क्या आप कभी टायपिस्ट रहे हैं और अलग अलग लोगों की हैंडराइटिंग में लिखे गये पत्रों से आपका पाला पड़ा है? अरे मैं भी कैसी मूर्खता की बातें कर रहा हूँ, आज के जमाने में कहाँ हैं अब टाइपराइटर और टायपिस्ट, अब तो कम्प्यूटर का जमाना है। क्या करें भाई उम्र अधिक हो जाने के कारण से भूलने की बीमारी हो गई है। हाँ तो मैं बात कर रहा था हैंडराइटिंग की। मेरा पाला बहुत लोगों के हस्तलेख से पड़ा है, टायपिस्ट जो था मैं। सन् 1973 में नौकरी लगी थी मेरी भारतीय स्टेट बैंक में। नरसिंहपुर शाखा में जॉयन करने का आदेश आया था। कॉलेज में पढ़ रहा था मैं उन दिनों, एम.एससी. (फिजिक्स) फायनल में। पिताजी उसी महीने रिटायर हुए थे। प्रायवेट संस्था में शिक्षक थे अतः पेन्शन मिलने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था। चार भाइयों और एक बहन में सबसे बड़ा मैं ही था। ठान लिया कि पढ़ाई छोड़ कर नौकरी करने की। नौकरी भी तो अच्छी मिली थी, विश्व के सबसे बड़े बैंक, भारतीय स्टेट बैंक में, मोटी तनख्वाह वाली। पिताजी परेशान। दो परेशानियाँ थी उन्हें। एक तो वे चाहते थे कि मैं अपनी शिक्षा पूरी करूँ और दूसरी यह कि यदि मैं नौकरी में जाना ही चाहता हूँ तो किसी को अपने साथ लेकर जाऊं, मैं कभी रायपुर से कहीं बाहर जो नहीं गया था। खैर साहब, पिताजी के लाख कहने के बावजूद मैं अकेले ही नरसिंहपुर गया।
अब आप सोच रहे होंगे कि बात तो हैंडराइटिंग की हो रही थी और ये साहब तो पता नहीं कहाँ कहाँ की हाँकने लग गये, ठीक वैसे ही जैसे कि व्यस्त चौराहे में मदारी डमरू बजाकर साँप नेवले की लड़ाई वाला खेल दिखाने की बात कह कर मजमा इकट्ठा कर लेता है और आखिर तक साँप नेवले की लड़ाई नहीं दिखाता बल्कि ताबीज बेच कर चला जाता है। धीरज रखिये भाई, आ रहा हूँ हैंडराइटिंग की बात पर, आखिर पहले कुछ न कुछ भूमिका तो बांधनी ही पड़ती है। तो उन दिनों एक महाराष्ट्रियन सज्जन स्थानान्तरित होकर हमारी शाखा में आये हमारे शाखा प्रबन्धक बनकर। एकाध साल बाद रिटायर होने वाले थे। उनकी एक विशेषता यह भी थी कि 'परंतु' को "पणतु" ही कहा करते थे, कभी भी मैंने उनके मुख से परंतु शब्द नहीं सुना। तो मैं उन्हीं सज्जन की हैंडराइटिंग की बात कर रहा था। उन दिनों भारतीय स्टेट बैंक की भाषा अंग्रेजी हुआ करती थी, हिन्दी का चलन तो बहुत बाद में हुआ। जब पहली बार उन्होंने मेसेन्जर के हाथ मेरे पास टाइप करने के लिये एक पत्र भेजा तो उसका एक अक्षर भी मेरे पल्ले नहीं पड़ा। बिल्कुल ऐसा लगता था कि किसी चींटे को स्याही में डुबा कर कागज पर रेंगा दिया हो। उसमें क्या लिखा है समझने के लिये मुझे शाखा प्रबन्धक महोदय के केबिन में 20-25 बार जाना पड़ा था। पर वे जरा भी नाराज नहीं हुये मेरे बार बार आकर पूछने पर, बहुत ही सज्जन व्यक्ति थे। उनके लिखे आठ दस पत्र टाइप कर लेने के बाद मैं उनके लिखने का "मोड" समझने लग गया और फिर मेरी परेशानी खत्म हो गई। खैर उनकी हैंडराइटिंग जैसी भी थी पर अंग्रेजी का उन्हें बहुत अच्छा ज्ञान था। उनके लिखे एक पत्र में एक बार mutatis-mutandis शब्द आया। मेरे लिये वह शब्द एकदम नया था। मैंने फौरन आक्सफोर्ड इंग्लिश टू इंग्लिश डिक्शनरी निकाली और उस शब्द का मायने खोजने लगा, पर मुझे नहीं मिला। तो मैंने शाखा प्रबन्धक के केबिन जाकर उसका अर्थ पूछा। मेरा प्रश्न सुनकर वे 'हो हो ऽ ऽ ऽ' करके हँसे और बोले अरे अवधिया डिक्शनरी में देख लो ना। मैं बोला कि मैं डिक्शनरी में देख कर ही आया हूँ, मुझे नहीं मिला। तो वे बोले कि डिक्शनरी के पीछे अन्य भाषाओं से अपनाये गये शब्दों वाला अपेन्डिक्स देखो। वहाँ मुझे उस शब्द का अर्थ मिल गया। उनके अंग्रेजी ज्ञान से बहुत प्रभावित था मैं और समझता था कि वे अंग्रेजी में एम.ए. अवश्य होंगे। बहुत दिनों बाद मुझे पता चला कि वे इम्पीरियल बैंक के समय के थे और उनकी शैक्षणिक योग्यता थी - दसवीं फेल।
