धान के देश में!
जी.के. अवधिया का ब्लॉग
Thursday, March 13, 2008
ऋतुराज वसन्त
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(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता) निर्मल नभ, मन्द पवन, पुष्प-गन्ध की व्यापकता, खग-कलरव, उन्मन भव, मत्त मदन की मादकता। अलि गण गुंजन, मु...
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Monday, March 10, 2008
वसन्त की बहार
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(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता) ऋतुराज है - वासन्ती साज है, वसन्त पर हमें नाज है, प्रकृति के मंच पर - नया संगीत नया साज है। मौर लगे ...
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राजिम मेला
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(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित छत्तीसगढ़ी कविता) चल संगवारी राजिम मेला घूमघाम के आबोन जी, महानदी में पुन्नी नहा के राजिम लोचन के दरसन पाबोन...
Sunday, January 6, 2008
संविधान की बन्दिनी
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(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता) अशोक वाटिका में बन्दिनी सीता- सहमी थी राक्षसियों से घिरी हुई, आज हिन्दी बन्दिनी है संविधान में, अन्य...
Saturday, January 5, 2008
नया साल है
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(स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया रचित कविता) नया साल है- लेकिन कौन खुशहाल है? जो पहले चलता था वही अब भी बहाल है। नये वर्ष में- क्या स्वभाव बदल जा...
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