursday, March 22, 2012

महान वैज्ञानिक आइंस्टाइन के कुछ किस्से

(1)

अक्सर लोग अल्बर्ट आइंस्टाइन से उनके सापेक्षता सिद्धान्त (जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिव्हिटी) को सरल शब्दों में समझाने के लिए निवेदन किया करते थे। जवाब में आइंस्टाइन कहते थे, "आप अपने हाथ को जलती अंगीठी के ठी ऊपर एक मिनट के लिए रखिये तो वह एक मिनट आपको एक घण्टे के बराबर लगेगा और किसी सुन्दर महिला के साथ एक घण्टे तक बैठिये तो वह एक घण्टा आपको एक मिनट के बराबर लगेगा। यही सापेक्षता है।"

(2)

एक दिन अल्बर्ट आइंस्टाइन भाषण देने जा रहे थे तो रास्ते में उनके ड्राइव्हर ने कहा कि आपका भाषण मैं इतनी बार सुन चुका हूँ कि लोगों के सामने मैं ही आपका भाषण दे सकता हूँ। यह कहकर कि 'ठीक है आज तुम्हीं भाषण देना' आइंस्टाइन ने ड्राइव्हर की पोशाक पहन कर उसका स्थान ले लिया और अपना स्थान ड्राइव्हर को दे दिया।

भाषण हॉल में ड्राइव्हर ने सचमुच, आइंस्टाइन के जैसे ही, धुआँधार भाषण दिया। भाषण देने के बाद जब लोगों ने प्रश्न पूछने शूरू किए और ड्राइव्हर पूरे आत्मविश्वास के साथ जवाब भी सही दिए। किन्तु किसी एक ने ऐसा कठिन प्रश्न पूछ लिया कि ड्राइव्हर को उसका उत्तर नहीं पता था। इस पर ड्राइव्हर ने कहा, "अरे इस प्रश्न का जवाब तो इतना सरल है कि मेरा ड्राइव्हर बता देगा।" ऐसा कहकर उसने ड्राइव्हर वाली पोशाक पहने आइंस्टाइन को जवाब देने के लिए खड़ा कर दिया।

(3)

जब आइंस्टाइन प्रिंसटन यूनिव्हर्सिटी में कार्यरत थे तो एक दिन यूनिव्हर्सिटी से घर वापस आते समय वे अपने घर का पता ही भूल गए। यद्यपि प्रिंसटन के अधिकतर लोग आइंस्टाइन को पहचानते थे, किन्तु जिस टैक्सी में वे बैठे थे उसका ड्राइव्हर भी उन्हें पहचानता नहीं था। आइंस्टाइन ने ड्राइव्हर से कहा, "क्या तुम्हें आइंस्टाइन का पता मालूम है?" ड्राइव्हर ने जवाब दिया, "प्रिंसटन में भला कौन उनका पता नहीं जानेगा? यदि आप उनसे मिलना चाहते हैं तो मैं आपको उनके घर तक पहुँचा सकता हूँ।" तब आइंस्टीन ने ड्राइव्हर को बताया कि वे स्वयं ही आइंस्टाइन हैं और अपने घर का पता भूल गए हैं। यह जानकर ड्राइव्हर ने उन्हें उनके घर तक पहुँचाया और आइंस्टाइन के बार-बार आग्रह के बावजूद भी, टैक्सी का भाड़ा भी नहीं लिया।

(4)

एक बार आइंस्टाइन प्रिंसटन से कहीं जाने के लिए ट्रेन से सफर कर रहे थे। जब टिकट चेकर उनके पास आया तो वे अपनी टिकट ढ़ूँढ़ने के लिए जेबें टटोलने लगे। जेब में टिकट के न मिलने पर उन्होंने अपने सूटकेस को चेक किया। वहाँ भी टिकट को नदारद पाकर अपनी सीट के आस-पास खोजने लगे। यह देखकर चेकर ने कहा कि यदि टिकट गुम हो गई है तो कोई बात नहीं, वह उन्हें अच्छी प्रकार से पहचानता है और उसे विश्वास है कि टिकट जरूर खरीदी गई होगी।

चेकर जब बोगी के सभी लोगों का टिकट चेक करके वापस जा रहा था तो उसने देखा कि आइंस्टाइन अपनी सीट के नीचे टिकट ढ़ूँढ़ रहे हैं। तब चेकर फिर से उन्हे कहा कि वे टिकट के लिए परेशान न हों, उनसे टिकट नहीं माँगा जाएगा।

चेकर की बातें सुनकर आइंस्टाइन ने कहा, "पर टिकट के बिना मुझे पता कैसे चलेगा कि मैं जा कहाँ रहा हूँ?"

