ज्ञानदत्त जी के पोस्ट "वर्तमान पीढ़ी और ऊब" के प्रतिक्रियास्वरूप लिखे गये कुछ पोस्ट मैने पढ़े (ज्ञानदत्त जी से प्रेरित, नयी पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी, ये फासला क्यों?, मानसिक हलचल की हलचले)। इन्हें पढ़ कर लग रहा है कि हमारे बीच कुछ गलफहमियाँ सी उत्पन्न हो गई है। इससे पहले कि गलफहमी और बढ़े उसे खत्म कर देने में ही भलाई है।
मैं समझता हूँ कि ज्ञानदत्त जी का विरोध ऊब से था, न कि नई पीढ़ी से। हाँ उन्होंने ऊब को वर्तमान पीढ़ी के साथ सीधा जोड़ दिया यह मेरी समझ में ठीक नहीं हुआ (ज्ञानदत्त जी कृपया अन्यथा न लें)। ऊब तो पुरानी पीढ़ी में भी थी। मैं स्वयं जब दसवीं कक्षा में था तो कोर्स में शामिल चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी की विख्यात कहानी "उसने कहा था" को पहली बार पढ़ कर ऊब गया था क्योंकि उसे पहली बार पढ़कर मैं समझ नहीं सका था। उस ऊब के कारण उस कहानी को फिर से पढ़ने की इच्छा ही नहीं हो रही थी। पर हर साल परीक्षा में उस कहानी से कम से कम एक प्रश्न अवश्य ही आता था, मुझे उस कहानी को समझने के लिये बार बार पढ़ना ही पड़ा। आज "उसने कहा था" मेरी प्रिय कहानियों में से एक है। हाँ तो मैं कह रहा था कि ऊब सिर्फ वर्तमान पीढ़ी में ही नहीं है, पुरानी पीढ़ी में भी थी। किन्तु आज हर काम के लिये शार्टकट अपनाने, जैसे कि पाठ्यपुस्तक के पाठ न पढ़ कर परीक्षा गाइड पर निर्भर रहने, का चलन बढ़ गया है। यह ऊब के बढ़ जाने के परिणामस्वरूप ही है।
यह भी सही है कि ऊब जाना एक स्वाभाविक क्रिया है जिससे कोई भी नहीं बच सकता चाहे वह वर्तमान पीढ़ी का हो या पुरानी पीढ़ी का। किन्तु ऊब के कारण हम शार्टकट रास्ते न अपना कर यदि उब को सहने और ऊब से लड़ने का प्रयास करें तो क्या यह अधिक अच्छा नहीं होगा?
और फिर पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच कुछ न कुछ दूरी याने कि जनरेशन गैप तो सदा से ही चलती आई है। जब हमारी पीढ़ी युवा थी अर्थात् उन दिनों की नई पीढ़ी थी तो हमें भी अपनी पुरानी पीढ़ी दकियानूस लगा करती थी। ईश्वर ने मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा बनाया है कि यह दूरी कभी भी मिट नहीं पायेगी। पुरानी पीढ़ी सदा ही अतीत में जीती है और अतीत को वर्तमान से अच्छा समझती है और यह भी स्वाभाविक है कि वर्तमान पीढ़ी वर्तमान को अतीत से अच्छा समझती है। दोनों पीढ़ियों में "कुत्ते बिल्ली का बैर" था, है और हमेशा रहेगा।
तो हम यदि हम पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी की बात को भूलकर ज्ञानदत्त जी के पोस्ट को पढ़ें तो सारी गलफहमियाँ अपने आप दूर हो जायेंगी।
Thursday, December 25, 2008
Tuesday, December 23, 2008
मेरे ब्लॉग की पाठक संख्या क्यों कम है?
और किसी के मन में यह प्रश्न उठे या न उठे पर मेरे मन में तो प्रायः ही यह प्रश्न उठता है कि मेरे ब्लॉग की पाठक संख्या क्यों कम है?
मैं यह समझता हूँ कि यह सिर्फ आपकी लिखी सामग्री है (content) जो कि पाठकों को खींच कर आपके ब्लॉग में लाती है। अंग्रेजी की उक्ति हैः
'Content is king.'
अर्थात् यदि हिन्दी में कहें तो "सामग्री ही साम्राज्ञी है।"
तो जब भी आप अपने ब्लॉग की सामग्री लिखें तो यह सोच कर न लिखें कि कुछ न कुछ तो लिखना है क्योंकि ऐसी सामग्री को कोई भी पाठक पढ़ना पसंद नहीं करता। फिर ऐसे लेखन का क्या फायदा जिसे कि कोई पढ़े ही नहीं। यह तो वही बात हुई कि जंगल में मोर नाचा किसी ना देखा। तो लिखते समय हमेशा अपनी सामग्री की उत्कृष्टता ध्यान रखें।
पाठक क्या चाहता है?
