धान के देश में!

जी.के. अवधिया का ब्लॉग

Saturday, April 17, 2010

चूमा सामने वाले ने और झापड़ मुझे खाना पड़ा

›
ट्रेन चली जा रही थी। फर्स्ट क्लास के एक कूपे में चार लोग बैठे थे - एक अधेड़ महिला, एक खूबसूरत युवती, एक अपने देश का युवक और एक पड़ोसी देश का य...
11 comments:
Friday, April 16, 2010

दीवारों में दरारें या दरारों के कारण दीवारें

›
यदि कोई दीवार है तो कभी ना कभी उसमें दरार भी पड़ेगी ही। किन्तु कई बार सोचता हूँ कि आखिर ये दीवारें बनती क्यों हैं? मुझे तो यही लगता है कि भाई...
5 comments:
Thursday, April 15, 2010

ना दुश्मनी के ढब हैं ना दोस्ती का तौर

›
प्रत्येक आदमी किसी ना किसी का दोस्त होता है और किसी ना किसी का दुश्मन भी होता है। शायद ही कोई ऐसा हो जिसकी न तो किसी से दोस्ती हो और न ही कि...
8 comments:
Wednesday, April 14, 2010

क्यों प्रेम से खिलाये? ... जिसे खाना है खाये जिसे नहीं खाना न खाये

›
"एक पूरी तो और लीजिये, बिल्कुल गरम है!" "बस, अब और नहीं ले सकता, पेट भर गया है।" "अच्छा एक गुलाबजामुन ले लीजिये...
8 comments:
Tuesday, April 13, 2010

मेरी ईपुस्तक का रिव्ह्यू श्री समीर लाल 'समीर' के द्वारा

›
मैं आभारी हूँ श्री समीर जी का जिन्होंने मेरी ईपुरस्तक "अंग्रेजी कहावतें हिन्दी भावार्थ" पर रिव्ह्यू लिख कर मेरी ईपुस्तक के विषय मे...
12 comments:
‹
›
Home
View web version

मेरे बारे में -

  • Admin
  • Unknown
Powered by Blogger.