Monday, March 12, 2012

अपने इतिहास की पुस्तकों को पढ़कर क्या अजीब-सा नहीं लगता?

हमारे इतिहास की पुस्तकें हमें बताती हैं कि अहिंसा, महात्मा गांधी, कांग्रेस आदि के कारण अंग्रेजों ने भारत को छोड़ा और हमारा देश स्वतन्त्र हुआ। यह सब पढ़कर बड़ा अजीब-सा लगता है मुझे। सोचने लगता हूँ कि क्या अहिंसा और सत्याग्रह के कारण डाकू, स्वार्थी, क्रूर, कुटिल, अत्याचारी, हत्यारे, निर्दय, अवसरवादी, अतिमहत्वाकांक्षी अंग्रेजों का हृदय परिवर्तन हो गया? मुझे विश्वास नहीं हो पाता, और शायद न कभी होगा, कि ऐसा हुआ था। यही कारण है कि इतिहास की पुस्तकों को पढ़कर मुझे अजीब-सा लगने लगता है। क्या आपको नहीं लगता ऐसा? क्या आप विश्वास करते हैं कि केवल एक व्यक्ति की अगुवाई में एक पार्टी अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से एक परतन्त्र देश को स्वतन्त्र करा सकता है?

जिस काल में अंग्रेजों ने भारत (1947) छोड़ा लगभग उसी काल में उन्हें अपने न्यू जीलैंड  (1947), बर्मा (1948), सीलोन (1948) Palestine (1948) आदि उपनिवेशों को भी छोड़ना पड़ा था। यह तो हो ही नहीं सकता कि अहिंसा और सत्याग्रह का प्रभाव अंग्रेजों पर इतना अधिक पड़ा हो को भारत के अलावा उन्होंने अपने उपरोक्त उपनिवेशों को भी छोड़ दिया हो। स्पष्ट है कि अंग्रेजों के समक्ष अपने उपनिवेशों को छोड़ने की विवशता थी। वास्तविकता यही है कि द्वितीय विश्वयुद्ध ने ब्रिटिश साम्राज्य को खोखला करके रख दिया था और उसके कारण अंग्रेज अपने उपनिवेशों में अपना नियन्त्रण रख पाने में स्वयं को असमर्थ पा रहे थे। इस विवशता के चलते उन्हें निश्चय करना पड़ा कि धक्के देकर निकाले जाने की अपेक्षा सत्ता छोड़कर इज्जत के साथ निकल लेना ही अधिक अच्छा है।

भारत में तो उनकी स्थिति और भी खराब हो गई थी। सेना उनके पास थी नहीं, वे तो स्थानीय सैनिकों को वेतन देकर उन्हीं के बल पर राज्य कर रहे थे। किन्तु समय बीतने के साथ स्थानीय सैनिकों में जागरूकता आ गई थी जिसके कारण अंग्रेजों के लिए भारत में सैनिकों का मिल पाना बहुत मुश्किल कार्य हो गया था। यदि अग्रेज भारत को न छोड़ने का निश्चय करते तो नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज उन्हें रौंद कर रख देती। वैसे भी अंग्रेज कुटिल अवश्य थे किन्तु बुद्धिमान भी थे, वे जानते थे कि किसी भी देश को हमेशा के लिए गुलाम बनाकर नहीं रखा जा सकता, एक न एक दिन उन्हें आजाद करना ही पड़ेगा। भारत को आसानी के साथ छोड़ देने के निश्चय के पीछे उनकी यह बुद्धिमत्ता भी एक कारण थी।

किन्तु इतिहास की पुस्तकों में अंग्रेजों के भारत छोड़ने का पूरा-पूरा श्रेय व्यक्तिविशेष, दलविशेष, अहिंसा और सत्याग्रह को दे दिया गया। क्या यह अजीब नहीं लगता आपको?

