Saturday, April 2, 2011

एक बेर जीता है और एक बेर जीतने की तमन्ना है!

कभी स्कूल के दिनों में "किस्सा हातिमताई" पढ़ा था, किस्सा तो अब याद नहीं है पर इतना याद है कि उसमें एक किस्से का शीर्षक  "एक बेर देखा है और एक बेर देखने की तमन्ना है" जैसा कुछ था। हातिमताई लिखा जाने से आज तक जमाना बहुत बदल चुका है और आजकल उस जमाने के शीर्षकों जैसा शीर्षक लिखने का जरा भी चलन नहीं है। पर पुराने समय का आदमी याने कि सठियाया हुआ बुड्ढा होने के कारण मुझे वह शीर्षक आज भी अच्छा लगता है। उस किस्से में किसी ने एक अनिंद्य सुंदरी को देखा था और उसी सुंदरी को फिर से एक बार देखने की उसकी तमन्ना थी। हमने भी एक बार सन् 1983 में क्रिकेट वर्ल्डकप में जीत, जो यदि अनिंद्य सुंदरी नहीं है तो उससे कम भी नहीं है, देखी थी और आज फिर से क्रिकेट वर्ल्डकप में जीतने की तमन्ना है। आज प्रत्येक भारतीय सिर्फ यही बात बात सोच रहा है कि "एक बेर जीता है और एक बेर जीतने की तमन्ना है!"

आइये, हम सभी मिलकर ईश्वर से कामना करें कि हम सबकी यह तमन्ना पूरी हो!

Friday, April 1, 2011

क्यों मनाते हैं हम भारतीय अप्रैल फूल दिवस?

यदि हम किसी प्रकार का उत्सव मनाते हैं तो उसके पीछे कुछ न कुछ कारण अवश्य ही होता है, उत्सव मनाने के कारण या कारणों के पीछे कुछ न कुछ कहानी या कहानियाँ अवश्य ही जुड़ी होती हैं।

तो प्रश्न यह उठता है कि हम (यहाँ पर हम से मेरा मतलब हम भारतीयों से है) अप्रैल फूल दिवस क्यों मनाते हैं?

आखिर क्या कारण है हमारे द्वारा अप्रैल फूल दिवस मनाने का?

उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर में सिर्फ यही कहा जा सकता है कि हमारे द्वारा अप्रैल फूल दिवस मनाने का सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण है और वह यह कि हम अंग्रेजों के गुलाम रह चुके हैं इसलिए अंग्रेज जो भी उत्सव मनाते हैं उन उत्सवों को मनाने में हमें गर्व का अनुभव होता है। अंग्रेजों ने अपनी शिक्षा नीति के माध्यम से अपनी सभ्यता और संस्कृति को हमारे भीतर पूरी तरह से भर दिया है। अंग्रेजियत हमारे नस-नस में खून बन कर दौड़ रही है। हमें नहीं पता कि संस्कृत भाषा और हमारी संस्कृति किस चिड़िया का नाम है, हिन्दी भाषा हमारे लिए गौण हो चुका है। हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं तो सिर्फ अंग्रेजी भाषा और अग्रेंजी सभ्यता एवं संस्कृति!

Thursday, March 31, 2011

भारतीयों में राष्ट्रीय भावना खेल भरती है या प्रतिद्वन्द्विता?

क्रिकेट, भारत का राष्ट्रीय खेल न होने के बावजूद भी, आज देश में सर्वाधिक लोकप्रिय खेल है। कल  मार्च  को भारत और पाकिस्तान के मध्य खेले गए क्रिकेट मैच के दौरान प्रत्येक भारतीय के भीतर बसी भारत की जीत की कामना और भारत की जीत के के पश्चात् उनकी जुनून की हद तक पहुँच जाने वाली प्रसन्नता भारतीयों की असीम और अटूट राष्ट्रीय भावना का द्योतक हैं। वास्तव में देखा जाए तो जन-जन के भीतर भारतीयता की भावना भर देने में में क्रिकेट की अपेक्षा भारत-पाकिस्तान की चिरप्रतिद्वन्द्विता की भावना की भूमिका कहीं बहुत अधिक है। वर्तमान पीढ़ी के बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि एक जमाने में भारत-पाकिस्तान के मध्य हॉकी का मैच, विशेषतः विश्वकप में फायनल मैच, प्रत्येक भारतीय को सिर्फ और सिर्फ भारतमय बना दिया करती थी। धीरे-धीरे हॉकी की लोकप्रियता घटते-घटते लोपप्राय हो गई और क्रिकेट की लोकप्रियता बढ़ते-बढ़ते चरम में पहुँच गई किन्तु भारत-पाकिस्तान की चिरप्रतिद्वन्द्विता की भावना ज्यों की त्यों बरकरार ही रही और समस्त भारतीयों के भीतर राष्ट्रीयता की भावना भरने की भूमिका को सतत् रूप से निभाती रही।

Wednesday, March 30, 2011

पतझड़ का सौन्दर्य - मनुष्य को प्रकृति का एक अलौकिक दान!