Saturday, January 3, 2009
Thursday, January 1, 2009
पैसे पीटो ब्लोग बेचकर
जी हाँ, ब्लोग बेच कर अच्छी खासी रकम कमाई जा सकती है। आजकल ब्लोग बेचना, जिसे कि blog flipping कहा जाता है, इंटरनेट मारकेटिंग इंडस्ट्री का खासा मुनाफा कमाने वाला एक बहुत बड़ा कारोबार है। मैं यहाँ पर हिन्दी ब्लोग्स की बात नहीं कर रहा हूँ, हिन्दी ब्लोग्स की खरीदी बिक्री में तो अभी सालों लगेंगे। बात हो रही है अंग्रेजी ब्लोग्स की। blog flipping के इस धंधे में संसार भर के लोग लगे हुये हैं और यदि चाहें तो आप भी यह काम कर सकते हैं। जरा वारियर्स फोरम के Warriors! - I Am Going To Make $100+ In 24 Hours! - Watch Over My Shoulder! थ्रेड को देखें।

और उसने अपना कहा करके भी दिखा दिया।

इसी प्रकार का एक चैलेंज Challenge Accepted - It’s On! | Site Flipping University में भी है।
यह तो चैलेन्ज वाली बात थी किन्तु प्रायः लोग 7 से 10 दिनों में ब्लोग बना कर बेच लिया करते हैं।
कैसे करते हैं इसे वे लोग?
संक्षिप्त विवरण इस प्रकार हैः
अरे हाँ, जो बात सबसे पहले कहनी थी वह तो भूल ही गया, चलो अब कह देता हूँ आप सभी को नया साल मुबारक!

और उसने अपना कहा करके भी दिखा दिया।

इसी प्रकार का एक चैलेंज Challenge Accepted - It’s On! | Site Flipping University में भी है।
यह तो चैलेन्ज वाली बात थी किन्तु प्रायः लोग 7 से 10 दिनों में ब्लोग बना कर बेच लिया करते हैं।
कैसे करते हैं इसे वे लोग?
संक्षिप्त विवरण इस प्रकार हैः
- सबसे पहले एक Niche (अच्छा मुनाफा कमाया जा सकने वाला विषय, ब्लोग के सारे लेख इसी विषय से सम्बंधित होते हैं) चुनते हैं। प्रस्तुत प्रकरण में निशे था weight loss।
- निशे के अनुरूप एक डोमेननेम रजिस्टर करते हैं।
- रजिस्टर किये गये डोमेन में वर्डप्रेस को इंस्टाल करते हैं और विषय के अनुरूप अच्छा सा थीम चुन लेते हैं।
- निशे पर लेख लिखने के लिये कीवर्ड रिसर्च करते हैं अर्थात् पता करते हैं कि लोग विभिन्न सर्च इंजिन के सर्चबॉक्स में क्या लिख कर खोज किया करते हैं। प्रस्तुत प्रकरण में कीवर्ड थे weight loss food, fast weight loss diet, lose stomach fat, fastest way to lose weight, lose weight quickly, best way to lose weight, weight loss plans, lose belly fat, weight loss products, weight loss pills,weight loss fast,fast weight loss, lose weight fast, exercises to lose weight, celebrity weight loss
- फिर इन्हीं कीवर्ड को प्रयोग करते हुये 10 से 15 पंद्रह लेख लिखते हैं और उन्हें ब्लोग में पोस्ट करते जाते हैं।
- साथ ही साथ ब्लोग का भी करते जाते हैं ताकि ब्लोग को सर्च इंजिन्स जल्दी से जल्दी पहचान सके।
- इतना सब करने के बाद साइटपॉइंट या डीपी फोरम, जहाँ कि ब्लोग्स और वेबसाइट्स की खरीदी बिक्री होती है, में उस ब्लोग को बेच देते हैं।
अरे हाँ, जो बात सबसे पहले कहनी थी वह तो भूल ही गया, चलो अब कह देता हूँ आप सभी को नया साल मुबारक!
