Friday, February 13, 2015

चाणक्य नीति - अध्याय 5 (Chanakya Neeti in Hindi)


  • द्विजों के लिए अग्नि पूज्य है; अन्य वर्ण के लोगों के लिए ब्राह्मण पूज्य है; पत्नी के लिए पति पूज्य है; और मध्याह्नभोज के समय आने वाला अतिथि सभी के लिए पूज्य है।

  • जिस प्रकार से सोने को घिसकर, काटकर, गरम करके और पीटकर परखा जाता है, उसी प्रकार से व्यक्ति को उसके त्याग, आचरण, गुण तथा व्यवहार से परखा जाता है।

  • भय से तभी तक भयभीत होना चाहिए जब तक भय आने की आशंका हो, किन्तु भय के आ जाने पर निःसंकोच उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए।

  • जैसे बेर के पेड़ में फले सारे बेर एक जैसे नहीं होते, उसी प्रकार से एक ही गर्भ से और एक ही नक्षत्र में उत्पन्न व्यक्तियों के स्वभाव भी एक जैसे नहीं होते।

  • किसी वस्तु के प्रति आसक्ति नहीं होने पर उस वस्तु का अधिकारी भी नहीं बना जा सकता। वासना का त्याग कर देने वाला श्रृंगार नहीं करता; मूर्ख व्यक्ति मृदुभाषी नहीं होता; और स्पष्ट बात करने वाला धोखा नहीं देता।

  • मूर्ख विद्वान से इर्ष्या करते हैं; दरिद्र धनवान से इर्ष्या करते हैं; बुरे आचरण वाली स्त्री पतिव्रता से इर्ष्या करती हैं; और कुरूप स्त्री सुन्दर स्त्री से इर्ष्या करती हैं।

  • आलस्य से विद्या का नाश होता है; भरोसा कर के दूसरों को दे देने से धन का नाश होता है; लापरवाही से बुआई करने पर बीजों का नाश होता है; और सेनापति के बिना सेना का नाश होता है।

  • विद्या अभ्यास से आती है; कुल का बड़प्पन सुशील स्वभाव से होता है; श्रेष्ठता की पहचान गुणों से होती है; और क्रोध का पता आँखों से चलता है।

  • धर्म की रक्षा धन से होती है; ज्ञान की रक्षा निरन्तर साधना से होती है; राजकोप से मृदु स्वभाव द्वारा रक्षा होती है और घर की रक्षा कर्तव्य परायण गृहणी से होती है।
  • वैदिक पाण्डित्य तथा शास्त्रों के ज्ञान को को व्यर्थ बताने वाले लोग स्वयं व्यर्थ हैं।

  • दान से दारिद्र्य का; सदाचार से दुर्भाग्य का; विवेक से अज्ञान का; और परीक्षण से भय का नाश होता है।

  • काम वासना से बढ़कार कोई रोग नहीं होता; मोह से बढ़कर कोई शत्रु नहीं होता; क्रोध से बढ़कर कोई आग नहीं होता; और ज्ञान से बढ़कर कोई सुख नहीं होता।

  • व्यक्ति अकेला ही जन्म लेता है, अकेला ही मरता है, अकेला ही अपने अच्छे बुरे कर्मों को भोगता है और अकेला ही नर्क में जाता है या मोक्ष प्राप्त करता है।

  • ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि में स्वर्ग तुच्छ है; पराक्रमी योद्धा की दृष्टि में जीवन तुच्छ है; इन्द्रियों को जीत लेने वाले की दृष्टि में स्त्री तुच्छ है; तत्वज्ञानी की दृष्टि में समस्त संसार तुच्छ है।

  • विदेश में विद्या मित्र है; घर में पत्नी मित्र है; रोगी के लिए औषधि मित्र है; और मरने वाले के लिए धर्म मित्र है।

  • समुद्र होने वाली वर्षा व्यर्थ है; तृप्त व्यक्ति को भोजन कराना व्यर्थ है; धनी व्यक्ति को दान देना व्यर्थ है; और दिन में दिया जलाना व्यर्थ है।

  • वर्षा के जल के समान कोई जल नहीं है; आत्मबल के समान कोई बल नहीं है; नेत्र की ज्योति के समान कोई प्रकाश नहीं है; और अन्न के समान कोई सम्पत्ति नहीं है।

  • निर्धन को धन की कामना होती है; पशु को वाणी की कामना होती है; मनुष्य को स्वर्ग की कामना होती है; और देवताओं को मोक्ष की कामना होती है।

