हे सर्वशक्तिमान परमात्मा!
आप जानते ही हैं कि मेरी उम्र साठ साल को पार कर गई है और मैं अब बूढ़ा हो चला हूँ।
मुझे अत्यधिक वाचाल याने कि बातूनी होने से बचाने की कृपा करें। ऐसी कृपा करें कि मैं अपने पुराने चुटकुले सुना-सुनाकर, अपने अतीत के किस्से बता-बता कर और लोगों को बिना माँगी सलाह दे-देकर पकाने की कोशिश करने से हमेशा बचूँ।
यह भी कृपा करें कि मैं लोगों के समक्ष अपनी बातों को, अन्तहीन विस्तार न देकर, संक्षेप में रख सकूँ। मेरी बुद्धि में यह बात सदा बनी रहे कि अपनी बात को अनावश्यक विस्तार देकर लोगों के समय बर्बाद करने वाले वृद्धजनों को लोग और कुछ नहीं, बल्कि एक खूँसट बुड्ढा ही समझते हैं।
अपनी ही हाँकने के बजाय लोगों की बात को सुनने और समझने की क्षमता मुझे प्रदान करने की कृपा करें।
मुझे ऐसा आशीर्वाद दें कि इस उम्र में भी मैं लोगों के सुख-दुःख में साथ दे पाऊँ।
मुझ पर ऐसी कृपा करें कि मैं लोगों के सामने अपने परिजनों की निन्दा करने से हमेशा बचा रहूँ।
मेरे मन में कदापि यह विचार न बना रहे कि 'चूँकि मैं अन्य लोगों से उम्र में बड़ा हूँ ड़सलिए, मैं अन्य लोगों से अधिक बुद्धिमान और ज्ञानी हूँ', मेरे भीतर सदा आभास बना रहे कि यह जरूरी नहीं है कि उम्रदराज आदमी दूसरों से अधिक विवेकी हो।
मेरी इस पूरी प्रार्थना का सार यही है कि हे भगवान! आप मुझ ऐसी कृपा करें कि मैं इस वय में भी अपने अवगुणों से अवगत रह पाऊँ ताकि लोग मुझे सठियाया हुआ बुड्ढा, सनकी बुड्ढा, झक्की बुड्ढा, खूँसट बुड्ढा जैसी उपाधि प्रदान करने से परहेज करें।
Monday, April 20, 2015
Saturday, March 21, 2015
हिन्दू नववर्ष
- हिन्दू नववर्ष (Hindu New Year) का आरम्भ प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से होता है। आज भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन है और आज से हिन्दू नव संवत्सर 2072 का आरम्भ हो रहा है।
- हिन्दू मान्यता के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन से सृष्टि की रचना का पहला दिन है। ब्रह्मा जी ने आज से लगभग एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 111 वर्ष पूर्व आज के दिन ही से सृष्टि की रचना शुरू की थी।
- रावण का वध करके लंका से अयोध्या वापस आने के बाद भगवान श्री राम का राज्याभिषेक आज ही के दिन, अर्थात् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के ही दिन, हुआ था।
- चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन से ही चैत्र नवरात्रि का आरम्भ होता है।
- आज से लगभग 5113 वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ था, जिसकी स्मृति में युगाब्द संवत्सर आरम्भ किया गया।
- भारत के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य द्वारा चलाये गये विक्रम संवत का आरम्भ भी आज से 2072 वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही से हुआ था।
- आज से 1937 वर्ष पूर्व आज ही के दिन से शालिवाहन शक संवत का आरम्भ हुआ था। उल्लेखनीय है कि शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित किया था।