Friday, March 2, 2012

परम्परागत तरीके से होली मनाने के लिए पत्नी से एनओसी लेना जरूरी

होली का त्यौहार समीप आ रहा है, ऐसे में भला मुहल्ले के युवा जागरण समिति के कर्ता-धर्ता लल्लू लाटा और कल्लू काटा भला चुप कैसे बैठ सकते हैं? सो उन्होंने युवा जागरण समिति की बैठक बुला ली। मुहल्ले के समस्त युवकों के बैठक में उपस्थित हो जाने पर लल्लू लाटा ने यह कहते हुए बैठक का शुभारम्भ किया, "प्यारे दोस्तों! होली का त्यौहार नजदीक आ गया है। यह तो आप लोग जानते ही हैं कि हम लोग हर साल होली के त्यौहार को परम्परागत तरीके से मनाते हैं। इस साल भी हमें इस त्यौहार को अपनी परम्परा के अनुसार मनाना है। वैसे तो हमारे मुहल्ले में हमेशा से भांग-ठंडाई के साथ होली मनाने का रिवाज रहा है। पर अब जमाना बदल गया है तो परम्पराएँ भी बदल गई हैं। यही कारण है कि पिछले दस-पन्द्रह सालों से हम लोग दारू-मुर्गा के साथ होली मना रहे हैं। इस साल होली में क्या और कैसे किया जाए, इसी बात पर विचार करने के लिए आज हम सब लोग यहाँ पर इकट्ठे हुए हैं।"


"इसमें विचार करने की क्या बात है? हर साल की तरह आप बस इतना बता दीजिए कि हम लोगों को सहयोग राशि कितनी देनी है। बाकी दारू-मुर्गा आदि का सारा इन्तिजाम आप हर साल तो करते ही हैं ना!" टिल्लू ने कहा।

लल्लू लाटा ने कहा, "हाँ पिछले साल तक मैं और कल्लू दोनों मिल कर सारा इन्तिजाम करते थे, पर अब हम दोनों ने डिसाइड किया है कि इस साल हम ये इन्तिजाम नहीं करेंगे।"

"वो क्यों?" चम्पू ने पूछा।

सभी लोगों ने लल्लू लाटा की ओर उत्सुकता से देखना शुरू कर दिया मानो कि चम्पू के प्रश्न का समर्थन कर रहे हों।

सब लोगों को अपनी ओर तकते हुए देखकर लल्लू लाटा ने कहना शुरू किया, "वो इसलिए कि पिछले साल टिल्लू और चम्पू की पत्नियों को जब पता चला कि उनके पतियों ने हमारे साथ परम्परागत तरीके से होली मनाई है तो उन दोनों ने अपने पतियों को खूब झाड़ा और मुहल्ले भर की औरतों के बीच ढ़िंढ़ोरा पीटना शुरू कर दिया कि लल्लू लाटा और कल्लू काटा दोनों मिल कर हमारे सीधे-सादे पतियों को गलत रास्ते में ले जा रहे हैं। यह तो हम सभी जानते हैं कि टिल्लू और चम्पू दोनों ही मौज-मस्ती का कोई भी मौका कभी भी नहीं छोड़ते पर पत्नियों को उसके बारे में पता भी नहीं चलने देते। यही कारण है कि उनकी पत्नियाँ उन्हें सदाचार का अवतार मानती हैं। बदनाम तो मैं और कल्लू हैं जो आप सभी के लिए सब प्रकार का इन्तिजाम करते हैं।"

कल्लू काटा ने कहा, "अरे उन दोनों ने तो मेरी और लल्लू जी की मिसेज के पास आकर कह दिया था कि तुम लोग अपने मिस्टर को सम्भाल कर नहीं रखती हो, आज के जमाने में भी पतियों से दबी रहती हो। बस फिर क्या था हम दोनों की पत्नियाँ भी शेरनी बन गई थीं। उन्हें फिर से पटरी पर लाने के लिए बहुत दिन लग गए थे हम दोनों को।"

