धान के देश में!
जी.के. अवधिया का ब्लॉग
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पानी
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Thursday, July 8, 2010
इक समुन्दर ने आवाज दी मुझको पानी पिला दीजिये
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पानी का कुछ भी रंग नहीं होता पर जब पानी उतरता है तो बड़ों-बड़ों का रंग उतर जाता है। एक समय था जब पानीदार लोगों की इज्जत हुआ करती थी पर जमाने क...
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Monday, April 19, 2010
कहाँ गईं वो घड़ों-सुराहियों की दूकानें
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गर्मी की शुरुवात होते ही घड़ों-सुराहियों की दूकानें दिखनी शुरू हो जाती थीं किन्तु आज इन दूकानों को खोजना पड़ता है। मिट्टी के घड़ों में शीतल किय...
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Friday, February 19, 2010
प्रियतम तो परदेस बसे हैं, नयन नीर बरसाये रे
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नीर अर्थात् सलिल, नीरद, नीरज, जल या पानी! यह नीर कभी नयन से बरसता है तो कभी मेघ से बरसता है। नयन से नीर जहाँ गम में बरसता है वहीं खुशी में भ...
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