- सिख परम्परा के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को गुरु अंगद देव प्रकटोत्सव मनाया जाता है। गुरु अंगद देव सिखों के द्वितीय गुरु हैं।
- आर्य समाज की स्थापना भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही हुई थी।
- सिंध प्रान्त के सुप्रसिद्ध समाज रक्षक संत झूलेलाल, जिन्हें भगवान वरुण का अवतार माना जाता है, भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही प्रकट हुए थे।
- उल्लास और उमंग प्रदान करने वाला ऋतुराज वसन्त का आरम्भ भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही होता है।
- अंग्रेजी नववर्ष रात्रि के बारह बजे नीरव अन्धकार में आता है जबकि हिन्दू नववर्ष प्रातः सूर्योदय के समय पक्षियों के मधुर कलरव के साथ आता है; अंग्रेजी नववर्ष आने के समय पतझड़ का मौसम होता है जिसके कारण प्रकृति का सौन्दर्य फीका रहता है जबकि हिन्दू नववर्ष आने के समय वसन्त ऋतु होता है जो कि प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में हर्ष, उल्लास और उमंग को उद्दीप्त करती है; अग्रेजी नववर्ष मादक पदार्थों का सेवन करके हो-हल्ला मचा कर मनाया जाता है जबकि हिन्दू नववर्ष शान्ति के साथ पूजा-पाठ करके मनाया जाता है।
Friday, March 20, 2015
परिवर्तन
इस संसार में कुछ भी स्थिर नहीं है, परिवर्तन (variance) ही संसार का नियम है। समय बदलने के साथ ही साथ अनेक प्रकार के उलट-फेर (somerset) होना स्वाभाविक बात है। इस सत्य को समस्त विद्वानों ने स्वीकारा है।
किसी ने सच ही कहा है - सदा न जोबन थिर रहे, सदा न जीवै कोय।
रावण का वंश बहुत विशाल था पर हुआ क्या? यही ना -
इक लख पूत सवा लख नाती,
ता रावण घर दिया ना बाती।
यह तो समय बदल जाने की ही बात है।
महाभारत के शान्ति पर्व (80/8) में परिवर्तन (variance, somerset) को लक्ष्य करते हुए वेदव्यास जी लिखते हैं -
असाधुः साधुतामेति साधुर्भवति दारुणः।
अरिश्च मित्रं भवति मित्रं चापि प्रदुष्यति॥
भावार्थः असाधु अर्थात दुष्ट मनुष्य साधु अर्थात भला व्यक्ति बन जाता है और साधु अर्थात भला व्यक्ति दारुण अर्थात दुष्ट बन जाता है, शत्रु मित्र बन जाता है और मित्र शत्रु।
सच पूछा जाय तो मनुष्य बलवान नहीं होता, समय ही बलवान होता है, इसीलिए तो कहा गया है
पुरुष बली नहि होत है समय होत बलवान।
भीलन लूटी गोपिका वहि अर्जुन वहि बान॥
मलिक मोहम्मद जायसी अपनी सुप्रसिद्ध रचना पद्मावत में कहते हैं -
मोतिहि जौं मलीन होइ करा। पुनि सो पानि कहाँ निरमरा॥
भावार्थः एक बार मोती की कान्ति मलिन हो जाने पर उसे फिर से वही कान्ति नहीं मिलती।
समय के साथ परिवर्तन कैसे होता है यह बताते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं -
तुलसी पावस के समय धरी कोकिलन मौन।
अब तो दादुर बोलिहैं हमें पूछिहै कौन॥
भावार्थः तुलसीदास जी कहते हैं कि पावस ऋतु अर्थात बरसात का मौसम आने पर कोयल मौन धारण कर लेती है, क्योंकि मेढकों के टर्राने की आवाज के बीच कोयल की आवाज कौन सुनेगा?