Tuesday, December 30, 2008
बाप दादाओं की तस्वीरों को निकाल कर फेंक दो
"हिन्दी के प्राचीनतम रूप और उसके प्राचीन साहित्य को अजाबघर में रख दो। उसकी अब कोई आवश्यकता नहीं।"
दिल खटास से भर गया है ऐसी बात पढ़ कर।
फिर तो बाप दादाओं की तस्वीरों को भी निकाल कर फेंक दो। क्यों उन्हें कमरे में लगा रखा है, क्या आवश्यकता रह गई है इन तस्वीरों की?
हिन्दी के प्राचीनतम रूप को अजायबघर में रख देने के बाद कौन सी हिन्दी का प्रयोग करोगे? अंग्रेजी शब्दों के सहारे जीवित रहने वाले खिचड़ी हिन्दी की? आज हिन्दी का सही ज्ञान ही लुप्तप्राय हो चुका है। दिल्ली जैसे हिन्दीभाषी क्षेत्र के लोगों को गागर जैसे सामान्य शब्द का अर्थ नहीं पता है (देखें मेरा ये पोस्ट)। अपने अज्ञान को छुपाने का यह बहुत ही अच्छा तरीका है। स्वयं अपना ज्ञान बढ़ाने के बदले दूसरे सभी लोगों को अज्ञानी बना दो।
दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जी चिट्ठा चर्चा की टिप्पणी के माध्यम से कहते हैं, "........ और जानता हूं कि हमारे पाठ्यक्रम कितने जड़ हैं. चन्द बरदाई, कबीर, तुलसी, सूर, बिहारी, केशव सब महान हैं, अपने युग में महत्वपूर्ण थे, लेकिन सामान्य हिन्दी के विद्यार्थी को उन्हें पढाने का क्या अर्थ है? तुलसी, सूर, बिहारी की भाषा आज आपकी ज़िन्दगी में कहां काम आएगी? मन्दाक्रांता, छन्द और किसम किसम के अलंकार आज कैसे प्रासंगिक हैं? अगर हम अपने विद्यार्थी को इन सब पारम्परिक चीज़ों के बोझ तले ही दबाये रखेंगे तो वह नई चीज़ें पढने का मौका कब और कैसे पाएगा?....."
भाई जब आप जानते हैं कि हमारे पाठ्यक्रम जड़ हैं तो क्या जरूरत थी आपको उसी जड़ पाठ्यक्रम को चालीस साल तक पढ़ाने की? तुलसी, सूर, बिहारी की भाषा ही वास्तविक हिन्दी भाषा है और यदि हम उस भाषा को समझ नहीं सकते, उनकी तरह लिख नहीं सकते तो इसमें उनकी भाषा का क्या दोष है? दोष है तो हमारी अज्ञानता का। मन्दाक्रांता, छन्द (आप हिन्दी पढ़ाते हैं किन्तु यह भी नहीं जानते कि मन्दाक्रांता छन्द का एक प्रकार है, छन्द जैसा काव्य का कोई अलग अवयव नहीं) और किसम किसम के अलंकार आज भी प्रासंगिक हैं किन्तु हममें अब वैसी काव्य रचने का सामर्थ्य नहीं रह गया है। उन महान कवियों ने हिन्दी को अलंकृत किया था, अब यदि हम हिन्दी को अलंकृत नहीं कर सकते तो क्या उसके वस्त्र भी उतार दें?
मैं ऐसी बातें लिखने से हमेशा परहेज करता हूँ जिनसे किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न हो। ऐसी बाते मुझे पसंद ही नहीं हैं। किन्तु आज इस पोस्ट को लिखने से मैं स्वयं को रोक नहीं पाया। जानता हूँ कि क्या होगा। बहुत सारी विरोधी टिप्पणिया ही आयेंगी ना। आने दो। न तो मैं यहाँ पर जो अपने विचार लिख रहा हूँ वह मेरे विरोधी विचार वालों पर जबरदस्ती लद जाने वाला है और न ही विरोधी विचार वाली टिप्पणियाँ मुझ पर लदने वाली हैं।
दिल खटास से भर गया है ऐसी बात पढ़ कर।
फिर तो बाप दादाओं की तस्वीरों को भी निकाल कर फेंक दो। क्यों उन्हें कमरे में लगा रखा है, क्या आवश्यकता रह गई है इन तस्वीरों की?
