Thursday, November 17, 2011

प्राचीन भारत में नगरीय सभ्यता

मोहन जोदड़ो की खुदाई में मिले विशाल नगर के अवशेष ने यह तो सिद्ध कर दिया है कि आज से लगभग पाँच हजार साल पहले भारत में नगर हुआ करते थे जो आज के आधुनिक नगरों जैसे ही होते थे। सन् 2001 में खम्बात की खाड़ी में समुद्र के भीतर 120 फुट नीचे एक नगर का अवशेष मिला जो कि, कार्बन डेटिंग के अनुसार, 9500 वर्ष पुराना है। (लिंक) इससे सिद्ध होता है कि भारत में हड़प्पा सभ्यता के लगभग 4500 वर्ष पहले भी नगर थे।

ये तो हुए पुरातात्विक साक्ष्य! पर प्राचीन भारत में विशाल नगरों के साक्ष्य विभिन्न प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में भी मिलते हैं। वाल्मीकि रचित रामायण में अयोध्या नगरी, मिथिला नगरी, लंकापुरी, विशाला नगरी आदि के विस्तृत विवरण हैं।रामायण में लिखा है कि उन भव्य नगरों में सुन्दर मन्दिर,  विशाल अट्टालिकायें, सुन्दर-सुन्दर वाटिकाएँ, बड़ी बड़ी दुकानें इत्यादि हुआ करती थीं। अमूल्य आभूषणों को धारण किये हुये स्त्री-पुरुष आदि नगर की सम्पन्नता का परिचय देते थे। चौड़ी-चौड़ी और साफ सुथरी सड़कों को देख कर ज्ञात होता था कि नगर के रख-रखाव और व्यवस्था बहुत ही सुन्दर और प्रशंसनीय होती थी।

उपरोक्त वर्णन से ज्ञात होता है कि उस काल में आज की ही तरह से नगरों का निर्माण तथा उनका रख-रखाव हुआ करता था। नगरों की साफ-सफाई तथा रख-रखाव के लिए अवश्य ही आज के जैसे ही स्वायत्तशासी संस्थाएँ भी रहा करती होंगी।

भारत में अत्यन्त प्राचीन काल में भी विशाल नगरों का होना भारत के गौरव का द्योतक है तथा भारत का यह गौरव विश्व भर में भारत को एक विशिष्ट स्थान प्रदान करता है। भारत को विश्व भर में विशिष्ट स्थान प्राप्त होना यूरोपियनों, विशेषकर अंग्रेजों, को बिल्कुल पसन्द नहीं आया क्योंकि वे स्वयं को भारतीयों से श्रेष्ठ समझते थे। इसलिए अंग्रेजों ने भारत में अपना उपनिवेश बनाने के बाद सबसे पहला काम तो यह सिद्ध करने का किया कि प्राचीन भारत में सही ढंग से इतिहास लिखने की प्रथा ही नहीं थी और जो भी प्राचीन भारतीय ग्रंथ हैं उनमें इतिहास है ही नहीं, जो कुछ भी है वह गल्प मात्र है। सन् 1909 में प्रकाशित इम्पीरियल गजेटियर कहता है "ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में हिन्दुओं ने कभी भी सही इतिहास लिखने का प्रयास ही नहीं किया। उन्होंने केवल सामान्य साहित्य ही छोड़ा है जिसमें कहीं-कहीं पर ऐतिहासिक वर्णन भी है, किन्तु, जैसा कि स्पष्ट दिखाई देता है, केवल आकस्मिक वर्णन को इतिहास नहीं समझा जा सकता।" (देखें इम्पीरियल गजेटियर का निम्न स्नैपशॉट)
उसी गजेटियर में एक अन्य स्थान पर लिखा है "यह पहले ही कहा जा चुका है कि हिन्दुओं ने अपने वसीयत के रूप में हमें कोई भी ऐसी ऐतिहासिक वस्तु नहीं दी है जिसे कि सच्चा इतिहास माना जा सके......" (देखें स्नैपशॉट)

कहने का तात्पर्य यह है कि अंग्रेजों ने अपनी श्रेष्ठता बताने के लिए हमारे ग्रन्थों को झुठलाया, एक स्थान पर तो गजेटियर यह भी कहता है कि 'यद्यपि हिन्दू रामायण को महाभारत से प्राचीन मानते हैं किन्तु उसमें निहित सामग्री को पढ़ने से यूरोपियन विद्वानों को यही प्रतीत होता है कि रामायण की रचना महाभारत के बाद हुई है और यूरोपियन विद्वान महाभारत काल को रामायण काल से पहले का काल मानते हैं'।

हमारे ग्रन्थों के अर्थ तो उन्हों तोड़ा-मरोड़ा ही, साथ ही उन्होंने भारत पर आर्यों का आक्रमण जैसे कपोल-कल्पना को भी जन्म दे दिया ताकि भारत की श्रेष्ठता कभी सिद्ध ही न हो सके।