नरोत्तमदास अपनी प्रसिद्ध खंडकाव्य "सुदामाचरित" में कहते हैं -
कै वह टूटि सी छानी हुती कहँ
कंचन के सब धाम सुहावत।
कै पग मे पनही न हुती कहँ
लै गजराजहु ठाढ़े महावत॥
भूमि कठोर पै रात कटै कहँ
कोमल सेज पै नींद न आवत।
कै जुरतो नहिं कोदो सवाँ, प्रभु
कै परताप ते दाख न भावत॥
भावार्थः कृष्ण के सखा सुदामा का कभी टूटी छत वाली झोपड़ी थी तो अब विशाल भवन है जिसे सारे कमरे सोने से सुसज्जित हैं। कभी सुदामा के पैरों में पनही तक नहीं होती थी और अब उनके लिए हाथी लेकर महावत खड़े रहते हैं। कभी कठोर भूमि पर सोकर रात कटती थी तो अब कोमल शय्या पर भी नींद नहीं आती और कभी मोटा-झोटा अन्न तक भी नहीं मिल पाता था और आज मेवे भी सुदामा को भाते नहीं हैं।
समय के बारे में कवि बिहारी लिखते हैं -
समै पलटि पलटै प्रकृति, को न तजै निज चाल।
भावार्थः समय बदलने पर प्रकृति भी पलट जाती है, इस संसार में भला ऐसा कौन है जो समय के साथ अपनी चाल न बदलता हो।
जयशंकर प्रसाद अपने नाटक "स्कन्दगुप्त" में लिखते हैं -
परिवर्तन ही सृष्टि है, जीवन है। स्थिर होना मृत्यु है, निश्चेष्ट शान्ति मरण है। प्रकृति क्रियाशील है।
सुमित्रानन्दन पंत जी अपनी रचना "पल्लव" में कहते हैं -
आज बचपन का कोमल गात जरा का पीला पात।
चार दिन सुखद चाँदनी रात और फिर अंधकार अज्ञात॥
भावार्थः बचपन में जो कोमल शरीर था वह आज वृद्धावस्था में पीला और झुर्रीदार हो गया है। चार दिन की सुखद चाँदनी होती है फिर अंधेरा ही रह जाता है।
"भारत भारती" में मैथिलीशरण गुप्त जी बताते हैं -
संसार में किसका समय है एक सा रहता सदा,
है निशि-दिवा सी चूमती सर्वत्र विपदा-सम्पदा।
जो आज राजा बन रहा है रंक कल होता वही,
जो आज उत्सव-मग्न है कल शोक से रोता वही॥
भावार्थः इस संसार में भला किसका समय एक सा रहता है! रात और दिन की तरह विपत्ति और सम्पत्ति आते-जाते रहते हैं। जो आज अमीर है वही कल गरीब हो जाता है और जो आज उत्सव मना रहा है उसी को कल शोक से रोना भी पड़ता है।
"चित्रलेखा" उपन्यास में भगवतीचरण वर्मा जी लिखते हैं -
संसार क्या है? शून्य है। और परिवर्तन उस शून्य की चाल है।
बन्धुओं समय कभी भी एक जैसा नहीं होता, आपने ये लोकोक्तियाँ अवश्य ही सुनी होंगी
"सब दिन जात न एक समान"
"कभी दिन बड़े तो कभी रात बड़ी"
"कभी नाव गाड़ी पर, कभी गाड़ी नाव पर"
"चार दिनों की चांदनी फिर अंधियारी रात"
"घूरे के भी दिन फिरते हैं"
अतः समय के अनुसार स्वयं को ढालने में ही बेहतरी है।
किसी ने सच ही कहा है - सदा न जोबन थिर रहे, सदा न जीवै कोय।
रावण का वंश बहुत विशाल था पर हुआ क्या? यही ना -
इक लख पूत सवा लख नाती,
ता रावण घर दिया ना बाती।
यह तो समय बदल जाने की ही बात है।
महाभारत के शान्ति पर्व (80/8) में परिवर्तन (variance, somerset) को लक्ष्य करते हुए वेदव्यास जी लिखते हैं -
असाधुः साधुतामेति साधुर्भवति दारुणः।
अरिश्च मित्रं भवति मित्रं चापि प्रदुष्यति॥
भावार्थः असाधु अर्थात दुष्ट मनुष्य साधु अर्थात भला व्यक्ति बन जाता है और साधु अर्थात भला व्यक्ति दारुण अर्थात दुष्ट बन जाता है, शत्रु मित्र बन जाता है और मित्र शत्रु।
सच पूछा जाय तो मनुष्य बलवान नहीं होता, समय ही बलवान होता है, इसीलिए तो कहा गया है
पुरुष बली नहि होत है समय होत बलवान।
भीलन लूटी गोपिका वहि अर्जुन वहि बान॥
मलिक मोहम्मद जायसी अपनी सुप्रसिद्ध रचना पद्मावत में कहते हैं -
मोतिहि जौं मलीन होइ करा। पुनि सो पानि कहाँ निरमरा॥
भावार्थः एक बार मोती की कान्ति मलिन हो जाने पर उसे फिर से वही कान्ति नहीं मिलती।
समय के साथ परिवर्तन कैसे होता है यह बताते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं -
तुलसी पावस के समय धरी कोकिलन मौन।
अब तो दादुर बोलिहैं हमें पूछिहै कौन॥
भावार्थः तुलसीदास जी कहते हैं कि पावस ऋतु अर्थात बरसात का मौसम आने पर कोयल मौन धारण कर लेती है, क्योंकि मेढकों के टर्राने की आवाज के बीच कोयल की आवाज कौन सुनेगा?