  • सत्य से पृथ्वी टिकी है; सत्य से सूर्य प्रकाशित है; सत्य से वायु प्रवाहित होती है; संसार के समस्त पदार्थों में सत्य ही निहित है।

  • लक्ष्मी अस्थिर है; प्राण अस्थिर है; संसार में सिर्फ धर्म ही स्थिर है।
  • पुरुषों में नाई धूर्त होता है; पक्षियों में कौवा धूर्त होता है; पशुओं में गीदड़ धूर्त होता है; और औरतों में मालिन धूर्त होती है।

  • जन्म देने वाला, यज्ञोपवीत संस्कार कराने वाला, विद्या प्रदान करने वाला, अन्न देने वाला और भय से मुक्ति दिलाने वाला - ये पाँच पिता कहे गए हैं।
  • राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, पत्नी की माता तथा स्वयं की माता को माता समझना चाहिए।

Wednesday, February 11, 2015

चाणक्य नीति - अध्याय 4 (Chanakya Neeti in Hindi)


  • व्यक्ति की कुल उम्र, व्यक्ति के कार्य का प्रकार, व्यक्ति की संपत्ति और व्यक्ति की मृत्यु दिनांक - ये चार बातें माता के गर्भ में ही निश्चित हो जाती हैं।

  • सन्तान, मित्र तथा सगे-सम्बन्धी भगवान के भक्त से दूर भागते हैं, किन्तु जो लोग भगवान के भक्त का अनुसरण करते हैं वे अपने समर्पण के कारण अपने परिवार को धन्य कर देते हैं।

  • जिस प्रकार से मछली, कछुआ और पक्षी अपने बच्चों को देखभाल करके, सावधानी बरत कर और स्पर्श करके बड़ा करते हैं, उसी प्रकार से संतजन भी अपने सहभागियों का पालन करते हैं।

  • जब शरीर स्वस्थ हो, स्वयं के नियन्त्रण में हो और मृत्यु दूर हो तभी आत्मसुरक्षा का प्रयास कर लेना चाहिए, मृत्यु के सर पर आ जाने पर भला क्या किया जा सकता है?

  • विद्या प्राप्ति कामधेन के समान है जो कि हर ऋतु में फल प्रदान करती है। विद्या माँ के समान रक्षक तथा हितकारी है। विद्या एक छुपे हुए खजाने के जैसा है।

  • अच्छे गुणों से सम्पन्न एक पुत्र, गुणों से वंचित सौ पुत्रों से भी अच्छा होता है। आसमान के असंख्य तारे रात्रि के अन्धकार को दूर नहीं कर सकते, उसे तो सिर्फ एक चन्द्रमा ही दूर करता है।

  • पैदा होते ही मर जाने वाला पुत्र, एक लम्बी उम्र वाले मूर्ख पुत्र से अच्छा होता है क्योंकि पैदा होते ही मर जाने वाला पुत्र क्षणिक दुख देता है जबकि मूर्ख बालक तमाम उम्र दुख देता है।

  • शरीर को बिना आग के जलाती हैं -
    उस छोटे से गाँव में बसना जहाँ रहने की सुविधाएँ उपलब्ध न हो
    नीच कुल में जन्मे व्यक्ति की नौकरी करना
    अस्वास्थ्यकर भोजन करना
    पत्नी का सदैव क्रोधित रहना
    मूर्ख पुत्र का होना
    पुत्री का विधवा हो जाना

  • दूध न देने वाली तथा गर्भधारण के अयोग्य गाय किस काम की? उसी प्रकार ऐसे पुत्र का जन्म किस काम का जो न तो शिक्षित हो सके और न ही भगवान की भक्ति कर सके।

  • जीवन के दुखों की आग में झुलसने वाले व्यक्ति को केवल सन्तान, पत्नी और भगवान के भक्तों की संगति ही सहारा देते हैं।

  • ये बातें सिर्फ एक बार होती हैं -
    राजा का आज्ञा देना
    पण्डित का उपदेश देना
    लड़की का विवाह

  • तप अकेले करना चाहिए, अभ्यास दो लोगों को एक साथ करना चाहिए, गायन तीन लोगों को एक साथ करना चाहिए, कृषि चार लोगों को एक साथ करना चाहिए और युद्ध अनेक लोगों को एक साथ लड़ना चाहिए।