अपने लेख को लोकप्रिय बनाने के लिये यह जानना बहुत जरूरी है कि पाठक क्या चाहता है। यदि पाठक को उसके पसंद की सामग्री मिलेगी तो वह उसे अवश्य ही पढ़ेगा। तो आखिर पाठक क्या चाहता है? वास्तव में पाठक संतुष्टि चाहता है। वह चाहता है कि उसे घिसी पिटी चीज पढ़ने को न मिले। उसने जो कुछ भी पढ़ा है उससे उसे कुछ नई जानकारी मिली है, उसके ज्ञान में कुछ वृद्धि हुई है।
तो ऐसे लेख पढ़ कर जिससे पाठक को कुछ भी प्राप्त नहीं होता, उसे क्षोभ होता है और जिस ब्लॉग में उसे ऐसी सामग्री पढ़ने को मिली है उस ब्लॉग से वह कन्नी काट लेता है। इसके विपरीत यदि उसे किसी ब्लॉग की सामग्री को पढ़कर कुछ नयापन मिले, उसे संतुष्टि हो तो वह उस ब्लॉग का चाहने वाला बन जाता है।
रोज रोज आखिर नई जानकारी लायें कहाँ से?
यह यक्षप्रश्न है कि आखिर रोज हम अपनी सामग्री में कहाँ से नयापन लायें? सच्चाई भी यही है कि हम हमेशा नई जानकारी नहीं प्राप्त कर सकते। पर हाँ किसी पुरानी जानकारी को ऐसी शैली में प्रस्तुत कर सकते हैं कि उसमें नयापन झलकने लगे। प्रायः सभी सफल लेखक यही करते हैं और इस प्रकार के प्रस्तुतीकरण को पाठक भी पसंद करते हैं।
लिखना शुरू करने के पहले
अपने लेख को आनन फानन में प्रकाशित न करें। पहले उसे कम से कम एक बार पढ़ें, दो बार पढ़ें तो और भी अच्छा है। विचारों के प्रवाह में लिखते समय प्रायः हिज्जे, व्याकरण और वाक्य विन्यास की गलतियाँ हो जाती हैं और इन गलतियों का पाठक के ऊपर विपरीत प्रभाव पड़ता है। प्रकाशन के पूर्व एक बार पढ़ लेने से हमें अपनी गलतियों की जानकारी हो जाती है और हम उसे सुधार सकते हैं।
पाठक के रुचि के प्रतिकूल सामग्री हो तो?
कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि हम पाठकों को ऐसी सामग्री देना चाहते हैं जिनके विषय में हम जानते हैं कि यह उनके लिये हितकारी है किन्तु उनकी रुचि के अनुरूप नहीं है। ऐसी स्थिति में आप अपने लेख को इस चतुराई से (tactfully) लिखें कि पाठक को वह सुरुचिपूर्ण लगे। मतलब यह कि कड़वी दवा के ऊपर शक्कर की परत।
पाठक संख्या बढ़ाने के लिये क्या करें?
सबसे अहम् बात तो यह है कि लोग जानें कि आपका ब्लॉग अपडेट हो गया है। ब्लोवाणी, चिट्ठाजगत, नारद जैसे हमारे हिन्दी एग्रीगेटर्स आपकी इस समस्या को बहुत हद तक हल कर देते हैं पर अभी भी बहुत से लोग हैं जो कि इन हिन्दी एग्रीगेटर्स के विषय में नहीं जानते अतः ब्लॉग अपडेट के के तत्काल बाद ही उसे पिंग करें। पिंग करने के लिये आप pingoat.com, pingomatic.com जैसी मुफ्त सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं। पिंग होने पर आपके ब्लॉग का अपडेशन विश्व के सभी बड़े ब्लॉग डायरेक्टरियों में स्वतः ही शामिल हो जाता है।
digg.com, technorati.com जैसे सोशल बुकमार्किंग साइट्स का (मुफ्त) सदस्य बनें का और अपने फेव्हरिट्स में अपने ब्लॉग को जोड़ दें। इस प्रकार जो लोग इन साइट्स के कई लाख सदस्यों पता चल जाता है कि आपका ब्लॉग अपडेट हो चुका है।
(विशेषकर technorati.com का क्योंकि वह हिन्दी को सपोर्ट करता है। यदि digg.com का प्रयोग करना है तो रोमन हिन्दी का प्रयोग करें।)
अपने लेख को कृति निर्देशिका में भी डाल दें और स्रोत बक्से में लिखें कि
".....(आपका नाम) हिन्दी के प्रति समर्पित लेखक हैं। उनके अन्य लेखों को पढ़ने के लिये आपका ब्लॉग में अवश्य पधारें।
इस प्रकार आपके ब्लोग के विषय में वहाँ आने वाले लोगों को जानकारी मिलेगी तथा आपके ब्लोग का इनबाउंड लिंक बढ़ेगा और सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि इन्टरनेट के हिन्दी सामग्री में इजाफा होगा।
मैं यह समझता हूँ कि यह सिर्फ आपकी लिखी सामग्री है (content) जो कि पाठकों को खींच कर आपके ब्लॉग में लाती है। अंग्रेजी की उक्ति हैः
'Content is king.'
अर्थात् यदि हिन्दी में कहें तो "सामग्री ही साम्राज्ञी है।"
तो जब भी आप अपने ब्लॉग की सामग्री लिखें तो यह सोच कर न लिखें कि कुछ न कुछ तो लिखना है क्योंकि ऐसी सामग्री को कोई भी पाठक पढ़ना पसंद नहीं करता। फिर ऐसे लेखन का क्या फायदा जिसे कि कोई पढ़े ही नहीं। यह तो वही बात हुई कि जंगल में मोर नाचा किसी ना देखा। तो लिखते समय हमेशा अपनी सामग्री की उत्कृष्टता ध्यान रखें।
पाठक क्या चाहता है?