Tuesday, March 20, 2012

भारतीय बजट के बारे में कुछ जानकारी

हर साल वार्षिक बजट के बारे में जानने का कुतूहल भला किसे नहीं होता? आखिर क्या चीज सस्ती होगी और क्या मँहगी, कौन सा नया टैक्स लगेगा, आयकर में छूट की सीमा बढ़ाई गई या नहीं आदि महत्वपूर्ण बातों की जानकारी बजट से ही तो मिलती है। मुझे आज भी याद है कि मेरे स्कूल के जमाने में, जब टी.व्ही. की सुविधा नही थी और रेडियो भी बहुत कम लोगों के पास पाये जाते थे, बजट प्रस्तुत होने के समय रेडयो में उसे सुनने के लिए रेडियो सेट को चारों ओर लोगों का हुजूम लग जाया करता था।

सामान्यतः किसी वित्तीय वर्ष के दौरान तय संसाधन के खर्च के लिए एक व्यवस्थित योजना को बजट कहा जाता है। बजट को सरकार के वित्त की एक विस्तृत योजना कहा जा सकता है और भारत में इसे सर्वाधिक महत्वपूर्ण आर्थिक एवं वित्तीय घटना माना जाता है।

आइये भारतीय बजट के बारे में कुछ और तथ्यों को जानें -

  • भारत में बजट की परम्परा का आरम्भ भारत के प्रथम वायसराय लॉर्ड कैनिंग ने की थी।
  • यद्यपि बजट की शुरुआत लॉर्ड कैनिंग ने की, भारत का पहला बजट 18 फरवरी 1860 को जेम्स विल्सन के द्वारा वायसराय परिषद में प्रस्तुत किया गया था। इसी कारण से जेम्स विल्सन को भारतीय बजट का संस्थापक भी कहा जाता है।
  • ब्रिटिश शासनकाल में भारत का बजट शाम को पाँच बजे प्रस्तुत किया जाता था क्योंकि भारतीय बजट को सुनने का कौतूहल इंग्लैंड में भी होता था और भारत में शाम के पाँच बजे इंग्लैंड में दोपहर का समय होता था।
  • स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात भी सन् 1998-1999 तक बजट शाम को पाँच बजे ही प्रस्तुत किया जाता रहा (जिसे कि मानसिक गुलामी माना जा सकता है अन्यथा आजाद हो जाने के बाद शाम को पाँच बजे बजट प्रस्तुत करने का कोई तुक नहीं था)।
  • सन् 1999-2000 में यशवंत सिन्हा ने पहली बार शाम के बजाय सुबह के समय बजट प्रस्तुत किया।
  • हमारे देश में बजट संविधान के अनुच्छेद 112 के अन्तर्गत प्रस्तुत किया जाता है।
  • स्वतन्त्र भारत का पहला अन्तरिम बजट 26 नवंबर 1947 को आर.के षण्मुखम शेट्टी ने प्रस्तुत किया गया था।
  • भारतीय गणतन्त्र का प्रथम बजट 28 फरवरी 1950 को जॉन मथाई के द्वारा प्रस्तुत किया गया था।
  • सी.डी. देशमुख एकमात्र रिजर्व बैंक के गव्हर्नर हैं जिन्होंने सन् 1951-52 में अन्तरिम बजट प्रस्तुत किया था।
  • आज बजट केवल एक पार्ट में पेश किया जाता है किन्तु पहले बजट के दो पार्ट्स हुआ करते थे जिसमें दूसरा पार्ट जनता से सम्बन्धित होता था।
  • मोराजी देसाई 8 वर्ष के सर्वाधिक लम्बे समय के लिए वित्त मन्त्री रहे और उन्होंने संसद में सर्वाधिक 10 बार बजट प्रस्तुत किया है।
  • वर्ष 1964 और 1968 में मोरारजी देसाई ने आम बजट अपने जन्म दिन के अवसर पर प्रस्तुत किया था।
  • सन् 1991-92 में अन्तरिम तथा फाइनल बजट को अलग अलग दलों के वित्त मन्त्रियों के द्वारा प्रस्तुत किए गए थे। अन्तरिम बजट यशवन्त सिन्हा ने प्रस्तुत किया था और फाइनल बजट मनमोहन सिंह ने।
  • संसद में बजट प्रस्तुत करने वाली एकमात्र महिला इन्दिरा गांधी हैं, जिन्होंने 1970 में आपातकाल के दौरान संसद में बजट पेश किया था।
  • यद्यपि बजट एक सार्वजनिक करने वाली चीज है किन्तु सार्वजनिक करने के पहले इसे भारत में बेहद गुप्त रखा जाता है।
  • पहले बजट पेपर्स राष्ट्रपति भवन में ही छपा करते थे। सन् 1950 में बजट पेपर लीक हो गए जिसके कारण बाद में बजट पेपर्स को मिंटो रोड स्थित सीक्युरिटी प्रेस में छापा जाने लगा।
  • वर्ष 1980 से बजट पेपर्स की छपाई नार्थ ब्लॉक में होने लगी।
  • बजट प्रस्तुत होने के एक सप्ताह पहले से बजट प्रस्तुत होने तक प्रेस के कर्मचारियों को मन्त्रालय में ही रहना पड़ता है जिस दौरान में उन्हें किसी से भी किसी प्रकार का सम्पर्क करने का कोई अधिकार नहीं होता।
स्वतन्त्रता प्राप्ति पश्चात भारत के वित्त मन्त्रियों की सूचीः