  • यथार्थ में पत्नी वही होती है जो शुचिपूर्ण हो, पारंगत हो, पतिव्रता हो, पति को प्रसन्न करने वाली हो और सत्यवादी हो।

  • पुत्रहीन व्यक्ति का घर, सम्बन्धी रहित व्यक्ति की समस्त दिशाएँ, मूर्ख व्यक्ति का हृदय और निर्धन व्यक्ति का सब कुछ उजाड़ होता है।

  • आचरण में न लाया जाने वाला आध्यात्मिक सीख जहर है; अजीर्ण रोग से ग्रसित व्यक्ति के लिए भोजन जहर है; निर्धन व्यक्ति के लिए सामाजिक कार्यक्रम में जाना जहर है; और वृद्ध या प्रौढ़ व्यक्ति के लिए युवा पत्नी जहर है।

  • दया और धर्म से हीन व्यक्ति, आध्यात्मिक ज्ञान न रखने वाले गुरु, निरन्तर घृणा प्रदर्शन करने वाली पत्नी और स्नेह न रखने वाले सम्बन्धी का त्याग कर देना चाहिए।

  • व्यक्ति का सतत् भ्रमण बुढ़ापे को समीप ला देता है; घोड़े को हमेशा बाँधे रखने से वह बूढ़ा हो जाता है; पति के साथ यौनाचार न करने वाली स्त्री बूढ़ी हो जाती है; और लगातार धूप में रखने से वस्त्र पुराने हो जाते हैं।

  • इन बातों पर बार-बार विचार करना चाहिए - उचित समय, उचित मित्र, उचित स्थान, आय के उचित साधन, व्यय के उचित तरीके और उर्जा स्रोत जहाँ से आप शक्ति प्राप्त करते हैं।
  • द्विज अग्नि अग्नि में भगवान् देखते है, भक्त अपने हृदय में भगवान् देखते है, अल्पबुद्धि लोग मूर्ति में भगवान् देखते है किन्तु व्यापक दृष्टि रखने वाले लोग सर्वत्र में में भगवान् देखते है।

Monday, February 9, 2015

चाणक्य नीति - अध्याय 3 (Chanakya Neeti in Hindi)

  • इस संसार में ऐसा कौन सा परिवार है जिस पर कोई दाग न लगा हो? ऐसा कौन है जो रोग और संताप से मुक्त हो, हमेशा सुखी रहने वाला कौन है?

  • व्यक्ति के आचरण से उसके कुल को पहचाना जा सकता है, उसकी भाषा के उच्चारण से उसके देश को पहचाना जा सकता है, उसके सौहार्द तथा उसकी दीप्ति से उसकी मित्रता पहचानी जा सकती है और उसके शारीरिक गठन से उसकी भोजन क्षमता पहचानी जा सकती है।

  • पुत्री का विवाह अच्छे कुल में करना चाहिए, पुत्र को ज्ञानार्जन के प्रति आसक्त करना चाहिए, शत्रु को क्लेश में डालना चाहिए और मित्रों को धर्म के प्रति आसक्त करना चाहिए।

  • एक साँप एक दुर्जन से बेहतर होता है क्योंकि वह तभी आक्रमण करता है जब उसे प्राण जाने का भय हो किन्तु दुर्जन हर कदम पर वार करता है।
  • राजा स्वयं को अच्छे कुल के व्यक्तियों से इसलिए घिरा रखता है क्योंकि वे न आरम्भ में, न तो मध्य में और न ही अन्त में साथ छोड़कर जाते हैं।

  • प्रलय के समय समुद्र भी अपनी मर्यादा खो देता है किन्तु सज्जन व्यक्ति कभी भी विचलित नहीं होते।

  • मूर्खों के साथ कभी भी मित्रता नहीं करनी चाहिए क्योंकि वे दो पैरों वाले पशु के समान होते हैं, जैसे कोई अनदेखा काँटा शरीर के अंग में घुसकर पीड़ा पहुँचाता है वैसे ही मूर्ख अपने कटु वचनों से हृदय को क्लेश पहुँचाता है।

  • अच्छे कुल में जन्म लेने वाला यौवन से सम्पन्न सुन्दर व्यक्ति भी विद्या से हीन होने पर पलाश के फूल के समान होता है जो कि सुन्दर होते हुए भी सुगन्ध हीन होता है।
  • कोयल की सुन्दरता उसकी कूक में होती है, स्त्री की सुन्दरता पति के प्रति विशुद्ध समर्पण में होती है, कुरूप व्यक्ति की सुन्दरता उसके ज्ञान में होती है और तपस्वी की सुन्दरता उसकी क्षमाशीलता में होती है।