हिन्दी के प्राचीनतम रूप को अजायबघर में रख देने के बाद कौन सी हिन्दी का प्रयोग करोगे? अंग्रेजी शब्दों के सहारे जीवित रहने वाले खिचड़ी हिन्दी की? आज हिन्दी का सही ज्ञान ही लुप्तप्राय हो चुका है। दिल्ली जैसे हिन्दीभाषी क्षेत्र के लोगों को गागर जैसे सामान्य शब्द का अर्थ नहीं पता है (देखें मेरा ये पोस्ट)। अपने अज्ञान को छुपाने का यह बहुत ही अच्छा तरीका है। स्वयं अपना ज्ञान बढ़ाने के बदले दूसरे सभी लोगों को अज्ञानी बना दो।
दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जी चिट्ठा चर्चा की टिप्पणी के माध्यम से कहते हैं, "........ और जानता हूं कि हमारे पाठ्यक्रम कितने जड़ हैं. चन्द बरदाई, कबीर, तुलसी, सूर, बिहारी, केशव सब महान हैं, अपने युग में महत्वपूर्ण थे, लेकिन सामान्य हिन्दी के विद्यार्थी को उन्हें पढाने का क्या अर्थ है? तुलसी, सूर, बिहारी की भाषा आज आपकी ज़िन्दगी में कहां काम आएगी? मन्दाक्रांता, छन्द और किसम किसम के अलंकार आज कैसे प्रासंगिक हैं? अगर हम अपने विद्यार्थी को इन सब पारम्परिक चीज़ों के बोझ तले ही दबाये रखेंगे तो वह नई चीज़ें पढने का मौका कब और कैसे पाएगा?....."
भाई जब आप जानते हैं कि हमारे पाठ्यक्रम जड़ हैं तो क्या जरूरत थी आपको उसी जड़ पाठ्यक्रम को चालीस साल तक पढ़ाने की? तुलसी, सूर, बिहारी की भाषा ही वास्तविक हिन्दी भाषा है और यदि हम उस भाषा को समझ नहीं सकते, उनकी तरह लिख नहीं सकते तो इसमें उनकी भाषा का क्या दोष है? दोष है तो हमारी अज्ञानता का। मन्दाक्रांता, छन्द (आप हिन्दी पढ़ाते हैं किन्तु यह भी नहीं जानते कि मन्दाक्रांता छन्द का एक प्रकार है, छन्द जैसा काव्य का कोई अलग अवयव नहीं) और किसम किसम के अलंकार आज भी प्रासंगिक हैं किन्तु हममें अब वैसी काव्य रचने का सामर्थ्य नहीं रह गया है। उन महान कवियों ने हिन्दी को अलंकृत किया था, अब यदि हम हिन्दी को अलंकृत नहीं कर सकते तो क्या उसके वस्त्र भी उतार दें?
मैं ऐसी बातें लिखने से हमेशा परहेज करता हूँ जिनसे किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न हो। ऐसी बाते मुझे पसंद ही नहीं हैं। किन्तु आज इस पोस्ट को लिखने से मैं स्वयं को रोक नहीं पाया। जानता हूँ कि क्या होगा। बहुत सारी विरोधी टिप्पणिया ही आयेंगी ना। आने दो। न तो मैं यहाँ पर जो अपने विचार लिख रहा हूँ वह मेरे विरोधी विचार वालों पर जबरदस्ती लद जाने वाला है और न ही विरोधी विचार वाली टिप्पणियाँ मुझ पर लदने वाली हैं।
Thursday, December 25, 2008
हमें गलतफहमी (misunderstanding) से बचना है
ज्ञानदत्त जी के पोस्ट "वर्तमान पीढ़ी और ऊब" के प्रतिक्रियास्वरूप लिखे गये कुछ पोस्ट मैने पढ़े (ज्ञानदत्त जी से प्रेरित, नयी पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी, ये फासला क्यों?, मानसिक हलचल की हलचले)। इन्हें पढ़ कर लग रहा है कि हमारे बीच कुछ गलफहमियाँ सी उत्पन्न हो गई है। इससे पहले कि गलफहमी और बढ़े उसे खत्म कर देने में ही भलाई है।
मैं समझता हूँ कि ज्ञानदत्त जी का विरोध ऊब से था, न कि नई पीढ़ी से। हाँ उन्होंने ऊब को वर्तमान पीढ़ी के साथ सीधा जोड़ दिया यह मेरी समझ में ठीक नहीं हुआ (ज्ञानदत्त जी कृपया अन्यथा न लें)। ऊब तो पुरानी पीढ़ी में भी थी। मैं स्वयं जब दसवीं कक्षा में था तो कोर्स में शामिल चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी की विख्यात कहानी "उसने कहा था" को पहली बार पढ़ कर ऊब गया था क्योंकि उसे पहली बार पढ़कर मैं समझ नहीं सका था। उस ऊब के कारण उस कहानी को फिर से पढ़ने की इच्छा ही नहीं हो रही थी। पर हर साल परीक्षा में उस कहानी से कम से कम एक प्रश्न अवश्य ही आता था, मुझे उस कहानी को समझने के लिये बार बार पढ़ना ही पड़ा। आज "उसने कहा था" मेरी प्रिय कहानियों में से एक है। हाँ तो मैं कह रहा था कि ऊब सिर्फ वर्तमान पीढ़ी में ही नहीं है, पुरानी पीढ़ी में भी थी। किन्तु आज हर काम के लिये शार्टकट अपनाने, जैसे कि पाठ्यपुस्तक के पाठ न पढ़ कर परीक्षा गाइड पर निर्भर रहने, का चलन बढ़ गया है। यह ऊब के बढ़ जाने के परिणामस्वरूप ही है।
यह भी सही है कि ऊब जाना एक स्वाभाविक क्रिया है जिससे कोई भी नहीं बच सकता चाहे वह वर्तमान पीढ़ी का हो या पुरानी पीढ़ी का। किन्तु ऊब के कारण हम शार्टकट रास्ते न अपना कर यदि उब को सहने और ऊब से लड़ने का प्रयास करें तो क्या यह अधिक अच्छा नहीं होगा?