  • लियाकत अली खान 1946-1947 (अन्तरिम सरकार)
  • जॉन मथाई 1948-1949
  • आर.के. षण्मुखम शेट्टी 1949-1951
  • चिन्तमनराव देशमुख 1951-1957
  • टी.टी. कृष्णामाचारी 1957-1958
  • जवाहर लाल नेहरू 1958-1959
  • मोरार जी देसाई 1959-1964
  • टी.टी. कृष्णामाचारी 1964-1967
  • मोरार जी देसाई 1967-1970
  • इन्दिरा गांधी 1970-1971
  • यशवन्तराव चौहान 1971-1975
  • सी. सुब्रमणियम 1975-1977
  • मोरार जी देसाई 1977-1979
  • चौधरी चरण सिंह 1979-1980
  • रामास्वामी वेंकटरामन 1980-1982
  • प्रनब मुखर्जी 1982-1985
  • व्ही.पी. सिंह 1985-1987
  • एस.बी. चव्हान 1987-1990
  • मधु दण्डवते 1990-1991
  • मनमोहन सिंह 1991-1996
  • पी. चिदम्बरम 1996-1998
  • यशवन्त सिन्हा 1998-2002
  • जसवन्त सिंह 2002-2004
  • पी. चिदम्बरम मई 2004 - नवम्बर 2008
  • मनमोहन सिंह  दिसम्बर 2008 - जनवरी 2009
  • प्रनब मुखर्जी  फरवरी 2009 - अब तक

Friday, March 16, 2012

लूट का नया तरीका

कुछ दिन पहले टाटा डोकोमो ने मेरे मो.न. 8109661148 में बिना मेरी सहमति के काल मी ट्यून सेवा शुरू कर दी और पचास रुपये काट लिये। कस्टमर केयर नं. लगाने पर उनके ग्राहक सेवा अधिकारी से बात करने का विकल्प बहुत मुश्किल से मिला क्योंकि वह नं. छुपा हुआ है। शिकायत (कम्प्लेंट नं. PSGO92356739) करने पर सेवा बंद कर दी गई किन्तु कटे हुए रुपये वापस मिलने का सिर्फ आश्वासन दिया गया। उसके बाद हर शिकायत में रुपये वापस मिल जाने का आश्वासन मिलता रहा पर रुपये नहीं मिले। बार-बार शिकायत करने पर ऐसा इन्तजाम कर दिया गया कि मेरा कस्टमर केयर से सम्पर्क ही ना हो सके। अब इसे व्यापार कहें या लूट?