  • परिवार की रक्षा के लिए परिवार के सदस्य का बलिदान कर देना चाहिए, गाँव की रक्षा के लिए परिवार का बलिदान कर देना चाहिए, देश की रक्षा के लिए गाँव का बलिदान कर देना चाहिए और आत्मा की रक्षा के लिए देश का बलिदान कर देना चाहिए।

  • कर्मशील व्यक्ति निर्धन नहीं हो सकता, जप करने वाला पापी नहीं हो सकता, मौनी व्यक्ति अन्य व्यक्तियों से विवाद नहीं हो सकता और सचेत व्यक्ति भयभीत नहीं हो सकता।
  • सीता का हरण उसकी अति सुन्दरता के कारण हुआ, रावण अन्त उसके अति अहंकार के कारण हुआ, अति दानी होने के कारण राजा बलि को बंधन में बंधना पड़ा, अतः अति किसी भी वस्तु की अच्छी नहीं होती।

  • सामर्थ्यवान के लिए कौन सा कार्य कठिन है? श्रम करने वाले के लिए कौन सा स्थान दूर है। विद्वान के लिए विदेश कहाँ है? मृदुभाषी का अहित कौन कर सकता है?

  • जिस प्रकार से सुगन्धित फूलों वाला केवल एक वृक्ष पूरे वन को महका देता है उसी प्रकार से केवल एक गुणवान पुत्र पूरे कुल को प्रतिष्ठा दिलाता है।

  • जिस प्रकार से केवल एक सूखा वृक्ष जलकर पूरे वन को भस्म कर देता है उसी प्रकार से केवल एक कपूत पूरे कुल की मान-मर्यादा एवं प्रतिष्ठा को नष्ट कर देता है।

  • जिस प्रकार से चन्द्रमा के उदय होने से रात जगमगा उठती है उसी प्रकार से विद्वान एवं सदाचारी पुत्र से सम्पूर्ण परिवार खुशहाल हो जाता है।

  • दुःख एवं निराशा देने वाले अनेक पुत्र किस काम के हैं? इससे तो अच्छा है कि परिवार को आश्रय एवं शान्ति प्रदान करने वाला एक ही पुत्र हो।

  • पाँच वर्ष की आयु तक पुत्र का पालन लाड़-प्यार के साथ करना चाहिए, बाद के दस साल तक उसे छड़ी से डराना चाहिए किन्तु सोलह वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने पर पुत्र के साथ मित्रवत व्यवहार करना चाहिए।

  • भयावह आपदा के समय, विदेशी आक्रमण होने पर, भयानक अकाल पड़ने पर तथा दुष्ट व्यक्ति का साथ हो जाने पर जो व्यक्ति दूर भाग जाता है, वही व्यक्ति हमेशा सुरक्षित होता है।

  • जो व्यक्ति धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष अर्जित नहीं कर सकता उसे बार-बार जन्म लेना और मरना पड़ता है।

  • धन की देवी लक्ष्मी स्वयमेव तथा स्वेच्छा से वहाँ चली आती हैं जहाँ -
    मूखो का सम्मान नहीं होता।
    अनाज का सही प्रकार से भण्डारण होता है।
    पति-पत्नी का आपस मे विवाद नहीं।

Thursday, January 29, 2015

चाणक्य नीति - अध्याय 2 (Chanakya Neeti in Hindi)


