Saturday, September 10, 2011

स्वर्ग में जाकर गुलामी बनने की अपेक्षा नर्क में जाकर राजा बनना बेहतर है

  • स्वर्ग में जाकर गुलामी बनने की अपेक्षा नर्क में जाकर राजा बनना बेहतर है।
  • भले ही आपका जन्म सामान्य हो, आपकी मृत्यु इतिहास बन सकती है।
  • अन्धेरी रात के बाद चमकीला सुबह अवश्य ही आता है।
  • 'उत्तम होना' एक कार्य नहीं बल्कि स्वभाव होता है।
  • असफलता मुझे स्वीकार्य है किन्तु प्रयास न करना स्वीकार्य नहीं है।
  • 'आँखों से देखा' एक बार अविश्वसनीय हो सकता है किन्तु 'अनुभव से सीखा' कभी भी अविश्वसनीय नहीं हो सकता।
  • कल की असफलता वह बीज है जिसे आज बोने पर आने वाले कल में सफलता का फल मिलता है।
  • भूत इतिहास होता है, भविष्य रहस्य होता है और वर्तमान ईश्वर का वरदान होता है।
  • कोई भी कार्य सही या गलत नहीं होता, हमारी सोच उसे सही या गलत बनाती है।
  • कठिन परिश्रम का कोई भी विकल्प नहीं होता।
  • यदि आपको कोई कार्य कठिन लगता है तो इसका अर्थ है कि आप उस कार्य को गलत तरीके से कर रहे हैं।

Friday, September 9, 2011

कुछ रोचक तथ्य

  • कोई भी व्यक्ति स्वयं की कुहनी को चाट नहीं सकता।
  • छींकते वक्त आँखे खुली रखना असम्भव है।
  • छींकते समय हृदय की गति एक मिली सेकंड के लिए रुक जाती है।
  • संसार में 50% से भी अधिक लोग ऐसे हैं जिन्हें कभी टेलीफोन प्रयोग करने का अवसर ही नहीं मिला है।
  • मात्र एक घण्टा तक हेडफोन पहने रहने से कान में बैक्टीरिया की संख्या 700 गुना बढ़ जाती है।
  • लाइटर का आविष्कार माचिस से पहले हुआ।
  • उँगलियों के निशान जैसे ही सभी के जीभ के निशान भी अलग-अलग होते हैं।
  • बिना खाना खाए एक माह तक जिंदा रहा जा सकता है जबकि बिना पानी पिए केवल एक सप्ताह। शरीर में सिर्फ 1% पानी की कमी होने पर प्यास महसूस होने लगती है और 10% कमी होने पर प्राण निकल जाते हैं।
  • ध्वनि की गति हवा की अपेक्षा स्टील में  15 गुनी अधिक होती है।
  • लिओनार्डो डा विंसी एक ही समय में एक हाथ से लिख सकते थे साथ ही दूसरे हाथ से चित्रकारी भी कर सकते थे।
  • च्युइंगगम चबाते-चबाते प्याज काटने से आँख से आँसू नहीं आते। (यद्यपि प्याज काटने से आँखों में आँसू बनने की प्रक्रिया अवश्य होती है किन्तु जबड़ों के लगातार चलते रहने के कारण वे आँख के बाहर तक नहीं आ पाते।)
  • "Rhythm" अंग्रेजी का वह सबसे बड़ा शब्द है जिसमें अंग्रेजी का कोई भी स्वर (vowel) का प्रयोग नहीं हुआ है।
  • शहद एक ऐसा खाद्य पदार्थ है जो हजारों साल तक खराब नहीं होता। (मिश्र के फैरो के कब्रों में पाए गए शहद को पुरातत्वविदों द्वारा चख कर देखने पर पाया गया है कि वह आज भी खाने योग्य है।)
  • पृथ्वी सौरमण्डल का एकमात्र ग्रह है जिसका नाम किसी देवता के नाम पर नहीं रखा गया है।
  • नींद में होने पर भी डॉल्फिन की एक आँख खुली रहती है।

