Monday, May 19, 2008

हमारे देश के अग्रणी संस्थान की हिन्दी?

यदि आप इसे पूरा पूरा पढ़ सकते हैं तो आपसे निवेदन है कि कृपया मुझे भी बताने का कष्ट करें कि क्या लिखा है

भारतीय स्टेट बैंक की हिन्दी वेबसाइट

(windows xp - firefox)
(windows xp - internet explorer)

P.S.: मुझे ज्ञात हुआ है कि कहीं कहीं यह सही हिन्दी दिखाई दे रही है, किन्तु मेरे कम्प्यूटर पर ऐसी ही दिखाई देती है जैसे कि स्क्रीनशॉट्स में दर्शाया गया है। अब प्रश्न यह है कि कितने लोगों को यह सही दिख रहा है और कितने को नहीं? क्या अग्रणी संस्थान के हिन्दी वेबसाइट को कही पर ठीक-ठीक और कहीं पर अस्पष्ट दिखना चाहिये? क्या unicode font के विषय में अब तक अग्रणी संस्थान को जानकारी नहीं है?

जुतियाना

यह तो हम सभी जानते हैं कि राजनीति, खास करके आज के जमाने की राजनीति, और जुतियाने में चोली दामन का सम्बन्ध है। जिस नेता के पास जुतियाने वाले चम्मचों की टीम नहीं होती, वास्तव में वह असली नेता ही नहीं होता। जुतियाना नेताओं के चम्मचों का जन्मसिद्ध अधिकार होता है। शक्ति प्रदर्शन करके अपना बड़प्पन स्वीकार करवाने का एक मात्र माध्यम जुतियाना ही है।


जब भी इंसान को गुस्सा आता है, किसी न किसी को जुतियाने का मन हो ही जाता है। अक्सर तो होता यह है कि गुस्सा किसी और पर आता है और जुतियाया कोई और जाता है। अब आप अपने से जादा ताकतवर को नहीं जुतिया सकते ना, पर गुस्सा शांत करने के लिये जुतियाना जरूरी भी है। इसीलिये जब आफिस में बॉस और घर में बीबी पर गुस्सा आता है तो चपरासी और नौकर ही जुतियाये जाते हैं।

'श्रीलाल शुक्ल' जी ने "राग दरबारी" में जुतियाने का जो तरीका बताया है वही तरीका हमें जुतियाने का सबसे अच्छा लगा। वास्तव में उससे अच्छा तरीका और हो ही नहीं सकता। उनके तरीके के अनुसार यदि किसी को जुतियाना हो तो उसे गिन कर 100 जूते लगाने चाहिये, न एक कम और न एक ज्यादा। और गिनती के 93-94 तक पहुँचने पर भूल जाना चाहिये कि अब तक कितने जूते लग चुके हैं। अब भूल गये तो फिर से जुतियाना तो शुरू करना ही पड़ेगा।


हम सोच रहे थे कि जुतियाना शब्द तो जूते से बना है। तो जब इस संसार में जूता नहीं हुआ करता था तो लोग भला कैसे अपना गुस्सा उतारते रहे होंगे? शायद जूते की जगह खड़ाऊ लगा कर। तो 'जुतियाने' को अवश्य ही 'खड़ुवाना' कहा जाता रहा होगा। और शायद उस जमाने में नेता के चम्मच के बजाय राजाओं के मुसाहिब और खुशामदी लोग 'खड़ुआते' रहे होंगे।


जुतियाने का सबसे बढ़िया प्रयोग तो फिल्म 'शोले' में किया गया था संजीव कुमार के द्वारा अमजद खान को बड़े बड़े कील वाले जूते खिलवा कर। सच्ची बात तो यह है कि जो जितना अधिक जुतियाने का प्रयोग करेगा वह उतना ही आगे बढ़ेगा। हम तो आज तक आगे नहीं बढ़ पाये क्योंकि हमें जुतियाना ही नहीं आता।