अपने लेख को लोकप्रिय बनाने के लिये यह जानना बहुत जरूरी है कि पाठक क्या चाहता है। यदि पाठक को उसके पसंद की सामग्री मिलेगी तो वह उसे अवश्य ही पढ़ेगा। तो आखिर पाठक क्या चाहता है? वास्तव में पाठक संतुष्टि चाहता है। वह चाहता है कि उसे घिसी पिटी चीज पढ़ने को न मिले। उसने जो कुछ भी पढ़ा है उससे उसे कुछ नई जानकारी मिली है, उसके ज्ञान में कुछ वृद्धि हुई है।
तो ऐसे लेख पढ़ कर जिससे पाठक को कुछ भी प्राप्त नहीं होता, उसे क्षोभ होता है और जिस ब्लॉग में उसे ऐसी सामग्री पढ़ने को मिली है उस ब्लॉग से वह कन्नी काट लेता है। इसके विपरीत यदि उसे किसी ब्लॉग की सामग्री को पढ़कर कुछ नयापन मिले, उसे संतुष्टि हो तो वह उस ब्लॉग का चाहने वाला बन जाता है।
रोज रोज आखिर नई जानकारी लायें कहाँ से?
यह यक्षप्रश्न है कि आखिर रोज हम अपनी सामग्री में कहाँ से नयापन लायें? सच्चाई भी यही है कि हम हमेशा नई जानकारी नहीं प्राप्त कर सकते। पर हाँ किसी पुरानी जानकारी को ऐसी शैली में प्रस्तुत कर सकते हैं कि उसमें नयापन झलकने लगे। प्रायः सभी सफल लेखक यही करते हैं और इस प्रकार के प्रस्तुतीकरण को पाठक भी पसंद करते हैं।
लिखना शुरू करने के पहले
- जानने का प्रयास करें कि पाठकों की रुचि क्या है। कोशिश करें कि आपका लेखन उनकी रुचि के अनुरूप हो न कि आपकी अपनी रुचि के।
- जिन ब्लॉगर्स के ब्लॉग अधिक पढ़े जाते हैं उन्हें पढ़ें और विश्लेषण करें कि उनकी सामग्री में क्या विशेषताएँ हैं जिनके कारण लोग उन्हें पढ़ते हैं। इस प्रकार आपको स्वयं के लेखन की कमजोरियों का पता चलेगा। और यह कहने की आवश्यकता ही नहीं है कि अपनी कमजोरी जान लेने पर उन्हें दूर करने का प्रयत्न करना है।
- उन विषयों पर लिखने के लिये कभी भी न सोचें जिन पर आप अधिकार नहीं रखते। इधर उधर से एकत्रित की गई सामग्री कभी भी किसी को प्रभावित नहीं करती बल्कि कई बार लेखक की स्थिति को हास्यास्पद बना देती है।
- जो कुछ भी आप लिखना चाहते हैं उसके लिये तरतीबवार पॉइंट्स बना लीजिये ताकि लिखते समय कुछ छूट न जाये।
- लिखने के पहले स्वयं में पूर्ण आत्मविश्वास बना लें तभी लिखना शुरू करें।
अपने लेख को आनन फानन में प्रकाशित न करें। पहले उसे कम से कम एक बार पढ़ें, दो बार पढ़ें तो और भी अच्छा है। विचारों के प्रवाह में लिखते समय प्रायः हिज्जे, व्याकरण और वाक्य विन्यास की गलतियाँ हो जाती हैं और इन गलतियों का पाठक के ऊपर विपरीत प्रभाव पड़ता है। प्रकाशन के पूर्व एक बार पढ़ लेने से हमें अपनी गलतियों की जानकारी हो जाती है और हम उसे सुधार सकते हैं।
पाठक के रुचि के प्रतिकूल सामग्री हो तो?
कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि हम पाठकों को ऐसी सामग्री देना चाहते हैं जिनके विषय में हम जानते हैं कि यह उनके लिये हितकारी है किन्तु उनकी रुचि के अनुरूप नहीं है। ऐसी स्थिति में आप अपने लेख को इस चतुराई से (tactfully) लिखें कि पाठक को वह सुरुचिपूर्ण लगे। मतलब यह कि कड़वी दवा के ऊपर शक्कर की परत।
पाठक संख्या बढ़ाने के लिये क्या करें?