मोबाइल सेवा प्रदाय करने वाली कम्पनियों के करोड़ों ग्राहक हैं। अब यदि टाटा डोकोमो ने मेरे जैसे ही अन्य एक लाख लोगों से इसी प्रकार से पचास-पचास रुपये ले लिये हों तो पचास लाख रुपये तो आ ही गए कम्पनी के पास!

Monday, March 12, 2012

अपने इतिहास की पुस्तकों को पढ़कर क्या अजीब-सा नहीं लगता?

हमारे इतिहास की पुस्तकें हमें बताती हैं कि अहिंसा, महात्मा गांधी, कांग्रेस आदि के कारण अंग्रेजों ने भारत को छोड़ा और हमारा देश स्वतन्त्र हुआ। यह सब पढ़कर बड़ा अजीब-सा लगता है मुझे। सोचने लगता हूँ कि क्या अहिंसा और सत्याग्रह के कारण डाकू, स्वार्थी, क्रूर, कुटिल, अत्याचारी, हत्यारे, निर्दय, अवसरवादी, अतिमहत्वाकांक्षी अंग्रेजों का हृदय परिवर्तन हो गया? मुझे विश्वास नहीं हो पाता, और शायद न कभी होगा, कि ऐसा हुआ था। यही कारण है कि इतिहास की पुस्तकों को पढ़कर मुझे अजीब-सा लगने लगता है। क्या आपको नहीं लगता ऐसा? क्या आप विश्वास करते हैं कि केवल एक व्यक्ति की अगुवाई में एक पार्टी अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से एक परतन्त्र देश को स्वतन्त्र करा सकता है?

जिस काल में अंग्रेजों ने भारत (1947) छोड़ा लगभग उसी काल में उन्हें अपने न्यू जीलैंड  (1947), बर्मा (1948), सीलोन (1948) Palestine (1948) आदि उपनिवेशों को भी छोड़ना पड़ा था। यह तो हो ही नहीं सकता कि अहिंसा और सत्याग्रह का प्रभाव अंग्रेजों पर इतना अधिक पड़ा हो को भारत के अलावा उन्होंने अपने उपरोक्त उपनिवेशों को भी छोड़ दिया हो। स्पष्ट है कि अंग्रेजों के समक्ष अपने उपनिवेशों को छोड़ने की विवशता थी। वास्तविकता यही है कि द्वितीय विश्वयुद्ध ने ब्रिटिश साम्राज्य को खोखला करके रख दिया था और उसके कारण अंग्रेज अपने उपनिवेशों में अपना नियन्त्रण रख पाने में स्वयं को असमर्थ पा रहे थे। इस विवशता के चलते उन्हें निश्चय करना पड़ा कि धक्के देकर निकाले जाने की अपेक्षा सत्ता छोड़कर इज्जत के साथ निकल लेना ही अधिक अच्छा है।

भारत में तो उनकी स्थिति और भी खराब हो गई थी। सेना उनके पास थी नहीं, वे तो स्थानीय सैनिकों को वेतन देकर उन्हीं के बल पर राज्य कर रहे थे। किन्तु समय बीतने के साथ स्थानीय सैनिकों में जागरूकता आ गई थी जिसके कारण अंग्रेजों के लिए भारत में सैनिकों का मिल पाना बहुत मुश्किल कार्य हो गया था। यदि अग्रेज भारत को न छोड़ने का निश्चय करते तो नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज उन्हें रौंद कर रख देती। वैसे भी अंग्रेज कुटिल अवश्य थे किन्तु बुद्धिमान भी थे, वे जानते थे कि किसी भी देश को हमेशा के लिए गुलाम बनाकर नहीं रखा जा सकता, एक न एक दिन उन्हें आजाद करना ही पड़ेगा। भारत को आसानी के साथ छोड़ देने के निश्चय के पीछे उनकी यह बुद्धिमत्ता भी एक कारण थी।

किन्तु इतिहास की पुस्तकों में अंग्रेजों के भारत छोड़ने का पूरा-पूरा श्रेय व्यक्तिविशेष, दलविशेष, अहिंसा और सत्याग्रह को दे दिया गया। क्या यह अजीब नहीं लगता आपको?