  • औरतो के कुछ नैसर्गिक दुर्गुण है -
    झूठ बोलना
    कठोरता
    छल करना
    बेवकूफी करना
    लालच
    अपवित्रता
    निर्दयता 
  • सामान्य तप का फल नहीं है -
    भोजन के योग्य पदार्थ की उपलब्धता और भोजन करने की क्षमता होना
    सुन्दर स्त्री की प्राप्ति और उसे भोगने के लिए काम शक्ति होना
    पर्याप्त धनराशि का होना तथा दान देने की भावना
  • वह व्यक्ति धरती पर स्वर्ग को पा लेता है -
    जिसका पुत्र आज्ञांकारी हो
    जिसकी पत्नी उसकी इच्छा के अनुरूप व्यव्हार करती हो
    जो अपने कमाये धन से संतुष्ट हो
  • पुत्र वही है जो पिता का आज्ञापालन करे, पिता वही है जो पुत्रों का पालन-पोषण करे, मित्र वही है जिस पर पूरा विश्वास किया जा सके और पत्नी वही है जिससे सुख प्राप्त हो।
  • ऐसे लोगों से बचकर रहना चाहिए जो आपके मुँह के सामने मीठी बातें करते हैं, किन्तु आपके पीठ पीछे आपके विनाश की योजना बनाते है। ऐसा करने वाले उस विष के घड़े के समान है जिसकी उपरी सतह दूध से भरी हो।
  • किसी बुरे मित्र पर तो कभी विश्वास करें हीं नहीं, साथ ही किसी अच्छे मित्र पर भी विश्वास न करें, क्योंकि आपसे रुष्ट होने पर ऐसे लोग आप के सारे रहस्यों को अन्य लोगों को बता देंगे।
  • जिस किसी भी कार्य को करने के लिए आपने निश्चय किया है, उसे किसी के समक्ष प्रकट न करें तथा बुद्धिमत्तापूर्ण तरीके से उसे कार्यरूप में परिणित कर दें।
  • मूर्खता निश्चित रूप से कष्ट देती है, वैसे ही युवावस्था भी निःसन्देह कष्टमय है, किन्तु सबसे अधिक दुःखदायी होता है किसी अन्य के घर जाकर उससे उपकृत होना।
  • प्रत्येक पर्वत पर माणिक्य नहीं मिलते, प्रत्येक हाथी के सिर पर मणि नहीं होता, प्रत्येक स्थान में साधु नहीं मिलते और प्रत्येक वन में चन्दन का वृक्ष नहीं होता।
  • बुद्धिमान व्यक्ति को अपने पुत्रों को नैतिकता की शिक्षा देनी चाहिए, क्योंकि नीतिशास्त्र में निपुण एवं अच्छा व्यवहार करने वाले पुत्र परिवार की कीर्ति होते हैं।
  • अपनी सन्तान को शिक्षा से वंचित रखने वाले माता-पिता अपनी ही सन्तान के शत्रु होते हैं, क्योंकि विद्या से रहित बालक विद्वानों की सभा में वैसे ही तिरस्कृत होते हैं जैसे कि हंसों की सभा में बगुले।
  • बच्चों मे गलत आदते पैदा करती है और ताड़ना से अच्छी आदतें, इसलिए बच्चों को, जरुरत पड़ने पर, अपने शिष्यों दण्डित करना चाहिए, लाड कभी भी ना करें।
  • बिना एक श्लोक, आधा श्लोक, चौथाई श्लोक, या श्लोक का केवल एक अक्षर सीखे या दान, अभ्यास या कोई पवित्र कार्य किये बिना किसी भी दिन को नहीं जाने देना चाहिए।
  • बिना अग्नि के शरीर को जलाती हैं -
    पत्नी से वियोग
    अपनों से अनादर
    बचा हुआ ऋण
    दुष्ट राजा की सेवा
    गरीबी
    अव्यवस्थित सभा
  • निःसन्देह शीघ्र नष्ट हो जाते हैं -
    नदी किनारे के वृक्ष
    दूसरे व्यक्ति के घर में रहने वाली स्त्री
    बिना मंत्री का राजा
  • ब्राह्मण का बल है तेज और विद्या, राजा का बल है उसकी सेना, वैश्य का बल है उसका धन और शूद्र का बल है उसकी सेवा-भावना।
  • वेश्या को निर्धन व्यक्ति का त्याग करना पड़ता है, प्रजा को पराजित राजा का त्याग करना पड़ता है, पक्षियों को फलरहित वृक्ष का त्याग का त्याग करना पड़ता है और अतिथियों को भोजन करने के पश्चात् अपना आतिथ्य करने वाले के घर का त्याग करना पड़ता है।
  • दक्षिणा मिल जाने पर ब्राह्मण यजमान के घर से चला जाता है, विद्या प्राप्ति के बाद शिष्य गुरु के घर से चला जाता है और आग से जल जाने पर पशु वन से चले जाते हैं।
  • दुराचारी, कुदृष्टि रखने वाले तथा धूर्त व्यक्ति के साथ मित्रता करने वाले का शीघ्र नाश हो जाता है।
  • प्रेम और मित्रता बराबर वालों में ही फलता है, राजा की सेवा करने वाले को ही सम्मान मिलता है, सार्वजनिक व्यवहार में व्यावसायिक बुद्धि वाला ही अच्छा होता है और सुन्दर महिला अपने घर में ही सुरक्षित होती है।