सुबह-सुबह के सूर्य की किरणें, जो अभी एक माह पहले तक भली लगती थीं, अब प्रखर होकर संतप्त करने लगी हैं। वायु में शीतलता के स्थान पर उष्णता का आभास होने लगा है। यद्यपि पलास और सेमल के पत्रविहीन वृक्ष अभी भी रक्तवर्ण पुष्पों से सुशोभित हैं, किन्तु आम्रवृक्षों की डालियों में अब आम्रमंजरी के स्थान पर आमफल के गुच्छे दृष्टिगत होने लगे हैं। पतझड़ अपना पूर्ण यौवन प्राप्त कर चुका है और पेड़ों के नीचे उनके गिरे हुए पत्तों के ढेर दिखाई देने लगे है। बड़ और पीपल वृक्षों के छोटे-छोटे पके हुए फल टप-टप करके टपकने लगे हैं जिन्हें खाने के लिए नन्हें-नन्हें पक्षियों का झुँड मँडराते रहता है। ये समस्त दृष्य एक प्रकार के सौन्दर्य के प्रती नहीं है तो फिर क्या हैं? यही तो है पतझड़ का सौन्दर्य! मादकता के साथ आलस्य का संगम! वसन्त के अवसान और ग्रीष्म के आरम्भ का सूचक! मनुष्य को प्रकृति का एक अलौकिक दान!

Tuesday, March 29, 2011

मजाल है कि पति की कोई बात पत्नी से छुप जाये!

यदि आप शादीशुदा हैं तो आपको अवश्य ही पता होगा कि पत्नी नाम की प्राणी विलक्षण प्रतिभा से युक्त होती है। पत्नी के पास पति की एक एक बात का लेखा-जोखा रहता है। पत्नी अपने पति की एक-एक बात, एक-एक आदत को अच्छी तरह से जानती है। किस दिन आपकी सेलरी मिलती है, कब ओव्हरटाइम का पेमेन्ट होता है, कब आपको बोनस मिलता है जैसी बातें तो आपकी पत्नी अच्छी प्रकार से जानती ही हैं पर उन्हें इनके अलावा इसका भी ज्ञान रहता है कि आप कब पीकर आये हैं, कब झूठ बोल रहे हैं आदि-आदि इत्यादि। पति अपने बारे में जितना नहीं जानता उससे अधिक पत्नी जानती है उसके विषय में। मजाल है कि पति की कोई बात पत्नी से छुप जाये! कहने का लब्बोलुआब है कि बहुत विचित्र जीव होती है ये पत्नी नाम की प्राणी।

आपके रग-रग से परिचित होने के लिए आपकी पत्नी को बहुत अधिक समय की आवश्यकता नहीं होती, शादी होने के चंद दिनों के भीतर ही वह आपके बारे में सब कुछ जान लेती है। इस बात की एक आपबीती उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ।

शादी के पहले ऑफिस जाते समय हमारी माता जी हमारा टिफिन तैयार करती थीं। हमारी खुराक से अधिक खाना रहता था उसमें। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि प्रायः प्रत्येक ऑफिस में एक न एक सहकर्मी जरूर ऐसा होता है जो कभी भी अपना टिफिन नहीं लाता पर खायेगा जरूर दूसरों की टिफिन से। हमारे टिफिन का अतिरिक्त खाना हमारे एक ऐसे ही सहयोगी के काम आता था। शादी होने के बाद कुछ दिनों तक तो माता जी ही टिफिन तैयार करती रहीं फिर धीरे से इस कार्यभार को हमारी श्रीमती जी ने अपने हाथों में ले लिया। लंच समय में जब हमने टिफिन खोला तो देखा छः पराठों की जगह चार ही पराठे और चाँवल भी रोज की अपेक्षा आधा। इधर हमारे टिफिनविहीन मित्र भी तत्काल आ धमके। खाना खाने की हमारी गति बहुत धीमी है। हम जब तक एक पराठा खतम करते, मित्र ने बाकी तीनों पराठे उदरस्थ कर लिये। चाँवल का भी अधिकतम हिस्सा उनके ही उदर में समा गया। हम तो रह गये भूखे।