सबसे अहम् बात तो यह है कि लोग जानें कि आपका ब्लॉग अपडेट हो गया है। ब्लोवाणी, चिट्ठाजगत, नारद जैसे हमारे हिन्दी एग्रीगेटर्स आपकी इस समस्या को बहुत हद तक हल कर देते हैं पर अभी भी बहुत से लोग हैं जो कि इन हिन्दी एग्रीगेटर्स के विषय में नहीं जानते अतः ब्लॉग अपडेट के के तत्काल बाद ही उसे पिंग करें। पिंग करने के लिये आप pingoat.com, pingomatic.com जैसी मुफ्त सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं। पिंग होने पर आपके ब्लॉग का अपडेशन विश्व के सभी बड़े ब्लॉग डायरेक्टरियों में स्वतः ही शामिल हो जाता है।
digg.com, technorati.com जैसे सोशल बुकमार्किंग साइट्स का (मुफ्त) सदस्य बनें का और अपने फेव्हरिट्स में अपने ब्लॉग को जोड़ दें। इस प्रकार जो लोग इन साइट्स के कई लाख सदस्यों पता चल जाता है कि आपका ब्लॉग अपडेट हो चुका है।
(विशेषकर technorati.com का क्योंकि वह हिन्दी को सपोर्ट करता है। यदि digg.com का प्रयोग करना है तो रोमन हिन्दी का प्रयोग करें।)
अपने लेख को कृति निर्देशिका में भी डाल दें और स्रोत बक्से में लिखें कि
".....(आपका नाम) हिन्दी के प्रति समर्पित लेखक हैं। उनके अन्य लेखों को पढ़ने के लिये आपका ब्लॉग में अवश्य पधारें।
इस प्रकार आपके ब्लोग के विषय में वहाँ आने वाले लोगों को जानकारी मिलेगी तथा आपके ब्लोग का इनबाउंड लिंक बढ़ेगा और सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि इन्टरनेट के हिन्दी सामग्री में इजाफा होगा।
Saturday, December 20, 2008
हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापन क्यों बंद हो गये
कल "शास्त्री जी कहते हैं" पोस्ट पर नजर पड़ गई। उसमें की गई टिप्पणियों को पढ़ने से लगा कि बहुत से लोग एडसेंस के विषय में जानने की जिज्ञासा रखते हैं। अतः इस विषय में मुझे जो जानकारी है वह यहाँ बता रहा हूँ (ये अलग बात है कि वर्तमान में एडसेंस के विज्ञापन हिन्दी ब्लोग्स तथा वेबसाइट्स को नहीं मिल पा रहे हैं पर उम्मीद करें कि जल्दी ही हिन्दी में फिर से ये विज्ञापन मिलने लगे, आखिर उम्मीद पे ही तो दुनिया कायम है)।
एडसेंस क्या है
वास्तव में गूगल संसार की सबसे बड़ी आनलाइन विज्ञापन कंपनी है। संसार भर से उसे विज्ञापन मिलते हैं जिन्हें कि वह अनगिनत वेबसाइट्स तथा ब्लोग्स में फैला देती है। जब कोई इस विज्ञापन पर क्लिक करता है तो गूगल को विज्ञापनदाता से पैसे मिलते हैं जिसका एक छोटा सा हिस्सा गूगल उसे भी देता है जिसके ब्लोग या वेबसाइट से क्लिक किया गया था। इसे इस प्रकार से समझ सकते हैं कि बड़े शहरों में विज्ञापन एजेंसियाँ विज्ञापनदाताओं से पैसे लेकर उनके विज्ञापन को शहर भर में अनेकों होर्डिंग में दर्शाती है। अब यदि कोई होर्डिंग आपके घर के दीवाल पर लगा हो तो आपके दीवाल को उपयोग करने के एवज में विज्ञापन एजेंसी आपको भी कुछ न कुछ रकम देती है।
यहाँ पर यह समझ लेना आवश्यक है कि गूगल को विज्ञापन के पैसे तभी मिलते हैं जब कोई विज्ञापन को क्लिक करता है और उस क्लिक के लिये गूगल जिस ब्लोग या वेबसाइट से क्लिक हुआ है उसके मालिक को पैसे देता है। अब होता यह है कि बहुत से लोग पैसा कमाने के लिये अपने ब्लोग के एडसेंस विज्ञापन पर या तो स्वयं क्लिक करते हैं या फिर अपने मित्रों, रिश्तेदारों और जान पहचान वालों से क्लिक करवाते हैं जिसे कि click fraud कहा जाता है। गूगल आज सिर्फ अपनी ईमानदारी की वजह से संसार की सबसे बड़ी विज्ञापन कंपनी बना हुआ है। उसे बेइमानी जरा भी पसंद नहीं है और वह नहीं चाहता कि उसके विज्ञापनदाताओं को अनावश्यक नुकसान हो। गूगल के पास ऐसे धोखा देने वाले क्लिक्स को पकड़ने का फूलप्रूफ तकनीक है। शास्त्री जी ने सही लिखा है कि "गूगल की नजरें बहुत तेज हैं"। क्लिक प्राड करने वालों पर गूगल जरा भी दया नहीं करता और उन्हें बैन करके विज्ञापनों से वंचित कर देता है। एक बार यदि किसी को गूगल ने बैन कर दिया तो उसे कभी भी गूगल एडसेंस से पैसे कमाने का अवसर नहीं मिल पाता। गूगल की इस नीति से अन्य भाषा के बहुत से ब्लोगर और वेबमास्टर (जिन्हें बेइमानी पसंद है) भी त्रस्त हैं। बेइमानी करने वाले लाखों लोगों को गूगल ने बैन करके रखा हुआ है।
हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापन आने क्यों बंद हो गये?