Monday, January 26, 2015

चाणक्य नीति - अध्याय 1 (Chanakya Neeti in Hindi)

  • प्रकाण्ड पण्डित भी घोर कष्ट में आ जाता है जब वह
    किसी मूर्ख को उपदेश देता है
    वह दुष्ट पत्नी का पालन-पोषण करता है
    किसी दुखी व्यक्ति के साथ अतयंत घनिष्ठ सम्बन्ध बना लेता है
    दुष्ट पत्नी, झूठा मित्र, धृष्ट नौकर और साँप के साथ निवास करना अपनी मृत्यु को निमन्त्रित करना है

  • दुर्दिन से निबटने के लिए धन संचय करना चाहिए। पत्नी की रक्षा के लिए, आवश्यक हो तो, धन का भी त्याग कर देना चाहिए। आत्म-रक्षा के लिए, आवश्यक हो तो, धन और पत्नी दोनों का ही बलिदान कर देना चाहए।

  • भविष्य में आने वाली आपदाओं के लिए धन जमा करना चाहिए। ऐसा कदापि न सोचें कि धनवान व्यक्ति पर, धन होने से, कभी आपदा नही आ सकती क्योंकि जब आपदा आती है तो धन भी साथ छोड़ देता है।

  • जहाँ मान-सम्मान न मिले, जहाँ आजीविका न मिले, जहाँ कोई मित्र न हो और जहाँ ज्ञानार्जन न हो सके ऐसे देश में कदापि निवास नहीं करना चाहिए।

  • उस स्थान में एक दिन भी निवास नहीं करना चाहिए जहाँ निम्न पाँच न हो -

    एक धनवान व्यक्ति
    एक ब्राह्मण जो वैदिक शास्त्रों में निपुण हो
    एक राजा
    एक नदी
    एक चिकित्सक
  • बुद्धिमान व्यक्ति को ऐसे देश में कभी नहीं जाना चाहिए जहाँ -

    आजीविका कमाने का कोई माध्यम ना हो
    लोगों को किसी बात का भय न हो
    लोगो को किसी बात की लज्जा न हो
    जहा लोग बुद्धिमान न हो
    लोगो की वृत्ति दान धरम करने की ना हो

  • नौकर की परीक्षा कर्त्तव्य-पालन से होती है, रिश्तेदारों की परीक्षा मुसीबत पड़ने पर होती है, मित्र की परीक्षा विपरीत परिस्थितियों में होती है और पत्नी की परीक्षा बुरे दिनों में होती है।

  • अच्छा मित्र वही है जो हमे निम्न परिस्थितियों में साथ न त्यागे -

    आवश्यकता पड़ने पर
    किसी प्रकार की दुर्घटना हो जाने पर
    जब अकाल पड़ा हो
    जब युद्ध चल रहा हो
    जब हमे राजा के दरबार मे जाना पड़े
    जब हमे श्मशान घाट जाना पड़े

  • जो व्यक्ति किसी नाशवान वस्तु के लिए ऐसी वस्तु को छोड़ देता है जिसका कभी नाश नहीं होता, तो नाशवान वस्तु को तो वह खोता ही है और निःसन्देह उसके हाथ से अविनाशी वस्तु भी निकल ही जाती है। 

  • बुद्धिमान व्यक्ति को सम्माननीय परिवार कन्या से ही विवाह करना चाहिए, भले की कन्या रूपवान न हो। हीन परिवार की कन्या चाहे कितनी भी सुन्दर क्यों न हो, उससे विवाह नहीं करना चाहिए। शादी-ब्याह हमेशा बराबरी के परिवारों मे ही उचित होता है।

  • निम्न पाँच पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए  -

    नदियाँ
    जिन व्यक्तियों के पास अस्त्र-शस्त्र हों
    नाख़ून और सींग वाले पशु
    औरतें (भोली सूरत)
    राज घराने के लोग

  • सम्भव हो तो विष मे से भी अमृत निकाल लेना चाहिए, यदि सोना गन्दगी में भी पड़ा हो तो उसे उठा तथा धोकर अपना लेना चाहिए, नीच कुल मे जन्म लेने वाले से भी ज्ञान ग्रहण करना लेना चाहिए और अच्छे गुणों से सम्पन्न बदनाम कन्या से भी सीख ग्रहण करना चाहिए।
  • महिलाओं में पुरुषों कि अपेक्षा भूख दोगुनी, लज्जा चारगुनी, साहस छःगुना और काम आठगुनी होती है।