आज जो भारत का इतिहास पढ़ाया जाता है उसे कोई भी जरा सी भी बुद्धि रखने वाला व्यक्ति भारत का इतिहास मान ही नहीं सकता। वह तो भारत के दुश्मनों के द्वारा लिखा गया उनका स्वयं का इतिहास है जिसमें उन्होंने, चाहे वे मुगल रहे हों या फिर अंग्रेज, स्वयं को भारतीयों से श्रेष्ठ दर्शाया है। और सबसे बड़े दुःख की बात तो यह है कि उसी झूठे इतिहास को आज भी हमारे देश में पढ़ाया जाता है।

कोई भी गुलाम देश जब आजाद होता है तो सबसे पहले वह गुलाम बनाने वालों की भाषा, संस्कृति, उनके द्वारा रचे गए इतिहास इत्यादि को त्याग कर अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने द्वारा रचे गए सच्चे इतिहास को अपनाता है, अपनी संस्कृति के आधार पर संविधान, शिक्षा-नीति इत्यादि का निर्माण करता है। किन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् तत्कालीन तथाकथित राष्ट्रनिर्माताओं ने हमारे देश में ऐसा कुछ भी नहीं किया। अपने देश की मूल भाषा संस्कृत को रसातल में ढकेल कर अंग्रेजी को महत्वपूर्ण बना दिया। अब जब हम अपनी मूलभाषा को ही नहीं जानेंगे तो भला अपनी संस्कृति को कैसे समझ पाएँगे? अपना सच्चा इतिहास कहाँ से रच पाएँगे?

Sunday, November 13, 2011

जानने योग्य कुछ रोचक बातें

  • जावा और सुमात्रा में करीब 3,500 प्रकार के रंग-बिरंगे पक्षी पाए जाते हैं।
  • जापान में करीब 3,000 प्रकार के फूल पाए जाते हैं हैं।
  • ‘टर्न’ नाम की चिड़िया हर साल लगभग 20,000 मील का सफर तय करती है।
  • नारियल का पेड़ याने कि ‘पाम ट्री’ 6 मीटर से लेकर 30 मीटर तक ऊँचे होते हैं।
  • बैंक ऑफ अमरीका पहले बैंक ऑफ इटली के नाम से जाना जाता था।
  • सूर्य में पाई जाने वाली गैसों का 94 प्रतिशत केवल हाइड्रोजन गैस होती है।
  • विशुद्ध सोने के आभूषण बनाए ही नहीं जा सकते।

Saturday, November 12, 2011

मोबाइल फोन से सम्बन्धित कुछ रोचक जानकारी

  • विश्व के 4 अरब से अधिक मोबाइल फोन में से लगभग 1 अरब स्मार्ट फोन हैं।
  • लगभग 3 अरब मोबाइल फोन SMS के लिए सक्षम हैं और, शायद आपको विश्वास न हो, लगभग 1 अरब से कुछ कम मोबाइल फोन में SMS की सुविधा ही नहीं है।
  • कुल फेसबुक प्रयोगकर्ताओं का एक तिहाई हिस्सा लगभग बीस करोड़ मोबाइल फोन के द्वारा फेसबुक में आते हैं।
  • मोबाइल इन्टरनेट प्रयोग का  91% प्रतिशत सिर्फ सोशल नेटवर्क्स के लिए ही पयोग किया जाता है जबकि डेस्कटॉप इन्टरनेट प्रयोग का 79% हिस्सा ही सोशन नेटवर्क्स के लिए प्रयुक्त होता है।
  • संसार की कुल जनसंख्या के 70% प्रतिशत लोग मोबाइल का प्रयोग करते हैं।
  • सन् 2014 में मोबाइल इन्टरनेट प्रयोग डेस्कटॉप इन्टरनेट प्रयोग से आगे हो जाएगा।

Thursday, November 10, 2011

शरद् ऋतु का अनुपम शारदीय आनन्द


मेघरहित नील-धवल स्फटिक-सा निर्मल अम्बर, श्वेत-धवल कास सुमन का वस्त्र धारण किए पंक-रहित धरा, भाँति-भाँति के पुष्पो से पल्लवित मधुकर-गुंजित उपवन एवं वाटिकाएँ, शान्त वेग से प्रवाहित कल कल नाद करती सरिताएँ, कमल तथा कुमुद से शोभित तड़ाग, चहुँ ओर शीतल-मंद-बयार का प्रवाह, अमृत की वर्षा करती चन्द्र-किरण शरद् ऋतु के आगमन का द्योतक हैं।

हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन तथा कार्तिक माह को शरद् ऋतु की संज्ञा दी गई है। शरद् ऋतु आते तक वृष्टि का अन्त हो चुका होता है। मौसम मनोरम हो जाता है। दिवस सामान्य होते हैं तो रात्रि में शीतलता व्याप्त रहती है। यद्यपि शरद् की शुरवात आश्विन माह के आरम्भ से हो जाती है किन्तु शरद् के सौन्दर्य का आभास शरद् पूर्णिमा अर्थात् क्वार माह की पूर्णिमा से ही शुरू होता है।