इस प्रश्न के उत्तर में हम विश्वासपूर्वक कुछ कह नहीं सकते क्योंकि गूगल ने इस विषय में अब तक कुछ भी नहीं कहा है। हाँ इस प्रश्न के उत्तर में कि मेरे वेब पेजेस में सार्वजनिक सेवा विज्ञापन क्यों आते हैं गूगल का जवाब हैः
मुझे नहीं लगता कि हिन्दी ब्लोग्स में विज्ञापन न आने या सिर्फ सार्वजनिक सेवा विज्ञापन ही मिलने का कारण क्लिक प्राड है (यानी कि लोगों ने अपने ब्लोग के विज्ञापनों को क्लिक किया इसलिये गूगल ने विज्ञापन भेजने बंद कर दिया)। गूगल केवल उन लोगों पर ही कार्यवाही करता है जो कि धोखेबाज होते हैं। वास्तव में गूगल के एडसेंस के लिये सपोर्टिंग भाषाओं की सूची में हिन्दी भाषा शामिल नहीं है (मई 2008 के पहले तक गूगल ने अपनी भाषा नीति में ढिलाई दे रखी थी इसलिये हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापन आ रहे थे और बाद में इस नीति को सख्त कर दिये जाने के कारण विज्ञापन आने बंद हो गये)।
बहुत हद तक तो यही लगता है कि गूगल के सपोर्टिंग भाषाओं की सूची में नहीं होने के कारण ही हमें एडसेंस विज्ञापन नहीं मिल पा रहे हैं। यह भी हो सकता है कि गूगल हिन्दी के लिये अपने "बोट" को विकसित करने में लगा हो क्योंकि गूगल का बोट आपके पेज को पढ़ता है और उसमें सिर्फ उन विज्ञापनों को ही भेजता है जो कि आपके पेज के विषय से संबंधित हों याने कि यदि आपका पेज फर्नीचर के बारे में है तो गूगल उसमें केवल फर्नीचर्स के विज्ञापन भेजेगा। मई 2008 तक हिन्दी पेजेस में जो एडसेंस विज्ञापन आ रहे थे वे पेज के विषय से संबंधित विज्ञापन न हो कर सिर्फ हिन्दी से संबंधित विज्ञापन हुआ करते थे। अब जबकि गूगल ने हिन्दी के अन्य भाषाओं में अनुवाद (http://translate.google.com) की टेक्नोलॉजी विकसित कर लिया है तो इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि गूगल अपने बोट को हिन्दी सपोर्ट के लिये विकसित कर रहा हो। पर यह सिर्फ एक अनुमान है, सत्य क्या है यह तो सिर्फ गूगल ही जानता है।
क्या फिर हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापन आयेंगे?
बहुत अधिक संभावना तो इसी बात की है कि हिन्दी पेजेस में जल्दी ही एडसेंस विज्ञापन आने शुरू हो जायेंगे और वह भी आपके पेज के विषय से संबंधित। आज जब संसार की सभी बड़ी कंपनियों ने अपने हिन्दी साइट्स बना लिये हैं, फायरफॉक्स, गूगल क्रोम के हिन्दी संस्करण आ चुके हैं, भारत में इंटरनेट का प्रयोग दिन दूना रात चौगुना बढ़ते जा रहा है तो कोई कारण नहीं है कि गूगल भारत के विज्ञापनों से होने वाली कमाई से आँख फेर ले। एक प्रश्न के उत्तर में गूगल हेल्प ने कहा थाः

अभी पिछले हफ्ते ही गूगल ने अधिकारिक भाषाओं की लिस्ट में चार नई भाषाओं को जोड़ा है, देखें http://adsense.blogspot.com/2006/12/adsense-for-content-in-4-new-languages.html
तो हम भी उम्मीद कर सकते हैं कि जल्दी ही गूगल अपनी लिस्ट में हिन्दी को भी स्थान दे देगा और हमें विज्ञापन मिलने शुरू हो जायेंगे।
पर जब कभी भी हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापन आये तो याद रखें कि अपने स्वयं के ब्लोग के विज्ञापनों पर भूल कर भी न खुद क्लिक करना है और न ही किसी अन्य से क्लिक करवाना है।
एडसेंस क्या है
वास्तव में गूगल संसार की सबसे बड़ी आनलाइन विज्ञापन कंपनी है। संसार भर से उसे विज्ञापन मिलते हैं जिन्हें कि वह अनगिनत वेबसाइट्स तथा ब्लोग्स में फैला देती है। जब कोई इस विज्ञापन पर क्लिक करता है तो गूगल को विज्ञापनदाता से पैसे मिलते हैं जिसका एक छोटा सा हिस्सा गूगल उसे भी देता है जिसके ब्लोग या वेबसाइट से क्लिक किया गया था। इसे इस प्रकार से समझ सकते हैं कि बड़े शहरों में विज्ञापन एजेंसियाँ विज्ञापनदाताओं से पैसे लेकर उनके विज्ञापन को शहर भर में अनेकों होर्डिंग में दर्शाती है। अब यदि कोई होर्डिंग आपके घर के दीवाल पर लगा हो तो आपके दीवाल को उपयोग करने के एवज में विज्ञापन एजेंसी आपको भी कुछ न कुछ रकम देती है।
यहाँ पर यह समझ लेना आवश्यक है कि गूगल को विज्ञापन के पैसे तभी मिलते हैं जब कोई विज्ञापन को क्लिक करता है और उस क्लिक के लिये गूगल जिस ब्लोग या वेबसाइट से क्लिक हुआ है उसके मालिक को पैसे देता है। अब होता यह है कि बहुत से लोग पैसा कमाने के लिये अपने ब्लोग के एडसेंस विज्ञापन पर या तो स्वयं क्लिक करते हैं या फिर अपने मित्रों, रिश्तेदारों और जान पहचान वालों से क्लिक करवाते हैं जिसे कि click fraud कहा जाता है। गूगल आज सिर्फ अपनी ईमानदारी की वजह से संसार की सबसे बड़ी विज्ञापन कंपनी बना हुआ है। उसे बेइमानी जरा भी पसंद नहीं है और वह नहीं चाहता कि उसके विज्ञापनदाताओं को अनावश्यक नुकसान हो। गूगल के पास ऐसे धोखा देने वाले क्लिक्स को पकड़ने का फूलप्रूफ तकनीक है। शास्त्री जी ने सही लिखा है कि "गूगल की नजरें बहुत तेज हैं"। क्लिक प्राड करने वालों पर गूगल जरा भी दया नहीं करता और उन्हें बैन करके विज्ञापनों से वंचित कर देता है। एक बार यदि किसी को गूगल ने बैन कर दिया तो उसे कभी भी गूगल एडसेंस से पैसे कमाने का अवसर नहीं मिल पाता। गूगल की इस नीति से अन्य भाषा के बहुत से ब्लोगर और वेबमास्टर (जिन्हें बेइमानी पसंद है) भी त्रस्त हैं। बेइमानी करने वाले लाखों लोगों को गूगल ने बैन करके रखा हुआ है।
हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापन आने क्यों बंद हो गये?