और फिर पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच कुछ न कुछ दूरी याने कि जनरेशन गैप तो सदा से ही चलती आई है। जब हमारी पीढ़ी युवा थी अर्थात् उन दिनों की नई पीढ़ी थी तो हमें भी अपनी पुरानी पीढ़ी दकियानूस लगा करती थी। ईश्वर ने मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा बनाया है कि यह दूरी कभी भी मिट नहीं पायेगी। पुरानी पीढ़ी सदा ही अतीत में जीती है और अतीत को वर्तमान से अच्छा समझती है और यह भी स्वाभाविक है कि वर्तमान पीढ़ी वर्तमान को अतीत से अच्छा समझती है। दोनों पीढ़ियों में "कुत्ते बिल्ली का बैर" था, है और हमेशा रहेगा।
तो हम यदि हम पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी की बात को भूलकर ज्ञानदत्त जी के पोस्ट को पढ़ें तो सारी गलफहमियाँ अपने आप दूर हो जायेंगी।
मैं समझता हूँ कि ज्ञानदत्त जी का विरोध ऊब से था, न कि नई पीढ़ी से। हाँ उन्होंने ऊब को वर्तमान पीढ़ी के साथ सीधा जोड़ दिया यह मेरी समझ में ठीक नहीं हुआ (ज्ञानदत्त जी कृपया अन्यथा न लें)। ऊब तो पुरानी पीढ़ी में भी थी। मैं स्वयं जब दसवीं कक्षा में था तो कोर्स में शामिल चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी की विख्यात कहानी "उसने कहा था" को पहली बार पढ़ कर ऊब गया था क्योंकि उसे पहली बार पढ़कर मैं समझ नहीं सका था। उस ऊब के कारण उस कहानी को फिर से पढ़ने की इच्छा ही नहीं हो रही थी। पर हर साल परीक्षा में उस कहानी से कम से कम एक प्रश्न अवश्य ही आता था, मुझे उस कहानी को समझने के लिये बार बार पढ़ना ही पड़ा। आज "उसने कहा था" मेरी प्रिय कहानियों में से एक है। हाँ तो मैं कह रहा था कि ऊब सिर्फ वर्तमान पीढ़ी में ही नहीं है, पुरानी पीढ़ी में भी थी। किन्तु आज हर काम के लिये शार्टकट अपनाने, जैसे कि पाठ्यपुस्तक के पाठ न पढ़ कर परीक्षा गाइड पर निर्भर रहने, का चलन बढ़ गया है। यह ऊब के बढ़ जाने के परिणामस्वरूप ही है।
यह भी सही है कि ऊब जाना एक स्वाभाविक क्रिया है जिससे कोई भी नहीं बच सकता चाहे वह वर्तमान पीढ़ी का हो या पुरानी पीढ़ी का। किन्तु ऊब के कारण हम शार्टकट रास्ते न अपना कर यदि उब को सहने और ऊब से लड़ने का प्रयास करें तो क्या यह अधिक अच्छा नहीं होगा?