Monday, September 5, 2011

शिक्षक और गुरु

मोटे तौर पर तो यही लगता है कि शिक्षक और गुरु पर्यायवाची शब्द हैं किन्तु यदि गहराई में जाया जाए तो यह सही नहीं लगता। शिक्षक का काम है विद्यार्थी को शिक्षा देना, ऐसी शिक्षा जो उन्हें डिग्री, डिप्लोमा या सर्टिफिकेट दिलवा सके जिसकी बदौलत शिक्षा पाने वाला अपनी आजीविका चला सके जबकि गुरु अपने शिष्य को ज्ञान देता है, ऐसा ज्ञान जो उसे स्वावलम्बी तो बनाता ही है, साथ ही शिष्य के भीतर नैतिकता, न्यायप्रियता, मानवता, राष्ट्रप्रेम, स्वाभिमान जैसी भावनाओं को भी कूट-कूट कर भरता है। शिक्षक विद्यार्थियों को सिर्फ किताबों में लिखी बातों को ही सिखाता है जबकि गुरु अपने शिष्य को सत्य से परिचित करवाता है, उस सत्य से जो पुस्तकों में कहीं भी नहीं मिलता। सत्य को पुस्तकें पढ़ कर नहीं जाना जा सकता, उसे सिर्फ ज्ञान और अनुभव से ही जाना जा सकता है। सत्य को न जानने वाला सदैव अपने इन्द्रियों के वश में रहता है किन्तु सत्य को जान लेने वाले में अपने इन्द्रियों को नियन्त्रित करने की क्षमता आ जाती है और वह इन्द्रियों के वश में न रह कर इन्द्रियों को अपने वश में कर लेता है।

शिक्षक शिक्षा देने के लिए नियत वेतन लेता है, नियत फीस लेता है, नियत पारश्रमिक लेता है अर्थात शिक्षा का मोल लेता है किन्तु गुरु ज्ञान देने के लिए बदले में कुछ भी नहीं माँगता क्योंकि वह जानता है कि ज्ञान का कोई मोल नहीं होता। विद्या अमोल होती है, ज्ञान का मोल चुकाने का सामर्थ्य संसार में किसी के भी पास नहीं है, तो भला गुरु विद्या की कीमत कैसे लगा सकता है? हाँ, शिष्य की श्रद्धानुसार दी गई दक्षिणा को वह अवश्य स्वीकार करता है। यह दक्षिणा न तो वेतन है, न फीस है और न ही पारश्रमिक है़, यह तो शिष्य का गुरु के प्रति मात्र आभार प्रदर्शन है, गुरु के प्रति शिष्य की श्रद्धा और समर्पण है। दक्षिणा की राशि नियत नहीं होती, दक्षिणा शिष्य की श्रद्धानुसार स्वेच्छा से दी जाती है। वसिष्ठ को दक्षिणा के रूप में राम जितनी राशि दे सकते हैं उतनी राशि गुह, जो कि भील होने के नाते राम के कहीं बहुत अधिक निर्धन है, दे ही नहीं सकता, सन्दीपनि जानते हैं कि दक्षिणा में कृष्ण जितनी राशि सुदामा दे ही नहीं सकता। फिर भी गुरुओं की दृष्टि में उनके सभी शिष्य एक समान होते हैं और वे उन्हें एक जैसा ही ज्ञान देते हैं।

अंग्रेजों के आने के बाद भी कुछ समय तक गुरु-दक्षिणा की यह परम्परा जारी रही। हजारों ब्राह्मण अध्यापक अपने घरों में ही अपने शिष्यों को ज्ञान प्रदान करते थे।  दक्षिणा के रूप में जहाँ उन्हें राजा-महाराजाओं, जमींदारों आदि धनाढ्य लोगों से जमीन, जायजाद, सोना, चाँदी और बहुत अधिक मात्रा में नगदी मिल जाती थी वहीं वे निर्धन शिष्यों को निःशुल्क ही ज्ञान बाँटा करते थे। दक्षिणा में मिली सम्पत्ति का भी वे उतना ही उपयोग करते थे जितने की उन्हें आवश्यकता होती थी और शेष सम्पत्ति को वे उन्हीं राजा-महाराजाओं तथा जमींदारों की अमानत समझते थे और जरूरत पड़ने पर वे उस राशि को राज्य और समाज के हित में भी व्यय कर दिया करते थे।

शिष्य का गुरु के प्रति सम्मान की भावना जीवन-पर्यन्त बनी रहती थी और गुरु-पूर्णिमा के दिन इस भावना का विशेष प्रदर्शन होता था। आज विद्यार्थी का शिक्षक के प्रति सम्मान की कितनी भावना है यह बताने की आवश्यकता नहीं है, यह तो आप सभी जानते हैं। हाँ, यह बात अवश्य है कि शिक्षक दिवस मना कर भले शिक्षक स्वयं को गर्वान्वित महसूस कर ले।

वसिष्ठ और विश्वामित्र जैसे गुरुओं के दिए ज्ञान ने राम जैसा शासक का निर्माण किया जिनके लिए प्रजा ही सर्वोपरि थी, यहाँ तक कि उन्होंने प्रजा की भावनाओं का सम्मान करके अपनी धर्मपत्नी तक का भी त्याग कर दिया। और आज शिक्षकों की दी गई शिक्षा नें हमें किस प्रकार के शासक दिए हैं यह तो आप देख ही रहे हैं।