इस प्रश्न के उत्तर में हम विश्वासपूर्वक कुछ कह नहीं सकते क्योंकि गूगल ने इस विषय में अब तक कुछ भी नहीं कहा है। हाँ इस प्रश्न के उत्तर में कि मेरे वेब पेजेस में सार्वजनिक सेवा विज्ञापन क्यों आते हैं गूगल का जवाब हैः
Your site content is primarily in an unsupported language.(देखें: https://www.google.com/adsense/support/bin/answer.py?hl=en&answer=10035)
If the AdSense code is placed on pages with content primarily in an unsupported language, we may show public service ads or ads in another language. As noted in our program policies, publishers may not display ads on pages with content primarily in an unsupported language, so please remove the ad code from these pages until we're able to support your language.
मुझे नहीं लगता कि हिन्दी ब्लोग्स में विज्ञापन न आने या सिर्फ सार्वजनिक सेवा विज्ञापन ही मिलने का कारण क्लिक प्राड है (यानी कि लोगों ने अपने ब्लोग के विज्ञापनों को क्लिक किया इसलिये गूगल ने विज्ञापन भेजने बंद कर दिया)। गूगल केवल उन लोगों पर ही कार्यवाही करता है जो कि धोखेबाज होते हैं। वास्तव में गूगल के एडसेंस के लिये सपोर्टिंग भाषाओं की सूची में हिन्दी भाषा शामिल नहीं है (मई 2008 के पहले तक गूगल ने अपनी भाषा नीति में ढिलाई दे रखी थी इसलिये हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापन आ रहे थे और बाद में इस नीति को सख्त कर दिये जाने के कारण विज्ञापन आने बंद हो गये)।
बहुत हद तक तो यही लगता है कि गूगल के सपोर्टिंग भाषाओं की सूची में नहीं होने के कारण ही हमें एडसेंस विज्ञापन नहीं मिल पा रहे हैं। यह भी हो सकता है कि गूगल हिन्दी के लिये अपने "बोट" को विकसित करने में लगा हो क्योंकि गूगल का बोट आपके पेज को पढ़ता है और उसमें सिर्फ उन विज्ञापनों को ही भेजता है जो कि आपके पेज के विषय से संबंधित हों याने कि यदि आपका पेज फर्नीचर के बारे में है तो गूगल उसमें केवल फर्नीचर्स के विज्ञापन भेजेगा। मई 2008 तक हिन्दी पेजेस में जो एडसेंस विज्ञापन आ रहे थे वे पेज के विषय से संबंधित विज्ञापन न हो कर सिर्फ हिन्दी से संबंधित विज्ञापन हुआ करते थे। अब जबकि गूगल ने हिन्दी के अन्य भाषाओं में अनुवाद (http://translate.google.com) की टेक्नोलॉजी विकसित कर लिया है तो इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि गूगल अपने बोट को हिन्दी सपोर्ट के लिये विकसित कर रहा हो। पर यह सिर्फ एक अनुमान है, सत्य क्या है यह तो सिर्फ गूगल ही जानता है।
क्या फिर हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापन आयेंगे?