और फिर पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच कुछ न कुछ दूरी याने कि जनरेशन गैप तो सदा से ही चलती आई है। जब हमारी पीढ़ी युवा थी अर्थात् उन दिनों की नई पीढ़ी थी तो हमें भी अपनी पुरानी पीढ़ी दकियानूस लगा करती थी। ईश्वर ने मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा बनाया है कि यह दूरी कभी भी मिट नहीं पायेगी। पुरानी पीढ़ी सदा ही अतीत में जीती है और अतीत को वर्तमान से अच्छा समझती है और यह भी स्वाभाविक है कि वर्तमान पीढ़ी वर्तमान को अतीत से अच्छा समझती है। दोनों पीढ़ियों में "कुत्ते बिल्ली का बैर" था, है और हमेशा रहेगा।
तो हम यदि हम पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी की बात को भूलकर ज्ञानदत्त जी के पोस्ट को पढ़ें तो सारी गलफहमियाँ अपने आप दूर हो जायेंगी।
Tuesday, December 23, 2008
मेरे ब्लॉग की पाठक संख्या क्यों कम है?
और किसी के मन में यह प्रश्न उठे या न उठे पर मेरे मन में तो प्रायः ही यह प्रश्न उठता है कि मेरे ब्लॉग की पाठक संख्या क्यों कम है?
मैं यह समझता हूँ कि यह सिर्फ आपकी लिखी सामग्री है (content) जो कि पाठकों को खींच कर आपके ब्लॉग में लाती है। अंग्रेजी की उक्ति हैः
'Content is king.'
अर्थात् यदि हिन्दी में कहें तो "सामग्री ही साम्राज्ञी है।"
तो जब भी आप अपने ब्लॉग की सामग्री लिखें तो यह सोच कर न लिखें कि कुछ न कुछ तो लिखना है क्योंकि ऐसी सामग्री को कोई भी पाठक पढ़ना पसंद नहीं करता। फिर ऐसे लेखन का क्या फायदा जिसे कि कोई पढ़े ही नहीं। यह तो वही बात हुई कि जंगल में मोर नाचा किसी ना देखा। तो लिखते समय हमेशा अपनी सामग्री की उत्कृष्टता ध्यान रखें।
पाठक क्या चाहता है?
अपने लेख को लोकप्रिय बनाने के लिये यह जानना बहुत जरूरी है कि पाठक क्या चाहता है। यदि पाठक को उसके पसंद की सामग्री मिलेगी तो वह उसे अवश्य ही पढ़ेगा। तो आखिर पाठक क्या चाहता है? वास्तव में पाठक संतुष्टि चाहता है। वह चाहता है कि उसे घिसी पिटी चीज पढ़ने को न मिले। उसने जो कुछ भी पढ़ा है उससे उसे कुछ नई जानकारी मिली है, उसके ज्ञान में कुछ वृद्धि हुई है।
तो ऐसे लेख पढ़ कर जिससे पाठक को कुछ भी प्राप्त नहीं होता, उसे क्षोभ होता है और जिस ब्लॉग में उसे ऐसी सामग्री पढ़ने को मिली है उस ब्लॉग से वह कन्नी काट लेता है। इसके विपरीत यदि उसे किसी ब्लॉग की सामग्री को पढ़कर कुछ नयापन मिले, उसे संतुष्टि हो तो वह उस ब्लॉग का चाहने वाला बन जाता है।
रोज रोज आखिर नई जानकारी लायें कहाँ से?
यह यक्षप्रश्न है कि आखिर रोज हम अपनी सामग्री में कहाँ से नयापन लायें? सच्चाई भी यही है कि हम हमेशा नई जानकारी नहीं प्राप्त कर सकते। पर हाँ किसी पुरानी जानकारी को ऐसी शैली में प्रस्तुत कर सकते हैं कि उसमें नयापन झलकने लगे। प्रायः सभी सफल लेखक यही करते हैं और इस प्रकार के प्रस्तुतीकरण को पाठक भी पसंद करते हैं।
लिखना शुरू करने के पहले
अपने लेख को आनन फानन में प्रकाशित न करें। पहले उसे कम से कम एक बार पढ़ें, दो बार पढ़ें तो और भी अच्छा है। विचारों के प्रवाह में लिखते समय प्रायः हिज्जे, व्याकरण और वाक्य विन्यास की गलतियाँ हो जाती हैं और इन गलतियों का पाठक के ऊपर विपरीत प्रभाव पड़ता है। प्रकाशन के पूर्व एक बार पढ़ लेने से हमें अपनी गलतियों की जानकारी हो जाती है और हम उसे सुधार सकते हैं।
पाठक के रुचि के प्रतिकूल सामग्री हो तो?
कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि हम पाठकों को ऐसी सामग्री देना चाहते हैं जिनके विषय में हम जानते हैं कि यह उनके लिये हितकारी है किन्तु उनकी रुचि के अनुरूप नहीं है। ऐसी स्थिति में आप अपने लेख को इस चतुराई से (tactfully) लिखें कि पाठक को वह सुरुचिपूर्ण लगे। मतलब यह कि कड़वी दवा के ऊपर शक्कर की परत।
पाठक संख्या बढ़ाने के लिये क्या करें?