Wednesday, August 31, 2011

छत्तीसगढ़ में तीजा - सुयोग्य वर की प्राप्ति तथा अखण्ड सौभाग्य की कामना का त्यौहार

महिलाओं के लिए उत्तर भारत में जो महत्व करवा चौथ का है वही महत्व छत्तीसगढ़ की महिलाओं के लिए तीजा का है। भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की तृतीया का दिन छत्तीसगढ़ में "तीजा" के नाम से जाना जाता है। इस दिन छत्तीसगढ़ की समस्त महिलाएँ, चाहे वे कुमारी हों या विवाहित, निर्जला व्रत रख कर रात्रि जागरण और गौरी-शंकर की पूजा करती हैं। इस व्रत-पूजन का उद्देश्य होता है - विवाहित महिलाओं का अपने लिए अखण्ड सौभाग्य की कामना करना और कुमारियों के लिए अपने हेतु सुयोग्य वर की प्राप्ति। मान्यता है कि आज के दिन ही शिव-पार्वती का विवाह हुआ था। छत्तीसगढ़ में तीजा व्रत की अत्यधिक मान्यता है। इस व्रत को मायके में ही आकर रखा जाता है। यदि किसी कारणवश मायके आना नहीं हो पाता तो भी व्रत तोड़ने के लिये मायके से जल और फलाहार का आना आवश्यक होता है क्योंकि इस व्रत को मायके के ही जल पीकर तोड़ा जाता है।

महिलाएँ रात भर जागरण करके भजन-पूजन करती हैं और भोर होने के बाद अपना व्रत तोड़ती हैं।

Tuesday, August 30, 2011

घन घमंड नभ गरजत घोरा

भादों का महीना है किन्तु पिछले तीन-चार दिनों से सावन-सी झड़ी लगी हुई है। इन तीन-चार दिनों में तीन-चार बार भगवान भास्कर ने उज्जवल-श्यामल मेघों के आवरण से झाँक तो अवश्य लिया है किन्तु आज प्रातःकाल से सायंकाल तक एक भी बार दर्शन नहीं दिया है। चहुँ ओर काले काले घन छाए हुए हैं। क्या सुबह, क्या दोपहर, हर वक्त शाम जैसा ही प्रतीत हो रहा है। कल मध्यरात्रि से आज अपराह्न तक मेघ गरज-गरज कर अनवरत रूप से बरस रहे हैं, कभी मूसलाधार वर्षा की मोटी-मोटी बूँदें बरसती हैं तो कभी कपास के रेशों जैसी फुहार पड़ती है। वर्षा की मोटी-मोटी बूँदों के धरा पर टपकने की लयबद्ध ध्वनि, सीमेंट और कंक्रीट के जंगल जैसे शहर में आज भी अपने अस्तित्व को बनाए रखे हुए कुछ पुराने घरों के खपरैलों से गिरते पानी की आवाज तथा सीमेंट के लैंटर वाले छतों से पानी निकासी वाले पाइपों से गिरने वाली मोटी धार के भूमि से टकराने का नाद व्यक्ति को एक मनमोहक संगीत के सागर में डुबा देता है और उसका मन-मयूर नाचने लगता है। शायद किसी संगीत ने 'सेनापति' को "अंबर अडंबर सौ उमड़ि घुमड़ि छिन छिछके छछारे छिति अधिक उछारे हैं" पंक्ति की रचने के लिए विवश किया रहा होगा। बादलों के बीच बिजली की तड़प से क्षण भर के लिये सम्पूर्ण धरा चौंधिया जाती है और उसके कुछ क्षणों बाद गगनभेदी गर्जन से काँप उठती है। दामिनी की इस दमक, मेघों की गर्जना और अनवरत मूसलाधार वर्षा को देखकर विरहिन नायिका बरबस गुनगुना उठती है "बादल तो आए लहरा के छाये, ओ आने वाले पर तुम तो न आए" (फिल्म दिल्लगी के लिए गीतकार योगेश द्वारा लिखे गए गीत की पंक्ति)। राम जैसे अवतारी पुरुष भी पावस से अप्रभावित नहीं रह पाते और कह उठते हैं "घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥"

चलते-चलते

'सेनापति' का पावस ऋतु वर्णन:

दामिनी दमक, सुरचाप की चमक, स्याम
घटा की घमक अति घोर घनघोर तै।
कोकिला, कलापी कल कूजत हैं जित-तित
सीतल है हीतल, समीर झकझोर तै॥
सेनापति आवन कह्यों हैं मनभावन, सु
लाग्यो तरसावन विरह-जुर जोर तै।
आयो सखि सावन, मदन सरसावन
लग्यो है बरसावन सलिल चहुँ ओर तै॥