बहुत अधिक संभावना तो इसी बात की है कि हिन्दी पेजेस में जल्दी ही एडसेंस विज्ञापन आने शुरू हो जायेंगे और वह भी आपके पेज के विषय से संबंधित। आज जब संसार की सभी बड़ी कंपनियों ने अपने हिन्दी साइट्स बना लिये हैं, फायरफॉक्स, गूगल क्रोम के हिन्दी संस्करण आ चुके हैं, भारत में इंटरनेट का प्रयोग दिन दूना रात चौगुना बढ़ते जा रहा है तो कोई कारण नहीं है कि गूगल भारत के विज्ञापनों से होने वाली कमाई से आँख फेर ले। एक प्रश्न के उत्तर में गूगल हेल्प ने कहा थाः

(देखें: http://groups.google.com/group/adsense-help-features/browse_thread/thread/77476824e7119726/1916d587ba3f179b?lnk=gst&q=hindi#1916d587ba3f179b)(AdSensePro Stephanie Google employee Jun 21, 1:14 am
From: AdSensePro Stephanie
Date: Fri, 20 Jun 2008 13:14:51 -0700 (PDT)
Local: Sat, Jun 21 2008 1:14 am
Subject: Re: Serving PSAs on unicoded (hindi) pages
If you haven't done so already, I'd encourage you to visit the AdSense
blog at adsense.blogspot.com to keep track of all the latest AdSense
news and updates. If we're able to expand our list of supported
languages, we'll be sure to post an announcement on our blog.)
अभी पिछले हफ्ते ही गूगल ने अधिकारिक भाषाओं की लिस्ट में चार नई भाषाओं को जोड़ा है, देखें http://adsense.blogspot.com/2006/12/adsense-for-content-in-4-new-languages.html
तो हम भी उम्मीद कर सकते हैं कि जल्दी ही गूगल अपनी लिस्ट में हिन्दी को भी स्थान दे देगा और हमें विज्ञापन मिलने शुरू हो जायेंगे।
पर जब कभी भी हिन्दी ब्लोग्स में एडसेंस विज्ञापन आये तो याद रखें कि अपने स्वयं के ब्लोग के विज्ञापनों पर भूल कर भी न खुद क्लिक करना है और न ही किसी अन्य से क्लिक करवाना है।
Friday, December 19, 2008
मानो या ना मानो
या आप बता सकते हैं कि भारत का यह चित्र किस वस्तु से बना है?

आप सोच रहे होंगे कि ये ड्राइंग पेपर या प्लास्टिक के बना होगा। जी नहीं! आप गलत सोच रहे हैं। यदि मैं कहूँ कि इसे खाया जा सकता है तो आप समझेंगे कि मैं बकवास कर रहा हूँ। पर आपको जानकर आश्चर्य होगा कि ये केक हैं और शायद इन्हें खाया भी जा चुका होगा।
सौजन्यः Love Guru Yahoo Group

आप सोच रहे होंगे कि ये ड्राइंग पेपर या प्लास्टिक के बना होगा। जी नहीं! आप गलत सोच रहे हैं। यदि मैं कहूँ कि इसे खाया जा सकता है तो आप समझेंगे कि मैं बकवास कर रहा हूँ। पर आपको जानकर आश्चर्य होगा कि ये केक हैं और शायद इन्हें खाया भी जा चुका होगा।
सौजन्यः Love Guru Yahoo Group
Wednesday, December 17, 2008
हमको जो कोई बूढ़ा समझे बूढ़ा उसका बाप
भाई अगर हम आप लोगों से कुछ साल पहले इस दुनियाँ में आ गये तो इसका मतलब यह तो नहीं हुआ कि आप हमें बूढ़ा बोलें। और यदि बोलते हैं तो बोलते रहिये हम कौन सा ध्यान देने वाले हैं? हम तो सिर्फ अपनी श्रीमती जी की बातों को ही मानते हैं जो कहती हैं कि 'अजी अभी कौनसे बूढ़े हो गये हैं आप?' (यदि हम बूढ़े हो गये तो वे भी तो बुढ़िया मानी जायेंगी और यह तो आप सभी जानते हैं कि कोई भी महिला बुढ़िया कहलाना तो क्या अपनी उम्र को जरा सा खिसकाना भी नहीं चाहेगी, उनका बस चले तो अपनी बेटी को भी अपनी छोटी बहन ही बताना पसंद करेंगी )। वास्तव में हमारा तो सिद्धांत ही है कि 'पत्नी को परमेश्वर मानो'। पत्नी के वचन ब्रह्मवाक्य हैं, पत्नी ने कह दिया याने परमेश्वर ने कह दिया (अब यह अलग बात है कि जब मूड में होती हैं तो यही गुनगुनाती हैं - मैं का करूँ राम मुझे बुड्ढा मिल गया)। अब देखिये ना, अमिताभ जी हमसे भी चार पाँच साल बड़े हैं पर उनको तो कोई बूढ़ा नहीं कहता। फिल्मों में तो वे अभी भी जवानों के जवान हैं। और यदि कहना ही था तो बुजुर्ग न कह कर "ओल्ड ब्वाय" कह लेते, आपकी मंशा भी पूरी हो जाती और हम भी खुश होते।
सत्यानाश हो इस अंग्रेजी का जिसके कारण सभी हमें अंकल पुकारते हैं। अब आप ही सोचिये कि यदि आपको कोई अंकल कहेगा तो क्या आपको अच्छा लगेगा? हमारे पिताजी के समय में तो उम्र में उनसे बहुत छोटे लोग भी उन्हें 'भैया' ही कहते थे, 'काका' नहीं। देखा जाये तो हमारे बुजुर्ग कहलाने में इस अंग्रेजी का ही सबसे ज्यादा हाथ है।
साठ साल की उम्र में भी अयोध्या नरेश दशरथ बूढ़े नहीं हुये थे तभी तो राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। सौ पुत्रों में से निन्यान्बे पुत्रों की मृत्यु के बाद जब अपना समस्त राजपाट छोड़ के विश्वामित्र तपस्या करने के लिये अपनी पत्नी के साथ वन में गये तब भी वे बूढ़े नहीं हुये थे क्योंकि उसके बाद भी उनके और पुत्र हुये। ययाति तो बूढ़े होने का शाप पाने के बाद भी जवान बने रहे, अपने पुत्र पुरु की जवानी लेकर। फिर हमने तो साठ को स्पर्श भी नहीं किया है पर लगे आप हमे बूढ़ा कहने।
बहुत बेइंसाफी है ये। कितने आदमियों ने हमें बुजर्ग कहा कालिया?