लल्लू लाटा ने फिर कहा, "अपने पतियों को वो चाहें जितना भी झाड़ें, हमें उससे कुछ भी लेना-देना नहीं है, अगर झाड़ू बेलन का स्टॉक कम हो जाए तो हम उन्हें और दे सकते हैं। पर हमें बदनाम करने का उनको कोई अधिकार नहीं है। इसीलिए हम दोनों ने डिसाइड किया है कि इस साल हर कोई अपना इन्तजाम खुद करेगा।"


लल्लू के इस कथन से वहाँ उपस्थित अधिकतर लोगों के चेहरे बुझ-से गए क्योंकि वो लोग भी टिल्लू और चम्पू के जैसे ही थे। पीते जरूर थे पर कोशिश यह भी रहती थी कि कोई देख ना ले, कोई जान ना ले। दारू दुकान जाकर दारू खरीद कर लाना तो वो कभी कर ही नहीं सकते थे, क्या पता कौन पहचान वाला देख ले।

आखिर बल्लू ने हिम्मत करके खुशामदी लहजे में कहना शुरू किया, "अरे लल्लू-कल्लू भाई, आप लोग ऐसे नाराज ना हों। आप लोगों के बदौलत ही तो हम मुहल्ले में पर्व-त्यौहार आदि अच्छे से मना पाते हैं। फिर हर कोई अलग-अलग होली मनाएगा तो फिर मजा ही क्या आएगा? हम सब आपसे रिक्वेस्ट करते हैं कि आप हर साल की तरह से इस साल भी सारा इन्तिजाम करें। हम प्रामिस करते हैं कि हम लोग अपनी पत्नियों को भनक भी नहीं लगने देंगे।"

लल्लू लाटा बोले, "देखो भाई लोगों! आप लोग कितना भी क्यों ना छुपाओ, पत्नियाँ तो जान ही जाएँगी। अगर आप लोग चाहते हैं कि मैं और कल्लू दोनों इस साल भी इन्तजाम करें तो हमारी एक शर्त है। आप सभी को अपनी-अपनी पत्नियों से "एनओसी" लाकर हमें देना होगा, वो भी लिखित में। अगर आप लोगों की पत्नियाँ निम्न प्रारूप में लिख कर देंगी कि -
मैं श्रीमती ..........................., पत्नी श्री................ एतद् द्वारा घोषणा करती हूँ कि मेरे पति यदि होलिका दहन की रात्रि से लेकर धुलेड़ी के सायंकाल तक मुहल्ले की परम्परा के अनुसार होली मनाएँगे तो मुझे किसी भी प्रकार का ऐतराज नहीं होगा।

हस्ताक्षर श्रीमती ..........................."

तभी हम इस बार की होली का इन्तजाम करेंगे अन्यथा नहीं। एनओसी लेने के लिए चाहे आप अपनी बीबियों के पैर पकड़ो या उनके सामने नाक रगड़ो।"

सभी लोगों ने इस शर्त को वापस लेने के लिए बहुत मिन्नतें की पर लल्लू और कल्लू अपनी बात पर अड़े रहे और अन्ततः उन्हे उनका शर्त मानने के लिए मजबूर होना पड़ा।

अब हमें जानकारी मिली है कि बैठक से वापस जाने के बाद से अब तक उनकी पत्नियों की हर फरमाइश पूरी होती जा रही है, हरेक पति अपनी पत्नी के सामने भीगी बिल्ली बना हुआ है। पत्नियों को सुबह उठने पर बिस्तर पर ही चाय मिल जा रही है, किचन में आने पर उन्हें जूठे बर्तनों के स्थान पर मँजे-धुले बर्तन दिखाई देते हैं। साड़ियाँ धुली हुई और प्रेस की हुई मिल रही हैं। अब कहाँ तक बताएँ, आप तो स्वयं समझदार हैं!