नरोत्तमदास अपनी प्रसिद्ध खंडकाव्य "सुदामाचरित" में कहते हैं -
कै वह टूटि सी छानी हुती कहँ
कंचन के सब धाम सुहावत।
कै पग मे पनही न हुती कहँ
लै गजराजहु ठाढ़े महावत॥
भूमि कठोर पै रात कटै कहँ
कोमल सेज पै नींद न आवत।
कै जुरतो नहिं कोदो सवाँ, प्रभु
कै परताप ते दाख न भावत॥
भावार्थः कृष्ण के सखा सुदामा का कभी टूटी छत वाली झोपड़ी थी तो अब विशाल भवन है जिसे सारे कमरे सोने से सुसज्जित हैं। कभी सुदामा के पैरों में पनही तक नहीं होती थी और अब उनके लिए हाथी लेकर महावत खड़े रहते हैं। कभी कठोर भूमि पर सोकर रात कटती थी तो अब कोमल शय्या पर भी नींद नहीं आती और कभी मोटा-झोटा अन्न तक भी नहीं मिल पाता था और आज मेवे भी सुदामा को भाते नहीं हैं।
समय के बारे में कवि बिहारी लिखते हैं -
समै पलटि पलटै प्रकृति, को न तजै निज चाल।
भावार्थः समय बदलने पर प्रकृति भी पलट जाती है, इस संसार में भला ऐसा कौन है जो समय के साथ अपनी चाल न बदलता हो।
जयशंकर प्रसाद अपने नाटक "स्कन्दगुप्त" में लिखते हैं -
परिवर्तन ही सृष्टि है, जीवन है। स्थिर होना मृत्यु है, निश्चेष्ट शान्ति मरण है। प्रकृति क्रियाशील है।
सुमित्रानन्दन पंत जी अपनी रचना "पल्लव" में कहते हैं -
आज बचपन का कोमल गात जरा का पीला पात।
चार दिन सुखद चाँदनी रात और फिर अंधकार अज्ञात॥
भावार्थः बचपन में जो कोमल शरीर था वह आज वृद्धावस्था में पीला और झुर्रीदार हो गया है। चार दिन की सुखद चाँदनी होती है फिर अंधेरा ही रह जाता है।
"भारत भारती" में मैथिलीशरण गुप्त जी बताते हैं -
संसार में किसका समय है एक सा रहता सदा,
है निशि-दिवा सी चूमती सर्वत्र विपदा-सम्पदा।
जो आज राजा बन रहा है रंक कल होता वही,
जो आज उत्सव-मग्न है कल शोक से रोता वही॥
भावार्थः इस संसार में भला किसका समय एक सा रहता है! रात और दिन की तरह विपत्ति और सम्पत्ति आते-जाते रहते हैं। जो आज अमीर है वही कल गरीब हो जाता है और जो आज उत्सव मना रहा है उसी को कल शोक से रोना भी पड़ता है।
"चित्रलेखा" उपन्यास में भगवतीचरण वर्मा जी लिखते हैं -
संसार क्या है? शून्य है। और परिवर्तन उस शून्य की चाल है।
बन्धुओं समय कभी भी एक जैसा नहीं होता, आपने ये लोकोक्तियाँ अवश्य ही सुनी होंगी
"सब दिन जात न एक समान"
"कभी दिन बड़े तो कभी रात बड़ी"
"कभी नाव गाड़ी पर, कभी गाड़ी नाव पर"
"चार दिनों की चांदनी फिर अंधियारी रात"
"घूरे के भी दिन फिरते हैं"
अतः समय के अनुसार स्वयं को ढालने में ही बेहतरी है।
Friday, March 13, 2015
कलम-दवात और काले हाथ