Wednesday, March 7, 2012

ले दे कुसुम रंग चूनरिया

फागुन का मदमस्त महीना नई-नवेली दुल्हन को, जिसे ब्याह के बाद मायके में लिवा लाया गया है, अपने सजन से मिलने के लिए आतुर कर रहा है। किन्तु विवशता यह है कि अब गौना होने पर ही उसे अपने प्रिय का संग मिल पायेगा। बगैर चुनरी के गौना होना नहीं है। इसलिए वह अपने प्रिय को सन्देशा भेज रही है -

चुनरी बिन गवन न होय रे सजनवा
ले दे कुसुम रंग चूनरिया

कहवाँ सिरजे चूनरिया हो कहवाँ सिरजे चूनरिया
कहवाँ आन बिकाय हो सजनवा
ले दे कुसुम रंग चूनरिया

धमधा सिरजे चूनरिया हो धमधा सिरजे चूनरिया
रइपुर आन बिकाय हो सजनवा
ले दे कुसुम रंग चूनरिया


"धान के देश में" में पधारने वाले समस्त सुधी जनों को उमंग-तरंग-रंग एवं परस्पर प्रेम का पर्व होली की की शुभकामनाएँ!

Monday, March 5, 2012

सारी साड़ी मेरो भिगोये...

आम्र-मंजरियों एवं महुआ के मदिर पुष्पों की भीनी व मादक सुगन्ध से सुवासित वातावरण! खेतों मे सरसों के फूलों का पीताम्बर! अलसी के अलसाये फूल! पत्रविहीन पलाश एवं सेमल के वृक्षों पर दहकते अंगारों सदृश रक्तिम सुमन! शीतल-मन्द-सुगन्धित बयार! वसन्त की मादकता एवं फागुन की फगुनाहट हर किसी के मन को मुग्ध तथा तन पुलकित कर देता है!

ऐसे में भ्रमरों का गुंजन और कोयल की तान सुनकर भला किसके मुख से गीत के बोल नहीं निकलेंगे? वैसे भी फागुन का यह महीना हर किसी को उन्मत्त बना देता है। मुख से अनायास ही फागगीत मुखरित होने लगता है। वही फागगीत जिसमें 'चन्द्रसखी' ने ब्रज की होरी जीवन्त रूप दिया है -

आज बिरज में होरी रे रसिया
आज बिरज में होरी

घर घर से आई ब्रज बनिता
कोई श्यामल कोई गोरी
रे रसिया आज बिरज में…

इत तें आए कुँअर कन्हाई
उत तें आईं राधा गोरी
रे रसिया आज बिरज में…

कोई लावे चोवा कोई लावे चंदन
कोई मले मुख रोरी
रे रसिया आज बिरज में...

उडत गुलाल लाल भये बादर
मारत भर-भर झोरी
रे रसिया आज बिरज में...

चन्द्रसखी भज बाल कृष्ण छवि
चिर जीवो यह जोड़ी
रे रसिया आज बिरज में...

फागुन का यह महीना बैजनाथ को लिखने पर विवश कर देता है -

मिला बन में मुरलियावाला सखी
मिला बन में मुरलिया वाला सखी।

कोई कहे देखो मोहन हैं आए,
कोई कहे नन्दलाला सखी।
मिला बन में मुरलिया वाला सखी।

धर पिचकारी खड़े ग्वाल सब
कोई धरे है गुलाला सखी।
मिला बन में मुरलिया वाला सखी।

सारी साड़ी मेरो भिगोए,
देखो नन्द का लाला सखी।
मिला बन में मुरलिया वाला सखी।

'बैजनाथ' कहे श्याम सलोना,
लेकिन मन का काला सखी।
मिला बन में मुरलिया वाला सखी।

और 'पल्टू हीरामन' लिखते हैं -

होरी खेलैं घनश्यामा
बिरिज में होरी खेलैं घनश्यामा।

श्याम के संग में सकल पदारथ,
राधा के संग सुख-सामां।
बिरिज में होरी खेलैं घनश्यामा।

श्याम के संग में गोकुल के ग्वाला,
राधा के संग बृजवामा।
बिरिज में होरी खेलैं घनश्यामा।

'पल्टू हीरामन' रंग उड़े रे,
लाल भए गोकुल ग्रामा।
बिरिज में होरी खेलैं घनश्यामा।

धन्य है यह गोप-गोपियों, ग्वालों और श्री कृष्ण का अद्भुत, अलौकिक और आत्मिक प्रेम!

