Thursday, August 4, 2011

सावन का पावन प्रणय-मास!

मूसलाधार वर्षा की टिपर-टिपिर...

तेज गति से चलती हुई पुरवाई की साँय-साँय...

बादलों की गड़गड़ाहट...

दादुरों की टर्राहट...

इन समस्त ध्वनियों का आपस में गड्डमड्ड हो जाने की प्रक्रिया एक विचित्र किन्तु मनभावन हारमोनी उत्पन्न कर देती हैं जिसके संगीत में डूबकर मन विभोर हो जाता है।

रात के सन्नाटे में मूसलाधार वर्षा के मध्य दामिनी की दमक और मेघों की कड़क एक ऐसी विचित्र अनुभूति का अनुभव होने लगता है जिसे कि शब्दों में बयान करना बहुत ही मुश्किल कार्य लगने लगता है। ऐसे में यदि दूर किसी रेडियों से  "मनमोर हुआ मतवाऽऽला ये किसने जादू डाला रे..." जैसे फिल्मी गीत के बोल सुनाई दे जाय तो कहना ही क्या है!

भगवान भास्कर द्वारा श्यामल-उज्ज्वल मेघों के लिहाफ को नख से शिख तक ओढ़ लेना, भरी दुपहरी का घटाटोप अंधेरे के आभास के कारण तिमिरमय रात्रि जैसा प्रतीत होना, इस तिमिर के बीच चपला की चमक से सम्पूर्ण धरा का चौंधिया जाना और उसके बाद मेघों के गगनभेदी गर्जन से उसका काँप जाना ही तो पावस का अपूर्व सौन्दर्य है!

पावस में कभी मूसलाधार तो कभी हल्की फुहार से नदी-नाले अपनी उफान पर आ जाते हैं। ऐसा प्रतीत होने लगता है कि उफनती हुई सरिताएँ सम्पूर्ण धरा को अपने भीतर समेट लेना चाह रही हैं। उनकी वेगवती प्रचण्ड धाराएँ चट्टानों से टकरा कर उन्हें चूर-चूर कर डालने के लिए आतुर हैं। वेगवती धाराओं का विशाल शिलाओं पर प्रहार से उत्पन्न धवल फेन की शुभ्रता नयनाभिराम प्रतीत होने लगती हैं।

पावस की ऋतु वह ऋतु है जो -

बाल हृदय को उल्लासित कर देता है...

युवा प्रेमी-युगलों के हृदय में मधुर मिलन के लिये तड़प उत्पन्न कर देता है...

विरहातुरों को संतप्त कर देता है...

वृद्ध हृदय को अतीत का स्मरण कराता है।

पावस में कवि-हृदय नव सृजन के लिए बरबस व्याकुल हो उठता है। जहाँ गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर बरबस ही गुनगुना उठते हैं "वृष्टि पड़े टापुर-टुपुर ..." वहीं रामेश्ववर शुक्ल 'अंचल' कह "पावस गान" में कह उठते हैं 'सावन का पावन प्रणय-मास!' हम मनुष्यों की तो बिसात ही क्या, देवाधिदेव श्री राम के मुख से बरबस निकल पड़ता है -

घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥

पोस्ट के अन्त यह भी बता देना चाहता हूँ कि लिखने को तो इतना सब कुछ लिख गया हूँ पर इन सारी अनुभूतियों पर भारी पड़ रहा है यह विचार कि -

सामने हैं सावन के सारे त्यौहार
जिस पर है भयंकर मँहगाई की मार
कहीं से लेना पड़ेगा उधार
नहीं तो काम चलाना हो जाएगा दुश्वार
लटक रही है ऐसी तलवार
जिसने कर दिया है "सौन्दर्य अनुभूति" को तड़ीपार
अब ऐसे में भला क्या पोस्ट लिखें यार?

Saturday, July 30, 2011

कई काम हम सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि उस काम को दूसरों ने भी किया है

आज छत्तीसगढ़ के प्रायः सभी मकानों के दरवाजों पर नीम की पत्तियों वाली टहनियाँ खुँसी हुई दिखाई पड़ रही हैं। भोर होते ही घरों के दरवाजों में नीम पत्ती लगाने का सिलसिला शुरू हो गया था। रायपुर में तो ऑटोरिक्शा, बस आदि वाहनों में भी नीम की टहनियाँ खुँसी हुई दिखाई दे रही हैं। अभी कुछ देर पहले मैं जिस ऑटो रिक्शा में था उस के सामने भी नीम की टहनी लगी हुई थी। ऑटो में बैठे एक सवारी ने, जो कि शायद छत्तीसगढ़ से बाहर से आया हुआ था, ऑटो वाले से पूछ लिया कि उसने यह नीम की टहनी क्यों लगा रखी है तो ऑटो वाले ने जवाब दिया कि अन्य वाहनों में नीम की टहनी लगी है इसलिए उसने भी अपने ऑटो में नीम की टहनी लगा लिया है। याने कि उसे स्वयं नहीं पता कि उसने नीम की टहनी लगाने का काम क्यों किया है। प्रायः होता यह है कि कई काम हम सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि उस काम को दूसरों ने भी किया है।

नीम की टहनी लगाने के पीछे वास्तविक कारण यह है कि आज छत्तीसगढ़ का एक विशिष्ट त्यौहार हरेली है जिसके विषय में मान्यता यह है कि आज का दिन विभिन्न प्रकार की शक्तियों के जागृत करने का दिन है और किसी प्रकार की तन्त्र-मन्त्र जनित बुरी शक्ति से नीम की टहनी रक्षा करती है। कहा जाता है कि हरेली, दीवाली, होली तथा हर महीने की अमावस्या और पूर्णिमा तान्त्रिकों तथा जादू-टोना करने वालों के लिए विशेष दिन होते हैं और इन्ही दिनों में उनकी विद्या का सफलतम प्रयोग होता है। उल्लेखनीय है कि हरेली का त्यौहार श्रावण माह की अमावस्या को मनाया जाता है।

