धान के देश में!

जी.के. अवधिया का ब्लॉग

Saturday, September 8, 2007

कलंक का अंत 3

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- 3 - अठारह वर्ष का समय बीत गया दिलेर सिंह को गायब हुये। बम्बई के कालेज का वातावरण रोमांस और चहल-पहल से मुस्कुरा रहा था। कॉलेज-बिल्डिंग के स...
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Friday, September 7, 2007

कलंक का अंत - 2

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रचयिता : स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया - 2 - खोह के आन्तरिक भाग में गुफा-द्वार की ओर से छन-छन कर प्रकाश बिखर रहा था। ऊबड़-खाबड़ दीवार पर अनेकों प...
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Thursday, September 6, 2007

कलंक का अंत

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(रचयिता श्री हरिप्रसाद अवधिया) - 1 - "गाड़ियाँ एकदम रोक दो।" गम्भीर और कड़कती हुई आवाज चांदनी रात के वक्षस्थल पर थिरक उठी! समस्त वन-...
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Wednesday, September 5, 2007

शबरी के बेर

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(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित खण्ड-काव्य) भारत के दक्षिण भागों में, फैले थे बीहड़ वन-खण्ड। दण्डक-वन कहलाते थे वे, जीव-जन्तु थे वहाँ प्रचण्...
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Tuesday, September 4, 2007

भूमिका

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स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित छत्तीसगढ़ का प्रथम आँचलिक उपन्यास 'धान के देश में' के लिये श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी लिखित भूमिका ...
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