Sunday, May 18, 2008

न बोलते हुये भी बहुत कुछ बोलते हैं हम

बोलना क्या है? भावों तथा विचारों की अभिव्यक्ति। किन्तु भावों तथा विचारों को अभिव्यक्त करने के लिये मुँह से बोलना ही केवल एक माध्यम नहीं है। आपका पूरा शरीर आपके भावों और विचारों को अभिव्यक्त करता है। यदि आपने कभी रेलगाड़ी के जनरल बोगी में यात्रा की है तो याद करें कि क्या हुआ था। सीट पर बैठा व्यक्ति और फैल कर बैठ गया था। उसने बिना कुछ बोले आपको बता दिया कि वहाँ पर आपके बैठने की कोई गुंजाइश नहीं है, वह आपको जरा सी भी जगह नहीं देने वाला। आप पुस्तक पढ़ने में तल्लीन हैं और बच्चा वहाँ पर शोर मचा रहा है। आप सिर्फ क्रुद्ध भाव से बच्चे को घूरते हैं और बच्चा वहाँ से खिसक लेता है। आपने बच्चे को बिना कुछ कहे ही बता दिया कि वह आपको 'डिस्टर्ब' कर रहा है और बच्चे ने समझ भी लिया।

जब हम अकेले होते हैं, किसी प्रकार का 'काम्युनिकेशन' नहीं होता किन्तु एक से दो या अधिक व्यक्ति होते ही 'काम्युनिकेशन' स्वतः शुरू हो जाता है। हम हर पल एक दूसरे से काम्युनिकेट करते रहते हैं। आपके समक्ष चाहे कोई परिचित हो या अजनबी, आप उसके साथ काम्युनिकेट करेंगे ही और वह भी आप के साथ काम्युनिकेट करेगा। काम्युनिकेट करना हमारे व्यवहार का एक अभिन्न अंग है।

आपसी सम्बन्धों में मधुरता या कटुता इसी काम्युनिकेशन के ही परिणाम है। सही और उचित काम्युनिकेशन से सम्बन्धों में मधुरता बढ़ती है और गलत काम्युनिकेशन से कटुता। काम्युनिकेशन का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। पिता-पुत्र, पति-पत्नी, भाई-भाई, मित्र-मित्र आदि में प्रेम या मनमुटाव का कारण भी यही काम्युनिकेशन है। हमारा काम्युनिकेशन हमारे व्यवहार को प्रदर्शित करता है।

काम्युनिकेशन को सीधा (direct) और स्पष्ट (clear) होना चाहिये अपरोक्ष तथा अस्पष्ट काम्युनिकेशन से हमेशा गलत संदेश जाने की आशंका बनी रहती है। यदि आप किसी को पाँच मिनट इंतजार करने के लिये कहकर आधे घंटे बाद वापस आते है तो यह आपका गलत काम्युनिकेशन होगा। गलत काम्युनिकेशन से संबंधों के बिगड़ने के पूरे अवसर बन जाते है।

एक सीधा व सरल व्यवहार वाला व्यक्ति बनने के लिये हमें हमेशा अपने काम्युनिकेशन का ख्याल रखना चाहिये।

Saturday, May 17, 2008

हिन्दी ब्लोग्स से कमाई का एक और उपाय

हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापनों को क्या हुआ?

पिछले एक-दो दिनों से मैं देख रहा हूँ कि हिन्दी ब्लोग्स में गूगल के सिर्फ सार्वजनिक सेवा विज्ञापन ही प्रकाशित हो रहे हैं। तो क्या अब गूगल ने हिन्दी ब्लोग्स में सिर्फ अपने सार्वजनिक सेवा विज्ञापन ही दिखाने की ठान ली है? एक तो हिन्दी ब्लोग्स के एडसेंस विज्ञापनों पर क्लिक करने वालों की संख्या ही नगण्य है। ले दे कर यदि कभी-कभार कुछ सेंट की कमाई हो भी जाती थी तो सार्वजनिक सेवा विज्ञापनों से वह भी बंद हो जायेगा।