ऑफिस से आने पर श्रीमती जी से जब कहा कि खाना कम क्यों रखा था तो जवाब मिला, "कम? कम कहाँ था? क्या मैं नहीं जानती कि आप कितना खाते हैं? मैंने तो अपने हिसाब से कुछ अधिक ही खाना रखा था। लगता है कि आपका खाना दूसरे लोग खा जाते हैं।"

हमने कहा, "हाँ भइ, अब कोई एकाध रोटी खा ले तो क्या फर्क पड़ता है? मना करते अच्छा भी तो नहीं लगता।"

वे बोलीं, "क्यों अच्छा नहीं लगता? क्या आपके मित्रों को तनखा नहीं मिलती? वो अपना खाना खुद क्यों नहीं लाते? अब से आपका इस प्रकार से रोज रोज दूसरों को खाना खिलाना बिल्कुल नहीं चलेगा।"

बताइए अब हम क्या कहते? इधर ऑफिस में हमारे मित्र को तो आदत लगी हुई थी रोज हमारे साथ खाने की, उन्हें क्या पता कि अब हमें भूखे मरना पड़ता है। अन्ततः दो-तीन दिन बाद कह ही दिया, "यार, तुम अपना खाना लाया करो नहीं तो नजदीक के भोजनालय में चला जाया करो।"

इस प्रकार से श्रीमती जी ने हमसे वह कहलवा लिया जो कि शादी के पहले हम कभी भी नहीं कह सकते थे।

शुरू-शुरू में तो हम त्रस्त रहते थे उनके हमारे बारे में सबकुछ जानने की वजह से। हम वे समझते थे कि पति के लिये पत्नी "साँप के मुँह में छुछूंदर" ही होती है जिसे न तो निगलते बनता है और न ही उगलते। पर बाद में धीरे-धीरे इस बात की समझ भी हमें आ ही गई कि पत्नियाँ जहाँ एक तरफ पतियों को अपनी मुट्ठी में रखने का भरपूर प्रयास करती हैं वहीं दूसरी तरफ पति पर आये किसी भी विपत्ति को दूर करने के लिये जी जान तक लगा देती हैं।

जीवन में पति-पत्नी के बीच बहुत सारे तकरार, नोक-झोंक चलते हैं किन्तु यह भी सत्य है कि वे दोनों ही एक-दूसरे के पूरक भी हैं। एक के बिना दूसरे का जीवन अधूरा है। पत्नी पति की प्रेरणा होती है। अनेक उदाहरण मिल जायेंगे इसके और सबसे बड़ा उदाहरण तो तुलसीदास जी का है। यदि रत्नावली ने यह न कहा होता किः

"लाज न आवत आपको, दौरे आयहु साथ।
धिक् धिक् ऐसे प्रेम को, कहा कहौं मैं नाथ॥
अस्थिचर्ममय देह यह, ता पर ऐसी प्रीति।
तिसु आधो रघुबीरपद, तो न होति भवभीति॥"


तो आज हम रामचरितमानस से ही वंचित रहते।

श्री गोपाल प्रसाद व्यास जी ने सही ही लिखा हैः

यदि ईश्वर में विश्वास न हो,
उससे कुछ फल की आस न हो,
तो अरे नास्तिको! घर बैठे,
साकार ब्रह्‌म को पहचानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो!


तो साहब, हँसी-ठिठोली, हास-परिहास, घात-प्रतिघात, ब्याज-स्तुति, ब्याज-निंदा तो चलते ही रहते हैं। ये सब न हों तो जीवन में रस ही क्या रह जाता है?

एक बात तो माननी ही पड़ेगी, पत्नी चाहे पति को गुलाम बनाये या चाहे पति की गुलामी करे, होती वह सच्चा साथी है। जीवन के सारे सुख-दुःख में साथ निभाने वाली वही होती है!

'अवधिया' या संसार में, मतलब के सब यार।
पत्नी ही बस साथ दे, बाकी रिश्ते बेकार॥


चलते-चलते

पति, "तुम मेरे रिश्तेदारों की बनिस्बत अपने रिश्तेदारों को ज्यादा प्यार करती हो।"

पत्नी, "गलत! मैं अपनी सास से अधिक तुम्हारी सास को प्यार करती हूँ।"