हाँ तो, हमारे मुहल्ले की होली में आप सभी लोग भी सादर आमन्त्रित हैं पर इसके लिए लल्लू-कल्लू की शर्त का पालन करना होगा आपको।

Tuesday, February 28, 2012

जै जै जै शिवशंकर.... ये प्याला तेरे नाम का पिया


"अरे ये तो ठंडाई है, भोलेनाथ का प्रसाद! भांग थोड़े ही है। लीजिए ना!"

अभी शिवरात्रि के दिन लोग ऐसा ही कुछ कह रहे थे उन्हें जो शिव जी के प्रसाद के रूप में भांग मिले ठंडाई को लेने में हिचकिचा रहे थे।

देखा जाए तो भांग का सेवन हिन्दू धार्मिक रिवाज का एक अंग सा बन गया है और प्रायः लोग भांग के सेवन को बुरा या अहितकर नहीं मानते। अंग्रेजी विकीपेडिया के अनुसार ईसा पूर्व लगभग 1000 वर्ष पहले भांग हिन्दू रिवाजों में सम्मिलित हुआ। समय बीतने के साथ-साथ भांग का यह धार्मिक रिवाज एक आम बात सी हो गई। उत्तर भारत में शिव जी की बूटी के रूप में भांग का सेवन सामान्य सी बात है। जो लोग भांग का नियमित सेवन नहीं करते वे लोग भी महाशिवरात्रि, होली आदि पर्व पर भांग के नशे को गलत नहीं मानते। इन पर्वों में भांग की ठंडाई, भांग के पकोड़े, भांग मिश्रित लस्सी तथा आइसक्रीम आदि बनाया जाना सामान्य बात है।

राजस्थान के बीकानेर में तो भांग प्रेमियों के लिए "भैरूँ कुटिया" नामक एक स्थान ही निर्धारित है जहाँ पर प्रतिदिन सैकड़ों की तादाद में भांग प्रेमी लोग इकट्ठे होकर "भंग के तरंग" का मौज लेते हैं। भैरूँ कुटिया में भांग पीने वालों के लिए किसी भी प्रकार का बन्धन नहीं है, वहाँ पर ब्राह्मण, कायस्थ, नाई, मोची, धोबी सभी साथ बैठकर भांग पीते हैं। हरिवंशराय बच्चन जी की पंक्तियाँ "मन्दिर मस्जिद बैर कराते प्रेम बढ़ाती मधुशाला" भैरूँ कुटिया के लिए सर्वथा उपयुक्त लगता है।

बनारस के घाटों में तो किसी भी समय लोगों के समूह को भांग बनाने की प्रक्रिया में लिप्त देखा जा सकता है। सिल और लुढ़िया द्वारा भांग पीसते हुए अनेक समूहों को आप इन घाटों में कभी भी देख सकते हैं। इस प्रकार से पिसे भांग में घी, मसाले, दूध आदि मिलाकर ठंडाई तैयार की जाती है जिसे कि वे लोग अल्कोहल का एक स्वास्थ्यवर्धक विकल्प कहते हैं।

आइये अब जानें कि भांग आखिर है क्या? भांग वास्तव में एक पौधे, जिसे कि वनस्पति शास्त्र में कैनबिस सटाइवा (cannabis sativa) कहा जाता है, के पत्ते होते हैं। यह पौधा अधिकतर पर्वतीय प्रदेशों में पाया जाता है। टनकपुर, रामनगर, पिथौरागढ़, हल्द्वानी, नैनीताल, अल्मोडा़, रानीखेत,बागेश्वर, गंगोलीहाट में बरसात के बाद भांग के पौधे सर्वत्र देखे जा सकते हैं। भांग के पत्ते नशीले होते हैं। भांग के पौधे की छाल से रस्सियाँ बनती हैं तथा डंठल को मशाल के रूप में प्रयोग किया जाता है। पर्वतीय प्रदेश की कुछ जातियों के लोग भांग के रेशे से कुथले और कम्बल भी बनाते हैं।