या फिर गूगल चुपचाप अपने तकनीक में कोई बड़ा परिवर्तन कर रहा है ताकि हिन्दी ब्लोग्स में हिन्दी शब्दों अंग्रेजी अनुवाद वाले शब्दों के अनुरूप विज्ञापन प्रकाशित हो सकें। चूँकि गूगल का स्वभाव हमेशा लोगों को विस्मित कर (surprise) देने का रहा है, यही लग रहा है कि अवश्य ही गूगल अपने तकनीक में कोई बड़ा परिवर्तन कर रहा है।

हिन्दी ब्लोग्स से कमाई का एक और उपाय

हिन्दी ब्लोग्स से कमाई का एक और उपाय है अपने ब्लोग में एफिलियेट विज्ञापन प्रदर्शित करना। लोग आपके एफिलियेट विज्ञापन को क्लिक कर के विज्ञापनदाता से यदि उनके उत्पाद या सेवाएँ खरीदते हैं तो कमीशन के रूप में आपकी भी कमाई होती है। वैसे तो अमेजान, क्लिक बैंक, पेडॉटकाम को सबसे अच्छा एफिलियेट प्रोग्राम्स माना जाता है क्योंकि इनमें कमाई अधिक होती है। किन्तु ये सभी प्रोग्राम्स हिन्दी ब्लोग्स के लिये उपयुक्त नहीं है क्योंकि इन प्रोग्राम्स में भारतीय उत्पादों और सेवाओं का स्थान नहीं के बराबर है। हाँ, शादी.कॉम, मैत्री.कॉम जैसे मैट्रिमोनियल एफिलियेट्स प्रोग्राम्स से कुछ कमाई होने की उम्मीद की जा सकती है।

मैनें dgmpro.com के एफिलियेट प्रोग्राम्स को हिन्दी ब्लोग्स/वेबसाइट्स के लिये अधिक उपयुक्त पाया है क्योंकि वहाँ पर भारत देश के लिये एक अलग ही विभाग है जिसके अंतर्गत एयर बुकिंग, होटल बुकिंग, इन्डियन शॉपिंग आदि एफिलियेट्स प्रोग्राम्स हैं जो भारतीय पाठकों को अधिक आकर्षित करते है। यात्रा, मेकमाइट्रिप, एयरटेल, रेडिफ, सिफी आदि एफिलेट कार्यक्रम, जो भारतीयों में अधिक लोकप्रिय है, dgmpro के अंतर्गत आते है।

पिछले कुछ समय से मैं अपने हिन्दी ट्युटोरियल वेबसाइट में उपरोक्त इन एफिलियेट विज्ञापनों को प्रदर्शित कर रहा हूं और उनसे अधिक नहीं पर कुछ तो कमाई हो रही है।

आप भी यदि चाहे तो अपने ब्लोग्स में उपरोक्त एफिलियेट विज्ञापनों को प्रदर्शित करके कुछ लाभ उठा सकते है।

Friday, May 16, 2008

एक अचम्भा हमने देखा

किसी एक की चार-पाँच मिलकर खूब कुटाई करें, दे घूँसे पे घूँसा, दे लात पे लात कि सामने वाला अधमरा हो कर गिर जाये, तुर्रा यह कि बावजूद अधमरा होकर गिरे रहने के भी यदा कदा धुनाई जारी ही रहे कि इतने में हीं अधमरे आदमी के बदन में अचानक बला की ताकत आ जाये और चारों-पाँचो की ऐसी धुलाई करना शुरू कर दे कि वे लोग तौबा-तौबा करने लगें अचम्भा नहीं है और तो क्या है? भैया, आपके लिये भले न हो, हमारे लिये तो अचम्भा ही है। कहाँ से आ जाती है अधमरे के बदन में इतनी ताकत? क्या कोई देवता चढ़ जाता है? या फिर उस पर शैतान सवार हो जाता है? जी हाँ मैं WWE की बात कर रहा हूँ जिसके कि हमारे खली साहब भी आजकल बहुत बड़े हीरो हो रहे हैं।

