Saturday, November 22, 2008

यदि कम्प्यूटर के हार्डड्राइव्ह्स न खुलें तो...

"मेरे कम्प्यूटर के हार्डड्राइव्ह्स नहीं खुल रहे हैं।" कल मेरे एक परिचित ने आकर मुझसे कहा, "क्या आप इसे ठीक कर सकते हैं?"

मैंने कहा, "चलिये देख लेते हैं।"

मैंने उनके कम्प्यूटर में जब माय कम्प्यूटर से किसी हार्डड्राइव्ह को खोलने की कोशिश की तो "ओपन विथ" वाला डॉयलाग बाक्स स्क्रीन पर दिखने लगा। मुझे सारा मामला समझ में आ गया और समस्या मात्र दो मिनट में सुलझ गई।

मेरे मन में विचार आया कि ऐसा कभी भी किसी के साथ हो सकता है। इसीलिये ये पोस्ट लिख मारा।

वास्तव में यह एक वायरस की करतूत है जो कि आपके कम्प्यूटर में जबरन autorun.inf नामक एक सिस्टम फाइल बना कर उसमें चुपचाप बैठ जाता है और उस फाइल को ऐसा छुपा देता है कि आपको खोजे न मिले।

इस समस्या से निजात पाने के लिये निम्न विधि अपनायें
  1. स्टार्ट/रन को क्लिक करके cmd टाइप करे और एन्टर बटन दबायें या ओ के को क्लिक करें।
  2. \cd टाइप करें।
  3. attrib -r -h -s autorun.inf टाइप करें।
  4. del autorun.inf टाइप करें। इससे c ड्राइव्ह में स्थित वायरस वाला फाइल डिलीट हो जायेगा।
  5. अब d: टाइप करें ओर स्टेप 4 तथा 5 को दुहरायें।
  6. इसी प्रकार से अन्य ड्राइव्ह्स के वायरस वाले autorun.inf को डिलीट कर लें।
बस आपकी समस्या सुलझ गई!

Monday, November 17, 2008

हमने भी खोल लिया अपना आनलाइन ई-बुक स्टोर

बहुत दिनों से जानने की इच्छा थी कि क्या वाकइ आनलाइन स्टोर से कुछ कमाया जा सकता है? इसीलिये आज से हमने भी अपना एक आनलाइन ई-बुक स्टोर खोल लिया है।

फिलहाल तो इस स्टोर में वे अंग्रेजी ईबुक्स ही हैं जो कि स्क्रिप्ट खरीदने के साथ मिली हैं किन्तु बहुत जल्दी ही इसमें अब हिन्दी के ईबुक्स भी डाल देने की योजना है। फिलहाल तो उपलबद्ध अंग्रेजी ईबुक्स की कीमत को मैंने बहुत कम कर दिया है।

तो यह है मेरा व्यावसायिकता की ओर बढ़ने का पहला कदम।

Saturday, November 15, 2008

ये चंदा रूस का ना ये जापान का


ये चंदा रूस का ना ये जापान का

ना ये अमरीकन प्यारे

ये तो है हिन्दुस्तान का!


जी हाँ, भारत का पहला मानव रहित अंतरिक्ष यान, चंद्रयान, 1, अंततः चंद्रमा की सतह पर पहुँच ही नहीं गया वरन भारतीय तिरंगे से चित्रित "प्रोब" को भी चांद की सतह पर रख दिया।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अनुसार भारतीय ध्वज के साथ चित्रित प्रोब ने दिनांक 14-11-2008 को भारतीय समय के अनुसार रात्रि 8-34 बजे (1504 GMT) चंद्रमा की सतह को छुआ।

हमारे वैज्ञानिकों ने ऐसे चन्द्रयान, जो कि चंद्रमा के वायुमंडल की संरचना को मापने सहित विभिन्न प्रयोगों के लिये सक्षम है, को सफलतापूर्वक चांद पर भेज कर साबित कर दिया है कि हमारा भारत भी किसी से कम नहीं है, निश्चित रूप से अब वह एक विश्व शक्ति के रूप में उभर रहा है।