शरद ऋतु ने वाल्मीकि, कालिदास तथा तुलसीदास जैसे महान काव्यकारों के रस-लोलुप मन को मुग्ध-मोहित किया है। वाल्मीकि रामायण के किष्किन्धा काण्ड में महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं -

रात्रि: शशांकोदित सौम्य वस्त्रा, तारागणोन्मीलित चारू नेत्रा।
ज्योत्स्नांशुक प्रावरणा विभाति, नारीव शुक्लांशुक संवृतांगी।।


चन्द्र की सौम्य एवं धवल ज्योत्सना से सुशोभित रात्रि किसी श्रवेत वस्त्र धारण किए हुए सुन्दरी के समान प्रतीत हो रही है। उदित चन्द्र इसका मुख तथा तारागण इसके उन्मीलित नेत्र हैं।

ऋतु संहार में कवि कालिदास कहते हैं -

काशांसुका विचक्रपद्म मनोज्ञ वस्त्र, सोन्मादहंसरव नूपुर नादरम्या।
आपक्वशालि रूचिरानतगात्रयष्टि : प्राप्ताशरन्नवधूरिव रूप रम्या।।


कास के श्वेत पुष्पों के वस्त्र से धारण किए हुए नव-वधू के समना शोभायमना शरद-नायिका का मुख कमल-पुष्पों से निर्मित है। उन्मादित राजहंस की मधुर ध्वनि ही, इसकी नूपुर-ध्वनि है। पके हुए बालियों से नत धान के पौधों के जैसे तरंगायित इसकी देह-यष्टि किसका मन नहीं मोहती?

रामचरित मानस में तुलसीदास जी राम के मुख से कहलवाते हैं -

बरषा बिगत सरद ऋतु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई॥
फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई॥


हे लक्ष्मण! वर्षा व्यती हो चुकी और शरद ऋतु का आगमन हो चुका है। सम्पूर्ण धरणी कास के फूलों से आच्छादित है।मानो (कास के सफेद बालों के रूप में) वर्षा ऋतु ने अपनी वृद्धावस्था को प्रकट कर दिया हो।

तुलसीदास जी तो शरद का प्रभाव पक्षियों पर भी बताते हुए कहते हैं  -

जानि सरद ऋतु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए॥


जिस प्रकार से समय पाकर सुकृत (सुन्दर कार्य) अपने आप आ जाते हैं उसी प्रकार से शरद् ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ गए हैं।

शरद् ऋतु को भारतीय संस्कृति में धार्मिक रूप से भी अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है। आश्विन माह में माता दुर्गा ने महिषासुर का, भगवान श्री राम ने रावण तथा कुम्भकर्ण का, भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर का और कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया था। यही कारण है कि आश्विन एवं कार्तिक दोनों ही माह पवित्र महीने माने गए हैं। इन दोनों माह में हिन्दू त्यौहारों की भरमार होती है यथा नवरात्रि, दशहरा दीपावली, देव प्रबोधनी एकादशी आदि।

Wednesday, November 9, 2011

समझ में नहीं आता कि भारत की जनता अब अपने आप को समझदार क्यों समझने लगी है?

अभी-अभी आनलाइन दैनिक भास्कर में एक समाचार समाचार पढ़ा - "वाह रे ''सरकार'', सोनिया के विदेश दौरों की ही जानकारी नहीं!" अब बताइये भला, सरकार के लिए सोनिया गांधी के विदेश यात्राओं की जानकारी रखना जरूरी है क्या? सरकार तो सरकार ठहरी, पूरे देश की मालिक! यह तो उसकी मर्जी है कि किसके विदेश यात्रा का हिसाब रखे और किसके न रखे! जनता की बुद्धि पर तरस आता है जो यह सोचती है कि विदेश यात्रा में आखिर खर्च तो होता है और खर्च का हिसाब रखा जाना चाहिए क्योंकि पैसा तो जनता का है! जनता को जानना चाहिए कि एक बार उसने टैक्स के रूप में सरकार को पैसे दे दिए तो वह पैसा सरकार का हो गया। सरकार को दे देने के बाद उस पैसे पर जनता का हक रहा ही कहाँ? टैक्स पटा देने के बाद उसकी औकात रह जाती है क्या हिसाब पूछने की? चाहे वह पैसा यू.पी.ए. अध्यक्ष के विदेश यात्राओं में खर्च हो या फिर घोटालों के के द्वारा काले धन में परिणित होकर विदेशी बैंकों में जमा हो जाए, जनता को क्या करना है उससे? समझ में नहीं आता कि भारत की जनता अब अपने आप को समझदार क्यों समझने लगी है?