आयुर्वेद में भांग के पौधे को एक महती औषधि बताया गया है। इससे पेट सम्बन्धी अनेक रोगों का उपचार किया जाता है। ईसा पूर्व 1000 से ही भारत में भांग का प्रचलन रहा है। भोजन के पूर्व भांग का सेवन क्षुधावर्धक (appetizer) का कार्य करता है। साधु सन्त ध्यान को एकाग्र करने के लिए इसका सेवन करते हैं।

किन्तु ध्यान रखें कि भांग का आवश्यकता से अधिक सेवन आपको मुसीबत में भी डाल सकता है क्योंकि कहा गया है "अति सर्वत्र वर्जयेत्"।

Tuesday, February 14, 2012

वैलेन्टाइन सभा

कल्लू काटा और लल्लू लाटा हमारे मुहल्ले के मुहल्ला विकास समिति के सबसे अधिक सक्रिय सदस्य हैं, बल्कि वास्तव में कहा जाए तो वे दोनों ही मुहल्ला विकास समिति के सर्वेसर्वा हैं। दोनों ही चाहते हैं कि मुहल्ले में कुछ न कुछ आधुनिक कार्यक्रम हों। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने मुहल्ले में वैलेन्टाइन सभा का आयोजन किया।

वैलेन्टाइन सभा में मुहल्ले के गणमान्य जन एकत्रित हो गए। कल्लू काटा ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा, "प्रिय मुहल्लावासियों! हमारे मुहल्ले में हर साल जन्माष्टमी, गणेशोत्सव, दुर्गोत्सव जैसे कार्यक्रम होते हैं। किन्तु आपको मालूम होना चाहिए कि सदियों से चले आ रहे ये कार्यक्रम अब किसी काम के नहीं रह गए हैं। ये सारे कार्यक्रम पोंगा-पंथियों के हैं और आज के जमाने में अब इनकी कुछ भी व्हैल्यु नहीं रह गई है। आज जरूरत है नए और आधुनिक कार्यक्रमों की। मुहल्ला विकास समिति ने मुहल्ले में इस वर्ष बड़े धूम-धाम से वैलेन्टाइन डे कार्यक्रम मनाने का निश्चय किया है और इस सन्दर्भ में आप लोगों की राय जानने के लिए इस वैलेन्टाइन सभा का आयोजन किया गया है।"

धरणीधर जी, जो कि मुहल्ले के बुजुर्ग और भारतीय सभ्यता के पक्षपाती थे, ने कहा, "आपने जन्माष्टमी, दुर्गोत्सव आदि को पोंगापंथी कार्यक्रम कैसे कह दिया? हमें लगता है कि आप वैलेन्टाइन डे मना कर मुहल्ले में मलेच्छ संस्कृति का प्रचार करना चाहते हैं।"

कल्लू काटा ने जवाब दिया, "देखिए धरणीधर जी, आप हमारे बुजुर्ग हैं इसलिए मैं आपका पूरा-पूरा सम्मान करता हूँ। पर यह सभा नौजवानों की है, आपको हमने यहाँ बुलाया भी नहीं है। अच्छा यही होगा कि आप चुपचाप  यहाँ से निकल लें।"

धरणीधर कुछ और बोल पाते इसके पहले ही लल्लू लाटा ने उन्हें सभा से जबरदस्ती बाहर कर दिया।