सबसे अहम् बात तो यह है कि लोग जानें कि आपका ब्लॉग अपडेट हो गया है। ब्लोवाणी, चिट्ठाजगत, नारद जैसे हमारे हिन्दी एग्रीगेटर्स आपकी इस समस्या को बहुत हद तक हल कर देते हैं पर अभी भी बहुत से लोग हैं जो कि इन हिन्दी एग्रीगेटर्स के विषय में नहीं जानते अतः ब्लॉग अपडेट के के तत्काल बाद ही उसे पिंग करें। पिंग करने के लिये आप pingoat.com, pingomatic.com जैसी मुफ्त सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं। पिंग होने पर आपके ब्लॉग का अपडेशन विश्व के सभी बड़े ब्लॉग डायरेक्टरियों में स्वतः ही शामिल हो जाता है।
digg.com, technorati.com जैसे सोशल बुकमार्किंग साइट्स का (मुफ्त) सदस्य बनें का और अपने फेव्हरिट्स में अपने ब्लॉग को जोड़ दें। इस प्रकार जो लोग इन साइट्स के कई लाख सदस्यों पता चल जाता है कि आपका ब्लॉग अपडेट हो चुका है।
(विशेषकर technorati.com का क्योंकि वह हिन्दी को सपोर्ट करता है। यदि digg.com का प्रयोग करना है तो रोमन हिन्दी का प्रयोग करें।)
अपने लेख को कृति निर्देशिका में भी डाल दें और स्रोत बक्से में लिखें कि
".....(आपका नाम) हिन्दी के प्रति समर्पित लेखक हैं। उनके अन्य लेखों को पढ़ने के लिये आपका ब्लॉग में अवश्य पधारें।
इस प्रकार आपके ब्लोग के विषय में वहाँ आने वाले लोगों को जानकारी मिलेगी तथा आपके ब्लोग का इनबाउंड लिंक बढ़ेगा और सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि इन्टरनेट के हिन्दी सामग्री में इजाफा होगा।
मैं यह समझता हूँ कि यह सिर्फ आपकी लिखी सामग्री है (content) जो कि पाठकों को खींच कर आपके ब्लॉग में लाती है। अंग्रेजी की उक्ति हैः
'Content is king.'
अर्थात् यदि हिन्दी में कहें तो "सामग्री ही साम्राज्ञी है।"
तो जब भी आप अपने ब्लॉग की सामग्री लिखें तो यह सोच कर न लिखें कि कुछ न कुछ तो लिखना है क्योंकि ऐसी सामग्री को कोई भी पाठक पढ़ना पसंद नहीं करता। फिर ऐसे लेखन का क्या फायदा जिसे कि कोई पढ़े ही नहीं। यह तो वही बात हुई कि जंगल में मोर नाचा किसी ना देखा। तो लिखते समय हमेशा अपनी सामग्री की उत्कृष्टता ध्यान रखें।
पाठक क्या चाहता है?
अपने लेख को लोकप्रिय बनाने के लिये यह जानना बहुत जरूरी है कि पाठक क्या चाहता है। यदि पाठक को उसके पसंद की सामग्री मिलेगी तो वह उसे अवश्य ही पढ़ेगा। तो आखिर पाठक क्या चाहता है? वास्तव में पाठक संतुष्टि चाहता है। वह चाहता है कि उसे घिसी पिटी चीज पढ़ने को न मिले। उसने जो कुछ भी पढ़ा है उससे उसे कुछ नई जानकारी मिली है, उसके ज्ञान में कुछ वृद्धि हुई है।
तो ऐसे लेख पढ़ कर जिससे पाठक को कुछ भी प्राप्त नहीं होता, उसे क्षोभ होता है और जिस ब्लॉग में उसे ऐसी सामग्री पढ़ने को मिली है उस ब्लॉग से वह कन्नी काट लेता है। इसके विपरीत यदि उसे किसी ब्लॉग की सामग्री को पढ़कर कुछ नयापन मिले, उसे संतुष्टि हो तो वह उस ब्लॉग का चाहने वाला बन जाता है।
रोज रोज आखिर नई जानकारी लायें कहाँ से?