अब वो क्या है भइ कि हम ठहरे पुराने आदमी। हमें तो ये लड़ाई ही समझ में नहीं आती। इस लड़ाई में तो लगता है कि अधमरा हो जाना एक फार्मूला है, वैसे ही जैसे कि हमारी पुरानी फिल्मों में दारासिंह किंग-कांग से पहले खूब मार खाये और बाद में खाये हुये मार को 10% मासिक की दर से ब्याज के साथ वापस करे। या फिर हीरो विलेन को मारने का तब तक खयाल ही न करे जब तक कि उसके नाक से खून न निकले और वह उस खून को अपने हाथ पोछ कर देख न ले। तो अधमरा हो जाने के बाद बदन में शैतान समाना हमारे ही बॉलीवुड फार्मूले की नकल है। हम भारतीयों की चीजों को एक दूसरा रूप दे देना तो सदियों से चलता चला आ रहा है। अब देखिये न, शताब्दियों पहले लोग हमारे अंकों को यहाँ से ले गये और बाद में उसे अंग्रेजी अंकों का रूप देकर हम लोगों को ही परोस दिया।

हाँ तो मैं लड़ाई की बात कर रहा था। अजीब लड़ाई है यह। कोई नियम नहीं, कोई कानून नहीं। हमारे यहाँ तो तलवार वाला तलवार वाले से और गदा वाला गदे वाले से ही लड़ा करता था। निहत्थे पर हाथ नहीं उठाया जाता था। किसी के मूर्छित हो जाने पर फिर वार नहीं किया जाता था। पर इस लड़ाई में तो सब जायज है। जैसी मर्जी आये मारो, बस कूटते रहो, धुनते रहो। देखने वालों को मजा आता है। वास्तव में मानव सदा से ही हिंसा प्रेमी रहा है, उसे हिंसा में सदा आनन्द आता रहा है, हिंसा करके या हिंसा देख कर मजा लेना उसका मूल स्वभाव है। खैर यह कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात है इंसान के हिंसक स्वभाव का फायदा उठा कर कमाई करना।

हमें तो लगता है कि WWE के ये सारे लड़ाकू जयद्रथ के वंशज हैं। महाभारत की लड़ाई में एक योद्धा से अनेक योद्धा मिल कर युद्ध करने का नियम नहीं होने के बाद भी जयद्रथ ने और योद्धाओं को फुसला कर अपने साथ मिला लिया था और अभिमन्यु पर एक साथ सात-सात योद्धाओं ने युद्ध किया था। पर समझ में नहीं आया कि जयद्रथ के वंशज अमेरिका में जा कर कब बस गये।

कुछ भी हो, ये दानवों जैसे दिखने वाले लड़ाकुओं की लड़ाई खूब लोकप्रिय हो रहा है अपने देश में, खास कर युवा और किशोर वर्ग में। हमने बच्चों से कहा बेटा जरा डिस्कव्हरी चैनल लगाना तो वे कहते हैं नहीं जी हम तो WWE देखेंगे, अभी तो 'खली' आने वाला है। अब आज के जमाने में बच्चों के आगे बड़ों की चलती ही कहाँ है? सो हम चुपचाप वहाँ से खिसक लिये अपने कम्प्यूटर के कीबोर्ड में खिटिर पिटिर करने लगे। नतीजे के रूप में जो आया उसे अब आप पढ़ रहे हैं और पढ़ कर पछता रहे हैं कि आखिर इस लेख का तात्पर्य क्या है? अब हम क्या और क्यों लिख रहे हैं हमें ही नहीं पता तो आपको क्या बतायें! हाँ आप लोग तो विद्वजन हैं, इसलिये कुछ न कुछ तात्पर्य निकाल ही लेंगे। यदि कोई तात्पर्य निकल जाये तो हमें भी बताना न भूलियेगा।