कल्लू काटा ने कहना जारी रखा, "मित्रों, मैंने जो कुछ भी कहा, उसका आशय यह नहीं है कि जन्माष्टमी, दुर्गोत्सव आदि मनाने में कुछ बुराई है। मैं तो यह कहना चाहता हूँ कि उनमें अब कुछ चार्म नहीं रह गया है। वैलेन्टाइन हमारे मुहल्ले के लिए भले नया हो पर हमारे देश भारत के लिए यह बहुत पुराना है। देखा जाए तो त्रेता युग में कैकसी के द्वारा विश्रवा ऋषि से प्रणय निवेदन करना वैलेन्टाइन ही था। और कैकसी ने विश्रवा से प्रणय निवेदन अपने पिता सुमाली के कहने से किया था याने कि उस समय के पैरेन्ट्स भी बेहद जागरूक थे। शूर्पणखा ने लक्ष्मण को अपना वैलेन्टाइन बनाया था, यह बात और है कि लक्ष्मण को वह वैलेन्टाइन के रूप में पसन्द नहीं आई। आज हम अपने वैलेन्टाइन को मोबाइल करके बुलाते हैं, कुन्ती के जमाने में मोबाइल नहीं था, मोबाइल की जगह मन्त्र था। कुन्ती ने क्या किया? अपने वैलेन्टाइन सूर्य को मन्त्र के द्वारा बुला लिया। वैलेन्टाइन में हम लोग प्रपोज करते हैं ना? तो दुष्यन्त ने भी तो अपने वैलेन्टाइन शकुन्तला को प्रपोज ही तो किया था। अर्जुन और सुभद्रा एक दूसरे के वैलेन्टाइन ही तो थे। सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु की वैलेन्टाइन थी उत्तरा। अभिमन्यु अपनी वैलेन्टाइन उत्तरा को अवश्य प्राप्त करे यही सोचकर तो उसके चचेरे भाई घटोत्कच ने अभिमन्यु का साथ दिया था! पृथ्वीराज और संयोगिता एक-दूसरे के वैलेन्टाइन ही तो थे। भारत का पूरा इतिहास भरा पड़ा है वैलेन्टाइनों से। इसलिए आप लोग यह जरा भी न सोचें कि वैलेन्टाइन डे या वीक भारत में बाहर से आया है। यह तो प्राचीनकाल से ही भारत का रहा है और विदेशियों ने इसे हमसे ही लिया है। और इसीलिए मुहल्ला विकास समिति ने हर साल बड़े धूम-धाम से वैलेन्टाइन उत्सव मनाने का निश्चय किया है।"

कल्लू काटा के इस भाषण पर तालियों की गड़गड़ाहट से सभा गूँज उठी।

गंगू बाई, जो मुहल्ले के घरों में कामवाली का काम करती थी, ने कहा, "वैलेन्टाइन उत्सव मनाने का बना के आपने बहुत अच्छा किया साहेब! अइसा करने से अब मेरी परेशानी कम हो जाएगी। अब लोग मेरे से साल भर प्रपोज करने के बदले इस त्यौहार में ही करेंगे। अभी 'किस डे' के दिन मैं कितना परेशान थी, जिस घर में काम करने जाती थी वहीं का साहेब मेरे को किस करने को कहता था। मोहिनी बाई ने तो देख भी लिया के उसका घरवाला मेरे को किस किया है। वो  मेरे को नौकरी से निकाल रही थी तो मैंने कहा बाई माफ कर दे अपने साहब को। किसन भगवान भी तो गोपियों से रास रचाते थे पर रुकमनी, सतभामा ने उने माफ किया के नइ? तू साहब को माफ कर देगी तो साहब तेरे लिए हीरे का नेकलेस ला देने को भी तैयार हैं। और तू मेरे को नौकरी से निकालेगी तो सोच तेरे घर का काम कौन करेगा? मैं किसी दूसरे कामवाली बाई को तो आनेच् नइ दूँगी ये मोहल्ले में। तो साहेब, ये वैलेन्टाइन उत्सव हो जाने से मेरी किल्लत कम होयेंगी।"