Friday, March 2, 2012

परम्परागत तरीके से होली मनाने के लिए पत्नी से एनओसी लेना जरूरी

होली का त्यौहार समीप आ रहा है, ऐसे में भला मुहल्ले के युवा जागरण समिति के कर्ता-धर्ता लल्लू लाटा और कल्लू काटा भला चुप कैसे बैठ सकते हैं? सो उन्होंने युवा जागरण समिति की बैठक बुला ली। मुहल्ले के समस्त युवकों के बैठक में उपस्थित हो जाने पर लल्लू लाटा ने यह कहते हुए बैठक का शुभारम्भ किया, "प्यारे दोस्तों! होली का त्यौहार नजदीक आ गया है। यह तो आप लोग जानते ही हैं कि हम लोग हर साल होली के त्यौहार को परम्परागत तरीके से मनाते हैं। इस साल भी हमें इस त्यौहार को अपनी परम्परा के अनुसार मनाना है। वैसे तो हमारे मुहल्ले में हमेशा से भांग-ठंडाई के साथ होली मनाने का रिवाज रहा है। पर अब जमाना बदल गया है तो परम्पराएँ भी बदल गई हैं। यही कारण है कि पिछले दस-पन्द्रह सालों से हम लोग दारू-मुर्गा के साथ होली मना रहे हैं। इस साल होली में क्या और कैसे किया जाए, इसी बात पर विचार करने के लिए आज हम सब लोग यहाँ पर इकट्ठे हुए हैं।"


"इसमें विचार करने की क्या बात है? हर साल की तरह आप बस इतना बता दीजिए कि हम लोगों को सहयोग राशि कितनी देनी है। बाकी दारू-मुर्गा आदि का सारा इन्तिजाम आप हर साल तो करते ही हैं ना!" टिल्लू ने कहा।

लल्लू लाटा ने कहा, "हाँ पिछले साल तक मैं और कल्लू दोनों मिल कर सारा इन्तिजाम करते थे, पर अब हम दोनों ने डिसाइड किया है कि इस साल हम ये इन्तिजाम नहीं करेंगे।"

"वो क्यों?" चम्पू ने पूछा।

सभी लोगों ने लल्लू लाटा की ओर उत्सुकता से देखना शुरू कर दिया मानो कि चम्पू के प्रश्न का समर्थन कर रहे हों।

सब लोगों को अपनी ओर तकते हुए देखकर लल्लू लाटा ने कहना शुरू किया, "वो इसलिए कि पिछले साल टिल्लू और चम्पू की पत्नियों को जब पता चला कि उनके पतियों ने हमारे साथ परम्परागत तरीके से होली मनाई है तो उन दोनों ने अपने पतियों को खूब झाड़ा और मुहल्ले भर की औरतों के बीच ढ़िंढ़ोरा पीटना शुरू कर दिया कि लल्लू लाटा और कल्लू काटा दोनों मिल कर हमारे सीधे-सादे पतियों को गलत रास्ते में ले जा रहे हैं। यह तो हम सभी जानते हैं कि टिल्लू और चम्पू दोनों ही मौज-मस्ती का कोई भी मौका कभी भी नहीं छोड़ते पर पत्नियों को उसके बारे में पता भी नहीं चलने देते। यही कारण है कि उनकी पत्नियाँ उन्हें सदाचार का अवतार मानती हैं। बदनाम तो मैं और कल्लू हैं जो आप सभी के लिए सब प्रकार का इन्तिजाम करते हैं।"

कल्लू काटा ने कहा, "अरे उन दोनों ने तो मेरी और लल्लू जी की मिसेज के पास आकर कह दिया था कि तुम लोग अपने मिस्टर को सम्भाल कर नहीं रखती हो, आज के जमाने में भी पतियों से दबी रहती हो। बस फिर क्या था हम दोनों की पत्नियाँ भी शेरनी बन गई थीं। उन्हें फिर से पटरी पर लाने के लिए बहुत दिन लग गए थे हम दोनों को।"