यद्यपि आज छत्तीसगढ़ में टोनही की अवधारणा तो समाप्तप्राय हो चुकी है किन्तु टोनही की अवधारणा से जनित भय आज भी बाकी है। यही कारण है कि आज प्रत्येक घर के दरवाजों में नीम की पत्तियों वाली छोटी-छोटी डंगाले टंगी हुई दिखाई दे रही हैं। वास्तव में हम अंध-विश्वास को तो दूर कर लेते हैं किन्तु अंध-विश्वास जनित भय को अपने भीतर से नहीं भगा पाते। अज्ञात का डर मनुष्य को आरम्भ से ही सताता रहा है और शायद अन्त तक सताता ही रहेगा।

हरेली को छत्तीसगढ़ में एक विशिष्ट त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। यह हिन्दू वर्ष (चैत्र-फाल्गुन) का प्रथम त्यौहार है जबकि होली अन्तिम! हरेली के दिन छत्तीसगढ़ में गाँव का बैगा गाँव की रक्षा करने के लिए ग्राम-देवता की पूजा करता है जिसके आयोजन के प्रत्येक ग्रामवासी सहयोग-राशि प्रदान करता है। दिन में त्यौहार की खुशियाँ मनाई जाती है किन्तु रात्रि को अत्यन्त भयावह माना जाता है।

Friday, July 15, 2011

गुरु तो रहे नहीं, गुरु पूर्णिमा रह गया

कहाँ रहे अब गुरु? वे गुरु जो अपने शिष्यों को प्राण से भी प्यारे मानते थे, उन्हें जीवन का सद्मार्ग दिखाते थे, आत्म-निर्भर बनाते थे, प्रत्येक परिस्थिति में अडिग रहना सिखाते थे। मेकॉले द्वारा लादी हुई शिक्षा नीति ने आश्रम प्रथा तथा गुरुकुलों को विनष्ट कर डाला और उनके नष्ट होने से वे गुरु भी लुप्त हो गए। उनका स्थान ले लिया प्रोफेसरों, लेक्चररों, टीचरों और शिक्षा कर्मियों ने जो आत्मनिर्भरता सिखाने के बजाय विद्यार्थियों के भीतर नौकरी करके दूसरों पर निर्भर रहने की भावना को बढ़ावा देते हैं तथा उन्हें सर्टिफिकेट, डिप्लोमा इत्यादि दिलाने की व्यवस्था करते हैं ताकि वे ऊँची से ऊँची नौकरियाँ प्राप्त कर सकें।

गुरु लुप्त हो गए किन्तु गुरु पूर्णिमा का अस्तित्व बना ही रहा क्योंकि लाख कोशिश करने के बावजूद भारत को लूटने वाले भारतीय के भीतर से भारतीयता को नहीं मिटा पाए।

चलते-चलते

जा के गुरु है आंधरा, चेला निपट निरंध।
अंधे अंधा ठेलिया, दोना­ कूप परंत॥

Wednesday, July 13, 2011

चाणक्य रचित सूक्तियाँ

  • मनुष्य अकेला ही पैदा होता है; अकेला ही मरता है; अकेला ही अच्छे तथा बुरे परिणामों का अनुभव करता है और अकेला ही परमधाम अथवा नर्क को प्राप्त करता है।
  • मनुष्य जन्म से महान नहीं होता, उसके कर्म उसे महान बनाते हैं।
  • किसी व्यक्ति को अत्यधिक ईमानदार नहीं होना चाहिए, जिस प्रकार से सीधे वृक्ष को पहले काटा जाता है उसी प्रकार से अत्यधिक ईमानदार व्यक्ति को पहले प्रताड़ना दी जाती है।
  • जिस प्रकार से एक सूखा पेड़ अग्नि पाकर पूरे वन का विनाश कर देता है उसी प्रकार से एक दुष्ट पुत्र समस्त परिवार का नाश कर देता है।
  • भय के उत्पन्न होते ही उस पर वार करके उसका विनाश कर दो।
  • किसी कार्य को आरम्भ करने के पूर्व स्वयं से तीन प्रश्न करो - मैं यह कार्य क्यों कर रहा हूँ?, मेरे इस कार्य का परिणाम क्या होगा? और क्या मुझे इस कार्य में सफलता मिलेगी? गहन विचार करने के पश्चात् यदि इन प्रश्नों के संतोषप्रद उत्तर मिलें तभी आगे बढ़ो।
  • किसी मूर्ख के लिए पुस्तकें उतनी ही उपयोगी होती हैं जितना अंधे के लिए आईना।
  • सबसे बड़ा गुरुमन्त्रः अपने भेद कभी भी किसी से मत कहो, ऐसा करना तुम्हें विनाश तक ले जाएगा।
  • नारी का यौवन तथा सौन्दर्य संसार की सबसे बड़ी शक्ति है।

Tuesday, July 12, 2011

समुद्र के अन्य नाम

संस्कृत ग्रंथ अमरकोष के अनुसार समुद्र के नाम हैं -
  • समुद्र
  • सागर
  • सिन्धु
  • रत्नाकर
  • उदधि
  • जलनिधि
  • सरित्पति
  • उदन्वान
  • सरस्वान
  • अब्धि
  • अर्णव
  • अकूपार
  • आकूपार
  • पारावार
  • यादपति
  • अपांपति