एक ने सरदार, कहा नहीं बल्कि चिट्ठा चर्चा में पोस्ट कर दिया और उसके समस्त पाठकगण के साथ ही साथ अन्य हिन्दी ब्लोगर्स ने मान भी लिया।
हूँऽऽऽ, इसकी सजा मिलेगी। जरूर मिलेगी। अरे ओ सांभा, जरा मेरा कम्प्यूटर तो लाना। हम भी अपने ब्लोग में लिखेंगे "हमको जो कोई बूढ़ा समझे बूढ़ा उसका बाप"।
उपसंहार
सूझ शब्द से याद आया कि एक मित्र ने हमसे पूछ लिया, "यार, तुम ये सब लिख कैसे लेते हो?"
हमने कहा, "बस कलम उठाता हूँ और जो कुछ भी सूझता है लिख देता हूँ।"
(मेरा तात्पर्य है कि कम्प्यूटर में तख्ती नोटपैड खोलता हूँ और जो कुछ भी सूझता है लिख देता हूँ।)
"तब तो लिखना बहुत सरल काम है।"
"हाँ, लिखना तो बहुत सरल है पर यह जो सूझना है ना, वही बहुत मुश्किल है।"
सत्यानाश हो इस अंग्रेजी का जिसके कारण सभी हमें अंकल पुकारते हैं। अब आप ही सोचिये कि यदि आपको कोई अंकल कहेगा तो क्या आपको अच्छा लगेगा? हमारे पिताजी के समय में तो उम्र में उनसे बहुत छोटे लोग भी उन्हें 'भैया' ही कहते थे, 'काका' नहीं। देखा जाये तो हमारे बुजुर्ग कहलाने में इस अंग्रेजी का ही सबसे ज्यादा हाथ है।
साठ साल की उम्र में भी अयोध्या नरेश दशरथ बूढ़े नहीं हुये थे तभी तो राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। सौ पुत्रों में से निन्यान्बे पुत्रों की मृत्यु के बाद जब अपना समस्त राजपाट छोड़ के विश्वामित्र तपस्या करने के लिये अपनी पत्नी के साथ वन में गये तब भी वे बूढ़े नहीं हुये थे क्योंकि उसके बाद भी उनके और पुत्र हुये। ययाति तो बूढ़े होने का शाप पाने के बाद भी जवान बने रहे, अपने पुत्र पुरु की जवानी लेकर। फिर हमने तो साठ को स्पर्श भी नहीं किया है पर लगे आप हमे बूढ़ा कहने।
बहुत बेइंसाफी है ये। कितने आदमियों ने हमें बुजर्ग कहा कालिया?
एक ने सरदार, कहा नहीं बल्कि चिट्ठा चर्चा में पोस्ट कर दिया और उसके समस्त पाठकगण के साथ ही साथ अन्य हिन्दी ब्लोगर्स ने मान भी लिया।
हूँऽऽऽ, इसकी सजा मिलेगी। जरूर मिलेगी। अरे ओ सांभा, जरा मेरा कम्प्यूटर तो लाना। हम भी अपने ब्लोग में लिखेंगे "हमको जो कोई बूढ़ा समझे बूढ़ा उसका बाप"।
उपसंहार
हमारे दो बुजुर्ग ( हालाँकि ये दोनों शायद बुजुर्ग कहलाना पसंद न करें )पढ़कर एक अच्छा मसाला मिल गया लिखने के लिये। वैसे हम क्यों बुजुर्ग कहलाना पसंद नहीं करेंगे? करेंगे और जरूर करेंगे। हमें 'सींग कटा कर बछड़ों में शामिल हो कर' जग हँसाई नहीं करवाना है। और फिर आज के जमानें में तो लोग बुजुर्ग को बुजुर्ग कहना भी नहीं चाहते। तो जब हमें यह सम्मान मिला है तो उसे क्यों न लें? वैसे लिखने के लिये मसाला सुझाने के लिये चिट्ठा चर्चा और विवेक जी को धन्यवाद!
सूझ शब्द से याद आया कि एक मित्र ने हमसे पूछ लिया, "यार, तुम ये सब लिख कैसे लेते हो?"
हमने कहा, "बस कलम उठाता हूँ और जो कुछ भी सूझता है लिख देता हूँ।"
(मेरा तात्पर्य है कि कम्प्यूटर में तख्ती नोटपैड खोलता हूँ और जो कुछ भी सूझता है लिख देता हूँ।)
"तब तो लिखना बहुत सरल काम है।"
"हाँ, लिखना तो बहुत सरल है पर यह जो सूझना है ना, वही बहुत मुश्किल है।"
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