कल एक व्यापारी मित्र ने अनुरोध किया कि मैं उनका बैंक अकाउंट खोलने का फॉर्म भर दूँ। फॉर्म तो मैंने भर दिया किन्तु फॉर्म भरने के लिए पेन निकालते समय विचार आया कि न जाने कितने दिनों से मैंन कुछ लिखने के लिए पेन का प्रयोग नहीं किया है। आजकल पेन तो सिर्फ हस्ताक्षर करने के लिए ही निकलता है, या फिर कभी कोई फॉर्म भरने के लिए। कुछ, सार्थक या निरर्थक ही सही, लिखने के लिए मैंने पेन का प्रयोग कब किया था, बहुत सोचने पर भी याद नहीं आया। अब लिखना होता ही कहाँ है? अब तो सिर्फ कम्प्यूटर में टाइप करना ही होता है।
विचारों के सागर में गोते लगाता हुआ मैं धीरे-धीरे बीते हुए समय की ओर जाने लगा। आज जेल पेन, उसके पहले बॉल पेन, बॉल पेन के पहले फाउंटेन पेन और उसके भी पहले कलम-दवात।
दवात को धो-पोंछ कर उसमें स्याही भरना...
स्याही भरते समय हाथ, कभी-कभी कपड़ों, का काला हो जाना...
लिखते समय कलम का निब टूट जाने पर परेशान होना...
लिखावट सुन्दर न होने के कारण गुरुजी से डाँट पड़ना और कभी-कभी मार खाना...
पर यह सब मैं लिख क्यों रहा हूँ? शायद इसलिए कि अतीत में जीते रहना वृद्धों का स्वभाव बन जाता है।
वैसे भी प्रेमचंद जी ने अपने उपन्यास 'गोदान' में लिखा है -
बूढ़ों के लिए अतीत के सुखों और वर्तमान के दु:खों और भविष्य के सर्वनाश से ज्यादा मनोरंजक और कोई प्रसंग नहीं होता।
Monday, March 9, 2015
औरत संसार की क़िस्मत है फिर भी...
साहिर लुधियानवी
औरत ने जनम दिया मर्दों को
मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
जब जी चाहा मसला कुचला
जब जी चाहा दुत्कार दिया
तुलती है कहीं दीनारों में
बिकती है कहीं बाज़ारों में
नंगी नचवाई जाती है
ऐय्याशों के दरबारों में
ये वो बेइज़्ज़त चीज़ है जो
बँट जाती है इज़्ज़तदारों में
औरत ने जनम दिया मर्दों को...
मर्दों के लिये हर ज़ुल्म रवाँ
औरत के लिये रोना भी खता
मर्दों के लिये लाखों सेजें
औरत के लिये बस एक चिता
मर्दों के लिये हर ऐश का हक़
औरत के लिये जीना भी सज़ा
औरत ने जनम दिया मर्दों को...
जिन होठों ने इनको प्यार किया
उन होठों का व्यौपार किया
जिस कोख में इनका जिस्म ढला
उस कोख का कारोबार किया
जिस तन से उगे कोपल बन कर
उस तन को ज़लील-ओ-ख़ार किया
औरत ने जनम दिया मर्दों को...
मर्दों ने बनायी जो रस्में
उनको हक़ का फ़रमान कहा
औरत के ज़िन्दा जलने को
कुर्बानी और बलिदान कहा
इस्मत के बदले रोटी दी
और उसको भी एहसान कहा
औरत ने जनम दिया मर्दों को...
संसार की हर एक बेशर्मी
गुर्बत की गोद में पलती है
चकलों ही में आ के रुकती है
फ़ाकों से जो राह निकलती है
मर्दों की हवस है जो अक्सर
औरत के पाप में ढलती है
औरत ने जनम दिया मर्दों को...
औरत संसार की क़िस्मत है
फ़िर भी तक़दीर की हेटी है
अवतार पयम्बर जनती है
फिर भी शैतान की बेटी है
ये वो बदक़िस्मत माँ है जो
बेटों की सेज़ पे लेटी है
औरत ने जनम दिया मर्दों को...
Subscribe to:
Posts (Atom)