फेकूलाल जी ने कहा, "वैलेन्टाइन उत्सव मनाना शुरू करना वास्तव में ही राष्ट्रहित का काम है, इससे हमारी प्राचीन परम्परा कायम रहेगी। इस उत्सव को तो हर शहर के हर गली-कूचे में मनाया जाना चाहिए। हमें यह भी कोशिश करना चाहिए कि हमारी सरकार इस उत्सव को विशेष महत्व दे और इस अवसर पर अवकाश या कम से कम अविवाहितों के लिए विशेष आकस्मिक अवकाश की घोषणा करे।"

इतने में ही किसी ने आकर बताया कि धरणीधर वैलेन्टाइ विरोधियों के दल को लेकर इसी तरफ आ रहे हैं और सभा से सारे लोग ऐसे गायब हो गए जैसे कि गधे के सिर से सींग।

Monday, February 13, 2012

ऐसा रहा हमारा वैलेन्टाइन

देखा कि श्रीमती जी का मूड अच्छा था सो हमने कह दिया, " हैप्पी हग डे डार्लिंग!"

श्रीमती जी ने नाक को आँचल से दबाकर, मुख-मुद्रा को वीभत्स बनाते हुए, कहा, "छिः छिः, क्या गन्दगी वाली बातें कहते हैं आप भी।"

हमने कहा, "अरे मैं हिन्दी के 'हग' के बारे में नहीं, अंग्रेजी के 'हग' के बारे में कह रहा हूँ। ग्रेजुएशन कैसे कर लिया था तुमने जब कि अंग्रेजी का 'हग' भी नहीं जानती?"

"क्या मैं कन्व्हेंट में पढ़ती थी जो ये सब जानूँ? आप अच्छी तरह से जानते हैं कि मेरा मीडियम हिन्दी था।"

"आज वैलेन्टाइन वीक का छठवाँ दिन है 'हग डे', इसीलिए मैंने 'हैप्पी हग डे डार्लिंग' कहकर तुम्हें विश किया था।"

"इतनी उम्र हो गई आपकी और आपको शर्म भी नहीं आती ऐसा कहते हुए? बच्चे सुन लें तो जाने क्या सोचें?"

"बच्चे अब बच्चे नहीं रह गए हैं, गृहस्थी वाले हो गए हैं, वो सब समझते हैं बल्कि खुद भी बहुओं को यही कह रहे होंगे।"

"वो कुछ भी करें, वो नये जमाने के हैं। पर आपको अपने जमाने के साथ चलना चाहिए। 'सींग कटा कर बछड़ों में शामिल होना' भला कोई अच्छी बात है?"

"कुछ भी कहो, पर मुझे तो लगता है कि मेरे और तुम्हारे साथ तो वही मिसल हो गई कि 'बन्दर क्या जाने अरदक का स्वाद' या कहें कि 'अन्धा क्या जाने बसन्त बहार'!"

श्रीमती जी ने तत्काल तुनक कर जवाब दिया, "देखिये जी, न तो आप बन्दर हैं और न मैं बन्दरिया। हम दोनों अन्धे भी नहीं हैं। अगर आप समझते हैं कि लच्छेदार भाषा में मुझसे बात करके आप मुझ पर रौब गाँठ लेंगे, तो जान लीजिए कि आप गलत समझ रहे हैं।"

'खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे' के अन्दाज में हमने कहा, "अरे भई, मैं तो यह कह रहा था हमारे जमाने में वैलेन्टाइन वीक होती ही नहीं थी और हम उसका मजा उठा ही नहीं पाए।"

"अच्छा, अगर उस जमाने में वैलेन्टाइन वीक होता तो क्या करते आप?" श्रीमती जी ने हम पर तरस खाने के अन्दाज में कहा।

"तो मैं 7 फरवरी याने कि 'रोज डे' के दिन तुम्हें गुलाब के बहुत सारे खूबसूरत फूल उपहार में देता।"