चंद्रयान 1, जिसे कि भारतीय अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित किया गया था, ने तीन हफ्ते पहले चंद्रमा की परिक्रमा करना आरम्भ किया था तथा दिनांक 14-11-2008 को भारतीय समय के अनुसार रात्रि 8-34 बजे 30kg वजन वाले तिरंगे से चित्रित प्रोब को चंद्रमा की सतह पर रख कर मिशन के पहले चरण का समापन किया।

Monday, November 10, 2008

आखिर हिन्दी ब्लोग्स सामान्य पाठकों को कब आकर्षित करेंगे?

हिन्दी ब्लोग्स की टिप्पणियों को पढ़ कर यही प्रतीत होता है कि को आज भी केवल हिन्दी ब्लोगर्स ही एक दूसरे के ब्लोग्स को पढ़ते हैं। सामान्य पाठकों का उनके प्रति कोई आकर्षण कहीं पर भी दृष्टिगत नहीं होता। यह बात तो है कि अभी भी भारत में इंटरनेट का प्रयोग अपेक्षाकृत बहुत कम है। किन्तु यह भी सत्य है कि "ब्लोग" से अब लोग अपरिचित नहीं रहे हैं। अमिताभ बच्चन साहब के ब्लोग(जो कि अंग्रेजी में है) की सैकड़ों टिप्पणियाँ, जो कि सामान्य वर्ग के लोगों के द्वारा की गई होती हैं, सिद्ध करती हैं कि पाठकों की संख्या इतनी भी नगण्य नहीं है कि हमें हिन्दी ब्लोग्स के लिये पाठक ही न मिल पायें। अतः लगता है कि यदि कोई खामी है तो कहीं न कहीं हमारे ब्लोग लेखन में ही है। अब समय आ गया है कि हम अपने लेखन की स्वयं ही समालोचना करें और खामियों को दूर कर के कुछ ऐसा लिखें जो कि आम लोगों को आकर्षित कर सके।

Saturday, November 8, 2008

लिख ले बेटा जो कुछ भी लिखना है! पर कोई पढ़ेगा तब ना?

बहुत दिन हो गये कुछ लिखे हुये। सोचा कुछ लिख लिया जाये। पर सूझ नहीं रहा था कि क्या लिखूँ। भीतर से आवाज आ रही थी कि लिख ले बेटा जो कुछ भी लिखना है! पर कोई पढ़ेगा तब ना?

मैने भी आवाज देने वाले से पूछा, "कोई क्यों नहीं पढ़ेगा?"

"तू अच्छी तरह से जानता है कि हर कोई सिर्फ अपनी पढ़वाना चाहता है, दूसरों की पढ़ना नहीं। तू ही दूसरों को कब कब पढ़ता है?"

"ऐसे में हिन्दी आगे कैसे बढ़ेगी?"

"तू क्यों फिकर कर रहा है? क्या तूने ठेका ले लिया है हिन्दी को आगे बढ़ाने का? तू तो बस ये सोच कि लोग तुझे कैसे पढ़ेंगे, छोड़ हिन्दी-विन्दी की फिकर।"

"अच्छा तो यही बता दो कि लोग मुझे पढ़ें इसके लिये मैं क्या करूँ?"

"ये तो तेरी समस्या है, इसे तू ही सुलझा। अपुन को नहीं पता कि लोग तुझे कैसे पढ़ेंगे।"

"अरे कुछ तो बता।"

कोई जवाब नहीं....

"बता भी ना यार।"

फिर वही चुप्पी ....

फिर हमने भी सोच लिया कि लिया कि लिखेंगे जरूर पर किसी को पढ़वाने के लिये नहीं, अपनी संतुष्टि के लिये। आखिर तुलसीदास जी ने भी तो "स्वांतः सुखाय" लिखा था, किसी को पढ़वाने के लिये नहीं। तो हमें भी क्या उनका अनुसरण नहीं करना चाहिये?