लल्लू लाटा ने फिर कहा, "अपने पतियों को वो चाहें जितना भी झाड़ें, हमें उससे कुछ भी लेना-देना नहीं है, अगर झाड़ू बेलन का स्टॉक कम हो जाए तो हम उन्हें और दे सकते हैं। पर हमें बदनाम करने का उनको कोई अधिकार नहीं है। इसीलिए हम दोनों ने डिसाइड किया है कि इस साल हर कोई अपना इन्तजाम खुद करेगा।"


लल्लू के इस कथन से वहाँ उपस्थित अधिकतर लोगों के चेहरे बुझ-से गए क्योंकि वो लोग भी टिल्लू और चम्पू के जैसे ही थे। पीते जरूर थे पर कोशिश यह भी रहती थी कि कोई देख ना ले, कोई जान ना ले। दारू दुकान जाकर दारू खरीद कर लाना तो वो कभी कर ही नहीं सकते थे, क्या पता कौन पहचान वाला देख ले।

आखिर बल्लू ने हिम्मत करके खुशामदी लहजे में कहना शुरू किया, "अरे लल्लू-कल्लू भाई, आप लोग ऐसे नाराज ना हों। आप लोगों के बदौलत ही तो हम मुहल्ले में पर्व-त्यौहार आदि अच्छे से मना पाते हैं। फिर हर कोई अलग-अलग होली मनाएगा तो फिर मजा ही क्या आएगा? हम सब आपसे रिक्वेस्ट करते हैं कि आप हर साल की तरह से इस साल भी सारा इन्तिजाम करें। हम प्रामिस करते हैं कि हम लोग अपनी पत्नियों को भनक भी नहीं लगने देंगे।"

लल्लू लाटा बोले, "देखो भाई लोगों! आप लोग कितना भी क्यों ना छुपाओ, पत्नियाँ तो जान ही जाएँगी। अगर आप लोग चाहते हैं कि मैं और कल्लू दोनों इस साल भी इन्तजाम करें तो हमारी एक शर्त है। आप सभी को अपनी-अपनी पत्नियों से "एनओसी" लाकर हमें देना होगा, वो भी लिखित में। अगर आप लोगों की पत्नियाँ निम्न प्रारूप में लिख कर देंगी कि -
मैं श्रीमती ..........................., पत्नी श्री................ एतद् द्वारा घोषणा करती हूँ कि मेरे पति यदि होलिका दहन की रात्रि से लेकर धुलेड़ी के सायंकाल तक मुहल्ले की परम्परा के अनुसार होली मनाएँगे तो मुझे किसी भी प्रकार का ऐतराज नहीं होगा।

हस्ताक्षर श्रीमती ..........................."

तभी हम इस बार की होली का इन्तजाम करेंगे अन्यथा नहीं। एनओसी लेने के लिए चाहे आप अपनी बीबियों के पैर पकड़ो या उनके सामने नाक रगड़ो।"

सभी लोगों ने इस शर्त को वापस लेने के लिए बहुत मिन्नतें की पर लल्लू और कल्लू अपनी बात पर अड़े रहे और अन्ततः उन्हे उनका शर्त मानने के लिए मजबूर होना पड़ा।

अब हमें जानकारी मिली है कि बैठक से वापस जाने के बाद से अब तक उनकी पत्नियों की हर फरमाइश पूरी होती जा रही है, हरेक पति अपनी पत्नी के सामने भीगी बिल्ली बना हुआ है। पत्नियों को सुबह उठने पर बिस्तर पर ही चाय मिल जा रही है, किचन में आने पर उन्हें जूठे बर्तनों के स्थान पर मँजे-धुले बर्तन दिखाई देते हैं। साड़ियाँ धुली हुई और प्रेस की हुई मिल रही हैं। अब कहाँ तक बताएँ, आप तो स्वयं समझदार हैं!

हाँ तो, हमारे मुहल्ले की होली में आप सभी लोग भी सादर आमन्त्रित हैं पर इसके लिए लल्लू-कल्लू की शर्त का पालन करना होगा आपको।

 
Design by Free WordPress Themes | Bloggerized by Lasantha - Premium Blogger Themes | fantastic sams coupons