यह यक्षप्रश्न है कि आखिर रोज हम अपनी सामग्री में कहाँ से नयापन लायें? सच्चाई भी यही है कि हम हमेशा नई जानकारी नहीं प्राप्त कर सकते। पर हाँ किसी पुरानी जानकारी को ऐसी शैली में प्रस्तुत कर सकते हैं कि उसमें नयापन झलकने लगे। प्रायः सभी सफल लेखक यही करते हैं और इस प्रकार के प्रस्तुतीकरण को पाठक भी पसंद करते हैं।
लिखना शुरू करने के पहले
- जानने का प्रयास करें कि पाठकों की रुचि क्या है। कोशिश करें कि आपका लेखन उनकी रुचि के अनुरूप हो न कि आपकी अपनी रुचि के।
- जिन ब्लॉगर्स के ब्लॉग अधिक पढ़े जाते हैं उन्हें पढ़ें और विश्लेषण करें कि उनकी सामग्री में क्या विशेषताएँ हैं जिनके कारण लोग उन्हें पढ़ते हैं। इस प्रकार आपको स्वयं के लेखन की कमजोरियों का पता चलेगा। और यह कहने की आवश्यकता ही नहीं है कि अपनी कमजोरी जान लेने पर उन्हें दूर करने का प्रयत्न करना है।
- उन विषयों पर लिखने के लिये कभी भी न सोचें जिन पर आप अधिकार नहीं रखते। इधर उधर से एकत्रित की गई सामग्री कभी भी किसी को प्रभावित नहीं करती बल्कि कई बार लेखक की स्थिति को हास्यास्पद बना देती है।
- जो कुछ भी आप लिखना चाहते हैं उसके लिये तरतीबवार पॉइंट्स बना लीजिये ताकि लिखते समय कुछ छूट न जाये।
- लिखने के पहले स्वयं में पूर्ण आत्मविश्वास बना लें तभी लिखना शुरू करें।
अपने लेख को आनन फानन में प्रकाशित न करें। पहले उसे कम से कम एक बार पढ़ें, दो बार पढ़ें तो और भी अच्छा है। विचारों के प्रवाह में लिखते समय प्रायः हिज्जे, व्याकरण और वाक्य विन्यास की गलतियाँ हो जाती हैं और इन गलतियों का पाठक के ऊपर विपरीत प्रभाव पड़ता है। प्रकाशन के पूर्व एक बार पढ़ लेने से हमें अपनी गलतियों की जानकारी हो जाती है और हम उसे सुधार सकते हैं।
पाठक के रुचि के प्रतिकूल सामग्री हो तो?
कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि हम पाठकों को ऐसी सामग्री देना चाहते हैं जिनके विषय में हम जानते हैं कि यह उनके लिये हितकारी है किन्तु उनकी रुचि के अनुरूप नहीं है। ऐसी स्थिति में आप अपने लेख को इस चतुराई से (tactfully) लिखें कि पाठक को वह सुरुचिपूर्ण लगे। मतलब यह कि कड़वी दवा के ऊपर शक्कर की परत।
पाठक संख्या बढ़ाने के लिये क्या करें?
सबसे अहम् बात तो यह है कि लोग जानें कि आपका ब्लॉग अपडेट हो गया है। ब्लोवाणी, चिट्ठाजगत, नारद जैसे हमारे हिन्दी एग्रीगेटर्स आपकी इस समस्या को बहुत हद तक हल कर देते हैं पर अभी भी बहुत से लोग हैं जो कि इन हिन्दी एग्रीगेटर्स के विषय में नहीं जानते अतः ब्लॉग अपडेट के के तत्काल बाद ही उसे पिंग करें। पिंग करने के लिये आप pingoat.com, pingomatic.com जैसी मुफ्त सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं। पिंग होने पर आपके ब्लॉग का अपडेशन विश्व के सभी बड़े ब्लॉग डायरेक्टरियों में स्वतः ही शामिल हो जाता है।
digg.com, technorati.com जैसे सोशल बुकमार्किंग साइट्स का (मुफ्त) सदस्य बनें का और अपने फेव्हरिट्स में अपने ब्लॉग को जोड़ दें। इस प्रकार जो लोग इन साइट्स के कई लाख सदस्यों पता चल जाता है कि आपका ब्लॉग अपडेट हो चुका है।
(विशेषकर technorati.com का क्योंकि वह हिन्दी को सपोर्ट करता है। यदि digg.com का प्रयोग करना है तो रोमन हिन्दी का प्रयोग करें।)
अपने लेख को कृति निर्देशिका में भी डाल दें और स्रोत बक्से में लिखें कि
".....(आपका नाम) हिन्दी के प्रति समर्पित लेखक हैं। उनके अन्य लेखों को पढ़ने के लिये आपका ब्लॉग में अवश्य पधारें।
इस प्रकार आपके ब्लोग के विषय में वहाँ आने वाले लोगों को जानकारी मिलेगी तथा आपके ब्लोग का इनबाउंड लिंक बढ़ेगा और सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि इन्टरनेट के हिन्दी सामग्री में इजाफा होगा।
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