"येल्लो, थर्ड क्लास में फिल्म देखने के लिए तो आपके पास चालीस पैसे तो होते नहीं थे उन दिनों। अपनी छोटी बहन तक से पैसे माँग लेते थे टिकट के लिए। मैं ही चुपके से आपकी बहन को पैसे दे दिया करती थी जिसे वो आपको देती थी। फिर मेरे लिए ढेर सारे गुलाब लाने के लिए कहाँ से पैसे आते आपके पास? और क्या आप समझते हैं कि आप मुझे गुलाब का फूल देते तो मैं खुश हो जाती? जबकि आप जानते हैं कि मेरे घर के बगीचे में गुलाब के फूलों की कोई कमी नहीं थी, हर प्रकार के गुलाब खिलते थे वहाँ पर।"

"अरे भई, 'रोज डे' के दिन प्रेमिका को गुलाब के फूल देना रिवाज है।"

"मतलब ये कि जिसके पास ढेर सारे गुलाब हों उसे भी उपहार में गुलाब ही दो। ये तो वैसा ही हुआ कि भरपेट खाना खाये आदमी को और खाने को दो।"

"तुम नहीं समझोगी इस रिवाज को।"

"हाँ मैं कैसे समझूँगी? मैं तो बेवकूफ हूँ। आप सीधे-सीधे मुझे बेवकूफ कह रहे हैं। जबकि अकल खुद आपमें नहीं है, अगर होती तो आप मुझे गुलाब देने के बदले गोलगप्पे खिलाते।"

मन ही मन हमने सोचा कि कह तो ये ठीक ही रही है, अगर हम में अकल होता तो इससे शादी ही क्यों करते? फिर प्रत्यक्ष कहा, "तुम तो जुबान पकड़ लेती हो, मैंनें तुम्हें बेवकूफ नहीं कहा, मेरी क्या शामत आई है जो तुम्हें बेवकूफ कहूँ? क्या इतना भी मैं नहीं जानता कि जिस तरह से काने को काना नहीं कहना चाहिए उसी तरह से बेवकूफ को भी बेवकूफ नहीं कहना चाहिए। फिर भी अगर तुम्हें ऐसा लगता है कि मैंने कहा है तो माफ कर दो। हाँ फिर 8 फरवरी याने कि प्रपोज डे के दिन मैं तुम्हें प्रपोज करता।"

"हुँह, खाक प्रपोज करते। किसी लड़की से बात तक करने में तो नानी मरती थी आपकी।"

"अरे भई कर ही लेता कैसे भी करके प्रपोज। फिर चॉकलेट डे के दिन मैं तुम्हें चॉकलेट लाकर देता।"

"आप जानते हैं ना कि चॉकलेट मुझे जरा भी पसन्द नहीं है। हाँ चॉकलेट की जगह अगर रसमलाई होता तो शायद मैं खुश हो जाती।"

"पर चॉकलेट डे के दिन चॉकलेट ही दिया जाता है।"

"अगर आप मुझे चॉकलेट देते मैं आपके सामने ही उसे फेंक देती।"

"और फिर किस डे के दिन मैं तुम्हें किस करता।"

"इतनी हिम्मत थी आपमें? और कैसे भी हिम्मत करके शादी से पहले आप मुझे किस करने की कोशिश करते तो किस-विस तो मिलता नहीं उल्टे मेरे हाथ के दो-चार झापड़ जरूर मिल गए होते।"

"तुम वैलेन्टाइन के लायक हो ही नहीं।"

"तो मैंने कब कहा कि मैं हूँ। बड़े आए हैं वैलेन्टाइन वाले। अपनी संस्कृति-सभ्यता भूल कर ऊल-जलूल रिवाज अपनाने वाले। भलाई इसी में है कि आप अपनी खाल में ही रहिये। और अब मेरा टाइम खोटा करने के बजाय जाइये, सब्जी लेकर आइये। और खबरदार जो फिर कभी वैलेन्टाइन-फैलेन्टाइन का नाम लिया मेरे सामने।"

इसके बाद भला हम क्या कर सकते थे? चुपचाप उठकर चले गए सब्जी लेने।